
आदमी मक्कार आखिर क्यों
उसकी ही दरकार आखिर क्यों
मैं जो कहता क्यों नहीं छपता
छापता अखबार आखिर क्यों
चोरियां कम क्यों नहीं होती
चोर पहरेदार आखिर क्यों
मज़हबों के बीच फिर फिर से
उठ रही दीवार आखिर क्यों
मैं ,मेरी बीवी मेरे बच्चे
दोस्त रिश्तेदार आखिर क्यों
द्रोण अर्जुन भीम के होते
द्रोपदी लाचार आखिर क्यों
प्रेम में इस नेक रिश्ते के
बीच मे बाज़ार आखिर क्यों

यादें पागल कर जाती है
दिल को घायल कर जाती है
आती तो बस ऐसे आती
झंकृत पायल कर जाती है
कभी इधर की कभी उधर की
मुश्किल हरपल कर जाती है
शांत पड़ी आंखों की झीलें
उनमें हलचल कर जाती है
मन समुद्र की लहरे सोई
उनको चंचल कर जाती है
नीर रुका पलकों के बांधे
उनको छलछल कर जाती है
इक नाले सी बहती नदिया
कैसे कलकल कर जाती है

आँख जागी तो रोए औ फिर सो गए,,,
उनकी आँखों के सपने,कहाँ खो गए,,,,,
पर को तोलें ज़रा फिर उड़ानें भरें
कल जो पंछी उड़े थे,कहाँ खो गए,,,,,
बादलों ने तो जम करके बरसात की,,,,
फ़स्ल ऐसी उगी,जैसी वो बो गए
वक्त रहते मना लें,जो नाराज हैं
वे चले जाएँगे और लो वो गए,,,
वक्त की आँधियाँ,सब उड़ा ले गईं,,,,,
वे बचे रह गए जो नरम हो गए,,,
दुश्मनी भी करें तो सलीका रखें
वे पिघलते गए जो गरम हो गए

रिश्तों,, की ,,, गहराई देख
किसने ,,आँख ,,चुराई देख
अन्दर बाहिर ,,सुलग रही है
किसने ,,आग ,,,लगाई देख
तेज, समंदर,, ,की लहरों में
किसने ,,नाँव ,,,फंसाई देख
खुद पे हंसने की हिम्मत हो
तो फिर,, ,लोकहँसाई, देख
आसमान, क्योंकर, बरसेगा
पेड़ों ,, की ,,,,,,,परछाई देख
जान बची उसकी तो लेकिन
किसने,,”जान”, गवाँई देख
छोड़ गये वो आखिर तुझको
कितनी ,, कसमें खाई,, देख
उनके क्या,,,अपने भी,मरते
तू ,,,तो ,,,बन, सौदाई देख

कुछ दिन थोड़ा ठहर अभी,,,
गाँव हुआ है,,,शहर अभी,,,,
चिमनी से भी,,,,धुआँ उठेगा,,,
और घुलेगा,,,,ज़हर अभी,,,,
चिन्दी चिन्दी,,,रिश्तों वाली,,,,
और चलेगी,,,,लहर अभी,,,,
चौपालों पर,,,,दंगे होंगे,,,,
फिर बरपेगा,,,,क़हर अभी,,,
बारिश को,,,मौसम तरसेगा,,,,
काग़ज़ पे है,,,,नहर अभी,,,,
एक कटा है कितना मुश्किल,,
होगा दूजा,,,,,पहर अभी,,,
रजिया की,,,,,शादी टूटेगी,,,
कमतर होगी,,,,,महर अभी,,
कुछ दिन थोड़ा ठहर अभी,,,
गाँव हुआ है,,,शहर अभी,,,,
चिमनी से भी,,,,धुआँ उठेगा,,,
और घुलेगा,,,,ज़हर अभी,,,,
चिन्दी चिन्दी,,,रिश्तों वाली,,,,
और चलेगी,,,,लहर अभी,,,,
चौपालों पर,,,,दंगे होंगे,,,,
फिर बरपेगा,,,,क़हर अभी,,,
बारिश को,,,मौसम तरसेगा,,,,
काग़ज़ पे है,,,,नहर अभी,,,,
एक कटा है कितना मुश्किल,,
होगा दूजा,,,,,पहर अभी,,,
रजिया की,,,,,शादी टूटेगी,,,
कमतर होगी,,,,,महर अभी,,

लो सहर हो गई,शब ढली भी नहीं,,,
शम्मा क्या रात भर तक जली भी नहीं,,,,
उनका वादा रहा,उनके वादों का क्या,,,
इन विवादों की कोई गली भी नहीं,,,
पेड़ की शाख़ पे वे ठिठुरते रहे,,
धूप पीपल के काँधे,पली भी नहीं,,,
एक आँधी चली,उनका घर उड़ गया,,,
इनकी कोई इमारत,हिली भी नहीं,,,
बीच बाज़ार वो शख़्स मारा गया,,,
इनकी कोई जुबाँ तक हिली भी नहीं,,,
इनके जश्नों में दावत पे दावत उड़ी,,,
इनके आँगन अँगीठी जली भी नहीं,,,
डॉ प्रेम तन्मय

एम .एससी.प्राणी शास्त्र,,एम.डी.ऐ.एम,
जन्म :एक मई उन्नीसौ पचपन (1-5-1955)
विधा: स्वतन्त्र लेखन ,,कहानी, कविता, ग़ज़ल, गीत समीक्षा, कार्यशाला आयोजन
सदस्य: संसदीय हिंदी सलाहकार समिति , कोल मंत्रालय भारत सरकार नई दिल्ली
प्रकाशन:
उपन्यास- 1.रिश्तों की धूप
२.एक लड़के की पर्सनल डायरी
3 बाई पास
काव्य संग्रह;
1.मुस्कान करती है सम्बन्ध हरे
2.पेड़ भी एक सवाल
अन्य : 1 .रंग चिकित्सा
2. ध्वनि चिकित्सा
3. एक्यूप्रेशर चिकित्सा
प्रकाश्य: ( काव्य संग्रह )कुछ गज़लें कुछ गीत
(कथा संग्रह) बंधे सैलाब
(उपन्यास)खिड़की से झांकते रिश्ते
व्याख्यान :
साहित्य ,लेखन कला ,बोलने की कला संस्कृति,भारतीय चिकित्सा ,भारतीय पारम्परिक चिकित्सा ज्ञान आदि विषय
पुरुस्कार:
1.प्रेम शंकर श्रीवास्तव साहित्य सम्मान
2.साहित्य संसद ,,चुरू
3.अभ्युदय इंटरनेशनल ,,साहित्य सम्मान
व्यवसाय: मुख्य चिकित्सक
स्टेप्स टू हेल्थ
बेंगलुरु
सम्पर्क: # 301 B गोल्डन पॉम, सी वी रमन नगर
बैंगलुरु
डायल : 94141 35697