मैं पिछले तेरह सालों से ‘अपना घर’ ओल्ड एज होम की मैनेजर हूँ। हर बार… हमेशा… कोई बेटा या बेटा-बहू आते और भरी हुई आँखो और कंपकपाते होंठो वाले किसी बुजुर्ग को छोड़कर चले जाते। जब तक उन्हें छोड़ने वाले उनकी आँखों से ओझल न हो जाते तब तक वे देखते रहते। कई बार बुजुर्ग टकटकी लगाये उनके वाहन के पीछे उड़ रहे धूल के गुबार को शान्त होने तक देखते रहते। शायद इस उम्मीद में कि… हो सकता है, उन्हें छोड़ने के बाद बच्चों के दिल में उनके लिये प्यार उमड़ आये और वे उन्हें वापिस अपने साथ ले जायें।
मुझे उन झुर्रियों से भरे चेहरे में बिल्कुल उस बच्चे जैसी मासूमियत और उम्मीद नज़र आती जो उसके माँ-बाप द्वारा उसे झूलाघर में छोड़ते वक्त होती।
सच पूछो तो उन बुजुर्ग चेहरों के साथ मैं भी हर बार यही चाहती हूँ।
उनकी गाड़ियों के पीछे उड़ता धूल का गुबार धीरे-धीरे शान्त होकर सड़क पर जा बैठता… मानो फिर जब कोई अपने घर के बुजुर्ग को छोड़कर जायेगा, उसकी गाड़ी के पीछे भागने के लिये सुस्ता रहा हो।
पता नहीं यह सच है या मेरी आँखों का भ्रम, जब कोई गाड़ी किसी और काम से ‘अपना घर’ आती तो ये धूल का गुबार उनके पीछे इस तरह नहीं भागता… पर जब कोई गाड़ी किसी बुजुर्ग को छोड़कर जाती है तो ऐसा लगता है मानो ये धूल उड़-उड़कर उन्हें रोकना चाह रही हो और कह रही हो कि अपने घर की शान को साथ ले जाओ, इधर मत छोड़ो। कई बार लगता कि बस… अब चमत्कार होने ही वाला है।
पर तेरह साल में ये चमत्कार कभी नहीं हुआ।
आज शाम के समय मैं पेपर्स को फाइल में अटैच कर रही थी तभी एक आवाज सुनाई दी- “सुनिये…!”
मैंने देखा एक नया जोड़ा मुस्कुराते हुये खड़ा था। उन्हें देखते ही मेरा मन कसैला हो गया। मैंने अपने मन में कहा, “लो फिर आ गये अपने बोझ को उतार फेंकने।” पर मैंने औपचारिक बने रहने का प्रयास करते हुये उन्हें रिस्पॉन्स दिया।
“जी… बतायें?”
“क्या हम लोग अंदर आ सकते हैं?”
“हाँ… बिल्कुल आ सकते हैं।”
“जी थैंक्यू।”
वे दोनों अंदर आ गये, मैंने उन्हें बैठने के लिये इशारा किया।
कुर्सी खींचकर बैठते हुए पुरूषने कहना शुरू किया, “जी, मैं रवि और ये मेरी वाईफ निधि।”
मुझे पता था कि ये भी अपने किसी बुजुर्ग से छुटकारा पाने के लिये आये हैं, और मुझसे सभ्यता का चोला ओढ़कर मुखातिब हो रहे हैं।
मैं जानती थी कि यह मेरा काम है पर पता नहीं क्यों न चाहते हुये भी ऐसे लोगों के लिये मन में जो कड़वाहट थी वह जुबान पर आ ही जाती। मैंने बिना किसी औपचारिकता के उनकी तरफ एक फॉर्म बढ़ा दिया, जो “अपना घर” ओल्ड एज होम में बुजुर्गों को रखने के समय भरवाया जाता। उन्होंने फॉर्म को उलट-पलट कर देखा। मैंने पूछा, “क्या हुआ?”
तब जवाब रवि ने दिया, “जी… ये तो एडमिशन फॉर्म है।”
“हाँ… जल्दी कीजिये। ऑफिस टाइम खत्म होने वाला है। फिर कल तक वेट करना पड़ेगा।”
“जी दरअसल हमें अडॉप्शन फॉर्म चाहिये है।”
एक बारगी तो मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ।
“क्या कहा आपने?”
“हम यहाँ किसी को छोड़ने नहीं बल्कि किसी को अपने साथ ले जाने के लिये आये हैं।”
इस बार आवाज निधि की थी। मुझे अब भी इस बात पर भरोसा नहीं हो रहा था।
“किसी को ले जाने…?”
“जी हाँ… क्या यहाँ पर ऐसा कोई प्रॉसीजर नहीं है क्या?”
“जी, आप अडॉप्ट तो आप कर सकते हैं लेकिन क्या आप लोग बता सकते हैं कि, आप एडॉप्ट करना क्यों चाहते हैं? मेरे कहने का मतलब कि अब तक तो यहाँ जो लोग भी आते हैं किसी न किसी को एडमिट कराने… मतलब छोड़ने के लिये ही आते हैं।”
मेरी बात सुनकर रवि मुस्कुराया, उसने कहा- “जी, दरअसल हम दोनों ही अनाथ हैं और हमारे घर में कोई बुजुर्ग नहीं है, इसीलिए…।” आधी बात उन्होंने अधूरी छोड़ दी।
कुछ सोचकर मैंने गार्डन में बैठे, चहलकदमी करते, योगा करते और बातचीत करते बुजुर्गों की ओर इशारा किया।
“देख लीजिये। और बताइये आप किसको ले जाना चाहेंगे?
“किसी को भी…।”
तभी पत्नी उसकी बात को काटते हुये बोली- “नहीं… जिसको सबसे ज्यादा अपने घर की याद आती हो, हम उन्हें ले जाना पसंद करेंगे।”
अभी भी मेरे मन में उनके लिये पूर्वाग्रह… या फिर दुराग्रह बना हुआ था इसीलिए मुझे लग रहा था कि हो न हो ये लोग मुफ्त की नौकरानी की लालच में यहाँ आ गये हैं। इसीलिए मैंने उनको टालना चाहा।
“मुझे लगता है अभी आप लोगों को आपस में तय करना चाहिये कि आप लोग किन्हें और क्यों ले जाना चाहते हैं। क्योंकि बच्चे को एडॉप्ट करने और बुजुर्ग को एडॉप्ट करने में जमीन आसमान का फर्क होता है। उम्मीद है आप लोग मेरी बात समझ रहे होंगे इसीलिए जो भी फैसला करें, अच्छे से सोच-समझ कर करें।”
पता नहीं क्यों, पर मैं चाह रही थी कि वे किसी को अपने साथ न ले जायें। इसीलिए मैं अपनी बात बोलकर उनके जाने का इंतजार कर रही थी। तभी रवि ने कहा- “मैम, अगर आपको कोई दिक्कत न हो तो क्या मैं ‘अपना घर’ के बुजुर्गों से कुछ देर बात कर सकता हूँ?”
“मुझे दिक्कत तो नहीं है पर, अब उनके संध्या-पूजा का समय हो गया है उसके बाद डिनर और फिर सोने का… तो, आप लोग अगर कल आ सकें तो बेहतर होगा।”
“जी ठीक है। हम लोग कल कितने बजे आ जायें?”
“किसी भी समय।”
“ठीक है। कल मिलते हैं।”
वे दोनों चले गये। ऑफिस बंद करके मैं भी बुजुर्गों के पास हॉल में आई और उनके साथ बात-चीत करने लगी। अगले दिन न चाहते हुये भी शायद मैं उनका इंतजार कर रही थी, पर वे लोग नहीं आये, शाम को जब मैंने ऑफिस बंद किया तो मेरे चेहरे पर एक व्यंग्य भरी मुस्कुराहट आ गयी और मैं अपने आप से बोल पड़ी- “आये बड़े, एडॉप्ट करने वाले। घर जाकर दवा-दारू, राशन-पानी का हिसाब-किताब लगाया होगा तो फौरन विचार भी बदल गया।”
ऐसे ही दो दिन गुजर गये। तीसरे दिन मैंने ऑफिस खोला, नटराज की मूर्ति के आगे अगरबत्ती लगाई, प्रणाम करके जैसे ही मुड़ी मुझे एक चिरपरिचित आवाज सुनाई दी।
“क्या हम अंदर आ सकते हैं?”
ये तो वही दोनों थे। अब मेरे मन में उनके लिये जो पूर्वाग्रह था वह और मजबूत हो चुका था।
“जी, आप लोग फिर से?”
“जी, रवि को वायरल फीवर आ गया था, कल से कुछ ठीक हैं तो हम आज आ गये।”
यह निधि की आवाज थी। मैंने पहली बार रवि का रवि का चेहरा देखा सचमुच बीमार लग रहा था। मेरा स्वर कुछ नरम हुआ।
“ओके… आप देख सकते हैं लगभग सारे बुजुर्ग इस समय ग्राउण्ड में हैं। जाइये जिस से जो बात करनी हो कर सकते हैं। पर प्लीज एक बात का ख्याल रखियेगा, किसी को भी आपकी बातों से प्रॉब्लम न हो।”
मेरी बात सुनकर रवि थोड़ी देर खड़े होकर ग्राउण्ड में जो बुजुर्ग थे उन्हें गौर से देखता रहा फिर लौट कर मेरे पास आ गया और मुझसे एक सवाल पूछा, “आपने कहा, लगभग सारे बुजुर्ग… इसका मतलब कोई है जो ग्राउण्ड में नहीं है?”
“जी हाँ… एक आँटी हैं, मृदुला आँटी… वे पिछले महीने ही शिफ्ट हुई हैं पर वे अभी यहाँ के माहौल में ढल नहीं पाईं। खुश-मिजाज होने के बाद भी वे अपना पूरा टाइम रूम में ही बिताती हैं।”
“क्यों न हम बातचीत की शुरुआत उन्हीं से करें?” रवि ने निधि से कहा, पर जवाब मैंने दिया, “वे किसी से बात नहीं करतीं।”
”फिर भी ट्राई करने में क्या हर्ज है?”
“चलिये, कार लीजिये ट्राय।” कहकर मैं उन दोनों को लेकर मृदुला आँटी के रूम की तरफ चल पड़ी। वैसे तो एक रूम में दो लोग रहते हैं, पर इस समय मृदुला आँटी अकेली थीं।
जब हम पहुँचे और दरवाजे पर खड़े होकर देखा तो वे अपनी साड़ी को सम्हाल रही थीं।
“ये आँटी दिन भर उल्टा पल्लू सीधा पल्लू खेलती रहती हैं।”, निधि और रवि की तरफ देखते हुये मैंने मुस्कुराते हुये कहा। फिर हम तीनों अंदर चले गये।
“गुड मॉर्निंग आँटी, इनसे मिलो, ये आपसे कुछ बात करना चाहते हैं।”
जब रवि और निधि ने उनको विश किया तो उन्होंने बहुत प्यार से जवाब दिया।
“खुश रहो… बताओ क्या बात करना चाहते हो?”
निधि और रवि ने एक-दूसरे को देखा और सहमति मिलने पर निधि ने उनके हाथ को अपने हाथ में ले लिया।
“हम आपको अपने साथ ले जाना चाहते हैं ।”
“मुझे… पर क्यों?”
“क्यों कि हमारे पास कोई बुजुर्ग नहीं है।”
“अजीब हो तुम लोग, वृद्धाश्रम में भी भला कोई किसी को लेने आता है क्या?”
“हम आये हैं न।”
“क्यों… फ्री की नौकरानी चाहिये है क्या?”
मृदुला आँटी के चेहरे और आवाज में कड़वाहट उतर आई थी। मुझे लगा उन दोनों को बुरा लगेगा। पर नहीं निधि उनकी इस बात पर भी पहले की तरह मुस्कुरा ही रही थी।
“नहीं आँटी… हमारी इनकम बहुत अच्छी है। हमने ऑलरेडी हाउस हैल्पर हायर किये हुये हैं।”
“ओह! अब समझी घर के लिये केयर टेकर चाहिये।”
“उहूँ… केयर टेकर भी नहीं।”
“वह क्यों नहीं भला?”
“क्योंकि घर के हर खास हिस्से में हमने cctv कैमरे लगवा रखे हैं जो हम दोनों के मोबाइल से कनेक्ट हैं।”
“फिर क्यों चाहिये एक खर्च का अड्डा तुम्हें? अभी सब कुछ अच्छा चल रहा है तो, चलने दो।”
“क्योंकि हमने कभी नहीं जाना कि बुजुर्गों के साये में कैसा महसूस होता है?” यह काँपती हुई आवाज रवि की थी।
मैंने देखा मृदुला आँटी की आँखो के कोर से आँसू बहने लगे जिसे उन्होंने अपने आँचल से सोख लिया और खुद को कठोर बनाने की कोशिश करने लगीं।
“नहीं, मैं नहीं चल सकती तुम लोगों के साथ।”
“पर क्यों?”
“कोई बात नहीं, आप लोग ग्राउण्ड में चलिये, वहाँ भी काफी लोग हैं… हो सकता है उनमें से कोई एग्री हो जाये।”
मैंने उन लोगों को वहाँ से ग्राउण्ड ले जाने के उद्देश्य से कहा पर उन्होंने मेरी बात पर ध्यान दिये बिना ही मृदुला आँटी से बातचीत करना जारी रखा।
“पर क्यों?”
“मेरे बेटा-बहू, जब मुझे लेने आयेंगे और मैं यहाँ नहीं मिलूँगी तो मेरा बेटा परेशान हो जायेगा।”
“वे नहीं आएंगे।”
“क्या बक रहे हो, क्यों नहीं आएंगे?
रवि के यह कहते ही मृदुला आँटी किसी अनहोनी की आशंका से घबरा गयीं। पर रवि ने उन्हें जल्दी ही कंट्रोल कर लिया।
“क्योंकि मैं आपके बेटे का क्लासमेट हूँ। पहले दोस्ती नहीं थी पर सोशल मीडिया से जुड़कर हम बहुत अच्छे दोस्त बन गये थे और उसने मुझे बताया कि आपके घर से जाने के बाद वह बहुत खुश है, उसे और उसकी गर्लफ्रेंड को फुल प्राइवेसी मिल रही है। आपके वहाँ रहने से वह परेशान था।”
“क्या… उसने सच में तुझसे ऐसा कहा?”
“हाँ, मेरे पास झूठ बोलने की कोई वजह नहीं है।”
“लेकिन कभी अगर उसे मेरी याद आयी तो वह यहाँ ही आयेगा मुझे लेने, क्योंकि यहीं छोड़कर गया था।
“अब वह कभी नहीं आयेगा।”
“मतलब?” तड़पकर पूछा मृदुला आँटी ने, जिसका जवाब बड़ी शान्ति से दिया रवि ने, “क्योंकि, वह अपनी गर्ल फ्रेंड से शादी करके विदेश में शिफ्ट हो गया है। वह भी पर्मानेंट।”
“सच?”
“बिल्कुल!” सुनकर मृदुला आँटी का चेहरा उदास हो गया। लेकिन रवि ने उनका हाथ पकड़ा और जमीन में घुटनों के बल बैठते हुए बोला- “अब तो चलो माँ, मेरा छोटा सा घर आपका इंतजार कर रहा है।”
“ठीक है।”
मृदुला आँटी की सहमति मिलते ही वो दोनों मुझसे मुखातिब हुये।
“ठीक है, आप लोग ऑफिस में आकर पेपर वर्क कंप्लीट कर लीजिये। तब तक आँटी जी अपनी पैकिंग कर लेंगी।”, मैंने सपाट लहजे में कहा।
“रवि, तुम पेपर वर्क कंप्लीट करो मैं माँ की पैकिंग में हैल्प करती हूँ।”, मेरी बात सुनकर निधि ने रवि से कहा।
जब रवि ऑफिस में आया तो उसके चेहरे पर एक आत्म-सन्तुष्टि का भाव था जो एकदम अलग था। मेरी अनुभवी आँखो से वह छुप न सका।
“झूठ क्यों बोला मृदुला आँटी से?”
मेरे पूछते ही पहले तो वह थोड़ा हड़बड़ा गया पर जल्दी ही नॉर्मल होते हुये जवाब दिया, “बहुत जरूरी था।”
“कोई जबरदस्ती तो नहीं है, पर मैं वजह जानना चाहूँगी।”
“इनका बेटा अब इस दुनिया में नहीं है। उसने मुझसे प्रॉमिश लिया था कि उसकी माँ को बेटे की कमी महसूस नहीं होने दूँगा।”
“ओह सॉरी… पर कैसे… क्या हुआ था उसे?”
“ब्लड कैंसर… लास्ट स्टेज थी जब पता चला। वह मुंबई में ट्रीटमेंट करवाने जा रहा था जब उसकी मुझसे मुलाकात हुई। हमारी दोस्ती हो गयी। वह आँटी को लेकर बहुत परेशान था। मैं अनाथ था, लगातार उसके संपर्क में रहा।”
“कब की बात है यह?”, पूछते हुये मेरी आँखों में आँसू थे।
“तीन महीने पहले जब वह आँटी को यहाँ छोड़कर सीधा मुंबई हॉस्पिटल गया था। फिर पिछले हफ्ते… मैंने ही उसका फ्यूनरल किया था और मैं ही उसकी अंतिम इच्छा पूरी करूँगा… मेरी माँ को हमेशा खुश रखना, भले ही मैं उनकी नजरों में विलेन रहूँ।”
“पर एक बात और है जो मेरे मन में हिलोरे ले रही है।“
“जी, कहिये, क्या आपको लगता है कि मैं उन्हें खुश नहीं रख पाऊंगा?”
“नहीं, दरअसल बात वो नहीं है, मैं सोच रही थी, जब आपको मृदुला जी को ही ले जाता था तो आपने ये किसी भी बुजुर्ग को अडॉप्ट करने का अभिनय क्यों किया?”
“दरअसल मैं चाहता था कि आपको या माँ मृदुला को इस बात का शक न हो कि हम उन्हीं को ले जाने आये हैं, लेकिन बातचीत का रुख कुछ ऐसा हुआ कि घुमाफिरा कर ये रहस्योद्घाटन करना ही पड़ा।“
रवि से ये बातचीत हो ही रही थी कि पीछे से अचाज़ आई “चलें..?”
देखा तो सामने निधि मृदुला आँटी का ट्रॉली बैग लेकर खड़ी थी और आँटी मुस्कुराते हुये अपनी साड़ी का पल्लू सम्हालते हुये उसके पास आकर खड़ी हो गईं।
तीनों गाड़ी में बैठे। गाड़ी ने तेज रफ़्तार पकड़ी, उनकी गाड़ी के पीछे उड़ता हुआ धूल का गुबार ऐसे लग रहा था मानो उनके कदम चूमने को बेताब हो।
परिचय :
पूजा अग्निहोत्री
जन्म – 4 सितंबर
जन्मस्थान – छतरपुर (मध्य प्रदेश)
शिक्षा – इंटरमीडिएट (विज्ञान संकाय), स्नातक (कला संकाय), परास्नातक (अंग्रेजी साहित्य), पीजीडीसीए।
संप्रति – स्वतंत्र लेखन, पटकथा लेखन, ।
अभिरुचि – पाककला, पोशाक सज्जा।
प्रकाशित / अप्रकाशित – लघुकथा कलश, किस्सा कोताह, विश्वगाथा, श्रावन्ति (दक्षिण भारतीय हिंदी प्रचारिणी महासभा), दृष्टि, क्षितिज, क्राइम ऑफ नेशन, पलाश, धर्मयुग, इत्यादि पत्रिकाओं एवं समाचार पत्रों में लगातार लघुकथाएँ, कविताएँ, आलेख आदि प्रकाशित।
साझा संकलन – काव्य पुंज, दास्तान-ए-किन्नर।
यूट्यूब चैनल (किड लॉजिक्स, बेडटाइम स्टोरी) के लिये पटकथा लेख ।
विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में साहित्यिक पुस्तकों की समीक्षा प्रकाशित ।
मोबाइल – 7987219458
ईमेल – agnihotrypooja71@gmail.com
पता : पूजा अग्निहोत्री W/O श्री प्रदीप अग्निहोत्री
रूम नंबर- 1236
उर्जानगर ‘C’ ब्लॉक
बिजुरी
अनूपपुर (म. प्र.)
पिन- 484440