
माँ का मतलब
माँ का मतलब खुरदरे हाथ..
चेहरे पर झुर्रियाँ अस्त व्यस्त कपड़े ..
माँ का मतलब दौड़ना और भागना ..
माँ का मतलब त्योहार
माँ का मतलब इंतजाम. .और
इंतज़ार
माँ का मतलब अनुशासन
माँ का मतलब ..आटे से रँधा हाथ..
बर्तन बासन में लगी छाई ..
माँ का मतलब चूल्हा. .
माँ का मतलब बरी , तिलौरी , अदौरी
माँ का मतलब गर्म रोटी और सालन ..
माँ का मतलब कपड़े धोती एक स्त्री. ..
माँ का मतलब घर -दुआर बुहारती औरत ..
माँ का मतलब धान फटकती औरत
चावल से कंकर पत्थर चुनती औरत
माँ का मतलब तुलसी पिंडा
माँ का मतलब जेठ की दुपहरी ..
पसीने से तरबतर…रसोई में भात बनाती हुई एक
स्त्री ..
माँ का मतलब ताकना या ध्यान
देना कोई भूखा तो नहीं सो गया ..
माँ का मतलब सुई ..
माँ का मतलब काज और बटन
माँ का मतलब अल्पना. .
माँ का मतलब दीपावली
माँ का मतलब
वैभव
माँ का मतलब
समृद्धि
माँ का मतलब अन्नपूर्णा
माँ का मतलब स्वाद
माँ का मतलब रँग ..
माँ का मतलब प्यार
माँ का मतलब विश्वास
माँ के ना होने पर असुरक्षा ..
माँ के ना होने पर घबराहट
माँ का मतलब निश्चिंतता ..
माँ का मतलब आश्वस्ति. .
माँ के होने पर लापरवाही ..
माँ का मतलब
दुनिया की हर मुसीबत और
परेशानी का बौना हो जाना है
माँ का मतलब
दर असल एक कवच है
जिसके अँदर पूरी दुनिया सुरक्षित है !

संभावनाएँ
जब जाओ ईश्वर की चौखट
पर
तो प्रार्थना करना और प्रार्थना में
ये माँगना की हमारी धरती बची रहे
एक बीज के रूप में जिसमें
बची रहे उस पर की हरियाली ..
और बचा रहे हर कुँए में पानी
बचा रहे हर खेत की मेंड से चार मेंड
दूर हरा भरा पेंड
और माँगना अपनी प्रार्थना में कि
बचे रहें हमारे हल
-बैल और खेती करने वाले
किसान ..
माँगना -अपनी प्रार्थना में कि
बची रहें ऋतुएँ और बारिश का पानी ..
और साइबेरिया से ठंड में लौट आने
वाले पक्षी
और जब प्रार्थना करना तो ये भी माँगना
कि हमारे जँगल बचे रहें
बचे रहें उसमें शेर , चीता ,भालू , हाथी ,
कोयल , कौए ,
ताकि , हमारा बचपन और
जँगल की कहानियाँ बची रहें
जहाँ हमारा बचपन जिंदा रहे
और इस तरह से ही हम
इस धरती पर बचे रहें ..!
एक बीज के रूप में
हम सबको बीज बना देना और
रख लेना अपने पास सुरक्षित!
हमारे बचपन , खेत ,खलिहान, हरियाली , हल
बैल को एक बीज में परिवर्तित कर देना !
जिससे
धरती पर उग आये बार – बार जीवण !
महेश केसरी, बोकारो, झारखंड

कुछ नहीं बीतता
प्यार या नफरत
ऊब और बेइमानी
और अर्थहीन यह
विध्वंसक खून खराबा
हिंसा से भरी लड़ाई
बस बीत जाते हैं
वक्त और इनसान
याद आने को
कभी पतछाने को

ख्वाइशों की तरह
बादल ये मनचला उड़ चला मन पाखी की तरह
अटका भटका लहराया धरती पे आँचल की तरह
मेघ सांवरे बरसेंगे धरती का दामन भर देंगे
सूखी धरती को हरा कर देंगे सावन की तरह
आकाश ज्यों झुक आता है तैरे हो तुम आंखों में
प्रेम की फुहार बन फिर कितनी ख्वाइशों की तरह

ख्वाइशों की तरह…..
हर सुबह एक सपना
सामने फैली सड़क को
मेरे गांव से जोड़ता
दिखता चिमनियों का नहीं
बापू की चिलम का और
मां के चूल्हे से उठता धुँआ
इन्तजार में उदास वो आँखें
मुड़-मुड़कर दरवाजा तकतीं
कोइ नहीं वहाँ जानती-समझती
सिकती रोटी की गरम वो महक
गुड़गुड़ाते पेट में खलबली मचाती
नन्हकू की लारभीगी मुस्कान
परबतिया की चमकती सिंदूरी मांग
सूनी बाहें बाट तकती, मुझे पुकारतीं
भग्न सपनों की किरच रौदता
पोटली में आस को मरहम-सा संजो
चल पड़ा हूँ मैं आज
चुभती-जलती आसहीन आँखों में
लेकर वही प्यास, चमकीली आस
बिना रुके, बिना थके, भूखा-हारा
यह सुबह और यह सड़क
अब बस एक सड़क ही तो नहीं
जीने की वजह है मेरी
हर घाव भरती
अपनों तक ले जाती
बेशुमार इन
ख्वाइशों की तरह…
शैल अग्रवाल

मेरा घर है कारागार
आगे लोहे के दरवाजे
पीछे पथ्थर की दीवार
दाँये बाँये अंधी गलियाँ
मेरा, बस, इतना संसार ।
रात और दिन क्या होते हैं ?
क्या नभ का आकार-प्रकार ?
हवा,. बता दे, कैसा लगता
इन दीवारों के उस पार ।
वर्ष, महीने, दिन न गुजरते
फिर क्या उम्र गुजरती है ?
जीवन, मृत्यु, निराशा, आशा
केवल शब्दों का व्यभिचार ।
हँसना, रोना, कहना, सुनना,
सोने, जगने का व्यापार
अर्थहीन मेरे हित सब कुछ
मेरा घर है कारागार ।

ऊमस
कोलाहल, वह अट्टहास, वह स्मित-अपनापन,
वह मिलना, वह चौक, वहां घंटों बतियाना,
वे इतवार, धूप में सिकना, चाय पकौड़े,
एक हवा के झोंके से सब बिखर गए क्या,
या, सारे रिश्ते केवल छिछले, सतही थे ?
धूप सहमकर किसी शाख पर जा चिपकी है
श्यामल बादल थके-थके, नभ के कोनों में
लाल हुए जा रहे विफलता की ब्रीड़ा से
हवा अधर पर उंगली रख कर मौन हो गयी
यह ऊमस, बेबसी, कहाँ से आ टपकी है !

जंगल
मेरी छाती पर उगते हैं रोज़
बिरवे ( नयी – नयी कामनाओं के)
बहुतेरे हो जाते हैं अकाल काल कवलित
और कुछ बढ़ कर पेंड हो जाते हैं
और कुछ दूसरे
थककर नभ छूने के निरन्तर प्रयास से,
ज़मीन से दूर हटते हटते,
धराशायी हो जाते हैं
देखता रहता हूँ मैं
क्रम आवागमन का
मैं तो जंगल हूँ ।
मुझमें बसते हैं बाघ, भालू
और न जाने कितने दरिंदे
किसी स्याह खोह में
लटके रहते हैं असंख्य चमगादड़
ठेंगे पर ऊँचाई और जूती पर आसमान;
मुझमें बसते हैं हजारों खरगोश
धवल, निरीह, कोमल और चंचल
स्नेह की खिलती धूप की तरह;
मैं सबको जानता हूं
मैं तो जंगल हूँ ।
रोज़ कटते हैं मेरे हरे – हरे पेंड
मेरी जानकारी में होती है पोचिंग
कुछ दाँत, सीँग और चमड़ों के लिये
मेरे हिरनों के लिये
बाघ हैं, चीते हैं, भेंड़िये हैं
और सबसे ऊपर आदमी हैं
भूखे, आक्रामक, निर्दय लोभग्रस्त
मैं दुआ माँगता हूँ उस चंचल छौने के लिए
जो कुछ नहीं समझता
पर जिसकी नर्म चमड़ी से बनी जूतियां
मुंहबोले दाम पर बिकती हैं
इसके सिवा क्या कर सकता हूँ मैं? मैं तो जंगल हूँ ।
सुधांशु मिश्र

विस्थापन
विस्थापन का गुण यह है कि आदमी
कभी अपनी जगह से पूरा जा नहीं पाता
पानी भरे ज़ंग खाये ड्रम की तरह
दाग़ों या गीले निशानों में रिसता रहता है
व्यापकतर होता है और सिद्ध करता है कि
कोई भी स्थापित नहीं है सिवाय उस पेड़ के
जिसे आँधी की प्रतीक्षा है शैया-व्रणों से बचने को
करवट बदलना व्रणों का विस्थापन है
वे त्वचा में स्मृतियाँ बसाकर
मन के सिर में जूएँ बन जाते हैं
और दर्द के नाख़ूनों को
खुजलाने को प्रेरित करते हैं ।
स्थापन और विस्थापन के बीच
देश काल में बदल जाता है
काल कसक में कसक रिक्तता में
और रिक्तता
न जाने किस में बदल जाये
या न बदले ….

ढिठ
गोरे ने काले को मारा
लाल ख़ून निकला
गोरे ने भूरे को मारा
लाल ख़ून निकला
काले और गोरे ने भूरे को मारा
लाल ख़ून ही निकला
ख़ून कितना अजीब है !
गौतम सचदेव

कुछ नहीं बीतता
उम्र,
बीतती रही मेरी देह की तहों में,
घटनायें जितनी भी घटीं,
सब धमनियों में जा बसीं।
सीने में धड़कते हैं;
बचपन के किस्से
खून में जवानी की कहानियाँ ….अल्हड़ बचकानियाँ
देह वक्त के साथ ढ़ल रही है
पर मेरी पूरी कहानी मेरे भीतर ही निरंतर चल रही है।
तुम्हारी छुअन,
उसकी आँखॆं,
बच्चों के नन्हें चेहरे,
माँ-बाप, घर की गंध
भाई-बहनों की हँसी, झगडे,
सब जैसे हड्डियों से चिपके हैं
और तो और
वो किराये का मकान,
सड़कें, नुक्कड़,
नीम का पेड़,
पहाड़ी चमेली की खुश्बू
जैसी की तैसी है!!
ये यादें नहीं है,
ये जीवित जगह है
ये गये हुये लोग और रिश्ते नहीं,
मेरे जीवन के मील के पत्थर हैं,
जो न बीते हैं, न रीते हैं
केवल मेरी उम्र की सड़क पर अपनी-अपनी जगह ठहर गये हैं
जिन्हें मैं अब भी छू सकती हूँ,
पलट कर देख आती हूँ!
जब-जब
अपने में उतरती हूँ
सब कुछ ज्यों का त्यों पाती हूँ॥

लड़की की माँ
सो नहीं पाई है माँ ज़माने से..
बेटी के लिये
एक सही पुरुष की तलाश में
भटकती रही है सदियों तक
और खोजबीन कर भी
ला नहीं पाई एक ऐसा पुरुष जो
दे सके उसकी लड़की को
एक मज़बूत घर,
ऐसा घर, जिसकी दीवारों पर
वो अपनी प्रतिभा से
खुशियों के बूटे
बना सके!
जो ना लाये बादलों का हिंडोला
पर ज़िंदगी को न झुलाये हिंडोले सा..
जो गीत गाती लाडॊ के सुर सुन
मुस्कुरा सके,
कहे “वाह, बहुत मिठास है तुम्हारी आवाज़ में”
और फिर बनाये रखे उस मिठास को
अपनी मिठास से।
पर हर सदी में मात खाती रही माँ!
कभी
ऊँचे बाज़ार भाव
तो कभी सही पुरुष का अभाव
तो कभी अपने सामान में खोट
बताती आँखों में तोल-मोल!!
चिन्ताग्रस्त ही रही है माँ सदियों से,
कि अचानक उस दिन
घनघनाते फोन पर सुना उसने
गुनगुनाती बेटी को…
“माँ,
खोज लिया है मैंने अपना वर
हम मिल कर बनायेंगे,
वही तुम्हारे सपनों वाला घर।
जहाँ खर्चों पर खर्च होंगे हम दोनों
और सँभालने को भी सँभलेगे हम दोनों।
जहाँ रसोई और टी.वी. रिमोट पर बराबर की हिस्सेदारी रहेगी।
हमारे हाथ गुस्से में नहीं,
केवल सपने पकड़ने को उठेंगे
और आँसू निकलेंगे केवल प्याज़ काटने पर!
मैं बनाऊँगी अपनी खुशियों के फूल घर की दीवारों पर,
तुम्हारी पलकों में थके इंतज़ार को
अब जगना नहीं पड़ेगा, सुबह की ओस तक…
माँ, अब तुम सो सकती हो चैन से!”
डॉ. शैलजा सक्सेना