ज्योत्सना कपिल, सीमा सिंह, विभा रानी श्रीवास्तव


पाँच लघुकथा

ज्योत्सना कपिल

लघुकथा-1
सही कदम

” मम्मी अब मैं वापस नही जाऊँगी, विवेक और उसके घरवाले बहुत लालची हैं। आज बिजनेस के बहाने पाँच लाख माँगे हैं। कल कुछ और चाहिए होगा।”
” ऐसे नही कहते बेटा । इंसान जरूरत पड़ने पर अपनों का ही मुँह देखता है। वैसे भी हमारा जो कुछ है, तुम बच्चों का ही है। ”
” मम्मा आप उनकी आदत बिगाड़ रही हो, यह ज़रूरत नहीं, बल्कि पैसा उगाहने का तरीका है। आप मुझे यहीं रहने दो। मैं अपना कॅरियर बनाऊँगी और अपना बोझ खुद उठाऊँगी । ”
” बेटा, शादीशुदा बेटी को आज तक कौन माँ बाप अपने पास रख पाए हैं। ” स्वर में खिन्नता थी।
” मतलब आप मुझे यहाँ नहीं रहने देंगी ? ” बेटी ने तल्ख स्वर में कहा।
” भाभी अब मैं चलूँ ? ” तभी लछमी ने माँ बेटी की बातों में ख़लल डाल दिया ।
” लछमी ज़रा जाने से पहले बाथरूम की टाइल्स और साफ कर दे। बहुत गन्दी दिख रही हैं। ”
” भाभी कल कर दूँगी, अभी देर हो रही है। सुबह देर से आँख खुलने से, कुछ बना न पाई थी। सिबानी स्कूल से आने वाली होगी। ”
” शिवानी ? उसकी तो तूने शादी कर दी थी ?”
” हाँ भाभी , पर अब उसे मैं बापस ले आयी हूँ। उसका घरवाला सराब पीकर खूब मारता तोड़ता था, तो हम उसे अपने साथ ले आये। ”
” तुम लोगों में सबकी यही कहानी है, तेरा आदमी भी तो पीकर, तुझसे मार पीट करता है ?”
” हमे तो कोई सहारा देने बाला न था भाभी , पर अपनी सिबानी को न भुगतने देंगे। उसका दाखिला हमने इस्कूल में करा दिया है, पढ़ लिखकर हिल्ले लग जाए, तो ये सब बर्दास्त न करना पड़ेगा । ”
” तू उसे घर लायी, तो तेरे दामाद ने कुछ न कहा ? ”
” क्यों नही, पहले तो खूब अकड़ा, फिर जब देखा कि हम खूब पक्के पे बैठे हैं, तो आजकल खूब हाथ पैर जोड़कर माफी माँग रहा है । ”
” जब माफी माँग रहा है तो भेज दे, बेटी को सारा जीवन, तो आज तक राजा भी अपने पास न रख पाया है। ”
” हम गरीब आदमी, राजा लोग की का जानें। पर जब बिटिया को जनम दिये हैं ,तो आग में तो न झोंकेंगे।” मालकिन को सोच में पड़ा देखकर उसकी हिम्मत बढ़ गई ” सराबी का कौन भरोसा भाभी , देखते हैं ,दो चार साल में सुधर गया तो ठीक, वरना निकल ले पतली गली से। ” कहती हुई वह निकल गई, तो बेटी ने तीखी एवम शिकायती दृष्टि से हतप्रभ माँ को देखा।
” ठीक है बेटा, किसी प्रोफेशनल कोर्स में तेरे एडमीशन की बात करती हूँ ।” कुछ पल सोचकर वह दृढ़ स्वर में बोली, तो बेटी हतप्रभ सी, माँ के बदलते हुए दृष्टिकोण देखती रह गई।

लघुकथा-2

विकलांग
” आज तो, रामनवमी के दिन, मंदिर में खूब भीड़भाड़ रही, तेरी अच्छी कमाई हो गई, अब मेरा हिस्सा निकाल। ” खाकी ने उस पंगु, बूढ़े, भिखारी की पसलियों में अपना डंडा चुभोया, तो भिखारी के चेहरे पर तिरस्कार के भाव आ गए।
” कहां हुजूर, आजकल भगतों के दिल में रहम की भावना बची ही कहां है दिबान जी। ” उसने खाकी को चकमा देने की कोशिश की।
” अबे तू मुझे मूरख बनाने की कोशिश कर रहा है ? सुबह से भक्तों का तांता देख रहा हूं , भगवान के दर्शन को भी और तुझे भीख देते भी। चल टाइम खराब मत कर , बिना चूं चपड़ किए मेरा हिस्सा दे दे। ” खाकी ने भिखारी को धमकाया।
भिखारी ने मन मसोसते हुए, अपनी गुदड़ी में से कुछ नोट निकालकर खाकी की ओर बढ़ा दिए। खाकी ने नोट अपनी जेब के हवाले किए और थोड़ा दूर खड़े होकर सिगरेट के कश भरने लगा। यह दृश्य देखकर कुछ दूर पर खड़े अजय व विक्रम के चेहरे पर घृणा के भाव उभर आए। दोनों ने एक दूसरे को देखा, फिर अजय मंथर गति से चलता हुआ बूढ़े भिखारी के पास गया। जेब से एक सौ का नोट निकालकर, उसने भिखारी की ओर बढ़ा दिया।
” बाबा, मेरा बच्चा लंबी बीमारी के बाद, अब जाकर ठीक हुआ है। दुआ करो कि वह हमेशा ठीक रहे। ”
” भगवान आपके बच्चे को खूब तंदुरुस्त रखे। बड़ा होकर आपका नाम रोसन करे बाबू। ” बूढ़े ने आसमान की ओर हाथ उठाकर दुआ मांगी।
जाते हुए वह पलभर को ठिठका, एक दृष्टि खाकी पर डाली, और फिर एक सौ का नोट उसके हाथ में भी थमा दिया
” आप भी चाय पानी के लिए रखो दीवान जी, और मेरे बेटे के लिए दुआ करना। ” खाकी ने हैरानी से उसे देखते हुए, नोट अपनी जेब में रख लिया।
” आपका बेटा हमेशा हंसता खेलता रहे, खूब लंबी उम्र हो उसकी। ” खाकी ने भी दुआ की।
अजय और विक्रम वापस आकर बाइक में बैठे और आगे बढ़ गए।
” यार तूने उस बूढ़े को पैसे दिए, यह तो समझ में आया। क्योंकि बेटे के ठीक होने के बाद तूने इक्कीस हेंडिकेप को दान करने का संकल्प लिया था। पर उस दुष्ट खाकी को क्यों ?”
” बीस दिव्यांगो को दान कर चुका था, पर उस खाकी को देखकर ख्याल आया कि एक विकलांग ही सही। बस यह बात दिमाग में आते ही मैंने उसे भी दान दे दिया। ”
” विकलांग …?”
” हां भई, बूढ़ा बेचारा तो दिव्यांग ही था, पर वह खाकी विकलांग निकला। ” अजय के जवाब पर विक्रम की आंखों में समझने के भाव झलक पड़े।

लघुकथा-3

आपेक्षाओं के दंश
2 दिसम्बर
प्रीबोर्ड में मेरे सिर्फ एट्टी परसेंट मार्क्स देखकर मम्मी बहुत नाराज़ हुईं हैं । इसलिए कि अपने सर्कल में उनकी बेइज्जती हो जाएगी। उनका मानना है कि अभी इतने कम मार्क्स हैं तो बोर्ड में क्या होगा ?
15 दिसम्बर
पापा खुद ज्यादा पढ़ नहीं सके थे, तो उनकी सारी उम्मीदें मुझसे है। वह मुझे आईएएस बनाना चाहते हैं। यदि मैं उसमें सफ़ल न हुआ तो वे बेहद निराश होंगे। पर मैं तो सिंगर बनना चाहता हूँ। एनुअल फंक्शन के लिए मैम ने मुझे स्कूल के बैंड में लिया था, पर पापा के फोर्स करने पर मुझे उसमें से अपना नाम निकलवाना पड़ा। मेरी अपनी इच्छा की कोई कीमत ही नहीं !
1 जनवरी
आज दोस्तों के साथ नए साल के जश्न के लिये मम्मी पापा ने मुझे जाने ही नहीं दिया। वह चाहते हैं कि अब मुझे सिर्फ पढ़ना चाहिए, पर थोड़ी देर के एंटरटेनमेंट का हक़ तो मुझे भी है। उन्होंने जबर्दस्ती मुझे पढ़ने बैठा दिया है। अब तो मुझे पढ़ाई के नाम से नफरत होने लगी है।
8 फरवरी
आज कैमिस्ट्री के खराब प्रेक्टिकल के साथ मेरी बोर्ड की शुरूआत अच्छी नहीं रही। अब क्या होगा ? मम्मी पापा मेरे कम नम्बर देखकर निराश होंगे। पर क्या करूँ ? मैंने तो दिनरात एक करके पढ़ाई की। फिर भी अगर कुछ गड़बड़ हो जाए तो क्या करूँ मैं ?
12 मार्च
इतनी मेहनत करने पर भी मैथ्स का पेपर खराब हो गया। दो क्वेश्चन मुझे समझ ही नहीं आये। आज मैं बेहद निराश हूँ। पापा कहते हैं ट्वेल्थ बोर्ड बहुत महत्वपूर्ण है। अगर नम्बर कम आये तो अच्छे कॉलेज में एडमिशन नहीं मिलेगा ।
21 मार्च
आज फ़िज़िक्स का पेपर भी मैं नाइंटी परसेंट सॉल्व कर पाया। मम्मी पापा चाहते हैं कि मेरे कम से कम नाइंटी एट परसेंट मार्क्स आयें। पर मुझे नाइंटी परसेंट की भी उम्मीद नहीं। मैं मम्मी पापा की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया। अब अपने सर्कल में मम्मी की निगाह झुक जाएगी और पापा को भी शॉक लगेगा। वह दोनों मुझसे इतना प्यार करते हैं । उनकी खुशी के लिए इतना करना मेरी जिम्मेदारी थी।
4 अप्रैल
निराशा बढ़ती ही जा रही है। जीवन बेकार लगने लगा है। मुझे जीने का हक़ नहीं। अपने माता पिता के सपनों को मैं चाहकर भी पूरा नहीं कर सका और मेरे सिंगर बनने के सपने को पापा पूरा नहीं होने देंगे। उनकी नज़र में जो किसी लायक नहीं होते वो ही भांड मिरासी बनते हैं।
11 अप्रैल
अब तो लगने लगा है कि मम्मी पापा ने मुझे सन्तान सुख के लिए नहीं, बल्कि अपनी समाजिक प्रतिष्ठा में बढ़ोतरी लिए ही जन्म दिया है। अपनी इच्छाओं का गला घोंटते हुए, बस अपेक्षाओं का बोझ ढोते मैं थक चला हूँ। या शायद मैं ही किसी लायक नहीं। मैं स्वयं को समाप्त कर रहा हूँ।
अगम।

***

लघुकथा-4
डर

” मम्मा, आप मुझे पार्क में देर तक खेलने क्यों नहीं देतीं ?
” बेटा अंधेरा होने वाला है, ऐसे में घर मे ही रहना चाहिए”
” क्या अंधेरे में भूत आ जाते हैं ?”
“भूत-वूत कुछ नही होता बेटा”
” अच्छा मम्मा, मैं जाकर अपने लिए चॉकलेट ले आऊँ ?”
“बेटा कल ला दूँगी मैं”
” पर मुझे तो अभी खानी है ”
” बेटा अभी मम्मा काम कर रही हैं। प्रॉमिस कल हम आपको चॉकलेट ला देंगे।”
“आप मुझे कहीं जाने क्यों नही देतीं? मुझे तो ज़रा भी डर नहीं लगता।”
” पर मम्मा को तो डर लगता है बेटा, आप अभी छोटी हो।”
“अच्छा मम्मा आप यह बताओ कि मैं इतनी बड़ी कब हूँगी कि आप मुझे कहीं भेजने से डरें नहीं?”
” बेटा, इतनी बड़ी तो आज तक मैं भी नहीं हो पाई हूँ।”
मम्मी ने अखबार की हेडलाइन की ओर देखते हुए कहा, जिसमें एक लड़की के साथ हुई जघन्य हैवानियत की ख़बर छपी थी।

***

लघुकथा-5
नामर्द

स्नान के बाद, कपड़े फैलाने के लिए ऋतु बालकनी में आई, तो देखा नमित , सामने वाली पड़ोसन को देखकर मुस्कुरा रहा है और कुछ इशारे भी कर रहा है। पत्नी को देखकर वह चौंक पड़ा और गंभीर भाव बनाए हुए वहाँ से हट गया। ऋतु का चेहरा उतर गया, फिर स्वयं पर नियंत्रण करते हुए उसने पूछा
” आप हॉस्पिटल से कब आए?”
” अभी तो आया हूं।”
” पूर्वा कैसी है?”
” उसे क्या होना है, भली चंगी है, डिलीवरी के समय, हालत थोड़ी बिगड़ गई थी। डॉक्टर के कहने पर, कि माँ और बच्चे में से किसी एक की जान ही बच सकती है , सुमित ने उसे ही बचाने का फैसला लिया। ”
” सुमित उसे बहुत चाहता है।” उसने देवर का पक्ष लेते हुए कहा।
” जो बीवी, शादी के दस साल बाद भी एक औलाद न दे सकी ? उसे सर आँखों पर तो ऐसे बैठाता है, जैसे दुनिया बस एक उसी पर खत्म हो जाती है। बीवी के पल्लू से बँधा घूमने वाला, साला नामर्द ।”
नमित ने नाराजगी से कहा।
” तो क्या हुआ, जब हमारा दूसरा बच्चा होने वाला था, तो आपने भी तो डॉक्टर को मेरी ही जान बचाने को बोला था। ” वह पति के क्रोध पर हैरान थी।
” उससे मेरी तुलना मत करो।” अपने जुड़वाँ बेटों को देखकर वह गर्व से मूछें उमेठने लगा। ” वैसे भी जब तुम्हें बचाने का फैसला लिया तो लड़की ….”
यह सुनते ही ऋतु सन्न रह गई।
” यानी, अगर उस समय लड़की के बजाय लड़का होने वाला होता, तो आप मुझे …. ”
” जो नहीं हुआ उस बात को करने का क्या मतलब ? ” वह तेज स्वर में बोला।
” वाकई असली मर्द तो आप हैं।”
उसने कहा, तो नमित अकड़कर बाहर निकल गया।
” काश मुझे भी सुमित जैसा ही नामर्द मिलता!”
कहते हुए उसने ठंडी सांस ली।

पाँच लघुकथा

सीमा सिंह
नोएडा

लघुकथा-1
ख्वाहिशों के छोर
“बस, मिष्ठी! यही आदत तुम्हारी नहीं पसंद है मुझे,” नाश्ते की ट्रे लेकर कमरे में प्रवेश करती माँ ने बिफरते हुए कहा।
पत्नी के क्रोधित स्वर से सहाय बाबू भी उठ कर चले आए। पूरा कमरा जंग का मैदान बना पड़ा था। बिटिया ने अपने कमरे में सारे कपड़े बिखरा रखे थे।
पिता को मुस्कुराता देख बिटिया को भी शह मिल गई।
“क्या, माँ? सब बेकार हैं, पुराने हैं! एक जोड़ा ऐसा नहीं है ,जिसको पहन पापा के साथ जा सकूँ!”
“भाई, बिटिया दो-एक साल में डॉक्टर बन जाएगी तो कपड़े तो ठीक-ठाक ही होने चाहिए उसके।
पिता का सहारा पा मिष्ठी और मुखर हो उठी। “आप ही देखिए पापा कितने बेकार कपड़े जमा कर दिए हैं माँ ने।”
“अभी दो सप्ताह पहले ही चार जोड़े इसको उठाकर दिए हैं मैंने,” आँगन में सफाई करती कामवाली की ओर इशारा कर श्रीमती सहाय अपने क्रोध को दबाते हुए बोली। “मैं कहती हूँ, जब पहनने नहीं होते हैं तो खरीदती ही क्यों हो?”
“वही तो! उसकी पसंद के खरीदा करो!” सहाय बाबू ने पत्नी से कहा।
एकलौती संतान की हर ख्वाहिश मुँह पर आने से पहले ही पूरी करने की इच्छा रखने वाले सहाय बाबू का बचपन बहुत तंगहाली में बीता था। इसी लिए वो अपनी बेटी की हर इच्छा पूरी कर देने की चाह रखते थे। किन्तु पत्नी दुनियादार महिला थी ,वो नहीं चाहती थी कि इकलौते होने के कारण बेटी पैसे के महत्त्व को नकार बेपरवाह हो जाए।
“अबकी बार अच्छे कपड़े दिलवा देंगे, तुम मेरे साथ चलना।” पिता ने फुसफुसा कर पुत्री से कहा। और पत्नी से आँखों ही आँखों में खुशामद करते हुआ बोले, “ये बेकार पड़े कपड़े अगर मिष्ठी नहीं पहनना चाहती, तो महरी को ही दे दो।”
उदास, आँगन बुहारती लड़की की आँखों में अचानक दीवाली के दिए जल उठे थे।

लघुकथा-2
वैशल्य
“बी ए तो मैं हरगिज़ नहीं करूँगी!”
यह आवाज़ कानों में पड़ी तो निर्मला की नींद टूटी। सर्दियों की अलसाई सी सुबह, कुछ सफर की थकान और कुछ मायके की निश्चिन्तता! सबका मिला जुला प्रभाव कुछ ऐसा रहा कि निर्मला देर तक सोती रही थी।
“मैंने बता दिया न, समझ नही आ रहा तुझे?” अगली आवाज़ के साथ ही तन्द्रा भी टूट गई, ये स्वर उसकी भाभी का था।
बिस्तर से उठ वह आवाज़ की दिशा में बढ़ी तो भाभी देखते ही उठ खडी हुई,
“अरे जिज्जी! इतनी सर्दी में बिस्तर से क्यों निकल आईं आप? आप इधर आ जाओ, यहाँ बैठ जाओ!”अपने बिस्तर की रजाई ठीक करके उसे बैठाती हुई भाभी, अपने स्वर में नरमी भरते हुए बोली।
“क्यों बिगड़ रही हो बिट्टी पर सुबह सुबह?” निर्मला ने सीधे मुद्दे पर आते हुए पूछा।
“क्या बताएं जिज्जी, स्कूल के हर खेल कूद में हिस्सा लिया इसने हमने नहीं रोका। पर अब ज़िद पर अड़ी है कि सादा बीए नहीं करेंगे पी एड कॉलेज जाएंगे!” भाभी ने गुस्से से भर कर बिट्टी की नकल उतारते हुए कहा।
“तो उसमें क्या हर्ज है?”
“मगर कॉलेज यहाँ थोड़े ही है, बाहर जाना होगा।”
“तो क्या हुआ बबलू को भी तो भेजा है इसको भी भेज देना।”
“नहीं भेज पाएंगे हम। आपके भैया कह रहे हैं, बीए करना है तो करे नहीं तो हम ब्याह कर देंगे जो करना है अपने घर जाकर करे!”
“अपने घर जाकर करे का क्या मतलब है भाभी? निर्मला के मन के छाले फूट गए थे। “तुम बहुत अच्छा गाना गाती थीं, तुम बन गईं संगीतज्ञ? मुझे पेंटिंग का चाव था, मैं बन गई चित्रकार?” मन के भीतर के भीतर की टीस,आँखों में डबडबा आई निर्मला के।
“पर जिज्जी…”
“भाभी! एक ही जीवन मिलता है, जी लेने दो बच्ची को!”
तभी बरामदे से एक पुरुष स्वर उभरा:
“बिट्टी! भर ले अपना फार्म बेटा! दफ्तर जाते वक्त रजिस्ट्री करता जाऊंगा।”
अंदर के कमरे में, कोने में चुपचाप अपनी रजाई में दुबकी बूढ़ी अम्मा ने गहरी सांस ली। उसकी छाती पर से बरसों से रखा पत्थर हट गया था, वह स्वयं को फूल सा हल्का महसूस कर रही थी।

लघुकथा-3
नमस्तस्यै…नमस्तस्यै…नमस्तस्यै!
“चाहे कोई देखने आए या न आए, ये फ़ालतू के सेलेब्रेशन ज़रूर करवाने होते हैं इन लोगों को,” फ़िज़िक्स टीचर ने कंप्यूटर लैब इंचार्ज से कहा, तो उन्होंने भी सहमति में सिर हिलाया।
लॉकडाउन के चलते बच्चों का स्कूल आना बंद था, मगर मैनेजमेंट के निर्देशानुसार नवरात्रि के उपलक्ष्य में असेम्बली फिर भी होनी थी, जो कि स्कूल की सालाना पत्रिका और वेबसाइट में उल्लेखित की जानी थी। फ़ोटोग्राफर आ चुके थे। स्कूल का स्टाफ भी धीरे–धीरे असेम्बली हॉल में एकत्रित हो रहा था। असेम्बली डायस पर पर्दा पड़ा था, और मंच के आगे रखी मेजों पर फूल और पूजा सामग्री लदी थी।
“अरे, आप तो शुक्र ये मनाओ, मैडम, कि आपको आज सज-धज के नहीं आना पड़ा है,” लैब इंचार्ज ने कहा। “मैंने तो लैब में बिजी होने का बहाना कर दिया था, मगर वर्मा सर ने बहुत सी मैम लोग को अपने इशारे पे नचाया है इस सब के नाम पर।”
“वर्मा? वो लफंगा?” फ़िज़िक्स मैडम ने उत्तेजित होते हुए कहा, तो लैब इंचार्ज ने दांत भींच कर धीमे बोलने का इशारा किया। “वह भला क्यों…”
“उनकी असेम्बली ड्यूटी जो थी, इस बार,” लाइब्रेरियन मैडम ने उनके बगल में स्थान ग्रहण करते हुए बताया।
सह अध्यापक वर्मा जी के रसिक स्वभाव से त्रस्त शिक्षिकाओं की शिकायत पर, प्रिंसिपल मैडम ने पुरुषों के बैठने की व्यवस्था अलग स्टाफ रूम में कर दी थी। इसी वजह से महिला अध्यापिकाओं में से कुछ को पिछले हफ्ते से चल रही तैयारियों के बारे में जानकारी नहीं थी।
पिछली सीटों पर कुछ पुरुष अध्यापक आ कर विराजने लगे।
“अरे, मैं तो शैलजा मैम के लिए आया हूँ, बस!” असैम्बली इंचार्ज वर्मा जी के टीम सहयोगी और अभिन्न मित्र, हिंदी के टीचर ने अर्थपूर्ण ढंग से मुस्कुराते हुए अपने साथियों से कहा।
“हां, भई, शैलपुत्री की सफेद साड़ी में क्या गजब लगेंगी आज!” किसी ने उत्तर दिया।
पिछली कतार में चल रही फुसफुसाहट के अंश अगली पंक्ति तक पहुँचे तो फ़िज़िक्स मैडम ने चौंक कर लाइब्रेरियन मैडम की ओर देखा। “ये क्या प्रोग्राम सेट किया है वर्मा जी ने?”
“और सुना है अपनी प्रिंसिपल मैडम को सिद्घिदात्री बनाया गया है?” पिछली सीट पर चल रही चर्चा में लिप्त अध्यापकों के स्वर में अब और रोमांच था।
“अरे, ये वर्मा जी कहां हैं? उन्होंने ही सारे नाम चुने हैं, और इंग्लिश सर ने सबको राज़ी किया। उनके ही पास लिस्ट है! हमें ज़्यादा अच्छे से याद नहीं आ रहा!” हिंदी टीचर ने अफसोस जताते हुए कहा।
“इस बार बच्चियों की जगह अध्यापिकाओं को नव देवियाँ बनाया है, मैडम!” लाइब्रेरियन मैडम ने बताया।
तभी पर्दा उठा। नवदुर्गा के रूप में सजी–धजी देवियाँ बनी शिक्षिकाएँ पहचान में नहीं आ रही थीं।
वर्मा जी अपने मित्रों के बीच आ कर बैठे। “इस बार मंच की देवियों का रोचना डाइरेक्टर सर नहीं कर रहे हैं, सोशल डिस्टेंसिंग के कारण,” उन्होंने सबके बीच फुसफुसाया।
“वर्मा जी ने बहुत मेहनत की है इस बार!” मित्र ने दांत चमकाते हुए मित्रता दिखाई। “क्यों ना उनको ही…”
हिंदी टीचर की बात का अनुमोदन किसी ने भवें उचका कर, तो किसी ने आंख मार कर किया।
फौरन ही वर्मा जी को कुर्सियों की कतार से बाहर, स्टेज की ओर ले जाया गया, और हल्दी कुमकुम से सजी थाली अब उनके हाथ में आ गई।
हमेशा सीटी बजाते रहने वाले वर्मा जी के लिए यह बिलकुल अलग अनुभव था। अब तक मन में उमड़ रहे विचार क्षण भर में सहम कर दुबक गए।
मंच पर विराजित सहकर्मी उन्हें साक्षात् देवियाँ लग रही थीं।
“प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।। पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।। नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।” शंख और घंटे की ध्वनि के साथ-साथ बजता मंत्र वातावरण को दिव्य बना रहा था।
वर्मा जी के हृदय की धड़कन बढ़ गई। पसीजते हाथों से सबके माथे पर तिलक लगाने की तैयारी करते वर्मा जी के पाँव शैलजा मैम के आगे ही ठिठक गए। लाउडस्पीकर में से आती म्यूज़िक टीचर की आवाज़ पूरे हॉल में गूंज उठी—
“वन्दे वांच्छित लाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्‌। वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌॥ अर्थात, देवी वृषभ पर विराजित हैं। शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल है और बाएं हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है। यही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। नवरात्रि के प्रथम दिन देवी उपासना के अंतर्गत शैलपुत्री का पूजन करना चाहिए।”
शैलजा मैडम के सामने ठिठके वर्मा जी ने रोली का तिलक लगाकर और झुक कर, कांपते हाथों से शैलजा मैडम के पैर छू लिए।
आज पहली बार शैलजा मैम को भी उनका स्पर्श लिजलिजा नहीं लगा था।
सीमा सिंह
नौएडा, दिल्ली

लघुकथा-१
जननी जन्मभूमिश्च
तकिया हाथ से दबाकर ठीक किया और फिर से करवट बदल ली। वैभव की आंखों में नींद का नामोनिशान न था।
वह फिर उठकर बैठ गया। पूरी डॉरमेट्री नींद में डूबी थी। हर चेहरा अजनबी । सिर्फ बीस सीट्स और दुनिया भर के छात्र उनके बीच प्रवेश परीक्षा में दूसरा स्थान पाकर यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया था।आज ही हॉस्टल में शिफ्ट किया वैभव ने।
रह रह कर घर की याद आ रही थी।
जैसे जैसे जाने की तारीख पास आती जा रही थी माँ की तैयारियाँ बढ़ती जा रही थी।
” इतना सामान मत इकट्ठा करो माँ फ़्लाइट में सिर्फ दो बैग अलाउड है वो भी सिर्फ़ बाइस किलो के।”
“अभी तो दस किलो भी वजन नही हुआ है।” दोनों हाथों में घर पर बनाई मठरी की बरनी थामें माँ ने मुँह बनाते हुए कहा। याद करते हुए अपने बैड पर लेटा मुस्कुरा उठा।
” मेरी माँ! कितनी हिम्मत के साथ सारी तैयारी करती रही चेहरे पर एक भी शिकन बिना लाए।”
मन ही मन मां को याद करते हुए उसने सोचा।
चुनचुन कर उसका सामान रखती माँ का चेहरा आंखों से गुजरा तो मन में हूक सी उठी, ‘अब कब मिलेंगे माँ पापा!’
अगले ही पल स्वयं को धीरज दिलाते हुए वैभव मन ही मन सोचने लगा,‘ये मुझे हुआ क्या है? क्या पहली बार घर से दूर आया हूँ। मैं तो हमेशा ही हॉस्टल में
रहा हूँ।’
सर्दी के कपड़ों से मीठी सौंफ तक हर ज़रूरत चीज़ माँ ने ही उसके साथ रखी थी। उसने तो बस टेबल पर रखी फ्रेम में जड़ी माँ पापा की तस्वीर उठाकर बैग में डाली थी।
” माँ !ये नेशनल फ्लैग क्यों रख दिया है? मैं पढ़ने जा रहा हूँ युद्ध पर नहीं जो अपने झंडा रख दिया है! निकालिए इसको प्लीज़।”
बैग में रखा झंडा देख वैभव ने शोर मचाया था।
“रखा रहने दे बेटे कभी ज़रूरत पड़ी तो वहाँ कहाँ ढूँढेगा?”
“क्या करती हो तुम भी! हमारा बेटा बर्लिन जा रहा है अमेजन के जंगल नहीं… वहाँ भी उसकी जरूरत का सब समान मिल जाएगा।” पापा ने थोड़े तल्ख़ स्वर में कहा तो मम्मी के सामान रखते हाथ रुक गए। आँखों की नमी नाक में उतर सूँ-सूँ की आवाज़ में बदल गई।
“रहने दीजिए पापा मैं तो मम्मी को तंग कर रहा था।” वैभव ने बैग में सामान लगाती माँ के दोनों कंधों को हाथों से हौले हौले दबाते हुए कहा।
माँ फिर से सामान रखने लगी थी। माँ की बहुत याद आ रही है घर पर होता था तो कैसे पास बैठकर सिर में हाथ फिराने लगती थी। उसके स्पर्श से दूर भागी नींद झट से पलकों पर उतर आती। वैभव ने हाथ बढ़ा कर बैड के नीचे रखा अपना बैग खींच कर बाहर निकाला। मोबाइल की रोशनी में बैग में रखी माँ की तस्वीर निकालनी चाही तो उसके ठीक नीचे रखा झंडा भी साथ निकल आया। धीमी धीमी रोशनी में माँ का मुस्कराता हुआ चेहरा देखा और झंडे को अपने सीने पर रख कर लेट गया। एक बार फिर से माँ का फोटो देखा और बाहों के घेरे में झंडे और और माँ दोनों को कैद किया और आँखे मूंद ली। पलकें भारी होते ही सांसे गहरी होती चली गईं अब वह पूरी तरह नींद के आगोश में था।

लघुकथा-२
ख्वाहिशों के छोर
“बस, मिष्ठी! यही आदत तुम्हारी नहीं पसंद है मुझे,” नाश्ते की ट्रे लेकर कमरे में प्रवेश करती माँ ने बिफरते हुए कहा।
पत्नी के क्रोधित स्वर से सहाय बाबू भी उठ कर चले आए। पूरा कमरा जंग का मैदान बना पड़ा था। बिटिया ने अपने कमरे में सारे कपड़े बिखरा रखे थे।
पिता को मुस्कुराता देख बिटिया को भी शह मिल गई।
“क्या, माँ? सब बेकार हैं, पुराने हैं! एक जोड़ा ऐसा नहीं है ,जिसको पहन पापा के साथ जा सकूँ!”
“भाई, बिटिया दो-एक साल में डॉक्टर बन जाएगी तो कपड़े तो ठीक-ठाक ही होने चाहिए उसके।
पिता का सहारा पा मिष्ठी और मुखर हो उठी। “आप ही देखिए पापा कितने बेकार कपड़े जमा कर दिए हैं माँ ने।”
“अभी दो सप्ताह पहले ही चार जोड़े इसको उठाकर दिए हैं मैंने,” आँगन में सफाई करती कामवाली की ओर इशारा कर श्रीमती सहाय अपने क्रोध को दबाते हुए बोली। “मैं कहती हूँ, जब पहनने नहीं होते हैं तो खरीदती ही क्यों हो?”
“वही तो! उसकी पसंद के खरीदा करो!” सहाय बाबू ने पत्नी से कहा।
एकलौती संतान की हर ख्वाहिश मुँह पर आने से पहले ही पूरी करने की इच्छा रखने वाले सहाय बाबू का बचपन बहुत तंगहाली में बीता था। इसी लिए वो अपनी बेटी की हर इच्छा पूरी कर देने की चाह रखते थे। किन्तु पत्नी दुनियादार महिला थी ,वो नहीं चाहती थी कि इकलौते होने के कारण बेटी पैसे के महत्त्व को नकार बेपरवाह हो जाए।
“अबकी बार अच्छे कपड़े दिलवा देंगे, तुम मेरे साथ चलना।” पिता ने फुसफुसा कर पुत्री से कहा। और पत्नी से आँखों ही आँखों में खुशामद करते हुआ बोले, “ये बेकार पड़े कपड़े अगर मिष्ठी नहीं पहनना चाहती ,तो महरी को ही दे दो।”
उदास, आँगन बुहारती लड़की की आँखों में अचानक दीवाली के दिए जल उठे थे।

लघुकथा–३
वैशल्य
“बी ए तो मैं हरगिज़ नहीं करूँगी!”
यह आवाज़ कानों में पड़ी तो निर्मला की नींद टूटी। सर्दियों की अलसाई सी सुबह, कुछ सफर की थकान और कुछ मायके की निश्चिन्तता! सबका मिला जुला प्रभाव कुछ ऐसा रहा कि निर्मला देर तक सोती रही थी।
“मैंने बता दिया न, समझ नही आ रहा तुझे?” अगली आवाज़ के साथ ही तन्द्रा भी टूट गई, ये स्वर उसकी भाभी का था।
बिस्तर से उठ वह आवाज़ की दिशा में बढ़ी तो भाभी देखते ही उठ खडी हुई,
“अरे जिज्जी! इतनी सर्दी में बिस्तर से क्यों निकल आईं आप? आप इधर आ जाओ, यहाँ बैठ जाओ!”अपने बिस्तर की रजाई ठीक करके उसे बैठाती हुई भाभी, अपने स्वर में नरमी भरते हुए बोली।
“क्यों बिगड़ रही हो बिट्टी पर सुबह सुबह?” निर्मला ने सीधे मुद्दे पर आते हुए पूछा।
“क्या बताएं जिज्जी, स्कूल के हर खेल कूद में हिस्सा लिया इसने हमने नहीं रोका। पर अब ज़िद पर अड़ी है कि सादा बीए नहीं करेंगे पी एड कॉलेज जाएंगे!” भाभी ने गुस्से से भर कर बिट्टी की नकल उतारते हुए कहा।
“तो उसमें क्या हर्ज है?”
“मगर कॉलेज यहाँ थोड़े ही है, बाहर जाना होगा।”
“तो क्या हुआ बबलू को भी तो भेजा है इसको भी भेज देना।”
“नहीं भेज पाएंगे हम। आपके भैया कह रहे हैं, बीए करना है तो करे नहीं तो हम ब्याह कर देंगे जो करना है अपने घर जाकर करे!”
“अपने घर जाकर करे का क्या मतलब है भाभी? निर्मला के मन के छाले फूट गए थे। “तुम बहुत अच्छा गाना गाती थीं, तुम बन गईं संगीतज्ञ? मुझे पेंटिंग का चाव था, मैं बन गई चित्रकार?” मन के भीतर के भीतर की टीस,आँखों में डबडबा आई निर्मला के।
“पर जिज्जी…”
“भाभी! एक ही जीवन मिलता है, जी लेने दो बच्ची को!”
तभी बरामदे से एक पुरुष स्वर उभरा:
“बिट्टी! भर ले अपना फार्म बेटा! दफ्तर जाते वक्त रजिस्ट्री करता जाऊंगा।”
अंदर के कमरे में, कोने में चुपचाप अपनी रजाई में दुबकी बूढ़ी अम्मा ने गहरी सांस ली। उसकी छाती पर से बरसों से रखा पत्थर हट गया था, वह स्वयं को फूल सा हल्का महसूस कर रही थी।

लघुकथा-४
‘नमस्तस्यै…नमस्तस्यै…नमस्तस्यै!’
“चाहे कोई देखने आए या न आए, ये फ़ालतू के सेलेब्रेशन ज़रूर करवाने होते हैं इन लोगों को,” फ़िज़िक्स टीचर ने कंप्यूटर लैब इंचार्ज से कहा, तो उन्होंने भी सहमति में सिर हिलाया।
लॉकडाउन के चलते बच्चों का स्कूल आना बंद था, मगर मैनेजमेंट के निर्देशानुसार नवरात्रि के उपलक्ष्य में असेम्बली फिर भी होनी थी, जो कि स्कूल की सालाना पत्रिका और वेबसाइट में उल्लेखित की जानी थी। फ़ोटोग्राफर आ चुके थे। स्कूल का स्टाफ भी धीरे–धीरे असेम्बली हॉल में एकत्रित हो रहा था। असेम्बली डायस पर पर्दा पड़ा था, और मंच के आगे रखी मेजों पर फूल और पूजा सामग्री लदी थी।
“अरे, आप तो शुक्र ये मनाओ, मैडम, कि आपको आज सज-धज के नहीं आना पड़ा है,” लैब इंचार्ज ने कहा। “मैंने तो लैब में बिजी होने का बहाना कर दिया था, मगर वर्मा सर ने बहुत सी मैम लोग को अपने इशारे पे नचाया है इस सब के नाम पर।”
“वर्मा? वो लफंगा?” फ़िज़िक्स मैडम ने उत्तेजित होते हुए कहा, तो लैब इंचार्ज ने दांत भींच कर धीमे बोलने का इशारा किया। “वह भला क्यों…”
“उनकी असेम्बली ड्यूटी जो थी, इस बार,” लाइब्रेरियन मैडम ने उनके बगल में स्थान ग्रहण करते हुए बताया।
सह अध्यापक वर्मा जी के रसिक स्वभाव से त्रस्त शिक्षिकाओं की शिकायत पर, प्रिंसिपल मैडम ने पुरुषों के बैठने की व्यवस्था अलग स्टाफ रूम में कर दी थी। इसी वजह से महिला अध्यापिकाओं में से कुछ को पिछले हफ्ते से चल रही तैयारियों के बारे में जानकारी नहीं थी।
पिछली सीटों पर कुछ पुरुष अध्यापक आ कर विराजने लगे।
“अरे, मैं तो शैलजा मैम के लिए आया हूँ, बस!” असैम्बली इंचार्ज वर्मा जी के टीम सहयोगी और अभिन्न मित्र, हिंदी के टीचर ने अर्थपूर्ण ढंग से मुस्कुराते हुए अपने साथियों से कहा।
“हां, भई, शैलपुत्री की सफेद साड़ी में क्या गजब लगेंगी आज!” किसी ने उत्तर दिया।
पिछली कतार में चल रही फुसफुसाहट के अंश अगली पंक्ति तक पहुँचे तो फ़िज़िक्स मैडम ने चौंक कर लाइब्रेरियन मैडम की ओर देखा। “ये क्या प्रोग्राम सेट किया है वर्मा जी ने?”
“और सुना है अपनी प्रिंसिपल मैडम को सिद्घिदात्री बनाया गया है?” पिछली सीट पर चल रही चर्चा में लिप्त अध्यापकों के स्वर में अब और रोमांच था।
“अरे, ये वर्मा जी कहां हैं? उन्होंने ही सारे नाम चुने हैं, और इंग्लिश सर ने सबको राज़ी किया। उनके ही पास लिस्ट है! हमें ज़्यादा अच्छे से याद नहीं आ रहा!” हिंदी टीचर ने अफसोस जताते हुए कहा।
“इस बार बच्चियों की जगह अध्यापिकाओं को नव देवियाँ बनाया है, मैडम!” लाइब्रेरियन मैडम ने बताया।
तभी पर्दा उठा। नवदुर्गा के रूप में सजी–धजी देवियाँ बनी शिक्षिकाएँ पहचान में नहीं आ रही थीं।
वर्मा जी अपने मित्रों के बीच आ कर बैठे। “इस बार मंच की देवियों का रोचना डाइरेक्टर सर नहीं कर रहे हैं, सोशल डिस्टेंसिंग के कारण,” उन्होंने सबके बीच फुसफुसाया।
“वर्मा जी ने बहुत मेहनत की है इस बार!” मित्र ने दांत चमकाते हुए मित्रता दिखाई। “क्यों ना उनको ही…”
हिंदी टीचर की बात का अनुमोदन किसी ने भवें उचका कर, तो किसी ने आंख मार कर किया।
फौरन ही वर्मा जी को कुर्सियों की कतार से बाहर, स्टेज की ओर ले जाया गया, और हल्दी कुमकुम से सजी थाली अब उनके हाथ में आ गई।
हमेशा सीटी बजाते रहने वाले वर्मा जी के लिए यह बिलकुल अलग अनुभव था। अब तक मन में उमड़ रहे विचार क्षण भर में सहम कर दुबक गए।
मंच पर विराजित सहकर्मी उन्हें साक्षात् देवियाँ लग रही थीं।
“प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।। पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।। नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।” शंख और घंटे की ध्वनि के साथ-साथ बजता मंत्र वातावरण को दिव्य बना रहा था।
वर्मा जी के हृदय की धड़कन बढ़ गई। पसीजते हाथों से सबके माथे पर तिलक लगाने की तैयारी करते वर्मा जी के पाँव शैलजा मैम के आगे ही ठिठक गए। लाउडस्पीकर में से आती म्यूज़िक टीचर की आवाज़ पूरे हॉल में गूंज उठी—
“वन्दे वांच्छित लाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्‌। वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌॥ अर्थात, देवी वृषभ पर विराजित हैं। शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल है और बाएं हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है। यही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। नवरात्रि के प्रथम दिन देवी उपासना के अंतर्गत शैलपुत्री का पूजन करना चाहिए।”
शैलजा मैडम के सामने ठिठके वर्मा जी ने रोली का तिलक लगाकर ने झुक कर, कांपते हाथों से शैलजा मैडम के पैर छू लिए।
आज पहली बार शैलजा मैम को भी उनका स्पर्श लिजलिजा नहीं लगा था। लघुकथा-५ रोक

लघुकथा-5
रोक
“माँ तू इसको कुछ कहती क्यों नहीं हैं?”प्रताप घर में प्रवेश करते ही ज़ोर से चीखता हुआ माँ के पास आया।
“अब क्या हुआ?”
माँ ने किचन में आटा गूंधती बेटी पर एक उचटती सी नज़र डालते हुए बेटे से पूछा।
“मुझसे क्या पूछ रही हो इस से पूछो न?”
प्रताप गुस्से से कांप रहा था।
माँ ने पानी का गिलास बेटे को पकड़ाते हुए किचन के सामने ही पड़ी डाइनिंग टेबल की कुर्सी खिसकाकर बेटे को बैठाया और बोली,
“पहले तू शांत हो कर बैठ! फिर बताना, बात क्या है?”
“ये दीदी फिर धरने में गई थी। इसको बोलो न इन सब कामों में क्यों पड़ती है?”
प्रताप ने खीज भरे स्वर में बोलते हुए बहन को घूरा जो बड़े इत्मीनान से अपने आटे सने हाथों को सिंक के नल की पतली धार से मसल-मसलकर धो रही थी।
“कॉलेज प्रेसीडेंट है!उसका फ़र्ज़ है अपने साथियों की समस्या का अपने ढंग से निवारण करना।”
माँ ने बात खत्म करने की गरज से कहा और किचन की ओर बढ़ चली।
“सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की पाबन्दी के ख़िलाफ़ धरना देना भी फ़र्ज़ है क्या इसका?”
प्रताप के क्रोध का जैसे लावा फूट गया।
माँ ने चौंक कर बेटी की ओर देखा।
“कोई दहेज़ का केस हो तो इसका धरना प्रदर्शन, कहीं कोई बलात्कार या कोई छेड़छाड़ हो जाए इसका धरना प्रदर्शन….। अब की बार तो इसने हद कर दी, धार्मिक मसलों में भी उलझ रही है।”
प्रताप एक ही सांस में बोलता चला गया।
दोनों की बहस के स्वर अंदर के कमरे तक पहुंचे तो दादाजी भी पहले भीतर से ही सुनते रहे जब रहा न गया तो बाहर निकल कर आ खड़े हुए।
” क्या बात है घर को अखाड़ा क्यों बना रखा है तुम लोगों ने?”
दादा जी अपनी छड़ी टिकाते आँगन तक आ खड़े हुए।
“समस्या कोई भी हो मेरा फ़र्ज़ है अपने लोगों का साथ देना। और ये मैंने आपसे ही सीखा है दादाजी।” गीले हाथों को तौलिया से थपथपाकर पोछती हुई लड़की ने भाई के कंधे पर समझाने वाले अंदाज़ में हाथ रखते हुए उत्तर दिया और दादाजी की ओर देखने लगी।
“तो कॉलेज तक रह न!आज सबरीमाला मंदिर है तो कल शनिदेव मंदिर है इन सबसे तेरा क्या लेना देना है?”
“बात तो सही है यह सब तो विश्विद्यालय में नही होना चाहिए बेटा।”
“ये नहीं समझता है कोई बात नही पर आप भी दादू?”लड़की का स्वर लड़खड़ा गया था।
“अपने शहर के सारे मंदिर देख लिये हैं क्या?तूने और तेरी उन साथियों ने! बात करती है केरल और महाराष्ट्र के मंदिरों की।” प्रताप के स्वर में बेहद कड़वाहट थी।
“बात सिर्फ़ मंदिर मस्ज़िद में जाने की नहीं है!तू हमारी घुटन नहीं समझेगा।”
बहन का स्वर अब भी संयत था,किन्तु आँखे छलक जाने को तत्पर।
” मुझे समझा बेटी! शरीर बूढ़ा है पर दिमाग अब भी युवा है मेरा!आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय भागीदारी की है तेरे दादा ने”
दादाजी ने बहस रोकते हुए तेज़ स्वर में कहा।
“बात छोटी सी है, दादू! बिलकुल वैसा ही अहसास होता है जैसा आपको हुआ करता था, ‘इंडियंस एंड डॉग्स आर नॉट अलाउड’ पढ़कर…।

लघुकथा-5

नामर्द
स्नान के बाद, कपड़े फैलाने के लिए ऋतु बालकनी में आई, तो देखा नमित , सामने वाली पड़ोसन को देखकर मुस्कुरा रहा है और कुछ इशारे भी कर रहा है। पत्नी को देखकर वह चौंक पड़ा और गंभीर भाव बनाए हुए वहाँ से हट गया। ऋतु का चेहरा उतर गया, फिर स्वयं पर नियंत्रण करते हुए उसने पूछा
” आप हॉस्पिटल से कब आए ? ”
” अभी तो आया हूं। ”
” पूर्वा कैसी है ? ”
” उसे क्या होना है, भली चंगी है, डिलीवरी के समय, हालत थोड़ी बिगड़ गई थी। डॉक्टर के कहने पर, कि माँ और बच्चे में से किसी एक की जान ही बच सकती है , सुमित ने उसे ही बचाने का फैसला लिया। ”
” सुमित उसे बहुत चाहता है। ” उसने देवर का पक्ष लेते हुए कहा।
” जो बीवी, शादी के दस साल बाद भी एक औलाद न दे सकी ? उसे सर आँखों पर तो ऐसे बैठाता है, जैसे दुनिया बस एक उसी पर खत्म हो जाती है। बीवी के पल्लू से बँधा घूमने वाला, साला नामर्द । ” नमित ने नाराजगी से कहा।
” तो क्या हुआ, जब हमारा दूसरा बच्चा होने वाला था, तो आपने भी तो डॉक्टर को मेरी ही जान बचाने को बोला था। ” वह पति के क्रोध पर हैरान थी।
” उससे मेरी तुलना मत करो।” अपने जुड़वाँ बेटों को देखकर वह गर्व से मूछें उमेठने लगा। ” वैसे भी जब तुम्हें बचाने का फैसला लिया तो लड़की ….” यह सुनते ही ऋतु सन्न रह गई।
” यानी, अगर उस समय लड़की के बजाय लड़का होने वाला होता, तो आप मुझे …. ”
” जो नहीं हुआ उस बात को करने का क्या मतलब ? ” वह तेज स्वर में बोला।
” वाकई असली मर्द तो आप हैं। ” उसने कहा, तो नमित अकड़कर बाहर निकल गया।
” काश मुझे भी सुमित जैसा ही नामर्द मिलता! ” कहते हुए उसने ठंडी सांस ली।

पाँच लघुकथा

विभा रानी श्रीवास्तव
बैंगलुरु, भारत
विभा रानी श्रीवास्तव

लघुकथा-1
दिवा स्वप्न
मुनिया ने जब से होश सम्भाला, उसके बापू ने उसे भी कूड़ा बीनने पर लगा दिया। काम तो वह करती रही लेकिन उसका मन इसमें नहीं लगता था। विद्यालय की पोशाक पहने जब वह बच्चों को विद्यालय जाते देखती, तो उसका भी मन होता कि वह भी इन बच्चों की तरह विद्यालय जाए?
आज उसने अंतिम फैसला कर ही लिया था कि वह भी विद्यालय जाएगी। संध्या समय घर लौटते हुए उसने अपने पिता से कहा–“बापू! कूड़ा बीनने में मेरा मन नहीं लगता। मैं भी दूसरे बच्चों की तरह विद्यालय जाना चाहती हूँ।”
“नाली के कीड़े रेशम पर सोने का सपना नहीं देखते। अगर उन्हें रेशम पर लिटा भी दिया जाए तो वे मर जाते हैं।” बापू बेटी को समझाने लगे।
“मैं नाली का कीड़ा नहीं हूँ।.. मैं भी उन्हीं सब बच्चों की तरह हूँ, जो स्कूल जाते हैं। मैं विद्यालय अवश्य जाऊँगी।” मुनिया ने अपने बापू से कहा।
“विद्यालय अगर जाएगी तो तेरा पेट कैसे भरेगा?” नशे में डगमग बापू ने बेटी से कहा।
“जैसे उन सभी बच्चों का पेट भरता हैं, वैसे मेरा पे भी भर जाएगा। लेकिन मैं स्कूल जरूर जाऊँगी।” मुनिया ने अपने बापू को दृढता से कहा।
“तू समझती क्यों नहीं? वे लोग धनी माँ-बाप की संतान हैं।गरीब बच्चों के लिए विद्यालय में जाना मनाही है। बापू बिटिया को भटकाने के प्रयास करता रहा।
“सड़क पार वाले भैया तो मुझसे कह रहे थे कि पढ़ने के लिए.. कोई फीस नहीं लगती। किताबें और खाना भी मुफ्त में मिल जाता है।” मुनिया ने कहा।
“फिर ऊ भैया से तूही कह, वो तुझे भी भरती करा दें ! लेकिन बिटिया ज़ोंबी से अपनी रक्षा तू कैसे कर पाएगी? घर कैसे चलेगा..?” बापू पूछता है।
“बापू ! स्कूल से लौटकर मैं पढ़ूँगी भी और कचरा भी बीन लिया करूँगी। तुम चिन्ता नाही करो। इंसानों के संग रहकर ज़ोंबी भी इंसान बनते हैं।” मुनिया विद्यालय जाने के लिए दृढ़ थी।
“ठीक है बिटिया, अब जैसी तेरी मर्जी।” पिता का दिल भर आया। चाहता तो वह भी था कि उसकी बिटिया पढ़े-लिखे और नाम रोशन करे।…इस खुशी में पिता की आँखें गीली हो आई और उसने मुनिया को सीने से चिपका लिया।
लघुकथा-२
उजाले में करूँ
“आज अनेक दिनों के बाद क़ैद से सूरज निकला था! तुम छत पर बैठे धूप का आनन्द ले रहे थे! कमान से छूटे तीर की तरह अचानक तेजी से दौड़ते हुए कहाँ चले गए थे?”
“पड़ोस के छात्रावास के हाते से आते शोर के कारण देखने चला गया था! कैसा शोर है…?”
“कैसा शोर था?”
“लड़कियों का दो दल आपस में ही सर-फुटव्वल करने में भीषण घायल हो रही थीं…! एक ही लड़का, अनेक लड़कियों को अपने प्रेम-बिसात का मोहरा बनाए हुए है…! कितनी मूर्ख-अंधी होती हैं लड़कियाँ…!”
“सच कहा! मूर्ख-अंधी लड़कियाँ ही होती हैं। इसलिए तो दलदल में डूब जाती हैं!”
“और जिगोलो उसकी भी छोड़ो, नेक्रोफ़ीलिया के बारे में तुम दोनों की क्या राय है?”
“विमर्श लैंगिक विभेद पर बात नहीं होनी चाहिए…!” दोनों ने नजरें चुराते हुए बेहद धीमी आवाज में फुसफुसाया।
“ओ! अच्छा! तो तुमदोनों विमर्श कर रहे थे…! लगता है तुमदोनों के पास मनुष्यता संबंधित विषयों की कमी हो गयी है!”
उसकी बातें सुनकर उनदोनों की खिलखिलाहट वाली हँसी शोर मचा गई। एक ने कहा, “तुम्हारी बातें सुनकर मुझे लगता है कि तुम्हारे पास मनुष्यता के बारे में बहुत कुछ कहने को है!”
उस तीसरे ने मुस्कराते हुए कहा, “हाँ, हमारे पास बहुत कुछ है जो हम कहना चाहते हैं! न! न! सिर्फ कहना नहीं हमें करना होगा, जिससे यह लिंग-पक्षपाती रूढ़ियों और पूर्वाग्रही विचारों से समाज मुक्त हो सके…!”

लघुकथा-३
उऋण
शोर मच गया कि बड़े मालिक गुजर गये। दर्शानार्थी पूरा गाँव उमड़ पड़ा। जुटे सभी स्त्री-पुरुष और उनकी आँखों से गंगा-जमुना बह रही थी।
थोड़ी ही देर में भीड़ को चीरती हुई एक कार दरवाजे पर आकर रुकी। बड़ी मलिकाइन अपने भाई की पोती की शादी से वापिस लौटी थीं। उनके गले में चाँदी की चिक, हँसुली, चंद्रहार तो कानों में कई लड़ी के चंद्रबाली, हाथों में कड़े, कंगना, कमरधनी, पैरों में छागल, जड़ाऊँ पायल साज सजे हुए थे।
उतनी ही सजी बड़ी बहू भी अपनी सास का साथ दे रही थीं।
गाँव की महिलाओं के रुदन और तेज हो गए।
बड़े बाबू ने अपनी पत्नी को इशारा किया कि माँ के साथ वो घर के अन्दर जाएँ।
रबी-खरीफ, दलहन-तिलहन, कपास, सूरजमुखी उगाने वाले गाँव का, शायद ही कोई घर ऐसा था, जहाँ से बड़े मालिक की उधारी ना निकलती हो। किसान द्वारा जब उधार लिया जाता है, तो बदले में उनके घर के जेवर बंधक के तौर पर बड़े मालिक की तिजोरी की शोभा बढ़ाते जाते हैं।
मूल तो सधता नहीं। सूद इतना हो जाता कि कभी-कभी ज़ेवर बंधक से बिक्री हो जाते।
बड़े मालिक की अर्थी सज चुकी थी। बड़े बाबू अर्थी के आगे आग लेकर चलने की तैयारी में थे। तभी बड़े मालिक के मुनीम जी घोषणा करते हैं–“बड़े मालिक के श्राद्ध के दिन, अपने-अपने बंधक के कागज लेकर उपस्थित हो जाएँ। बड़े बाबू ने भोज की जगह बंधक का सामान लौटाने का निर्णय लिया है।”
सभी का रुदन और तेज हो गया।…

लघुकथा-४
क्षिप्रिका
माता-पिता की खुशियों के उच्छल पर अंकुश लग ही नहीं रहा था। उन्हें अपनी इकलौती पुत्री के लिए मनचाहा भारतीय प्रशासनिक सेवक, घर-जमाई मिल गया था। बारात का स्वागत हो चुका था। वरमाला के बाद वर-वधू गाड़ी में बैठ चुके थे। शादी के लिए मंडप घर की छत पर बना था। लेकिन वर-बधू वाली गाड़ी घर की तरफ न जाकर दूसरी तरफ मुड़ गई। बेबस होकर सभी गाड़ियाँ वर-बधू वाली गाड़ी का अनुसरण करते हुए शहर से बाहर बने वृद्धाश्रम के सामने पहुँच गईं।
वृद्धाश्रम के प्राँगण में मंडप सजा हुआ था। एक वृद्ध पीली धोती और सिल्क का नया कुर्ता पहने आगवानी में खड़े थे। वधू के माता-पिता भौंचक्के से पत्थर की मूर्तिवत खड़े थे।
“क्या आप अपने पिता को पहचान रहे हैं?” वर ने वधू के माता-पिता से पूछा।
“यहाँ तुम लोगों को आना था, तो हमें पहले से क्यों नहीं बताया।” वधू की माता ने वर से कहा। आखिर उनकी जड़ता टूट ही गई।
“दादा को वृद्धाश्रम में छोड़कर विदेश में भटकते रहे। आज भी आपने इन्हें याद नहीं किया। इन्हें यहीं छोड़ने का इरादा है क्या? आपने बताया भी नहीं था।” वर ने वधू के पिता, माता और वधू से पूछा।
“हुँह्ह्ह,..बताया जाता…कैसे बताया जाता? जब तक बुआ भारत में रहीं, दादा उनके साथ ज्यादा रहते थे। मेरी हम-उम्र फुफेरी बहन के साथ भी खुश रहते थे। मुझे तो दादा से बहुत दूर हॉस्टल में रखा गया।” आहत स्वर में वधू ने वर से कहा।
“सत्ता का उन्माद बिना महावत का रहा। महावत के बिना मदमस्त हाथी अलग-अलग दिशाओं में भ्रमित रहा। क्या अब इनका स्थानांतरण कर दें?” वधू के माता-पिता लजाए से खड़े रहे लेकिन वधू ने, वर से कहा–“नहीं। गलतियों के इतिहास को दोहराया नहीं जाता। मै अपने दादा के सामने और उनके आशीर्वाद से आपके अंक में आऊँगी।” वधू ने कहा।
….और तब, वहीं वृद्धाश्रम में विवाह मंडप सज गया। वधू के माता-पिता, दादा के चरणों में बैठकर अश्रुपूरित आँखें लिए रोने और बिलखने लगे।

लघुकथा-५
जाल से फिसली
ट्रिन-ट्रिन…ट्रिन-ट्रिन !
“हैल्लो”
“…………”
“हाँ ! इतनी भोर में जगी हूँ। रात में लगभग एक-डेढ़ बजे आँखों का लगना और भोर चार बजे नींद का उड़ जाना, रोज का नियम हो गया है।”
“…………”
“नहीं ! मेरी तबीयत नहीं खराब होगी।”
“………..”
“नहीं! मैं फ़ौलाद की नहीं बनी हूँ। यह सभी जानते हैं, जब बच्चों के दादा बीमार रहे, तो रात-रात भर जगना पड़ता था। तो अब आदत लग गई। बचपन से भी कम ही सोने की आदत रही।”
“…………”
“करना क्या है, कभी लॉकर का कागज ढूँढ़ते हैं, कभी एटीएम का पासवर्ड। कभी गाड़ी के पेपर, कभी बैंक का कुछ।… पता चला। शहर का कोई बैंक नहीं बचा, जिसमें अकाऊँट नाहीं खोला गया हो?”
“………..”
“हाँ..! लॉकर खाली हो चुका है। सारे बैंक अकाऊँट भी। गाड़ी बिके सालों गुजर गए। लेकिन उन्हें तो याद नहीं रहता ना?”
“……….”
“हाँ-हाँ ! तुम्हें नहीं पहचानते। इसलिए तो हम तुम्हारे साथ रहना नहीं चाहते। हमारी शादी दस साल ही निभ पाई थी….यह भी इन्हें याद नहीं।”
“………”
“बच्चे तो चाहते ही हैं। लेकिन एन.आर.आई बच्चों के पास रहने से भौतिक सुखों का अतिरेक, एकांत और दमघोंटू परिवेश, जिस से भागकर ही तो हम वृद्धाश्रम में सुकून से हैं…?”
“……..”
“तुम्हारे साथ रहने के अनुरोध को स्वीकार करना कठिन है। चिन्ता नहीं करो, यहाँ सम-वयस्क लूडो, कैरमबोर्ड, शतरंज के संगी-साथी…सब है।”
“……..”
“इस जन्म के लिए मेरे हालात को तुम्हारी मित्रता और तुम्हारी सहन शक्ति को आजमाने की जरुरत नहीं लग रही है। मित्रता प्यार में बदल सकती है, लेकिन क्या ऐसा हो सकता है कि प्यार मित्रता में बदल जाए?”
“…….”
“सही कहा। बिसात बिछा रह जायेगा। कौन पँछी पहले उड़ेगा यह कौन जान सका है? लेकिन मैं पहले जाना ही नहीं चाहती।” और फोन काट दिया गया।
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