
किसे भूल जाऊँ, किसे प्यार कर लूँ?
मंदिर मधु-किरण है,
मदिर स्वर्ण-घन है,
मंदिर कम न गृह-दीप
की पर शरण है,
किसे स्वप्न के इंद्र-धनु-सा मिटा दूँ
समझ सत्य लौ चूम किसके अधर लूँ?
अमर साधना-धन,
अमर प्यास के क्षण,
अमर पर न क्या
तृप्ति का एक ही कण?
किसे अर्चना की सुरभि-सा उड़ा दूँ
किसे सिद्धि-चंदन समझ भाल पर लूँ?
मधुर अश्रु-बंधन,
मधुर मौन क्रंदन,
मधुर पर न क्या
मंद मुस्कान-दंशन?
नयन-धार में प्यास किसकी बहा दूँ
तृषित बाहु में बाँध किसकी लहर लूँ?
अमिट है क्षितिज पर
रजत रात का स्वर,
अमिट प्रात का भी
कनक गान सुंदर,
किसे शापमय रागिनी-सा भुला दूँ,
किसे मान वरदान स्वर प्राण भर लूँ?
किसे भूल जाऊँ, किसे प्यार कर लूँ?

मैं तुम्हारे साथ हूँ
हर मोड़ पर संग-संग मुड़ा हूँ।
तुम जहाँ भी हो वहीं मैं,
जंगलों में या पहाड़ों में,
मंदिरों में, खंडहरों में,
सिन्धु लहरों की पछाड़ों में,
मैं तुम्हारे पाँव से
परछाइयाँ बनकर जुड़ा हूँ।
शाल-वन की छाँव में
चलता हुआ टहनी झुकाता हूँ,
स्वर मिला स्वर में तुम्हारे
पास मृगछौने बुलाता हूँ,
पंख पर बैठा तितलियों के
तुम्हारे संग उड़ा हूँ।
रेत में सूखी नदी की
मैं अजन्ताएँ बनाता हूँ,
द्वार पर बैठा गुफ़ा के
मैं तथागत गीत गाता हूँ,
बोढ के वे क्षण, मुझे लगता
कि मैं ख़ुद से बड़ा हूँ।
इन झरोखों से लुटाता
उम्र का अनमोल सरमाया,
मैं दिनों की सीढ़ियाँ
चढ़ता हुआ ऊपर चला आया,
हाथ पकड़े वक़्त की
मीनार पर संग-संग खड़ा हूँ।

विषम भूमि नीचे, निठुर व्योम ऊपर !
यहाँ राह अपनी बनाने चले हम,
यहाँ प्यास अपनी बुझाने चले हम,
जहाँ हाथ और पाँव की ज़िन्दगी हो
नई एक दुनिया बसाने चले हम;
विषम भूमि को सम बनाना हमें है
निठुर व्योम को भी झुकाना हमें है;
न अपने लिए, विश्वभर के लिए ही
धरा व्योम को हम रखेंगे उलटकर !
विषम भूमि नीचे, निठुर व्योम ऊपर !
अगम सिन्धु नीचे, प्रलय मेघ ऊपर !
लहर गिरि-शिखर सी उठी आ रही है,
हमें घेर झंझा चली आ रही है,
गरजकर, तड़पकर, बरसकर घटा भी
तरी को हमारे डरा जा रही है
नहीं हम डरेंगे, नहीं हम रुकेंगे,
न मानव कभी भी प्रलय से झुकेंगे
न लंगर गिरेगा, न नौका रुकेगी
रहे तो रहे सिन्धु बन आज अनुचर !
अगम सिन्धु नीचे, प्रलय मेघ ऊपर !
कठिन पंथ नीचे, दुसह अग्नि ऊपर !
बना रक्त से कण्टकों पर निशानी
रहे पंथ पर लिख चरण ये कहानी
बरसती चली जा रही व्योम ज्वाला
तपाते चले जा रहे हम जवानी;
नहीं पर मरेंगे, नहीं पर मिटेंगे
न जब तक यहाँ विश्व नूतन रचेंगे
यही भूख तन में, यही प्यास मन में
करें विश्व सुन्दर, बने विश्व सुन्दर !
कठिन पंथ नीचे, दुसह अग्नि ऊपर !

ढलानों पर कभी घूमा
शिखर पर मैं कभी ठहरा।
खुले रथ पर हवाओं के
यहाँ चढ़कर वहाँ उतरा।
कभी इन आँधियों में था,
कभी उन बिजलियों में था,
समंदर पर कभी था तो
कभी इन घाटियों में था,
बजाकर कान में सीटी
चिहुँक जाती दिशाओं के
हँसी से मैं हुआ जाता
कभी दुहरा, कभी तिहरा।
फरों के चीड़ के वन से
लिपटकर मैं कभी सोया,
नदी, निर्झर, पहाड़ों से
गले मिलकर कभी रोया,
कभी लेकर पताकाएँ
विजय की मैं रहा उड़ता,
कभी हरियालियों के द्वार
पर देता रहा पहरा।
लुटाता था खुले हाथों
कभी मोती, कभी हीरे,
किसे मैंने नहीं बाँधा
कभी कसकर, कभी धीरे,
बिना बोले, बिना पूछे
मिला सबसे नया बनकर
कभी कोई नई सूरत
कभी कोई नया चेहरा।
घुमाता चर्ख़ियों पर मैं
परिंदों को थके-हारे,
जिलाता उन सभी को जो
मरे थे प्यास के मारे
बनाता ईंगुरी सुबहें
बनाता सुरमई शामें
रहा रँगता दिनों को मैं
कभी हल्का, कभी गहरा।
शंभुनाथ सिंह