कहानी समकालीनः खतम होने की कगार पर- राजश्री अग्रवाल

मेखला पर तो संकट किस कद्र बरपा है…रह रह कर यह बात कृष्णा के मन में उभर रही थी| 41 वर्ष के जवान बच्चे ने आत्महत्या कर ली थी| उनके पति दो साल पहले गुजर गए थे, बीमार होकर| अविरल अपने माँ-बाप का इकलौता बेटा था, उसने अपनी पसंद की लड़की मोहिनी से ज़िद कर शादी की थी| एक लडका और एक लड़की के साथ उसका परिवार भी भरा-पूरा है, हिम और हिमंकानी| वो स्वम् राजकीय महाविद्यालय में उपप्राचार्य के पद पर नियुक्त था|

कृष्णा के मन में यह सब बाते रह-रह कर उभर रही थी कि 41 वर्ष के जवान बच्चे ने आखिर क्यों फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली?

आज वो अपनी छोटी बहिन रेवती के साथ मोहिनी के सुसराल में बारहवीं की रस्म में शामिल होने गयी थी| जहाँ मेखला यानि मोहिनी की सास की पथराइ आँखे अनबोले ही बहुत कुछ बोल रही थी| आखिर तीन वर्षीय हिम की पगड़ी रस्म करते समय वो निढाल होकर वही गिर गयी… बस शून्य को ताकती आँखों में रहरह कर आंसू भर रहे थे| कृष्णा के साथ रेवती ने उन्हें संभाला और बड़ी व्यावहारिकता के साथ रेवती बोली- “ बस मेखला जी! इतना ही साथ था, अविरल का अपने साथ……आप मोहिनी का भी तो सोचो जिसका तो पति ही चला गया|”

“अरे मेरा साथ तो छ: साल पहले ही …..”और वो फफक कर रो पड़ी|

कृष्णा को भी रेवती के बोल बुरे लगे| उन्होंने कहा- “मेखला जी! हिम्मत से काम लो| नियति से कौन लड़ सकता है?”

लौटते समय कृष्णा यही सब गाड़ी में बैठे-बैठे सोच रही थी कि अविरल को दिन दहाड़े घर में ही मृत्यु के द्वार तक कौन ले गया? या फिर किसी ने स्वम् कोई कारगुजारी कर आत्महत्या दर्शा दी……?

वो आगे ना सोच सकी| इस मृत्यु के बाद जितनी बार वो रेवती के साथ मोहिनी के सुसराल आई है, रेवती इतना बडबोला पन दिखाती है जैसे वो ही सबसे ज्यादा समझदार है…………

घर पहुचते पहुचते रेवती फिर बोल उठी-“ कृष्णा दी! मेखला जी तो आदत है सबके सामने बेचारी बनने की|”

“रेवती! तू पता नहीं कैसी मिट्टी की बनी है? औरत नहीं तो इन्सान बन कर ही कभी सोचा कर|”

कहते-कहते वो घर में जाने लगी, पीछे पीछे रेवती भी जा बैठी| अब रेवती बोली- “ मै क्या गलत कह रही हूँ? मेखला ऐसे नहीं दिखा रही थी की जैसे अविरल की मृत्यु से उन्ही का सब कुछ ख़त्म हो गया हो?”

कृष्णा ने उसकी आँखों में दृढ़ता से झांक कर कहा-“ इसमें गलत क्या है? ख़त्म तो उन्ही का सब कुछ हुआ है ना?”

“क्यों? मोहिनी का तो वो पति था| जिन्दगी तो उसकी बर्बाद हुई है ना|”

“यदि वो मोहिनी का पति था तो अपने पति को कौन नारी सामने की सामने खुले दरवाजे सुसाइड करने देती है| उस दिन हिमांकिनी बोल रही थी ना –‘मम्मी मै आपको बोल रही थी ना पापा देखो पंखे पर झूल रहे है……आपने उन्हें रोका ही नहीं|”

“छोड़ो दीदी! अविरल तो पहले भी कई बार हाथ की नस काटने की कोशिश कर चूका था| उसे क्या पता आज सच में ही फंसी लगा लेगा| झगडा तो हुआ ही था, वो भी गुस्से में थी|”

“तुम गंवारो की तरह बात ना करो| सी सी कैमरे की फुटेज, बच्चो के बयान कि मोहिनी ने कहा कि मरना है तो मरेगा ही…….और खुले दरवाजे दोपहर को फांसी लगाने देना, बालकोनी में खड़े उसकी मौत का इंतजार करना आदि सबका कानून में विशेष अर्थ निकाला जायेगा|”

अब रेवती हतप्रभ सी कृष्णा दीदी को देखती रही थी|

कृष्णा ने फिर दृढ़ता से बोला-“ दरअसल अविरल की मृत्यु का सबसे बड़ा नुकसान तो मेखला जी को ही हुआ ना| वास्तव में मोहिनी को तो उसके जीवन से कोई लगाव ही नहीं था| उसको तो दूसरा पति मिल जायेगा मगर मेखला को दूसरा अविरल नहीं मिलेगा|”

“दीदी! आपकी बात गलत नहीं है मगर मोहिनी और उसके तीन साल के हिम पर भी तो प्रश्न चिन्ह लग ही गए ना|”

कृष्णा ने उसे स्थिर निगाहों से तोलते हुए कहा-“ बहुत अच्छी बात है…. अब तो तुम संतुष्ट हो? क्या मै गलत कह रही हूँ?”

“ ना बाबा! तुम गलत कब कहती हो?”

“ तुमने हमेशा मोहिनी की गलत-सही सब मांगो की वकालत की| उसे गलती पर भी सही ठहराया| माँ सही में वो होती है जो बच्चे को सही राह दिखाए, अगर वो उसकी हितैषी है तो| गलती करने पर उसे रोके और जरुरत पड़ने पर उसे सजा भी दे|” एक गहरी साँस लेकर वो फिर बोली-“ कहे क्या? तुम्हारी खुद की सोच ही एसी ही रही है| तुमने कभी घर बनाने की सोची थी क्या? वो तो कंवर साहब थे जो अकेले परिवार में सरकारी नौकरी पर थे, जो तुम्हे शहर ले गये और निभा लिए| वरना तुमने कौनसी कसर छोड़ी थी……….. सच में चोर से पहले उसकी माँ गुनाहगार होती है| तुमने हर जगह मोहिनी को भड़काया ही था| जब उसने अविरल और उसकी माँ के ख़िलाफ़ एफ आई आर कराई और पुलिस ने पारिवारिक मामला देख दोनों को बुलाकर राजीनामा कराया, तो तुमने पुलिस को बोला कि मेखला के कारण पति-पत्नी में झगडा होता है तो अविरल माँ-बाप से अलग रहे……….आजकल अलग रहना तो आम बात है……….. यही नहीं मोहिनी को स्त्रीधन के नाम पर सुसराल से चढ़ाया ज़ेवर दिलाया, साथं ही सास का ज़ेवर भी बंटवा दिया कि बाद में भी इन बच्चो का ही तो है| ”

रेवती ने कहा-“ देखो दीदी! आजकल पढ़े-लिखे बच्चे खुद समझदार होते है| उसे अपनी सास पर विश्वास नहीं था कि उर्मी की शादी के बाद मेखला जी के पास कुछ शेष रहेगा|”

“तो क्या जब मोहिनी की शादी में मेखला उसको ज़ेवर चढ़ाने को बनवा रही थी तो उर्मी ने भी अपने लिए बराबर रखवाया था? वैसे भी इन बातो का कोई अंत नहीं है| अब-जब दो साल पहले मेखला जी विधवा हुई तो उनके पास क्या रहा? कभी औरत बनकर भी तुमने नहीं सोचा? उसका तो स्त्रीधन तक तुमने अपनी बेटी को राजीनामे की धौस से दिलवा दिया| क्या मेखला जी को उनके एकमात्र स्त्रीधन का अधिकार नहीं है……. केवल सास होने के नाम पर और मोहिनी को मात्र भारतीय नारी होने के नाम पर बहू होने के नाम पर स्त्रीधन का एकमात्र अधिकार है?”

रेवती नि:शब्द हो आखिर बोली- “खैर! अब कल सुबह ही उसे ले आउंगी| वो वहा रहेगी तो नहीं| तुम साथ चलती तो………”

“नहीं मेरा जाना नहीं होगा ….वैसे तुम्हे भी थोडा सोचना चाहिए| इतनी उतावली क्यों हो|”

खैर! वो बिना कुछ बोले चली गयी| किन्तु कृष्णा वही बैठी रह गयी| हाँ! विचार अब मंथन बन गए थे, एक ही ताल पर….. ठीक है अविरल गैजेटेड ऑफिसर था उसकी मृत्यु उपरांत मोहिनी और दोनों बच्चो को पेंशन, ग्रेच्युटी, इंश्योरेंस एवं सर्विस आदि सब कुछ मिलेगा………..लेकिन अपना आदमी? उसकी मोहिनी को जरुरत ही कहा है? पता नहीं धन जो जीवन जीने का मात्र साधन है साध्य नहीं…..फिर भी आज धन परिवार में भी सर्वोपरी हो गया| मोहिनी घर की बाते, अपने पति से संबंधो की हर छोटी बड़ी बातो को लेकर अपनी अनुभूर्तिया माँ को साँझा करती लेकिन रेवती ने कभी बात को समेटने की जगह अपनी बेटी को शह दी| जिससे परिवार में विवाद बढ़ते गए और मोहिनी अपनी माँ की दी गयी बोली सुसराल में बोलने लगी| आखिर पांच साल पहले मोहिनी हिमंकिनी को लेकर अपने पीहर आ गयी| फिर अपने पति सास-ससुर और अविवाहित ननद उर्मी के ख़िलाफ़ ऍफ़ आई आर करा दी| पुलिस ने दोनों को बुलाया, समझाया |अविरल को अलग से चेतावनी दी –“ घर का विवाद घर में ही निपटा ले तो अच्छा है नहीं तो बेटा! आजकल तो लडको को मुसीबत हो जाती है|”

उस समय रेवती ने बड़ी समझदारी दिखाते हुए बेटी-जवाई को परिवार से अलग रहने का मशवरा पुलिस के सामने दिया कि मेखला जी के कारण दोनों में विवाद होता है| ये दोनों अलग रहेंगे तो इनका परिवार बना रहेगा|

उस समय सत्ताईस वर्षो से एक सूत्र में बंधे परिवार के टूटने की पीड़ा “ये तो आज आम बात है कि बेटे-बहू परिवार से अलग रहे” रेवती के शब्दों के निचे दब गए, स्वरहीन हो गए| फिर भी विवाद खत्म नहीं हुए क्योंकि शायद विवाद मेखला के कारण नहीं बल्कि रेवती का अपनी बेटी के घर को अपने अनुसार चलाने की ख्वाहिश थी| जो बाद में अविरल पर तानाशाह होती जा रही थी| कृष्णा को कई घटनाये याद आने लगी| रेवती ने अविरल पर शिकंजा कसा- जब मोहिनी तुम्हारी माँ के उस घर में नहीं जाती, तो तुम क्यों जाते हो? वो लोग तुम्हे नहीं बसने देंगे…..जो बहिन मोहिनी/ तुम्हारी पत्नी से सीधे मुंह नहीं बोलती तुम उससे नहीं बोलोगे…….आखिर बहिन की शादी में भी मोहिनी और बच्चो के कपड़ो में 45 हज़ार रूपये खर्च हुए, स्वम् मोहिनी ने एक सोने का सैट ख़रीदा लेकिन बहिन को एक तोला सोना नहीं देने दिया|

-“मम्मी-पापा करेंगे ना….” -एसा उर्मी की शादी में ही हुआ हो, एसा नहीं है| मोहिनी की निगाह हमेशा सुसराल में गिद्द की तरह रहती है| पहले अविरल प्राइवेट सेक्टर में था लेकिन बाद में जॉब छुटने पर सब परेशान थे| लेकिन मोहिनी की झुंझलाहट इससे और बढ़ गयी थी| वो बात बात पर लड़ाई करती, उससे तू-तडाक से पेश आती| अविरल ने कई परिक्षाये भी सरकारी नौकरी के लिए दी लेकिन परेशानी में जब रोज़ कोई उसके स्वाभिमान को चोट करे…. उसका आत्म विश्वास डगमगाए…..तो वो समय युगों की तरह लम्बा लगता है| मेखला जी ने अविरल की नौकरी के संकल्प के साथ 16 सोमवार के वृत्त किये, इस उम्र में भी| माँ के तप और परिवार की परेशानी देख अविरल ने एक बार मोहिनी को अपने मन की इच्छा बताई कि मेरी सरकारी नौकरी लगे तो मै मम्मी को सोने की चूड़ियाँ बनवा दूंगा और तुम्हे भी एक तौला सोना खरीद दूंगा…………… हाँ! उसे पता था कि उसकी शादी में बहू को ज़ेवर बनवाने के समय मम्मी ने अपना लॉकर करीब खाली ही कर दिया था| उनके हाथो की सोने की चूड़ियाँ अब चीर कर ख़त्म हो गयी थी| अभी पांच सोमवार ही किये थे कि अविरल की सरकारी नौकरी लग गयी, वो भी राजकीय महाविद्यालय में उपप्राचार्य के पद पर|

कुछ समय बाद मेखला जी ने अपने बिमा के मिले पैसे और पुरानीहुई चीरी चूड़ी मिलाकर नई चूड़ी ले आई| उस बार दिवाली पर घर में बजट बनाया जा रहा था तो मोहिनी ने अविरल को टोका-“ मम्मी ने तो चूड़ियाँ खरीद ली है तो अब उनके लिए सोना क्यों खरीदना है?”

“ इससे मतलब? तुम्हारे लिए नहीं खरीद रहा क्या, एक तौला|”

“ वो तो आपने मुझे प्रोमिस किया था, एक तौला देने का|”

“ तो मम्मी के लिए भी तो मैंने संकल्प किया था……दो सोने की चूड़ी बनवाने का| फिर तुम्हे दिखा नहीं वो मेरी नौकरी के लिए कितने कठोर वृत्त कर रही थी, इस उम्र में भी|”

“तो? वो तो माँ है…करती ही|”

“ ये कभी तुम अपने को देखो? तुम क्या करती थी, पत्नी हो कर|”

“ठीक है…. आपने चूड़ी बनवाने के लिए उन्हें थोड़ा कहा था| 2-2.50 लाख रूपये अपने काम आते…..”

कि एकाएक अविरल बीच में चिल्ला पड़ा-“ कौन कहेगा कि तुम मास्टर्स क्वालीफाई हो? तुम्हे ज़रा सी शर्म नहीं आती, यह बोलते| जिस माँ ने तुम्हे ज़ेवर चढ़ाने को अपना सोना निकाल कर दिया …..

“वो तो सब चढाते……..”

“एक दम चुप| ये बोलने से पहले बताओ कि क्या तुम्हारे मम्मी ने भी जंवाई के लिए लॉकर खाली किया था? जो केवल लेना जनता हो वो ये सब क्या जानेगा…… तुमने तो राजीनामे के नाम पर उनका ज़ेवर तक बंटवा लिया| तुम एसी माँ से बेईमानी कर सकती हो …..मै सोच भी नहीं सकता| तुम मेरी पत्नी हो इसलिए मै तुम्हारा सम्मान करता हूँ| वरना मेरे दुःख: के समय भी माँ ही मेरे दर्द से जुडी रही और अकेले रहकर भी 16 सोमवार के वृत्त करती रही| जिसके तप तप, वृत्त से तुम्हे भी तमाम एश्वर्य प्राप्त हो रहे है|”

पापा की मृत्यु के बाद अविरल मेखला के पास अक्सर चोरी-छिपे जाता तो कह्ता-“ मम्मी अच्छा है मोहिनी आपसे अलग हो गयी तो…..अब वो आप पर झूठे इल्ज़ाम नहीं लगा पायेगी, अब जो भी होगा मै झेलूँगा|”

मेखला को कहा पता था कि इन शब्दों की गहराइ उसकी आत्महत्या पर होगी……..रेवती के सामने भी दोनों में कई बार कहा-सुनी हुई और एक दो बार दोनों माँ-बेटी की निरंकुशता से परेशां हो उसने नस भी काट ली थी| अब तो मेखला साथ नहीं रहती, अब किस बात से झगड़ा होता था…….शायद हम टी वी, मिडिया से अधिक ही प्रभावित है, समस्या की जड़ को देखना ही नहीं चाहते|

केवल निरंकुश इच्छाएं- मेखला से नहीं मिलोगे…… कभी ना ख़त्म होने वाली आशंकाएं! माँ से चोरी-छिपे मिलते हो…….. उन्हें सहयोग करते हो……. जो अविरल पिता की मृत्युपरांत कोई भी पुश्तैनी संपत्ति के बिकने पर हाथो हाथ अपना हिस्सा ले लेता था, वो चोरी-छिपे अब बेवा माँ को कोई सहयोग करता हो, नहीं लगता|

आज बारहवे पर ये सारी चर्चाये हो रही थी | कृष्णा जी ना केवल ये सब याद कर रही थी बल्कि रात तक एक खत्म होते परिवार के तथ्यों का हर दृष्टिकोण से विश्लेषण भी कर रही थी|

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सुबह उठते ही कृष्णा ने एक फोन घुमाया|

“ हाँ! प्रात: नमन, पूनम दीदी!”

“ हाँ कृष्णा जी! आपको भी प्रात: नमन! कितनी सुखद सुबह है? तुमने पुकारा…..कहिये|”

“जी आप अविरल के तीये की बैठक में आई थी| बहुत ही दुखद अंत था अविरल का, अपने ही घर में आत्महत्या?”

“जी”

“आपने तो इस केस को अपनी शोध में ले लिया होगा? मै भी पिछले 12 दिन से इसी विषय में सोच रही हूँ| हाँ! कुछ समझा भी है……आप बताइए आप किस निष्कर्ष पर पहुंची है?”

“जी मैंने 135 दाम्पत्य केसो का विश्लेषण किया है| देखती हूँ कि कभी सास और ननद के नाम बदनाम थे….एसा नहीं है कि वो शत-प्रतिशत काल्पनिक थे| 10-20 प्रतिशत निरंकुशता भी होती थी| फिर पिछले 25-30 वर्षो से एक ओर सरकार ने स्वस्थ समाज बने, इस लिए महिला के प्रति अति संवेदन शील होकर कठोर संरक्षण कानून बना दिए तो समाज में भी सास-बहू विवाद के नाम पर लड़की वाले और समाज ने भी बहू-बेटे को अलग रहने की, उनकी आज़ादी के नाम पर और बच्चो के जीवन को सुखमय बनाने के नाम पर ज्यादा ही उछ्रीन्खल सीख दे डाली| परिणाम कि मध्य भारत में 80-90% परिवार एकल ही रहते है| दूसरी ओर समाज ने भी सास पुराण के नाम पर एकल पररवार को मान्यता दे दी| बेटे -बहू का जीवन सुखमय रहे….उन्हें भी आज़ादी मिले…आज उत्तरी और मध्य भरत में 90% बेटे-बहू अलग ही रहते है| फिर भी उन दोनों में इतने झगडे है कि पारिवारिक अदालते भरी पड़ी है, पुलिस स्टेशन भरे पड़े है| दरअसल झगडे की जड़ सुसराल का परिवार नहीं बल्कि लड़की और उसके परिवार की दखलंदाजी है| वो लड़की विदा नहीं करते बल्कि लड़की के माध्यम से उसके सुसराल में अदृश्य ही हमेशा बने रहते है| वास्तव में महर्षियों ने हमारी संस्कृति सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक शोध के बाद बनाई| कि बेटी के घर का पानी भी पीना पाप समझा जाता था| आज हमने सारी मर्यादा तोड़ दी….. तो हालत ये है कि बेटी का विवाह होने के बाद उसके सुसराल की रसोई भी बेटी की माँ अपनी इच्छानुसार चलाना चाहती है|”

“वो तो सब जानते है मगर …….”

पूनम बीच में ही बोली-“ कष्णा जी! हम अभी भी गहरे से नहीं देख रहे| उस दिन मेखला जी रोते हुए बोल रही थी-“ रेवती जी तुमने कहा था कि तुम्हारे कारण दोनों में झगडा होता है…..दोनों को अलग कर दो| अब तो मै दोनों से पांच किमी दूर रहती हूाँ अब अविरल ने क्यों खुले दरवाजे फांसी लगाई और बाहर बालकनी में बैठी मोहनी ने लगाने दी……..अरे! तुझे अविरल से दिक्कत थी तो उससे अलग हो जाती …..लेकिन तूने उसे अकेला करके मेरे बेटे को जान से ही ख़त्म कर दिया….”

और वो अविरल को पुकार कर बहुत रोई- “अरे बेटा! मुझे एक बार मुझे बताता तो सही……..इसको तेरी जरूरत ना हो तेरी माँ का तो तू ही लाल था……हे भगवन कहाँ से लाऊं? मेरा अवि sss “

तब मेरा ध्यान इस बात पर पहली बार गया कि बड़े ही सुनियोजित तरीके से बच्चो का सुख, सास-ननद की तानाशाही आदि शब्दों के नीचे आज लडको को अकेला किया जा रहा है| वो अपने सारे अधिकार, सहयोग परिवार से लेकर केवल पत्नी के साथ अपने परिवार से तन-मन से प्रथक किया जा रहा है लेकिन पत्नी अपना पीहर नहीं छोड़ती और उनसे मिलकर सब पति को जकड़ लेते है| दूसरी ओर पुलिस और कठोर कानून से डरा हुआ पति अविरल की तरह आत्महत्या ही करता है| प्रेम तो उन मे है नहीं और जीवन में प्रेम करने वालो को हमने पहले ही लॉक लगा कर बंद कर दीया|”

“आपके अनुसार….”

“ जी झगडे अपने पूर्वजो की जिन्दगी में भी होते थे, लेकिन यदि कोई बात-झगड़ा भी हुआ तो भाई, बहन, भाभी, माँ कोई भी उसे सहला लेता था और जिससे वो एकाकी हताश सोच से कोई समाधान नहीं मिलने पर भी आत्महत्या नहीं करता था| मनोविज्ञान कहता है कि हत्या/आत्महत्या एक समय विशेष का जूनून है जो कुछ पल का होता है…….यदि उस पल उसे प्रेम की मलहम लगा दे तो वो पल गुजरने के बाद दुःख जैसा नहीं कुछ रहता और जिन्दगी उसे अपने रेले में आगे ले जाती है|”

“ओह!”- हताश सी कृष्णा बोली- “आज हम तो बच्चे को कभी नौकरी, कभी नई शादी, कभी आज़ादी के नाम पर अकेला छोड़ देते है……लेकिन वो वहा क्या झेल रहा है? कहा जानते है? काश! कोई बेटा अपनी माँ से कहता तो सही…… “एकाएक वो बोली -“पूनम! इस विषय पर एक विस्तृत चर्चा रख ले| कम से कम हम सोचे तो सही |”

“अ हाँ! अभी कुछ समय दो| मै हमारे परिवार की भारतीय व्यवस्था उसके पीछे छिपे ज्ञान-विज्ञान, मनोविज्ञान को पेपर पर उतार लू| फिर चर्चा रखे……. वैसे भी परिवार समाज और फिर देश की पहली इकाई है, हम खुद ही अपने परिवार खत्म कर रहे है……सोचना तो पड़ेगा, गहराइ से|” और दोनों ने परस्पर अभिवादन कर फोन बंद कर दिए|

राजश्री अग्रवाल
जन्म एवं स्थान : 13 सितम्बर,1961, अलवर (राज॰)

शिक्षा : बी॰ए॰(ऑनर्स), एल॰एल॰बी॰
राजनीतिक- सामाजिक विश्लेषक, समाज सेवा, सतत लेखन कार्य ;-

कविता कहानी, यात्रा संस्मरण, उपन्यास, नाटक लेखन मे विशेष रुचि।
हाल ही में “ आर्टिकल 51 ऐ “ नाम से हिंदी में हमारा देश से रिश्ता विषय पर प्रकाशित
2017 में “स्ट्रगल विद लाइफ़” नामक हिंदी बुक इन्डियन यूथ के स्ट्रगल पर प्रकाशित हुई ।

स्वरचित “रूपारेल’ कहानी संग्रह,एवं“वैदेही” उपन्यास प्रकाशित ।
विभिन्न स्तर की पत्र- पत्रिकाओ मे रचनाओ का सतत प्रकाशन। 2015 में मौरिशस मे रामायण सेंटर के इन्टरनेशनल कोन्फ्रेंस मे “राम-राज्य” पर शोध-पत्र वाचन। “वुमेन वेल्फेयर सोसाइटी” की मासिक पत्रिका “आँचल के साये मे” का सम्पादन।
जिला अग्रवाल संसथान अलवर मे तैतीस वर्षो महिला अध्यक्ष के रूप मे समाज सेवा एवं राष्ट्रीय अग्रवाल महासम्मेलन मे सक्रिय सदस्य। वर्तमान मेंअग्रवाल अलवर जिला अग्रवाल संसथान में जिला महिला अध्यक्ष । 1989 से “वुमेन वेल्फेयर सोसाइटी” की अनवरत अध्यक्षा तथा इस मंच से नि: शुल्क परिवार परामर्श, नि: शुल्क विधिक सहायता एवं विधिक जागृति आदि कार्यो द्वारा महिला कल्याण कार्य एवं समाज सेवा ।

· सान 2006 से “श्रीमती मीना अग्रवाल चेरिटेबल एंड मेमोरियल ट्रस्ट” की मुख्य ट्रस्टी। जिसके द्वारा अति निर्धन लड़कियो की शादी मे सहायता कार्य एवं सामाजिक शोध, वर्कशॉप।

· जिला अधिवक्ता एसोसिएशन, अलवर की 1991-1992 मे पहली बार महिला महासचिव के रूप मे निर्वाचित की गयी। ग्लोबल पार्लियामेंट ऑफ राम-राज्य की संस्थापक सदस्या।

· आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर ज्वलंत सामयिक विषयो पर वार्ताओ मे भागीदारी।

· आधुनिकता की दौड़ में परिवार टूटने से बचाने के लिए पिछले सात वर्षो से शोध कार्य|

· आयरलैंड, इंग्लॅण्ड, मॉरिशस, श्री लंका, थाईलैंड, नेपाल एवं कंबोडिया आदि की विदेश यात्राएं। 1987 से महिला अधिवक्ता के रूप मे कार्यरत साथ ही राजनीतिक, सामाजिक एवं पृथ्वी पर महिला और परिवार की स्थिति पर शोध कार्य।

व्यवसाय से एडवोकेट, राजस्थान हाई कोर्ट |

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