कहानी समकालीनः कमीना -रूपसिंह चन्देल

“मैम आप घर में हैं?” उसका रोता हुआ स्वर उन्हें सुनाई दिया.
“घर में हूं.”
“मैम, मैं अभी आपसे मिलना चाहती हूं.”
“कुछ देर पहले ही कोर्ट से लौटी हूं.” उन्होंने घड़ी देखा, सवा पांच बजे थे, “तुम सात बजे के लगभग आ सकती हो.” कुछ रुककर उन्होंने पूछा, “कोई खास बात?”
“आकर बताऊंगी.”
“ओ.के.” उन्होंने मोबाइल बन्द कर सामने सोफा मेज पर रखा और दिनभर की थकान से चूर बदन को कुछ आराम देने के लिए सोफा पर पसर गयीं. सुबह नौ बजे कोर्ट के लिए निकली थीं. उनका केस दसवें नम्बर पर था. पांच नम्बर तक सब ठीक चलता रहा, लेकिन छठवें केस को बुलाने के बजाए जज ने छत्तीसवें नम्बर को बुलाने के आदेश दिए. छः-सात केस सुनने के बाद उठकर अपने चैम्बर में चले गए. एक घण्टा बाद लौटे और पैंसठ नम्बर से सुनवाई शुरू की. सुबह ग्यारह बजे तक आ जाने वाला उनका नम्बर शाम चार बजे लगा. दिनभर कोर्ट के बाहर पड़ी बेंच पर बैठी अपने मुवक्किल के केस का नम्बर आने की वह प्रतीक्षा करती रही थीं. लंच के समय मुवक्किल ने उन्हें बाहर रेस्तरां में लंच के लिए प्रस्ताव दिया, लेकिन बाहर का वह कुछ भी लेना पसंद नहीं करतीं. ’मालूम होता कि ऎसा होगा तब वह लंच साथ लेकर आतीं या घर जाकर लंच कर आतीं. लेकिन मालूम नहीं जज साहब का मूड कब बदल जाए और उनके मुवक्किल के नाम की पुकार हो जाए.’ सोचती हुई वह बाहर बैठी रही थीं. उनके जूनियर ने भी उन्हें लंच के लिए चलने का प्रस्ताव दिया, लेकिन उन्होंने मना कर दिया. “अनिल तुम जानते हो कि मैं बाहर का कुछ भी नहीं लेती.”
आंते थकान नहीं समझतीं. पन्द्रह मिनट बाद वह उठीं. मुरमुरे और भुने चने लिए और टूंगने लगीं. ड्राइवर दरवाजे पर नमूदार हुआ.
ड्राइवर की ओर कटोरी बढ़ाती हुई बोलीं, “तुम भी लो हरीश.”
“आप लें मैम, मैंने लंच कर लिया था.”
“चाय बना लो.” एक क्षण रुककर वह बोलीं, “मेड के आने का भी समय हो रहा है. चाहो तो रुक जाओ.”
“आपने दिनभर चाय भी नहीं पी मैम. मेड आती रहेगी. उसे आपके लिए डिनर भी बनाना है. मैं चाय बना देता हूं.” किचन की ओर जाता हरीश रुका, “अगर कहीं और नहीं जाना मैम तो चाय पीकर मैं —.”
“कहीं नहीं जाना. तुम्हें पता है कि मैं शाम समय कहीं नहीं जाती.”
“यूं ही पूछा. कभी-कभी आप अपनी दीदी के घर जाती हैं—.”
“दीदी–.” वह बुदबुदाई और मन में सोचने लगीं, ’दीदी बिना जरूरत कहां पूछती हैं. शादी नहीं की तो भुगतो अकेले—परिवार के लोगों की नज़रें मकान और मेरे बैंक बैलेंस पर हैं. सभी चाहते हैं कि कितनी जल्दी—.’ तत्काल उनके विचार बदले, ’मैं भी क्या सोचने लगी. दिनभर की ऊब केस में कुछ भी न हासिल होने का गुस्सा—सोचा था कि आज फेवर में जजमेंट हो जाएगा. लेकिन दूसरी पार्टी आकर चली गयी थी. दूसरी तारीख. यह भारतीय कानून व्यवस्था है—अंग्रेजों के समय से जारी व्यवस्था बदलने का नाम नहीं ले रही. दो मिनट से अधिक किसी केस को समय नहीं दिया जाता. वकीलों का व्यवसाय फल-फूल रहा है. जिस मामले में एक-डेढ साल में मुकदमा समाप्त हो जाना चाहिए उसे पांच-सात सालों तक खींचा जाता है. इस केस के बाद मैं वकालत छोड़ दूंगी. वैसे भी पैंतालीस सालों से कोर्ट के चक्कर काटते थक चुकी हूं.’
फोन की घण्टी बजी. वह उठ बैठीं. फोन उठाया. नम्बर, नाम देखने का अवसर दिए बिना ही उधर से आवाज सुनाई दी, “मैम, शालिनी.”
“बोलो.” स्वभाव के विपरीत उनकी आवाज शुष्क थी. शालिनी की अधैर्यता से उन्हें गुस्सा आ रहा था.
“मैम, मैं आ जाऊं?”
“सात बजे के लिए कहा था.” फिर कुछ सोचकर बोलीं, “कितना समय लगेगा आने में?”
“आध घण्टा मैम.”
उन्होंने घड़ी देखा. छः बज चुके थे. “आ जाओ.”
“थैन्क्स मैम.”

शालिनी नोएडा के एक राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र में पत्रकार और उसका पति नितिन एक अन्य राष्ट्रीय हिन्दी समाचार पत्र में रिपोर्टर है. दो साल पहले नितिन शालिनी के समाचार पत्र में रिपोर्टर था. दोनों ने प्रेम-विवाह किया था. नितिन के परिवार वालों ने शादी का विरोध नहीं किया जबकि शालिनी के परिवार वालों ने न केवल विरोध किया, बल्कि उससे सम्बन्ध भी तोड़ लिए थे. नितिन बिहार के मुजफ्फरपुर का रहने वाला था. उसने जे.एन.यू. से मास मीडिया का कोर्स किया था. वह पिछले आठ वर्षों से दिल्ली में रह रहा था. शालिनी लखनऊ की थी. उसने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का कोर्स किया और कुछ दिनों तक इंदौर के एक समाचार पत्र में प्रशिक्षु के रूप में कार्य करने के बाद नोएडा के उस समाचार पत्र में नियुक्ति पाकर दिल्ली आ गयी थी. नितिन पहले से ही उस समाचार पत्र में रिपोर्टर था. शालिनी के ज्वाइन करने के कुछ दिनों बाद ही दोनों में मित्रता हो गयी. एक साल में मित्रता प्रगाढता में बदली और शालिनी ने नितिन के साथ विवाह का फैसला अपने परिवार को सुना दिया. शालिनी के साथ काम करने वाली एक युवती ने उसे आगाह किया कि वह बहुत सोच-समझकर नितिन का हाथ थामे, क्योंकि उसकी जानकारी के अनुसार नितिन उस समाचार पत्र में आने से पहले जिस समाचार पत्र में था वहां की दो लड़कियों के साथ फ्लर्ट कर चुका था. उनसे शादी करने का वायदा करके वह सब किया जो शादी बाद होता और इस समाचार पत्र में आने के बाद उनसे सम्बन्ध तोड़ लिए. उस लड़की के अनुसार आश्चर्य यह कि वह दोनों से एक साथ फ्लर्ट कर रहा था.
“अंजना. मेरे साथ छल किया तो खून के आंसू रोएगा नितिन.” शालिनी बोली थी.
शादी से शालिनी का अपना परिवार छूट गया था. शहर में अधिक मित्र भी नहीं बना पायी थी. उनसे उसका परिचय एक नारीवादी संगठन के कार्यक्रम के दौरान हुआ था. उन्हें ’आज की स्त्री- शिक्षा और समस्या’ पर बोलने के लिए बुलाया गया था. कर्यक्रम समाप्त होने के बाद शालिनी ने उनके पास आकर अपना परिचय दिया और उनसे अपने अखबार में युवतियों की समस्याओं पर लिखने का आग्रह करते हुए, “मैम आप बहुत अच्छा बोलीं. मुझे आज ज्ञात हुआ कि आप कुछ अखबारों में सामाजिक और कानूनी विषयों पर लिखती हैं. मैंने आपके अलेख पढ़े हैं. मिलने का सौभाग्य आज मिला.”
हर लेखक को अपने पाठकों से मिलकर अच्छा लगता है. शालिनी से अपने लिखे की प्रशंसा सुनकर उन्हें भी अच्छा लगा और जब उसने उनका पता और फोन नंबर मांगा उन्होंने उसे अपना विजिटिंग कार्ड देते हुए कहा, “शाम समय कभी भी.”
“थैंक्स मैम. शाम समय ही आ सकूंगी. छः बजे तक तो ऑफिस ही होता है.”
“ओ.के.”
लगभग एक माह बाद एक शाम छः बजे उसका फोन आया, “मैम मैं शालिनी सिंह.”
“कौन शालिनी सिंह?” वह भूल गयी थीं.
“मैम, इंडिया इण्टरनेशनल सेंटर में कुछ दिन पहले आपसे मिली थी. मैं ’दैनिक नवप्रकाश’ में काम करती हूं.”
कुछ देर तक सोचने के बाद उन्हें याद आया. ”हां, याद आया.”
“मैम, आप घर में हैं?”
“हां.”
“अनुमति दें तो आ जाऊं.”
“कितनी देर में?”
“ऑफिस से निकल रही हूं. मेट्रो लेकर—.”
“शालिनी, सात बजे क्लाइण्ट्स को समय दे रखा है. यदि साढ़े छः बजे तक आ सको–.”
“ओ.के. मैम, मैं ऑटो या कैब लेकर ठीक समय पर पहुंच जाऊंगी.”

शालिनी बैठी बाद में पहले हाथ में पकड़ा अपने विवाह का निमंत्रण पत्र उनकी ओर बढ़ाते हुए बोली, “मैम, परसों मयूर विहार के ग्रीन प्लाजा में —आपका आशीर्वाद चाहिए.”
निमंत्रण पत्र थाम मुस्कराते हुए वह बोलीं, “जल्दी में हो?”
“नहीं मैम. आपको यह कार्ड देकर घर जाऊंगी.”
“कहां रहती हो?” उन्होंने उसे बैठने का इशारा किया.
“मयूर विहार फेज एक में एक बरसाती में.” सोफे पर उनके सामने बैठते हुए वह बोली.
“और नितिन?”
“वह पटपड़गंज की एक सोसायटी में.”
“नितिन क्या करते हैं?” पूछने के बाद उन्हें लगा कि दूसरी बार उनसे मिली है लड़की और वह यह सब उससे क्यों पूछ रही हैं. लेकिन यह उनके स्वभाव में है. एक-दो बार में ही वह किसी से भी आत्मीय हो जाती हैं. हालांकि उनके व्यवसाय में ऎसा नहीं होता. एडवोकेट किसी भी मिलने वाले को अपना क्लाइंट समझते हैं और किसी आई.ए.एस. अफसर की भांति नपी-तुली बात करते हैं. अपने पेशे वालों के साथ ही वह घुलते-मिलते हैं. लेकिन उनके साथ ऎसा नहीं है.
शालिनी ने नितिन,अपने और दोनों के परिवार के बारे में संक्षेप में बताया.
“मैम, मैंने आपकी बहुत तारीफ सुनी है. आप लोगों की बहुत सहायता करती हैं. मेरे परिवार वालों ने मुझसे संबन्ध तोड लिए हैं जबकि नितिन के परिवार के लोग विवाह में शामिल होंगे. यदि आप अन्यथा न लें—.” उसके चेहरे पर संकोचभाव उभर आया.
“कहो—कहो.”
“मैम, मेरी ओर से आप अभिभावक की भूमिका –.”
“श्योर—.” उनके इतना कहने के साथ ही डोरबेल बजी.
“मेरे क्लाइण्ट्स आ गए.”
“ठीक मैम, आप वहां एक घण्टा पहले आ जाइएगा.” उसने उठकर दरवाजा खोला. दो लोग अंदर आए. अपना बैग उठाकर जाते हुए वह फिर बोली, “मैम, मैं आपके लिए कैब भेज दूंगी.”
“उसकी जरूरत नहीं. मैं आ जाऊंगी.”

शादी के एक माह बाद एक रविवार दोपहर शालिनी का फोन आया. “मैम, मैं और नितिन आज शाम आपसे मिलने आना चाहते हैं. आज रात का डिनर आप हमारे साथ लें. हमे अच्छा लगेगा मैम.”
“तुम दोनों मेरे घर आओ. यहीं डिनर करेंगे. बाहर क्यों जाना.” कुछ रुककर उन्होंने पूछा, “इतने दिनों कहां थीं?”
“मैम, हम दोनों हनीमून के लिए बाली और सिंगापुर गए थे.”
“बहुत सुन्दर.”
“फिर आज शाम—.”
“आ जाओ. तुम्हारे आने के बाद सोचेंगे.”
ठीक सात बजे शालिनी नितिन के साथ आयी. सजी-धजी गुड़िया-सी लग रही थी—बहुत ही सुन्दर-आकर्षक. नितिन लंबा—लगभग पांच फुट दस इंच लंबा, गेहुआं रंग, सुडौल शरीर, बड़ी आंखें और चौड़ा ललाट—कुल मिलाकर भव्य व्यक्तित्व. शादी के समय वह उसे इतना गौर से नहीं देख पायी थीं. उस दिन कार से दोनों को उतरते भलीभांति देखा और अनुभव किया कि जोड़ी बहुत ही शानदार है.
नितिन और शालिनी की जिद पर उन्हें नोएडा के लॉजिक्स सिटी सेंटर मॉल जाना पड़ा. उन्होंने एक-दूसरे के प्रति दोनों का प्रेम अनुभव किया. ’सदैव यह प्रेम ऎसा ही बना रहे.’ उन्होंने मन ही मन दुआ की थी. लेकिन उनकी दुआ शायद कुबूल नहीं हुई थी. चार-पांच माह बमुश्किल बीते कि रात नौ बजे के लगभग शालिनी का फोन आया. रो रही थी. उसे रोता सुन वह परेशान हो उठीं. इस दौरान वह कई बार उन्हें फोन पर अपने खुशहाल वैवाहिक जीवन के बारे में बता चुकी थी. वह जब भी उसे किसी रविवार मिलने आने के लिए कहतीं वह कहती, “मैम, इस संडे अमुक जगह घूमने जाएंगे या इस संडे अमुक—.” शालिनी के विवाह में उन्होंने उसकी ओर से उसकी मां-पिता की भूमिका निभायी थी इसलिए उसे वह अपनी बच्ची की तरह चाहने लगी थीं. एक-दो बार उन्होंने सोचा, ’यदि मैंने विवाह किया होता तब मेरी बेटी इससे बडी होती.’ तत्काल उनके दिमाग में आया, ’बेटा भी हो सकता था.’ फिर अपनी सोच पर शर्मिन्दगी अनुभव करते हुए अपने को झिड़का, ’कभी शादी न करने का निर्णय करके यह सब सोचना—छिः–.’
“क्या हुआ शालिनी! इस तरह रो क्यों रही हो?”
“इस कमीने ने मुझे अभी बहुत मारा मैम. रुई की तरह धुनक दिया.”
“अचानक यह सब—?”
“मैम” रोते हुए वह बोली, “मैम, मैं अब इसके साथ नहीं रह सकती.”
“हुंह.” वह केवल इतना ही बोलीं.
“मैम, कल सुबह आप मुझसे मिल सकती हैं?”
“आ सकती हो सुबह नौ बजे. साढ़े नौ बजे मुझे कोर्ट जाना है. लेकिन क्यों?”
“मैम, तलाक के लिए. मैं अब इसके साथ बिल्कुल नहीं रह सकती. जल्लाद है यह.”
“ठीक. कल आकर मिलो.” एक क्षण रुककर वह बोलीं, “नितिन है तो मेरी बात करवाओ.”
“मुझे पीटकर बाहर निकल गया है.” फिर कुछ बिफरती हुई वह बोली, “आप उससे क्या बात करेंगी! आप मेरे साथ हैं या—.”
“अरे शालिनी, मैं तुम्हारे साथ ही हूं. लेकिन एडवोकेट भी हूं न!”
“उससे बिल्कुल बात नहीं करेंगीं मैम. मैं कल सुबह मिलने आऊंगी. तलाक के लिए कौन-से डाक्यूमेण्ट्स चाहिए होंगे.”
“आधार, शादी का निमंत्रण पत्र, शादी के समय के तुम दोनों के संयुक्त फोटो, तुम्हारे दो फोटो.”
“ठीक मैम.” यह कहते हुए वह रो नहीं रही थी. उन्हें लगा जैसे तलाक देने के विचार मात्र से उसकी पीड़ा दूर हो गयी थी.
अगले दिन सुबह साढ़े आठ बजे शालिनी उनके यहां हाजिर थी. वह उस दिन के कोर्ट केस के कागजात तैयार कर रही थीं. कागजात तैयार करते हुए उन्होंने कहा, “शालिनी, पन्द्रह मिनट में पूरा घटनाक्रम बता दो. माफ करना, मैं तुम्हें आज चाय नहीं पिला पाऊंगी. मेड जा चुकी है और ड्रायवर अभी आया नहीं है. मुझे तैयार होना है. मेरे पास बस पन्द्रह मिनट ही हैं.”
“मैम, कल रात नितिन प्रेस से आकर बोतल खोलकर बैठ गया था. पहली बार पीते देखा. अनुमान तो था, लेकिन घर में या मेरे सामने कभी नहीं पी थी. शादी से पहले ही मैंने उसे कहा था कि मुझे ड्रिंक पसंद नहीं है. उसने शपथ ली थी कि वह नहीं पीता. लेकिन एक-दो बार जब घर आया तब मुझे शंका हुई थी. उसने कसम खायी कि उसने नहीं पी. मैंने मान लिया, लेकिन कल वह घर में बोतल खोलकर बैठा तब मैं चीखी. मेरे चीखते ही वह उठ खडा हुआ और गाली देता हुआ बोला, “बहुत हो चुका शालिनी. मैं इसके बिना नहीं रह सकता.”
“तब मेरे बिना रहना होगा. मेरे इतना कहते ही उसने मेरे गाल पर जोरदार तमाचा जड़ दिया. मैं उस समय किचन में चपाती बनाने जा रही थी. हाथ में बेलन था. मैंने उलटकर उसकी पीठ पर बेलन से चोंट की. तिलमिला गया और उसके बाद—-बुरी तरह धुनक दिया.”
“हुंह.” मेज से उठती हुई वह बोलीं, “दो दिन बाद आकर पिटीशन और वकालतनामा पर हस्ताक्षर कर जाना.” कुछ रुककर वह बोलीं, “वह रिपोर्टर है शालिनी. तुम्हें मालूम होगा कि रिपोर्टर्स को सब मुफ्त मिलता है. मैं एक अखबार के रिपोर्टर को जानती हूं जो शाम होने के साथ ही शराब में डूब जाता था. विरोध करने पर उसने शराब डालकर पत्नी को जला मारा था. अखबार का सीनियर रिपोर्टर था. नेताओं से लेकर पुलिस के बड़े अधिकारियों से जान-पहचान थी. बच गया. दूसरी शादी कर ली. खैर, उसकी छोड़ो. भलीभांति सोचकर निर्णय करना था. मेरा अनुमान है कि नितिन कभी भी नहीं छोड़ पाएगा और तुम उसे घर में पीने से रोक भी नहीं पाओगी.” एक क्षण रुककर बोलीं, “कहो, तो मैं नितिन को समझाकर देखूं.”
“कोई फायदा नहीं मैम. बल्कि वह भड़क जाएगा.”
“ओ.के. तुम दो दिन बाद शाम हस्ताक्षर करने के लिए आ जाना.”

शालिनी पांच दिनों तक नहीं आयी. अंततः उन्होंने ही उसे पांचवे दिन रात फोन किया.
“सॉरी मैम, मैं आ नहीं पायी.”
“तुमने फोन भी नहीं किया.”
“मैम, वह क्या है मैम, वह यह कि इसने माफी मांगी तो मैंने माफ कर दिया.”
“हुं!”

ऎसा तीन बार बाद में भी हुआ. हर बार उसने रात रोते हुए फोन किया. वही बात, “मैम, आज इस कमीने ने फिर मुझे रुई की तरह धुनक दिया. फिर मैंने भी उसके हाथ में काटकर उसे घायल कर दिया. कमीना रिपोर्ट टाइप नहीं कर पाएगा. मैम, कल आप पिटीशन तैयार कर रखें, मैं आकर हस्ताक्षर कर जाऊंगी. अब मैं बिल्कुल ही इसके साथ नहीं रह सकूंगी. मुझे हर कीमत में तलाक चाहिए ही.”
लेकिन कहकर भी शालिनी नहीं आती रही. जब वह उसे फोन करके पूछतीं, उसका उत्तर होता, “मैम, इस बार भी इसे छोड़ती हूं.”
इस बार भी शालिनी पिटीशन में हस्ताक्षर करने नहीं आयी. उन्होंने हर बार की तरह फोन किया और पूछा, “तुम कहकर भी तलाक के कागजातों में हस्ताक्षर करने नहीं आती. आखिर तुम इतना सब सहती क्यों हो!”
“सॉरी मैम.” एक क्षण रुककर शालिनी बोली, “वह क्या है मैम, यह मारता तो है मैम, लेकिन क्या है कि यह कमीना मुझे प्यार भी बहुत करता है.”
“ओह!”
–0–

रूपसिंह चन्देल

रूपसिंह चन्देल- कानपुर के गांव नौगवां(गौतम) में 12 मार्च,1951 को जन्म। कानपुर वि.वि. से हिन्दी में पी-एच.डी.| ’रमला बहू’,’पाथर टीला’, ’नटसार’,’गलियारे’,’दग़ैल’ चर्चित उपन्यासों सहित 21 उपन्यास, 21 कहानी संग्रह,5 संस्मरण पुस्तकें,4 आलोचना पुस्तकों सहित बाल साहित्य,यात्रा संस्मरण, लेव तोलस्तोय की जीवनी,उनका उपन्यास ’हाजी मुराद’,उन पर 30 संस्मरण (तोलस्तोय का अंतरंग संसार), दॉस्तोएव्स्की के पत्र और उन पर संस्मरणों के अनुवाद, दॉस्तोएव्स्की की मौलिक जीवनी-’दॉस्तोएव्स्की के प्रेम’ सहित 85 पुस्तकें। 6 आलोचकों द्वारा साहित्य पर आलोचना पुस्तकें,10 उपन्यासों के मराठी और 3 उपन्यासों के कन्नड़ अनुवाद। उत्तर हिन्दी संस्थान से ’साहित्य भूषण’,रूस का ’वी.एम.तेरेखोव स्मृति सम्मान’,आचार्य निरंजन नाथ सम्मान और हिन्दी अकादमी सम्मान.
संपर्क – 8059948233

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