कनक हरलालका, पद्मा मिश्रा, राजनंदनी रावत

पाँच लघुकथा

कनक हरलालका

लघुकथा-१
वैष्णव जन तो तेने कहिये…

कई दिनों से वह सपना उसे रोज सुबह सुबह जगा देता।
सपने में आकाश से जैसे हर तरफ से रंगीन किरणें निकलती थी किन्तु केसरी और हरे रंग की किरणें मिल कर धरती तक पंहुचते पंहुचते लाल रंग में बदल जाती और फिर रक्त सदृश्य बहने लगतीं।
वह भयभीत और परेशान सा उठ बैठता।
उसने सुन रखा था सुबह का सपना सच होता है।
“अरे… सुबह सबेरे कहाँ चल दिए?”
“हूँउऊऊ..”
“पूजा की आपने..? कई दिन से देख रही हूँ आपने पूजा करना छोड़ रखा है।”
“हँअअअ..”
“ज्यादा नहीं तो कम से कम घण्टी बजा कर हाथ हो जोड़ लिया कीजिए..”
“हूँउउऊ..”
चलते चलते मन्दिर के सामने पंहुचे ही थे कि “अरे श्रीमान जी.. लीजिए प्रसाद लीजिए”
“…..”
“अरे..क्या हुआ..?”
“अच्छा.. मिठाई.. दीजिए..”
“मिठाई नहीं.. प्रसाद है प्रसाद.. बाबू सीताराम जी ने भोग लगवाया था..”
“ओहो.. लड्डू है मोतीचूर का..बढ़िया है..कहाँ से मंगवाया..?”
“अरे लड्डू नहीं… प्रसाद है प्रसाद..!!”
“हूँउउ..नुक्कड़ वाली दुकान का लगता है..अच्छी मिठाई बनाता है..स्वादिष्ट है…”
“सठिया गए हो..पगला गए हो..विधर्मी हो गए हो…सुबह सुबह मिजाज खराब कर दिया है..”
तभी उन्होंने देखा एक छोटी-सी बच्ची लालायित भरी नजरों से मोतीचूर के लड्डू को देख रही थी ।
“ले बिटिया !… लड्डू खा ले ।”
“चचा जी बहुत भूख लगी है मदरसे पढ़ने जा रही थी … लड्डू देख रुक गई ।”
बच्ची हँसते हुए लड्डू लेकर खाने लगी ।
“हाँ ! अब हुआ यह प्रसाद।” कहते हुए आकाश में सदियों से सुनहरे रंग की किरणों से मण्डित सूर्य के समक्ष दोनों हाथ जोड़ कर नतमस्तक हो गए।

लघुकथा-२
लोहे के नाखून
मेरे सामने वाली जगह पर आज एक नया रंगरूट अपने दो जम्हूरों के साथ, जो खरगोश बने हुए थे , तमाशा जमा रहा था।
गाँव में मेला लगा हुआ था। वैसा ही मेला जैसा कि हमारे देश के बारह महीने के तेरह त्यौहारों पर किसी न किसी गाँव में लगा रहता है। पर इस मेले में खास बात यह थी कि इसमें मैंने भी थोड़ी सी जगह किराए पर लेकर चूड़ियों की दुकान लगाई हुई थी। आज मेरे सामने की जगह पर रोज वाला मदारी अपने बन्दरों की जोड़ी के साथ नहीं था।
“देखिए मेहरबानों…कदरदानों… बिल्कुल नया पर बहुत पुराना तमाशा… आइए..आइ..ए…”
तमाशबीन जमा थे तमाशा जारी था।
खरगोश अपनी पत्नी से कह रहा था “अरे भागवान..सुनती हो यह शेर हमारे परिवार को एक एक करके नष्ट करने पर तुला रहता है। मैंने कल रात उसकी गुफा के बाहर छिप कर उसके शिकार करने का राज जान लिया है।उसने अपनी पत्नी से पूछा ‘मेरी आँखें लाल है ! मेरी पूंछ तनी हुई है ! मेरे नाखून कड़े व तेज हैं !’ उसकी पत्नी के हाँ कहने पर वह गया और कुछ ही देर में शिकार करके ले आया। मैं भी आज उसका तरीका आजमा कर उसे मार कर आता हूँ। तुम बस मेरी हर बात में हाँ कहती रहना..
देखो -क्या मेरी आँखें लाल हैं?”
“हाँ”
“क्या मेरी पूँछ तनी हुई है ?”
“हाँ”
“क्या मेरे नाखून कड़े और तेज हैं ?”
“हाँ”
पत्नी के हाँ कहने पर वह खरगोश गया और फिर लौट कर नहीं आया।
तमाशबीन खुश होकर रंगरूट के सामने पैसे डाल रहे हैं और मैं सोच रही हूँ कि कल से मुझे चूड़ियों के साथ साथ लोहे के नाखून भी बेचने चाहिए।

लघुकथा-३
ब्रिलिएंट

रमा जी की अवस्था दिनों दिन बिगड़ती जा रही थी। आज कुछ ज्यादा ही खराब थी। मानसिक अस्वस्थता के कारण वे सभी इकट्ठा हुए लोगों से केवल अपने बेटे की बात कर रही थीं।
“अरे वह पढ़ने में बहुत अच्छा था। हमेशा फर्स्ट आता था। पता है उसे कॉलेज से ही विदेशी नौकरी के लिए चुन लिया गया था। अब वह अमेरिका में है। मैंने उसे लैपटॉप पर बारिश की बूंदें भेजी थीं। हवा का संगीत भेजा था। मेघों की तस्वीर भेजी थी। उसे न बचपन से ही सावन बहुत अच्छा लगता था। देखना वह जल्दी ही आएगा। मेरे लिए नई साड़ी लाएगा। हमेशा कहता है माँ तुम फटी साड़ी मत पहनों। अरे सुनते हो बेटा इतने पैसे भेजता है अब तो केला मूड़ी छोड़कर इधर आओ।”
रमा जी को नहीं बतलाया गया था कि उसके लैपटॉप में बिजनेस के डीटेल्स डाउन लोडेड हैं।उससे बारिश की बूंदें डिलीट कर दी गई हैं। रमा जी को नहीं बतलाया गया था कि उनका बेटा हवाई जहाज में बैठ गया है पर वह भारत नहीं कनाडा जाएगा।
नहीं बतलाया गया था कि वहाँ पर इमोशन नहीं केवल प्रमोशन चलता है। वहाँ पर अतीत नहीं है केवल भविष्य है।
रमा जी को यह भी नहीं बतलाया गया था कि उनके पड़ोसी का लड़का भी उनके बेटे की राह पर फर्स्ट आकर विदेश जाने के लिए दिन रात एक कर रहा है।

लघुकथा-४
उपज

देश की वार्षिक मीटिंग के अतिरिक्त वर्तमान की एक बड़ी समस्या को लेकर उच्च स्तरीय मीटिंग बुलाई गई थी।
जिसमें सरकारी अधिकारियों के अलावा वैज्ञानिक, डॉक्टर, पर्यावरण विशेषज्ञ एवं अन्य क्षेत्रों के बुद्धिजीवी भी शामिल थे।
सरकार की तरफ से जनगणना मंत्री ने समस्या को प्रस्तुत करते हुए कहा “जनगणना में कन्याओं की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है पुरुषों की तुलना में।”
“हाँ यह समस्या मेरे क्लिनिक और अस्पताल में भी बहुलता से पाँव पसार रही है। जबकि हर दम्पति लड़के की कामना करते हैं कन्याओं का जन्म आंकड़ा बढ़ता जा रहा है।” डॉक्टर ने कहा।
वैज्ञानिक ने भी अपना मत रखते हुए कहा “हमारे लैब परीक्षण में पुरुषों के स्पर्म में वाई क्रोमोजोम्स की संख्या में बहुत कमी देखी जा रही है जबकि एक्स क्रोमोजोम्स ही अधिक हैं। जैसाकि आप सभी जानते हैं पुरुषों के जन्म के लिए वाई क्रोमोजोम ही आवश्यक होते हैं ।”
तभी पर्यावरण विद उठ कर बोल पड़ी “यह तो प्रकृति का नियम है। जो बोया जाएगा वही तो उगेगा। आखिरकार धरती की कोख में इतने भ्रूणों का बीज जो बोया गया है ।

लघुकथा-५
क्रमशः

काफी समय पहले जब वह गाँव छोड़ कर इस शहर में आ बसा था तो कोई था जो उसे धीरे-धीरे खुदकुशी करने पर मजबूर कर रहा था।
सबसे पहले उसने अपनी जुबान काट ली थी , जिससे अब वह किसी भी अन्याय का विरोध नहीं कर सकता था।
फिर कुछ सालों बाद उसने अपनी अंतड़ियां निकालकर फेंक दी और अब उसे कई-कई दिनों तक भूख बैचेन नहीं करती थी।
फिर एक दिन उसने अपने पाँव ही काट डाले जिसके फलस्वरूप अब वह काम की तलाश में कितना भी चल ले उसे थकान बिल्कुल भी नहीं होती थी।
इसी प्रकार किसी दिन उसने अपने हाथ भी काट डाले । उसके किये किसी भी काम से उसकी गृहस्थी चल सकने लायक बरकत ही नहीं होती थी।
और आज…
आज तो उसने अपने दिल को भी मार डाला जब उसने अपना चूल्हा जलाने के लिए पड़ोसी के आँगन से वे लकड़ियां भी उठा ली जिन पर उसका पड़ोसी अपना भात पकाने वाला था।
अब वह पूरी तरह मृत है। जिसे इस शहर ने कभी आत्महत्या के लिए उकसाया था।

पाँच लघुकथा

पद्मा मिश्रा, जमशेद पुर
लघुकथा-१
कल किसने देखा है
धूप की गर्मी से तपती पिघलती कोलतार की काली सड़कों पर जैसे आग बह रही थी । सुगिया जल्दी जल्दी अपने पांव बढ़ाती भागी जा रही थी,, पसीना में डूबा हुआ शरीर,, जैसे पानी की कुछ शीतल बूंदों की कामना कर रहा था,,माथे पर सब्जियों की भरी टोकरी उठाए वह बाजार की ओर बढ़ रही थी,ताकि थोड़ी बहुत सब्जियां बेच सकें,आज बच्चों के लिए भात का जुगाड हो जाएगा,, चप्पलें धंसी जा रही थीं।आग बरसाती तपती दोपहरी में सुगिया पांव घसीटते नंगी सड़क पर जैसे दौड़ लगा रही थी,।कहीं तो पेड़ की छाया भी नहीं दिखाई देती।,माथे से अनवरत पसीना बह रहा है,पर उसे परवाह नहीं,।उसकी आंखों में अपने बच्चों के चेहरे नजर आते हैं, उनकी भूख दिखाई देती है,,दो दिन से खाना नहीं बना, चूल्हे पर गर्म पानी में सत्तू घोल कर काढ़ा बनाकर पिलाया है उसने, पड़ोसी ने कुछ खाना दिया था,बस वही ,,,आज‌ तो उसे कुछ सब्जियां बेचनी ही हैं, उनकी आंखों में गर्म भात खिलाने का सपना देकर आई थी वह। पसीना आंखों तक बह गया था और अनायास बह गए आंसुओं के साथ एकाकार हो रहा था। वह एक हाथ से आंचल संभालती हुई चेहरा पोछती है और दूसरे हाथ से बास की टोकरी को संभाल रही हैं,।गांव से बाजार आने तक आधी सब्जियां सूख जाती है, फिर उन्हें कोई नहीं खरीदता,आधे से भी कम दामों में बेचना पड़ता है। कभी कभी तो मुफ्त में ही देकर लौट आती है सुगिया।
बाजार में भीड़ थी, ज्यादातर कालोनी में रहने वाली गृहिणियां इसी समय सस्ती सब्जियां मिलने के लालच में आती है। सभी की सब्जियां पानी से तर ताजी लग रही है,वह अपनी प्यास बुझाए या सब्जियों की,?सामने सरकारी चापाकल था, पतली धार वाले नल से गमछा भिगोकर सब्जियों पर डाल देती है, और चुल्लू
से थोड़ा पानी खुद भी पी लेती है,खाली पेट पानी पीने से पेट में जोर से मरोड़ उठी,, जिसे वह झेल गई।
अपनी छोटी सी टोकरी लेकर किसी कोने को तलाश करके बैठ गई है सुगिया,, कोई मोटी सी महिला आ रही है सब्जियों से लदी,, धनिया की तलाश में,पर सुगिया की टोकरी में सूखे धनिया देखकर मुंह बना लेती है,,दाम पूछा कितने का है।””पांच रुपए का”।
ये तो सूखा है,दो रुपए में दो, वैसे यह भी ज्यादा है,कहकर वह सुगिया के जवाब का इंतजार करने लगी,। सुगिया को बच्चों की भूख याद आई,उसने चुपचाप धनिए का गुच्छा उन्हें दे दिया,दो रुपए को अमानत की तरह आंचल में बांध लिया उसने,। एक उम्मीद भरी उसकी आंखों में अजीब सी चमक आ गई थी, शायद सांझ तक कुछ अच्छी आमदनी हो जाए,। पर दिन ढलने तक भीड़ भी कम हो रही थी, और सूखी सब्जियां कोई खरीद नहीं रहा था,। सांझ हो रही थी, और सुगिया ने आज केवल पंद्रह रुपए कमाए थे,पर वह खुश थी कि दो जून भात का जुगाड हो जाएगा।
उसकी आंखें भर आईं थीं,अपनी बेबसी पर,दो तीन साल पहले ऐसी नहीं थी घर की हालत,जब उसका आदमी शहर में कमाता था, हफ्ते में घर लौटता तो ढेर सारी चीजें लेकर आता, बच्चों के लिए, उसके लिए,तब घर जैसे खुशियों में झूमता रहता थ। उसके साथियों ने खाली खबर दी कि किसना नहीं रहा।अब इन सब्जियों को बेचने के अलावा कोई और चारा नहीं था उसके पास।, मीलों दूर से चलकर बाजार में सब्जियां बेच कर वह सभी मजदूरों के साथ लौट आती थी।सुगिया जानती थी कि उसका बड़ा बेटा हरिया चूल्हा जलाकर हंडी में पानी खौलने के लिए रख दिया होगा,कि मां लौट कर भात पकाएगी,, मुनिया दरवाजे पर बैठी उसकी राह देखती होगी,सुगिया जल्दी जल्दी कदम आगे बढ़ाने लगी। सेठ से थोड़े चावल खरीदें, और नमक मिर्च, थोड़े आलू भी,,टोकरी आधी खाली है, क्योंकि सब्जियां बिकी नहीं।सुगिया को देखते ही बच्चे उससे लिपट गये, मां भूख लगी है, भात पकाते हुए सुगिया सोच रही हैं,चावल थोड़े कम है तो क्या हुआ अपनी मेहनत के है,।वह बड़े प्यार से बच्चों को खाना खिला रही है, उसे संतोष होता है।मन भर आया है। ममता की आंखें नम हैं पर मन में कुछ करने, का हौसला है,मेहनत मजदूरी भी,वह‌ एक लंबी सांस लेकर उठती है। हंडी में भात उसके लिए कम बचा है।,वह प्याज के टुकड़ों को तोड़कर नमक मिर्च के साथ खुद के लिए भात परोसती हैं, फिर पेट भर कर पानी पी लेती है।,वह खुश हैं कि पानी का मोल नहीं लगता,पेट तो भर जाता है। बच्चों के बगल में सोई सुगिया अब निश्चिंत हो गई है, उसे चिंता नहीं है कि कल की भूख का क्या होगा?वह खुश हैं कि आज तो भात मिल गया पेट भर,कम से कम रात में नींद तो आएगी,।कल का सूरज फिर आग बरसाएगा,फिर रोटी की जुगाड में उसे मीलों चलना होग। पर,वह मां हैं!, अपनी मेहनत पर भरोसा है उसे,कल फिर कुछ सब्जियां बेच लेगी ।लेकिन बच्चों को भूखा नहीं रखेगी,,सुगिया भी गांव की दूसरी औरतों की तरह दुनिया का सुख चाहती है, अपने बच्चों के लिए,खुद का सुख याद नहीं,,वह नहीं जानती है कि कल उनका भविष्य क्या होगा?? वह सुबह से सांझ तक बच्चों की भूख के लिए खटती है,, क्योंकि दुनिया ने उसे इतना तो सिखा दिया है कि गरीबों की दुनिया का सूरज सिर्फ रोटी है!!, चांद की चमक में भी भात की महक है!! एक राहत की सांस लेकर वह नींद में खो जाती है,आज तो जी लें,,कल किसने देखा है!!?

लघुकथा-२
स्नेह-बंधन
कल स्वाति आ रही है। पूरा घर चहल पहल में डूबा हुआ है। स्वाति के पसंद की खाने पीने की चीजों की तैयारी हो रही है और मुदिता,घर की इकलौती बहू को फुर्सत नहीं कि वह फ्रेश होकर सुबह की चाय भी पी सके,बस मशीन की तरह किचन में व्यस्त हैं तड़के सुबह से ही।
परसों रक्षाबंधन है न,इकलौते भाई की अकेली बहन।, सबको प्रतीक्षा रहती है उसके आने की। मुदिता बस दौड़ती रहती है घर आंगन,एक दूसरे की सुविधाओं का ख्याल रखती जरुरी चीजों की व्यवस्था लेनदेन की जिम्मेदारी सब कुछ मुदिता के ऊपर ही है। मुदिता भी चाहती हैं अपने मायके जाना, दोनों छोटे भाइयों को सामने बैठा कर राखी बांधने का सुख जीना चाहती है पर विवाह के बाद ये कभी संभव नहीं हुआ। बस कभी आनलाइन या कभी स्पीड पोस्ट से राखी भेजकर संतुष्ट हो लेती ह।आज की तकनीकी दक्षता ने भले ही यह संभव बना दिया है कि वह मोबाइल में अपने भाइयों को देख सकती है लेकिन उनके स्नेहिल स्पर्श और अहसास की अनुभूति वह कभी नहीं कर पाती,उन्हें गले लगाकर ढेरों आशिर्वाद देने की लालसा, अतृप्त ही रह गई। पिता के जाने के बाद अकेली मां के लिए भी वही मनोबल और जिजीविषा की कड़ी है। हर बार स्वाति के आने की तैयारियों में जुटी मुदिता खुद से सवाल करती है *क्या मुझे हक नहीं?? पर कोई जवाब नहीं होता। इसलिए अक्सर चुप रहती है और चुपचाप अपने काम पूरे करती रहती है।अपनी यादों में खोई मुदिता की तंद्रा भंग होती है टेलिफोन की कर्कश आवाज से। अम्मा जी पूजाघर में है और पति मनीष आफिस में वह दौड़ कर फोन उठाती है,उधर से मनीष की आवाज सुनाई पड़ी मृदु ! जल्दी से तैयारी करो, मायके जाने की मां जी आई सी यू में है, दोनों भाई अकेले हैं। सुबह ही छाती में दर्द था,पड़ोसी शर्मा जी ने भर्ती करा दिया है।सुबह एक गाड़ी आयेगी तुमको लेने,जल्दी करो मैंने सारी व्यवस्था कर दी है। वह लड़खड़ा गई, आंसू आंखों में बह आये थे,,तभी मनीष ने कहा अम्माजी को फोन देना वह दौड़ कर उनको बुला लाई ,पता नहीं मनीष ने क्या कहा उनसे कि वह घबराकर बोली,जल्दी तैयार हो जाओ बहू। मुदिता ने जल्दबाजी में दो चार कपड़े रखे और तैयार हो गई,। बाहर गाड़ी हार्न दे रही थी,मुदिता का दिल घबराहट में न जाने कितने अनाप-शनाप बातें सोच रहा था। गाड़ी में बैठी हुई मुदिता स्तब्ध थी,साथ ही पीछे छोड़ आए कामों की चिंता भी थी, बच्चों को भी नहीं बता पाई,। पता नहीं कैसे सब करेंगी अम्मा जी? फिर मां के विषय में सोचती,अकेले वह कैसे संभालेगी मां को?,अचानक क्या हो गया,मेरे दोनों भाइयों का क्या होगा फिर अपनी गलत सोचों को परे धकेल देती नहीं नहीं,ये मैं क्या सोच रही हूं?तभी रेलवे स्टेशन आ गया और सामने ही मनीष मिल गये,उसे टिकट थमाते हुए बोले, आराम से चार पांच दिन तक रुक जाना जब तक मां की हालत संभल नहीं जाती” और एक बड़ा सा बैग थमा दिया,लो,इसे संभालो। तुम कुछ जरुरी सामान घर भूल आई थी। ट्रेन आई और वह बैठ गई,,वह चुप थी, केवल मनीष बोले जा रहे थे “बच्चों की चिंता मत करना, मैंने छुट्टी ले ली है,। शाम को कानपुर पहुंच कर उसने आटो किया और घबराती हुई घर पहुंची। गेट से ही भागते हुए घर में घुसी तो सामने जो दिखा वह चकरा कर वहीं सोफे पर बैठ गई,, सुखद आश्चर्य!! मां तो बिल्कुल ठीक थी वह दौड़ कर उनके गले लग गई “मां तुम्हारी तबियत कैसी है, तुम तो आइसीयू में,”।अरे नहीं, मैं बिल्कुल ठीक हूं,कल से ही सुजय,विनय जिद कर रहे थे कि इस बार दीदी के हाथों से राखी बंधवायेगें और शाम तक मनीष जी को फोन कर बात भी कर ली।,ये सब मनीष जी का सुनियोजित नाटक था।स्वाति के आने से तुम बहुत व्यस्त हो गई थी इसलिए ये सब करना पड़ा, इसमें स्वाति भी शामिल है।मनीष जी के दिये बैग में राखियां, मिठाई फल और मां के लिए साडी भी थी। मुदिता हैरान रह गयी ।रिश्तों की जिस डोर को वह संभालने के लिए अपनी इच्छाओं, सपनों को भूल गयी थी,,#वे रिश्ते तो बहुत अनमोल निकले। बहुत प्यारे, यह स्नेह बंधन तो रक्षाबंधन की तरह पवित्र और बहुमूल्य है,इन्हें मैं आजीवन सहेज कर रखूंगी। ।वह फोन पर मनीष और स्वाति को धन्यवाद देते ऱो पड़ी।,

लघुकथा-३
भूख
हे राम!!, यह घुटनों का दर्द तो मेरी जान लेकर ही जाएगा” अम्माजी घुटनों पर हाथ रखे कराहते हुए बड़बड़ा रही थी रही थी ।कई दिन से दवाई खत्म है ,पर किस से कहें ?,एक बड़ी कंपनी में कार्यरत बेटे की व्यस्तता ही इतनी ज्यादा थी कि रात को 11,:12 बजे उसके लौटने पर उसकी थकान और शिथिलता देखकर उनका मन अपनी सारी शिकायतें ,,सारी जरूरतें ,भूल जाता और ममता भरा हाथ उसके सर पर फेरने की इच्छा हो आती।
वैसे विपुल भी उनकी दवाइयों जरूरतों का ख्याल रखना या उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछना कभी नहीं भूलता था,। बहू को सख्त हिदायतें देकर ऑफिस जाता शायद बहू अपर्णा ही भूल जाती थी कभी उसकी सहेलियां आ धमकती तो कभी उनके फोन ,आने पर वह घंटों बस बातें करती रह जाती थी । किसी नौकर को कहकर भूल गई होगी,। बेचारा नौकर, किचन संभाले ,सब्जियां लाए ,लान की सफाई करें या दवाईयां लाए। मांजी बहू के गुस्से से बहुत डरती थी जब वह नाराज हो जाती तो घर में खाना नहीं बनाती थी। खुद तो बेटी को लेकर कहीं बाहर खा आती और नौकरों को भी रुपए देकर बाहर भेज देते पर विपुल के सामने यूं दिखावा करती जैसे उसने पूरे दिन भर कुछ नहीं खाया है अम्मा जी की भूख ही हमेशा घर में कलह का कारण बन जाती है,,मिर्च मसाले उन्हें पचते नहीं थे -दो रोटियां दाल और सूखी रोटी सब्जी ही तो खाती थी लेकिन बहू वह भी आसानी से उन्हें दे नहीं पाती थी जब यह दोनों सपरिवार कहीं बाहर से खा कर लौटते तो अम्मा जी को हमेशा भूल जाते थे जब वह कहती* बहू भूख लगी है ,,थोड़ा सा कुछ भी दे दो*तो बहू गुस्से से भुनभुनाती “तुम्हारी मां को कितनी भूख लगती है ?बिल्कुल सुरसा की तरह, कि कभी शांत ही नहीं होती “”उसका स्वर भी इतना ऊंचा होता की अम्मा जी के कानों में पड़ ही जाता और वह मन मसोस कर रह जाती, और नौकर जल्दबाजी में बनाई गई दो रोटियां, पनियल,दाल परोस जाता,।वह,समझ जाती की सुबह की दाल में पानी डालकर गर्म कर दिया गया है लेकिन पेट की ज्वाला इतनी प्रबल होती है कभी-कभी तो वह मान अपमान भी नहीं देखती इधर 5 वर्षों से घुटनों के दर्द और बाएं अंग में लकवा मार जाने के बाद से चलने फिरने में असमर्थ हो गई थी। पिछली रात को बेटा बहू किसी पार्टी में गए थे सपरिवार तो बेटे ने हीं अम्मा जी के खाने के लिए पूछा था बहू बोली थी “निश्चिंत रहें लौटकर बना दूंगी “जब वे लौटे तो देर हो चुकी थी ,बेटे के बार बार टोकने पर सुबह के बचे भात में पानी डालकर कुकर में गर्म कर दिया था,अचार के साथ अम्मा जी को खाना देकर बड़बड़ाती हुई लौट गई थी ,कि एक दिन चावल ही का लेंगी तो मर नहीं जाएंगी !
अम्मा जी की आंखों में आसूं आ गए थे रात को चावल उन्होंने कभी नहीं खाए ,क्योंकि उससे घुटनों का दर्द बढ़ जाता है ।तभी बेटा कमरे में आ गया *खाना खा लिया अम्मा?*और थाली में रखा भात देखकर चौंक गया। *चावल ?वह भी रात में आपको तो पचता नहीं** तुरंत अपर्णा को आवाज लगाई “”अम्मा जी को चावल क्यो दिए? तुमने तो कहा था कि रोटियां बना दूंगी*
बहू अपने कमरे से ही चिल्लई,,*बनाई तो थी लेकिन टामी को देदी, बेचारा भूखा था,,है आज उसकी तबीयत भी ठीक नहीं है ।
बेटा कभी मां को देखता कभी भात की थाली को ,,तो क्या मेरी मां कुत्ते से भी गई गुजरी है।उसकी आंखों से आंसू बह निकले, मां बेटा दोनों एक दूसरे को मौन,बस देखे जा रहे थे मां बेटे की बेबसी को और बेटा मां के निरीह चेहरे पर उभर आए दया और करुणा के भावों को,वह मन ही मन क्षमा प्रार्थी हो उठा,,,**क्षमा करना मां, तुम्हारे दिए संस्कारों ने कर्तव्य पथ पर चलना सिखाकर व्यस्त कर दिया कि तुम्हारे प्रति ही अपना कर्तव्य भूल बैठा !!*थोड़ी देर बाद अम्मा जी बेटे के हाथों की अनगढ़ गरमा गरम रोटियां अपार तृप्ति के साथ खा रही थी ,बेटा दौड़ दौड़ दौड़ कर कभी परवल की उबली सब्जी परोसता तो कभी पानी का गिलास भर देता था,वह व्यस्त हो उठा था उस मां के लिए जो गरमागरम खाना खिलाते ,प्यार से पकवन परोसते समय आत्मविमुग्ध हो उठती थी ,,,आज उसी मां की भूख शांत कर भूख शांत कर बेटा मानो अपने वैभव ऐश्वर्य, रुतबे से कहीं बढ़कर संतोष, तृप्ति एवं ममत्व का खजाना पा गया था,आज उसे मां की भूख का रहस्य समझ में आ गया था ,।वह समझ गया था कि यह मां की भूख नहीं थी बल्कि समय के मेले में खो गए अपनेपन की तलाश थी।

लघुकथा-४
विश्वास का रिश्ता

त्रिशा जब घर में घुसी तो लडके वाले आ चुके थे।.रसोई घर में चाय की व्यवस्था करते हुए उसकी मम्मी के चेहरे पर तनाव व्याप्त था।
जा बेटा.जल्दी से तैयार हो जा ,वो लोग आ चुके हैं.।
त्रिशा मुस्कराते हुए तैयार होने चल दी।आज फिर एक परीक्षा देनी होगी।अपने चेहरे पर आत्मविश्वास और विवेक का दिपदिपाता सौंदर्य लिए उसने ड्राइंग रूम में प्रवेश किया,सामने सोफे पर बैठी एक गरिमामय व्यक्तित्व की सौम्य महिला ने उसका स्वागत किया.आओ बेटी.यहां बैठो। त्रिशा ने झुककर उनके चरण स्पर्श किये और साथ में बैठे हुए राजेश और उनके पिता को भी अभिवादन कर वहीं बैठ गई। मां भी चाय लेकर आ गई थीं.।.त्रिशा के माता पिता का मन कुछ सशंकित था.लेकिन लडके वाले बिल्कुल सहज.शांत थे.लडके के पिता ने प्रश्न किया-
मेरा बेटा एक जिम्मेदार पद पर है.परिवार में समृद्धि है ईश्वर की कृपा से..परंतु हमें बेटे के लिए जीवन संगिनी के साथ साथ एक विवेकशील. समझदार बहू भी चाहिए .क्या तुम दोनो भूमिकाए निभा पाओगी ?
त्रिशा ने विनम्रतापूर्वक जवाब दिया,जी विवाह केवल दो व्यक्तियों के बीच ही नही बल्कि परिवार और बडों के आशीष के साथ भी होता है.मैं पूरी कोशिश करुँगी.।
त्रिशा के इस समझदार कथन से कमरे का माहौल बदला.। राजेश के पिता ने चाय पीते हुए प्रश्न किया*
बेटी.तुम योग्य और होनहार हो.फिर तुम नौकरी आगे भी करना चाहोगी?
कमरे में सन्नाटा छा गया था.यही तो वह यक्ष प्रश्न था जिसने त्रिशा और उसके परिवार को बार बार व्यथित किया था।.पहले जौ रिश्ते आये.उन्हें बहू का नौकरी करना पसंद नहीं था.और बात यहीं अटक जाती थी।
तभी निशा का कोमल.गंभीर स्वर गूंजा’ जी अंकल.मुझे.विश्वास है कि मै अपनी शिक्षा का सम्मान करते हुए. आपके आशिर्वाद और मार्गदर्शन से अपने परिवार को साथ लेकर चलूंगी और अपने सारे कर्तव्य निभाऊंगीं।त्रिशा के जवाब से सभी खुश हो गये।.तभी राजेश के पिता ने कहा,मुझे विश्वासहै कि तुम अपनी मेहनतऔर लगन से जिस तरह.आगे बढी हो.तुम्हारे संस्कार मेरा.परिवार भी.संवार देंगें.आशिर्वाद देता हूं। तभी राजेश ने एक मिठाई उठाकर खाते हुए कहा* जीवन के इस नये सफर में तुम अकेली नहीं मैं भी साथ रहूंगा ।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

लघुकथा-५
देश अभी जिन्दा है
कमरे में टीवी तेज आवाज के साथ मौजूद था –गणतंत्र दिवस की धूम और जश्न का मुख्य समारोह दिल्ली से प्रसारित हो रहा था,गाँव से वर्षों बाद अपने बेटे के पास आये स्वतंत्रता सेनानी दादाजी पूरे जोश में थे,और पास बैठे पोते-पोतियों के साथ उत्साहपूर्वक स्व्तंत्रता की लड़ाई की यादें ताजा करते करते–कभी प्रसन्नता के आवेग में उछल पड़ते तो कभी धीरे से आँखें पोंछने लगते थे।छोटे बच्चे तो कुछ अनुशासित -एकाग्र हो टीवी पर आ रहे गणतंत्र दिवस कि परेड पर नजरें जमाये थे, परन्तु बड़े -युवा बच्चों को तो यह सारा आयोजन ही नागवार गुजर रहा था । किसी का क्रिकेट मैच तो किसी का फ़िल्समारोह का प्रसारण समारोह छूटा जा रहा था,-‘अरे,अब हो गया न? ,झंडा फहरा दिया जायेगा,फिर थोड़ी देर में राष्ट्र-गान .फिर क्या बचेगा ?दादाजी टीवी छोड़ देंगे,” सब धीरे धीरे फुसफुसाते हुए एक दूसरे को सांत्वना दे रहे थे ।
उधर दिल्ली में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी मंच की ओर बढ़ रहे थे -इधर दादाजी का फरमान जारी हुआ –” सब खड़े हो जाओ ” ‘क्यों?”-, छोटे बच्चे ने धीरे से पूछा ,
”राष्ट्रीय ध्वज को आदर देने के लिए” , , वाक्य समाप्त ही हुआ था कि झंडा फहरा दिया गया और राष्ट्रीय गान प्रारम्भ हो गया “जन-गण-मन ,अधिनायक जय हे
”दादाजी सावधान की मुद्रा में खड़े गुनगुना रहे थे ,बच्चे भी साथ गा रहे थे।अपनी अनगढ़ -भाषामे -स्कूल में तो रोज ही गाते हैं,और जो खड़े नहीं थे दादाजी की घूरती नजरों के डर से खड़े हो गए पर राष्ट्र-गान तो याद ही नहीं था।गाया होगा स्कूल में कभी . अब इतने साल हो गए .कौन याद रखता है! अब टीचरजी थोड़े ही न
डांटने आएँगी ?”राष्ट्र-गान समाप्त हो चूका था -दादाजी ने जोरदार आवाज में -कहा -”यही सीखा है तुमने अपनी शिक्षा से ,देश का, राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करना तुम्हे नहीं आता ?”
”अरे दादाजी,जब स्कूल में थे तब याद था,अब इंजीनियरिंग की मोटी मोटी किताबें पढ़ें ,उनके प्रोजेक्ट बनाएँ या राष्ट्र-गान याद करें?”’ शर्म आनी चाहिए तुम्हे-तुम लोग देश की उम्मीद हो,जब तुम्ही उसको आदर नहीं दोगे तो,। उस समय सारे बच्चे तो शांत होकर चुपचाप चले गए पर दादाजी के मन में सैकड़ों सवाल उठा गए – -एक स्वतंत्रता सेनानी,कर्मठ अधिकारी की भावी पीढ़ी को राष्ट्र-गान याद न हो,गणतंत्र का महत्त्व मालूम न हो ,–यह बात उन्हें पीड़ा पहुंचा रही थी, तभी तो ये बच्चे एक अनजानी कल्पना की दुनिया में जी तो रहे हैं पर अपनी पुरानी पीढ़ी के त्याग, आदर्श व् अनुभवों को पीछे भूल कर । ,बाहर बगीचे में टहलते हुए दादाजी इन्ही गम्भीर विचारों में खोये हुए थे,-तभी गेट पर उनके मित्र शर्माजी ने पुकारा ,दादाजी अपने परम मित्र को देख कर खुश हो गए और लान में पड़ी कुर्सियों पर उनके साथ बैठते हुए बोले ‘आज तुमसे बातें करने की तीव्र इच्छा हो रही थी,”-”क्या बात हुई ”शर्माजी ने वहीँ पड़ा अख़बार उठा लिया था, कुछ देर पढ़ने के बाद तुरंत बंद कर दिया।’,दादाजी का मौन टूटा –”कैसी अमन शांति?,सारा परिवेश ही उलटी धारा में बहा जा रहा है,-सबको जल्दी है आगे बढ़ जाने की,भौतिकता की तलाश में -संस्कार-नैतिकता -आदर ,सब कुछ खो दिया है ,इस पीढ़ी ने ,अब आज ही की बात लो,टीवी पर गणतंत्र दिवस की परेड आ रही थी ,लेकिन बच्चों को यह तक पता नहीं था कि राष्ट्र-गान क्या होता है,झंडे का आदर क्यों करें ?” , , ,
शर्मा जी ने उनके थरथराते हाथों को थाम कर कहा –”हाँ,अब उन्हें फिल्मो के गीत जरुर याद हैं।और राष्ट्र-गान तो शायद ही किसी को याद हो ठीक से,अभी मै अपनी पोती के स्कूल में गया था,छोटे बच्चों की नृत्य-प्रतियोगिता,-कहाँ आठ से दस साल के बच्चे –‘छैया,छैया ,डिस्को दीवाने ,मुन्नी बदनाम हुई जैसे गानो पर नाच रहे थे,मैं शर्मसार होकर लौटा,।चाय आ गई थी ,अनुज उनका बड़ा पोता कहीं बाहर जा रहा था,शर्मा जी ने हाल -चाल पूछा,खेल रहे छोटे बच्चों ने समझा अब भैया को डांट पड़ेगी,वे सब पास आगये -शर्मा जी ने पूछना शुरू किया –”तुम लोग बड़े होकर क्या बनोगे ?किसी ने कहा -‘हीरो,किसी ने डाकटर और डांसर तो किसी ने जहाज उड़ाना पसंद किया।
सबसे छोटे पोते ने कहा –मैं तो दादाजी बनूँगा,मार दूंगा सब दछमनो को -सब दर कर भाग जायेंगे -अंगरेज भागे थे न ।है ना दादाजी ?’
”लेकिन कैसे ?-तुम तो छोटे हो अभी”, शर्मा जी को आनंद आ रहा था ,–‘अपने माथे पर सलाम की मुद्रा में हाथ रखते -कदम ताल करते हुए विभु ने जवाब दिया
–ऐछे -वंदे मातरम -वंदे मातरम ‘और लैफ्ट राइट करता अंदर चला गया ,प्रसन्नता के आवेग में दादाजी ने अपनी आँखें पोंछते हुए कहा –”देश अभी जिन्दा है । शर्मा जी,यही आजादी तो हमने चाही थी ।

पाँच लघुकथा

राजनन्दिनी रावत

लघुकथा-1
निर्णय
घर में खुशी का माहौल था
सब शालिनी के लिए आए रिश्ते के बारे में बात कर रहे थे,लड़का अच्छे और ऊँचे खानदान था।घर में किसी चीज की कमी नहीं थी लेकिन शालिनी अभी तक उलझन में थी,क्या यहीं काफी था जिंदगी के लिए ?
घर में लगभग सब इस रिश्ते के लिए तैयार थे पर शालिनी…
शालिनी हर बार की तरह इस बार भी साहित्य में अपनी उलझन का जवाब ढूंढ रही थीं… तभी उसकी नजर एक कहानी पर गईं… कहानी में एक पिता अपनी बेटी के लिए रिश्ता देखने के लिए जाता हैं… घर बड़ा और लड़का अच्छा होने के बावजूद वो रिश्ता मना करके आ जाता हैं… अपनी पत्नी के पूछने पर कि आखिर सब कुछ तो था..फिर आप रिश्ते के लिए मना क्यों कर आए !
तब पिता ने कहा,”हाँ ! घर में सब कुछ था लेकिन किताबें नहीं थीं… और मेरी बेटी की अब तक की ज़िंदगी किताबों के साथ बीती हैं… फिर बाकी ज़िन्दगी वो कैसे उनके बगैर बिता लेती ? वहाँ सब था मगर क्या वहाँ ज्ञान का मोल था…क्या वहाँ मेरी बेटी की जिज्ञासाओं, सपनों और आत्म निर्भरता का मान था ?
नहीं न !
बस इसलिए ही मैं मना कर आया।
कहानी के अंत तक शालिनी को अपना जवाब मिल गया था ।

लघुकथा-2
बैम्बू बास्केट
रागिनी बैम्बू बास्केट को अपनी भाषा में बस बाँस की टोकरी समझती थी। बचपन में अखबारों में ऐसी टोकरियाँ, चटाई, फल-चॉकलेट्स के साथ पिकनिक की तस्वीरें देखकर वह सोचती, “ये बड़े लोगों की बातें हैं।” निम्न वर्गीय परिवार में जन्मी रागिनी के लिए किताबें ही उसकी सच्ची दोस्त थीं। माँ-बाप मेहनत-मजदूरी करते, और वह पढ़ाई में डूबी रहती। साहित्य और प्रकृति से उसका गहरा जुड़ाव था। प्रकृति की गोद में समय बिताना उसे सुकून देता। किताबों के पन्नों में वह उन सपनों को जीती, जो उसका बचपन अधूरा छोड़ गया था।
वर्षों बाद, रागिनी निजी विद्यालय में शिक्षिका बन चुकी थी। पंचायत भवन के हरे-भरे गार्डन में झूले- चकरघिन्नी देख वह ठिठकी। उसे अपनी जुड़वाँ भाँजियाँ—अमृत और माही—याद आई।
अमृत का नाम उसने अमृता प्रीतम से प्रेरित होकर रखा था। दोनों बच्चियाँ उसे बेहद प्यारी थीं। वह बच्चियों को पिकनिक पर ले गई। वे इतनी खुश हुईं मानों वह उन्हें किसी जादुई दुनिया में ले आई हो।
रागिनी ने बैम्बू बास्केट, टॉफियाँ, चॉकलेट्स, फल और चटाई ली। वे घास पर दौड़ीं, खिलखिलाईं। रागिनी ने उन्हें बिस्किट, फल खिलाए। बच्चियों ने झूले झूलते हुए खूब मस्ती की। सूरज की सुनहरी किरणों में उनका हँसता-खिलखिलाता चेहरा देख रागिनी का मन भर आया।
“बुआ, हम फिर कब आएँगे?” माही ने उत्साह से पूछा।
“हर इतवार को !” रागिनी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
घर लौटते वक्त रागिनी का मन शांत था। बचपन में पिकनिक के दृश्य, जो उसके लिए कोरी कल्पना थे, आज वह उन्हें जी चुकी थी। उसकी आँखें नम थी। उस टोकरी में सिर्फ फल-चॉकलेट्स नहीं, उसके बचपन के सपने भी थे।

लघुकथा-3 –
दर्पण
रीमा का दिल हर बार उस दर्पण को देखकर सिसक उठता था। उसकी बहन, जिसे सड़क दुर्घटना छीन ले गई थी, उसके साथ ही ये दर्पण खरीदा था। हर बार उसका चेहरा उसमें झांकता, तो बीते दिन—हंसी, बातें, सपने—सब लौट आते। दर्पण सिर्फ कांच और लकड़ी नहीं था; वो उसकी बहन की याद था।
एक रात, तेज आंधी ने शहर को झकझोर दिया। खिड़की खुली रह गई थी। सुबह जब रीमा कमरे में पहुंची, तो दर्पण फर्श पर बिखरा पड़ा था। कांच के टुकड़े चमक रहे थे, मानो उसकी बहन की आखिरी निशानी भी टूट गई हो। आंसुओं के बीच उसने कांच को बाहर फेंक दिया, लेकिन लकड़ी की फ्रेम को सीने से लगा लिया।कुछ दिन बाद, रीमा ने उस फ्रेम में अपनी बहन की तस्वीर लगाई। अब हर सुबह, जब वो उस फ्रेम को देखती, तो दुख के साथ एक हल्की मुस्कान भी आ जाती। दर्पण टूटा था, लेकिन यादें तो अभी भी जिंदा थीं।
राजनंदिनी रावत
ब्यावर,राजस्थान

लघुकथा-4 –
निर्णय
घर में खुशी का माहौल था
सब शालिनी के लिए आए रिश्ते के बारे में बात कर रहे थे,लड़का अच्छे और ऊँचे खानदान था।घर में किसी चीज की कमी नहीं थी लेकिन शालिनी अभी तक उलझन में थी,क्या यहीं काफी था जिंदगी के लिए ?
घर में लगभग सब इस रिश्ते के लिए तैयार थे पर शालिनी…
शालिनी हर बार की तरह इस बार भी साहित्य में अपनी उलझन का जवाब ढूंढ रही थीं… तभी उसकी नजर एक कहानी पर गईं… कहानी में एक पिता अपनी बेटी के लिए रिश्ता देखने के लिए जाता हैं… घर बड़ा और लड़का अच्छा होने के बावजूद वो रिश्ता मना करके आ जाता हैं… अपनी पत्नी के पूछने पर कि आखिर सब कुछ तो था..फिर आप रिश्ते के लिए मना क्यों कर आए !
तब पिता ने कहा,”हाँ ! घर में सब कुछ था लेकिन किताबें नहीं थीं… और मेरी बेटी की अब तक की ज़िंदगी किताबों के साथ बीती हैं… फिर बाकी ज़िन्दगी वो कैसे उनके बगैर बिता लेती ? वहाँ सब था मगर क्या वहाँ ज्ञान का मोल था…क्या वहाँ मेरी बेटी की जिज्ञासाओं, सपनों और आत्म निर्भरता का मान था ?
नहीं न !
बस इसलिए ही मैं मना कर आया।
कहानी के अंत तक शालिनी को अपना जवाब मिल गया था ।

लघुकथा-5
संदिग्ध

“इतनी रात को कौन-सा कॉलेज खुला रहता है”, उसने फुसफुसाया।
फुसफुसाहट उनके कानों में पड़ गई।
रीता तुरंत ही असहज व भयभीत हो गई।
उसके कदम अँधेरे में तेजी से बढ़े।
“देखा! औरतें क्या कह रही थीं,” उसने अपनी बहन विद्या से कहा।
“उन्होंने हमें सुनाने के लिए ही ज़ोर से कहा,” विद्या ने मुँह मोड़ते हुए कहा।
“लेकिन उन्होंने गलत तो नहीं कहा, आखिर हम आई तो लड़कों से मिलकर ही।”
“जो भी हो, उन्हें यह अधिकार नहीं है,”
विद्या मन में बुदबुदाई।
“हमने कब कहा कि हम कॉलेज गई थीं? और बैग केवल कॉलेज में ही काम आता है?
और यह कहाँ तक ठीक है कि घर के बाहर बैठकर तुम हर आती–जाती स्त्री को संदिग्ध बना दो?
पुरुष तो पुरुष, स्त्रियाँ भी समूह में स्त्री को घूरती हैं,
और इनके घूरने की कला में उनकी बारह–तेरह वर्षीय बेटियाँ भी पारंगत हो जाती हैं,
और फिर कम उम्र में वे समझ ही नहीं पातीं कि कब यह प्रवृति कुंठा बन गई।”
विद्या ने एक साँस में कहा।
इस दुनिया में सबसे संदिग्ध गली से गुजरती स्त्री होती है।
(उसने एक आह में बात खत्म की और पढ़ने बैठ गई।)

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