चाँद परियाँ और तितलीः नीलम राकेश


चारू का चमत्कार
दादी की स्नेह डोर से बँधी चारू जब गाँव के करीब पहुँची तो माहौल कुछ बदला-बदला सा लगा। गाँव के पूर्वी छोर पर सतरंगे रंगो का जमघट सा दिखा। जैसे-जैसे वह गाँव के निकट पहुँचती गई रंगों का वह जमघट आकृति ग्रहण करने लगा। रंग-बिरंगे वस्त्रों में सजे लोग पूर्वी छोर पर एकत्र थे। प्रसन्नता से चारू खिल उठी और बोली,
‘‘अरे, चाचा वो देखिये गाँव में तो मेला लगा है। आपने पहले क्यों नहीं बताया? इस बार खूब मजा आयेगा।’’
‘‘सच दीदी बड़ा मचा आएगा। मैंने तो कभी गाँव का मेला देखा भी नहीं है।’’ चारू के छोटे भाई आयुश ने बहन का समर्थन किया।
‘‘अरे बच्चों, यह मेला नहीं है। हमारे गाँव में एक बहुत बड़े महात्मा आये हैं। उन्हीं के दर्शन के लिये सब लोग वहाँ एकत्र हुए हैं। कल तुम लोगों को भी दर्शन करा दूँगा। अभी तो घर चलो तुम्हारी दादी तुम्हारा इंतजार कर रही है।’’
बच्चों को थोड़ी निराशा तो हुई, किन्तु दादी से मिलने के उत्साह में वे जल्दी-जल्दी चलने लगे। दादी के पास पहुँच कर तो उनकी बातों का कोई अन्त ही नहीं था। ढेर सारी बातें और ढेर सारी पेट पूजा। बातों के इसी क्रम में महात्मा जी का जिक्र आया और दादी पूरी श्रद्धा के साथ महात्मा जी का गुणगान करने लगीं।
‘‘बड़े पहुँचे हुए महात्मा हैं। कल तुम लोगों को उनका आशीर्वाद दिला कर लाऊँगी। जानती हो, वे हवा में हाथ हिलाते हैं तो उनके हाथ में भभूत आ जाती है।’’
‘कोई चमत्कार भी करते हैं क्या?’’ चारूप्रिया की जिज्ञासा बढ़ गई थी।
‘‘अरे बड़े दयालू हैं। हम सबके जेवर को दुगना करने वाले हैं।’’
‘‘कैसे?…………’’ आश्चर्य से आयुश की आँखे फैली रह गईं।
‘‘बगल वाली काकी हैं न उनकी सोने की चेन को महात्मा जी ने अपनी एक पेटी में डाला और दूसरे दिन उस पेटी में से दो सोने की जंजीर निकाल कर काकी को दे दीं।’’ दादी ने प्रसन्नता के साथ बताया।
‘‘और किसी को भी कुछ दिया है?’’चारू ने पूछा।
‘‘देने वाले हैं। आज सुबह मैंने व कुछ लोगों ने अपना जेवर उनकी पेटी में डाला हैं बाकी गाँव वाले कल सुबह उनकी पेटी में अपने-अपने सामान डालेंगे। महात्मा जी से एक दिन बाद दुगना करके दे देगें।’’ श्रद्धा से दादी ने हाथ जोड़ दिये।
चारूप्रिया का माथा ठनका। इन श्रद्धालुओं से कुछ भी कहना व्यर्थ था। उसने चाचा से बात करने का निर्णय लिया.
“चाचा, ये सब गाँव में क्या चल रहा है? आप तो पढ़े लिखे है आप तो कुछ करिये.” एकांत मिलते ही चारू चाचा से बोली.
“देख चारू, मुझे पता है तेरा जासूसी का कीड़ा तुझे काटने लगा होगा. शहर में तुमने बहुत से केस सुलझाए हैं. पर बेटा ये गाँव हैं. और बात इनकी श्रद्धा से जुड़ी हुई है. तुम कुछ भी करोगी और इनकी आस्था पर चोट आएगी तो तेरे साथ साथ पूरा परिवार पिटेगा. इसलिए बेटा कुछ मत करना.” चाचा के स्वर में घबराहट साफ थी.
“चाचा आप भी” आश्चर्य से चारु अपने चाचा को देख रही थी.
“मुझे पता था तुम चुप नहीं बैठोगी इसलिए मैं तुम्हें अभी नहीं लाना चाहता था. पर माँ की जिद के आगे मेरी एक नहीं चली.” सिर हिलाते हुए चाचा बोले.
“”……..” वह मौन चाचा को देखती रही. वे कमरे से बाहर चले गए.
वह परेशान हो उठी। अचानक उसे गाँव के मास्टर जी का ध्यान आया। पिछले साल उनसे मिलकर उसे बहुत अच्छा लगा था। वे एक सुलझे हुए ज्ञानी व्यक्ति थे। झटपट चारू अपने भाई के साथ उनसे मिलने चल दी। मास्टर साहब भी गाँव में घट रही घटनाओं से चिन्तित थे।
“सर, मैं चुप नहीं बैठूंगी. मैं पता लगाकर ही रहूंगी कि इन लोगों का इरादा क्या है.” चारू दृढ़ता से बोली.
“उनका इरादा ठगने का है यह तो हम जानते ही हैं बेटा.” सिर हिलाते हुए मास्टर जी बोले.
“फिर हम हाथ पर हाथ रखकर क्यों बैठे हैं?” चारू सीधे मास्टर जी को देख रही थी.
“तुमने वो मुहावरा सुना है, जहर ही जहर को काटता है.”
“जी सुना है.”
“तो बस, हमें यह करना होगा.” मास्टर जी बोले.
“मैं समझी नहीं.”
“आस्था के विरुद्ध बोलेंगे तो कोई हमारी बातें नहीं सुनेगा. इसलिए हमें आस्था को ही हथियार बनाना होगा.” मास्टरजी ने स्पष्ट किया.
“…….” चारू ने सहमति में सिर हिलाया.
विज्ञान की छात्रा का साथ मिलते ही उन्होंने झटपट एक योजना बना डाली और जुट गए उसके क्रियान्वयन में। चारू वापस आकर चाची के साथ बैठी गप्पे हाँक रही थी कि दादी दनदनाती हुई अन्दर आई।
‘‘चारू, यह सब मैं क्या सुन रही हूँ?’’
‘‘क्या दादी?’’ चारू ने अनजान बनते हुए पूछा।
‘‘वही सपने वाली बात’’
‘‘तो आपने भी सुन लिया। हाँ दादी यह सच है।’’ चारू ने गम्भीरता से स्वीकारा।
‘‘पूरे गाँव में चर्चा है और तूने मुझे नहीं बताया?’’ दादी का गुस्सा सातवें आसमान पर था।
‘‘मुझे लगा आपको विश्वास नहीं होगा।’’ चारू ने अपनी सफाई दी।
‘‘क्यों नहीं होगा विश्वास? देवता आकर सपने में कोई बात कहें और कोई विश्वास न करे ऐसा कहीं होता है?’’ दादी का गुस्सा शान्त नहीं हुआ था।
‘‘कैसा सपना?’’ चाची बीच में बोल उठीं।
‘‘चाची, सपने में मुझे देवी माँ ने दर्शन देकर कहा कि तुम्हारी दादी माँ बहुत पवित्र आत्मा हैं। उनके पास जाओ और उनके पिछवाड़े के आम के बाग में एक जगह उन्होंने दिखाई और कहा कि इस जगह फूल और जल चढ़ा कर मेरी पूजा करो मैं दर्शन दूँगी।’’
‘‘सच देवी माँ ने ऐसा कहा?’’ आश्चर्य चाची की आँखों में तैर रहा था।
‘‘हाँ चाची। उसी दिन चाचा हम लोगों को लेने शहर आ गये और हम लोग उनके साथ गाँव आ गये। मुझे लगा मैं ये बात जिससे कहूँगी वो मुझ पर हँसेगा लेकिन लगता है आयुश ने मेरे सपने की बात सबको बता दी है। अभी बताती हूँ उसे। कहाँ है वो?’’
‘‘ठीक तो किया उसने। देख, तेरे चाचा को तेरे पास भेजकर तेरे गाँव आने की व्यवस्था भी कर दी देवी माँ ने।’’
‘‘हाँ सो तो है’’ भोली बनते हुये चारू बोली।
‘‘तू जल्दी से नहा ले और चल बाग में चल कर मुझे वो जगह दिखा। हम अभी से वहाँ पूजा आरम्भ करेंगे।’’ दादी ने हुक्म सुना दिया।
चारु ने झटपट दादी की आज्ञा का पालन किया। कुछ देर बाग में इधर-उधर भटकने के बाद अचानक चारू बोली,
‘‘दादी, दादी, यही-यही पेड़ दिखा था मुझे सपने में। इसी के नीचे पूजा करनी है। लाइये आटा मुझे दीजिये मैं चौक बनाती हूँ।’’
फटाफट चारू ने एक चैकोर सी अलपना बना दी। गाँव के श्रद्धालुओं की भीड़ पूरे मनोयोग से सारी क्रिया देख रही थी सबने थोड़ा-थोड़ा जल व पुष्प चढ़ा कर देवी की अर्चना की। दो लालटेन लाकर वहाँ रख दी गई। पूरी रात लोग भजन गाते रहे। प्रातः पुनः जल चढ़ाकर पुष्प अर्पित किये गये। दिन भर दर्शनार्थियों का मेला लगा रहा। उस स्थान पर अखण्ड भजन का कार्यक्रम अगली रात भी चलता रहा।
सुबह के प्रकाश में भजन गाते हुये भक्तगण चकित रह गये। अचानक जमीन चटकने लगी। जितने स्थान में अलपना बनी थी वह स्थान फूल गया था और धीरे-धीरे चटक रहा था। इस खबर के फैलते ही पूरा गाँव वहाँ उमड़ पड़ा। सबके देखते-देखते एक देवी की मूर्ति उसमें से प्रकट होने लगी। लोग जय-जयकार कर उठे। प्रसन्नता के मारे लोग चारू को ही पूजने लगे। तब चारू गम्भीर स्वर में बोली,
गाँव वासियों, मुझे दिव्य दृष्टि से पता चला है कि महात्मा ढोंगी है और आप सबको ठगने वाला है। आप जल्दी जाइये और उसे रोकिये अपने जेवर, धन और बर्तन वापस लीजिये।’’
देवी माँ का दर्शन कराने वाली चारू पर सबका विश्वास अटल था। अतः कुछ लोग तेजी से पूर्वी छोर की ओर दौड़े। वहाँ पहुँच कर वे चकित रह गये बाबा और उनके चेले मय सामान के वहाँ से गायब हो गये थे। घबरा कर वे वापस चारू के पास लौट आये। लोग बुरी तरह लुट चुके थे, रोना-पीटना मच गया। सब चारू से कुछ करने को कहने लगे। उसी समय मास्टर साहब के साथ पुलिस चौकी के इंचार्ज वहाँ आये उनके पीछे-पीछे चार सिपाहियों के बीच में बँधे हुए हाथ व झुका सिर के साथ ढोंगी महात्मा भी थे।
पुलिस को देखते ही गाँव वाले बताने लगे। ‘‘दरोगा जी हमारी चारू की दिव्य-दृष्टि ने इस ठग को पहचान लिया। हम तो इसे महात्मा समझ कर अपने जीवन भर की कमाई गँवाने जा रहे थे।’’
‘‘बेटी चारु, पुलिस विभाग तुम्हारा आभारी है। एक शातिर ठग को पकड़ने में तुमने हमारी मदद की है।’’ चौकी इंचार्ज ने चारु से कहा।
वातावरण चारु की जय-जयकार से गूँज रहा था। चारु बोली, ‘‘मैंने जो कुछ भी किया आप सब के भले के लिए, मास्टर साहब की प्रेरणा से किया। आप लोगों को इस ठग से बचाने का यही एक तरीका था कि आपके विश्वास को जीता जाए। मैंने कोई सपना नहीं देखा था। न ही मुझे कोई दिव्य-दृष्टि प्राप्त है। मैं भी आपकी तरह साधारण इन्सान हूँ। हाँ विज्ञान की छात्रा हूँ इसलिये विज्ञान का ज्ञान मेरे पास है।’’
‘‘लेकिन, बिना दिव्य-दृष्टि के इस ठग को पहचान लेना कैसे सम्भव हुआ?’’ कई स्वर एक साथ पूछ बैठे।
‘‘जैसे ही मुझे दादी से पता चला कि वह जेवर दुगुना करके देने वाला है। मैं जान गई कि वह कोई महात्मा नहीं है, क्योंकि यह एक असम्भव कार्य है। यदि यह सम्भव होता तो अनेक लोग यही करके करोड़पति बन गये होते।’’
मास्टर साहब बीच में बोल उठे, ‘‘कल सुबह इसने सबका जेवर, धन आदि अपने बक्से में डला लिया था। अतः रात में इसका भागना निश्चित था। मैंने पुलिस की मदद से रात को इसे सामान सहित भागते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया।’’
‘‘अरे ये देवी माँ का धरती से प्रकट होना………….’’ दादी ने पूछा।
‘‘दादी वो विज्ञान का चमत्कार है देखिये आपको दिखाऊँ जहाँ से मूर्ति प्रकट हुई है उस स्थान को मास्टर साहब की मदद से खोदकर हमने उसमें भीगे हुये चने भर दिये उसके ऊपर मूर्ति खड़ी कर दी और उसे मिट्टी की हल्की परत से ढक कर समतल कर दिया। पूजा के नाम पर हम सब उस पर जल चढ़ाते रहे। जमीन की गर्मी और जल पाकर चने अंकुरित होकर फूल गये जिससे मूर्ति ऊपर उठी और पोली मिट्टी से बाहर झाँकने लगी।’’
आश्चर्य से गाँव वालों का मुँह खुला रह गया। विज्ञान ऐसे-ऐसे चमत्कार भी करता है उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था। ग्राम प्रधान जो बड़ी देर से विचार मग्न थे उठ कर बोले, ‘‘गाँव का प्रधान होने के नाते मैंने यह फैसला किया है कि मास्टर साहब आप पंचायत घर में रोज शाम को हम सब गाँव वालों को पढ़ायेंगे। आज हमारे अनपढ़ होने के कारण ही यह ठग हमें इतनी आसानी से मूर्ख बना रहा था और चारु बिटिया ने अपनी पढ़ाई के ज्ञान की मदद से ही हमें ठगे जाने से बचा लिया हैं आज पढ़ाई का महत्व मुझे समझ में आ गया।’’
सभी गाँव वालों ने प्रधान जी का एक स्वर से समर्थन किया।
चारू और मास्टर साहब एक दूसरे की ओर देखकर मुस्कुरा दिये। यह उनके अभियान की सबसे बड़ी सफलता थी।

***

पर्यावरण बचाना है

देखो देखो मम्मी
भैया व्यर्थ पानी बहाते हैं।
बुरी बात है यह
शिक्षक ऐसा मुझे बताते हैं।।

शिक्षक बोले मेरे
तुझे जल रक्षा सैनिक बनना है।
पर्यावरण रक्षा में
हिस्सेदारी सुनिश्चित सबकी है।

अरे कार धोने में
पापा व्यर्थ पानी बहाते हैं।
समझाओ सबको
पर्यावरण हमें ही बचाना है।।

पर्यावरण रक्षा का
आरंभ आज मिलकर करते हैं।
करना है जो काम
श्री गणेश आज ही करते हैं।।

नीलम राकेश
610/60, केशव नगर कालोनी,
सीतापुर रोड, लखनऊ-226020
उत्तर-प्रदेश
दूरभाष नम्बर: 8400477299
neelamrakeshchandra@gmail

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