20 लघुकथाएँ-2020


हतप्रभ

वह उठा।
बाहर घर के खुले आंगन में आ बैठा।
कई तरह के फूलों से क्यारी महक रही थी। मौसम जो था।
वह फूलों के पास गया और खुशबू से तरोताजा महसूस करने लगा।
उसने दो फूल तोड़े और वापस आ कुर्सी पर बैठ गया।
हाथों में फूल लिए , खुद को आनंदित महसूस किया। दोनों हाथों को व्यस्त देख, उसे एकदम सूझा और उसने वो फूल कानों पर रख लिए।
हवा आई। उसने देखा और मुस्कुरा कर आगे बढ़ गई। इस व्यवहार पर वह भी मुस्करा दिया।
पेड़ पर बैठे पंछियों ने देखा तो वो भी अपनी चहचहाहट रोक ना सके। उसका मन भी पुलकित हो उठा।
आंखों को बंद कर वह इसी मुद्रा में लीन हो गया।
पड़ोस में रहता उसका भाई आया और उसे इस हालत में देख, गुस्से में बोला,” ये क्या पागलपन है, तुझे क्यों आदमी बन कर रहना नहीं आता ?”
इस गुस्सैली आवाज को सुन, फूल एकदम मुरझा कर नीचे गिर पड़े। भाई उसी गुस्से में पांव पटकता हुआ , वापस लौट गया। वह हतप्रभ सा उसे देखता रह गया।
डा श्याम सुन्दर दीप्ति

बुलावा
ठक-ठक….!
“कौन ? दरवाजा खुला है आ जाओ ।”
“राम राम चन्दा!”
“राम राम बाबूजी! आप यहाँ!”
“क्यूं मैं यहाँ नहीं आ सकता?”
“आ क्यूं नही सकते ! पर यहाँ आता ही कौन है!”
“आया न आज ! ये कार्ड देने मेरे बेटे की शादी का !
“कार्ड ! बेटे की शादी का !”
“हाँ अगले महीने मेरे बेटे की शादी है तुम सब आना ।”
“……!”
“…और ये मिठाई सबका मुँह मीठा करने के लिये !”
कांपते हाथों से मिठाई का डिब्बा पकड़ते हुए चंदा बोली
“हम तो जबरदस्ती पहुंच जाते है शादी ब्याह या बच्चा पैदा होने पर तो लोग मुँह बना लेते हैं और आप हमें बुलावा देकर…..!”
“चन्दा, बरसों से तुम्हें देख रहा हूँ सबको दुआएं बांटते !”
“…..!”
“याद है जब मेरा बेटा हुआ था तो पूरा मोहल्ला सिर पर उठा लिया था तुमने खुशी के मारे ।”
“हाँ! और आपने खुशी खुशी हमारा मनपसंद नेग भी दिया था !”
“तुम्हारी नेक दुआओं से मेरा बेटा पढ़ लिख कर डॉक्टर बन गया है और….. तुम सबको उसकी शादी में आना ही होगा !”
“क्यूं नही आएंगे बाबूजी जरुर आएंगे ! आपने इतनी इज्ज़त देकर बुलाया है क्यूं न आएंगे!”
कहते हुए चंदा की आँखे गंगा जमुना सी बह उठी और उसका सिर बाबूजी के आगे सजदे में झुक गया ।
अंजू खरबंदा
दिल्ली

।जात- पात।।
रविवार मुर्गे -बकरों की शामत का दिन है। आज शहर में बकरीद की मानिंद सैकड़ों बकरे व मुर्गे कटेन्गे, तकरीबन ८०-९०% घरों में पकेन्गे। और जब ये पकेन्गे तो इन्हे पचाने मदिरा तो आएन्गे ही आएन्गे ।
बहरहाल इस आलम में जो अछूते हैं ,वही रियल में अछूत हैं। सरकारी नौकरी -चाकरी से लेकर दिहाड़ी करने वाले कुली कबाडी तक “जश्न ए संडे ” में डूब जाते हैं। क्या गजब का अंग्रेज़ी तिहार है ।
सुबह -सुबह चर्च के प्रेयर से मुक्त होते माइकल मुलायम बकरे की गोश्त खरीदने के लिए साइकिलिंग करते शहर की पुरानी कसाई खाना गये। सोचा कुछ कीमा भी लेते आए अर्सा हो गये कबाब खाए? कोरोनाका के लाकडाउन में होटले/ बिरयानी सेंटर बंद है तो घर में ही पका -खा ले । दूर से एक बंदा शायद जासुस सा हाव भाव देखते समझ गया और जोर से आवाज दिए-” ओय सर जी ! यही मिलेगा शानदार मक्खन जैसा “करीम का कीमा ”
पास सायकल खड़ा करते पुछे -“क्या भाव ?”
“सर जी !७०० रुपये १०० रुपये तो कुटने का लगा रहे हैं। मेहनत बहुत है सर जी !
अरे लूट रहे हो जी उधर हमारे तरफ तो ६०० में गोश्त लो या कीमा सब समान रेट हैं।
अरे जनाब !क्या कह रहे हैं कसाई कभी बेईमानी नहीं करता उधर गड़ेरिये और हिन्दुओं की दूकाने है। भला वे लोग हमसे बेहतर कटिंग्स क्या जाने ? यहाँ क्वालिटी और कटाई -चुनाई का महत्व है तभी तो जानकार टूट पड़ते हैं।
सच में खाल उतरे बकरे रस्सी से लटके करीने से सजे थे। उनमें मक्खियाँ भिनभिना रही थी ,उसे हांकते और उनकी तरफ दिखाते कहे -“ऐसा सफाई और चुनाई ओ कर दे तो ,कसम मौला की !धंधे छोड़ दे और बकरियाँ चराने गड़रिये बन जाय !”
“अच्छा यह तो अच्छी बात है! कसाई से गड़रिये यह तो पुण्य का काम है । ये मारना – काटना छोड़ पालना शुरु कीजिए । मारने से बचाने व पालने वाला बड़ा होता हैं।
अरे साहब! काहे नीच नराधम बनाने की सोच रहे हैं। हमारे ही लहु सने दिए पैसों से पलने वाले गड़रिये से हम ऊचे दर्जे का है। वे हमारे आगे गिड़गिड़ाते है हमसे छोटे हैं। बड़ा हमीं हैं और रहेन्गे सदा।
माइकल सोच मे पड़ गये -“ये ऊंच -नीच कहा कहां घुस गये हैं। उस दिन कबाड़ वाले देवार कह रहे थे कि हम नेताम आदिवासी देवार सुअर पालने वाले शहरी देवार से ऊंच है। इसी तरह घसिया सूत सारथी सफाई करने वाले भंगी मेहतर से स्वयं को ऊंच कहते हैं। और तो और खाल छिलने वाले मेहर से खाल की जूते बनाने वाले मोची ऊंच बना बैठा है। मलनिया से अधिक प्रतिष्ठित सेलून में बाल काटने वाले नाई है। इसी तरह बड़ी मच्छी मार नाविक- केवट से नीच छोटी मच्छी और उनकी सुक्सी बेचने वाले ढीमर हैं। किसान के बरदी चराने व गोबर बिनने वाले राउत से बडा खुद के डेयरी चलाने , कचरा खाद करने वाले यादव बड़े बने हुए हैं। इधर किसानो में कुर्मी -तेली बड़हर व प्रतिष्ठित है और लोधी अघरिया हिनहर कैसे गये हैं।शादी- ब्याह व सत्यनारायण कथा करने वाले ब्राह्मण अंत्येष्टि करने/ पितर बरा भात खाने वाले से ब्राह्मण से उच्च बना हुआ हैं।और पैदल सैनिक से बड़ा हाथी घोड़े वाले क्षत्रिय बड़ा है।” छोटी किराना और बजरहा बनिए से शहर में शो रुम खोले वैश्य उच्च हैं।
विचित्र मान्यताओं व संस्कृति वाले अजायबघर देश में मांस ,मदिरा, खान -पान वाले आमिष आहारी और निरामिष के बीच सडयंत्र कर परस्पर एक- दूसरे को लडाने वाले छुआ-छूत, जात- पात को बढावा देने प्रभावशाली तथाकथित सात्विक आहारी -विहारी उनके शास्त्र आदि को यही कीमियागिरी लोग पूज्यनीय बना रखे है! जिनकी गाढ़ी कमाई और श्रद्धा के वही लोग सौदागर बने मजे लूट रहे हैं।
इधर कुछ जातिविहिन समानता वादी सिख ,सतनामी कबीर पंथी , बौद्ध जैन ईसाई भी केवल उत्सवी बन‌कर रह गये हैं। और उनमें इनके देखा -देखी अनेक धड़े, फिरके बनने लगे हैं।
बहरहाल ठोस विचारों की किमागीरी करते अपने रास्ते पैडल मारते माइकल आए ..और हमें देख फूट पड़े ओ लेखक महोदय ! कब इस देश से जात -पात, ऊंच -नीच भेदभाव जाएगा और मानवता स्थापित होकर समानता का मार्ग प्रशस्त होन्गे ? उनके औचक प्रश्न व व्यवहार देख हम हतप्रभ सा रह गये।
-डॉ. अनिल कुमार भतपहरी 9617777514 , रायपुर छ ग भारत

*चाबी
“विकास घर की चाबी दे दे यार।”
“हाँ, चाबी तो ले ले मगर देख यार रवि, मैनें शाम के लिए खाना बना कर रखा है, पिछली बार की तरह वह खा मत जाना।”
“अरे यार पिछली बार पंकज ने चाबी ली थी उसने ही खाया होगा, मैनें तो एक माह से तेरे घर की चाबी ली ही नहीं है।”
” ठीक है।”
“अब करें भी क्या! तूँ तो लकी है जो तुझे तेरे माँ बाप का घर मिल गया। हम बाहर से आये हैं यार, इतने सालों से संघर्ष कर रहे। गाँव में सब सोचते हैं मुम्बई में अच्छा खासा कमा रहे हैं। जो पैसे हम पेट काट कर भेजते हैं वह भी उन्हें कम पडते हैं।
आज छोटा भाई आ रहा है, उसे कैसे बताऊँ कि अब तक हम गार्डन की बैंच पर सोते हैं।”
“हाँ मेरे भाई मैं समझ गया तूँ ले जा चाबी।”
“सुबह-सुबह वो चला जायेगा।”
“हाँ ठीक है, अपना बेड रुम मैं बंद कर रहा हूँ तुम बाहर बाले रुम में ही रहना।कल मेरी फ्रेंड आ रही है।”
“विकाश कल तेरी कौन सी शिफ्ट है।”
“नाईट है।”
“तो तुम कल दोपहर घर में रहोगे।”
“हाँ भाई तो अब अपने घर में भी न रहूँ?”
“यह बात नहीं है यार, हम पाँचों में केवल तेरे पास ही तो घर है। किसी के रिश्तेदार हो या गर्ल फ्रेन्ड तेरे यहाँ ही तो आते हैं।”
“अच्छा विकाश आज पार्टी किस खुशी में दे रहा है यह तो बता?”
“एक खुशखबरी है दोस्तो, मैं अगले माह शादी कर रहा हूँ यह बताने के लिए ही आज पार्टी रखी है।”
“बधाई विकास।”
“लो नाश्ता तो करो।”
“नही विकास, हम जाते हैं बहुत काम है यार।हाँ हाँ, पार्टी फिर कभी।”
सभी दोस्तों को जाते और आइसक्रीम को पिघलते देखता रह गया विकास।
ऋचा यादव
बिलासपुर


परवरिश
“शुक्ला जी, मिठाई खाइए, मेरे बेटे को नोएडा में एक बड़ी कंपनी में जॉब मिल गया है|”
“अरे वाह, बहुत बधाई, आपकी और बच्चे की मेहनत सफल हुई, सिंह साहब|” शुक्लाजी ने दिल से मुबारकबाद दी थी और सिंह साहब का चेहरा गर्व से दमक उठा|
शासकीय कर्मचारियों की उस कॉलोनी में अधिकांश बाबू थे जो या तो रिटायर हो चुके थे या रिटायर्मेंट की कगार पर थे| धीरे-धीरे कर सबके समवयस्क बच्चे भी करियर में स्थायी हो रहे थे| बस एक शुक्लाजी का बेटा ही था, जो पढाई में तेज नहीं था| लोग पीठ पीछे कहते, “भई माना, बहुत इमानदारी से नौकरी की शुक्लाजी ने, पर संबंधों का फायदा लेकर लड़के को तो कहीं लगा देते| ऐसी शराफत भी किस काम की|”
शुक्लाईन कुछ कहती तो शुक्लाजी हंसकर टाल जाते, “ऊपर राम है और नीचे काम| मैं तो सिर्फ सलाह दे सकता हूँ और आशीर्वाद|” पर जीवनयापन के लिए कुछ तो करना ही था, बेटे ने दुकान खोलने की इच्छा जाहिर की| शुक्लाजी ने घर के गैरेज से किराना दुकान खोलने का मशविरा दिया, साथ में यह भी कहा, “बेटा, व्यापार में मुनाफे से ज्यादा नजर नियत पर रखोगे और व्यवहार में मिठास बनाए रखोगे तो बरकत रहेगी|” बेटा पढाई में भले ही कुशाग्र नहीं था पर धंधे में खरा निकला| पिता के लिए मन में आदरभाव था, सो उनकी सलाह मान कर ही आगे बढ़ता गया| अगले ही साल बैंक से लोन लेकर पास वाले मार्केट में बड़ी दुकान खरीद ली| अब दुकान अच्छी चल निकली, साख भी बन गई लेकिन कॉलोनी के कई लोगों की नजर में विदेश या महानगरों में बसे बच्चों की तुलना में उसे कमतर ही समझा जाता|
इस वर्ष तो उसने शहर के सबसे बड़े मॉल में सुपर-मार्केट खोलने की योजना बनाई थी कि यह विश्वव्यापी महामारी आ धमकी| खैर, उसने समय की नब्ज को समझते हुए पैर खिंच लिए और दुकान के सामान की ऑनलाइन डिलीवरी शुरू कर दी| कॉलोनी के सभी घरों में वह खुद पूरी सावधानी से सभी जरुरी सामान पंहुचा रहा था| अधिकांश के बच्चे बाहर थे, सो सामान की डिलीवरी के साथ ही सबके हालचाल पूछना उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया|
एक दिन सिंह अंकल उसे असहज लगे तो तुरंत डॉक्टर को ले आया| पता चला, शुगर और बीपी दोनों बढ़े हुए थे, हार्ट-अटैक हो सकता था| सिंह साहब का बेटा नोएडा से उसे फ़ोन कर माता-पिता का हालचाल लेता| किसी को इलेक्ट्रीशियन चाहिए तो किसी को पलम्बर, सब उसे ही कहते और वह सहज मुस्कान के साथ उपस्थित रहता|
एक दिन सिंह साहब ने शुक्लाजी को फ़ोन किया, “शुक्लाजी, हम लोगों को बड़ा गर्व था कि हमने बच्चो को पैसा कमाने लायक बनाया पर आपने बच्चे को सम्मान कमाने लायक बनाया| सच है, नेक-नियती और भलाई सिखाई नहीं जाती, वो बच्चों में अपने बड़ों को देखकर ही आती है| बेहतरीन परवरिश के लिए आपको बधाई|”
-शैली बक्षी खड़कोतकर

“पैमाना”
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“भैरवी दी! तुम तो करोड़पति परिवार में ब्याही गई हो। हर तरह से समृद्ध हो। फिर नेटवर्क मार्केटिंग में इस तरह दिन रात सालो भर क्यूँ माथापच्ची करती रहती हो? चैन से जीती क्यों नहीं?”
“वो… बड़े बड़े सपने। बड़ी रकम। बड़ी खुशी।सुख..पूरी दुनिया घूमने का शौक वगैरह वगैरह…।”
“वाकई तुम्हें या जीजू को बीते सात सालों से काम करते एहसास हो रहा है कि अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे हैं ? मगर कब? परिवार कहीं और, पति कहीं और, छोटे छोटे बच्चे हॉस्टल में, तुम कहीं और क्या तुम….।”
“बस बस तू मुझे हतोत्साहित कर रही है। जलती है मेरी किस्मत पर..!”
कह वह कमरे से बाहर जाने लगी लेकिन उसकी छोटी बहन नें हाथ पकड़ रोक लिया-
“तेरी गोद में खेली हूँ तू बड़ी बहन नहीं मेरी माँ है और कोई बेटी भला अपनी माँ का बुरा चाहेगी?”
दरअसल वैष्णवी सफल गृहस्थ जीवन जी रहे अपनी छोटी बहन के घर आई थी जिसके पति एक प्राथमिक शिक्षक हैं। जिसके थोड़ी अपनी खेती, एक गाय, सास-ससुर,एक देवर एक ननद हैं के आज के सवालों के कई प्रयासों में भी सटीक जवाब नहीं दे पा रही थी। आँखों में आँखे डाल बात भी नहीं कर रही थी। वैष्णवी नें अपनी बड़ी बहन की आँखों में अंदर और बाहर से लगे चश्मे को देख लिया था। वह हर बार हजारों के प्रोडक्ट्स छोड़ जाती और लाख समझाने पर भी एक पैसे भी नहीं लेती।
फिर बहुत देर तक और बहुत खुलकर बातें हुईं। अंत में वह जाती हुई बोली-
“बहना! जिस बहन को मैं दीन-हीन समझ रही थी वह तो बहुत धनवान निकली। वाकई खुशी और सुख का पैमाना एसेट्स और अरबों धन नहीं बल्कि जो है उसे तुमसे सीखकर जा रही हूँ..
वैष्णवी अपने बड़ी बहन की आँखों को नँगा कर और उनमें चमक देख बड़ी खुश होती हुई कार के ओझल होने तक अपना हाथ हिलाती रही!*
जकुस
गया, बिहार


सौदा
रेलवे स्टेशन के बाहर सड़क के किनारे कटोरा लिए एक भिखारी लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए अपने कटोरे में पड़े सिक्कों को हिलाता रहता और साथ-साथ यह गाना भी गाता जाता*
*गरीबों की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा -२
तुम एक पैसा दोगे वो दस लाख देगा
गरीबों की सुनो …”*
*कटोरे से पैदा हुई ध्वनि व उसके गीत को सुन आते-जाते मुसाफ़िर उसके कटोरे में सिक्के डाल देते।*
*सुना था, इस भिखारी के पुरखे शहर के नामचीन लोग थे! इसकी ऐसी हालत कैसे हुई यह अपने आप में शायद एक अलग कहानी हो!*
*आज भी हमेशा की तरह वह अपने कटोरे में पड़ी चिल्हर को हिलाते हुए, ‘ग़रीबों की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा….’ वाला गीत गा रहा था।*
*तभी एक व्यक्ति भिखारी के पास आकर एक पल के लिए ठिठकर रुक गया। उसकी नजर भिखारी के कटोरे पर थी फिर उसने अपनी जेब में हाथ डाल कुछ सौ-सौ के नोट गिने। भिखारी उस व्यक्ति को इतने सारे नोट गिनता देख उसकी तरफ टकटकी बाँधे देख रहा था कि शायद कोई एक छोटा नोट उसे भी मिल जाए।*
*तभी उस व्यक्ति ने भिखारी को संबोधित करते हुए कहा, “अगर मैं तुम्हें हजार रुपये दूं तो क्या तुम अपना कटोरा मुझे दे सकते हो?”*
*भिखारी अभी सोच ही रहा था कि वह व्यक्ति बोला, “अच्छा चलो मैं तुम्हें दो हजार देता हूँ!”*
*भिखारी ने अचंभित होते हुए अपना कटोरा उस व्यक्ति की ओर बढ़ा दिया और वह व्यक्ति कुछ सौ-सौ के नोट उस भिखारी को थमा उससे कटोरा ले अपने बैग में डाल तेज कदमों से स्टेशन की ओर बढ़ गया।*
*इधर भिखारी भी अपना गीत बंद कर वहां से ये सोच कर अपने रास्ते हो लिया कि कहीं वह व्यक्ति अपना मन न बदल ले और हाथ आया इतना पैसा हाथ से निकल जाए और भिखारी ने इसी डर से फैसला लिया अब वह इस स्टेशन पर कभी नहीं आएगा – कहीं और जाएगा!*
*रास्ते भर भिखारी खुश होकर यही सोच रहा था कि ‘लोग हर रोज आकर सिक्के डालते थे, पर आज दो हजार में कटोरा! वह कटोरे का क्या करेगा?’ भिखारी सोच रहा था?*
*उधर दो हजार में कटोरा खरीदने वाला व्यक्ति अब रेलगाड़ी में सवार हो चुका था। उसने धीरे से बैग की ज़िप्प खोल कर कटोरा टटोला – सब सुरक्षित था। वह पीछे छुटते नगर और स्टेशन को देख रहा था। उसने एक बार फिर बैग में हाथ डाल कटोरे का वजन भांपने की कोशिश की। कम से कम आधा किलो का तो होगा!*
*उसने जीवन भर धातुओं का काम किया था। भिखारी के हाथ में वह कटोरा देख वह हैरान हो गया था। सोने का कटोरा! …..और लोग डाल रहे थे उसमें एक-दो के सिक्के!*
*उसकी सुनार वाली आँख ने धूल में सने उस कटोरे को पहचान लिया था। ना भिखारी को उसकी कीमत पता थी और न सिक्का डालने वालों को पर वह तो जौहरी था, सुनार था।*
*भिखारी दो हजार में खुश था और जौहरी कटोरा पाकर! उसने लाखों की कीमत का कटोरा दो हजार में जो खरीद लिया था।
वीरेन्द्र सोलंकी

घर की ख़ुशी
चार महीने के बाद गार्डन में रामू काका टहलने गए तो वहाँ उन्हें कुछ पुराने दोस्त मिल गए कुछ समय टहलने के बाद सब लोग बैठकर लॉकडाउन और घर की परिस्थितियों पर चर्चा करने लगे अपने अपने कस्ट , व्यथाएँ , जो इन 4 महीनों में भोगी थी वो शब्दों द्वारा मुखरित हों उठी “तिवारी “जी का कहना था हमें हमारा पैसा बुढ़ापे के लिए बचाकर रखना चाहिए उससे ही घर में सुख शांति और आराम है हमारी इज़्ज़त है ! “ दीनदयाल जी बोले मैं नहीं मानता बच्चों को यदि अच्छे संस्कार दो तो किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है संस्कारी बच्चे बुढ़ापे को बेहतर ढंग से सम्मभाल लेते हैं। इसी तरह सब अपनी अपनी मन की व्यथा कह रहे थे तभी “ भोलेनाथ जी बोले मैं आप सब से एक प्रश्न पूछता हूँ ….?
उसका सही सही जवाब सब लोग देना ! घर की खुशियां घर की रौनक घर की लक्ष्मी और घर की इज्ज़त किससे है ….?
अलग अलग जवाब दिए गये किसी ने धन कहाँ , किसी ने बेटा , आदि पर भोलेनाथ जी किसी के जवाब से ख़ुश नहीं हुए तो उन्होंने रामू काका से कहा आप क्यों चुप बैठे हैं । आप भी जवाब दीजिए उन्होंने कहा क्या जवाब दूँ आप सब पढ़े लिखे लोग मेरी बातों से सहमत नहीं होंगे मेरा एक ही शब्द का जवाब है ।
एक ही शब्द में दुनियाँ सिमटी हुई है।
मेरे घर की रौनक मेरे घर की लक्ष्मी मेरे घर की सारी खुशियां और मेरे घर की आबरू , मेरे घर की सारी दौलत मेरी “बेटी “है।
रामू काका वहाँ से उठे और किसी का कोई जवाब सुने बिना चलते बने….
पूरे गार्डन में सन्नाटा पसर गया सारे लोग गर्दन झुका बिना एक दूसरे से कुछ कहे , अपने अपने घर की तरफ़ चलदिए , भोले नाथ बहुत ख़ुश थे उन्हें सही जवाब जो मिल गया था !
डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई

सही फैसला
माॅल से शाॅपिंग कर बाहर निकली तो नजर दो पुरुष मेंहदी लगाने वालों पर पड़ी। कई दिन से मेंहदी लगाने की इच्छा थी। मन होते हुए भी पुरूष देख आगे बढ़ने लगी। शायद मेरे पति अमर ने मेरा मन पढ़ लिया और मुझे रोकते हुए बोलें “मन है तो लगवा लो”
मन तो था पर पति के सामने एक गैर पुरूष से मेंहदी लगवाना.. मन में हिचक पैदा कर रहा था।
“नहीं, कोई महिला होती तो लगवा लेती ये तो पुरूष हैं”
“बेवकूफों वाली बात मत करो, लगवा लो… ये तो इनका काम है” अमर की यह बात सुन मैं हाथ आगे कर एक मेंहदी वाले के सामने बैठ गयी, पर मन अतीत में विचरण करने लगा। कितना प्यार करती थी मैं आदित्य से और उसने भी तो पूरे काॅलेज के सामने घुटनों के बल बैठ कर प्रपोज किया था। अक्सर कोई ना कोई गिफ्ट देता। किसी दिन ना मिल पायें तो वह मिलने के लिए बैचेन हो जाता।
आज इस मेंहदी वालों को देख याद आ गया कि कैसे एक बार एक पुरूष मेंहदी लगाने वाले के सामने मैं हाथ आगे कर बैठ गयी थी यह बोलते हुए.. भैया मेरे हाथ में भी मेंहदी लगा दो। कितना गुस्सा हुआ था आदित्य। पूरे बाजार के सामने चीखा था। जब भी किसी लड़के से बात करते हुए मुझे देखता तो गुस्सा होकर चिल्लाना शुरू कर देता। जब परेशान होकर मैंने उससे दूरी बनाने का फैसला लिया तो उसने कहा था “बहुत पछताओगी अपने इस फैसले पर। मैं क्या.. मेरी जगह कोई भी लड़का होगा तो वह यह सब बर्दाश्त नहीं करेगा”।
“सिस्टर हो गया” मेंहदी वाले की आवाज सुन ध्यान टूटा तो नजर अमर पर पड़ी। वह वहीं हाथ में फोन लिए खड़े थें। मेंहदी वाले को पैसा देने के लिए मैंने अमर को आवाज दी।
“हो गया क्या?” अमर ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा। मैंने मुस्कुराते हुए अपना दोनों हाथ अमर को दिखाया तो वो भी मुस्कुरा दियें। आज दिल में पछतावे की जगह खुद पर फख्र था सही समय पर सही फैसला लेने का।
ऐश्वर्यदा मिश्रा

ऑफिस आर्डर
”बहुत मेहनत करनी पड़ी सर , कहीं भी ऐसा घर नहीं दिखा जो बूस्टर लगा पानी खींच रहा हो ! हो सकता है जलदाय विभाग के नए नियमों से लोग डर गए हो क़ि अगर बूस्टर लगा मिला तो जुर्माना भरना पड़ेगा !”
”सही बात है तुम्हारी !”
अधीनस्थ कर्मचारी अपने अधिकारी को सूचना देता हुआ रिपोर्ट दे रहा था !
‘मगर सर, मुझे लगता है की जुर्माने से बचने के लिए लोग नए-नए तरीके ईजाद कर लेते हैँ !”
”हमारे यहाँ नियम तोड़ने के तरीके पहले बनते हैँ और नियम बाद में , समझा !”
अधिकारी समझता सा बोला !
” जी सर, सौ फीसदी सच !” अधीनस्थ कर्मचारी ने सहमति जताई !
”किसी को पानी का हक़ नहीं मारना चाहिए कि बूस्टर लगाकर खुद का घर तो लबालब कर ले और अपने पडोसी का कोई सोचे ही नहीं !”
” साब , आज तो सभी पहले अपनी ही सोचते है !”
”सही है दयाराम ! जो ना सोचे, ऐसा वो अपनी ही खींचो ओढ़ो ! फिर वो क्यूँ आकर हमारे सामने अपने मटके फोड़ते हैँ !”
‘बात सही है साब ”
”अब छोड़ इस बात को , चल पंखा तेज़ कर गर्मी तो मानो जान लेकर छोड़ेगी !”
”साब ,लगता तो पानी का भी है ,पूरे शहर में किल्लत मारा-मारी ! अच्छा हुआ जो आप ने फरमान जारी करवा दिया कि अगर किसी के यहाँ पानी सप्लायी के समय बूस्टर लगा मिल गया फलाइंग के समय तो हाथो-हाथ जुर्माना देना पड़ेगा ! साब ,लगता है आप की योजना काम कर गयी !”अधीनस्थ कर्मचारी दाद देता-सा बोला !
” अरे भई ,सीधी- सी बात है दया राम ! पानी देंगे तो उतना ही ना जितना हमें पीछे से मिलेगा ! रोज-रोज बूस्टर की शिकायतों से तंग आकर ऊपर से परमिशन लेकर ये फ़रमान ही जारी करवाना पड़ा ! चलो मगज़ मारी तो मिटी कुछ समय के लिए !” ठंडी सांस भरता बोला !
”अरे साब ! याद आया, याद आया ! शहर के दूसरे छोर पर मुझे एक निर्माणाधीन मकान में बूस्टर लगा मिला फलाइंग के समय ! जब ऐसा करने के लिए वहाँ मना मना किया वहाँ खड़े लोग इतराते हुए मुझसे धक्का -मुक्की करने लगे,गाली -गलोज करते धमकाने लगे !”
” कहीं लगी तो नहीं ना तुम्हे? !” अधिकारी चिंतित भाव में प्रश्न किया !
”नहीं साब ,मगर मैंने वहाँ का ठिकाना नोट कर लाया ,नोटिस ज़ारी कीजिये इस नाम का ! सारी हेकड़ी हवा हो जायेगी सालो की !” अधीनस्थ कर्मचारी दांत पीसता अपने जेब से पर्ची निकालता हुआ बोला !
पर्ची देखते ही चेहरे की हवा उड़ गयी और तुरंत पर्ची फाड़ते हुए कहा ! ‘अभी नई- नई ही नौकरी लगी है तुम्हारी, इसलिए अंजान हो कुछ नियमों से ! मुझे भी पता था इस मकान का ,अगर अपनी सर्विस बुक पे कोई लांछन नहीं लगवाना चाहते होतो फिर कभी इस पर्ची का ज़िक्र मत करना !”
”कारण” ? सकपकाया- सा अपनी जिज्ञासा रखता बोला !
‘कुछ कारण समझे जाते है ,बताये नहीं जाते ! बस इतना समझ लो की हमें भी अपने ऊपर वालो की कुछ बातें दबानी पड़ती हैँ !”
”ओह, समझ गया ! क्या जान सकता हूँ निर्माणाधीन मकान किसका है ?”
”हमारे ही डिविज़नल हैड का !”
ज़वाब के बाद ऑफिस में सन्नाटा छा गया !
सुनील गज्जाणी

मुस्कुराहट वाली चादर
तू खुश तो है रानो ?” रानो से उसकी सहेली ने पूछा ।
“हु उँ … ” इतना ही बोल पायी रानो और उसने बिस्कुट की प्लेट सुरेखा की तरफ बढ़ा दी । “ले ना, तूने तो चाय के साथ कुछ लिया ही नहीं।”
रानो, मैंने जो पूछा तूने उसका सही से जबाब नहीं दिया । बता ना ठीक से , रमेश जी तुझे प्यार तो करते हैं ना?”
“हाँ , बहुत , बहुत ही ज्यादा ।” रानो ने कहीं खोई हुई सी आवाज में जबाब दिया ।
चल ठीक है, जो हुआ सो हुआ अब तू सब कुछ भूलकर अपनी नई जिंदगी शुरू कर ।” सुरेखा ने रानो को समझाते हुए कहा ।
“किसी को भूलना इतना आसान होता है क्या सुरेखा?”
“आसान तो नहीं , लेकिन भूलने का भरम पालना पड़ता है बहन और इसी में सबकी भलाई है।”
हम्म.. एक लंबी साँस ली रानो ने । “इसीलिए तो हर वक़्त चेहरे पर मुस्कुराहट की झूठी चादर ओढ़कर रहती हूँ । वरना उन्हें लगता है कि मुझे पहले वाले कि याद आ रही है और वे उदास हो जाते हैं ।”
रानो के अंदर का दर्द आँसू बनकर गालों पर लुढ़कने लगा । सुरेखा ने अपने हाथों से उसके आँसूं पोंछें और दोनो सहेलियां गले लगकर फफक पड़ी ।
रोते रोते रानो बोली “वो तो एक ही बार मरा लेकिन मैं तो रोज ही मरती हूँ । तिसपर कुछ लोग पीठ पीछे खुसर-फुसर करते हैं कि इसका क्या गया इसको तो नया खसम मिल गया।”
नीता सैनी, दिल्ली

माँ और मूंगफली
माँ, इस उम्र में मूंगफली? नकली दांतों से कैसे खाओगी ? रमेश ने लगभग चीखते हुए कहा. उसकी विधवा माँ निरीह सी एक ओर सर झुकाए हुए खड़ी रही, उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था की उसने बेटे से ऐसी फरमाइश की ही क्यों .पति की मृत्यु के बाद रमेश ही उसका एकमात्र सहारा था. रमेश ने पत्नी वाणी को टिफ़िन के लिए आवाज़ दी और टिफ़िन लेकर ऑफिस चला गया. आज ऑफिस में उसका मन नहीं लग रहा था. उसे याद आये अपने वो अत्यधिक निर्धनता के वो दिन. अपनी माँ के वो सभी चेहरे – स्कूल से निकाले जाने पर अध्यापकों की की चिरौरी करती माँ, बेरोजगारी के दिनों में उसकी कुढ़न, गुस्से और झुंझलाहट को झेलती माँ, उसके दूसरे शहर को जाने पर भगवान से उसकी सलामती की दुआ मांगती हुई माँ और न जाने ऐसी ही कितनी घटनाएँ. रमेश का मन न जाने कैसा कैसा हो गया. वह ऑफिस से घर लौटा पर घर के किसी सदस्य की ओर देखने की उसकी हिम्मत न हुई. अपने कमरे में आ कर सुबह का पढ़ा हुआ अख़बार मुँह छुपाने के लिए पढ़ने लगा. तभी माँ कमरे में आयी “ आज तो ठीक समय पर आ गया” कैसा रहा ऑफिस में दिन ? रमेश ने बिना अख़बार मुँह से हटाये भीगे स्वर में कहा “ तुम्हारी मूंगफली ला दी हैं, वाणी से कह दिया है कि दानों को मिक्सी में पीस दे ताकि तुम्हें खाने में दिक्कत न हो”.
अविनाश अग्रवाल


लॉकडाउन
“रज्जो दरवाज़ा खोल मैं हूं”।
-गीता ने तेज़ आवाज़ में कुंडी खड़खड़ाते हुए बोली।
“आओ आंटी!
अम्मा की तबीयत ख़राब है,
वह लेटी हुई है”।
-दरवाज़ा खोलते हुए उसका लड़का बोला।
“रज्जो क्या हो गया तेरे को, मैं तेरे व तेरे बच्चों के लिए खाना लेकर आई हूं”।
चल उठ खाना खा ले पहले।
– गीता बोली
“अरे बहन तुम बच्चों को दे दो! वह 2 दिन से भूखे हैं मैं पानी भरते समय में पेट के बल गिर गई हूं,मेरे तो पेट में बहुत दर्द हो रहा है मैं ना खा पाऊंगी और तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद,हमारा कितना ख़्याल रखती हो, हम रोज के कमाने वालों के पास तो खाने को भी नहीं है इस लॉकडाउन ने तो भूखा ही मार डाला है”
– रज्जो बोल रही थी।
“चल थोड़ा सा तो खा ले और फिर मैं तुझे अस्पताल दिखाने चलती हूं”।- गीता बोली
नहीं मुझसे नहीं खाते बनेगा मुझे 3 महीने हैं और दर्द इस तरह से हो रहा है जैसे प्रसव पीड़ा हो रही है, मुझसे सहन नहीं हो रहा है।
-रज्जो तकलीफ़ में बोली।
क्यों तेरा पति कहां है?
-गीता ने पूछा।
“मजदूरी के लिए काम ढूंढने के लिए निकला है पर इस समय में कौन काम देगा”।
– रज्जो बोली।
गीता से रज्जो की तकलीफ़ देखी नहीं जा रही थी।
“चल अस्पताल चलते है कोई साधन मिलता है तो अच्छा है नहीं तो धीरे-धीरे चलेंगे”। –
गीता रज्जो का हाथ पकड़ कर चल देती है।
जैसे तैसे वह चलती है और कुछ ही दूरी पर एक पुलिस की गाड़ी ने उन्हें रोका तो,रज्जो ने अपनी समस्याएं बता दी और कुछ ही पल में वह अस्पताल में थी।
सरिता बघेला अनामिका

सितारा
कंकरिया मार के जगाया, कल तू मेरे सपनों में आया, बालमा—- थोड़ा लहक कर गाती नानी को देखकर लग रहा था कि नानी के जीवन का यह पहलू आज तक कहां छुपा हुआ था। बिना किसी घबराहट के गाती नानी की आवाज जिंदगी के 85 बसंत देखने के बाद बुढ़ापे की हल्की सी थकान लेकर भी उतनी ही सुरीली, दमदार थी। सुर ताल से कहीं भी नहीं हटे थे। राग पंचम तक बोलों को खींचने में उन्हें कोई परेशानी का अनुभव नहीं हो रहा था। मुझे लगा हमने पहले इनकी प्रतिभा को क्यों नहीं देखा।
3 महीने पहले प्रकाश के साथ उसके स्टूडियो में बैठी थी और वह अपना रोना रो रहा था।
भावना, कुछ नया लाओ ना। वही सब देखते देखते तो सब बोर हो गए हैं।
अचानक एक ख्याल दिमाग में कौंधाऔर मैं बोली —
प्रकाश तुम टैलेंट हंट करते हो और नई नई प्रतिभाओं को सामने लाते हो। मैं सोचती हूं इस बार एक नई तरह का टैलेंट हंट करो। सिंगिंग कम्पिटीशन– 70 साल से बड़ी महिलाओं के बीच –देखना ,अलग, हटके होगा यह टैलेंट हंट।
सबसे बड़ी बात होगी वह बुजुर्ग महिलाएं जिनकी जिंदगी रंगविहीन हो चुकी है, वह अपने जीवन में एक नए रस का अनुभव करेगी।जोअपने ही घर में उपेक्षित हो कोने में पड़ी एक बेजान वस्तु में तब्दील हो चुकी है, उनमें एक नई चेतना का संचार होगा। नई ऊर्जा उनके चेहरे पर एक नया हास्य लाएगी।
उनके समय में ना तो इतनी सुविधा थी ना इतनी आजादी कि वह अपनी इच्छाओं को पूरी कर सके, अपने हुनर का सिक्का जमा लोगों की प्रशंसित नजरों से अपने दिल को आल्हादित कर सके।बस वर्जनाओं के बीच कुढ-कुढ कर ही अपना जीवन गुजारा है उन लोगों ने। यह टैलेंट हंट उनके जीवन को रोमांच देगा, एक नया अर्थ देगा, उन्हें भी जीने का एक मकसद देगा।
प्रकाश ने हाथों-हाथ यह आईडिया लपक लिया ।
और फिर बड़े आश्चर्यचकित थे हम जब इतनी बड़ी तादाद में एंट्रियां आई ।
और नानी— नानी ने तो समा ही बांध दिया।
यह तो पता था मुझे कि नानी की आवाज बहुत अच्छी है।शादी ब्याह में शादी के गीत, बन्ना बन्नी इत्यादि गाने में वह हरदम आगे रहती थी। हर शादी में उनके पास स्पेशल फोन आते कि भाभी आपको ही आकर सब संभालना है। नानी बड़ी खुशी खुशी यह सब संभालती थी। गाने में उनके प्राण बसते से। लेकिन वह सब बस वहीं तक सीमित था बाकी कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं थी। और फिर 70 साल की होने के बाद तो वह बस भजन कीर्तन में ही रमी रहती थी ,और कुछ था भी नहीं करने को।
इतने सालों से भजन गाते गाते आज एक रोमांटिक गाना गाते हुए अपने दिल के दबे हुए भावों को चमकती आंखों से व्यक्त करती हुई नानी इतनी प्यारी लग रही थी, जैसे कह रही हो –अभी तो मैं जवान हूं।
और फिर जब उन्हें प्रथम घोषित किया गया तब तो खुशियों के समंदर में डूबती उतरती एक नई नानी सामने आई। और मुझे लगा आज एक नया सितारा चमक कर पूरे आकाश पर छा गया है।
उषा किरण टीबड़ेवाn
तेजपुर, आसाम

पेंशन

“क्या हुआ तुम क्यों अम्मा को चिल्ला रही हो ?”

“अरे तुम तो ड्यूटी चले जाते हो अम्मा सुनती नहीं हैं, चलते बनता नहीं है फिर भी बर्तन मांजने बैठ जाती हैं.एक पल भी बैठने नहीं देती .”

“देखो तुमसे कितनी बार कहा अम्मा का ध्यान रखा करो.उन्हें कुछ करने नहीं दिया करो .”

वहां से अम्मा की कराहने की आवाज़ आती है ….”वे कहती है बेटा अब ऐसे जीने से अच्छा है भगवान् हमें उठा ले कितना जियेगे .”

“नहीं अम्मा ऐसा नहीं कहते आप आराम करो हम अभी आते हैं “

इतने में बहू आती है ..” कहती है क्यों अम्मा क्या शिकायत कर रही थी इनसे .”

“ नहीं हमने कुछ नहीं कहा ..”

इतने में बहू अम्मा का हाथ मरोड़ती और कहती है..” तुम्हें सिर्फ इसलिए खिला पिला रहे हैं क्यों हर महीने तुम्हारी पेंशन जो आती है.”
अम्मा ने अपना हाथ बहू के सिर पर रख दिया।

डॉ भावना शुक्ल

बुरी हवाएं
“आने दो आशु को आज, कितनी बार कहा है कि स्कूल जाने से पहले कमरा थोडा तो ठीक कर जाया कर। कभी सुनता ही नही है।“
शालिनि भुनभुना रही थी और नीलेश जी ने हमेशा की तरह मुस्कुराकर उसे शांत हो जाने को कहा। पीछे देखा, तो थका हारा आशु सीढियां चढ रहा था। स्कूल, पढाई, खेल, होमवर्क की उधेडबुन उसके नन्हे से चेहरे को समय से पहले परिपक्व बनाने पर तुली हुई थी।
जल्दी से झटककर चादर बिछाई और बेटे का स्वागत किया। ध्यान से देखा, तो चेहरे पर थकान की कम और उदासी की रेखाएं ज्यादा थी। आंखों में सवाल उभरने की ही देर थी और आशु फफककर रो पडा।
“श्रीकांत ने आत्महत्या कर ली मम्मी”
शालिनि का चेहरा काठ का हो आया, शब्दों ने साथ छोड दिया और बेटे को गले लगा लिया।
थोडा सामान्य होने के बाद आशु को उसके कमरे में ही छोड शालिनि ने नीलेश को यह जानकारी दी, चर्चा का सार यही था कि वे भाग्यवान है जो उनके पास आशु जैसा समझदार बेटा है… वैसे दोनो के ही मन में बात यही थी कि उनका बेटा “है”
तभी तैयार होकर आशु बाहर निकलने को हुआ। दोनो की आंखों में सवाल ही था, “कहां?”
“श्रीकांत के घर जा रहा हूं! उसके मम्मी पापा के प्रति मेरा भी तो कोई फर्ज बनता है ना…!” प्रयत्नपूर्वक आंसू रोककर चला गया आशु।
शालिनि और नीलेश सोचते ही रह गए कि श्रीकांत के माता पिता उनके भी तो अच्छे पारिवारिक मित्र है, लेकिन उनसे मिलकर दुख में शरीक होने की बात मन में क्यों नही आ पाई…
नीलेश ने उठकर खिडकियां बंद करनी चाही। आजकल हवाएं ही बुरी होने लगी थी।
अंतरा करवडे

ताई जी
आज उनके घर में सुबह से चहलपहल मची हुई है… आज बहुत सालों के बाद ताऊजी और ताई जी आ रहे हैं। उन्होंने प्रखर की नई नवेली बहू ममता को अच्छी तरह से समझा दिया था…”देखो बेटा! ताऊजी ताईजी तुम्हारे सामने पहली बार आ रहे हैं…वो इस घर के बड़े हैं… उन्होंने बड़े होने का फ़र्ज़ बहुत बढ़िया से निभाया है…हम सब भी उनका बहुत सम्मान करते हैं… बस ताई जी थोड़ी पुराने फैशन की हैं और बेहिचक डाँट भी लगा देती हैं…थोड़ा ध्यान रखना बेटा।”
“ओह मम्मी जी, आप चिंता मत करिए…मैं आपको और ताई जी को शिकायत का मौका नही दूँगी।”
समय पर वो लोग आ गए…ममता ने उनकी पसंद के समोसे और जलेबी बनाई…ताई जी तो एकदम प्रसन्न हो गई,”अरी छोटी, तेरी बहू तो जितनी सुंदर है, उतनी ही गुणी भी है… वाह मन खुश हो गया।”
शाम तक उन्होंने बहुत चीजों को भाँप लिया… एकाएक बहू को डाँट कर बोलीं,”सुबह से देख रही हूँ…प्रखर प्रखर की रट लगा रखी है… बिटिया ,इस तरह हर समय पति का नाम नहीं लिया जाता है…हम लोग तो पति को परमेश्वर मानते हैं।”
नटखट बहू ने सिर झुका कर उनकी बात शिरोधार्य कर ली…शाम को चाय पीते समय उसने प्रखर से पूछा,”पति परमेश्वर जी! आप खाण्डवी और लेंगे क्या?”
सब हक्के बक्के हो गए… वो हँसते हुए बोली…”ताई जी ने ही तो सिखाया था…पति परमेश्वर होता है… है ना।”
वहाँ तो ठहाकों का फब्बारा फूट गया… ताईजी की तो हँसी रुकने का नाम ही नही ले रही थी।
अचानक बहू पूछ बैठी,”एक बात बताइए ताई जी! आप जरूरत पड़ने पर ताऊजी को कैसे बुलाती थीं?”
“देख मालती, बहू को आँख ना दिखा!कितनी प्यारी गुड़िया सी है अपनी बहू…हम तुम्हारे ताऊजी को फलाने बाबू कहते थे।”
इसी हँसी खुशी के माहौल में मस्ती के मूड में उनसे पूछा गया,” ताई जी, आज मीठे में क्या लेंगी… आज कुछ नया बनाती हूँ।”
“क्या बनाएगी हमारी लाडो?”
“आज पति परमेश्वर को भून कर ,चीनी मिला कर बाँध दूँगी।”
वो अवाक् सी थी…प्रखर ने चुटकी ली,”अरे ताई जी…आप मेरा बचपन का नाम भूल गई… लड्डू… ये बेसन के लड्डू बनाती है।”
अब ताई जी खिलखिलाकर उसे प्यार से धौल जमा कर बोली,”अरे लाडो, तू जैसी है.. बहुत अच्छी है… अब हमारी नकल छोड़ दे…अब नया जमाना है।”
स्वरचित मौलिक
नीरजा कृष्णा

उसके जैसे और भी…
कुछ सोचो, हो कुछ जाता है… जैसा सोचा, वैसा नहीं हुआ जिंदगी में… उसके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ… उसके जैसे औरों के साथ भी!… बेहतर जिंदगी के लिए इधर-उधर भटकता रहा… पर जीवन स्थिर हुआ सालों बाद… उसके जैसे बहुतों का जीवन भी!
उसे याद है- घर के हालात ठीक नहीं थे… उसके जैसे बहुतों के घर के भी! पर पापा सबको हिम्मत देते रहते… सब ठीक होगा… ईश्वर पर विश्वास रखो… कितना संघर्ष भरा जीवन था उनका… उसके जैसे सबके पापा का जीवन भी! पहली जॉब क्या छोड़ी… पाँच-छः साल पीछे चला गया… उसके जैसे और लोग भी!
उसे आज फिर जॉब से निकाल दिया गया… उसके जैसे और लोगों को भी! जरा-सी बात थी… मैंनेजर ने उसकी कार्य क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया… तकरार हुई… बहस हुई… अंत में हमेशा की तरह फिर से जॉबलैस हो गया… उसके जैसे और लोग भी!
“कहाँ जाओगे?”
“यहीं रहूँगा.”
“अब क्या करोगे?”
“फिर से जॉब सर्च करूँगा.”
“नहीं मिली तो.”
“क्यों नहीं मिलेगी.”
“फिर भी… यदि नहीं मिली तो?”
“मेरी योग्यता पर, मेरी क्षमता पर सवाल मत उठाओ… जरूर मिलेगी.”
“फिर भी?”
“फिर भी… फिर भी…”
वह बिस्तर पर झटके से उठ कर बैठ गया… शरीर पसीने से तर-ब-तर है… उसे आश्चर्य हुआ कि कौन उससे पूछ रहा है?… कौन सवाल कर रहा है?… वह चीखना चाहता है- कौन है?… कौन है?.. क्यों पूछ रहे हो?… पर आवाज गले में ही फंसी रह गई… उसके जैसे दूसरों के गले में भी!…
पवन शर्मा ( सुकरी-जुन्नारदेव/छिन्दवाड़ा (म.प्र)

अफसोस या जश्न-
नीना के केबिन में घुसते ही शुचिता बोली-यार जल्दी कर, बड़ी मुश्किल से यह अप्रत्याशित छुट्टी मिली है थोड़ा इंजॉय हम भी कर लें! हां हां रुक तो सही दो मिनट..ये फाइलें समेट लूं फिर चलते हैं |पहले फिल्म देखेंगे, फिर मॉल में विंडो शौपिंग, फिर कुछ चटखारा जायकेदार…! हां हां.. बस कर.. अब चल भी |
सुबह ऑफिस पहुंचने के दो घंटे बाद ही खबर आई कि हार्ट अटैक से बॉस की माताजी चल बसी, खबर सुनते ही रंजन सन्न रह गया |भली चंगी थी मां सुबह जब घर से निकला था तो,अचानक…खुसर-पुसर शुरू हो गई, उम्र भी क्या पचास- बावन. कोई उम्र है क्या यूं जाने की.. |घर में दो ही प्राणी अविवाहित बेटा रंजन यानि कि कम्पनी का बॉस और मां!
एक पल में ही रंजन की दुनिया उजड़ गई, उसे सारी दुनिया घूमती नजर आने लगी | कम्पनी में शोक सभा के बाद अवकाश घोषित हो गया |अब इसे मांजी की मौत का अफसोस कहें या अप्रत्याशित अवकाश का जश्न ?

मंजु पाण्डॆय “उदिता” हल्द्वानी (उत्तराखण्ड)


टूटी हुई ट्रे

कमरे के दरवाजा थोड़ा-सा खुला तो किशोर चंद जी भीतर तक काँप गए। उन्होंने अपनी ओर से बहुत सावधानी बरती थी। सुबह आम से घंटा भर पहले ही उठ गए थे। टूथब्रश बहुत धीरे-धीरे किया ताकि थोड़ी-सी भी आवाज़ न हो। रसोईघर में चाय बनाते समय भी कोई खड़का न हो, इस बात का विशेष ध्यान रखा। फिर भी…।
सत्तर वर्ष की उम्र में अब इतनी फुर्ती तो थी नहीं कि बहू के देखने से पहले, किसी तरह ट्रे और चाय के कपों को छिपा लेते।
बहू उनके सामने आ खड़ी हुई थी, “बाबू जी, क्या बात आज दो कप चाय?“
“नहीं बेटी, चाय तो एक ही कप बनाई थी, उसे ही दो कपों में डाल लिया।” गले से डरी हुई सी आवाज निकली।
“और बाबू जी, यह टूटी हुई ट्रे! आप इसे बार-बार प्रयोग न करें, इसलिए यह तो मैंने डस्ट-बिन में डाल दी थी, वहाँ से भी निकाल ली आपने।”
“वो क्या है कि बेटी…” उनसे कुछ कहते नहीं बना। फिर थोड़ा रुक कर बोले, “मैंने इसे साबुन लगा कर अच्छी तरह धो लिया था।”
अचानक पता नहीं क्या हुआ कि बहू का स्वर कुछ नर्म हो गया, “बाबू जी, इस टूटी हुई ट्रे में क्या खास है, मुझे भी तो पता चले”
सिर झुकाए बैठे ही किशोर चंद जी बोले, “बेटी, यह ट्रे तुम्हारी सास को बहुत पसंद थी। इसलिए हम सदा इसी ट्रे का प्रयोग करते थे। दोनों शूगर के मरीज थे। पर लाजवंती को फीकी चाय स्वाद नहीं लगती थी। उसकी चाय थोड़ी चीनी वाली होती। इस ट्रे के दोनो तरफ फूल बने हैं, एक तरफ बड़ा, दूसरी ओर छोटा। हममें से चाय कोई भी बनाता उसका कप बड़े फूल की ओर रखता ताकि पहचान रहे…”
“मगर आज ये दो कप?”
“आज हमारी शादी की सालगिरह है बेटी। इस बड़े फूल की ओर रखे आधा कप चाय में चीनी डाल कर लाया हूँ…लग रहा था जैसे वह सामने बैठी पूछ रही है–‘चाय में चीनी डाल कर लाये हो न?” कहते हुए किशोर चंद जी का गला भर आया।
थोड़ी देर कमरे में खामोशी छाई रही। किशोर चंद ने चाय के कपों को ट्रे में से उठा कर मेज पर रख दिया। फिर ट्रे उठा कर बहू की ओर बढ़ाते हुए कहा, “ले, बेटी, इसे डस्ट-बिन में डाल दे, टूटी हुई ट्रे घर में अच्छी नहीं लगती।”
बहू से ट्रे पकड़ी नहीं गई। उसने ससुर की ओर देखा। वृद्ध आँखों से अश्रु बह रहे थे।

श्याम सुंदर अग्रवाल

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