पर्यटनः रोम-एक अजब कथा-सन्तोष बंसल

किसी देश की सभ्यता और संस्कृति जितनी प्राचीन होती है, उसकी उतनी ही तीखी गंध वहां की जमीन पर पसरी होती है। रोम ऐसा ही नगर है, जहाँ पहुँच कर एक अजीब सी मिली -जुली गंध का आभास हुआ । पश्चिमी सभ्यता का जन्मस्थल यह शहर फैशन एवं डिजाइन के साथ फिल्म स्टूडियोज का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। यूरोपीय संघ का तीसरा प्रिय शहर, रोम इसी आकर्षण के कारण पूरे संसार में पर्यटन का प्रमुख स्थान है। दिल्ली के हवाई अड्डे से फ़्लाइट पकड़ कर जब हम रोम के हवाई अड्डे ( Fiumicino Airport )पहुंचे, तो टर्मिनल तक पहुँचने के लिए मैट्रो ट्रेन लेनी पडी। लेकिन वहां सीढ़ियां उतरने के बाद, प्रवेश की अनुमति लेने के लिए हमें कई घंटों तक लाइन में लगे रहना पड़ा। एक तो बेसमेंट का छोटा सा हॉल, तिस पर अन्य उडानों से आने वाले लोग आगे चले जाते और हम वहीं पंक्ति में गोल -गोल घूमते रहे। सिगरेट पीने की अनुमति होने से वे सब धुंआ उड़ाते हुए बेफिक्री से आगे बढ़ जाते। उनके चेहरे की शुष्कता और सपाटपन कुछ अलग किस्म का था, जो मेरे लिए नया था। अपने में खोये हुए, आस -पास के माहौल से बेखबर, कुछ ऐसा ही इन लोगों के व्यवहार में झलक रहा था। ज्यादातर यात्रियों की पोशाक ब्लैक या चॉकलेटी ब्राउन कलर की थी, जिनको देखकर रंग -बिरंगेपन का अहसास नहीं होता था। हरेक को आगे पहुँच खुद को पहले निकल जाने की जल्दी थी, जबकि पासपोर्ट चैकिंग के लिए सिर्फ एक या दो काउंटर पर अधिकारी विधमान थे। इसीलिए लाइने तो खिसकी नहीं, बल्कि खिड़की के समीप झुण्ड- सा एकत्रित हो गया। तभी वहां ‘सिक्योरिटी’ के लिए नियुक्त व्यक्ति को हमने शिकायत की, तो वह अपने अफसर को दौरे पर लाया। फिर भीड़ को देखते हुए ऑफिसर ने कॉल करके अन्य अधिकारियों को चैकिंग के लिए तैनात किया। दो-ढाई, तीन और फिर चार घंटे रेंगते -रेंगते, घुटन में सांस लेते हुए, जब हम स्टैम्प लगवा बाहर निकले, तो हमने राहत की सांस ली। तब हमारा पूरा ग्रुप इकट्ठा हो कर बाहर आया, जहाँ दालान में हाथ में झंडी लिए ‘ट्रिप एडवाइज़र ‘हमारा इन्तजार कर रहा था।
आसमान के खुलेपन के साथ कुदरती हवा का, काफी घंटो के बाद अहसास हुआ। कुछ ठंडक के साथ उस मौसम में बारिश की हल्की फुहारों की सीलन भी महसूस हुई। चूँकि रात के दस बजने को थे और पेट में चूहे भी दौड़ रहे थे। किसी भारतीय रेस्टोरेंट में शुद्ध शाकाहारी भोजन हमारे इन्तजार में ठंडा हो रहा था, इसीलिए लगभग दौड़ते हुए हम सबने अपना सामान बस की डिक्की में ‘लोड’ किया। दस -पंद्रह मिनट की सवारी के बाद हम उस क्षेत्र में पहुंचे, जो देखने में दिल्ली के दरियागंज में आसफअली रोड जैसा लग रहा था। इधर बारिश का पानी सड़कों को गीला कर चुका था, इसीलिए हम लोग झट से रेस्त्रां में घुस गए। बेहद पुरानी इमारत, जिसके अहाते में ही मेज -कुर्सियां एक-दूसरे से सटी हुई रखी थी। मद्धिम रोशनी में छिपा दीवारों का मटमैलापन जाहिर हो रहा था, जिन पर कहीं -कहीं दक्षिण भारतीय शैली के चित्र और मुखौटे टंगे थे। बीच में पुरानी हवेली के खम्बों जैसे स्तम्भ थे, जिन पर बहुत पुरानी तस्वीरें लगी थी। हमारी टेबल के पीछे ही कश्मीर का चिरपरिचित लकड़ी की कारीगिरी किया हुआ ‘डिवाइडर ‘रखा था, जिससे अंदर रसोई में कोई झाँक न सके। लेकिन उसके पीछे से खाना परोसने वाले अचानक से आते और बेहद आत्मीयता से गरमागर्म और सुस्वादु भोजन परोसते। खाना खाकर सभी लोग होटल (Mercure Roma West )की ओर रवाना हो गए, अगले दिन जल्द ही हमें रोम सिटी को देखने के लिए निकलना था। सुबह नाश्ता लेकर बाहर निकले, तो उजाले में रोम के बाहरी दृश्य से मेरा पहला साक्षात्कार था। वहां जो ख़ास बात मैंने देखी, वह सारे रास्ते में भी देखने को मिली। सामने की तरफ एक ही तरह के पेड़, लगभग एक ही साइज़ और ऊंचाई में कटे -छंटे थे। मुझे लगा, शायद होटल परिसर में कटिंग की है, लेकिन हैरानी तब हुई जब पूरे रोम में सब पेड़ों का ‘स्टाइल ‘एक जैसा देखा। जबकि भारत में पेड़ों की कुदरती बढ़त होती है और सड़कों किनारे पेड़ ऊँचे -नीचे फलते -फूलते देखें हैं। बस ने हमें एक सड़क पर किसी बाग़ के सम्मुख उतार दिया, जहाँ बहुत सी टूरिस्ट बसों की कतार लगी थी। बड़ी संख्या में पर्यटक सड़क पार करके दूसरी तरफ जा रहे थे, जहाँ हमें भी अपनी गाईड के साथ जाना था। इतने में सफ़ेद टॉप और पैंट में एक प्रौढ़ महिला ने अपना परिचय देते हुए हमें साथ चलने को कहा। वह अपनी बात को इतावली अंगरेजी में समझाने का प्रयास कर रही थी, किन्तु उसके वाक्यों के कुछ शब्द कानों में पहुँचने से पहले ही बाहर रह जाते। जितना हम सुन पा रहे थे, उससे टूटा –फूटा ही समझ आ रहा था। काफी दूर पैदल चलने के बाद हम एक खंडहरनुमा इमारत के निकट पहुंचे, जिसकी आकृति कुछ जानी -पहचानी लग रही थी। स्मार्ट एवं सभ्रांत सी दिखने वाली हमारी गाईड ‘कोलोसियम ‘के विषय में बताने से पूर्व यहाँ की खासियत बता रही थी। जैसे कि रोम यूरोप का सबसे प्राचीन शहर है और पश्चिमी सभ्यता का बर्थप्लेस है। इसका इतिहास लगभग 2800 वर्ष पुराना है, यानी रोम की स्थापना 753 BC ईसा पूर्व हुई। बॉलीवुड की ऑस्कर अवार्ड विजेता ‘ग्लेडियेटर्स ‘ मूवी से प्रसिद्द हुआ ‘कोलोसियम ‘भी 80 सदी (AD -80 ) में उद्घाटित हुआ था । पचास हजार दर्शकों की सामर्थ्य रखने वाला यह स्टेडियम ‘प्लेरियन एम्पीथिएटर ‘ के नाम से जाना जाता था। जहाँ खूंखार जानवरों और ‘ग्लेडिएटर्स ‘के मध्य युद्ध खेल दर्शाया जाता था।अचानक मुझे भारत के तमिलनाडु राज्य में ‘जल्लीकुट्टी ‘ उत्सव याद आया, जिसमे बड़ी संख्या में किसान और बैलों के बीच खेल युद्ध होता है। और जिस पर केंद्र सरकार ने कानून द्वारा रोक लगाने की कोशिश की थी, किन्तु जिसे केवल खेल करार कर ‘लोकल’ लोगों ने विरोध किया। अंततः वह रोक हटानी पडी और मानव एवं पशु के बीच का वह मल्ल युद्ध अब भी जारी है।लेकिन जब गाईड ने इस खेल युद्ध की वास्तविकता बताई, तो मैं सकते में आ गयी।’ग्लेडिएटर्स उन लड़ाकू बंधकों या गुलामों को कहा जाता था, जिन्हे खूंखार जानवरों से अंतिम सांस तक लड़ना होता था। अगर वे पांच बार उस आदमखोर पशु से विजयी होते, तभी उन्हें मुक्त किया जाता था। किसी हिंसक, खूनी खेल को मनोरंजन और रोमांच का माध्यम बनाने वाले इस स्टेडियम का प्रारम्भ सम्राट (Vespasian ) द्वारा किया गया। जिसे उनकी मृत्यु उपरान्त उनके पुत्र (Titus )ने पूर्ण किया और लगभग नौ वर्ष के बाद इसके उद्घाटन में आयोजित खेलों में पांच हजार जानवरों का क़त्ल किया गया। इसके बाद कुख्यात टार्ज़न ( 98 -117 AD ) ने यहाँ मैराथन का आयोजन किया, जो एक सौ सत्रह दिन चला। वह रोम का सबसे डरावना एवं भयावह पीरियड माना जाता है, जिसमे नौ हजार ग्लेडिएटर्स एवं दस हजार जानवर मारे गए। इस तरह यह एक क्रूर और भयावह खेल था, जो उस काल में सम्राटों के मनोरंजन का माध्यम था। उन क्रूरतम क्रियाओं की स्मृति स्वरूप रह गए इस खंडहर स्मारक को देखने से पता चल रहा था कि इस स्टेडियम की बाहरी दीवार की तीन परतें थी। जिसमे बीच -बीच में ‘कॉलम्स ‘डले हुए थे और दीवार के सबसे ऊपरी हिस्से में खिड़कियाँ भी बनी हुई थी। पूरे स्टेडियम में अस्सी प्रवेश द्वार बनाये गए, जिन्हे घृणित (Vomitoria ) नाम से जाना जाता था। इतनी अधिक तादाद में बनाये गए दरवाजों से, खेल को देखने के लिए दर्शक कुछ ही मिनटों में अंदर पहुँच सकते थे। गाईड ने आगे बताया कि भीतर लड़ाई के मैदान में लकड़ी के बने फर्श पर रेत बिछा रहता था, जिससे वहां फिसलन न हो। क्योंकि पशु और मानव युद्ध के दौरान एक तो ग्लेडिएटर्स के पैर न फिसले, दूसरे घाव से बहने वाला रक्त रेत आसानी से सोख सके। यह सुनकर एक बार तो मन वितृष्णा और ग्लानि से भर उठा कि रोम राजतंत्र की असभ्यता और अमानवीयता के किस दौर से गुजरा है ? तभी गाईड ने कहा कि गोलाई में बने इस स्टेडियम के सबसे निचले हिस्से में सीनियर ऑफिसर्स एवं मजिस्ट्रेट आदि के बैठने का इंतजाम होता था। एवं मध्य में अमीर नागरिकों का तथा सबसे ऊंचा स्थान राजसी परिवार के लिए था। स्त्रियों के लिये ऊपरी स्थल पर, किन्तु सस्ता वाला ‘सेक्शन ‘बनाया हुआ था। टेरेसनुमा (Podium )स्थल सिर्फ महाराज यानी सम्राट के लिए सुरक्षित था तथा ऊपर के तीनों हिस्से रोमन (Belvedere) नाम से जाने जाते थे। पांचवी सदी में रोमन एम्पायर के समाप्त होते ही यह थिएटर भी धूल -धूसरित हो गया था, लेकिन मध्य युग में ख्यात फैमिली (Frangi Pani )द्वारा इसकी दोबारा साज- संभार की गयी। एवं तब इस थिएटर का नाम ‘कोलोसियम ‘पड़ा, जो ‘कोलोसो डि निरोने ‘नामक नीरो से पड़ा एवं जिसका बड़ा सा ‘स्टेच्यू ‘यहाँ अभी तक खड़ा हुआ है। ‘ग्लेडिएटर्स ‘पिक्चर के बाद यह खंडहर लोगों की निगाह में आया और दो हजार ईस्वीं में इसको फिर से साफ़ किया गया। रोम के इतिहास के इस वीभत्स घटनाक्रम का साक्षी ‘कोलोसियम ‘आज भी अपनी बदसूरत छवि लिए मौजूद है और रोम का प्रतीक चिन्ह (Symbol of Rome )कहलाता है। काल के जिस चक्र में इंसानियत और उसकी शक्ति का इम्तहान लिया गया, यह उस राजतन्त्र की पाशविकता एवं अमानवीयता का घोतक होने के साथ उसकी अंतिम निशानी है। अगर हम देखें तो दो देशों की सेनाओं के बीच अब भी युद्ध होता है या इन्सान पशुओं से अपनी सुरक्षा के लिए लोहा भी लेता है। किन्तु इस तरह के आयोजन मानव मन के किस कोने की तुष्टि या मनोरंजन के साधन थे, यह प्रश्न कुरेदने वाला है। क्योंकि जान -बूझकर कोई भी इंसान एक -दूसरे की मौत का इंतजाम नहीं करता। उस काल की नृशंसता, क्रूरता, हिंसा और अमानवीयता का ऐतिहासिक स्मारक यह खंडहर ही ‘कोलोसियम ‘है, जो यहाँ प्रत्यक्ष विधमान है। लौटते समय रास्ते में कुछ इतावली लोग, पारम्परिक राजसी वेश -भूषा के पहनावें में नजर आये। वहां जुटने वाले लोगों की दाढ़ी तथा हाथ में सिगरेट ने अजीब सी गंध पैदा की हुई थी। गाईड ने उसी के सामने ऊँचे पेड़ों के बीच में दिखते एक साधारण से भवन की ओर इशारा करते हुए बताया कि यह मदर टेरेसा का पुराना निवास स्थान है।अचानक मेरे जेहन में बिशप वैलेंटाइन की स्मृति आई, जिन्हे प्रेम का सन्देश देने के जुर्म में रोमन सम्राट ने 270 ईसा पूर्व सज़ा -ए -मौत दी थी। फिर यहाँ की हिंसात्मकता के बीच उस मानवीय मिसाल की तस्वीर भी कौंध गयी, जिसने बीसवीं सदी में भारत के गरीब, बेसहारा लोगों को सहारा दिया। तो क्या रोम में ‘कोलोसियम ‘एवं मदर टेरेसा का यह स्थल अमानवीयता -मानवीयता, हिंसा -अंहिंसा की सापेक्षता का स्मारक है ? इसी के साथ मेरी स्मृति में बचपन में सुनी ‘क्रूर नीरो ‘ की दहशत भरी दास्ताँ उभर आई। वास्तव में कोई भी कहानी तब तक आपकी संवेदना की चूलें नहीं हिलाती, जब तक वह प्रत्यक्ष न हों। अथवा कभी भूले -भटके वे हमारे अनुभव में आ जाएँ, तो उनकी पीड़ा और अहसास मारक हो उठतें हैं । रोम में ‘कोलोसियम’ को देखकर, वे सारे दर्दनाक हादसे मेरे सामने तैरने लगे, जो फिल्म में देखें थे। वे सभी जिन्दा हो गए और उसमे देखी जघन्यता, बर्बरता भी। मेरे मष्तिष्क की ‘ स्क्रीन’ पर वह कहावत ताजी हो आई, ‘जब रोम जल रहा था तब नीरो बांसुरी बजा रहा था। ‘ रोम में नीरो पर आग लगवाने का आरोप लगाया जाता है और कहा जाता है कि उसने जानबूझ कर ऐसा किया। नीरो को ऐसे क्रूर शासक के रूप में जाना जाता है, जिसने अपनी माँ, सौतेले भाइयों और पत्नियों की हत्या करवाई और दरबार में मौजूद किन्नरों से शादियां की। सन 54 ईस्वीं में केवल सौलह वर्ष की आयु में नीरो अपनी माँ के प्रयासों से एक ऐसे साम्राज्य का बादशाह बना, जिसकी सीमाएं स्पेन से लेकर उत्तर में ब्रिटेन और पूर्व में सीरिया तक फ़ैली हुई थी। सिंहासन की भूखी नीरो की माँ अग्रिपीना ने महल में साजिशें और जोड़तोड़ करके बेटे को सत्ता दिलाई और नीरो की सबसे करीबी सलाहकार रही। जब नीरो ने सत्ता संभाली, तब तक रोमन सिक्कों पर नीरो की तस्वीर के साथ अग्रिपीना की तस्वीर भी होती थी। लेकिन सत्ता में आने के लगभग पांच साल बाद नीरो ने अपनी माँ की हत्या करा दी, शायद उसे अधिक शक्ति और स्वतंत्रता की हवस थी। उसका पहला प्रयास असफल रहा था, किन्तु उसने अपनी माँ पर बगावत का आरोप लगवाकर लोगों से उसकी हत्या करा दी। इसी कांड के कुछ सालों बाद ही ‘कोलोसियम ‘का निर्माण हुआ और यह जुल्म और नरसंहारता निरंतर चलती रही। इन तिथियों में मैं मानव मन के उन दुर्गम कोनों के भीतर झाँकने की कोशिश कर रही थी, जहाँ मनुष्यता और मानवीयता का नामोनिशान नहीं था। लेकिन इसी के समानांतर इस पीड़ा और दर्द को महसूस करने वालों की मुहीम भी चल रही थी, जिससे इस पर रोक लगाई जा सके। सम्भवतः प्रत्येक संस्कृति और सभ्यता में अच्छाई और बुराई का यह द्वंद्व युद्ध सदैव चलता रहता है, कभी समाप्त नहीं होता। इन्हीं यादों के बीच एक बड़ी सड़क पर गुजरते हुए गाईड ने एक स्थल की ओर इंगित करते हुए प्राचीन रोमन साम्राज्य और ‘इम्पीरियल फ़ोरम ‘के विषय में बताया और जिसके मध्य डिक्टेटर मुसोलिनी ने ही सड़क निर्माण करवाया। उस क्षेत्र में विभिन्न राजाओं द्वारा बहुत से ‘फ़ोरम ‘बनाये गए थे, जिनका निर्माण 46 BC-113 AD के बीच में हुआ था । उस समय यह स्थान इस शहर का मुख्य केंद्रीय बिंदु था, जहाँ महत्वपूर्ण ओहदों के व्यक्ति एकत्रित हो राजनीति एवं अर्थव्यवस्था के साथ धार्मिक तथा शैक्षणिक मुद्दों पर चर्चा करते थे। उन खंडहरों के रूप में ‘फ़ोरम ऑफ़ सीज़र ‘अपनी कहानी कह रहा था, जिसमे घुड़सवार सीज़र के ‘स्टैच्यू ‘के साथ ‘टेम्पल ऑफ़ गॉडेस वीनस ‘है। साथ ही ‘गॉड मार्स’ को अर्पित ‘फ़ोरम ऑफ़ ऑगस्टस ‘स्थित है (2 BC) ,जो अपने स्तम्भों के साथ अपनी कहानी स्वयं बता रहा था । एक तरह से इसका निर्माण ऑगस्टस का ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापन करना था, जिसने सीजर के क़त्ल करने वाले को हराने में उसकी मदद की थी। इन्हीं के पास ‘फ़ोरम ऑफ़ पीस ‘ है, जो येरुशलम पर विजयस्तम्भ के रूप में बनाया गया । यधपि यह सारा क्षेत्र आग लगने से नष्ट हो गया था, किन्तु फिर भी एक अद्धभुत स्मारक (Ancient Wonder ) बचा रह गया। रोम में ‘पैंथियन’ (The Pantheon ) एकमात्र ऐसी धरोहर है, जो प्राचीन रोमन शिल्पकला का जीवंत उदाहरण है। इसका कंक्रीट का ‘डोम’ सारे संसार में सबसे बड़ा है, जिसका डायामीटर 142 फ़ीट है। इसके गुम्बद के बीचोबीच एक छेद है, जिसे इसका नेत्र (The eye of the Pantheon ) कहा जाता है। इसका फर्श अभी तक प्राचीन पत्थर वाला ही है, जो समय एवं काल के प्रभाव से विक्षुण्ण है। इसके अग्रभाग के ‘पिलर्स’ इटेलियन शिल्पकला के आधार स्तम्भ बन गए और इसी पैंथियन को देखकर माईकिल एंजेलों ने वेटिकन की बैसिलिका का गुम्बद तैयार करवाया। वास्तव में ‘पैंथियन ‘शब्द ग्रीक भाषा का ‘एडजेक्टिव ‘है, जिसका अर्थ सभी देवों के प्रति नतमस्तकता (ऑनर )है। इसका निर्माण भी ग्रीक आर्किटेक्ट (Apollodorus of Damascus )ने किया, जो महान रोमन साम्राज्य की शिल्पकला का अध्भुत नमूना है। जिसे देखकर ही माइकल एंजेलो ने कहा था,”यह कार्य फरिश्तों के जैसे लगता है, मानव निर्मित नहीं।”
मेरे विचार -मंथन के बीच ही हमारी बस रोम के उस हिस्से में पहुँच चुकी थी, जहाँ नीचे नदी (Tiber River )बह रही थी। वहां से ‘सैंट पीटर बैसिलिका’ की ओर इंगित करते हुए गाईड ने ब्रिज पर बनी कुछ आकृतियों को दिखाया। जिनका नाम इसके संस्थापक तथा प्रथम राजा (Romulus) से जुड़ा है और इसी के साथ उस (She Wolf ) आकृति का सत्य भी जुड़ा है। दंतकथाओं में रोमुलुस एवं रेमस दोनों जुड़वा भाई थे एवं इनके दादा (Numitor) को उन्ही के भाई (Amulius ) ने गद्दी से उतार फेंका। इन दोनों जुड़वा बच्चों को एक मादा भेड़िया ने बचाया और तब तक इन्हें पाला, जब तक एक गड़रिये ने नहीं देखा। इसी कथा की प्रतीक चिन्ह, दो शिशुओं को दूध पिलाती ‘शी वूल्फ ‘ की यह आकृति है, जो आधुनिक युग में ‘Symbol Of Rome ‘बन गयी है। सन 1471 ईस्वीं में किसी मूर्तिकार ने रोम की इस अजब कथा को पाषाण रूप में ढ़ाला और 75 cm .ऊंची, 114 cm .बड़ी प्रतिमा का निर्माण किया। जिसमें मादा भेड़िया अपनी सतर्क निगाहों, सजग कानों तथा चमकती हुई आँखों से खतरों को भांपती नजर आती है और दोनों मानव शिशु उसका दूध पीते नजर आते हैं। गाइड ने उस प्रतिमा (Capitoline Wolf ) को दिखाते हुए, उससे रोम के पूरे इतिहास और उसके नाम के साथ ही यहाँ की मिथकीय कथा के जुड़े होने की बात बताई। सारी बात सुनने के बाद एक ख्याल आया कि आज जब प्रत्येक देश में अनेक धर्मों और उनकी शाखाओं के बीच वर्चस्व को लेकर आपसी द्वंद्व और संघर्ष है, ऐसे में यह अद्धभुत स्मारक (The Pantheon ) सबके सामने एक आदर्श हो सकता है, जिसमे कालातीत सभी देवी -देवताओं का एक ही प्रतीक बना, सारा झगड़ा -फसाद मिटाया जा सकता है। इतनी अच्छी और सुलझी बात से मन शांत हो रहा था और साथ में ही एक सवाल भी पैदा हो रहा था। प्रत्येक स्मारक के साथ ‘टेम्पल ‘ शब्द लगा होना, मेरी उत्सुकता को बढ़ा रहा था। तो क्या रोम में चर्च साम्राज्य से पूर्व ‘टेम्पल ‘ यानी मंदिर का स्वरूप मौजूद था ? जिनमे प्रकृति से जुड़े देवी- देवताओं का पूजन -वंदन किया जाता था। क्या प्राचीन भारतीत सभ्यता और रोमन संस्कृति के संपर्क सूत्र आपस में जुड़े हुए थे ?

संतोष बंसल
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