
पाँच लघुकथा
नीना छिब्बर
जोधपुर
लघुकथा-१
सतोलिया
गर्मी की भर दोपहरी में पीपल की विशाल जड़ों में “सतोलिया ” के सात पत्थर एक दूसरे से सटे पड़े थे।बच्चे उन्हें शामको यहाँ से उठाकर मैदान में खेलते और फिर यहीं अपनी ओर से छिपाकर रख जाते कि कोई और टीम उन्हें ले ना जाए। पर पिछले तीन चार दिनों से कोई नहीं आया। सबसे नीचे रखा बड़ा चोकोर पत्थर बोला मुझे तो गोलू -मोलू की खूब याद आ रही है।बीच में रखा टुकड़ा हँसते हुए बोला ,”बड़के मुझे तो लंबी चोटी वाली गौरी याद आ रही है। वो इतने प्यार से मुझे सहलाती कि मेरा दिल भी धड़कने लगता। इसी बीच सबसे छोटे वाले पत्थर ने कहा और मुझे तो निशाने बाज लंबू याद आ रहा है। इनके हाथों से गेंद की मार भी फूलों की मार लगती है। जब सतोलिया कहकर चिल्लाते हैं तो चारों और संगीत बजता है। पर आये क्यों नहीं? तभी मिठठु हरिया ने आकर बताया कि सभी बड़ो ने बच्चों को पत्थरों से दूर रहने को कहा है क्योंकि मनुष्य जाति ने तुम्हे हथियार बना कर बदनाम कर दिया है। सभी सातों एक साथ बोले पर हम तो सतोलिया हैं।
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लघुकथा-२
दबंगई
दिल्ली की सीमा रेखा पर राजीव गांधी नगर में झुगी झोपड़ियों का अपना एक विचित्र संसार बसा हुआ है। जिसमें माचिस की डिबिया जैसे घर और तिलियों जैसे लोग रहते थे। जो कभी भी, कहीं भी सुलगने के लिए तैयार रहते हैं।
सबसे अधिक गाज पड़ती थी घर की औरतों पर जो दिन भर दूसरों के घर के बर्तन,कपड़े,सफाई में स्वयं को खर्च करती थी़ और रात को घर के मर्दोंं की कच्ची शराब की गंधाती वासनाओं में लथपथ रात काटती थीं।
शराब की लत ने पुरुष वर्ग को निक्कमा और वहशी बना दिया था। हर दिन के नर्क को ओर भी हवा मिली जब करीब में ही ठेका खुल गया और बिक्री बढ़ाने के इरादे से दुकानदार
ने सभी को मुफ्त पिलानी शुरू की। अब सब महिलाओं ने सोचा कि ठेके पर धरना देने से बेहतर है अपने मर्दों की दबंगई को एकजुट होकर खत्म करें। सबसे बुजुर्ग अम्मा रमता माई ने कड़ी आवाज में कहा कि मर्द की मर्दानगी जहाॅं से शुरू होती है वहीं वार करना है।
मर्यादा नहीं अब मार पड़ने पर मारने वाले का सिर फोड़ कर घर के बाहर करना है। यदि किसी घर की महिला को मर्द घर से निकालने की कोशिश करेगा तो हम सब उसकी सहायता करेंगे। किसी की दबंगई नहीं सहनी है दबंग बनना है।
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लघुकथा-३
एक ही जीवन…
“कैमरा रोल, साउंड,कट, शानदार, एक और बार, यह तो जुबली मनाएगी,आप के आगे कोई टिक नहीं सकता,” ऐसे ही कितने जुमले, बातें, प्रशंसा, उद्बोधनों “जीवन राणे” के कानों में ढ़ोल बजा रहे थे।याद नहीं उम्र के किस मोड़ पर कैमरे के सामने पहला शाॅट दिया था। याद है तो तालियां, मिठाई,और निर्देशक का गोंद में लेकर चूमना और सिर पर हाथ रखना। उस समय सिक्कों की खनक, रूपयों की गंध, और प्रसिद्धि का नशा किस चिड़िया का नाम है जानता नहीं था।
फिर रील की तरह रियल ज़िन्दगी में सबकुछ सिनेमा जैसा हुआ..पलक झपकने वाला जादू। प्रेम, विवाह, विवाहेत्तर संबंध, टूटन, अकेलापन, अभिनेता से चरित्र अभिनेता और भीड़ में खड़ा एक गुमनाम चेहरा बनना।
बस ऐसे ही एक दिन भीड़ की शूटिंग में लड़खड़ा कर गिरना,होश में आने पर सरकारी अस्पताल में अकेले लेटा वो भीगी मुस्कान चेहरे पर चस्पा कर चुका था।
हर रोगी के पास रिश्तेदार ,दोस्त रोगी को हौसला देने की भरपूर कोशिश कर रहे थे। जीवन की आंखें सबके चेहरों पर असल और नकल के अभिनय को बाखूबी देख रहा था। आखिर ज़िंदगी भर यही किया था।एक जीवन में “जीवन ” ने अनेक जीवन जी लिए थे।आज भी अस्पताल का कमरा उसे एक सेट ही लग रहा था । जिसमें तीन घंटे नहीं तीन मिनट की शिफ्ट भी है सकती है और फिर पैक अप।
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लघुकथा-४
सेल्फ शिफ्ट
सौम्य आज शांत , धीर और आजाद महसूस कर रहा था। घर के बगीचे में झूले पर बैठ कर हौले – हौले हिचकोले लेते हुए भीतर के ताप और बाहर की झुलसती जिंदगी से छुटकारा पाने का रास्ता उसने ढूँढ ही लिया था। वैसे तोमान-सम्मान, शोहरत और दौलत की कोई कमी नहीं थी पर मंजिलों को पाने की चाह और दौड़ में कभी सिर्फ अपने लिए जिया ही नहीं। सबकी कसौटी पर खरा उतरने के लिए हर परीक्षा में अव्वल आने की आदत बना ली थी उसने। घर परिवार के सब लोग जब हॅंसी-ठट्ठा कर रहे होते, वो किसी ना किसी की समस्या सुलझाने या सलाहकार की भूमिका में रहता। सब उसे दंभी मानने लगे और उससे दूर छिटकने लगे। कभी वो उनके बीच आ भी जाता तो सभी के चेहरे गंभीर हो जाते। आज अचानक पुराने एलबम में स्कूल बैंच पर पाँच दोस्तों को बैठा देखकर ‘शिफ्ट-शिफ्ट’ खेल याद आया और अंदर की आवाज ने धीरे से कहा, सौम्य! ‘सेल्फ शिफ्ट’ हो जा अब से। कुछ समय सिर्फ अपने लिए, अपने तरीके से बिताने की शुरूआत कर और सोचते ही चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई।
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लघुकथा-५
गाचनी
अपने पड़ पौत्र को दीवार की मिट्टी चाटते देखकर 75 साल की शांती देवी के चेहरे की मुस्कान आँखों तक फैल गयी। झट से संदूक खोला और बड़ी लाल गुत्थी में से एक और छोटी सुनहरी गुत्थी निकाली और उसमें रखे मिट्टी के ढ़ेले को देखने लगी।इतने में दोहिती सुमन ने अंदर आते कहा ,मुझे भी दिखाओ क्या खजाना है”। शांती देवी ने कहा, अरे यह तो मेरे घर के आँगन की मिट्टी है। सुमन ने चौंक कर कहा,”ओ माई गाड़,यू मीन पाकिस्तान।दुश्मन देश की। पर नानी ने नाराजगी दिखाते हुए कहा,तुम्हारे लिए दुश्मन देश है, हमारा तो अखंड भारत, हमारी जन्मभूमि है।
तुझे पता है मैं बचपन से ही खूब मिट्टी खाती थी।बड़ी हो गयी ,शादी हो गयी पर यह आदत नहीं छूटी । तेरे नाना जी तो इस बात को लेकर खूब मजाक उड़ाते थे कि इसे तो मिट्टी दिखा कर कुछ भी करवा लो ।सब कुछ सुखद था। फिर विभाजन का शोर, दंगों की बातें ज्यादा बढ़ने लगी तब हमारे ससुर जी ने इस ओर भेजने की तैयारी कर ली थी। खूब रुतबा था उनका। शाम को कह दिया कि अलसुबह रेलगाड़ी से घर की औरतें ,बच्चे जरूरी सामान, थोड़े पैसे ओर कीमती सामान को कपड़ो में छुपा कर निकल जाना है। ताई,चाची भाभी, माँ तो गहने -पैसों को गुत्थी में सिल रही थी और मैं पगली मिट्टी भर रही थी। मेरे लिए तो यही मेरा खजाना था। सोचती गहने तो चुभते हैं, पैसा कभी हाथ में लिया नहीं था। ,मैं तो बस यही लूँगी। सुमन ने घूर कर देखा तो नानी ने कहा, पगली बारह तेरह साल की तो थी। नादान अपने में मस्त ।पर वक्त की मार ने सारी बेफिक्री को खत्म कर दिया। सपने टूटे, अपने छुटे, शरणार्थियों की तरह रहे और कई सालों बाद जिंदगी पटरी पर आयी।
मैंने तो तेरी मामी से कह दिया है कि अंतिम स्नान के समय गंगाजल के साथ इसे भी मिला देना। मुक्ति मिल जायेगी। बस इसीलिए इस गुत्थी को सबसे दूर रखती हूँ ।
यह मिट्टी नही मेरी जड़े हैं।
पाँच लघुकथा 
शिखर चन्द जैन
लघुकथा-१
सर्दी का जुगाड़
तोता और मैना तीन महीने बाद एक साथ मिले थे। तोते ने प्यार जताते हुए पूछा, कैसी हो प्यारी मैना?सुनाओ अपने हाल।
मैना बोली, बस मस्त।हम पंछी तो वैसे ही बेफिक्रे कहलाते हैं।हाँ! सर्दी ने दस्तक दे दी तो आदमी जरूर चिंतित है। सब सर्दी से बचाव के जोगाड़ में लगे हैं।
तोता हंस कर बोला, इंसान की तो जात ही ऐसी है।हर वक्त भविष्य की चिंता में ही घुलता रहता है। तुमने क्या देखा वो तो बताओ।
मैना बोली, तोते! एक दिन मैं एक बहुत बड़े उद्योगपति के निजी उद्यान में लगे अनार के पेड़ पर बैठी थी।वो फोन पर किसी विदेशी दोस्त को वहां से सर्दी के लिए उम्दा सुरा और कुछ गोरी सुंदरियाँ भेजने को कह रहा था। मैं समझ गयी कि यह एक ऐय्याश किस्म का इंसान है।मुझे उससे नफरत हो गयी।मैं उड़कर एक छोटे से बगीचे में चली गयी।वहां एक दुकानदार मॉर्निंग वाक के लिए आया हुआ था।वह अपने साथियों से कह रहा था कि अब गोंद के लड्डू बनवाने पड़ेंगे और बेटे से कहूँगा कि च्यवनप्राश के दो डिब्बे लाकर रख दे ताकि भर सर्दी निश्चिन्त रहे। तीसरे दिन मैं सड़क किनारे लगे एक पेड़ पर बैठी थी तो कुछ निम्न मध्यमवर्गीय लोग सर्दी के लिए स्वेटर, मोटी चादर और रजाई खरीदने की बात कर रहे थे। अगले दिन एक गाँव में पहुंची तो कुछ महिलाएं आपस में बात कर रही थीं कि सर्दियाँ आने वाली हैं।बेटे से कहेंगे की अलाव के लिए अभी से सूखी लकड़ियाँ इकट्ठा कर के रख लें। बस आज मैं यहां आ गयी। अब कुछ तुम सुनाओ।
तोता बोला, हाँ री मैना! सर्दियों की चिंता तो सबको सताती है। मैंने आज एक गरीब को अपनी पत्नी से बात करते सुना।कह रहा था कि सर्दियां आ रही हैं अब शरीर को गर्म रखने के लिए रात की पाली में रिक्शा चलाएगा या बस अड्डे पर बोझ ढोने का काम करेगा।इससे शरीर में गर्माहट रहेगी। लेकिन उसकी पत्नी बोली कि आखिर कितनी मेहनत करोगे तुम वैसे ही काफी कमजोर हो गए हो। ये सब छोड़ो।पुआल को बोरे में सी कर गर्म ओढ़ना बना लेंगे।मौसम ज्यादा खराब हुआ तो बगल में श्मशान है ही चिताओं की गर्माहट का सहारा ले लिया करेंगे। हर आदमी सर्दी से बचाव का जोगाड़ कर रहा है अपनी हैसियत के अनुसार।
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लघुकथा-२
दुनियादारी
“पापा ! पिया दीदी और विमल जीजू शाम को आ रहे हैं।रेलवे स्टेशन पर मैं उन्हें लेने जाऊंगा। जाने से पहले ही गोकुलम से रसमलाई, छेना टोस्ट, कचौड़ी ,कटलेट और ड्राई फ्रूट वाली दालमोठ ले आऊंगा. शाम को खाने की तैयारी के लिए पनीर, शिमला मिर्च और आम ले आऊंगा .आप मुझे हजार रुपए दे जाओ.”
12वीं कक्षा में पढ़ने वाले अनिकेत ने पूरी जिम्मेदारी और समझदारी के साथ पापा से कहा.
पापा ने अपने चश्मे को नीचा करता करते हुए धीरे से कहा,” बावला है क्या? ले ₹500 रख .कॉलोनी के हलवाई से नाश्ते में पेठा, रसगुल्ले और बीकानेरी नमकीन ले लेना .घर में मठरी और नमकीन तो है ही और खाने में मम्मी को बता दिया है ,आलू मटर की रसेदार व गोभी की सूखी सब्जी बना लेगी. शिमला मिर्च और पनीर के भाव वैसे ही सिर चढ़कर बोल रहे हैं.”
” लेकिन पापा , रेखा दीदी और मोहित जीजू को मैं एयरपोर्ट लेने जा रहा था तब तो नाश्ते और खाने की यही सारी चीजें आपने खुद फाइनल की थी.” अनिकेत ने आश्चर्य से पूछा.
पापा कुछ कहते इसे पहले मम्मी ने उसे डांटते हुए कहा , “तुझे जितना कहा जाए उतना ही किया कर.अभी दुनियादारी की समझ नहीं है तुझमें .मोहित की बात अलग है.वह अपने शहर के नामी व्यापारी हैं. वह तो हमेशा आते भी फ्लाइट से हैं. उन्हें तो तिलक करके भी ₹ 2100 से कम नहीं देते.”
अनिकेत इतना भी अबोध नहीं था।पल भर में उसे दुनियादारी की सारी बात समझ में आ गई।
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लघुकथा-३
आंदोलन का खामियाजा
किसना को खाली हाथ देख सुगना ने पूछा,का हुआ? खाली हाँथ? बोहनी न हुआ का
“अरे ! आज दोकान कहाँ लगा, कुछ सत्तू पड़ा है तो घोल दो न। भूख से पेट दुखाता है।” रूखे स्वर में किसना बोला।
सुगना उदास होकर बोली, “सत्तू कहाँ से आएगा। कल तो तुम्हारा बोहनी ही नहीं हुआ। कल हम नहीं खाए थे तो डब्बा को घोलकर उसमे थोड़ा नून देकर पी लिए….लेकिन ई बताओ कि आज दोकान काहे न लगा?”
“ऊ का कहते हैं …एथी गणतंत्र दिबस पर किसान लोग का ट्रैक्टर परेड में झमेला हुआ था न।अब वहाँ कुछ दिन खोमचा नहीं लगेगा। सिकोरिटी का बजह से पुलिस वाला सबको मार के भगा दिए।”
“ओह!तब एक काम करो। चलो आज मंगल है, हनुमान मंदिर का सामने दान पून्न का कुछ मिल जावेगा। कल किसी गुरुद्वारा में लंगर में खा लेते हैं। फेर भी न जुगत बैठा तो सनिच्चर को किसी मन्दिर का सामने केला पाँवरोटी दान हो रहा होगा वही खा लेंगे। तब तक झमेला खतम हो जावेगा।”
दोनों चल पड़े पेट पूजा के मिशन पर। कहीं गाना बज रहा था,” मेरे देश की धरती सोना उगले…उगले हीरे मोती…मेरे देश की धरती।
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लघुकथा-४
काम का आदमी
“अरे अविनाश, तुमने सबको वेडिंग कार्ड पोस्ट तो कर दिए न? लिस्ट दिखाना जरा”- शैलेश ने अपने छोटे बेटे से कहा।
“हाँ पापा, सभी मित्रों, रिश्तेदारों और बिजनेस सर्किल वालों को दे दिए।” लिस्ट पकड़ाते हुए अविनाश ने कहा।
शैलेश ने लिस्ट देखी। पार्षद, विधायक, फैमिली डॉक्टर, मेयर, प्रिंसिपल ,थानेदार ,पत्र- पत्रिकाओं के संपादकों सबको कार्ड दे दिए गए थे। लेकिन एक संपादक का नाम काटा हुआ था।
शैलेश ने चौंक कर पूछा , “अरे, हमारे अजीज उपाध्याय जी का नाम क्यों काट दिया। कितने मिलनसार व्यक्ति हैं। ”
अविनाश ने कहा, “पापा, अब उन्हें कार्ड देना बेकार है। वे अखबार छोड़ चुके हैं और अभी तो किसी अखबार को जॉइन भी नहीं किया। फिर क्या फायदा। ”
शैलेश बेटे की समझदारी से काफी इम्प्रेस हुए।
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लघुकथा-५
ख्वाहिशें तो हैं..
आज क्लास 12 में बच्चों के आपस में मिलने का अंतिम दिन था। यह स्कूल क्लास 12 तक ही था।इसके बाद सबको किसी कॉलेज में दाखिला लेना था।मार्कशीट मिलने के बाद सभी बच्चे आपस में गप्पें लड़ा रहे थे।तभी बात उठी कि सब अपनी अपनी ख्वाहिशें बताएं।
बच्चे शुरू हो गए।कोई कह रहा था कि अब वह स्मार्टफोन लेगा,तो कोई आईफोन लेने की बात कह रहा था।कुछ ने मोटरसाइकिल लेने की ख्वाहिश प्रकट की तो एकाध बच्चे ने नई कार की इच्छा भी जताई।
चुप था तो बस अविनाश। उसे चुप देख,दोस्तों ने पूछा,”क्यों दोस्त,तुम्हारी कोई ख्वाहिश नहीं?एकदम चुप बैठे हो?”
अविनाश की आंखें डबडबा आईं।उसने कहा,” ख्वाहिशें तो हैं,पर मेरे पापा नहीं।”
उसका जवाब सुनकर सब सन्नाटे में आ गए।एक दोस्त के मुंह से निकल गया,”सच है, पिता हैं तो ख्वाहिशें हैं।”
पाँच लघुकथा 
पायल गुप्ता ‘पहल’
अजमेर।
लघुकथा-१
जागरूकता
जाह्नवी कॉलेज के लिए निकल रही थी ।माँ ने आवाज़ लगाकर कहा,”हेलमेट पहनकर जाना तुम ।”उसने चिढकर कहा,”नही न माँ, सारे बाल खराब हो जाते हैं।” माँ ने फिर समझाते हुए कहा,”बाल खराब हो जाते हैं तो कंघा रख लो बैग में पर हेलमेट लगा कर जाओ।” अपनी बात पूरी करते हुए माँ ने कहा,”वैसे भी कौन सा रोज़ हेलमेट लगाना है,सिर्फ आज की ही तो बात है न बेटी।कल से मत लगाना बस।” अखबार में माँ ने ‘ यातायात सुरक्षा अभियान आज शहर में’ की खबर पढ़ ली थी।
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लघुकथा-२
अस्तित्व
डिब्बी और दियासलाई हमेशा साथ रहा करते थे। दोनों का एक दूसरे के बिना गुजारा ही नहीं होता था फिर भी कभी डिब्बी दियासलाई से तो कभी दियासलाई डिब्बी से झगड़ा करती थी। दोनों ही बहस पर उतर आते थे कि कौन बेहतर!
डिब्बी ने कहा ,”मेरे अंदर ही तुम्हारे सभी हिस्सों की ऊर्जा का संचय होता है।मैं तुम्हारे सभी अंशों को सँभालकर भी रखती हूं और आवश्यकता होने पर ही बाहर निकालती हूँ।
मुझमे समाय बिना तुम बिखरकर अपना अस्तित्व ही खो दोगी।”
अचानक पूजा घर मे कोई आया। आखिरी बची दियासलाई से दीपक जलाकर डिब्बी को कुड़ेदान में फेंक कर चला गया।
अब डिब्बी अपने अस्तित्व की तलाश में थी।
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लघुकथा-३
प्याज़
शिखा को सो कर उठने के बाद अचानक याद आया कि शाम के लिए घर में सब्जी ही नहीं है। सब्जी वाले भाई के पास हरी सब्जियां तो सुबह-सुबह ही खत्म हो जाती है। फिर भी चली शिखा सब्जी लेने। “भैया सब्जी दोगे कुछ।”शिखा ने सब्ज़ी वाले से कहा।”दीदी, अब तो सारी सब्ज़ी खत्म हो गई ,आप कल सुबह सब्जी ले लेना।” सब्जी वाले ने शिखा से कहा।”चलो ठीक है फिर प्याज़ ही ले लेती हूं ,भरवां प्याज़ ही बना लूंगी।”शिखा मन ही मन बुदबुदाने लगी।” आधा किलो छोटे प्याज दे दो भैया।” शिखा ने मन बना कर कहा।”” नहीं है दीदी, छोटा प्याज भी।”सब्ज़ी वाले ने उत्तर दिया।”कैसे नही है,ये अलग से तुमने रखा हुआ है न।”शिखा ने गुस्से में कहा।” दीदी,आज मेरी घरवाली ने भरवां प्याज़ के लिये शाम को छोटे प्याज़ लाने को बोला था।” सब्ज़ी वाले ने बड़े भोलेपन से उत्तर दिया।
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लघुकथा-४
स्वार्थ
रेखा जी गौ माता के दूध की बडी महिमा गाती रहती थी। ” मेरे बच्चे तो छोटे से बड़े हो गए पर गौ माता का ही दूध पिया है इन्होंने।” इतराते हुए अपनी पड़ोसन को बता रही थी ।”भैंस के दूध से तो सिर्फ ताकत आती है बुद्धि ना आए है और गाय के दूध से तो शक्ति और बुद्धि दोनों ही आए हैं ,समझी बहुरिया।”
अपनी बहू को सिखाते हुए बोल रही थी। उसके बाद उठकर रसोईघर से एक पॉलिथीन में सब्जी के छिलके और गौ माता की रोटी दोनों डालकर ऐसे ही गौमाता के आगे रख आई रेखा जी।
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लघुकथा-५
जादुई धागा
मुकेश अपने कार्यों के व्यस्तता के चलते अपनी बेटी के साथ कम ही समय बिता पाता था।जब भी समय मिलता वह अपनी बेटी के साथ बच्चा बनकर खेलने लग जाता।उसे हर अच्छी और बुरी आदत के बारे में सिखाया करता था।उसकी बेटी हर काम को बाएं हाथ से करती थी।दो साल की नव्या लिखने का प्रयास भी बाएं हाथ से ही करती थी।मुकेश उसे और किसी काम पर तो नही लेकिन खाना खाने के लिए दाएं हाथ का प्रयोग करने के लिए कहता ।नव्या मान भी जाती लेकिन फिर भूलकर बायें हाथ से खाने लगती।तब मुकेश ने उसके दाएं हाथ मे मौली बांध कर कहा ,”नव्या,मैं तुम्हारे जिस हाथ पर ये बांध रहा हूँ ,उसी हाथ से खाना खाना है तुमको, ये जादुई धागा है …इससे तुमको खाना और स्वादिष्ट लगेगा।” नव्या अब मुस्कराहट के साथ हाथ मे बंधी मौली को बड़े प्यार से देख रही थी।
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