पिछला साल बेहद तकलीफदेह रहा, अगला बेहद सावधानी माँग रहा है। ब्रिटेन का मेहमान घर आ पहुँचा है।”
सुलेखा ने प्रारंभ में ही सब को आगाह करने की कोशिश की। पड़ोसियों, नाते-रिश्तेदारों, मित्रों, अपने सहयोगियों को। फोन से। व्हाट्स एप समूहों पर। सब से बारंबार कहा।
टी.वी. खोलते ही मौतों की बारिश की खबरें। डेल्टा वैरिंयट का बदलता स्वरूप और असहायता से सभी आँखें भीग जातीं। कभी नहीं रोनेवालीं उसकी आँखें भी रो पड़तीं।
“उजाले में ही नहीं, अँधेरे में भी साथ देनेवाले कुछ कर नहीं पा रहे हैं।”
“अब नहीं देख पाऊंगी टी.वी.। डाक्टरों को इतना बेबस कभी नहीं देखा।”
“पटरी, बिखरी खून सनी रोटियाँ और कटे हाथ-पाँव ही अभी दिमाग से उतरे नहीं थे कि… ”
डेढ़-दो वर्ष से जैसे सारा का सारा नीला आसमान काला पड़ गया है। कोरोना की मार से पूरा संसार त्रस्त, भयाक्रांत! पीलेपन का शिकार मन, दिमाग तन।
कोविड 19 के प्रारंभ से ही चीन, अमेरिका, इंग्लैण्ड, आस्ट्रेलिया, इटली जैसे साधन-संपन्न, अति आधुनिक चिकित्सा से लैश देशों की हालत और भी पतली। लगातार विदेशों से लोग धारदार रोते हुए तड़पती आवाज में अबूझ बीमारी के बारे में बताने की कोशिश कर रहे थे।
सुप्रिया मोबाइल में इटली, ऑस्ट्रेलिया के गुहार लगाते लोगों को देखकर पहले तो कुछ समझ नहीं पाई थी। बस, अत्यधिक विकल हो समझने की कोशिश करती थी,
“हुआ क्या है। ये लोग इस तरह बिलखते हुए, सर धुनते हुए वीडियो क्यों अपलोड कर रहे है?”
“क्या समझाना चाह रहे हैं?”
बाद में सभी के साथ वह भी कोरोना की भयावता समझने लगी थी। सभी को समझ में आ गया था, कोई उपाय नहीं है। कोरोना सभी को चेता रहा है। सभी को बराबर किए दे रहा है। पूरे संसार को उनकी औकात दिखला रहा है।
दुनियाभर में अवसादग्रस्त लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही है। लोग आत्महत्या के लिए भी प्रेरित हो रहे हैं।
महामारी की शुरूआत हो चुकी थी और सड़कों पर सैलाब उमड़ आया था।
गली-कूचों, रास्तों पर जिंदगी के घबराए-छटपटाए पल! त्रासद महामारी!! प्लेग, हैजा, चेचक से भी ज्यादा त्रासद!
शहरों, महानगरों को अनथक श्रम से संवारनेवाले लोग अपनी जिंदगी को सँभाल नहीं पाए, उल्टे पैरों अपने घरों की ओर लौट रहे हैं। साधनहीन भुखमरी के शिकार लोगों का यह सैलाब बच गए लोगों को हिलाए हुए है। मजबूत से मजबूत आदमी टूट रहा है।
रेल अपना धर्म निभा चुकी, पटरियाँ अपना। मजदूरों के रक्त में डूबीं पटरियाँ और बिखरी रोटियाँ!…सूटकेश पर घिसटता बच्चा…ट्रकों पर चढ़ने को उतावले लोगों के बीच एक हाथ में ऊपर टँगा बच्चा…पिता को लेकर साइकिल से मीलों सफर करती लड़की, सब दृश्य कारुणिक।
बेहद विवश बेहद समर्थ मानव।
सुलेखा को सब याद है। जेहन में एकदम ताजा।
“बिखरी रोटियाँ और कटे मजदूर नहीं जानते थे, रेल की पटरियों पर गहरी नींद में बिछ जाने का अँजाम। रोटियों के लाले पड़ गए थे सब तरफ। बचाकर खर्चने की जुगत में पोटलियाँ सिरहाने रख सो गए पटरियों को तकिया बना…सो गए सबके सब एक साथ।”
वह अक्सर बुदबुदाहट से भर जाती।
“किश्तों में मौत नहीं थमाई धड़धड़ाती रेल ने, एक साथ उन गाफिलों को ले गई थी। निद्रामग्न लोग चूँ भी नहीं कर सके थे और रेल की पटरियों पर खून के छींटें…कटे हाथ, कटे सर, कटे पाँव, विच्छिन्न पेट-पीठ बन बिखर गए थे। खून में डूबीं रोटियाँ सिसक उठी थीं।”
किश्तों में तो मौत कोरोना तथा महानगरों, राजधानियों से भगा देनेवाली असंवेदनशीलता ने थमाई थीं। बिखरी कड़क सूखीं रोटियाँ गवाह हैं कि कितने भूखे, विवश थे महानगरों को अपने खुरदरे हाथों, बिवाई फटे पाँवों से सँवारनेवाले लोग।
तेलविहीन रूखे केशोंवाले की खुरदुरी हथेलियों में बूँद भर तेल नहीं। रखा-रखाया सब महामारी की भेंट।
“समझदार समझ चुके हैं, नासमझ थूक रहे हैं…डाक्टरों पर, नर्सों पर, कोरोना वारियर्स पर, नोटों पर। आग की लपटें उनके आवास पर भी पहुँचेंगी, इल्म नही।”
“लोगों की कोई सुन कहाँ रहा था। ठोकर लगने लगी तो होश ठिकाने हुए।” – पीपीई कीट के भारी-भरकम सुरक्षा तले भयंकर गर्मी में सड़कों पर छाए पुलिसकर्मी कहते।
ऐसे लोगों की भी कमी नही, जो नाखून कटाकर शहीदों में नाम लिखा रहे हैं। कोरोना वारियर्स कह रहे हैं, कहा रहे हैं। सुलेखा ऐसे लोगों को देख कहती,
“हमारा देश महान!”
सुलेखा ने अपनी क्षमतानुसार अखबारवाले, गार्ड तथा अन्य की कई तरह से मदद करनी शुरू कर दी।
“कभी सोचती हूँ, खूब पैसे होते, खूब सहायता करती। पतिदेव का आटा कितना गीला किया जाए। काश, खुद कमाती होती।”
वह अपनी जरूरतें कम करती गई थी।
बाहर निकलना एकदम बंद, वह मदद के साथ मनोबल बढ़ाने के काम में व्यस्त। मदद के लिए न्यूज बनना और बनाना जरूरी नहीं। लाकडाउन ने महामारी में बहुत सारे लोगों के अंदर निराशा-हताशा, डिप्रेशन भर दिया है। उन्हें फोन के माध्यम से बूस्ट अप करने की कोशिश उसकी।
कोरोना काल में बहुत सारे लोग अचानक मिले अवकाश का उपयोग करने लगे। घर में ऐसी व्यस्तताएँ ही मन, तन को थोड़ा स्वस्थ रख पा रही हैं।
अम्मा के सूत्र वाक्य जीवनभर कितने काम आए –
“बैठा न रह, कुछ किया कर
पैजामा उघार-उघारकर सिया कर”
“नर हो ना निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो।”
“खुशी चंदन या मेंहदी होवऽ है। पहले खुदे के हाथ के रंगऽ है।”
“बेरोजगारी, पलायन, भूखमरी। यह सब और भी बढ़नेवाला है। इसका असर तुरंत खत्म नहीं होगा। अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी। बहुत लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी।”
अमर कहते रहते।
“हाँ जी! रास्तों पर उतर आए कामगारों का सैलाब अपने बहाव की तेजी में बहुत कुछ बहा ले जानेवाला है।”
*****
दूसरी लहर ने कहर बरपा दिया। इस लहर ने मौका ही कहाँ दिया और कुछ भी समझने से पूर्व उसकी अजगरी जकड़ में सब आते गए।
सुलेखा के आमंत्रण पर मित्र नीता ने राँची आने के लिए फ्लाइट बुक करा ली थी। उसे झारखंड के तीन सौ साल पुराने मलूटी के 150 में से बचे 72 मंदिरों को देखने के लिए आना था। वह इस विश्व धरोहर को देखने के लिए सबसे अधिक लालायित थी। उसे उन 52 शिव मंदिरों में विराजमान महादेव की भव्यता देखनी थी।
उसने घर में कह भी दिया था,
“आखिर बंगाल सीमा पर बसे इस देव स्थान पर ऐसा क्या है कि इसे संसार के 12 सर्वाधिक लुप्तप्राय धरोहरों में शामिल किया गया। मैं उस भेद को जानने-समझने के लिए ही जाना चाहती हूँ।”
“जाऊँगी जरूर। दो दिन राँची में सुलेखा के पास रहूँगी।”
सुनील के न कहने के बावजूद नीता ने दृढ़ निर्णय सुना दिया था।
आधी पैकिंग भी हो गई थी कि कोविड का दूसरा फेज शुरू।
वह अपने खूबसूरत फ्लैट के पीछे बहती नदी के तट पर कभी-कभार जलती लाशों को देखकर ही घबरा जाती थी। अब तो एकाएक लाशों की चिताओं की गिनती भी मुश्किल। एक साथ अनगिन चिताएँ सजतीं। चिरायंध से पूरा इलाका विषाक्त। चिड़-चिड़ की आवाज के साथ उठती लपटों और धुएँ के बीच उड़ती चिंगारियांँ… वह बेसुध होने लगी। नीता हिस्टीरिया की शिकार।
“कोई मेरे पास न आना। मुझे भी कोविड हो गया है।”
कभी कहती, “मेरे कमरे से भागो सब लोग। हम सब मर जाएँगे… सबके सब।”
“भागो। मुझे छूना नहीं। मेरे निकट नहीं…”
नीता को कुछ नहीं हुआ था तब तक फिर भी वह झींकती रहती। उसके सर पर हर क्षण पीपीई कीट में लिपटे शव, जलती चिताएँ, चटखती चिंगारियांँ, धूम्र गंध और बदरंग होता नदी का जल हावी रहता।
एम्बुलेंस की लंबी कतारें और उसकी सीटियाँ भी। उस पर खौफ तारी…बढ़ता ही जाए।
फिर यह भी नजर आया कि साइकिल, रिक्शा, हाथ गाड़ी पर लाकर परिजन नदी में पुल के ऊपर से ही लाशें फेंक जाते।
बेटा बेटा नहीं, माँ माँ नहीं, पिता पिता नहीं, बेटी घर की लक्ष्मी नहीं…सब मात्र माटी में बदल गए थे…
नीता को कमरा बदलने के लिए घरवाले बोलते रहे, वह नहीं मानी। हर बार खिड़की से जा लगती, लाख रोका जाता। उसकी चीखें बढ़ने लगी। जितना ही देखती, चीखें जातीं।
सुलेखा ने एक दिन फोन लगाया तो जान पाई, अब नीता कभी राँची नहीं आ पाएगी। डेल्टा वैरिंयट के सुरसा मुँह ने उसे निगल लिया है। उसका मुँह खुला रह गया,
“ओह! नीता को भी आक्सीजन उपलब्ध नहीं हो सका।”
नीता के पति की आवाज दूर से आती प्रतीत हो रही थी,
“आक्सीजन से भरी दुनिया में उसकी साँसें आक्सीजन के लिए तरसती-तड़फड़ाती शांत हो गईं और वह बेटे-बहू से मिलने की आस लिये गंगा तट पहुँच गई।”
सुबकी तेज हुई सुलेखा की।
“पीपीई कीट के आसमानी रंग में लिपटी वह आसमानी हो गई, पीपीई कीट में लिपटे अनजान लोगों के समक्ष। कोई रिश्तेदार गंगा जल-तुलसी दल मुँह में डाल नहीं पाया। न ही किसी ने उसे स्नान कराकर दुल्हन की तरह सजाया। न आलता, न बिंदी, न भर माथ सिंदूर! न सुहागिनों की तरह विदाई।”
“सब तो एक ही तरह से विदा हो रहे हैं।”
आवाज का दर्द और नमी उस तक पहुँच रही थी। वह फिर भी सांत्वना के दो बोल न बोल सकी। दिमाग सन्नाटे में।
सूरज क्षितिज पर लाल-पीला होता हुआ पुनः आत्महत्या के लिए छलांग लगा चुका है। देर से चुपचाप बैठी सुलेखा स्तब्ध है,
‘नीता बस एक कड़वी याद बनकर रह जाएगी, किसी ने नहीं सोचा था।’
सुलेखा मित्र की इस गुमनामी भरी मौत पर बेहाल हो गई। आँखों की नमी में न जाने कितनी अनदेखी मौतों की परछाइयाँ उभर आईं।
“उसके सामने विवश हैं हम”
इस बात को सुलेखा ने समझाने की पुरजोर कोशिश की थी,
“प्रकृति हमें सबक सिखा रही है। अब भी नहीं चेते तो संसार का नष्ट होना तय है।”
अमर की बहन चंदना और उसके पति, बेटी, दामाद सब डॉक्टर हैं। एक दिन एफ.बी. पर डा.चंदना आँखें झुकाए कविता पढ़ती नजर आई,
किसे बचाएँ
मरीजों को,
उनके परिजनों को
अपने लोगों को
या…या
खुद को?
लाइक की झड़ी लग गई। सुलेखा को अजूबा लगा। वीडियो में आँखें चुराने की झलक। तुरंत मोबाइल उठाया। डॉक्टर ननद को तंग करना उचित नहीं लगा। अतः मैसेज,
“घर में सब लोग स्वस्थ हैं?…बेटी दामाद, डाक्टर साहब?”
“हाँ, हम सब ठीक हैं।”
“तो…? तुम्हारी कविता बहुत अच्छी है। पाठ भी।”
डा.चंदना तड़प उठी, “भाभी! वह कविता नहीं है।”
डाक्टरों को इतना बेबस सुलेखा ने कभी नहीं देखा था। उसी दौर में नई-नवेली बहू ने चंदना को पोता दिया था। नवजात पोते की भी चिंता होगी।
सुलेखा समझ गई, अस्पताल से लौटकर दोनों भर आँख पोते को देख भी न पाते होंगे।
सब तरफ डाॅक्टरों की बेबसी की चर्चा। वे भी मौत के मुँह में जा रहे थे।
अपने शहर के घाघरा मुहल्ले के पास स्वर्णरेखा नदी के किनारे ध्वस्त विद्युत शवदाह गृह को सुलेखा देखती रही थी। दो-एक लाल-पीली अग्नियुक्त चिताएँ, बिखरे कपड़े, चुक्के भी। अभी हड़बड़ाहट में विद्युत शवदाह गृह की मरम्मत शुरू हुई थी।
लेकिन कोविड वक्त कहाँ दे रहा है। लकड़ियाँ कम पड़ रही हैं। जंगल के लिए प्रसिद्ध इस
झारखंड राज्य में भी। लाशें एक-दूसरे पर फेंकी जा रही हैं। एक पर एक रखकर सामूहिक चिता जल रही है। सभी जगह। पूरे संसार में असहायता पसर चुकी है। हर तरफ दहाड़ें, बेचैनी का आलम है।
हाथ से फिसलती लकीरें, पानी की लकीरों पे सर पीटते लोग।
कभी लोग थोड़ा आश्वस्त होते, फिर तुरंत बुरी खबरें। विचलन बढ़ जाती।
“बलिष्ठ,स्वस्थ युवा जा रहे हैं। अपने आगत बच्चों को छोड़कर…अपनी युवा माता की गोद सूनी कर।”
फोन घनघनाते। बहुत डराते सभी को। सब सुनते रहे असहाय। यह देख-सुन पूरी कायनात स्तब्ध! लगा, अब सब खत्म होकर रहेगा। दुनिया पूर्णतः नष्ट होकर रहेगी। भय का कद बढ़ता जा रहा था।
कभी अवसाद से घिर चुकी थी सुलेखा। तीन साल पूर्व बड़ी कठिनाई से निकल पाई थी। वह हर हाल में अपने मन को शांत रखने की कोशिश में है।
‘हे भगवान! कोई और अटैक नहीं। एकदम नहीं।’
उसे लोगों से मिलना पसंद है, एकांत में रहना भी पसंद है। लेकिन ऐसा एकांत नहीं। सन्नाटे में डूबा एकांत एकदम नहीं।
एक संतोष है, छोटी बेटी सुप्रिया साथ है। छोटी बेटी आँखों के सामने है, दोनों उसकी चिंता से मुक्त हैं। बड़ी बेटी के इसी शहर में रहने के बावजूद कोई भेंट-मुलाकात महीनों से नहीं हुई। बस, मोबाइल से एक-दूसरे का हाल जानने और छिपाने की कोशिश होती। भरपूर हिदायतें दोनों तरफ से।
“हाँ!…हाँ! हम एकदम ठीक हैं। चिंता न करो।”
खूब झूठ भी परोसा जाता।
*****
फिर एक दिन –
अमर ने सुलेखा को आवाज दी। वे टी.वी. देख रहे थे। सुलेखा पास आकर सोफे के कोने को पकड़कर खड़ी हो गई।
“मैं नहीं देखूँगी। दहशत होती है।”
“देखो तो सही। कितने दिनों से तुमने टी. वी. नहीं देखा।”
“मैं झेल नहीं पाती। दूर से ही जो सुन पड़ता है, काफी कष्टदायक है।”
“बैठो सुलेखा।”
अमर ने हाथ पकड़ पास बिठा लिया। उसकी हथेली को थामे रखा थोड़ी देर। सुलेखा की हथेलियों में थरथराहट थी।
“फिर हमारा राज्य ही साँस बन रहा है। देखो।”
बारंबार दिखाया जा रहा है, बोकारो, टाटा स्टील कंपनी से आक्सीजन टैंकर अन्य राज्यों में लगातार भेजे जा रहे हैं। आक्सीजन से भरे कंटेनर सीधे राँची एयरपोर्ट पर खड़े हवाई जहाजों में समा रहे हैं। झट हवाई जहाज अन्य जरूरतमंद राज्य की ओर उड़ रहे हैं।
मुंबई जैसे सबसे अधिक विकसित राज्य में मौत का तांडव सबसे ज्यादा था। वहाँ झारखंड का आॅक्सीजन पहुँचाया जा रहा।
“हाँ! अब आक्सीजन के लिए छटपटाहट कम होगी।”
टी.वी. देखना आज उसे बुरा नहीं लग रहा है। हथेलियों की थरथराहट गर्माहट में बदल रही है।
अब खबरों में उपाय भी नजर आने लगे हैं। स्तब्धता थोड़ी कम हो रही है।
सुलेखा को सबसे अधिक उस दिन अच्छा लगा था, जब उसने लोगों में उम्मीद जगाई थी। लगातार भरती रही थी। वह कहती थी,
“किसी के वश में और है भी क्या…सब बंद हैं घरों के अंदर।”
और सुलेखा ने मोबाइल से ही सबके मन को, दिमाग को सुकून देने की कोशिशें जारी रखी थीं।
“आपदाएँ दिलों को जोड़ने का भी काम करती हैं। लोग सबको सँवारनेवाले हाथों की कीमत पहचानने लगे हैं।”
अमर कह उठे अचानक।
“यह बड़ी बात थी पापा।…है भी।”
सुप्रिया अभी-अभी लैपटॉप रखकर पास आ बैठी थी। तीनों के बीच इस अयाचित समय पर देर तक बात होती रही। थोड़ी देर बाद टी. वी. बंदकर वे तीनों डायनिंग हाॅल में आ गए। खिड़कियों के पार हरियाली को देखते रहे।
सामने खेतों में लोग-बाग पूर्ववत काम करते रहते। हल चलता, क्यारियों की इंद्रधनुषी छटा उकेरी जाती, निराई-गुड़ाई चलता ही रहता। कभी-कभार पुलिस आती। दो-चार दिन सन्नाटा। फिर घने पेड़ के नीचे कभी बस्तीवालों की पिकनिक, कभी बच्चों-किशोरों का टायरों के झूले लगाकर झूलना चालू। खेतों में हरी सब्जियों की भी भरपूर सुगबुगाहट।
“इन्हें कुछ नहीं हुआ?”
आश्चर्य में सुप्रिया।
“ये सब है तो हम हैं। इन्हीं की बदौलत ऐसे समय में सब घर बैठे खाना खा पा रहे हैं। ये भी कोरोना वारियर्स ही हैं।”
अमर कह उठे।
“हाँ पापा! पुलिस, डाॅक्टर्स, नर्स, वार्ड ब्वाॉय, एंबुलेंस ड्राइवर सब अपनी जान की परवाह किए बिना निरंतर लगे रहते हैं। इन्हीं वारियर्स के कारण…”
“अरे! लोग ऐसे में भी मदद को निकल ही रहे हैं, जान की परवाह किए बिन।”
सुप्रिया ने सैनेटाइजर लगाया। शीशी अमर की ओर बढ़ाया। फिर सुलेखा की ओर। आगे कहा,
“कुछ लोग खाना खिला रहे हैं, कुछ अपना खून दे रहे हैं। भाईचारा, मानवता की मिसाल भी बन रहा है यह समय!”
अमर ने भर नजर देखा उसे। और कहा,
“तो चलो सुलेखा। हम भी यहीं से मदद…।”
” …तो चलिए पापा। हम भी।”
दूसरे दिन एक टेम्पो अपार्टमेंट के नीचे आया। प्रायः आने लगा। दाल-चावल, मास्क, सैनेटाइजर से भरा टेम्पो वापस लौटता।
ड्राइविंग सीट के बगल में बैठे व्यक्ति ने पहले दिन ही कह दिया था,
“पैसा, रसद, जिसको जो बन पड़े, दें। कोई बंधन नहीं।”
सुलेखा ने एक दिन भी फ्लैट से अमर और सुप्रिया को उतरने नहीं दिया।
“मैं नहीं रहूँगी तो ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। सुप्रिया के लिए आपका रहना जरूरी है। और अभी तो सुप्रिया की पूरी जिन्दगी पड़ी है।”
वह फोन से मैनेज कर टेम्पो के आते ही मास्क लगाए झट लिफ्ट से उतरती, अपना काम करती और वापस अपने फ्लैट की कैद में जा दुबकती।
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अनिता रश्मि
ईमेल : rashmianita25@gmail.com