
पीर पराई
सावन के महीने में खतौली कस्बे से गुजर कर कावड़ियों का बहुत बड़ा हुजूम हरिद्वार की तरफ जाता था । रास्ते में कावड़ियों के नाश्ते, भोजन , आराम के इंतजाम गांव के लोग अकेले या समहू में कर रहे थे।
गांव में सड़क के किनारे ही अरुणा का घर था , वो एक बड़े नर्सिंग होम में नौकरी करती थी मगर बेहद मामूली तनख्वाह पर । काम इज्जत का था मगर नर्सिंग होंम का एक कल्चर होता है । जिसमें दिखाई तो सब कुछ समृद्ध देता है मगर सेलरी नाम की ही देते हैं।
छुट्टियों में अरुणा की बड़ी बहन नीलम भी दो बच्चों के साथ में कांवड़ का पर्व मनाने मायके आई थी ।
दूर -दराज से शिव भक्त प्रार्थनाएं करते हुए हरिद्वार जा रहे थे जहां से गंगाजल लेकर उन्हें शिवजी को चढ़ाना था । किसी को नौकरी, किसी को संतान ,किसी को मनपसंद विवाह तो कोई ये मन्नत मांगने जा रहा था कि उसके खेतों से हाइवे या राजमार्ग निकल जाए ताकि उसके जमीनों की कीमत आसमान छू ले।
चारों तरफ कांवड़ियों का हुजूम दिखाई पड़ता था और “बोल बम “ , “बम भोले “ , “हर -हर महादेव” की गूंज सुनाई देती थी ।
अरुणा की बड़ी बहन नीलम के पति और बच्चों के साथ मायके आने से घर का बजट थोड़ा सा और तंग हो गया था। क्योंकि उस घर की आमदनी इतनी ही थी कि किसी से मांगना न पड़े और किसी को कुछ दे पाने की हैसियत में तो वो लोग बिल्कुल न थे। लेकिन मनुष्य की संवेदना कब उसे बैठने देती है फिर चाहे वह सकारात्मक हो नकारात्मक।
अरुणा और नीलम ने कावड़ियों की जरूरतों का जायजा लेने के लिये गांव के बाहर का एक चक्कर लगाया, वहां भोजन, आराम के बेहद इफरात इंतजाम थे ।
उन्होंने सरकारी स्टालों और धर्मार्थ स्टालों पर भी देखा , लेकिन वहां पर कहीं भी ऐसी दवाइयों के इंतजाम नहीं थे जिनकी बेहद जरूरत थी,और अगर दवाईयां भी तो सिर्फ नाम मात्र की ।
अरुणा और नीलम लौट आईं। दोनों बहनों के हाथ तंग थे, मगर मन में कहीं-न -कहीं एक कसमसाहट थी।
उन दोनों के हाथ में लिस्ट थी जिसमें घर और बाहर के कांवड़ियों के खाने -पीने का जरूरी सामान उन्हें लाना था ।
अरुणा ने कहा-
“ दीदी , क्या कहती हो , वही करें हम जो हमारा मन कह रहा है या वो करें जो गांव वाले करते हैं। अगर हम अपने हिसाब से चलेंगे तो गांव वाले ताना देंगे कि हमने धर्म का काम नहीं किया “।
नीलम ने कहा –
“अरुणा , पेट भरने के तो सभी इंतजाम किए दे रहे हैं और कावड़ियों के आराम की भी व्यवस्था है । मगर बेहद तकलीफ उठा कर ये कावंड़िये कोसों पैदल चल कर जा रहे हैं , इनके पैरों में इतनी सूजन, छीलन और घाव है । ऐसी दवाइयां न तो स्टाल पर हैं और हैं भी तो उन्हें कोई कावड़ियों के पांवों में लगाने वाला नहीं है । तुम अपनी नर्सिंग की जानकारी का इस्तेमाल इन कावड़ियों की सेवा पर क्यों नहीं करती । इलाज तुम करो , इलाज में मदद और सेवा मैं भी करूंगी”।
अरुणा ने सहमति से सिर हिलाया। दोनों बहनों ने खाने -पीने के सामान की लिस्ट फाड़ दी औऱ वो दोनों बाजार से मलहम-पट्टी,डेटाल खरीद लाईं।
ढेर सारे खाने और आराम करने के स्टालों के बीच उन्होंने भी अपना एक स्टाल लगाया जिसमें वो थके,घायल लोगों की मलहम-पट्टी और सेवा -टहल करने लगीं । उनके सामान कम पड़ने लगे थे मगर कावड़ियों का तांता नहीं टूट रहा था उनके स्टाल पर । थके -हारे घायल कावड़ियों की सेवा ही उनके लिये सच्ची शिव भक्ति थी। कांवड़ियों के पांव धुलवाते , उनकी मलहम पट्टी करने से उनकी आत्मा में एक अजीब किस्म की तृप्ति भर रही थी।
गांव के लोग भौचक्के हो कर उनके स्टाल को देख रहे थे । पराई पीर को हरने के बाद जब वो दोनों कावड़ियों को विदा करती तो बोलतीं “हर-हर महादेव” स्टाल छोड़कर जाते हुए कावड़िये भी उनसे कहते “हर-हर महादेव”।
अरुणा मल्हम पट्टी करती हुए गाती “वैष्णव जन तो तेने कहिये पीर पराई जाने रे “
तो नीलम भी आगे का अंतरा गाती उसके बाद दोनों बहनें खिलखिलाकर हँस पड़तीं, उन्हें हँसता देखकर उनके स्टाल के घायल और थके हुए कावंड़िये भी मुस्कराने लगते।
दिलीप कुमार

दर्शन
दो घंटे से चींटी सी रेंगती लाइन में जैसे-तैसे खुद को बचाती-संभालती यहाँ तक पहुंची थी वह। सामने मंदिर का मुख्य द्वार दिख रहा था। पर मंदिर के छोटे से गर्भगृह की भीड़ याद आते ही पसीने छूटने लगे उसके। सावन का सोमवार जो ठहरा। पर कल शहर भी तो छोड़ रही थी। दर्शन तो करने ही थे, और वह भी आज ही। पर यह जो जोखिम था साथ… याद आया कैसे माँ के दोनों हाथ पीछे से पकड़े थे एक ने और दूसरे ने इन्ही भक्तो की भीड़ में से निकलकर चेन उतार ली थी। तो क्या लौट चले? सोचकर ही आँखों में आँसू भर आए। रात के नौ बजे का वक्त हो चला था और सुबह की ही तो उसकी फ्लाइट थी। आगे जाने कब आना हो…
‘आगे बढ़िए बहन जी, खड़ी-खड़ी क्या सोच रही हैं, पीछे लाइन लम्बी है।’
ड्यूटी पर तैनात पुलिस कर्मी ने करीब-करीब धक्का-सा देते हुए कहा।
देखा तो चार-पांच थे नियंत्रण व संचालन के नाम पर वहीं खड़े-खड़े बस यही करते। कभी किसी को धक्का दे दिया तो कभी किसी को डंडे से छू दिया।
‘क्या आप मेरी मदद कर सकते हो?’
‘बताएँ।’
‘मुझे डर लग रहा है कहीं भीड़ में कोई मेरा पर्स न छीन ले और मैं दर्शन भी करना चाहती हूँ। ‘
‘मुझे दे दें। सुरक्षित रहेगा ।’
‘नहीं। ऐसा नहीं कर सकती। मजबूरी समझें मेरी।’
‘क्यों, भरोसा नहीं है हम पर?’
क्या जबाव दे सोच ही रही थी, कि पीछे खड़ा जवान आगे आया और बोला,
‘आइये मेरे साथ। ‘
पर्स लेकर अपने कंधे पर टांग लिया था अब उसने और फैली बांहों का घेरा बनाता, उसका हाथ पकड़े-पकड़े कुछ ही मिनटों में सुरक्षित दर्शन करवाकर बाहर भी ले आया उसे।
बार-बार धन्यवाद देती आभार से छलकती आँखों से सोचे जा रही थी-काश अफसरी अकड़ के साथ-साथ समझ भी बड़ी होती सभी वर्दी वालों की, बिल्कुल इस नौजवान की तरह ही, तो कितने अनावश्यक अपराध रोके जा सकते थे!…
शैल अग्रवाल
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