कविता आज और अभीः जाने किस आस में


नीरो
नीरो फिर अपनी लय-तार-धुन बजा रहा
सपनों का रोम जल रहा, वह दिखा रहा
कितना था विस्तृत साम्राज्य
स्नेह-प्यार का
पावन संस्पर्शों के
उष्मित संसार का
निभृत विष्फोटों को वह बाहर ला रहा
पट्टों-स्तंभों पर
अंकित इतिहास था
दुर्ग थे उपलब्धि के
मन का प्रकाश था
नीरो अब इन सबकी ईँट-ईंट गिरा रहा
यह नीरो-जो न हुए हम,
उसका दर्द है
गहरे अभावों की आँधी की गर्द है
अब वह अहसासों की कीलें चुभा रहा
स्वप्न जहां होते हैं
नीरो भी होता है
जो न उसे जान सका, जीवन भर खोता है
नीरो विश्वास की धज्जियां उड़ा रहा
-सतेन्द्र श्रीवास्तव

जाने किस आस में

ध्वस्त मलवा हैं शहर पर शहर
बुझी आँखों से इन्दजार करता
अभी भी बिछुड़ों का, अपनों का
जाने किस आस में

नहीं मछलियों को मिल सकती
पानी की अब नागरिकता
और पंछियों को आकाश की
घर परिवार शब्द हुए अतीत के
अपने ही घरों से निष्कासित सब

चारो तरफ बस धुँआ-धुँआ
बजते सायरन और मरते-मारते लोग
फिर भी टूट और जुड़ रही उम्मीदें
जाने किस आस में

हर तरफ़ बस स्वार्थ का कब्जा
नाथ नहीं कोई अनाथों का
दुनिया बेहतर बनाने का
ऊपर से क्रूर एक दावा
मखौल उड़ाता भूखे-नंगों का

न कोई आस ना उम्मीद शेष
फिर भी प्रार्थना कर रहे लोग
मंदिर मस्जिद चर्च और गुरुद्वारे
जाने किस आस में?’

शैल अग्रवाल

धरती हूँ मैं

कहाँ हैं मुझे चाहने वाले
मुझे ये मां कहते थे
मेरी पूजा करते थे
इनका इंतजार करती हूँ मैं
धरती हूँ मैं

अबतक तो मैंने सबको था पाला
सोखी बरखा और तपती ज्वाला
मेरी गोद में तुम जो खेले बढ़े
मुझे ही मौत की चादर उढ़ाते
तुम्हारा पेट आज भी भरती हूँ मैं
धरती हूँ मैं

आग यह सीने में कैसी लगा दी
सागर उबला लहरें झुलसीं
पिघल रहे मेरे हिम शिखर
उजड़ चुके पक्षियों के घर
अगली होगी अब तुम्हारी बारी
पल-पल आंसू झरती हूँ मैं
धरती हूँ मैं

कलुषित नदियों का बहता जल
जहरीली हवाओं का उठ रहा चक्रवात
पलपल थोड़ा-थोड़ा मरती हूँ मैं
बचा सको तो बचा लो मुझे
कैसे अँधेरों में भटकी हूँ मैं
धरती हूँ मैं

खिलो महको झाँको दरारों से
उपेक्षित अँधेरी उन झिर्रियों से
टूटते ढहते बेबस किनारों से
उठो और हाथ दो, रौशनी करो
तुम्हारी अपनी हूँ मैं
धरती हूँ मैं

शैल अग्रवाल

तेज़ नाखून से ये वार करते है,
खून से ये बहुत प्यार करते है !
पास इनके कफ़न लेके जाना,
ये तो लाशों का व्यापार करते है !!
चीख से हर शहर भर गया है,
कोई बहरा इसे कर गया है !
क़त्ल इतने हुये है यहाँ पर,
दर्द भी दर्द से मर गया है !!
मौत का साजों – सामान लेकर,
खौफ गोलियों में रहना लगा है !
देख कर एसा बेदर्द मंजर,
खून आखों से बहने लगा है !!
दहशत की गली से कभी न गुज़ारना,
यहाँ बेबस जिंदा जलाये गये है !
बच गई चंद पत्थर कि आखें,
जिनके भी सपने बुझाये गये है !!
छोटी छोटी अंगुलियाँ न देखो,
हादसों की कहानी बड़ी है !
माँ के अंचल में छिपाने को आतुर,
ढेरों नन्हे बच्चों कि लाशें पड़ी है !!
कल तो आँगन में किलकारियां थी,
फूल खिलने थे, फुलवारियां थी !
सास लेते मगर ये न जाना,
इन हवाओं में चिंगारियां थी !!
वह वाही ढेर है विस्तारों का,
स्वप्न जिस पे सवारें गये थे !
खून के दाग अब चीखते है,
लोग दहशतगर्दी में मारे गये है !!
कल इन्हें तो पता भी नहीं था,
इतनी बेदर्द तकदीर होगी !
वक़्त कि कील पर झूलने को,
आज इनकी भी तस्वीर होगी !!
चीख उभरी है फिर बस्तियों में,
खून फिर से बहा जैसे पानी !
लाख खुनी असलहे आज़मा लो,
मानवता लिखेगी अमन की कहानी !!!
– ज्योति नारायण, हैदराबाद


जीवन की कीमत क्या होगी

जो मानवता की हत्या कर,युग धर्म, न्याय को भूल गए
उन पथ -भटके लोगों में,जीवन की कीमत क्या होगी
मन की आशाएं सपनों के ,जब‌ शीशमहल में पलती हैं,
सुख के प्रभात की उम्मीदें, एक नया सबेरा बुनती हैं ,
आतंक बिछाती रातों में सूरज की‌ कीमत क्या होगी?
जब चारों ओर निराशा हो, धूमिल मन की अभिलाषा हो
तब मौन प्रार्थना के स्वर में बस नव प्रकाश की आशा हो
उस गहन तिमिर में उदभासित,मन ज्योति किरण का प्यासा हो
तब बूंद बूंद उम्मीदों में सावन की कीमत क्या होगी,
उन पथ -भटके लोगों में,
जीवन की कीमत क्या होगी

पद्मा मिश्रा, जमशेदपुर


सूर्यास्त
हर सूर्यास्त अवसान नहीं होता
.न जीवन का.न मन का
.बस एक अंतराल है.समय का
.जैसे लहरों का उत्थान पतन.
जैसे दिन भर थककर सोया सूरज..
अंधेरे को चीरकर पुन: जागता सूरज.
कल का आकाश जगमगायेगा फिर.
आशा की किरणें फिर मुसकरायेंगी।
दोनो ही प्रकृति के सुंदर उपादान.
आदि और अंत.
सूर्योदय और सूर्यास्त।

पद्मा मिश्रा, जमशेदपुर

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