पाँच लघुकथा
उमेश मदहोशी

लघुकथा-1
स्मृतिशेष
जैसे ही वो पुस्तक मेरे हाथ में आयी, मैंने उसे खोला। खोलते ही जो पृष्ठ मेरे सामने था, वो समर्पण का पृष्ठ था।
उसके शब्दों का सुनने की कोशिश की तो कुछ इस तरह बोलता सुनाई दिया वो पृष्ठ-
‘‘उन मित्रों की स्मृति में
जो ऐसे वादे करते हैं
जिनके बारे में वे स्वयं जानते हैं;
नहीं करना है पूरा उन्हें
और मैं भी जानता हूँ-
नहीं करना है शामिल ऐसे सहृदयों को
अपनी मित्र सूची में’’
मैंने पुस्तक आगे पढ़ने की बजाय लेखक को फोन लगा दिया। बधाई दी उन्हें अद्भुत समर्पण पृष्ठ के लिए।
लेखक महोदय पहले तो हँसे, फिर बधाई के लिए आभार व्यक्त किया। और अंत में पारंपरिक प्रश्न…
‘‘और किताब…?’’
‘‘किताब पढ़ने का वादा मैं नहीं करता।’’ मैंने कहा।
‘‘क्यों…’’का
‘‘स्मृतिशेष नहीं होना चाहता अभी मैं!’’
और दोनों हँस पड़े ठट्ठा मारकर।
***
लघुकथा-2
सुनने वाला यहाँ है कौन!
अचानक जैसे तीव्र बिजली-सी कौंधी, किन्तु यह कौंध नहीं थी। जैसे अचानक भयानक लपटों के साथ आग लगी हो और फैल गयी हो, किन्तु यह आग नहीं थी। भयानक प्रकाश जैसा, जो विकट तीव्रता के साथ अचानक प्रकट होकर पल गुजरते-न-गुजरते सर्वत्र फैलता गया, आँखों को चौंधियाता-सा! मुझे कोई तुलना नहीं मिल रही है! आप ऐसे भी समझ सकते हैं, जैसे कोई हिमशिखर टूटा हो और प्रलय जैसा कोई दृश्य, असीम वेगवान जलधारा के साथ मलवे को समेटे; दूर, बहुत दूर तक बढ़ता जा रहा हो। पर यह प्रलय का दृश्य नहीं था। मलवे जैसा किसे कहूँ…! किन्तु इसका वेग…! उसे तो हिमशिखर के टूटने से प्रवाहित जलधारा के वेग से भी अनेकानेक गुना तीव्रता से फैलते देखा था मैंने।
मैं आश्चर्यचकित-सा था। भय भलेे नहीं किन्तु भय जैसा कुछ था, जिसने समूचे तन-मन को हिला डाला था। पर जिसे कभी नहीं देखा था, उसे देखने की उत्सुकता जैसा कुछ अन्तर्मन मेें उतर गया था। होंठ न जाने क्या बुदबुदाना चाहते थे…!
अचानक वह सब जाने कहाँ विलीन हो गया। चारों ओर विकट घना अंधकार फैल गया। कुछ भी शेष जैसा न रहा। किन्तु मैं…? मैं तो सही-सलामत सा खड़ा था। मैंने अपनी आँखों को टटोला। आँखें भी ठीकठाक-सी लगीं। फिर…?
हुआ तो हुआ क्या…?
क्या कोई है यहाँ, जो मुझे ठीक-से बता सके इस सबके बारे में?
कोई सुन रहा हो तो सुन ले… मेरा दिल रोने को हो रहा है…!
पर, सुनने वाला यहाँ है कौन…!
***
लघुकथा-3.
रसारोहण
बच्चे के सौंदर्य से अभिभूत नर्स ने उसे पुचकारते हुए पलंग पर लेटी कुसुम को सौंपा, ‘‘लीजिए मैम, सम्हालिए अपने सलौने राजकुमार को। देखिए, कितना सुन्दर है, बिल्कुल आपकी तरह!’
’ हल्की मुस्कराहट के साथ कुसुम ने बच्चे को गोद में लेकर एक पल के लिए दुलारा। अगले ही पल हृदय में धधक उठी ज्वाला उसकी आँखों में उतर आयी। गोद में उठाये अपने पुत्र को वह घूरने लगी।
…उसने पिताजी को यही तो कहा था, ‘‘मेरी शादी की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है आपको। मैंने अपना जीवन-साथी चुन लिया है।’’
‘‘क्या…?’’ एक पल के लिए पिताजी भौचक हुए फिर आक्रोश में भरकर उबल पड़े, ‘‘बेशर्म लड़की! क्या तूने सारी मान-मर्यादा बेच खायी है? क्या यही संस्कार दिए हैं मैंने तुझे?’’
घर में मानो तूफान आ गया था। माँ ने अपने तरीके से समझाने का प्रयास किया तो पिताजी अपने तथाकथित संस्कारों के टीले पर खड़े होकर चीखने लगे। जब वह कैसे भी अपने निर्णय से पीछे हटने को तैयार नहीं हुई तो जाति व गैर-बराबरी के पंच और रवि की बेरोजगारी पर तंज के बार किए गये।
वह भी कहाँ रोक पायी थी स्वयं को। उसने भी उतने ही तीखे तंज का बार किया था, ‘‘भाई को दिए संस्कार भी याद हैं न आपको? उसने भी तो अपने जीवन-साथी का चयन स्वयं ही किया था। और भी बहुत-कुछ है, जिसे याद दिलाया जा सकता है। बेटे के सामने तो हर बार आप बड़ी आसानी से समर्पण करते रहे…’’
सामने खड़े रवि पर दृष्टि पड़ते ही उसकी गोद में बच्चे को लगभग फेंकते हुए चीखी कुसुम, ‘‘लो, सम्हाल सकते हो तो सम्हालो अपने बेटे को, नहीं तो अभी के अभी फेंक दो इसे कचरे के डिब्बे में। मुझे नहीं चाहिए संस्कारवान बेटा!’’
‘‘आखिर इसे हुआ क्या…?’’ रवि और परिवार के सभी लोग एक-दूसरे का मुँह देख रहे थे।
***
लघुकथा-4.
कला का चेहरा
पिछले कई महीने से फेसबुक पर इस युगल का फिल्मी गीत-गायन सुन रहा हूँ। पेशेवर तो नहीं ही है यह युगल। हाँ, कुछ ठीक-ठाक गा लेता है। इतना ठीक कि उनके सामान्य स्रोता सुनकर खुश हो जाते हैं। ऐसे स्रोताओं को गायन और संगीत की बहुत समझ तो होती नहीं है, हाँ मूल गायन से तुलना करके अपनी समझ का सिर अवश्य सहला लेते हैं। मैं भी एक ऐसा ही स्रोता हूँ। इसीलिए कह रहा हूँ काफी कुछ अच्छा गा लेता है यह युगल।
गायक-गायिका आपस में संबंधी हैं, मित्र हैं या कुछ और; नहीं मालूम। किन्तु दोनों का पारस्परिक सामंजस्य आकर्षित करने वाला है। वे डूब जाते हैं गायन में, गायन गीत में और गीत… !
पता नहीं स्रोताओं को क्या अच्छा लगता है! …गायन, गीत या कुछ और!
मेरा ध्यान आज ही इस ‘कुछ और’ की ओर गया है।
आज इन दोनों के पारस्परिक सामंजस्य में उतराता दिखाई दे रहा है, यह ‘कुछ और’!
साफ दिखता है कि गायिका गायक के चेहरे में बार-बार डूब जाना चाहती है, किन्तु गायक…?
उसके मंदहास में भी एक गहरा तनाव-सा है, मंच से हिले बिना ही मानो वो रस्सी तोड़कर भाग जाना चाहता हो।
रस्सी…? आप कहेंगे, कला क्या कोई रस्सी है?
मैं भी ऐसा ही सोचता हूँ किन्तु अक्सर कलाकार के हाथों, कमर और गर्दन पर जो निशान दिखाई देते हैं, वो किस चीज के होते हैं?
***
लघुकथा-५
गोस्त का नशा
‘‘अभी मुझसे बोलने की जरूरत नहीं है, मिस्टर! मेरा मूड बहुत ख़राब है इस समय। मन करता है अपने और तुम्हारे- दोनों के बाल नोच…’’
‘‘क्या…अभी भी तुम्हारा मूड ठीक नहीं हुआ? देख रहा हूँ, पिछले कई दिनों से फ्रस्टेशन मेड के साथ एक घंटा बिताकर भी तुम नार्मल नहीं हो पाती हो..!’’
‘‘वो तो तुमसे भी ज्यादा मूर्ख है। मैं कुछ भी बोलती रहूँ, रियेक्ट ही नहीं करती। सुनकर इधर से उधर निकल जाती है। ऐसे फ्रस्टेशन दूर होता है कहीं! उसके इस विहैव से तो उल्टा बढ़ ही जाता है।’’
‘‘फिर क्या फायदा, हर महीने इसे दो हजार रुपये देने का!’’
‘‘मैं भी यही सोचती हूँ। इससे तो तुम्हीं मुझे एक घंटा बर्दास्त कर लिया…’’
‘‘न…बाबा..ना! मेरा बस नहीं है तुम्हें टॉलरेट कर पाने का। ..मैं तो इसीलिए तुम्हारे ऑफिस से आने के एक घंटे बाद ही घर आता हूँ।’’
‘‘पता है मुझे, किन्तु ऐसे तो मेरी नौकरी नहीं चल सकती! कल से तुम्हें मेरे आने तक घर पहुँचना ही…’’
‘‘देखो, इससे बात बिगड़ सकती है। फ्रस्टेशन तुम्हें ही नहीं होता, मुझे भी होता है। दोनों का फ्रस्टेशन मिलने से बबाल खड़ा हो सकता है।‘‘
‘‘तुम्हें तो अपने फ्रस्टेशन को मैनेज करना आता है।’’
‘‘मैनेज नहीं, मजबूरन कन्ट्रोल करता हूँ। बल्कि जैसे-तैसे पी जाता हूँ।’’
‘‘फिर तो मुझे नौकरी छोड़नी ही…’’
‘‘…नहीं, हम दूसरी फ्रस्टेशन मेड ढूँढते हैं। आई होप, ज्यादा पैसे लेकर फ्रस्टेशन डाउन तक तुम्हें बर्दास्त करने वाली कोई जरूर मिल जायेगी…।’’
‘‘ह..म्…म..ऽ..!’’
***
पाँच लघुकथा
राजेन्द्र पुरोहित, जोधपुर

लघुकथा-१
एक और कुरुक्षेत्र
“हाँ प्रकाश, तूने बिल्कुल सही सुना। मैं जीना नहीं चाहता। मुझे संसार में कुछ भी अच्छा नहीं लगता। पत्नी मेरा सम्मान नहीं करती। बड़ा बेटा स्वेच्छा से विदेश गया और अब वहीं सेटल होने की बात करता है। नौकरी के समय की मेरी विभागीय जाँच अभी भी परेशान कर रही है। छोटा बेटा न तो कमाता है और सामने जवाब भी देता है। हर तरफ़ निराशा, फिर क्यों जीना? देख, मैं जानता हूँ कि यह न तो सामाजिक रूप से सही है और न ही मनोवैज्ञानिक रूप से। बल्कि यह तो कानूनी रूप से भी ग़लत है। तू मेरा अच्छा दोस्त है और शहर का सबसे बड़ा डॉक्टर भी। मुझे मरने का आसान तरीका बता दे, बस। भगवान के लिए मुझे समझाने की कोशिश मत करना!” रंजन गिड़गिड़ाते हुए बोला।
“बिल्कुल नहीं।” डॉ प्रकाश मुस्कुराया और उठ कर एक इंजेक्शन तैयार कर के ले आया। इस से पहले कि रंजन कुछ संभल पाता, डॉ प्रकाश ने उसे इंजेक्शन लगा दिया।
“यह क्या है प्रकाश ?” रंजन बुरी तरह से हड़बड़ा उठा था।
“तुम्हारी इच्छा-पूर्ति! मैंने तुम्हें ज़हर दे दिया है। थोड़ी ही देर में तुम दुनिया से मुक्ति पा लोगे।” डॉ प्रकाश की मुस्कुराहट बरकरार थी।
“क्या? अरे एक बार मुझसे पूछ तो लेते! तू डॉक्टर हैं या कसाई? अब जल्दी से इसका एंटीडोट लगा भाई!” रंजन चीखा।
डॉ प्रकाश की मुस्कान और गहरी हो गई, “यह तो सबसे ख़तरनाक ज़हर है रंजन बाबू। इसका एंटीडोट तो आज तक बना ही नहीं।”
रंजन फूट-फूट कर रो पड़ा, “हत्यारा है तू! अरे “मरना है” का मतलब ये थोड़े ही था कि तू मुझे बिना पूछे ज़हर ही दे देगा। सुधा कैसी भी है, अभी उसे आर्थिक सुरक्षा देनी है। छोटी बहू उम्मीद से है। बड़ा बेटा भी शायद स्वदेश आये तो देख लेता उसे एक बार। मकान की किश्त तीन माह बाद पूरी होगी। कितने काम बाक़ी हैं और तू …!”
डॉ प्रकाश का चेहरा अब गंभीर हो गया, “और ये सब काम एक मुर्दा नहीं कर सकता रंजन। फिर तूने कैसे राय बना ली कि तू जीना नहीं चाहता? जीवन-युद्ध में जीत या हार हो सकती है भाई, लेकिन युद्ध छोड़ कर भागने का नियम इस युद्ध में नहीं है। घर जा रंजन। और हाँ, काउंटर पर मल्टी-विटामिन के इंजेक्शन के पैसे जमा करते जाना!”
***
लघुकथा-२
बरकत
“अरे अम्मा, कहाँ चढ़ी आती हो? कबाड़ का सामान लेता हूँ, कबाड़ हो चुकी बुढ़िया थोड़े ही ले लेता हूँ!” कल्लू कबाड़ी ने हँसते हुए कहा!
“जानती हूँ रे! तू सभी से मज़ाक़ करता रहता है। लेकिन मुझे अगले चौराहे तक छोड़ दे बेटा तेरे ठेले पर।” अनवरी की साँसे मानो जवाब दे रहीं थीं।
“ले चाची, बैठ जा! आहिस्ता से। गिर मत पड़ना, कहीं पुलिस में पहुँचा दे कल्लू को। चल तुझे छोड़ता हूँ।” कल्लू ठेला खींचने लगा।
“लेकिन चाची। तेरा घर तो पीछे है। अगले चौराहे पर क्यों जा रही है, वह भी इस मुर्दा हालत में?”
अनवरी फूट-फूट कर रो पड़ी, “क्या बताऊँ रे! आज शहज़ाद और समीना ने मुझे घर से निकाल दिया है। दो दिनों से रोटी भी नहीं देते। कहते हैं, तू कुछ काम नहीं कर सकती इसलिए रोटी नहीं मिलेगी। आज कहने लगे कि जा चौराहे पर भीख माँग और वहीं खा…” कहते-कहते अनवरी बेहोश हो गई।
थोड़ी ही देर में उसे होश आया तो वह एक कमरे में पड़ी थी। पास में पानी, रोटी और थोड़ा दूध भी रखा था।
“ले चाची। ये खा ले, वरना मरेगी मेरे घर में! और सुन, यहीं पड़ी रहा कर। कल्लू कबाड़ी की माँ नहीं है न, तो दो रोटी में तू महँगी नहीं है।”
रोटी मुँह से लगा कर अनवरी सिसक पड़ी। फिर सामने पूजा का आला देख कर बोल पड़ी,” बेटा लेकिन ये…?”
कल्लू ने फिर कहकहा लगाया, “इसमें और तेरे अल्लाह में कोई फ़र्क़ है क्या? तूने कहा था न कि तू भीख मांगने जा रही है। तो यहीं बैठ और तेरे अल्लाह से भीख माँग कि तेरे इस बेटे तो रोज़ दो की जगह चार रोटी जितना धंधा दे!”
***
लघुकथ-३
भरोसा
कचरा बीनते हुए भिखारिन और उसके दो छोटे-छोटे बच्चों के हाथ एक पुराना चिराग लग गया और जैसे ही भिखारिन ने वह चिराग हल्का-सा रगड़ा, एक जिन्न प्रकट हो गया।
“सुन भिखारिन, मैं चिराग का जिन्न हूँ। मैं तुझे तीन वरदान देता हूँ। जो चाहे, वह मांग ले।“
भिखारिन बहुत देर सोचती रही और बोली, “मरे हुए पति को वापस लाना तो तेरे वश में नहीं। पहला वरदान मांगती हूँ कि मेरे दोनों बच्चों को बड़ा हो कर कचरा न बीनना पड़े। दूसरा, इनको पक्का मकान मिले। तीसरा, इनको कभी बीमारी न लगे।“
“ऐसा ही होगा।“ कह कर जिन्न गायब हो गया।
भिखारिन का छोटा वाला बेटा ज़ोरों से रोने लगा, “रोटी, माँ, रोटी। तूने रोटी क्यों नहीं मांगी? मुझे भूख लगी है न!”
वह कुछ कहे, इस से पहले बड़े बेटे ने छोटे को एक हल्की चपत लगाई और कहा, “पागल, रोटी कभी जिन्न देता है क्या? कभी भूखा सुलाया हमें माँ ने?”
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लघुकथा-४
अवलम्बन
“तो सतीश जी, आपका बाज़ू काटने के अलावा कोई चारा नहीं। ज़हर बहुत गहरा फ़ैल चुका है। अब दो ही विकल्प बचे हैं, बाज़ू या जीवन। निर्णय आपका!” डॉक्टर विनोद का स्वर ठंडा था।
“दो ही विकल्प!” ये शब्द सुन कर सतीश अतीत में कहीं खो गया। सामने दीवार पर बेटे की तस्वीर उसे यादों के भँवर में कहीं ले गई।
“पिताजी, अब आपके सामने दो ही विकल्प बचते हैं। मुझे चुनिए या माँ को। मेरी जीवन शैली जैसी है, वैसी ही रहेगी। माँ को नहीं पसंद तो मैं क्या करूँ? रोज़-रोज़ की झिकझिक से मैं परेशान हो गया हूँ। विनीता का फ्लैट है और वो अकेली रहती है। हम साथ रह लेंगे। हमारी पीढ़ी में सब चलता है। आप लोग न जाने किस युग में जी रहे हैं! ख़ैर, अब आपके पास दो ही विकल्प हैं, निर्णय आपका!” बेटे का स्वर अभद्रता की सीमा पार कर चुका था।
अचानक सतीश को अपने माथे पर सावित्री का स्पर्श महसूस हुआ और वह वर्तमान में लौट आया। उसने आँखें खोलीं और पत्नी का हाथ कसकर थाम लिया। फिर धीमे परंतु दृढ़ स्वर में बोला, “डॉ विनोद। आप ऑपरेशन की तैयारी कीजिए। मैं आज भी बाज़ू के मुक़ाबले जीवन ही चुनूँगा!”
***
लघुकथा-५
अक्स
दरवाज़ा खोलते ही सुमित्रा के आँखों में प्रश्न उभर आया, “जी आप लोग कौन? मैंने पहचाना नहीं।” सामने एक युवती और शायद उसके माता-पिता थे।
“आंटी, आप हमें नहीं जानतीं। हम लोग पार्क के दूसरी तरफ़ वाली कॉलोनी में रहते हैं। लेकिन बात पहचान की है ही नहीं।” लड़की का स्वर तल्ख़ था।
“अरे? ऐसी क्या बात हो गई?”सुमित्रा चिंतित हो उठी।
“देखिए बहन जी, बात बड़ी शर्मनाक है!” इस बार युवती की माँ ने बोलना आरम्भ किया,”दरअसल हम मिसेज और मिस्टर गुप्ता हैं और ये हमारी बेटी स्वाति है।”
“जी अच्छा। आप सीधे मुद्दे पर आइए बहन जी।” सुमित्रा के स्वर में चिंता बरक़रार थी।
युवती कठोर स्वर में बोली,”आंटी, मैं रोज़ पार्क में जाती हूँ मॉर्निंग वाक के लिए। लेकिन पिछले एक सप्ताह से एक अंकल मेरे पीछे पड़ गए हैं। मुझे लगातार घूरते हैं और जहाँ मैं जाती हूँ, वहीं पीछे आ जाते हैं। मेरा समय ठीक सात बजे का है, तो अंकल भी ठीक सात बजे पहुँच जाते हैं। आज तो वे मुझे देख कर मुस्कुराने भी लगे। मैंने पता लगाया तो मालूम पड़ा कि अंकल यहाँ रहते हैं।”
सुमित्रा के चेहरे का भाव बदल रहे थे। वह एकटक युवती का चेहरा देखे जा रही थी।
युवती के पिता आगे आए और बोले,” देखिए, हम कोई क़ानूनी कार्यवाही नहीं करना चाहते, वरना…”
सुमित्रा ने संयत स्वर में कहा, “आप लोग एक बार अंदर पधारने का कष्ट करेंगे?” तीनो आगंतुक हिचकिचाए, तो सुमित्रा ने ज़ोर देते हुए कहा, “आ जाइए एक बार। आपके ‘अपराधी’ मेरे पतिदेव अनिरुद्ध हैं, लेकिन अभी वे दवा ले कर आराम कर रहे हैं।”
जैसे ही तीनों बैठे, सुमित्रा ने अलमारी से एक फोटो-एलबम निकाल कर उन लोगों के सामने खोल दिया। स्वाति चौंक उठी। एलबम में सभी फ़ोटो एक युवती के थे, जिसका चेहरा-मोहरा और क़द-काठी उस से बहुत मिलते-जुलते थे। यहाँ तक कि स्वाति की तरह उसने भी लगभग हर चित्र में गुलाबी रंग के वस्त्र ही पहन रखे थे। तीनों आगंतुकों ने प्रश्नवाचक दृष्टि से सुमित्रा जी की तरफ़ देखा।
“मृणालिनी। या मीनू। हमारी इकलौती बेटी। तीन महीने पहले एक सड़क-दुर्घटना में वह हमें छोड़ कर चली गई थी।” सुमित्रा का स्वर सिसकियों में डूब गया।
फिर अपने आप को सम्भालते हुए बोलीं, “हम दोनों पर बिजली-सी गिर पड़ी। मैं तो ज्यों-त्यों यह आघात झेल गई लेकिन अनिरुद्ध मानसिक रूप से टूट गए। कभी सड़क-दुर्घटना वाली जगह चले जाते तो कभी श्मशान की तरफ़। मनोचिकित्सक का इलाज शुरू होने के बाद अब हालत सुधर रही है। मैंने ही इन्हें सुबह पार्क में घूमने की सलाह दी थी, लेकिन नहीं जानती थी कि वहाँ ऐसा हो जाएगा। दरअसल तुम्हारा पसंदीदा रंग भी गुलाबी है न बिटिया? मीनू का भी वही था। तुम्हारे अंकल तुम में उसे ढूँढ रहे हैं शायद।”
तीनों मेहमानों की आँखों में आँसू थे। स्वाति ने दबे स्वर में कहा,”आंटी, मुझे क्षमा कर दीजिए। मैंने पापा जैसे अंकल को कितना ग़लत समझा।”
तभी गला खंखारते हुए अनिरुद्ध बैठक में आये, लेकिन स्वाति को देख कर घबरा गए, “वह मैं… ग़लती से… माफ़ कर दीजिए… दरअसल मैं इस बच्ची को… क्या नाम है बिटिया आपका?”
सुमित्रा ने उठ कर अनिरुद्ध का हाथ थाम लिया और कहा, “यह स्वाति बिटिया है अनिरुद्ध।”
अचानक स्वाति उठी और अनिरुद्ध के चरणों में झुकती हुई बोली, “नहीं अंकल, मैं आपकी मीनू। कल सुबह सात बजे पार्क में इंतज़ार करूँगी आपका। आयेंगे न?”
रेडियो पर जगजीत सिंह का स्वर गूंज रहा था।
“ऐसा भी एक रंग है, जो करता है बात भी
जो भी उसको पहन ले, वो अपना-सा लगता है।
तुमको भूल न पाएंगे, ऐसा लगता है।”
***
पाँच लघुकथा

डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा
रायपुर , छत्तीस गढ़

लघुकथा
१.कफन
पिछले दो दिन से पत्नी की तबीयत ठीक नहीं थी। घर में खाने के लाले पड़े थे। ऐसी मुफलिसी में दवा-दारू कैसे करे ? परंतु पत्नी को यूँ ही बिना इलाज के कैसे मरने दे ?
पाँच साल पहले वह बेटे की इलाज के लिए गैरकानूनी तरीक़े से अपनी एक किडनी बेच चुका है। अब क्या करे ?
काफी सोच-विचार कर वह एक निजी अस्पताल में अपना खून बेच कर नौ सौ रुपए का जुगाड़ कर ही लिया। हाथ-पैर जोड़ कर डॉक्टर साहब को अपनी झोपड़ी में भी ले आया। उसे पूरा विश्वास था कि अब उसकी पत्नी बच जाएगी।
डॉक्टर ने पत्नी की नब्ज देखी। बी.पी. वगैरह चेक कर एक सादे कागज पर कुछ दवाइयाँ लिखकर देते हुए कहा, “मैंने दवाइयाँ लिख दी हैं। ये इन्हें खिला देना। ये जल्दी ही ठीक हो जाएँगी।”
अपनी फीस के 500/- रुपए लेकर डॉक्टर साहब चले गए।
वह लाचार-सा कभी पत्नी तो कभी डॉक्टर की पर्ची, कभी डरे सहमे छोटे-छोटे बच्चों तो कभी हाथ में बचे हुए 400/- रुपए को देखता रहा।
कुछ सोच कर वह तेजी से भागते हुए मेडिकल स्टोर पहुँचा।
दवाई लेकर घंटे भर बाद जब वह घर पहुँचा, तो पत्नी दुनिया छोड़ चुकी थी।
वह उलटे पैर मेडिकल स्टोर पहुँचा और बोला, “कृपया ये दवाइयाँ वापस ले लीजिए और मेरे पैसे मुझे लौटा दीजिए, क्योंकि ये दवाइयांँ जिसके लिए खरीदा था, वह अब इस दुनिया में ही नहीं है।”
मेडिकल स्टोर का संचालक बोला, “देखिए, रूल्स के मुताबिक यहाँ हम बिकी हुई दवाई के बदले दवाई ही दे सकते हैं, रुपए नहीं लौटा सकते ? बोलिए, इन दवाइयों के बदले आपको क्या दें ?
“एक कफन दे दीजिए। कफन खरीदने के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैँ।” कहते हुए रो पड़ा वह।
लघुकथा-२
लघुकथा-३
रिश्ता वही, सोच नई
“बेटा, क्या तुम्हें हमारी बेटी पसंद है ?” लड़की के पिता रमेश जी ने पूछा।
“जी हाँ।” लखन ने कहा।
“देखो बेटा, मैं लड़की का पिता हूँ। इसलिए मुझे अपनी बेटी की फ्यूचर का ध्यान रखते हुए आपसे कुछ चीजों की जानकारी चाहिए।”
“जी बिल्कुल पूछिए। आपको जो भी पूछना है।”
“बेटा, जैसा कि आपने बताया कि आप सरकारी कॉलेज में लेक्चरर हैं। मतलब नौकरी परमानेंट है। क्या आप मुझे अपना सिबिल स्कोर बता पाएँगे।”
“हाँ हाँ, क्यों नहीं। ये देखिए 898 है।” लखन ने एप में खोलकर दिखाया।
“वाओ, व्हेरी गुड। आपका सिबिल स्कोर तो मेरे से भी अच्छा है। हमारी ओर से ये रिश्ता पक्का है।”
“अंकल क्या मैं जान सकता हूँ कि आपके कुल कितने बच्चे हैं ?”
“बेटा, मेरी दो ही बेटियाँ हैं। बड़ी बेटी की शादी तीन साल पहले ही कर चुका हूँ। अब दूसरी की आपसे।”
“सॉरी अंकल। मुझे ये रिश्ता मंजूर नहीं ?”
“पर क्यों ? अभी तो आप कह रहे थे कि आपको मेरी बेटी पसंद है। फिर…”
“क्योंकि तब आपने मुझसे सिबिल स्कोर नहीं पूछा था और…”
“और क्या ?”
“जब आप सिबिल स्कोर देखकर दामाद पसंद कर सकते हैं तो मैं भी इकलौती लड़की से शादी कर सकता हूँ। ऑफ्टरआल ये मेरे फ्यूचर का सवाल है।”
डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा
लघुकथा-४.
रिश्तों की खिचड़ी
“माँ-बाबू जी तो अब रहे नहीं, पर उनकी इच्छा का मान रखने के बहाने ही सही, हम लोग साल में एक बार सबसे मिल तो लेते हैं।” बड़ी बहू ने किचन में चावल धोते हुए कहा।
“हाँ, कितना खुश हो जाते थे बाबू जी हम सबको त्योहार पर एक साथ देखकर। लगता था मानो वे सालभर इसी दिन का इंतजार करते हों।” छोटी बहू ने दाल चढ़ाते हुए कहा।
“सच कहूंँ दीदी तो हम लोग भी तो इस दिन का इंतजार करते हैं कि कब दिवाली आए और हम सब यहाँ पहुँचकर एक साथ त्योहार मनाएँ। बच्चे भी तो कितने लालायित रहते हैं अपने परिजनों से मिलने के लिए।” मंझली बहू ने सब्जी काटते हुए कहा।
“हाँ, रोजी-रोटी के लिए भले ही हम सब अलग-अलग शहरों में रहते हों, पर दिवाली पर आगे भी यहाँ जरूर आएँगे और मिलकर त्योहार मनाएँगे। तुम्हारे जेठ जी भी कह रहे थे कि हम सबका साल में कम से कम एक बार मिलना जरूरी है। कहीं ऐसा न हो कि कल को हमारे बच्चे अपने भाई-बहनों को ही न पहचान सकें।” बड़ी बहू ने कहा।
“हाँ दीदी, भैया एकदम सही कह रहे हैं। जब तक हमारे बच्चे अपने भाई-बहनों के साथ कुछ खूबसूरत पल नहीं बिताएँगे, तब तक उनमें प्यार और अपनेपन का भाव कैसे पनपेगा ?”
“तो तय रहा कि जब भी समय मिले, हम लोग एक दूसरे के यहाँ आते-जाते रहेंगे, पर दिवाली में आवश्यक रूप से सभी सपरिवार यहाँ गाँव आएँगे।” बड़ी बहू ने कहा।
“क्या खिचड़ी पका रही हैं तीनों बहुएंँ ?” किचन के बाहर नटखट देवर जी की आवाज सुनकर बड़ी बहू ने जवाब दिया, “रिश्तों की खिचड़ी।”
और तीनों बहुएँ खिलखिलाकर हँस पड़ीं।
लघुकथा-५
वजनदार प्रोफाइल
‘‘पापा, आप अपनी प्रकाशित होने वाली सभी पुस्तकों के आवरण पृष्ठ पर अपने परिचय के साथ महामहिम राष्ट्रपति महोदय से पुरस्कृत लिखते हैं। आप अपने सभी सोसल मीडिया एकाउण्ट में भी वही फोटो लगाते हैं। वैसे आपको ये राष्ट्रपति पुरस्कार मिला कब और किसलिए था ?’’ जिज्ञासावश बारह वर्षीय बेटे ने अपने साहित्यकार पिता से पूछा।
‘‘……..’’
‘‘बताइए न पापा, प्लीज।’’
‘‘बेटा, जानना ही चाहते हो तो सुनो। आठ-नौ साल पहले हमारे गाँव में महामहिम राष्ट्रपति महोदय का आगमन हुआ था, तब उन्होंने हमारे सरपंच जी के आग्रह पर मेरे जैसे गाँव के सात-आठ ऐसे चहेते युवाओं को, जो उनके स्वागत-सत्कार के कार्य में लगे हुए थे, अच्छी व्यवस्था के लिए सम्मानित किया था। बस, तब से मैं राष्ट्रपति पुरस्कृत हो गया हूँ। ऐसा लिखने से प्रोफाइल वजनदार लगता है।’’ उन्होंने मुसकुराते हुए बताया।
‘‘पापा, अब दूसरी बार हमारे गाँव में महामहिम राष्ट्रपति कब आएँगे ?’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘मुझे भी अपनी प्रोफाइल वजनदार बनानी है।’’
बेटे की बात सुनकर वे सोच में पड़ गए।
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