कहानी समकालीनः आज भी-इंदु झुनझुनवाला

उस दिन पूरी रात समझाया था उसे , फिर भी बात उसकी समझ में नहीं आई , मुझे लगा ये लड़की पागल है।
इतनी -सी बात इसे समझ में नही आ रही।
मेरी सहेली की छोटी बहन थी वो।
घर में सभी ने समझाया था, पर वो नहीं समझी तो मझे लगा वो मेरा बहुत सम्मान करती है , जरूर मेरी बात मान लेगी
हुआ भी यही। रा मैं उसके साथ थी इसी लिए।
उसने मेरी बात ध्यान से सुनी भी, समझी भी।
पर घूम फिरकर ढाक के तीन पात।

तब नहीं समझ सकी मैं उसको।

पर तब मुझे यही लगा कि वो दुनिया की सबसे बडी बेवकूफ लडकी है, जो देखते हुए भी मक्खी निगलने तैयार है, या यूँ कहूँ निगलना चाहती है दिल से।

आज बात समझ आई है सालों बाद , जब मैं भी उस जैसी सी स्थिति में पहुँची हूँ।

हुआ यूँ , कि वो पढ़ने गई दिल्ली ,,,
दिल्ली दिल वालों का शहर कहलाता है, क्यूँ मुझे नहीं पता ।कितनी बार गई हूँ, पर मुझे तो बाकी शहरों जैसा ही लगा ।हाँ एक बात है , हर शहर की हवा की खुशबू उसका संदेश कुछ अलग ही लगता रहा है मुझे।

मुम्बई भाग-दौड का संदेश देती फिरती है तो कोलकता भीड़भाड का । चैन्नई में एक ठहराव है तो बैंगलोर शान्ति से जिए जाने का ,,, हालाँकि अब ये पुरानी बातें हो गई।

खैर तो मैं बात कर रही थी पूर्वी की ,,,
मुझसे उम्र में करीब चार-पाँच साल छोटी होगी।
मुझे बहुत मान देती थी , अपनी बहन , यहाँतक की माँ से भी अधिक। तभी तो मेरी सारी बात स्वीकारी उसने । मैंने कहा उससे – वो सही लड़का नहीं है।
उसने कहा “जी , आप ठीक कह रही हैं।”
‘उसने तुझे बदनाम करने की कोशिश की। क्या इसे प्यार कहते हैं ? ‘
‘जी ठीक कह रही हैं आप।’
तुझपर हाथ भी उठाया ना?
जी
वो पीता भी बहुत है ।
जी
और इतना बडा फ्राड किया है उसने अपनी कम्पनी से ।
जी
फिर ऐसे आदमी से तु शादी क्यों करना चाहती है , वो सही नही है तेरे लिए।
जी, ठीक कह रही हैं आप ।
तो फिर, बता अब तेरा क्या फैसला है।
दीदी, शादी तो उसी से करनी है।

हे भगवान , आखिर क्यों?
मैं नहीं जानती दीदी, पर मैं उससे इतना प्यार करती हूँ कि उसके बिना नहीं जी सकती।
तू बच्ची नहीं हैं पूर्वी। कोई सोलह सतरह साल की भी नहीं । तूने जीवन के 23 बसंत पार कर लिए हैं। सोच, ,,,,,
तू उसके साथ खुश नहीं रह सकती ।

मैं उसके बिना भी तो खुश नहीं रह सकती ना दीदी!

हे राम, ये कैसा प्यार का भूत है,,,

दीदी, मैं सब समझती हूँ, पर मेरा दिल ,,,,
वो नहीं समझता मेरी , आप ही बोलो क्या करूँ।

मुझे लगा , कुछ नहीं किया जा सकता इस लडकी का।
नहीं मानी वो और अन्त में शादी कर ही ली। उसके एक बच्चे की माँ है, उसकी हर ज्यादती सहते-सहते अब उसके लिए जीवन बस अपने बच्चे में सिमट कर रह गया है।
पैसा बड़ी चीज है, पर खुशियाँ नहीं खरीद सकती, साधन खरीद सकती है,,,।
उलटे -सीधे धंधों से उसने पैसे तो कमा लिए, पर न खुद खुश रहा ना उसे रख पाया। रोज सुबह से ही बोतल लेकर बैठ जाता, जब मर्जी हो काम पर जाता , नहीं तो नहीं।
शाकाहारी घर में मांसाहार की बदबू शराब के साथ।
यकीन नहीं होता, शुरू-शुरू घर आता था तो पैर छूकर प्रणाम करता और कहता मैं पूर्वी को बहुत खुश रखूँगा। घर में कभी मांसाहारी भोजन नहीं बनेगा।
वैसे तो थोड़े ही दिनों में उसके रंग ढंग चौड़े आ गए थे , पर ये पागल लड़की ,,, सब कुछ जानकर भी ,,,,।

क्या दिल ऐसा ही होता है। सब कुछ जानकर भी अगर किसी से एक बार प्यार हो जाए तो बस,,, उसी का हो जाता है?
नहीं समझ आई थी उसकी परेशानी, उसकी विवशता तब मुझे ,,
पर आज आज जब मैं भी प्यार करने लगी हूँ उससे , बेइन्तहा प्यार,,,, जो उसकी खुशी के लिए कभी मर जाना चाहता था , कभी क्यों आज भी तैयार है ,,, पर आज थोड़ा फर्क आया है, अब मन इतना कड़ा तो हो गया है कि उसकी अहम की तुष्टि के लिए गलत स्वीकार नहीं करना चाहता।
आज ये सच अच्छे से समझ चुका है मन कि वो प्यार नहीं करता,, आज ही क्यों , सालों पहले ही समझ गया था ,,, फिरभी एक उम्मीद लिए चलता रहा उसके साथ, अध्यात्म और दर्शन की भाषा में इसे माया ही तो कहेंगे जो नहीं है वो दिखता है , जो नहीं है उसे सच मान बैठा है मन,,,,
और उस अन्जान डोर से बाँध बैठा है खुद को जो दिखती तो नहीं , पर है बड़ी मजबूत, कसकर जकड़ रखा है उसने दिल को ,,,,, अब मेरी सहेली कहती है मुझसे , तोडनी होगी तुम्हें ये डोरी ,,,, पर मैं,,,,,,मेरा दिल,,,,
उसका हर सच जानते हुए भी ,,,, आज भी ,,,,, पूर्वी की भाँति,,,,,।

इंदु झुनझुनवाला

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