मेरी प्रेरणाः नीना छिब्बर, इंदु झुनझुनवाला, देवी नागरानी


अजीब दास्तां है यह
सच में ” अजीब दास्तां है यह” संसार में जीना यानि चमत्कारों और जादू का खेला रोज अनुभव‌ करना जिसे ईश ने रचा है। कभी बासंती प्रेमल मौसम सा , कभी वर्षा ऋतु में सब तरबतर और कभी सूखे में एक-‌एक बूंद को तरसता जनजीवन। धरती पर मानव रूप में जन्म लेकर हम स्वयं ‌को धन्य मानते हैं क्योंकि शारिरीक, मानसिक और बौद्धिक दृष्टि से हम अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ है।‌तब भी कैसा अजीब मेला और खेला है जहाॅं हार-जीत, आशा-निराशा, पाना- खोना, उठना- गिरना और लड़ना‌ और फिर ‌-‌फिर लड़ते हुए बढ़ना जरूरी है। तब चाहिए होती है एक प्रेरणा।‌यह प्रेरणा हर व्यक्ति को अपने तरीके से ढूंढ़नी पड़ती है और‌ कभी मिल जाती है और कभी छूमंतर हो जाती है। पर प्रेरणा सपनों को पंख लगा देती है।

प्रेरणा मिलती है शब्दों से। कुछ शब्द, वाक्य, कथन, संवाद, गीत की पंक्तियाॅं, फिल्म के डायलॉग, वाहनों के पीछे लिखे अजीबोगरीब कविताऍं और अटपटे विज्ञापन जो शायद व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध हो सकते हैं पर रूकी हुई गति को किक देने में सौ प्रतिशत शुद्ध होते हैं। बरसों पहले किसी धारावाहिक में खलनायक अपनी प्रेमिका से कहता है कि ऐसी जगह मत बैठो कि कोई कहे उठ/ऐसी बात मत बोलो कि कोई कहे चुप/ऐसी चीज मत उठाओ कि कोई कहे रख। मुझे धारावाहिक का नाम याद‌ नहीं पर यह वाक्य मेरी प्रेरणा का सिक्का है जिसे मैं मुठ्ठी में बंद रखती हूॅं। ऐसे कितने ही वाक्य,शब्द गाहे- बगाहे अंतर आत्मा के संदुक में रखें हैं।

मेरी प्रेरणा के साथी सचमुच अजीब से ही हैं। शब्द तो हैं पर इसके अलावा प्रकृति के कुछ तत्व और उनकी स्थितियाॅं मुझ में नयी उर्जा भर्ती हैं।जब भी सूर्यास्त देखती हूॅं तो आसमान में बिखरी आखरी छोर‌ तक उसकी बावरी सी लालिमा मुझे कहती है कि जाना भी इतना लालित्यपूर्ण हो सकता है। अस्त होना उदय होने के लिए जरूरी है। उसी तरह पूर्णिमा का चाॅंद नहीं अमावस्या की रात‌ में जब हजारों -लाखों तारें टिमटिमा कर काली रात का शृंगार करते हैं तो उन्हें देखकर मेरे भीतर छोटी -छोटी जीत को भी बड़े पैमाने पर उत्सव के रूप में मनाने की प्रेरणा के तारे टिमटिमाते हैं। चाॅंद के बिना भी आसमान का अस्तित्व है। जीत के बिना भी सहज सरल निर्मल जीना अच्छा है। हर समय की भागदौड़ या मैं की जरूरत नहीं है।
हरे भरे, फल-फूलों से लदे वृक्षों से तो सभी प्रेरणा लेते हैं पर ठूंठ पेड़ जिसमें शाखाऍं श्रीविहिन ,झूकी और उपेक्षित सी उस ठूंठ पर बस पड़ी दिखती हैं।पक्षी भी बस पलभर रूक कर उड़ान भरते हैं । मुझे वो कहता है कि सब छोड़कर चलें जाए तब भी जीना और अपने दम पर जीना ही असल है। बस मन में यह विश्वास होना चाहिए कि एक बरसात की जरूरत है और जड़ों से एक अंकुरण जरूर फूटेगा। यह पानी/बरसात/तरलता /बहाव हमारे भीतर दबी है बस उसे बाहर लाकर अपने शुष्क इरादों को हरियल करना है। पहाड़ों से गिरते हुए झरने की अठखेलियाॅं, उल्हास,उच्छाह और गुनगुनाता शोर प्रेरणा देता है कि जीवन छोटा हो पर ऐसा हो। पत्थरों की प्यास बुझाता, नन्हें पौधें जो चट्टानों के बीच में से झांक रहे हैं उन्हें भी तृप्त कर नीचे उतरना और धरती पर आकर किसी नदी नाले में मिलना आनंद ही है।इन झरनों की मचलती फुहारें और चाल मन को स्फूर्ति देती है और रूकी हुई, अधूरी योजनाऍं पूरी हो जाती हैं।
अथाह समुद्र उसकी लहरें, खारा पानी, ज्वार- भाटा, नीले पानी पर फेन की परतें , शोर के पास खड़े होकर अह्म पिघलता है। जब समुद्र के नीचे ‌की अनोखी दुनिया के बारे में सोचती हूॅं तो नतमस्तक हो जाती हूॅं।
भीतर शैवाल के सुंदर पहाड़, मानक, मोती सीप सौंदर्य का अपना प्रतिमान गढ़ती हैं। समुद्र ऊपर हरहराता और गहरे शांत अपना विस्तृत साम्राज्य बसाए रहता है। तब मेरे भीतर से भी आवाज आती है कि हारना नहीं। भीतर की विशिष्टता को पहचान और बना अपना मार्ग। आंधी तूफान में झुके हुए पेड़ प्रेरणा देते हैं कि कठिन समय में झुको, रूको ,सोचो और तूफान के बाद अपनी योजना को फिर से बनाओ। अपनी कमियों को पहचानो क्योंकि हर परीक्षा उत्तीर्ण करने की जिद्द से व्यक्ति को तोड़ती है। सदा तने रहने से तनाव आता है। झूकने का अर्थ हार नहीं विनम्रता भी होती है।
जलते हुए दीपक का प्रकाश सभी को लुभाता है, स्मरण रहता है पर उस लौ के साथ जो धुंआ निकलता है वो भी प्रेरित करता है कि किसी भी नतीजे को समग्रता से लेना चाहिए।

प्रेरणा उस चींटी से लेती हूॅं जो अपने वजन से दस से पचास गुणा वजन उठा लेती है और कहलाती है चींटी।
नन्हीं गिलहरी की चंचलता, फुर्ती और सुंदर कोमल रूप गहरे अवसाद में भी बड़ी सी मुस्कान ले आती है। गिलहरी को यदि पेड़ों की सबसे ऊॅंची डाल पर फुदकते देखें तो दिल हवा की तरह हल्का हो उड़ता है। लगता है सब ओर से भार मुक्त हो बस ऐसे ही आगे बढ़ें।
प्रेरणा तो कण -कण‌ में बसी है। आवश्यकता है उसे पहचानने की और अपनी सवालों के जवाब खोजने की।
जिंदगी में यदि हमें हार -जीत और आशा निराशा में संतुलन करना आ जाए तो प्रेरणा का हाथ पकड़ कर हम बहुत दूर तक जा सकते हैं। कर्म करना और फल का इंतजार करना जरूरी है।

डॉ.नीना छिब्बर
जोधपुर

बात जीवन में प्राप्त प्रेरणा की, ऐसी प्रेरणा जो जीवन को सुन्दर दिशा प्रदान करें, कलियों को खिलने का अवसर दे, चेहरे पर मुस्कान हृदय में संतुष्टि के भाव से,,, तो मुझे याद आता है अपना बचपन,, बचपन कहूँ या किशोरावस्था, शायद यही उचित होगा।
कमल चाचा जी का घर पर आगमन मुम्बई शहर से, और उनके साथ हम सभी भाई बहनों का जुडाव, हमारी साहित्य के प्रति रूचि को पहचानकर उन्होने एक पुस्तक थमा दी, जिसका नाम था जिन्दगी मुस्कुराई’। तब मेरी उम्र महज तेरह वर्ष की होगी।
आज भी उसकी एक प्रति मेरे पास है, बासठ बसन्त पार कर चुकी हूँ।
पन्ने पलट कर,देखती हूँ तो उसके कवर के पिछले हिस्से पर लिखा है “जिन्दगी मुस्कुराती भारतीय शैली के अप्रतिम साधक स्व. कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ के ऐसे निबन्धों का मोहक संग्रह है, जो कहने को निबन्ध हैं, लेकिन ये संस्मरण भी हैं, कहानी भी हैं, अनुभव भी हैं, विचार भी हैं, उपदेश भी हैं और इन सबसे बढ़कर एक सहृदय, सत्पुरुष, हितैषी और प्रेमी मित्र की रात्री बातें हैं जो हृदय से निकलकर पाठक के हृदय में समा जाती हैं। दूसरे शब्दों में ये मन की मुरझाती तुलसी को प्रसन्नता के, अवसाद से आह्लाद के, हताशा से उद्यम के , अकर्मण्यता से सफलता के लहलहाते उपवन में लाकर रोप देती है।”
पुनः पहुँच जाती हूँ उन पलों में, जब पहली बार इस छोटी- सी दिखने वाली पुस्तक के पन्नों को पलटते हुए इसके शब्दों को अपने बाल मन की क्षमता के अनुरुप समझने का प्रयास करते हुए अपने चरित्र को उसके दर्पण में दिखने का प्रयास करती मैं,,।
छोटे-छोटे से प्रसंग, जीवन को सही दिशा देते हुए, किशोर अवस्था की जो बात आज भी याद है, उनमें से कुछ का जिक्र कर सकती हूँ।
हम बाल बनाते हैं और कंघी को बालों से भरा यूँ ही छोड देते हैं, दूसरा आता है, वो कंघी से मेरे बालों को निकालता है, फिर बाल सँवारना अपने टूटे बालों को कंधी में फँसा छोड़कर चल देता है, यह तो रोजमर्रा
की आम बात थी।
पर जब इस आलेख को पढ़ा तो हैरान हुई। प्रभाकर जी ने बडी ही सरलता से बताया कि क्या दूसरों के बाल निकालने से बेहतर नहीं कि हम अपने बालों को निकालकर कंधी साफ करके रखें!
मेरे किशोर मन में वो बात गहराई से उतर गई और आज सालों बाद भी यह याद रहती है और मैंने अपनी गन्दगी साफ करनी सीखी, दूसरों की बजाय।
बात बहुत मामूली नजर आती है, पर आज दर्शन की दृष्टि से देखती हूँ तो समझ आता है कि हम सभी यही करते आए हैं, हमारी उर्जा दूसरों की कमियों को सुधारने की असफल कोशिश में जाया होती रहती है और हमें अपनी कमियाँ नज़र ही नहीं आती, सुधारना तो दूर की बात,है,। तो क्या हम दूसरों की गन्दगी को साफ करने में अपना जीवन तो नहीं बर्बाद कर रहे?

याद आती है एक ओर बात, जब हम बीमार होते थे बचपन में, पूरा घर उसमें इसप्रकार लगा होता था, जैसे कोई बड़ी मुसीबत आ गई हो, सभी चिन्तित बुखार मात्र के हो जाने पर।
इनका एक आलेख पढ़ा ‘बीमारी -एक राहत’ ।
पहली बार ऐसा हुआ कि बुखार मुझे परेशान नहीं कर सकी, बल्कि मुझे लगा कि मैं जिन्दा हूँ, मुझमें लड़ने का क्षमता का नाम बुखार है, तो भला इसमें परेशान होने की क्या बात है,ये तो अच्छी बात है, बुखार होना मेरी लड़ने की क्षमता का प्रकाशन मात्र है।
ऐसे अनेकों उदाहरणों ने मेरे अन्दर के धैर्य को बढाया, मुझे कर्मठ बनाया और सचमुच मुझे लगा कि जिन्दगी मुस्कुराने लगी है।
फिर तो मैंने अपने चाचाजी से कहा कि मुझे प्रभाकर जी की सारी रचनाएँ पढने हैं और उन्होंने वायदे के मुताबिक उन्होने उनका पूरा निबन्ध साहित्य भेजा।
बात प्रेरणा की करूँ तो माता-पिता के पश्चात गुरु की,,
नारायणी कन्या उच्च विद्यालय की प्राचार्या अन्नपूर्णा देव, मेरी शिकायत पर मुझे बिना डाँटा, प्यार से सिर्फ एक ही पंक्ति, ध्यान रखना और फिर उनके नाम के साथ डॉ. शब्द का लग जाना, उनकी सीख सत्य बोलना अपराध नहीं पर प्रिय सत्य बोलो- इन तीन बातों का मेरे जीवन पर गहरा असर पड़ा।
किसी की गलती पर धैर्य रखकर समझाना आ गया, कटु सत्य पर मौन रहना सीखा और नाम के साथ डॉ. लगना चाहिए, कैसे वो पता नहीं था, डाक्टर बनना होगा तभी तो।
ये और बात थी कि डाक्टर की पढाई के लिए चीर फिर मेरे बस में नहीं था।
बहुत बाद में जाना कि उन्होंने डाक्टरेट किया था।
दो और गुरु महाविद्यालय के जो बने मेरी प्रेरणा जीवन के व्यवहारिक पक्ष में, समाज विज्ञान की प्राध्यापिका डॉ कुमकुम श्रीवास्तव, जो हमेशा हम सभी को आप कहकर बडे प्यार से बुलाती थीं, कभी डाँटा नहीं और डॉ. मंजिला सिंहा, जिन्होंने हमेशा बेटा कहकर ही बुलाया और हमारी अच्छी दोस्त बनी, तभी एक सपना पलने लगा अनजाने ही शिक्षिका बनने का, एक ऐसी शिक्षिका, जो दोस्त बनकर हाथ थाम सके जरूरत पडने पर।
लिखती चलूँ तो शायद अन्त ही नहीं जीवन के हर पल में कहीं न कहीं प्रेरणा के फूलों ने मेरे जीवन को सुवासित किया है।
आज जब बात साहित्य की है तो साहित्य किसप्रकार जीवन में सह हित को लेकर सार्थक होता है, इसे मैंने अनुभव किया और साहित्य की महत्ता से परिचित मन पुस्तकालयों के चारों ओर धूमधाम चला गया, विद्यालय से महाविद्यालय और महाविद्यालय से विश्व विद्यालय के पुस्तकालयों की खाक छानता मन, सभी विधाओं का अध्ययन करता, अन्य भाषाओं के अनुवादों को समझने का प्रयास करता, धर्मो की जड़ों को तलाशता, दर्शन की गहराईयों में उतरता, अन्तस में उतरने की राह पाकर अपने प्रश्नों के समाधान तलाशता, आज आज इतना तो कह ही सकता है कि वाकई में एक अच्छा साहित्य जीवन गुरु एवम् माता-पिता तथा साथी की भाँति दिशा और दशा बदलने में पूर्णतः सफल हो सकता है, बशर्ते हम जीवन की थोडा समय उसमें इस दृष्टि से लगाए कि हम उसमें लिखी गई बातों को अपने जीवन में उतार सकें।

डॉ. इन्दु झुनझुनवाला जैन
बेंगलूरू
9341218152

जिंदगी-एक सफर, एक मुक्ति द्वार
मैं मात्र मिट्टी, वह भी कच्ची

ज़िन्दगी की किताब से पन्ना दर पन्ना हर रोज़ पढ़ना पड़ता है. यही जीवन का सार है, जो ज़िन्दगी सिखाती है.

जीवन एक तवील सफ़र है, जिसके साथ और कई सफर चलते रहते हैं. कहते हैं, कहकशां में कहकशां हैं और भी…

जिंदगी को मैंने जैसे जाना, पहचाना उससे प्यार किया है. आज भी कोई शिकायत नहीं, और आज तक न ऐसा कोई गणित ईजाद हुआ है जिससे मूल्यांकन किया जाय कि जिंदगी ने हमें क्या दिया और क्या छीना? कोई मापदंड भी नहीं कि अपने आप को परख पाएं. वैसे भी सेल्फ जजमेंट सही हो इसकी भी तो कोई खातिरी नहीं.

मेरी आस्था उस पैदा करने वाले पर शायद, शायद नहीं, निश्चित ही तब भी थी जब मेरी जीवन रूपी नैया गिर्दाब में धंस रही थी, और आज भी वही आस्था कायम है, कि करने वाला भी वही और कराने वाला भी वही है. मैं तो फ़क़त एकमात्र वसीला हूँ. आगाज़ और अंजाम के बीच का फासला तय करने में मैं प्रयत्नशील, कुछ इस तरह जैसे कोई अस्थाई जॉब मिला हुआ हो, जो कदम दर कदम आगे बढ़कर कार्य को संपूर्ण करके तजुर्बों के शुमार में दर्ज करती हूँ. कच्चे मटके को पक्का करना, काम उस कुंभार का. मैं मात्रा मिट्टी, वह भी कच्ची.

शादी के पश्चात एक पत्नी की, बच्चों के बाद एक माँ की, और अनेक दूसरे रिश्तो को निभाने की रस्म अता करनी पड़ती है. हर एक इन्सान के जीवन में यही मौसम आकर गुजर जाते हैं. स्थाई कोई दौर नहीं! बदलते हुए मौसमों की मानिंद, धूप-छांव की तरह आती-जाती अवस्थाएं- बालपन, जवानी और अधेड़ उम्र की दहलीज़ से होकर जीवन की राह आगे बढती है. आज का दिन गुजरता है, जो महसूस किया, जिया, उस हर पल को हमारे तजुर्बात के टकसाल में दर्ज किया जाता है.

नियामतें रोज हमारे सामने रक्स करतीं हैं, शायद हमें पहचानने वाली वह नज़र नहीं है, या शायद हम कुछ और ढूंढ रहे हैं जो हमारे हिस्से में नहीं है. पाना और खोना- अगर हम इस महाजाल की सतह से ऊपर उठकर देखें तो हमें आभास होगा कि सूरज उगने के साथ, कुदरत हमें एक दूसरा नया दिन जीने के लिए देती है, खुद को जानने व् पहचानने के लिए, अपना कुछ निजी काम करने के लिए.

Life is a gift to live, to enjoy, to serve and to attain the purpose of human birth. कुछ इस तरह सोच कर चलने के लिए कि- It is the first day of the rest of my life.

फिर तो रोशनी ही रोशनी होगी और हम!

एक शायर के ख़याल की तरह इस करिश्मे का अहसास महसूस किया जा सकता है जो कहता है–

“नुक्ते के हेर फेर से उस से जुदा हुआ

नुक्ता पलट कर रख दिया, वही खुदा हुआ”

रुककर, पलटकर, पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है कि जीवन मुझपर मेहरबान रहा है- कम छीनकर, ज़्यादा दिया है: एक पहचान, एक रोशनी जो मेरे मन के वहमों, भरमों के अंधेरों को रोशन करती है.

सबसे बड़ी नियामत जिंदगी ने मुझे तोहफे में दी है वह है मेरी प्यारी सिंधी भाषा, अपनी बोली! वह बोली जो मैंने बचपन में तो न पढ़ी ढी, न लिखी, पर बड़ी उम्र के इस पड़ाव पर उस भाषा को लिखना-पढ़ना सीखकर यह पाठ पढ़ा कि अपनी मात्रभाषा हमारे अस्तित्व की बुनियादी नींव है, हमारी असली पहचान है, हमारी तखलीक की लौ है.

वह कशमकश का कौन सा दौर था, नहीं जानती. जिसने शिद्दते-शौक को अंजाम तक लाने में मेरी मदद की. क्यों वक़्त मुझसे यह सब कुछ कराता गया, किस कारण, नहीं जानती पर, इस बात का संपूर्ण विश्वास है इस करने कराने के पीछे उस विधाता का कोई तो हाथ है.

बचपन, विभाजन के दौर में गुजरा. लड्पडाण (विस्थापन) बस जाने में बाधा बनता चला गया, कुछ भी आसान न था, अपने उखड़े वजूद को फिर से नई मिट्टी में रोपना. यह दौर हममें से बहुतों ने देखा और भोगा है. उसका दंश अब तक नसों के तहों में सरसराहट पैदा करता है.

हैदराबाद दक्षिण में आकर बस जाना हुआ. शुरूवाती शिक्षा हिंदी में, फिर अंग्रेजी में हुई. उस प्रांत में तेलुगू बोली दूसरी भाषा के रूप में पढने की अनिवार्यता थी, जिसकी मान्यता ने मुझे दक्षिण भारत की उस भाषा से परिचित करवाया.

वह दौर भी खत्म हुआ, कदम आगे बढ़े. जिंदगी का एक और पड़ाव आया या यूँ कहें कि दूसरा जन्म, जो एक औरत के जीवन का अहम् हिस्सा होता है, अपनी स्थापना करने व् अपनी निजी पहचान पाने का.

1961 में शादी के बाद मुंबई में बस जाना पड़ा. एक नारी मात्र नहीं, एक पत्नी, एक माँ, एक बहू, बेटी होने के साथ साथ अनेक और गर्दिशों के दौर से गुजरी. हर आज़माइश के पड़ाव को पार करते हुए आज सूरज के सामने खड़ी हूँ. जिंदगी यही है सबके लिए-यकसी, सूरज की रोशनी की तरह. बस नज़रिया अलग अलग रहता है, सूरज को दरवाजा खोल कर देखें, या फिर खिड़की.

मैंने अपने दिल के दरवाजे खोल कर जिंदगी को आगोश में भर लिया है. जैसी थी और जैसी है, मुझे स्वीकार है. कोई शिकायत नहीं, कोई शिकवा नहीं. बस एक तमन्ना शुक्रगुज़ारी की कायम रहती है-कि यह क़लम मेरा साथ निभाते आई है, इस की धार ही मेरी सोच को शब्दों में कलमबंद कर पाई है. हर नए सफर के नए मोड़ पर, नई आशाएं, नई आकांक्षाएं अपने आपको जाहिर करने के लिए छटपटाती हैं, यही अभिव्यक्ति है का सार है, मेरा रचना संसार.

१९७२ में नागरानी साहब के देहांत के पश्चात, पहाड़ जैसी मुश्किलातें, सामने मुंह उठाये खड़ी रहीं. किसी के होने और न होने का अहसास क्या होता है, यह तब जाना. तीस साल की उम्र में तीन बच्चों के साथ इस जीवन के महासागर के मंझधार में मेरी नैया पार लगाने वाला भी यकीनन वही जग का पालनहार है. यह मेरी अटूट आस्था है जो आज तक मुझे इन पगडंडियों से पार, यहाँ तक ले आई है. कोई तो है जिसके पदचिन्ह मेरी राहों को सुगमता बख्शते हैं, जिनपर चलना मेरे लिए ज्यादा मुश्किल नहीं हुआ. मुश्किलें तो और होती है यह उनसे पूछो जो दिन रात जिंदगी बसर करते हुए यह भी नहीं जानते हैं कि दुख क्या है सुख क्या है, अंधेरा क्या है, रोशनी क्या है?

और आज बेइंतहा लम्बे सफर के बाद यह अहसास मन में विश्वास बनकर बस गया है: “I walk on the footsteps of one who walks before me.” न जाने क्यों ऐसा लगता है जैसे मैं किसी मकसद के लिए उन्हीं रास्तों पर चल रही हूँ, जो कुदरत ने मेरे लिए स्थापित किए हैं। वही मेरे सामने के बंद रास्ते खोलते रहती है, और यह भी सच है जिन रास्तों पर मुझे नहीं चलना है वे दर बंद कर देती है. इस खुलने और बंद होने की तहों में मैं जिंदा हूँ, वह कोई और थी जो मेरे भीतर मर गई- वह डरी हुई सहमी सहमी नारी, वह कमजोर माँ।…


देवी नागरानी
न्यू जरसी, अमेरिका
dnangrani@gmail.com

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