नमिता राकेश, इरा जौहरी, रीता सिंह सर्जना

पाँच लघुकथा

नमिता राकेश

लघुकथा-१
सिर्फ एक दिन का पर्यावरण ?
पर्यावरण दिवस आने को था। उसके एक महीना पहले से देशभर में हर रोज पौधे लगाए जाने की बात हो रही थी ।
पर्यावरण दिवस आया अर्थात पांच जून के दिन लोगों का हजूम असंख्य पौधे लेकर पौधारोपण के लिए नियत स्थान पर पहुंचा । पौधे लगाए गए मिठाई बांटी गई ।
लोग खुश थे कि पौधे लगाकर उन्होंने पर्यावरण को बचाए रखने के लिए बहुत महत्वपूर्ण काम किया है । फोटो खिंचाई गई।
अगले दिन अखबार ऐसी खबरों से भरे पड़े थे फलां स्थान पर फलां लोगों ने इतने  अधिक पौधे लगाए सभी लोग खुश थे लेकिन पौधे जो लगाए गए थे वह उदास थे क्योंकि पौधे लगाने के बाद अगले दिन उनको पानी देने वाला कोई नहीं आया । जून की झुलसा देने वाली गर्म  दुपहरी में वे पौधे पानी की आस में दिन पर दिन सूखते  गए कुछ पौधों को गाय ने खा लिया और कुछ पौधे गर्मी की मार सहन नहीं कर पाए और ज़मींदोज़ हो गए।
फिर से वह भूमि जहां पर असंख्य  पेड़ लगाए पौधे लगाए गए थे खाली हो चुकी थी और उसे इंतज़ार था ठीक उसी दिन का जब अगले वर्ष फिर से लोग आएंगे और उसकी गोद पौधों से भर देंगे इस तरह विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया और वे पौधे एक दिन के मेहमान बन कर रह गए ।
लघुकथा-2
” हम में से ही कोई”
ना जाने कितनी कहानियां होती हैं हमारे आसपास। हमारे भीतर बाहर। कुछ जलती बुझती सी। और जब सामने आ जाती हैं तो काग़ज़ पर तो पृष्ठ दर पृष्ठ किताब में ढल जाती हैं ।
उसने भी लिखी थी ऐसी ही एक कहानी…..और उसे सुनाते सुनाते वो ख़ुद आज एक कहानी बन चुकी है ….जिसे अब कोई सुनना पसंद नहीं करता….शम्माआ की मानिंद वो सबको उजाला देते देते मोम मोम पिघल चुकी है और जम चुकी है कहीं…..भीतर तक …हमेशा के लिए….
लघुकथा-३
“यह तो कबूतर भी नही जानता ”
30 जनवरी का दिन , सुबहा के 11 बजे , क़रीब क़रीब पूरा भारत वर्ष चुप , यहाँ तक कि महिलाए भी चुप , मानो सांप सूंघ गया , दो मिनट का मौन , महात्मा गांधी की पुन्य तिथि , सभी अपने अपने कार्यालयों , स्कूलों के सभागारों में एकत्र , सायरन बजा —सब चुप, सर नीचे किये हुए , कुछ दाए -बाए तिरछी निगाहों से पलकों की ओट में ताक -झाँक करने का प्रयास कर रहे थे ( प्राचीन भारतीय परम्परा) ……. मैं भी चुपचाप अपने कार्यालय में खडी थी। चारों तरफ सन्नाटा। सायरन की अगली आवाज़–मौन को तोड़ने की आवाज़ की प्रतीक्षा हर एक को।
तभी, रौशनदान की खिड़की में बैठा कबूतर गुंटरगूं बोल उठा। मनो ,…शांति के दूत के प्रति वह शांति का प्रतीक –कबूतर अपनी श्रद्धांजलि दे रहा हो। –इस विश्वास के साथ कि इस दो मिनट के मौन के अंतराल में शायद आदमी उसकी गुटरगूं सुन ले। वरना इस भाग दौड़ के शोर शराबे के जीवन में जब आदमी अपने भीतर की आवाज़ नहीं सुन पाता तो उसकी गुटरगूं भला कैसे सुनेगा ?… उस दो मिनट के मौन में किसने कितना गांधी को याद किया, यह तो कबूतर भी नहीं जानता!

लघुकथा-४
“बेटी”
शैल बाला खुशी खुशी नर्सिंग होम से घर वापिस आई थी। उसकी बेटी नमिता की डिलिवरी जो नॉर्मल हुई थी। वरना आजकल तो डॉ फ़ौरन सीज़ेरियन ऑपरेशन कर देते हैं। कल देर शाम नमिता को अचानक दर्द उठा था तो आनन फानन में नर्सिंग होम में एडमिट करवाना पड़ा था। मां बच्चा दोनो स्वस्थ थे। घर वापिस आई तो जल्दी जल्दी घर के काम निपटाने में लग गई।
बेटी नमिता के लिए कुछ कपड़े और हरीरा भी तैयार करना था। शैल बाला काम में लगी थी कि इतने में डोर बेल बजी। देखा तो बाहर डाकिया था।
डाक लेकर शैल बाला ने कहा कि “अरे रुको, मैं मिठाई लाती हूँ। घर में नया मेहमान आया है।”
शैल बाला के हाथ से मिठाई लेते हुए डाकिए ने कहा,” लगता है इस बार तो बेटा हुआ है तभी मिठाई बांटी जा रही है। मैं तो दो दो मिठाई लूंगा।”
” इतना सुनते ही शैलबाला बोलीं कि ” अरे बेटा नहीं। इस बार भी बेटी ही हुई है पर मिठाई इसलिए कि बेटी और बच्ची दोनो सकुशल हैं।पिछली बार तो…सीज़ेरियन था।

डाकिए ने तुरंत कड़वा सा मुंह बनाया मानो मिठाई की जगह कुनैन की गोली खा ली हो।  बोला-  ” जाने कैसे लोग हैं जो दूसरी बेटी के जन्म पर मिठाई बांट रहे हैं ?”

और शैलबाला अचरज में पड़ गई कि आख़िर यह सोच कब बदलेंगी ?


लघुकथा-५
“छलिया या छलनी”
सभी उसे ग़लत समझते थे। वो थी ही ऐसी । सबसे हंसकर जो मिलती थी। तंग पजामी, कसा हुआ कुर्ता, लहराते बाल, मैचिंग ज्वेलरी और दमक कर चलना– बरबस ही सबको आकर्षित कर लेता था। सब उससे दोस्ती करना चाहते थे। कुछ ऐसे भी थे जो पीठ पीछे उसका मज़ाक भी उड़ाते थे। फब्तियां भी कसते थे। कुछ तो यहां तक कह देते थे कि “अरे यार, इससे दोस्ती करना कौन सा मुश्किल काम है , बस थोड़ी तारीफ़ कर दो, चाय वाय पिला दो , बस—”
और ऐसा कह कर अधूरा वाक्य छोड़ कर जो कुटिल मुस्कान चेहरे पर आती थी वो सामने वाले को बहुत कुछ समझा देती थी।
ऐसा नहीं कि वो यह सब जानती नहीं थी या समझ कर भी नासमझ बनती थी। उसे तो लोगों पर अपने पर मरते देखना पसंद आता था। वो अपनी मर्ज़ी से जीना चाहती थी।

उसका यह रूप देख कर कोई भी उसे ग़लत समझ सकता था। यहां तक कि उसके साथ ऑफिस में काम करने वाली सहकर्मी भी उसे अच्छी नज़र से नहीं देखती थीं।
पर, एक मंजुला ही थी जो उसके भीतर का दर्द समझती थी। उसकी पीड़ा समझती थी। उसको जानती थी।
वास्तव में, वो बहुत वर्षों तक एक पुरुष द्वारा छली गई थी और अब वो अपना बदला ले रही थी।

पाँच लघुकथा

इरा जौहरी

लघुकथा-१
“नजरिया”
घर में विवाह की गहमा-गहमी में एक आवाज़ आई
“ससुराल जा रही हो । संभल कर रहना सीखो लाडो! अब हर कदम पर चार आँखे तुम पर नज़र रखेंगीं। वहाँ यह सब नहीं चलेगा।”
अठखेलियां करती चुलबुली कन्या के कदम जहाँ के तहाँ रुक गये ।
उसको सहमा सा देख तभी एक और गम्भीर स्वर गूँजा “कभी भी किसी बात के लिये पहले से ही कोई अवधारणा नहीं बनानी चाहिए। यह देखो सामने जो ऐनक दिख रहा है इसका एक कांच साबित तथा दूसरा चटका हुआ है। इसकी चिटकी कांच से देखने पर जहाँ सब कुछ बिखरा हुआ नज़र आ रहा है वहीं देखो साबुत कांच से उस पार देखने पर सब सलामत नज़र आ रहा है। तो सबसे पहले अपनें नज़रिये को खुला और साफ़ रखो आगे उन चार आँखो के साथ तुमको भी सब अच्छा ही नज़र आयेगा।”
तभी सभी की नज़र सधे कदमों के साथ पुरानी अवधारणाओं को त्याग नये साफ़ मन से नये नज़रिये के साथ सुनहरे संसार की ओर आत्मविश्वास संग बढ़ते कदमों की ओर उठ चली।

लघुकथा-२
“लक्ष्य”
हैलो कैसे हो?”
“हमेंशा की तरह एकदम मस्त।”
“बस तुम्हारी यही बात तो अच्छी लगती है। कैसी भी परिस्थिति हो हमेंशा खुश रहते हो। तुमसे बात कर मन हल्का हो जाता है।”
“अच्छा बताओ कैसे फोन किया।”
“मन परेशान था कोई समाधान मिल नहीं रहा था। सोचा तुम्हें बतलाऊं। तुम जरूर हल निकाल दोगे।”
“देखो सीधा सा फंडा है। जब परिस्थितियाँ अनुकूल न हों तो परेशान होने की जगह उन परिस्थितियों में जो कुछ अच्छा हो सकता है उसे देखो। दुःखी हो कर भाग्य को कोसने से सिर्फ हताशा ही हाथ आयेगी।जबकि शान्त चित्त से परिस्थितियों का आंकलन करने पर अंधकार में भी रोशनी की किरण नज़र फूटती आयेगी।”
“इसीलिये तो तुमको फोन किया था।समाज की सुन निराशा का भंवर हमें अवसाद के जाल में फंसा अपनी चाल में सफल हो पाता उससे पहले तुमसे बात कर अब नयी ऊर्जा के साथ मंजिल के लिये पुनः प्रयासरत होना ही हमारा नया लक्ष्य होगा।”

लघुकथा-३
“सजग”
“का हो! कस लगइयो !” सब्जी के दाम पूछते हुये ग्राहक नें बात आगे बढ़ाई।
“तुमका पहिले इहाँ नाहीं देख्यो।आजु हम बड़े दिनन बाद निकरिस हऊ। इहाँ त एक लरिका सब्जी बेचत ह।ऊ कहाँ हउआ।”
यह सुन सब्जी बेच रहे बूढ़े विक्रेता की आँखें पीली हो गयीं। गमछे से उन्हें छिपाये हुऐ बोला।”ऊ हमरा बिटवा रहन।अऊर ई हमार पतोहू।छह माह पहिरे मंडी भीतर भया हादसा मा हमार लरिका की जान चली गयी रही ।इनकेर नान से दुई बच्चा हई।इत्ती बड़ी दुनिया मा अकेर कइसे बिना आमदनी व आदमी के जियेगी । जिनगी मा बहुत मुसकिल आवत हई।साथ ही हर काम में पइसा लगतई है।त पहिले ईको तनि काम धंधा सिखायके मजबूत करिहई ।फेरि सही लरिका देख हाथ पीले। ईकी उदासी देखी नाही जाती । हमरी जिनगी का कौनो ठिकाना नाहीं ।खुद कमइहैं त आत्मनिर्भरता भी आइहैं।जीससे जीनगी आसान हुई जइहैं। ”
सामने बैठा व्यक्ति बुजुर्ग विक्रेता की सोंच से गदगद हो कह बैठा “हमार लरिका से का इहका बियाह करिहऊँ।ऊ भी इहहीं सब्जी बेचत हउआ। जीनगी भर इहका अऊर इहके बचवन का खयाल रखिहैं। अच्छे से सोंच समझ कर उत्तर दीऊ।”
दोनों सजग बुजुर्गों की इस वार्तालाप के बाद हमेंशा उदास रहने वाले मुख पर मुस्कान बिखर गई।

लघुकथा-४
“काश”
” आज हम बहुत दिनों के बाद मिल रहे हैं।कुछ याद आया ?”
“हाँ अच्छी तरह याद है पर यदि अभी भी तुम सत्य का सामना करने में असमर्थ हो तो यह हमारी अंतिम मुलाकात होगी।”
“हम्म!!”
“अच्छा डूबते सूर्य संग लहरों के उठने गिरने को देख कर तुम्हें क्या लगता है ।”
“यही कि हमारी जिंदगी भी लहरों की उथल-पुथल की तरह अशान्त सी चली जा रही है और फिर लगता है एक दिन हमारा यह रिश्ता भी कोई मंजिल पाने से पहले ही ढुलक जायेगा।”
“इन सबके मध्य तुम्हें क्या कुछ और नज़र नहीं आया।”
“क्या !!”
“यही कि अस्त होंने के पश्चात भी सूर्य का अन्त नहीं होता । वह पूर्ण आभा के साथ पुनः अवतरित होता है।उस वक्त ये चंचल लहरें भी शान्ति से किलोल करतीं नज़र आतीं हैं। बहुत जल्द ही सभी कुछ बदल जायेगा। भरोसा रखो।जिस राह पर हमनें कदम रखा है उसकी मंजिल अब ज्यादा दूर नहीं ।” मुस्कुरा कर यह कहते हुए जब उसने पलकें उठा साथी की आँखों में एक गम्भीर विश्वास के साथ देखा ।
प्रति उत्तर में पलकें उठा यह कहते आगे बढ़ हाथ थाम वह भी मुस्कुरा उठी।
“काश कि तुमने जिन्दगी का यह फ़लसफ़ा पहले ही समझा होता।तो हमें आज ये दिन देखने न पड़ते।”

लघुकथा-५
“जीत”
दो पीढ़ी के रणबांकुरों के मध्य आज जबरदस्त जंग छिड़ी हुई थी।
बच्चों से यूँ मजदूरी का कार्य कराना बुजुर्गवार के उसूलों के खिलाफ़ था तो मुफ्त में कुछ लेना नन्हे कर्मवीर के।
कर्मवीर को धन की आवश्यकता थी। बुजुर्गवार दान दे पुण्य कमाना चाहते थे परन्तु वो खुद्दार बालक यूँ कुछ लेना नहीं चाहता था।
आखिर कर्म के विचारों से धर्म नें बड़प्पन का परिचय देते हुए सामन्जस्य बिठा अपनी बात कही।ह”ठीक है तुम्हें जो ठीक लगे और कर सको वह कार्य करो और अपनों मेहनत का पैसा ले जाओ।” कह बुजुर्गवार भीतर चले गये।
काम मिलने की खुशी के साथ ही अब क्या करना चाहिए इस असमंजस के साथ कुछ पल खड़ा रह वह खुद्दार बालक जो समझ में आया उस कार्य को करनें में जुट गया।
थोड़ी ही देर में घर के सामने की खाली जमीन का काया पलट हो चुका था।
यह देख बुजुर्गवार स्वयं को रोक नहीं पाये। भीतर जा एक डण्डे में तिरंगा लगा उसे बालक के साथ मिल कर फावड़े से गड्ढा खोद खाली भूमि में गाड़ दिया।

पाँच लघुकथा

रीता सिंह सर्जना, असम

लघुकथा-1
सभ्यता

एक तरफ क्षितिज विशालता को ओढ़े धरती को निहार रहा है तो वही लोहे के ढांचे में तब्दील कंक्रीट का जंगल उसे छूने को आतुर है। सदियों से उसने समय को बदलते हुए देखा है। कहते हैं इसी तट के किनारे खगो की चहचहाहट भरी बस्ती थी पर इसकी जगह बढ़ रहे कंक्रीट के जंगल ने अतिक्रमण कर उसके बसेरे पर बुलडोजर चला दी है। तो क्या सचमुच शहर ने विकास को ओढ़ ली है या यह कहूं शहर सिकुड़ रहा है। किसी बंद पड़े संदूक के भीतर अपने अस्तित्व को खोते हुए “क्या शहर सचमुच बदल रहा है या फिर जीने का भान कर रहा है, तभी तो अब गगनचुंबी इमारत पर रहने वाले आदमी पत्थर बनते जा रहे हैं। सभी सुख सुविधाओं से लैस शहर किसी कैद पंछी की भांति क्यों छटपटा रहा है? हरी घास, तरुवर पक्षियों के कलरव की कल्पना मानो एक स्वप्न सा प्रतीत हो रहा है आज तो क्या शहर बीमार है? नदी रूप मन में उफन रहे प्लावन को “क्या रोक पायेगा विकासोन्मुख शहर?”
“नहीं सभ्यता।” अनुभव की चादर ओढ़े विशाल बाहू बूढ़ा लुइत के दिल से आवाज आई जो अपनी गति से आज भी बह रहा है।

लघुकथा-२
खुशियों का घर (लघुकथा)
“इतना अच्छा घरबार, बेटा-बहू सब है फिर भी तुम यहां! आज भी तुम्हारा बेटा आया था न? तुम्हें अपने बेटे के साथ चले जाना चाहिए था सावित्री! क्यों नहीं गई? अपना खून तो आखिर अपना ही होता है भले ही चाहे बहू की बात … ” बातें पूरी होने से पहले ही सावित्री बोल उठी-
“नहीं लक्ष्मी मेरी बहू बहुत अच्छी है। बिना जाने ऐसा मत बोलो। मैं अपनी मर्जी से ही यहाँ आई हूँ। बल्कि मेरे बच्चे बिल्कुल नही चाहते थे कि मैं यहां पर रहूँ।”
“तो तुम्हें नहीं आना चाहिए था। फिर क्यों आई?”
“न आती तो तुम कैसे मिलती?”
“क्या मतलब?”
“मतलब यह कि सभी सुख सुविधा मौजूद होने के बावजूद वह घर मुझे काटने को दौड़ता है। दोनों बच्चे मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत है। बहुत व्यस्त रहते हैं। घर में बस हम तीन प्राणी है। मेड आकर अपना काम करके चली जाती है। मेरे लिए कुछ नहीं बचता। दीवारों के साथ कितनी बातें करोगी? बीतती घड़ियां मेरे अकेलेपन की पीड़ा को अंदर ही अंदर मेरी बेचैनी बढ़ा रही थी। मैं अपने बच्चों को परेशान करना नहीं चाहती थी। एकदिन मैंने अपने बच्चों से अपनी मन की बात कही कि मैं वृद्धाश्रम में रहना चाहती हूँ।यह सुन दोनों घबरा उठे। वह नहीं चाहते थे कि मैं यहाँ आऊं। गाँव में भी कोई नहीं था। इसलिए मैंने अपने बच्चों को समझाया कि “मैं अपने जैसे लोगों के साथ रहना चाहती हूँ।” अंत में वह समझ गए और मैं यहां आ गई। ”
“माफ करना सावित्री! मैंने तुम्हारी बहू के बारे में गलत सोचा।”

लघुकथा-३
बिथरी हुई नेमतें
नरेन ने अपनी नम होती आंखों से आइता की तस्वीर को देखा। आज एक वर्ष बीत गया है आइता को गए हुए। ओल्ड एज होम में आज चहल-पहल हो रही है। क्योंकि आज आइता की बरसी है। कनका, माला आंटी और करबी बड़ी मां सभी काम में जुटे हुए हैं। नरेन को भावुक होता देखकर करबी बड़ी मां ने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरा और कहा- “मत रो नरेन।”
“मन नहीं मानता बड़ी मां।”
“जानती हूं मगर इस सत्य से सभी को गुजरना पड़ता है।”
“हां बड़ी मां, आइता मेरे जीवन की आधार थी।”
“जानती हूं नरेन और तुम्हारे हृदय को भी, वर्ना…।” वाक्य पूरा होने से पहले ही नरेन बोल उठा -“ऐसा ना कहे बड़ी मां, हम सब साथ हैं। बड़ी मुश्किल से नरेन ने अपनी भावनाओं को काबु किया और तैयारी में जुट गया। कई वर्षो इसी ओल्डेज होम में नरेन ने आइता के साथ कितनी खुशियां बांटे तो दुख दर्द को भी सहा है। नरेन का कोई नहीं था तो आइता को अपनों ने उनका साथ छोड़ दिया था। भीख मांगती आइता को देख एकदिन नरेन ने कहा था- “मेरे साथ चलोगी आइता?” मैं भी अकेला हूं। पता नहीं किस जन्म का साथ था आइता भी झट से मान गई। नरेन उसे अपने घर ले आया। धीरे-धीरे यह घर माताओं के लिए ओल्डेज होम के रूप में एक सहारा स्थल बन गया। नरेन इसे चलाने के लिए लोगों से मदद लेने लगा। कई बार तो उसे ऐसे लोगों के कटु व्यवहार को भी सहना पड़ा। लेकिन ध्येय ऐसा कि इस आश्रम में मौसी, दादी,नानी, बड़ी मां आंटी के लिए वह चुपचाप सब कुछ सहन कर लेता। आज इस ऑल्डेज होम में चालीस महिलाएं रह रही है। उसे इस बात की खुशी है कि ईश्वर ने उसके हिस्से में बिखरे हुए नेमतें के रूप में इन माताओं की सेवा के लिए चुना है।
ालघुकथा-४
जिल्लत या सम्मान
“लो तुम फिर आ गई? ऐसे हाथ फैलाकर तू कितने दिन जिएगी, कुछ काम वाम ही कर लेती?”
“मुझ अपाहिज को भला कौन काम देगा दीदी?”
“कभी कोशिश की?”
“नही।”
“कब तक लोग तरस खाकर तुझे देंगे? चलो आज एक उपाय ढूँढते हैं।”
“क्या उपाय दीदी?”
“तुम्हें अपने पैरो पर खड़ी करते हैं ताकि दूसरो के सामने हाथ फैलाने की नौबत न आए।”
“मजाक मत कीजिए दीदी, मैं और पैरो पर खड़ी?”
“क्यों नहीं खड़ी हो सकती? ऐसे हाथ फैलाने के बजाय, अपने हाथ को जादू से भर दो।”
“वह कैसे?”
“मैं तुझे काम दूंगी, करेगी?”
“पर मेहनत बहुत होगी न?”
“तुम जो लोगो के सामने हाथ फैलाती हो, इस काम में भी तो मेहनत है।
“हां, पर….।”
“पर क्या? दोनों काम में बहुत अंतर है। क्या मैं तुम्हारी हां समझू?”
“मुझे नही लगता मैं कर पाउंगी दीदी।”
“सोच लो, जिल्लत या सम्मान?आगे तुम्हारी मर्जी। ”

लघुकथा-५
पर्यावरण दिवस
“पृथ्वी
को संतुलित रखने के लिए सबसे आसान उपाय है वृक्षारोपण करना। हम सभी को मिलकर वृक्षारोपण करना चाहिए ताकि हमारी धरती बची रहे।” एक संस्था द्वारा आयोजित विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर मंत्री जी भाषण दे रहे थे। तभी संस्था के एक कार्यकर्ता ने आकर हौले से उनके कानों में कहा – ” सर वृक्षारोपण कर ले । फोटोग्राफर को अन्यत्र भी जाना है।” मंत्री जी फटाफट माइक छोड़कर उस जगह पर जाने लगे। जहाँ वृक्षारोपण करना था। तभी एक कार्यकर्ता ने फटाफट आकर उनके हाथ में वृक्ष को थमाया । फोटोग्राफर ने तुरंत फोटो खींच लिया साथ में संस्था के निदेशक ने भी मुस्कान ओढ़कर पौधा के साथ फोटो खींच लिया। जैसे वृक्षारोपण न होकर जरुरी काम फोटो हो गया। इसके बाद पहले से ही तैयार गढ्ढे में मंत्री जी ने वृक्षारोपण किया । इधर कार्यक्रम समाप्त कर मंत्री जी चले गये। सभी घर जाने लगे तो पास में खड़े 10 वर्षीय एक बालक ने कुछ बिखरे पड़े पौधो को देख अचानक कहा – “बाकी पौधो को क्या मैं ले जाऊं?” निदेशक ने उस ओर देखा जिधर से आवाज आ रही थी। एक छोटा बच्चा को देखकर उन्होंने पूछा।
“तुम पौधा लेकर क्या करोगे ?”
“सर मैं इसे खाली सड़क के किनारे लगाउंगा और देखभाल भी करुंगा।”
” बड़ा आया पौधा लगाने वाला क्या कभी तुमने पौधा लगाया है?” उपेक्षा के साथ निदेशक पूछा।
“हाँ सर, मैंने पिछले साल लगाया था, जो बढ़कर अभी मेरे समान हो गया है। मैं और दादी मार्निंग वाक में जाते समय उन पौधों की देखभाल भी करते हैं। दादी कहती है पेड़ हमारा परम मित्र है। इतना कहकर बच्चे ने उसी निश्छलता के साथ फिर से पूछा-“तो क्या मैं इन पौधों को ले जाऊँ सर?”

रीता सिंह ‘सर्जना’
तेजपुर, असम

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