कंचन अपराजिता, नीलम राकेश, रचना शर्मा


पाँच लघुकथा

कंचन अपराजिता
चेन्नई

लघुकथा-१
तथास्तु
——
ईश्वर एक कमरे में एक आत्मा को ले गये । कहा अपना आगामी जीवन चुन लो। आत्मा कमरे में प्रवेश कर पाया वहाँ अनेक मेज हैं। किसी मेज पर कुछ इलेक्ट्रानिक्स समान रखे हैं ,किसी मेज विभिन्न प्रकार की मिट्टी तो किसी मेज पर सौन्दर्य प्रसाधन रखे हैं। उसे एक कोने में पड़ी हुई मेज ने आकर्षित किया।
ईश्वर उसे देख मुस्कराते हुए कहा
“सभी के साथ कुछ सकारात्मक व नकारात्मक बाते जुड़ी हैं। चलो ,मै विश्लेषण कर दूँ ” उन्होंने आगे कहा
“इस चश्मे से तुम भूत और भविष्य दोनों देख सकोगे।”
आत्मा ने कहा “मै उसे देख वर्तमान गढ़ लूँगा।”
“इस लेंस से तुम कड़वा सच व मीठा झूठ को पहचान सकोगे।”
उसने कहा “मैं विवेक से काम चला लूँगा।”
इस कैमरे से तुम्हें श्वेत व श्याम रंग की तस्वीर दिख सकेगी और यदि रंगीन देखना चाहो तो बस पहली क्लिक जिसपर करोगे वही तुम्हें हमेशा से रंगीन दिखेगी ।
कोई बात नहीं मैं वह क्लिक के लिए प्रकृति का चयन करूँगा ।
“इस धागे से फटे व टूटे हुए भी चीज सिले जा सकते है”
मैं” इससे बिखरे दिल जोड़ सकूँगा और फटे रिश्ते को प्रेम धागे से सिलूँगा।”
“इस डिब्बे में रंगीन मिट्टी है जिससे तुम फूल भी लगा सकते हो या काँटा भी पैदा कर सकते हो”
मैं गुलाब के पौधे लगा लूँगा।
अब ईश्वर शांत थे।
आत्मा ने सोचा प्रभु ने डायरी और पेंसिल के बारे मे कुछ नही कहा।
कौतुहल से पूछ बैठा
“ये लेखन पुस्तिका व लेखनी के बारे मे भी बतायें”
“ये तेरे किसी काम की नही होगी।”
इसमे तेरी जीवन की कहानी का अंत मैने लिख दिया है।
क्या आप मुझे क्या इसे आरंभ से लिखने की इजाजत देगे,अंत आपका ही रहेगा।
“क्या करोगे तुम ,अंत जानते नहीं हो आरंभ से सभी कुछ लिखकर”
आत्मा आँखों मे चमक लेकर कहा
“हो सकता मैं इसे अपने कर्मों से इतना अच्छा लिखूँ कि आपको मेरे अनुकूल कहानी का अंत करना पड़े।”
ईश्वर प्रसन्न हो कह बैठे
“तथास्तु”।

***

लघुकथा-२
नियति

मै आँसू की एक बूँद हूँ..
मुझे भेजा गया है धरती पर किसी के आँखो से बरसने के लिए। मेरी नियति है किसी के दुख के आँसू बनना..
मगर नियति ने मुझे किस व्यक्ति के आँखो से गिरूँ इसकी स्वतंत्रता दे रखी है मै सोच रही हूँ किसको अपना निमित्त के रूप मे चुनाव करूँ ।
मेरे सामने कर्ज मे डुबा रमुआ किसान का परिवार है ..मै सोचने लगी इस परिवार मे किसके नयन से टपक पड़ूँ ।
एक वृद्ध किसान चारपाई पर लेटा खाँस रहा है । लगता है वो रमुआ का बाप है दमा से साँस लेने मे तकलीफ हो रही है। अनेक व्याधियों से ग्रसित उसका शरीर जर्जर हो चुका है। उसके मन मे विभिन्न व्यंजन को खाने की इच्छा है आलू मटर की सब्जी पूरी, खीर ,मिठाई और न जाने क्या क्या ??मगर न स्वास्थ दे रहा है न घर वाले ही ये भोजन दे रहे हैं । क्या मै उसके नयन कोर से गिरूँ?
पास मे रमुआ सिर पर हाथ धरे बेहद रूआँसा चितिंत अवस्था मे जमीन पर बैठा है घरवाली से कह रहा है इस बार फसल बरबाद हो चुकी है.. खाने के लाले पडने वाले है ..इसमे जो साहूकार से कर्ज लिया था उसे कैसे भरे। वेदना से उसका गला भरा जा रहा है क्या मै उसकी अश्रूबूँद बन छलकूँ ।
रमुआ की पत्नी पति को सांत्वना देने के लिए चाय बनाने रसोई मे है चायपत्ती की लास्ट खेप उबलते पानी मे डाल सोच रही है कल क्या होगा ? बेटा, बेटी ,ससुरजी को कल क्या भोजन देगी सामने खाली डिब्बे उसकी नजर के सामने है क्या उसके गालो पर चमकूँ।
कमरे मे एक किशोरी रमुआ की बाद सुन दुखी बैठी है सोच कर मन को म्लान किये जा रही है कि पिता पहले ही चिंतिंत है ऐसे मे उसका ब्याह के लिए जो दहेज देने का पिता जो वादा कर आये हैं उसका क्या होगा वो अपने पिता के दुख को और बढ़ा रही है . उनके दुख सबसे बड़ा कारण है क्या मै उसके भीगे मन को छोड़ आँखों से बहूँ ।
तभी किसान का बेटा नजर आया । जोश हौसला से भरा हुआ।पिता की बातें सुनकर भावुक हो उठा । बैठे पिता के काँधें पर हाथ रख कर कह रहा है हर समस्या का हल होता है मिलकर कोई उपाय सोच लेगे । मै उसकी आँखो से भाव विश्वास व आशा की बूँद बन छलक पड़ी।

***

लघुकथा-३
आत्म प्रश्न

“आज आशालता विकलांग केन्द्र जाना है । जायसवाल साहब ने सांस्कृतिक कार्यक्रम में बुलाया है, तुम कवर कर लेना |” फोन के दूसरी तरफ से विनोद जी ने कहा।
“अच्छा सर |” कह कर अनु ने फोन रख दिया ।
थोड़ी देर में अनु की स्कूटी विकलांग स्कूल के कैम्पस में थी। जायसवाल साहब स्वयं बाहर आकर उसे अपने चैम्बर में ले गये। चाय की चुस्कियों के बीच उन्होनें बताया कि यहाँ कोई भी व्यक्ति किसी विकलांग बच्चे के शिक्षा व भोजन का खर्च उठाकर उसकी मदद कर सकता है।
“चलें, कार्यक्रम शुरू होने वाला है ?”
सांस्कृतिक कार्यक्रम दे रहे बच्चों में कुछ देख नही सकते थे, कुछ अपंग थे कुछ मूक व बधिर दोनों थे| सभी ने बहुत खूबसूरत प्रस्तुतियां दी। कार्यक्रम अत्यंत मन भावन था। उन विकलांग बच्चो की प्रतिभा देख अनु विस्मित थी | अंत में बच्चों ने उसे अपने हाथों से बना पर्स दिया तो उसका मन भर आया। सोचने लगी अनु कि उसे कुछ ज्यादा तन्खाह मिलती तो वे भी किसी का भार ले सकती ।पुन: उसे लगा कहीं सब लोग ऐसा ही सोच कर तो मदद ही नही करते।
अनु के कदम विकलांग केन्द्र के बाहर न जाकर आफिस की तरफ मुड गये।

***

लघुकथा-४
हक

“मम्मा ,आपका फोन …”
“मन ,मेरे हाथ मे बेसन लगा है तू मेरे पास उसे ले आ और स्पीकर ऑन कर दे”उसने अपने बेटे को कहा।
“क्या मॉम”..बेमन से फोन लेकर उसने उसके मुख के सामने लगा दिया।
“हैलो”..
“कैसी है मैडम ..मै चित्रा ”
“हाँ चित्रा बोलो”
“मैडम..अभी तो लॉकडाउन चल ही रहा है …
आपका काम मेरे नही आने से बढ़ गया न..”
“कोई बात नही चित्रा..मैनेज कर ले रही हूँ..तुमलोग घर पर ही रहो ..बिना मास्क के नहीं निकलना”उसने उसके प्रति चिंता जाहिर करती हुई बोलती गई।
“जी मैडम…”
“एक बात पूछनी थी मैडम”
“हाँ पूछो”
“मेरे पास चावल ज्यादा मात्रा मे है ..क्या आप खरीदेंगी”
“क्या ..चावल”वो अचरज से बोली ।
“जी मैम”
मन का ध्यान अचानक से उसकी बातों पर गया..
हाथ से इशारा किया ..क्या कह रही है?
“समझी नहीं चित्रा” वो उसने विस्तृत बात जानना चाही।
“हाँ मैडम ,इस करोना की वजह से सरकार ,कुछ एनजीओ ने चावल बाँटे थे मैम…
मैने ज्यादा ले लिया ..सभी जगह से ले लिया
अब दो जन का परिवार ..
कितना खाएँगे..ज्यादा दिन रहेगा तो कीड़े भी लग जायेगे..
सोचा बेच दे ..ाहर बेचना मुश्किल है पुलिस है …इसलिए”उसने बात जारी रखी ।
“मैडम पूछ रही थी आप मुझसे खरीद लेते तो पैसे मिल जायेंगे।”
“अच्छा चित्रा मैं कुछ देर मे कॉल करती हूँ..”
“ठीक है मैडम ..आप सोचना हाँ..”.
“करती हूँ चित्रा..”फोन काट दिया मन ने।
“मम्मा, ये लोग कैसे है ..जब जरूरत नही थी तो क्यों राशन ली.. मुफ्त में मिल रहा ..उफ्फ!”मन ने प्रश्न अपनी मॉम से किया।
“अब आप क्या करेगी .?”..
“तू पकौड़ा का प्लेट लेकर ड्रॉइंग रूम जा..मै आ रही हूँ” ..वो बेटे को कही और अंतिम खेप पकैड़े के कढ़ाई मे डाल दिये।
मन चला गया। चंद मिनट बाद वो भी बेटा के पास पकौड़ा खाने आ गई।
सुंदर से बैठक के मुख्य दीवार पर लगी पेटिंग को मन देख रहा था कहा
“क्या सोचकर आपने ये चिडियों वाली पेंटिग बनाई मॉम? वह भी अपनी बनाई पेंटिग को देखने लगी । वो उत्तर देने की जगह मुस्कुरा दी।
अपना मोबाइल लिया फोन लगाया..
“आप मधुबन ढाबा से बोल रहे है”..
“जी ,कहिये”
“मै आपके मालिक से बात कर सकती हूँ ”
“देता हूँ”
“जी,मै रामेश्वर बोल रहा हूँ कहिये..”
“रामेश्वर जी,आप पैदल चल रहे मजदूर को जो मुफ्त मे खाना खिला रहे है..क्या मै आपको चावल भिजवा सकती हूँ.?”
“जी अवश्य .”.
“जी, कल मेरी मेड आपको चावल पहुँचा देगी”।
“आपका आभार”फोन कट कर
उसने फिर चित्रा को फोन लगाया।
“चित्रा मै तुम्हारा चावल खरीद रही हूँ .. चावल का दाम मुझसे ले लेना पर चावल मधुबन ढ़ाबा मे पहुँचा देना”
“क्यों मैम”चित्रा ने पूछा
“जो कह रही हूँ करो न”
“गुड ..मॉम” देखा बेटा मुस्कुरा रहा था।
पेंटिग भी यही सोच कर बनाई थी न……..हर चिड़िया के लिए उसका दाना उसका हक है।

***

लघुकथा-५
संस्कार
आज सुबह की ही बात थी । जब सोना ने उससे पूछा था
“उदास क्यों बैठे हो, कोई फोन आया क्या?”
“नही, अभी तक कोई प्रोजेक्ट नही मिला । मै कहता हूँ न यहाँ सबों को खिलाना पिलाना पड़ता हैं ।”
“अब”
“समझो गई नौकरी”
नौकरी जाने के नाम से दोनो के आँखों के सामने बिल की लंबी फेहरिस्त नजर आने लगी । ई० एम० आई० ,दूध बिल,मोबाइल बिल.बिजली बिल ,मकान भाड़ा..इस महँगाई के समय मे एक दो माह भी बिना पैसों के रहना कितना कठिन हैं।
“मैं तुमसे बार- बार कहता हूँ उनलोगों को खाने पर बुला लेते हैं”
“नहीं”
“तुम समझती नहीं हो , आजकल ऐसा करना पड़ता है”
“उन्हें बाहर खिला दो”
“बाहर खिलाने मे बहुत रूपये लग जायेंगे।”
“तो क्या करूँ”
“तो घर में हीं बुला लेते हैं ,क्या कहती हो”
“मेरे किचन मे नॉनवेंज नहीं बनेगा”
“बन ही गया तो क्या होगा.दुनिया तो खाती है”
“खाती होंगी , हमारे परिवार मे नही चलता”
“हमलोग किसी से नहीं कहेंगे ”
“कहने की बात नहीं हैं हमारे कुछ उसूल हैं ,फिर तुम भी उन लोगों का साथ देने खा लोगे ”
“जब पैसें नहीं होंगे न तो उसूल को प्लेट मे रख खाना ….मैं कुछ नही जानता हूँ ,मैं उन लोगो को बुला रहा हूँ।”
रात हो गई है।
सोना काँफी बनाने किचन मे गई है ।वो बॉलकोनी मे खड़े होकर आकाश की ओर देख रहा है । पूरा घर नॉनवेज की गंध मे भरा हुआ है।आज पहली बार उसके घर मे मांस मछली ,पोर्क वैगरह बने हैं।
“ये लो कॉफी”
“चलो ,आखिर मिल ही गया प्रोजेक्ट,नौकरी बच गई”
सोना ने उसके हाथो के उपर हाथ रख कर उसकी ओर देखा और धीमे से बोली
“नौकरी तो बच गई पर संस्कार”


पाँच लघुकथा

नीलम राकेश
लखनऊ

लघुकथा-१
“ गलती”
चार साल का ननकू अपनी झोंपड़ी के सामने रो-रोकर हलकान हो गया था । उसको समझ नहीं आ रहा था, उसकी गलती क्या थी। माँ ने उसे आखिर इतना क्यों मारा? और मारा तो मारा पर मार कर रोईं क्यों !! उसने तो केवल अपनी रोटी में से आधी रोटी तोड़ कर कुत्ते को दी थी।

***

लघुकथा-२ “मिलावट
25 किलो बारीक कंकड़ी, सारी दाल की बोरियों में अच्छे से डाल कर उसने अपनी कमर सीधी की । प्रसन्नता से उसने दाल की बोरियों की ओर देखा । सीधा-सीधा 5,000 का मुनाफा था। अभी वह पूरी तरह खुश भी नहीं हो पाया था की परेशान हाल पत्नी गोदाम में चली आई ।
“सुनो जी, छोटू का बुखार नहीं उत्तर रहा। देखो तो कहीं ये दवा नकली तो नहीं है। आजकल इन मुनाफाखोरों का कोई भरोसा नहीं। लालच के अंधे ये लोग अब लोगों की सेहत से भी खिलवाड़ करने लगे हैं। हे भगवान, इन्हें कड़ी सजा देना।” कहते हुए पत्नी ने दवा का पत्ता उसके हाथ में थमा दिया।
वह कभी दवा के पत्ते को देखता और कभी दाल की बोरियों को।

***

लघुकथा-३
“निर्णय”
निहारिका गाउन पहने वालकनी में खड़ी थी । वह बहुत हल्का महसूस कर रही थी । इस निर्णय पर पहुँचना उसके लिये आसान नहीं था। बहुत पीड़ादायी उतार-चढ़ाव से गुजरी थी वह । मानसिक यातना का एक दुरूह दौर था वह । परन्तु, एक बार निर्णय कर लेने के बाद सब कुछ बहुत सहज लग रहा था ।
नीरज, निहारिका को आवाज देता हुआ तेजी से बालकनी में आया। परन्तु उसे गाउन में खड़े देखकर, उसकी भृकुटी तन गई ।
‘‘ये क्या निहारिका तुम अभी तक तैयार नहीं हुई ? तुम्हें पता है न मैंने डाक्टर से टाइम ले रखा है । वहाँ से निपट कर मुझे फैक्टरी की एक जरूरी मीटिंग भी अटेन्ड करनी है । जल्दी करो। तुम लोग समय के महत्व को समझती ही नहीं हो ।’’
‘‘मुझे कहीं नहीं जाना है ।’’ निहारिका ने दृढ़ शब्दों में नीरज की आँखों में देखते हुये जवाब दिया ।
पल भर को भौचक्का रह गया नीरज । डरी, सहमी सी उसकी पत्नी अचानक बदल कैसे गई । परन्तु अपने को सहेज कर वह चीखा, ‘मुझे ‘‘नहीं’’ सुनने की आदत नही । फौरन तैयार हो जाओ ।’
‘‘नीरज, मैं फैसला कर चुकी हॅूं। एक बार तुम्हारे कहने पर मैं अपनी कोख उजाड़ चुकी हूँ । यदि आने वाली संतान लड़की है, तो इसमें उसका क्या दोष है? उस अजन्मी को मृत्यु दण्ड क्यों दे रहे हो ? …..और नीरज क्या गारेंटी है कि अगली बार लड़का होगा । कब तक तुम अपनी ही बेटियों की हत्या करते रहोगे?’’
‘‘जब तक बेटा नहीं होगा, मैं बेटी को नहीं आने दूंगा समझी तुम।’’ बौखलाया सा नीरज गरजा ।
‘‘ठीक है, तुम पिता का कर्तव्य नहीं निभा पा रहे तो मत निभाओ, लकिन मैं मॉं हूँ और माँ होने का फर्ज निभाऊँगी । मैं अपनी बेटी को जन्म दूंगी और बिना तुम्हारी मदद के उसे पालूंगी । हाँ, एक बात और, मैं तुम्हारा घर छोड़ कर जा रही हूँ, क्योंकि जो पुरूष पिता का कर्तव्य नहीं निभा सकता उसे पति का अधिकार देने को मैं तैयार नहीं । तुम जब चाहो तलाकनामा भेज देना। मैं हस्ताक्षर कर दूंगी ।’’ कहती हुई निहारिका सधे कदमों से कमरे में प्रविष्ट हो गई ।
अवाक नीरज इस निर्णय की मार झेलता सा खड़ा रह गया ।

***

लघुकथा-४
“बन्द”
झुग्गी-झोपड़ी में शिक्षा का अलख जगाने का हमारा मिशन पूरे जोरों पर था । नन्हें मुन्नों को देने के लिए कुछ चॉक-स्लेट और बिस्कुट लेकर मैं घर से निकल पड़ा । घर से निकलते हुये मेरे अधरों पर प्रसन्नता की स्मित खिची हुई थी। बात ही ऐसी थी। कल मेरे अग्रज द्वारा आयोजित बन्द पूरी तरह सफल रहा था। होता भी क्यों नहीं आखिर वे जनप्रिय नेता थे। आज के सारे अखबार इसी खबर से रंगे हुये थे। घर में सुबह से यही चर्चा थी।
झुग्गी-झोपड़ी के अपने क्षेत्र में पहुँचते ही
नन्हे ननकू पर मेरी नजर ठहर गयी। जो टुकुर-टुकुर सूनी सड़क को निहार रहा था ।
‘‘अरे ननकू वहॉं क्या देख रहे थे? चलो, पढ़ाई का समय हो गया है ।’’
‘‘हमका भूख लागल बा।” बिना नजर घुमाये ननकू बोला ।
‘‘आधा दिन बीत गया, तुमने अभी कुछ खाया नहीं?” आश्चर्य मेरे स्वर में उतर आया ।
ननकू के स्थान पर पास बैठे एक बुजुर्ग बोले, ‘‘बच्चन का पढ़ावे का काम सोझो बा बिटवा। जिन्दगी के पढ़ना बड़ों गूढ़ बा।’’
‘‘मैं समझा नहीं बाबा।’’
‘‘काहे बूझोगे बचवा,पर हमार लड़िकन का बन्द का मतलब बताये का न पड़ी। ऊ तो ‘‘बन्द’’ के नाम से जान जात हैं कि घर का चूल्हा बन्द।’’
मैं विस्फारित नजरों से ननकू को देखने लगा। जो हमारी बातों से अनजान भूखे पेट और आशा भरी नजरों से अपलक सड़क को निहार रहा था। जहॉं से उसका बापू रोटी लेकर आने वाला था।
बन्द का यह अर्थ मैंने आज जाना था।

***

लघुकथा-५
“जिम्मेदारी”
जैसे ही पैसा देकर मैं मुडने लगा वह हाथ जोड़कर बोला, “साहब आपसे कुछ कहना था।”
मैंने मुस्कराने की कोशिश करते हुए कहा “हाँ- हाँ, बोलो ना।” मेरी आँखों के सामने पिछले एक महीने का हर वह दिन नाच उठा जब मेरा छोटा बेटा जो मात्र 5 वर्ष का है मेरे साथ फल लेने आता है और ठेले पर से कभी सेब तो कभी संतरा उठाकर खा लेता है।
वह हाथ जोड़कर बोला “साहब आप मेरे बहुत पुराने ग्राहक हैं। बिटुवा को इतने से बड़ा होते हुए देखा है मैंने। मेरी अम्मा कहती थीं बच्चा गलती करें तो हर बड़े की जिम्मेदारी है कि वह उसे सही और गलत बताये। इसीलिए कुछ कहना चाह रहा हूँ।”
मेरा माथा ठनका, खुद को संभाल कर बोला, “हाँ-हाँ, बोलो न क्या बात है?” मन ही मन सोच रहा था, क्या है अगर इसने देख लिया है तो पैसा दे दूंगा।
“बाबूजी आपका बच्चा मेरा भी बच्चा है। बच्चे के एक फल खा लेने से मेरा कोई बहुत नुकसान नहीं होगा पर बाबूजी हम बड़े अगर उसे नहीं बताएंगे कि क्या सही है और क्या गलत, तो वह बेचारा यह अंतर कभी नहीं जान पाएगा। कल जब वह गलती करेगा तो उसका दोषी वह नहीं हम और आप होंगे। वैसे आप समझदार हैं। मैं तो अनपढ़ आदमी हूँ।”
मैं आत्मग्लानि से गड़ा जा रहा था। मेरी पी.एच.डी इस अनपढ़ आदमी की सीख के आगे पानी भर रही थी।


पाँच लघुकथा

रचना शर्मा
चितवन, नेपाल

लघुकथा -१
मायका

“गोठों को सोभा देगा माली नाम के गाय से
मायकी को सोभा देगा दाजुभाई से….”
शादी के दिन, मनमाया के घर पर पड़ोसी इकट्ठा हुए और तीज का असली गीत गाया। मनमाया की बेटी मुना ने मादल की ताल पर कमर मटकाते हुए नृत्य किया। मुना के नाचते ही उसका भाई भी गीत का अभिनय करते हुए उसके साथ नाचने लगा। कार्यक्रम बहुत मज़ेदार था।
इतने खुशनुमा माहौल में भी मनमाया की आँखें नम थीं। देखने वालों ने सहज ही अनुमान लगा लिया, “और दिनों में मनमाया के बच्चे कुत्ते-बिल्लियों की तरह लड़ते थे, आज वे खुशी से नाच रहे है। इसीलिए मनमाया की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले होंगे!”
आधा अनुमान सही था, लेकिन आधा अनुमान सिर्फ़ मनमाया को ही पता था।
शादी के बाद, मनमाया हमेशा तीज पर अपनी माँ के पास जाती थी। जब वह तीज मनाने के लिए अपने मायके नहीं जाती थी, उसके माता-पिता और भाई बहुत दुखी होते थे।
माता-पिता की मृत्यु के बाद पहली तीज में भी तीज मनाने के लिए वह अपने मायके गई थी। तीज के बाद जब वह घर लौट रही थी, तो उसके भाई ने कहा था, “बहन! पिछले साल तक माँबाप जीवित थे और जब तुम मायके आती थीं वह बहुत खुश होते थे, लेकिन अब…!”

***

लघुकथा-२
लघुकथा – गुरु का चित्र

भाई अपने कमरे में काम कर रहा था।उसकी बडी बहन भाई के सामने आकर खड़ी हो गई । भाई चौंक गया। “बहन…! बिना बताए… मेरे कमरे में ?” भाई ने अपनी बनाई हुई तस्वीर को एक पत्रिका से ढकते हुए पूछा ।
“क्या मुझे अपने छोटे भाई के कमरे में आने के लिए भी बताना पडेगा, जो एक ही घर में रहते है? यह लड़का कमाल करता है! और जैसे ही मैं आयी, क्या छुपाया है तुमनें? दिखाओ मुझे !”
“ऐसा कुछ नहीं है बहन, आज गुरु पूर्णिमा है, इसीलिए मैं कल से अपने गुरु को उपहार देने के लिए उनकी एक तस्वीर बना रहा हूँ। अब मैं इसे पूरा कर रहा हूँ। मैं इसे आधे घंटे में पूरा कर लूँगा और फिर उन्हें दिखाऊँगा!”
भाई की बात सुनकर बहन “ठीक है,ठीक है।” बोलकर अपने काम पर वापस चली गई।
भाई जल्दी से तस्वीर तैयार करके अपनी बहन के पास आया और बोला,”बहन! मैंने गुरु की तस्वीर तैयार कर ली है,अब मैं इसे गुरु को देने जाऊंगा, ठीक है?”
“तुमने कैसा चित्र बनाया है, कौन से गुरु का चित्र बनाया है, पहले मुझे तो दिखाओ!”
बनाए हुए चित्र को भाई ने अपनी बहन को दिखाया । भाई द्वारा बनाया गया चित्र देखकर उसकी बहन स्तब्ध हो गई और पूछा, “भाई! क्या तुम भी.., तुम भी इस को गुरु मानते हो?”
बहन का हाथ पकड़ते हुए भाई ने बोला, “माँ-बाप की मृत्यु के बाद इस भाई की एक अच्छी गुरु आप ही तो हो न, बहन!”

***

लघुकथा-३
मौत का डर

“पिता जी! बस का टिकट काट दूँ?”
“ऐसे बरसात में यात्रा पर जाना मौत को न्योता देना जैसा है, नहीं मैं नहीं जाऊंगा अभी । हर जगह भूस्खलन हो रहा है।सड़कों में दोनों ओर खाइयाँ हो गई हैं।”
“नहीं तो हवाई जहाज का टिकट ले दूँ ?”
“नहीं, हवाई जहाज से तो बिल्कुल भी नहीं जाऊंगा । विमान दुर्घटनाओं में नजाने कितने लोग मारे जाते हैं आजकल।”
“तो फिर कैसे जाएंगे? आपके मितवा की चौरासवीं पूजा हैं । आपको जाना ही होगा।
“पहले, हम पैदल ही चलते थे। उन दिनों सबकुछ सहज था। अब तो चलते समय पहाडियों से सीधे सर पर पत्थर गिर कर मार न डाले! तौबा! तौबा!! नहीं अभी नहीं जाऊंगा बारिश रुकने के बाद ही मितवा से मिलने जाऊंगा।”
यात्रा के लिए प्रतिकूल मौसम और असुरक्षित परिवहन को देखते हुए उनके पिता ने यात्रा की तारीख आगे बढ़ा दी। और नाश्ता करने के बाद वह आराम करने के लिए अपने कमरे में चले गये ।
“पिता जी ! चलो, शाम को पैर फैलाने के लिए सैर पर चलें!”
उसने कमरे के बाहर से आवाज लगाई ।
पिता जी ने नहीं सुने तो वह उनके कमरे में चला गया। उस ने देखा कि, पिताजी बिस्तर पर ही हमेशा के लिए पैर फैला चुके थे…….!

***

लघुकथा-४
लघुकथा – बारी
रचना शर्मा (चितवन, नेपाल)
2024 के आखिरी दिन, रात को ठीक 11:59 बजे, 2025 आ पहुँचा। 2024 को अपनी गद्दी पर बैठा देखकर, 2025 की धड़कनें तेज़ हो गईं। उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर 2024 को मारा। 2024 रोते हुए पीछे हटा, और अचानक ज़ोर से हँस पड़ा।
आस-पास के जीव आश्चर्यचकित हूई । उन्होंने अनुमान लगाया कि वह पागल हो गया है क्योंकि उसे राजगद्दी छोड़नी पड़ी। “चलो उससे पूछते हैं, वह अब भी हमें कुछ जवाब दे सकता है ।”, सोचते हुए उल्लू ने पूछा, “2024 भाई! इतने दुःख के समय में तुम रोना छोड़कर क्यों हँस रहे हो?”
2024 ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “अगले साल, 2025 को भी 2026 मेरी तरह मारेगा भाई!”

***

लघुकथा-५
अबोध प्रश्न

माँ आँगन में पूजा की सामग्री तैयार कर रही थी, तभी उसकी छोटी बेटी दौड़ती हुई आई और पूछा, “मम्मी! आज हम किस भगवान की पूजा करेंगे?”
माँ ने कहा, “छठी माई को ।”
बेटी ने फिर पूछा, “मम्मी ! यदि देवी लक्ष्मी धन देती हैं और देवी सरस्वती ज्ञान देती हैं, तो छठी माई क्या देती हैं?”
“बेटी! अगर हम छठी माई की पूजा श्रद्धा से करें, तो वे जिनके पास धन नहीं है उन्हें धन, जिनके पास विद्या नहीं है उन्हें विद्या और जिनके पास संतान नहीं है उन्हें संतान देंगी।” माँ ने बेटी को समझाया। लड़की ने बात बदलते हुए कहा, “मम्मी! दूसरे घर वाली चाची मुझे हमेशा गोद मेँ उठाकर परेशान करती हैं।”
“उनके कोई बच्चे नहीं हैं। इसीलिए वे तुमसे प्यार करते हैं! प्यार – दुलार को भी दिक्कत मानोगी क्या ?” माँ ने समझाया।
“तो फिर आप उनको भी छठ पूजा करने के लिए कहिए न !”
समलैंगिक जोड़े, जो लड़की की बातें सुनरहे थे , वह एक दुसरे को देखते ही रह गये ।

***

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