
अहिंसा परमो धर्मः
खिड़की खुली
और तुम आए बिन बुलाए
इठलाते इतराते भयभीत करते
कितने बदसूरत और डरावने
उड़ने लगे थे चारो तरफ
कभी छुपने की कोशिश करते
गिरने लग जाते कभी पंख समेटते
अंधेरे कोनों में सांस रोके गिरे पड़े
मुक्ति की कामना में झटपटाते
सच कहूँ भयभीत तो मैं भी थी
मारना चाह रही थी तुम्हें बदहवास
अचानक हाथ रुके और दया जागी
यदि तुम सुंदर होते एक तितली होते
तो भी क्या यूँ ही आघात करती
नहीं शायद , शायद क्या पक्का ही
और अधमरे तुम्हें उठाकर कागज पर
फेंक दिया बाहर कि तुम जी सको
जानते हुए भी कि चोट गहरी थी
और तुम्हारा बचना नामुमकिन
पर ऐसे ही तो होते हैं
सारे आघात और युद्ध
निरर्थक और बेमतलब ही
विशेषतः कमजोरों पर
कभी पसंद या नापसंद पर आधारित
तो कभी बेवजह ही भय या घृणा से
शत्रु कमजोर तो दुश्मन हावी
शक्तिमान तो भागते ढूँढ पतली गली
यह क्षणिक ग्लानि और पश्चाताप
खुद ही खुद को बहलाना मात्र बस
अहिंसा परमोधर्मः बातें हैं किताबी…

कुछ नहीं बदलता
बरसते बम है भूकंप कहीं
खबरें चलतीं दिनरात
बीतती ही नहीं
शहर शहर मलबे में दबे
रोते चीखते इनसान
सुन्न हैं पर संवेदना
धरती गरम कहीं पर धरम
अहम और वहम के
भोग और इस रोष से
किसकी मदद कैसी मदद अब
जिन्दा भी तो मुरदों से पड़े
जिन्होंने तहस-नहस किया
जब वही कुछ करना चाहते
घायलों के उपचार हेतु
दवा दारु हेतु या स्व के
मान और रेखांकन हेतु
चंदा मांगते
कुछ नहीं बीतता यहाँ
कुछ नहीं सुलझता यहाँ
युद्ध तो वही है आज भी
चक्रव्यूह-सा ही जटिल
और सदियों पुराना…
शैल अग्रवाल

युद्ध और मानवता
वह कौन है?,जो घोलता है,
हवाओं में, गंध बारूद की,
वह कौन है ,जो बोता है,नफरतों के बीज,
धरती से आसमान तक…
लहुलुहान सपने हैं,
कर्मठ हथेलियों पर ,मौत के खिलौने हैं..
कौन हैं जो दहशत की रातों में जगता है,
नन्हे नौनिहालों की कोमल हथेलियों पर,
… सपनो की राख तले,
बूंद बूंद खून से लिखता है तहरीरें,
कौन है जो छीनता माँओं से शिशु अबोध,
सपने आशाओं के, किरणें उम्मीद की,
कौन है जो रचता है,अपनी ही धरती पर,
अपने ही लोगों में,
दहशत, आतंक और ध्वंश की कहानियां,
कितनी ही आँखों के सपनों को रौंद यहाँ,
छोड़ गए आंसू और दर्द की निशानियाँ,
कौन जो मानवता को कलंकित कर बार बार
लाशों के ढेर पर ..बाँसुरी बजाता है ?
मुट्ठी भर लोगों की हत्यारी सोचों में
जिंदा है दर्द कहां? पशुता ही पलती है,
जाति.सांप्रदायिकता की, विकृत भावनाओं में,
जगती पाशविकता पर दानवता हंसती है,
केसर की क्यारी में घुली हुई कालिमा है
शीतलता बांटती धरती के दर्पण में
कहां खो गई है वह स्वर्णिम अरुणिमा?
तुझमे और मुझमे फर्क ही भला कैसे?
रामायण,बाइबिल,गीता,कुरान में भी,
प्रेम ही तो पलता है,,प्रेम ही सिखाता है,
जाति वर्ग. धर्मों में.क्यों बांटे दिलो को हम?
सबसे बड़ा तो इंसानियत का नाता है…..
मानव के मन में जब मानवता बिहंसेगी
पोर पोर महकेगा अपना नव वर्ष तब.
पद्मा मिश्रा जमशेदपुर

हमे युद्ध नहीं चाहिए
धरती की सीमाओं के इस पार
और उस पार भी,
वो कौन सी आग जलती है
जो जलाती है, संवेदनाओं के पल दर पल,
जली ,बिखरी दबी राख के नीचे
मानवता, करुणा की घुटी हुई चीखें,
क्यों सुनाई नहीं देती??
क्यों लज्जित हो जाती है,
बुद्ध की करुणा,ईसा का त्याग
और विश्व शांति की भावनाएं??
बस शेष रहती है,केवल
दो व्यक्तियों की विकृत कामनाएं,
एक का अहम, दूसरे की चुनौती बन जाता है,
और इसके प्रतिकार में,
दमन भट्टियों में एक समूची मानवता को,
युद्ध की विभिषिका में,
झोंक दिया जाता है,,
इतने विवश क्यों है हम?
हम क्यों लड़ते हैं?
हम कब जागेंगे,,
जब विनाश की जहरीली हवा,
हमारे अस्तित्व को निगल जायेगी,
विज्ञान की कसौटियों पर गर्व करने वाले,
एक धमाके से,
पूरी दुनिया को नष्ट करने वाले दावों पर
एक दिन दानवी चीत्कार गूंजेगी,
और पीढ़ियां हम पर गर्व नहीं,
धिक्कार करेंगी,,
ये युद्ध नहीं चाहिए,
नहीं चाहिए स्वार्थी वैचारिक संघर्ष,
रुको, ठहरों,चीख उठी है मानवता,
उसे जीने की आस दो,
थोड़ी सी सांस दो,,,
बुझे हुए सपनों में जीवन की प्यास दो।

हम युद्ध नहीं होने देंगे
भारत की पावन माटी पर संत्रास नहीं पलने देंगे
अब युद्ध नहीं होने देंगे हम युद्ध नहीं होने देंगे
विश्वासों की छांव तले अनजाने विषधर पलते हैं
ममता की शीतल छाया में आतंकी पथ पर चलते हैं
हम देशभक्ति के दीवाने ममता को नहीं लुटने देंगे
पर युद्ध नहीं होने देंगे हम युद्ध नहीं होने देंगे
हर मन जिसका अनुगामी है वह सत्य अहिंसा लाने दो
जन गण मन का आशीष मिले वह गीत सृजन को गाने दो
बलिदानों की परिपाटी को हर युव-मन में जगने देंगे
पर युद्ध नहीं होने देंगे हम युद्ध नहीं होने देंगे
प्रज्वलित स्वस्ति के दीप मगर हर राह यहाँ भटकाती है
हमने जिनको अपना माना उनका मकसद बरबादी है
हम क्रांति ध्वजा लेकर कर में अन्याय नहीं होने देंगे
पर युद्ध नहीं होने देंगे हम युद्ध नहीं होने देंगे
काश्मीर हमारा था,अब है,वह भूमि हमारी अपनी हे
फूलों की हरी भरी घाटी,केशर की क्यारी अपनी है
तेरे नापाक इरादों को हम कभी नहीं फलने देंगे
पर युद्ध नहीं होने देंगे,हम युद्ध नहीं होने देंगे
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

युद्ध समस्या का हल नहीं
तथ्य से अनभिज्ञ मानव बुद्धि पथ अवरुद्ध है ।
हल नहीं देता समस्या का कभी भी युद्ध है ।।
हो रही अंधी लड़ाई विश्व में वर्चस्व की ।
लालसा अधिपत्य की है कामना है स्वत्व की ।।
शक्ति का करता प्रदर्शन मार्ग अनुचित चुन रहा ।
अन्य पर शासन करे यह स्वप्न प्रतिपल बुन रहा ।।
स्वार्थ- लोलुपता हृदय में हर मनुज अब लुब्ध है ।
हल नहीं देता समस्या का कभी भी युद्ध है ।।
हो रही वार्ता विफल है शांति की हर देश में ।
जी रहे निर्दोष जन आतंक के परिवेश में ।।
अस्त्र- बम- बारूद हमलों से नगर हैं काँपते ।
धूम्र के बादल घनेरे महि-गगन को ढाँपते ।।
द्वेष की ज्वाला बनाती हर मनुज को क्रुद्ध है ।
हल नहीं देता समस्या का कभी भी युद्ध है ।।
युद्ध के मैदान में संवेदना दम तोड़ती ।
क्रूरता निर्लज्जता का आवरण है ओढ़ती ।।
ढूँढती अस्तित्व अपना अब मनुजता हर दिशा ।
लीलती है सभ्यता का सूर्य लिप्सा की निशा ।।
पोंछता कातर नयन से अश्रु – धारा बुद्ध है ।
हल नहीं देता समस्या का कभी भी युद्ध है ।।
है समय अब काल की प्रस्तावना का अंत हो ।
शांतिदूतों जाग जाओ तुम सभी अरिहंत हो ।।
विश्व के उद्यान में बस फूल समता के खिलें ।
प्रेम-करुणा भावना से एक दूजे से मिलें ।।
जीत ले जो प्रीत से जग वह मनुज अनिरुद्ध है ।
हल नहीं देता समस्या का कभी भी युद्ध है ।।
संगीता चौबे ‘पंखुड़ी’
कुवैत
कवयित्री, लेखिका, समीक्षक