कहानी समकालीनः पियानो टीचर -शैल अग्रवाल


‘क्रिस नहीं रहा।’ सुबह-सुबह जब खबर मिली तो विश्वास ही नहीं हुआ ।
‘ पर यह कैसे संभव है, कल शाम तक तो बिल्कुल ठीक था, वह ! कोई हारी-बीमारी भी नहीं. फिर…? उसका जीवन तो सदा ही लहरों के खिलाफ तैरने जैसा ही कठिन रहा है और डूबा भी नहीं कभी, बहादुरी से जूझा है। फिर अचानक यह खबर? कैसे सच हो सकती है!’
कई सवाल उनके होठों पर थे और प्रश्न आँखों में ।

‘हाँ, मम्मी। खबर सच है। हम अभी-अभी उसके घर होकर आए हैं। पूरा घर जल गया, साथ में क्रिस भी। दमकल वाले पहुँच तो गए थे पर बचा नहीं पाए ।…असंभव से असंभव भी तो कभी-कभी सच बनकर सामने आ ही जाता है।’
बहू हाँफती-सी उन्हें शांत करने का प्रयास कर रही थी। पर वह चुप थी और थोड़ी सन्न भी।
शब्द अटके रिकौर्ड से खुद को अभी भी दोहराए जा रहे थे, ‘ क्रिस नहीं रहा । कल रात उसके घर में आग लग गई और वह उसी में….’
‘ क्या मतलब बचने की भी कोशिश नहीं की उसने?’ होठो ही होठों में बुदबुदायीं मिसेज़ कपूर।
‘ शायद उठ ही न पाया हो?’
‘ पुलिस दरवाजा तोड़कर घर में घुसी थी, माँ। पर उसे बचा नहीं पाई थी। आधे जले उस घर में उन्हें उसकी लाश ही मिली।’
‘स्वस्थ लोगों के लिए भी जिन्दगी कठिन है, फिर वह तो अकेला रहता था। शायद अवसाद में भी हो, या बीमार हो!’…

‘ पता नहीं? हम सभी अभी-अभी उसके घर होकर आए हैं। मिल जुलकर चन्दा जमा कर रहे हैं ताकि उसे एक सम्मानजनक अंतिम विदा दे सकें। इतना तो फर्ज बनता ही है ना हमारा भी?’

‘ हाँ-हाँ, क्यों नहीं? करना ही चाहिए। पिछले पांच साल से बच्चों को पियानो च्यूशन दे रहा था। परिवार के सदस्य-सा ही तो था ।‘

गला भर आया था अब तो उनका भी।

कुरसी का सहारा लेकर बैठी तो घंटों लग गए उठने तक में ।
क्रिस की यादें, क्रिस का चेहरा आँखों से हट ही नहीं रहा था पर। …

मुस्कुराता चेहरा और बेहद विनम्र व सुसंस्कृत स्वभाव। सारी तकलीफ और शारीरिक मजबूरियों के बाद भी, बर्फ, आंधी-पानी, चाहे कुछ भी हो, डगमग पैरों के साथ वक्त पर पहुँच ही जाता था क्रिस अपने शिष्यों के घर पर। संगीत सिर्फ जीवकोपार्जन ही नहीं, जीने की वजह थी उसके लिए। भूखा तो रह सकता था वह, परन्तु पियानो से दूर अधिक देर तक नहीं।…

नन्ही-नन्ही उंगलियों से मोजार्ट और बेथोवेन बहते तो उसकी खुशी और आँखों की चमक सूरज की किरणों-सी चमकीली दिखती। संगीत जिंदा रहेगा, जबतक आदमी जिन्दा है, विश्वास पक्का होने लगता उसका।

दीवानगी की हद तक था उसे संगीत से लगाव। यह उसे विशिष्ट तो बनाता ही था, सभी का प्यारा भी। गुणों के आगे उसकी मजबूरियों पर किसी का ध्यान तक न जाता। टेढ़े-मेड़े चलने के बावजूद भी मात्र अपाहिज नहीं , एक सशक्त और श्रद्धेय व्यक्ति की तरह ही उभर कर आता था उसका व्यक्तित्व किसी के भी आगे। अमीर बाप का वह ग़रीब कलाकार बेटा भले ही अपने व्यापारी पिता के सपनों पर खरा न उतर पया हो, एक विलझण और समर्पित कलाकार अवश्य था।

‘प्रभु की जैसी मर्जी!’ मन जाने क्या-क्या समझाने लगा था उन्हें अब। पर बहुत देर हो चुकी थी। क्रिस हर मदद से दूर जा चुका था। आकाश में बसा तारा था बस अब, सिर्फ यादों में ही टिमिटमाता।

कल ही की तो बात थी जब वह आया था… उसी लगन से पोते को ट्यूशन भी दिया था। अधिकांशतः बहू ही उसके लिए कौफी बनाती थी। पर आज वह घर पर नहीं थी तो उन्होंने उठकर कौफी बना दी थी। साथ में दो डाइजेस्टिव के बिस्कुट भी रख दिए थे तश्तरी में। और इतने पर ही ‘आभार, आप कितनी दयालु हैं।‘ मुस्कुराकर कहा था उसने।

बेहद विनम्र था क्रिस। या फिर इतना अकेला था कि कोई जरा भी उसके लिए कुछ कर देता था तो उसे बहुत अधिक महसूस होता था। या शायद अच्छे लोगों की यह भी एक खासियत ही होती है कि जरा से आतिथ्य को भी अत्याधिक कृतघ्नता से ही गृहण करते हैं ये ।

साधारण-सी घटना और बात थी यह क्रिस के लिए भी और उनके लिए भी। परिवार के सदस्य-सा ही तो हो चुका था क्रिस । इस घटना के याद आने की या जिक्र की कोई जरूरत ही नहीं थी, अगर अगले दिन ही सुबह-सुबह वह भयावह खबर नहीं मिलती उन्हें क्रिस को लेकर।
….

पंद्रह दिन बाद जब उसकी अंतिम विदा हुई तो आयोजन भव्य था। उसकी साधारण जिन्दगी और सादे रहन-सहन से कई-कई गुना भव्य।

भाई-भतीजे , बहन , परिवार के सभी अन्य सदस्य आए थे ।

भाई ने बातों-बातों में बताया-‘ हम दो ही भाई थे और एक बहन। क्रिस सबसे छोटा। क्रिसमस के दिन पैदा हुआ था तो माँ-बाप ने नाम क्रिस रखा।

बचपन में ही पोलियो का शिकार हो गया था क्रिस । पर अपनी शारीरिक कमजोरी को कभी आड़े नहीं आने दिया उसने। पढ़ने-लिखने में सबसे तेज। और संगीत में तो विलक्षण प्रतिभा का धनी। वजीफे पर ही पूरी पढ़ाई की और न्यू कासल से म्यूजिक में मास्टर की डिग्री भी ली। वह भी प्रथम श्रेणी में। पर पिता को यह सब पसंद नहीं आता था, उसका रात दिन यूँ पियानो में ही खोए रहना। लम्बा -चौड़ा कारों का व्यापार था उनका। पांच-पांच शो रूम थे उनके, जिनमें सैकड़ों लोग काम करते थे। चाहता तो आराम से जिन्दगी निकल सकती थी उसकी भी। पर उसने तो संगीत को ही अपनी जिन्दगी बना लिया था। पहली ही डांट पर घर छोड़ दिया। साल में बस एक दिन घर जरूर आता था वह भी एक-एक सदस्य के लिए तोहफा लेकर। क्योंकि माँ से वादा किया था उसने कि अपने जन्मदिन पर जरूर आकर मिलेगा उनसे, चाहे कहीं पर भी हो वह, कितनी भी दूर क्यों नहीं! और उसने अपना वादा निभाया भी बखूबी। पर खुद परिवार से कभी कोई मदद नहीं ली कभी। न तो आर्थिक ही और ना किसी और तरह की ही। चाहता तो हम दोनों की तरह वह भी बहुत आराम से जी सकता था। एक संपन्न परिवार का शहजादा था वह भी। पिता के पास और हमारे पास बहुत कुछ था। पर उसे तो यही जिन्दगी पसंद थी। बस पियानो ही चाहिए था चौबीसो घंटे संगत के लिए। और पिता जी को ये सड़क छाप कलाकार असफल और समाज पर बोझ लगते थे। क्रिस का तो सब कुछ था संगीत। उनकी सोच से समझौता कैसे कर पाता वह? ‘

‘अपनी जरूरत भर पैसा कमा ही लेता था वह।’

‘या तो संगीत कौनसर्ट में वक्त निकलता था उसका या फिर बच्चों को पियानो सिखाने में। और कोई शौक भी तो नहीं था उसे। उसकी तो छुट्टियाँ भी इन्ही संगीत यात्रा और आयोजनों में ही बीतती थीं। खुद एक अच्छा कलाकार ही नहीं, अच्छा शिक्षक भी था क्रिस? ‘

‘ हो भी क्यों न, अच्छा विद्यार्थी ही तो अच्छा शिक्षक बन पाता है।‘

‘कितना अजनबी और दूर था पर बड़ा भाई छोटे भाई की जिन्दगी से, अब उन्हें सच में आश्चर्य हो रहा था। वाकई में जिन्दगी कितना दूर ले जाती है अपनों को अपनों से ही- न दुख में साथी रह जाते हैं न सुख में ही! साथ देना तो दूर, कई बार तो महक तक नहीं मिलती किसी भावना या जरूरत की !’

पर भाई तो भाई, जाने किस मलाल में बोले ही जा रहा था, ‘ बस दुख इस बात का है कि सब कुछ होते हुए भी, इतनी अकेली और इतनी कठिनाई में जिन्दगी निकाली इसने। कुछ भी तो हासिल नहीं हुआ। बेमौत ही मरा। हमें भी इतना उदासीन नहीं होना चाहिए था इसकी तरफ से, इसकी चुप्पी की चीख को सुनना चाहिए था।‘

उन्होंने तब रूमाल के कोर से आँखें पोंछते हुए भाई को बताया,

‘पियानो ट्यूशन करके जो मिलता उसी में गुजर करता था क्रिस। जो बन पाता उसी से जैसे-तैसे कर ही लेता था अपनी गुजार। पर यूँ इस तरह से दुखद और एकाकी अंत…’

‘खामोशियाँ भी तो कराहती हैं, चीख बनकर गूंजती हैं। फिर कला तो है ही या तो अंतस की चीख या फिर नम मुस्कान…कभी खुली धूप-सी। तो कभी नम बदली-सी ।’

भाई की आँख में भी अब आँसू थे और उनकी भी ।

याद आया कि बहू ने उन्हें बताया था कि उस दिन क्रिस का कमरा तोहफों से और अधजले रंग-बिरंगे कागज व रिबन से भरा पड़ा था। अगले दिन क्रिसमस ही तो था, जब उसे अपने परिवार से मिलने जाना था…पर नियति ने तो दूसरी ही यात्रा चुन रखी थी उसके लिए।….

और आज नई साल का पहला दिन…एक संकल्प मन में स्वतः ही उभर रहा था, इतनी जागरूकता तो होनी ही चाहिए परिवार में, समाज में कि कोई अपनी ही चीखों में डूबकर आत्महत्या न कर पाए।

‘मिसेज़ कपूर, हम लोग क्रिस की याद में एक संगीत एकैडमी की स्थापना करने की सोच रहे हैं। वहीं उसके अपने धर में। पिता मिलियन पाउंड का ट्रस्ट बना रहे हैं। जिससे ग़रीब और विलक्षण बच्चों को शिक्षा और साथ-साथ दस बच्वों को प्रति वर्ष वजीफा भी दिया जाएगा।’

‘काश क्रिस के सामने यह खुशी दे पाते वह !
संपर्क क्यों नहीं रखा? यदि वह नहीं आ पाता था तो तुम लोग ही मिलने आ जाते कभी-कभी!’ मिसेज़ कपूर के होठ मन ही मन बुदबुदाए…’परिवार ने भी तो कोई खोज-खबर नहीं ली कभी! ऐसे भी भला नाराज़ हुआ जाता है अपनों से ही?’

जबाब नहीं, उनका वह सवाल अब एक मलाल बनकर दोनों की ही आँखों में तैर रहा था और एक-दूसरे की नजरें चुराकर अपनी-अपनी भीगी पलकें तुरंत ही पोंछ भी डालीं थीं दोनों ने ही।
बस एक ही संतोष था कि जब तक जिया, ख़ुश रहा क्रिस। पियानो-टीचर की तरह उसने अपनी जिन्दगी अपनी तरह से गुज़ारी और यह भी कम बड़ा संतोष नहीं था उसके लिए। संगीत उसका पहला प्यार भी था और आखिरी भी।

‘हम जैसे कई सुरक्षा के मजबूत किनारों पर बैठे-बैठे ही जिन्दगी गुजार देते हैं पर उबर नहीं पाते मन की भँवरों से और क्रिस जैसे डूबकर भी तर जाते हैं। यही नहीं, यादों के भंवर में डूबते-उतराते आजीवन साथ रहते हैं अपने चाहने वालों के हृदय में सदा । बेशकीमती हीरा था मेरा बेटा। ‘

इस बार क्रिस की ब्यानवें साल की बूढ़ी माँ बोली। और भरे गले से ‘ हाँ माँ! ‘ कहता बड़ा बेटा माँ का हाथ पकड़कर माँ की बगल में जा खड़ा हुआ।

क्रिस अब इस दुनिया में नहीं है। परन्तु क्रिस से ही कला के दीवाने कई कलाकार आज भी हैं, जो अपनी साधना में लीन, दीन-दुनिया से बेखबर सब कुछ भूल सकते हैं सिवाय उस कला या कृति के जिसने उन्हें दीवाना कर रखा है। ऐसे में समाज का ही नहीं, हर इंसान का फर्ज बनता है कि उनका ध्यान रखे। उनके कल्पना के पंखों को उड़ने के लिए खुला आकाश दे।

आज भी बाजार में या किसी कोने पर जब भी कोई गिटार बजाता, गाता दिख जाता है मिसेज़ कपूर को, तो क्रिस का मुस्कुराता चेहरा पीछे से झांकने लग जाता है, जिसके बाप ने उसे घर से निकालते समय कहा था कि देखता हूँ कि कैसे तुम अपनी इस लूली-लंगड़ी जिन्दगी को मेरी सहायता के बिना जी पाते हो?

और उनके हाथ खुद-बखुद ही बटुए तक चले जाते हैं मदद के लिए। …

शैल अग्रवाल
संपर्क सूत्रः shailagrawal@hotmail.com
shailagrawala@gmail.com

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