आपके पत्र और ई. पत्र/ Your letters & e.mails

I like you informative and interesting Site. Congratulations..
Jagdish Kinjalk.
( Author, Journalist, Editor, Media Man and Retd. Director of Radio )
Bhopal. M.P.
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Date: 2014-04-06 21:31 GMT+05:30
आदरणीया शैल जी, सादर नमन,
आप दूर बैठ कर कितना महान कार्य कर रही हैं आपकोस्वयं नही पता । आप महनीय हैं
सचमुच आप काशी की विभूति हैं । मेरा बारंबार प्रणाम आपको । आपकी पत्रिका
बहुआयामी एवम शलाघनीय है । देख कर आनन्दातिरेक से जी भर गया ।
डा‌*. मञ्जरी पाण्डेय ,शिक्षिका ,केन्द्रीयविद्यालय , नं.- ४ , डी.रे.का.,वाराणसी।
चल दूरवाणी -९३०७४८८०८७।

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From: Padma Mishra
Date: Sun, 2 Mar 2014 11:42:17 +0000
kabhi kabhi lekhni ka suruchi purn abhivyakt soundary hame shabdhin kar deta hai ..kya kahun,kya likhun -bahu sundar shail di aapki sampadan -kushalta hme moun kar deti hai,jivan ka koi kona achhuta nahin raha lekhni kii aankhon se ..yah srijan-yatra nirantar jari rahe -meri ashesh anant shubhkamnayen–pdama

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From: Anita Rashmi
Date: Thu, 27 Feb 2014 06:55:31 +0000
shail ji,

namaskar!

lekhni pahle se jyada prabhavi, upyogi ho gai hai. main nirantar use dekhti hun. renu sahay ki kahaniyan aChi lagi thi. praytan per alekh bhi jankari bhare hote hain. naye ank me kavitayen sunder.
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From: Harihar Jha
Date: Mon, 10 Feb 2014 02:47:34 +0000
शैल जी
नमस्कार। फरवरी का अंक बार-बार पढ़ने योग्य है।

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From: Sangeeta Srivastava
Sun, 29 Dec 2013 10:49:38 +0000
shaildi,namaste,
nayesal ki hardik shubhkamna sprivar,
meri kavita ko sthan dene ke liye dhanywad.
aapka kavita section bahut hi utkrisht hai iske liye sadhuvad.
Omji ko vishesh bdhaee
Arunji ke kavita sagrah ki smisha ke liye.Manthan per aap ka lekh bahut hi sunder hai. sach hai kashi ki mahima aprampar hai.kashi to jiwan aur mritu ka anupam sanyog hai.yaha basne wale jiwan aur mritu ke bhay se abhay hote hai.aap ko sadhuwad ati sunder.jiwan to mrigmrichica hai esse par wahi pa sakta hai jo moh bandhan se mukt ho.aap ki patrika ko yash ki prapti ho neye lekhko ko sthan mile asi kamna hai. dhanyawad .
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From Devi Nagrani
04/12/2013
manney Shail ji
lekhni mein kalatmak lekhan kala ka pardarshi chitr ankhon ke aage indradhanushi rang bikher deta hai…Is saundarymay sampadan ke liye bahut bahut shubhkamnayeinDevi Nnagrani
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03/10/2013
आपकी पत्रिका वैश्विक दृष्टि सम्पन्न है। इससे गुजरना सुखद अहसास से भर देता है। आपकी मेहनत को नमन करता हूँ ।
गिरीष पंकज
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03/10/2013
Vividh vishayon ko apane me samete hue sundar patrika. UtkRuShT sampadan hetu badhai.
Mahesh Chandra Dewedy
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09/08/2013
आदरणीया बहन शैल जी,
सस्नेह नमस्ते।
लेखनी का अगस्त अंक पढ़ गया। मंथन तो वास्तव में मन को देर तक मथता रहा। जातिवाद, सम्प्रदायवाद, प्रांतवाद (जो अब बढ़कर अंचलवाद तक पहुँच चुका है), भाषावाद (जिसने अब “बोलीवाद” का रूप ग्रहण कर लिया है) जैसी समस्याएं दिन- ब – दिन उग्ररूप धारण करती जा रही हैं। आपने बहुत सही कहा है आज का भारत एक ऐसी इमारत है जिसकी नींव खोखली हो चुकी है और छत जर्जर। तभी तो किसानों को तो आत्महत्या के लिए विवश होना पड़ रहा है, पर उधर करोड़पतियों / अरबपतियों की संख्या बढ़ती जा रही है। एक वे इंजिनियर थे जिन्होंने (आधुनिक सुविधाओं के बिना ) केदारनाथ के मंदिर को ऐसे ढंग से बनाया कि भयंकर बाढ़ में भी सुरक्षित रहा ; एक ये इंजिनियर हैं जो तमाम सुविधाओं के बावजूद ऐसे सड़कें बनाते हैं जो साल भर भी न चल सकें। निश्चित रूप से यह वह भारत तो नहीं। ” कहाँ है वह मेरे सपनों का भारत , जिसे मैं पूजता हूँ ? स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिल्ली जैसे महानगरों की जगमगाहट और नारों के तुमुलनाद में बहकने से बचाने के लिए आपने पत्रकार का धर्म जिस तरह निभाया है,उसके लिए आपका अभिनन्दन करता हूँ।
रवीन्द्र अग्निहोत्री

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Wed, 7 Aug 2013 15:51:59 +0530
शैल जी
नमस्कार
लेखनी का अगस्त अंक पढ़ा। शानदार। आप ने पूरा उत्तराखंड ही दिखा दिया अब मैं क्या लिखूं :))
सुन्दर धाराप्रवाह। आप से भी सपरिवार रूबरू हो गए।
सादर
सेहर
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Wed, 7 Aug 2013 11:31:32 +0000
आदरणीय संपादक महोदय!
यदि आप ब्लॉग में प्रकाशित रचनाओं को भी लेखनी में शामिल करते हों तो कृपया मैं अपना ब्लॉग लिंक दे रही हूँ यदि इसमें से कोई भी रचना आप इसमें शामिल करने योग्य समझ प्रकाशित करेंगे तो मुझे हार्दिक प्रसन्नता होगी ..
सादर
कविता रावत
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Sat, 3 Aug 2013 07:27:05 -0700
bhut hi sarahaniya karya kar rahi hai ap
Puran singh

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Shailji

Congrats. Very well edited.
It was forwarded to me by a friend.
I would like to get it regularly please.
Do you welcome poems/stories from unknowns, like me?
I have published a few (serious) poems in Sarita, and a short story in Sakhi, not to mention the internet mag. anubhuti-hindi.org, plus in the anthology of Australian Hindi poets (Boomerang).

Best regards
Yours
PreM
Prem S Mathur
8 Lachlan Rd, Willetton
WA 6155
Australia

Phone: 618 9354 9316

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बहुत बहुत धन्यवाद शैल जी,
आपने मेरी दो लघुकथाओं को यह मान बख्शा कि वे ‘लेखनी’ में स्थान पा सकीं।
इस बार का लेखनी का अंक बहुत विशिष्ट लगा। अशोक वाजपेयी जी की कविताओं से गुजरना एक नये अहसास से रू ब रू होना लगा। ग़ज़ल पर जो आपने लेख दिया है, वह मैं एक सांस में पढ़ गया हूँ। ग़ज़ल में हाथ-अजमाई करने वाले नये शाइरों को इसे अवश्य पढ़ना चाहिए।
अन्य रचनाएं भी पढ़ूंगा।

सुभाष नीरव
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Date: Fri, 28 Jun 2013 12:10:50 +0000

Lekhnee ki samagree parh kar ek behtar E-Magzine ki meri TALASH poorn huee.Badhaee.
Gopesh Vajpayee,Bhopal.(M.P).
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शैल अग्रवाल जी प्रणाम।

आपके हौसले के बदौलत लिखने का मन किया और ‘लेखनी’ चलती रही। इस मायने आपका ई-पत्रिका चलाने का उद्देश्य सफल हो रहा है ऐसे माना जा सकता है। लेखक और समीक्षक को आपका एक विशिष्ट विषय पर केंद्रित अंक लेखन के लिए उकसाता है और कम-से-कम पंद्रह बीस दिन चिंतन करने के लिए भी मजबूर करता है। बधाई।

डॉ.विजय शिंदे
औरंगाबाद-महाराष्ट्र (भारत)
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Date: Fri, 7 Jun 2013 13:05:06 +0000
लेखिनी का लिंक डॉ. भावना तिवारी से मिला.. हालाँकि पहले एक बार देख चूका था.. एक बेहतरीन पत्रिका है और आज थोडा आराम से देखकर मन खुश हो गया…मेरी ओर से हार्दिक बधाई एवं मेरी सदस्यता ग्रहण करके उपकृत करने की विनम्र बिनती.
– पंकज त्रिवेदी
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Date: Fri, 7 Jun 2013 06:14:11 +0000
सादर नमन ..

लेखनी का एक अंक आदरणीय ओम निश्छल जी के द्वारा प्राप्त एक link के माध्यम से पढ़ने को मिला …..आज दोबारा अनायास पढ़ने को मिला ..सुखद अनुभूति की प्रबलता कि पत्र लिखे बिन उँगलियाँ अकुलातीं रहीं ….एक-सी सोच वाले कवि ,लेखकों को एक सम्मिलित मंच पर देख कर ख़ुशी हुई…हार्दिक बधाई इस लेखनी में सहयोगी रचनाकारों को ..विशेष शुभकामनाएँ श्रमसाध्य सम्पादन को ….नवीन सोपानों का स्पर्श लेखनी को प्राप्त हो ..इस सदाकांक्षा के साथ ……..

..भावना तिवारी -कानपुर (कवयित्री )
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Date: Tue, 4 Jun 2013 05:43:08 +0000
From:Sunita Jugran
I am thankful to Khursheed Hayat Bhai for letting me know about your magzine.
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Date: Tue, 28 May 2013 09:30:02 +0000
From:Padma Mishra

namskar shail di –mai to aapke sampadan ,kushlta our samvedanshilta par fida hun ..lekhni ne meri rachnadharmita ko ek naya marg dikhataya hai –shatshah–aabhar –
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Date: Tue, 23 Apr 2013 10:22:45 +0530
From: Sourav Rai.

आपकी पत्रिका ‘लेखनी’ का नियमित पाठक रहा हूं । आपकी पत्रिका ऑनलाइन ही पढ़ता रहा हूँ । साहित्य के उत्थान एवं सेवा में आपके कार्य के लिए शुभकामनाएं एवं बधाई ।
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Date: Wed, 3 Apr 2013 15:46:26 +0530
From: goverdhan yadav

नमस्कार,
निश्चित ही यह पत्रिका शो‍षित-पीड़ित मानव-जन का स्वर बन कर अपने दायित्वों का निर्वहन भली-भांति कर रही है. इसमे रोजमर्रा की कशमकश,उसमें बिंधी इच्छाएं,आकांक्षाएं,विडम्बनाएं आदि को बडे ही शिद्दत के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है.आपकी कडी मेहनत इसमें देखने को मिलती है.अशे‍ष शुभकामनाएं.
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Date: Wed, 3 Apr 2013 13:27:50 +0530
From: sudha arora
खूब प्रासंगिक मुद्दा लिया है शैल जी आपने ! बधाई आपको !
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Date: Wed, 3 Apr 2013 10:21:16 +0100
From: sudha bhargava
लेखनी को इंद्रजाल पर देखकर बड़ी खुशी हुई । धन्यवाद … ।
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Om Nischal : 5 Mar 2013
भई आपका फागुन के रंग अद्भुत है। बसंत पर शैल अग्रवाल ने चित्‍तग्राही निबंध लिखा है। ऐसे रिच लेख कादंबिनी जैसी पत्रिका में नही आ पाते। अहा जिन्‍दगी में ऐसे आलेख जरूर आते हैं। उनका फरवरी अंक वसंत अंक था । इसी तरह होली में कर्ठ लेखों, गीतों गजलों दोहों का गुच्‍छा बेहतरीन ढंग से पिरोया है। मुनव्‍वर राणा की गजल की नई पुस्‍तक शहदाबा पर अच्‍छे तरीके से लिखा है विजेन्‍द्र शर्मा ने। हेमंत शर्मा का स्‍मृति शेष्‍ं भी मार्मिकता से बुना गया रम्‍य लेख है।

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Anita Rashmi : Sun, 3 Mar 2013 17:22:42 +0000
nirantar sarthak, achhi rachnao se saji lekhni behad akarshak hoti hi ja rahi hai. gambhir rachnayen man ko bandhti hai. apne march ank me meri is kahani ko prakashit kar mujhe anandit aur patrika ke sarokaron ke prati aur aaswast kar diya. dhanyvad shail ji.
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Vijendra Sharna 02/02/2013
Aadab Kaisi hai aap… Rubru….aajkal band kar diyaa kyaa…. Is shaandaar ank ke sampaadan ke liye badhaai…. Regards Vijendra…..
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Rachna Bhardwaj 02/02/2013
ओह !! इसकी सूचना मुझे नही मिली, वरना में इस विषय पर बहुत कुछ भेजना चाहती थी

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Saroj Vyas 02/02/2013

shail ji namaskar aaj lekhani ka jan-farwari ka ank padhane mila .bahut hi sundar hai aek sanpoorna sahityikata ko jeeta huaa sa hai yah .sabhi ki rachanayen marmasparshi rahi .
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Date: 24’th Jan 2013
आपका प्रयास अभिनंदनीय है।
डॉ. सत्तपा चावन
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Date: 11 Jan 2013
आज कल लेखनी का अंक अपलोड नही हो पा रहा है।जिससे देश विदेश के साहित्य के कई समाचैरो का अवलोकन नही हो पा रहा है।
लाल बिहारी लाल
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Date: 26 Dec. 2012
इन्टरनेट द्वारा रचनाएँ भेजने का पता कहीं दिखाई नहीं दे रहा ….यह तो लिखा है कि यूनिकोड में रचनाएँ भेजे …लेकिन कैसे …..?
जयंत श्रीवास्तव
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Date: 5 Nov 2012

Is mah kee rachnaon ka vishay samsmayik hai evam rachnakaron ka chayan uchch stareey hai.
Kavitayen visheshatah rochak hain.
Sampadak ko badhai
Mahesh Dewedy
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Date: Mon, 29 Oct 2012 15:29:11 +0530

कहानीकार हयात जी मानवीय संबंधों की पड़ताल अच्छे से कर लेते हैं। यही नही वह जीवन से जुड़ी बहुत सी बातों-चिंताओं को भी कहानियों में उकेरते हैं। सुन्दर कहानी है। आप दोनों को बधाई …!!
शहनाज इमरानी

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Date: Sun, 21 Oct 2012 16:41:33 +0530
संदर्भः गजल में बच्चे,
..जितनी तारीफ़ की जाये उतनी कम है ….
पहली बार बाल मन के माध्यम से समाज को समझने का मौका मिला |
-सुशील सिंह
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Date: 3’rd Oct 2012
Shail Ji,Yah to sangrahniy ank hai. Vijendra Sharma ki ‘Jab bachche ghazal me aa gaye’ shirshak charcha padhkar aanand aa gaya. Bade shram se bachchon par ghazal sangrah taiyar kiya gaya hai. Badhai sweekar karen.
Mahesh Chandra DewedyLucknow
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Date: 24 Sept 2012
लेखनी मिलीजुली आवाज देने की आकांक्षा लेकर आगे बढ़ रही है।
-जितेन्द्र कुमार

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Date: Thu, 20 Sep 2012 13:59:33 +0530
स्नेही शैल जी

लेखनी के ताजा सितम्बर अंक ने मन मोह लिया l एकटक इसमें छिपे सौन्दर्य ,शिल्प ,कविताओं ..कहानियों को देखती रही l धरोहर ,मंथन स्तम्भ की रचनाएं हर बार कि तरह श्रेष्ठ रहीं! सम्पादकीय हमेशा कि तरह सुंदर शब्द शैली की अभिव्यक्ति से प्रभाव डाल रहा था ! रचनाओं का चयन और प्रस्तुति बहुत अच्छी रही ..हिंदी पर सुंदर रचनाएं थीं ! एक उम्दा अंक के लिए असीम बधाई!

सस्नेह

डॉ सरस्वती माथुर
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Date: Wed, 19 Sep 2012 04:27:35 -0700
आदरणीय बहन शैल जी ,
“ आचरण और व्याकरण भूले हम सब “ लेखनी के सितम्बर अंक के लिए आभारी हूँ. इस अंक की अनेक रचनाओं ने विशेष आकर्षित किया. “ समय का जादूगर जलपरी-सा दूर निर्णय की अडिग चट्टान पर बैठा रंगबिरंगे इंद्रधनुष बुनता रहता है और हम सम्मोहित इसके तिलिस्म में भटकते, पसीना बहाते रहते हैं .” अपनी बात में आपने जिस ढंग से समय की जादूगरी दिखाई है, उसके लिए बधाई. प्रसिद्ध रससिद्ध कविवर बालकवि बैरागी जी की ” माँ हिंदी “, पूर्णिमा वर्मन की ” मेरी भाषा ” और आपकी ” प्रवास ” बहुत पसंद आईं . ” आरक्षण क्या है ” ( रंजन मिश्रा ) की अनेक पंक्तियाँ मन को छू गईं — ” समानता के नाम पर / किसी के सपने छीन लेना / या संख्या के दम पर / लोगो को कुचल देना ” उन्हें बधाई. , शैलजा पाठक ने मानों आज सामान्य व्यक्ति की दुखती रग पर हाथ रख दिया है ,” लिफ़ाफ़े में पैसे कम हैं, आँखें नम हैं “. अज्ञेय और यशपाल की कहानियों पुरानी होते हुए भी नवीन लगती हैं. डा. सरस्वती माथुर का आलेख ” गुलाबी नगरी की पहचान – जयपुर फुट ” जानकारी भी देता है और डा. सेठी जैसे महामानव के प्रति कृतज्ञता भी ज्ञापित करता है. जब कोई युवा ( डा. प्रीत अरोड़ा ) ” बुढापे ” की समस्याओं और चिंताओं का आकलन करने लगता है, तो विस्मय तो होता ही है साथ ही प्रसन्नता भी होती है. उन्हें आशीष. आप इस प्रकार की रोचक और उपयोगी सामग्री जुटाकर हम लोगों के समक्ष प्रति मास प्रस्तुत कर देती हैं, इसके लिए आपको जितना भी धन्यवाद दिया जाए, कम है. आप स्वस्थ रहें और इसी प्रकार माँ सरस्वती की सेवा करती रहें — इसी कामना के साथ, रवीन्द्र अग्निहोत्री
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Date: Tue, 11 Sep 2012 16:17:13 -0700
शैल जी , आज लेखिनी पढ़ने का समय मिला। इस अंक में भी संकलित सामग्री पठनीय है। हिन्दी को लेकर लिखी गई सभी कवितायें अच्छी लगीं। कहानियाँ पढ़ना अभी बाकी है। उल्लेखनीय लगा मैक्सिम गोर्की का(अनूदित) आलेख – साहित्य का उद्देश्य क्या है? हमें लिखते समय इस आलेख को स्मरण रखना चाहिये। इसकी प्रासंगिकता का स्मरण मनुष्य मात्र के कल्याण से जुड़ा है।
सादर इला
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07 September 2012 7:30 .09
Kahani, Free Pass padhi. Bahut achchi lagi. Zindagi ke mayne hi badal jaate hain, retirement ke baad. Isme sandeh nahin. Lekin jeevantata ko banai rakhna apni soch par nirbhar karta hai. Aadami agar retirement ke baad ya phir umar ke ek aise mukaam par pahunch kar, jahan usaki kaya aur karya kshmata par koi prashn chinh lagta mahsus hota ho, apne jeene ki shaili ko badal sakta hai. Khush rahane aur khush rakhne ke hazar avasar hain. Dukhi hone ke liye kuchh zyada karane ki zarurat nahin padti. Achhi, bahut achhi kahani.
Hemanand Sharma Arun Bharti
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04 September 2012 12:30:21
लेखनी एक लंबे अरसे से अपनी यात्रा पर चलती चली आ रही है। जहॉं परंपरा और सनातन से इसका नाता है, वहीं आधुनिक रचनाशीलता से भी इसका गहरा जुड़ाव है। धरोहर, कविता में इन दिनो, माह के कवि, कविता: आज और अभी, कहानी समकालीन, कहानी धरोहर, कविता धरोहर, मंथन, कहानी विशेष, समीक्षा, परिचर्चा, विमर्श और विविधा जैसे स्‍तंभ लगातार अच्‍छी रचनाओं को सँजोते आ रहे हैं। सर्वथा पठनीय वेब पत्रिका। संपादिका शैल अग्रवाल स्‍वयं सुधी कहानीकार और कवयित्री हैं और अपनी बात में उनके संपादकीय को पढ़ना हमेशा एक ललित गद्य के रूपाकार से गुजरना होता है।

स्‍वागत लेखनी।
ओम निश्चल

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04 September 2012 06:10:56
shail didi, namastey,
september issue bahut achchha lagaa.
collection adwiteeya hai, aapne to amrita preetam se lekar tamam
sahityakaron kifauj khadi kr di h, iske liye aapko kotishah badhayee.

Ajat Shatru
Amar Ujala

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04 September 2012 04:10:00
साहित्य की मंडी में एक तरफ कारोबारियों की भीड़ है .जो ज़ाहरी चमक दमक , रंगीन चटपटे साहित्य को थाली में परोस रहे हैं , यह जानते हुए की चमक दमक के नीचे दीमक है , दूसरी तरफ वो चेहरे हैं , जो फकीराना अंदाज़ में साहित्य सर्जन कर रहे हैं , इस से बेखबर कि कोई उनकी तारीफ करता है या नहीं , जब कि साहित्य के इन फकीरों के पास वो सब कुछ है जो लेखनी को एक नया फलक दे जाता है ताकि लफ्ज़ परिंदे खुली और आजाद फिजा में परवाज़ कर सकें , इक नई इबारत लिख सकें , सब कि हथेलियों पर एक नया सूरज रख आयें ताकि अँधेरा छीन न सके रौशनी .
शैल अगरवाल एक ऐसी ही लेखिका का नाम है जो वर्षों से ख़ामोशी से साहित्य की खिदमत में लगी हैं , बगैर किसी ढोल बाजे के साथ…… साहित्य के प्रति उनके इस जूनून कि मैं कद्र करता हूँ . लेखनी का यह अंक भी पढने से तआल्लुक रखता है …. इस ख़ूबसूरत अंक के लिए शैल अगरवाल जी को बधाई !
आज और आने वाले कल से रु बा रू होना है तो लेखनी को देखें .
————— खुर्शीद हयात —————- .
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Date: 4 September 2012
lekhni ke vishay me jaankar achchha laga. mai bhi apni rachnayen bhejna chahti hun.dhanyvad
–padma mishra

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Date: Fri, 10 Jul 2012 20:01:28 +0630
यह पत्रिका आपके जीवन का एक अहम् हिस्सा बनेगी और जीवनपर्यंत हम जैसे लोग उसे पढ़ कर आपको याद करेंगे ।योगेन्द्र गुर्जर

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Date: Fri, 27 Jul 2012 22:01:28 +0530
लेखनी का हमेशा की तरह साहित्य को समृद्ध करता जुलाई अंक बहुत अच्छा लगा ! सम्पादकीय ” अपनी बात “की झरती बूँदें मन मोह ले गयीं ….शैल जी को बधाई! फु हारों में रमानाथ अवस्थी जी, गोपालसिंह नेपालीजी ,डॉ विष्णु सक्सेना जी ,गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर जी के साथ साथ- रचना जी व् खुशबू जी… सावन घटा के मृगछौनो ने तो शैल अग्रवाल जी की ” बादल ” कविताओं ने खूब भिगोया ..लोक गीतों में सावन जम कर बरसा !! कहानियाँ सभी अच्छी लगीं! फिर एक बार हमेशा की तरह उत्कृष्ट, सामयिक ,सार्थक और संवेदन शील रचनाओं के साथ बनी ठनी खड़ी थी “लेखनी” …इस हेतु साधुवाद ! मंथन भी छू गया..विविधा ने भी नयी जानकारी दी …और अब बैचैनी से इंतज़ार है नए अंक का…..:) ! डॉ सरस्वती माथुर

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Date: Tue, 3 Jul 2012 17:43:12 +0530

आदाब, ज़बरदस्त सम्पादन है आपका …..ज़ोर ए क़लम और ज़ियादा इसी दुआ के साथ- विजेंद्र
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Date: Mon, 2 Jul 2012 05:38:12 +0000
shail ji, namaste!
prayatan se sambandhit june ank pasand aya. club me ganesh-lakchmi ke dance per kya kaha jaye? anita rashmi

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Date: Mon, 18 Jun 2012 06:19:05 -0700
आदरणीय बहन शैल जी ,
सस्नेह नमस्ते । लेखनी का जून अंक बहुत पसंद आया. इस बार रमानाथ अवस्थी के सुन्दर गीत लेकर आया कविता धरोहर वाला स्तम्भ तो हमेशा मुझ जैसे बूढ़े लोगों को अतीत की यात्रा कराता ही है , पर्यटन को समर्पित इस बार का पूरा अंक अनेक अवसरों पर अतीत में ले गया . आपके पेरिस के शब्द चित्र को पढ़ते हुए अनायास ही महादेवी वर्मा के अनेक शब्द चित्रों की याद आ गई. आपने पेरिस का बहुत ही सुन्दर चित्र उकेरा है. डा सरस्वती माथुर ने ” पधारो म्हारे देस ” में उस जयपुर की याद ताज़ा कर दी जहाँ मैंने अपनी युवावस्था के 20 वर्ष गुज़ारे . गोवर्धन यादव का रोमांचक लेख ” शेरों के बीच एक दिन ” भी कुछ पुराने रोमांचक क्षण याद करा गया . स्मरण में भगवत रावत के निधन का समाचार भी अतीत की याद करा गया . ऐसी सामग्री जुटाने के लिए आपको बधाई।

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Date: Sat, 16 Jun 2012 13:53:23 +0530
शैलजी
“लेखनी” का जून 2012 का “यात्रा अंक ” बहुत ही समृद्ध और संग्रहनीय अंक है! सभी रचनाएं व् स्तम्भ खुबसूरत शब्दों -भावों की सुगन्धित माला है ..मनकों से सुसज्जित इस माला में सम्पादकीय पेंडल है, वो रत्नजडित जैसा सुशोभित हो रहा है …इस अंक का सम्पादकीय समझ व् दृष्टी के अलोक में प्रस्तुत है! समस्त सामग्री अत्यंत पठनीय व् संग्रहनीय है ! साज़ सज्जा इसे अतिरिक्त तौर पर आकर्षक बनाती है ..यूँ तो सभी की पर शैल अग्रवाल जी व् वर्तिका जी की कवितायेँ मन मोहती हैं !

“लेखनी” सही मायने में साहित्य की आग को बुझाती है, पढ़ कर मन खुश और आत्मा तृप्त हो जाती है! इस पत्रिका की हर माह बैचनी से प्रतीक्षा रहती है!.इस पत्रिका की अलग ही पहचान है ! बहुत बहुत बधाई !

डॉ सरस्वती माथुर

जयपुर
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is baar bahut achchhee lagee lekhani… kahani bahut acchi lagi…sadhuvaad
-vishnu saxena
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स्नेहमयी शैल जी,
नमन।
लेखनी पत्रिका से मैं प्रभावित ही नहीं,आश्चर्य चकित भी हूँ कि आप इतनी सुन्दर हिन्दी वेब पत्रिका का यू. के. से इतनी कुशलता से संचालन कर रहीं हैं। आपका प्रयास सराहनीय है। बहुत बहुत बधाई।
-रेनू चंद्रा

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Date: Wed, 9 May 2012 11:21:52 +0530
स्नेही शैलजी
सृज़न के सौन्दर्य के साथ “लेखनी” का मई का अंक …लाज़वाब है !” धूप” के बिम्ब को समेट झिलमिलाते सृज़न कणों के तारों से चमकती रचनाएँ बहुत ही बेहतरीन तरीके से सजी हैं ….”लेखनी पत्रिका” एक आकाश सी नए आयामों को छू रही हैl सम्पादकीय में भावों को बहुत ही खूबसूरती से सम्मोहित करते शब्दों में नए बिम्ब के साथ उकेरा है …जितनी तारीफ की जाये कम होगी शैलजी ! इस सुंदर सृज़न को नमन …मेरी बधाई स्वीकारें !
स्नेहंकांक्षी डॉ सरस्वती माथुर
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Date: Sat, 5 May 2012 12:36:26 +0530
शैल जी,

लेखनी का यह अंक भी पढ़ा. आपके द्वारा सामग्री का संकलन बहुत बेहतर होता है. मंथन की कविताओं ने बहुत आनंदित किया. बाकी सामग्री भी श्रेष्ठ है.

संजीव निगम
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Date: Tue, 1 May 2012 21:26:18 +0530
प्रिय शैल,
लेखनी के इस अंक में तुमने धूप को जिस तरह हज़ार बाहें फैला कर समेटा है वह सचमुच गहरी संवेदनात्मक दृष्टि का प्रमाण है. पूरे विश्व में सबके पास धूप के अपने अपने उजाले झुलसे कथ्य हैं, अपने इस अंक में तुमने कोई अपवाद नहीं छोड़ा है और बीच बीच में तुम्हारे कृतित्व के हस्ताक्षर भी हैं. विशेष रूप से तुम्हारी कविताओं में बिम्ब जैसे गीत बन कर छू जाते हैं. तुम योग्य रचनाकार और संपादक दोनो हो मेरी बहना…
ओह शर्मा जी, यह क्या कह दिया आपने…’फूल मुरझाया हुआ किस काम का..?’ अरे आपने जिंदगी नहीं देखी शायद. मेरी अंजुरी में कितने फूल हैं जिन्हें कोई मुरझाया हुआ कहा जा सकता है, लेकिन उन में से मेरे लिए साँसें फूटती है. मैं खुद न जाने कितनी बार कहीं मुरझाया फूल बन कर अपनी ऎसी ही किसी अंजुरी में गिरा हूँ और जी उठा हूँ. जिंदगी को पलट कर फिर देखो बंधु,
अभी पूरा अंक फिर से देखना है.
शुभेक्षु,
अशोक गुप्ता
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Date: Tue, 1 May 2012 20:42:58 +0530
शैल जी, अंक पुन: देख गया। अच्‍छा समायोजन है। आपका श्रम लेखनी के आकल्‍पन से लेकर हर आयोजना में दिखता है।
बधाई
ओम निश्‍चल
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Date: Tue, 1 May 2012 22:58:38 +0530
Shail ji,
Namaskar.
Abhi mein ne Lekhni dekha. Bahut pyara and sundar hai, hamesha jaise.Hamare shubh kaamanyein.

aap ke mitr
sony dalia
chandra mouli
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Date: Sun, 29 Apr 2012 05:21:24 +0000
shail ji,
namaste!
kya khub hai lekhni sandhya! bajre par kavya gasthi—gagnga ki lahren, banaras ke ghat… us par tayrti kavya panktiyan—nai prikalpana….behad akarshak! 5 varsh ki lekhni ko meri hardik badhai. lekhni sada ganga ki dhara si bahti rahe. bajre se dikhti arati, mandiron ke burj mujhme nai kahani ke bij bo rahi hain. banaras ki thandhai–sach me bahut acha laga sab kuch.

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05/4/2012
दीदी प्रणाम |
लेखनी का अप्रैल अंक देखा मन झूम गया | वो शाम , वो सारी बातें सब याद आ गईं |खूबसूरत अंक के लिये आपको बहुत बधाई | मेरे कविता को स्थान देने के लिये क्या कहूँ ? बस अच्छा लगा | ये सुखद आश्चर्य था।
रचना शर्मा
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05/4/2012
maaney Shail ji
Sadar namaskar
AAp bharat aayin par main aapse mil n paayi. Main mumbai mein hoon….aapki patrika ki nishtha sarahaneey hai. Iske sampadan ki kushalta aap ki saadhna hai.
sadarDevi
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05/4/ 2012
Shailji

Bahut bahut mubaarak – bahut acchi patroka hai!

aap itnaa samy nikal kar ye sab karti hain – bahut khoob.

aur aap ka gadya to padya sa hai!

sadbhavnaayen

prem

Prem S Mathur
8 Lachlan Rd, Willetton
WA 6155
Australia
Phone: 618 9354 9316

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04/4/2012
सुश्री शैल जी ,
लेखनी की पांचवीं वर्षगाँठ पर हुई काव्यगोष्ठी का आत्मीयता से भरा विवरण पढ़ कर मैं आनंदित हो गया हूँ . चित्र खूब हैं . काश , बनारस के गंगा घाट पर संपन्न ऐसी मनोरम काव्यगोष्ठी में शामिल होने का सुअवसर मुझे प्राप्त होता ! खैर , आपको नाना बधाइयाँ और शुभ कामनाएँ लेखनी के लिए . प्राण शर्मा
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01/ 3/ 2012

प्रिय बहन शैल जी,
सस्नेह नमस्ते लेखनी के नए अंक की सामग्री पढ़ते हुए बार – बार आपका अभिनन्दन करने का मन होता रहा . पूरा अंक है और सभी रचनाएँ पठनीय हैं. कविता धरोहर में अज्ञेय की चुनी हुई कविताएँ और कहानी धरोहर में गुलेरी जी की ‘ उसने कहा था ‘ कहानी को पढ़ने का अलग ही आनंद मिला . चौपाल में डा. वेद प्रताप वैदिक का आलेख ‘ बच्चों को कैसी भाषा में पढ़ाया जाए ‘ केवल विचारोत्तेजक नहीं, बच्चो के प्रति हमारे प्रेम और उत्तरदायित्व का बोध कराने वाला भी है. इस उत्तरदायित्व का जब सम्यक निर्वाह नहीं किया जाता, तब बच्चों के सन्दर्भ में नन्द किशोर आचार्य की कविता की पंक्ति याद आती है , ” कविता होना था मुझे, रह गया होकर कहानी , न कुछ हो पाने की ” ऐसी उपयोगी सामग्री जुटाने के लिए आपको हार्दिक बधाई . भवदीय – रवीन्द्र अग्निहोत्री

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22-1-12
shail ji,
namaskar! lekhni ka jan-2012 ka ank ‘navvwarsh visheshanank’ tazgi se bhara laga.baba nagarjun,bhavani prasad mishra,purnima barman,satya narayan,dr.sherjung aur aapki kavitayen mann ko anandit kar gayin.wahin shailendra ki kahani, alok ki laghukatha avam anya rachnayen bhi mann per chap chodti hain.rachnaon ki prastuti to ‘lekhni’ mein lubhavni hoti he hai.is sunder prastuti ke liye bhut badhai.. -subodh srivastava
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18-1-2012
aapke patrika ke madhyam se chalaye ja rahe sahitik mahtkarya ke liye hardik shubhkamnayen.
-Gokul Kshirsagar

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06/12/2011
आदरणीय प्राण जी,
लेखनी में ’विमर्श” के अंतर्गत आपका उल्लेखनीय आलेख आज पढ़ पाया. बहुत ही परिश्रम के साथ लिखा गया यह एक महत्वपूर्ण और विचारणीय आलेख है. लेखनी में मेरी टिप्पणी जा नहीं पाती इसलिए आप चाहें तो मेरे इस पत्र को शैल जी को भेज दें. इतना अच्छा आलेख लिखने के लिए आप साधुवाद के पात्र हैं.
सादर,
चन्देल
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26-11-11
shail ji

maa par kendrit ank kafi sanwedanshil hai. bawari chidiya, sel, sahit anya kahani bhi marmik. app nirantar sundar rachnaon se saje ank se hamen chakit kar rahin hain.

anita rashmi
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4-11-11
Read your story . Nice sentimental story.
-Vijay Sharma.
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3-11-11.
शैल जी , लेखनी का यह अंक माँ के नाम देख कर बहुत अच्छा लगा . साधुवाद !आप हमेशा अछूते विषय उठाती हैं , एक बार मृत्यु पर उठाया था …. बावरी चिड़िया पढ़ ली ! आँखें नम हो आयीं ! यह सच है कि माँ और बेटी का रिश्ता सब रिश्तों से बड़ा है — माँ बेटे से भी ज्यादा क्योंकि संवेदनाएं यहाँ ज्यादा जुडती हैं. आपकी कहानी भी कहानी कम और संस्मरण अधिक लग रही है . इस तरह की टेलीपैथी अक्सर होती है , इसमें भी कोई संदेह नहीं ! इतनी भीगी हुई कहानी लिखने के लिए आपको बधाई !
-सुधा अरोरा
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subah subah dil khush kar diya apney, dhanyavad.
Sasneh, Divya Mathur
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17-11-11.
bitch”bahut hee acchee kahanee hai.Rabiya aur Neha charitron ko aapne jis drishti se ghada hai, striivimarash kee aik behtrrn kahanee siddh hotee hai.in chatiron ke madhyam se aap ne do sanskritiyon kee sajeev abhivyakti hee naheen dee apitu man ke jariye saguniya aur nirguniya lokkatha aur uske charitron ke rakhane ke sath aaj kee sthiti men use aprasangik bataya hai.Jaisa ke NeHA ne nirnaya lya hai ki vah apnee betiyon ko yah kahanee naheen sunayegee.Yahee kahanee ke sabase badee uplabdhi hai.yanfemale swatantrata kee bat kee gayee hai. kahanee ke ant men Neha ka jhuunth bhee prsangik hai jo kahanee ko aur bada banata hai unke kathan ke sath…bahut-bahut badhai.Aapne is kahanee ke katha charitron madhyam se do sanskrtiyon kee visngtiyon ko bakhuubee bunna hai.aur yah bhee prtishthit karne ka pyas kiya hai ki kaunsa muulya kab aprasangik ho jaye;sandarabh -nirguniya- saguniya katha…aik bar phir se bahai.
Meetesh Nirmohi
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Date: Thu, 13 Oct 2011 10:42:58 +0000
Short of words in praising your efforts.
Narendra.Agrawal
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09 October 2011 09:08:31
आदरयोग्य शैल जी, आपको नमन! आपका हिंदी के साथ साथ विरासत और प्रासंगिकता के बेजोड मेल से जो लाभ समाज को हो रहा है वो अदभुत है आपका जीवन मंगलमय हो
सुशील कुमार (प्राध्यापक)
केंद्रीय विद्यालय पटियाला (पंजाब) भारत
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Date: Sat, 17 Sep 2011 00:14:05 -0700
बहुत समय बाद आपको मेल भेज रहा हूँ. ” लेखनी ” के अंक मिल रहे हैं. यों तो हर अंक की सामग्री की कुछ न कुछ विशेषता होती ही है, पर इस पत्रिका में जिस चीज़ की मुझे बहुत उत्सुकता से प्रतीक्षा रहती है वह है इसका ” कविता धरोहर ” स्तम्भ . वस्तुतः यह इस पत्रिका का ऐसा स्तम्भ है जो इसे अन्य पत्रिकाओं की भीड़ में विशेष बना देता है . इस स्तम्भ की कविताएँ हमें अतीत में तो ले ही जाती हैं , पर साथ ही वर्तमान सन्दर्भ में उनकी प्रासंगिकता देखकर सुखद आश्चर्य होता है . इस अंक में आपने ‘ दिनकर ‘ की ” सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ” कविता भी दी है. समर्थ लोगों द्वारा अब तक जारी देश को लूटने के कामों के विरोध में पिछले दिनों देश में हुए स्वामी रामदेव और अन्ना हजारे के आन्दोलनों और उन पर सरकारी प्रतिक्रिया के सन्दर्भ में इस कविता का महत्व और भी बढ़ गया . इसलिए इस समय इसे पढ़कर अलग ही आनंद मिला. ” लेखनी ” के इस स्तम्भ के लिए और इसमें चयनित कविताओं के लिए मैं आपका विशेष अभिनन्दन करता हूँ.
हीर्दिक स्नेह और सम्मान सहित – रवीन्द्र अग्निहोत्री
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प्रिय शैल,नमस्कार बाद में पहले जयहिंद. लेखनी में तुम्हारा सम्पादकीय पढ़ा. सचमुच भारत देश भयंकर दुर्गति के दौर से गुज़र रहा है. राजनीति में, नौकरशाही में, सेना में यहाँ तक कि शिक्षा संस्थानों तक में देश प्रेम की भावना का गहरा अकाल है. नैतिकता का जितना घोर संकट है, उसकी उतनी ही ज्यादा छद्म नुमायश है. कई बार तुमसे हिस्सा बाँट करने का मन हुआ लेकिन लगा कि तुम ऐसे परदेस मैं बैठी हो जहाँ से हमने आज़ादी छीनी या पाई.. अब उनके सामने ही हमारी छीछालेदर खुले, इस से ज्यादा हंसी की क्या बात होगी… लेकिन इस विश्वग्राम में किसके चूल्हे का धुंआ किसको नहीं दिखता… खैर, बस आँख की शर्म है. लेकिन तुमने यह वर्क खोल ही दिया तो उसकी इबारत क्या छिपाना…
-अशोक गुप्ता
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Date: Wed, 3 Aug 2011 09:04:01 +0000
Subodh Srivastava
shail ji,lekhni ke ank niymit dekh raha hoon.nishchit he yeh ek sampoorn patrika hai.naya ank sangrahniya hai.
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Date: Wed, 13 Jul 2011 08:08:09 +0000
sampoorn paripakv aur sundar patrika. dhanyawad Shail ji
Sunil Gupta
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Date: Thu, 7 Jul 2011 19:11:28 -0700
Badhai Shail Ji. Vishay evam prastuti dono shlaghniy hain.
Mahesh Chandra Dwivedy
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Date: Wed, 6 Jul 2011 15:51:33 +0530
प्रिय शैल जी,
लेखनी नियमित पढता रहा हूँ. अद्वितीय काम कर रही हैं आप. मेरा शहर स्तम्भ पढ़कर प्रेरित हुआ कि अपने शहर पर लिखी सामग्री आपको भेजी जाये. सानंद होंगी.
-जयनंदन
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Date: Wed, 6 Jul 2011 7:31:22 +0530
……..हमारे दोस्त काफी खुश हैं. इसकी वजह शायद बनारस के साथ उनका खिचाव हो सकता है, वो यादें हो सकतीं हैं जो उन्होंने बचपन में वहां कि घाटों पर गुजारी थीं. जहाँ तक मैंने नोटिस किया, आपके लेख पढने के बाद वें काफी भावुक हो गएँ थें. वजह जो भी रहा हो, मगर उस दिन ये पता जरुर चला कि हम कंही भी रहें, अपनी जन्मभूमि में एक अलग ही तरह का खिचाव होता है और हम जाने अनजाने उससे जुड़े रहतें हैं. भावनाओं का ये ज्वार उस शहर का नाम आते ही फूट ही पढता है. इस बात से कोई इत्तेफाक नहीं होता है कि तत्कालीन समय में उसकी हालत कैसी है.

अमित गुप्ता

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Date: Wed, 6 Jul 2011 10:32:41 +0530
बधाई शैल जी , बर्मिंघम में मिले सम्मान के लिए ! बधाई लेखनी के लिए — आप बहुत अच्छे अंक निकलती हैं !
सुधा अरोड़ा

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Date: Wed, 6 Jul 2011 13:17:30 +1000
‘Lekhni’ is fast becoming my friend.
Ramesh
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Date: Wed, 6 Jul 2011 01:36:51 +0000
शैल जी,लेखनी का जुलाई2011 माह का अंक विहंगम रूप से अवलोकित किया। आपकी प्रतिभा और लगन की सराहना करनी पड़ती है। बहुत करीने से यह अंक सँजोया है, आपने। मेरी बधाई स्‍वीकार करें। खास तौर पर बनारस को जिस तरह जिया है आपने और उसकी यादों को अपने अंत:करणमे इतने दिनों से सँजो कर रखा है,यह इस बात का परिचायक है कि जिस आबोहवा में कोई सॉंस लेता है, परवरिश पाता है, उॅगलियॉं थाम कर चलना सीखता है,उसे कोई कैसे भूल सकता हे। बनारस की आबोहवा आपकी अंतश्‍चेतना में विद्यमान है। देवमणि पांडेय की पहली कविता शहर के लिए शुक्रिया व्‍यक्‍त करती हुई गॉंव की अनिंद्य भावभूमि पर खींच ले जाती है। शेष सामग्री पढ़ कर राय व्‍यक्‍त करूँगा। लेखनी से जैसे भारतीय मन और पारिस्‍थितिकी की खुशबू आती है। साधुवाद। सानुराग–डॉ.ओम निश्‍चल, वाराणसी
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Date: Mon, 6 Jun 2011 09:49:07 +1000

नमस्ते शैलजी,

लेखनी को जब पढ़्ता हूँ तो ’धर्मयुग’( सं. डॉ.धर्मवीर भारती) और ’दिनमान’ को पढ़्ने की सी राहत मिलती है। बहुत स्तरीय-उच्चकोटि की रचनाओं के बीच मेरी रचनाओं को स्थान देकर आप मुझे प्रोत्साहित करतीं रहीं है । आपकी इस भावना को मेरा सादर प्रणाम ।साभार and also pl. take care.
रमेश
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Date May 8 at 8:20pm
shail ji,lekhni ka may issue dekha.rachnayen acchi lagin,visheshkar ‘maa’ per kavitayen!
Suboh Srivastava
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Date: Sun, 8 May 2011 13:37:24 +0530

लेखनी का मई का अंक बहुत अच्छा लगा, ओसामा पर रपट बहुत सटीक लगी, बधाई, माँ पर कविताये भाव पूर्ण थी |

– विष्णु सक्सेना

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Date: Fri, 1 Apr 2011 07:01:08 -0700
Respected Shail ji
lekhni ka ank padha bahut achchha laga aapne jo banaras ki holi aur shiv parvati ke vivah aur fir vidai ke bare me likha hai padh kar achchha laga bahut sahi aur achchha likha hai .sabhi kavitayen ati sunder hain.kahaniyan to aapne chun chun kar dali hain
punha ek sunder ank nikalne ke liye badhai.
Saader
Rachana

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Date: Sun, 13 Mar 2011 19:31:37 +0530
krurta ke khilaf bagawat buri bni nahon hai.
-Purushottam Viswakarma
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Date: Wed, 23 Feb 2011 12:57:29 -0800
प्रिय बहन शैल जी, सस्नेह नमस्ते एक लम्बी प्रतीक्षा के बाद ‘ लेखनी ‘ का नया अंक पाकर विशेष प्रसन्नता हुई . जनवरी में अंक न पाकर मैंने आपको एक मेल भेजी भी थी क्योंकि मुझे लगा कि कोई न कोई विशेष बात अवश्य होगी. वह बात तो पता नहीं चली, पर अब संयुक्तांक पाकर यह तो निश्चित हो ही गया कि जो भी ‘ विशेष बात ‘ रही होगी वह अब नहीं रही. आपके उत्तम स्वास्थ्य और साहित्यिक गतिविधियों में सक्रियता की निरंतरता के लिए हार्दिक शुभकामनाओं सहित, रवीन्द्र अग्निहोत्री .
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Date: Wed, 16 Feb 2011 08:20:15 +0000
Apki vaicharik chinta jayaj hai
-Alok Satpute
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Date: Tue, 15 Feb 2011 16:21:05 +0000
प्रिय शैल जी ,
लेखनी का अंक पाकर सुख और संतोष का सांस लिया है विदेशों में लिखे जा रहे हिंदी साहित्य के लिए ” प्रवासी ” शब्द का उपयोग आजकल धड़ल्ले से हो रहा है . हिंदी गीत , हिंदी कविता हिंदी ग़ज़ल और हिंदी कहानी पर प्रवासी शब्द थोपा जा रहा है . भाषा कभी प्रवासी नहीं होती है और न ही साहित्य प्रवासी होता है . www.vaatayan .blogspot.com पर इस विषय के बारे में चर्चा पढ़िएगा . सभी हिंदी साहित्य के साथ जुड़े प्रवासी शब्द के विरोध में हैं , तेजेंद्र शर्मा को छोड़कर .आपके विचार भी हम सब जानना चाहेंगे
-प्राण शर्मा
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Date: Tue, 15 Feb 2011 06:28:35 -0800

Respected Shail di,
is bar thodi der ho gai .me to kab se intjar kar rahi thi
mujhe bhejne ka bahut bahut dhnyavad
Saader
Rachana

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Date: Tue, 15 Feb 2011 20:29:12 +0530
आदरणीया शैल जी’लेखनी’ के अंक मैं स्वयं ही हर माह क्लिक करके देखता-पढ़ता रहता हूँ। मेरे हर ब्लॉग पर इसका लिंक है। अपने साहित्यिक मित्रों से भी ‘लेखनी’ पढ़ने के लिए कहता रहता हूँ। जनवरी-फरवरी 2011 अंक विशिष्ट बन पड़ा है। सभी सामग्री पठनीय है। समकालीन कहानी के अन्तर्गत आपकी कहानी और सुहैल की कहानी ने प्रभावित किया। ‘तुषार’ की ग़ज़लें अच्छी लगीं। अन्तर्जाल पर हिन्दी की दो चार ही वेब पत्रिकाएं ऐसी हैं जो संतुष्ट करती हैं उनमें लेखनी एक अहम पत्रिका है। इसके पीछे आपकी मेहनत और लगन भी साफ़ झलकती है। मेरी शुभकामनाएं स्वीकार करें। सादरसुभाष नीरव

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Date: Fri, 10 Dec 2010 12:55:28 -0800

To day, I went into your website and found out the latest issue with all the pomp and show and new flavors. It is always a great deal of mental feast with the opening of your magazine. You are a very good writer . I enjoy reading your articles in all different versions. Keep it up. With all the good wishes for the coming new year
-Sudershen ‘ Priyadarshini’

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Date: Thu, 9 Dec 2010 08:38:18 +0530
uttam vishay chayan evam uttam prastuti hetu badhai Shail ji. Mahesh Chandra Dewedy

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Thu, 9 Dec 2010 07:10:08 +0000
सादर नमस्कार,

अपनी रचना ब्राह्मण यहाँ देखकर बहुत प्रसन्नता हुई। कृपया कर के मेरे इस ब्लाग पर बच्चों के लिए बहुत सारी सामग्री है आप चाहें तो इसे अपने इस साइट पर पब्लिस कर सकते हैं।
http://nanihal.blogspot.com
प्रभाकर पांडेय

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Wed, 8 Dec 2010 19:01:59 +0000
lekhni ka dec-2010 issue dekha,pasand aaya.
Subodh Srivastava
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Date: Wed, 8 Dec 2010 15:56:47 +0530

प्रिय शैल जी ,बधाई और धन्यवाद .साल का आखिरी महीना — मृत्यु पर बेहतरीन अंक निकाला है आपने . अभी पूरा तो नहीं पढ़ पायी पर दीप्ति गुप्ता की कवितायेँ अद्भुत हैं — बेहद संवेदनशीलता से लिखी हुई । — ” मृत्यु भय – मौत के आने से ज्यादा ज़िन्दगी के छूटने का भय है .”परिचर्चा में जो दो घटनाएँ हैं — वे क्या आपके अपने अनुभव हैं ? भयानक हैं पर अविश्वसनीय नहीं . इन पर विश्वास करना मुश्किल नहीं क्योंकि ऐसा होता है कई बार . कृपया उस पर अपना नाम अवश्य दें और एक शीर्षक भी .
-सुधा अरोड़ा

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Wed, 8 Dec 2010 12:00:54 +0530
नमस्कार शैल जी

यथार्थ निकट
स्थायी सत्य
मृत्यु।
लौकिक-अलौकिक
परम सत्य
मृत्यु।
कथित कथ्य
अंतिम सत्य
मृत्यु।
धन्यवाद
राजीव वत्स
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Date: Tue, 9 Nov 2010 03:27:32 -0800

दीपावली की शुभकामनाओं, लेखनी के नए अंक और आपकी मेल के लिए आभारी हूँ. दीपावली के अवसर पर लेखनी के इस अंक में दीपमाला के अंतर्गत दीपक के सन्दर्भ वाली पुराने – नये कवियों की रचनाएँ पढ़कर बहुत अच्छा लगा.बहुत दिनों बाद नीरज की ‘ अंधियार ढलकर ही रहेगा’ पढ़ने का एक अलग ही आनंद मिला. अपनी बात में आपने वैश्वीकरण के सन्दर्भ में अनेक महत्वपूर्ण बातें कही हैं. नियामक की भूमिका छोड़कर ” बिचौलिया ” बन जाना इस नई व्यवस्था में सरकार की सोची समझी रणनीति है . इसे भले ही ” विश्व गाँव ” का नाम दिया गया हो, पर आत्मीयता के नाम पर न यह गाँव है न मोहल्ला . ” वसुधैव कुटुम्बकम ” की वैदिक भावना हमारी संस्कृति को हमेशा अनुप्राणित करती रही है, पर यह भावना तभी सार्थक हो सकती है जब वेद के आदेश ” कृण्वन्तो विश्वमार्यम ” ( संसार को आर्य अर्थात श्रेष्ठ बनाओ ) का भी पालन किया जाए, वरना लुटेरों, चोरों, डकैतों , हत्यारों के साथ तो ऐसा ही कुटुंब बनेगा .आपने एक नया शब्द भी दिया है ” विश्वीकरण ” , व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध न होते हुए भी यदि लोगों ने इसे पसंद किया और यह यह प्रचलन में आया तो हिंदी और समृद्ध होगी. लोक में प्रयोग पहली चीज़ होती है, व्याकरण तो उसका अनुगामी है. सरोकार में सुप्रसिद्ध विद्वान डा. वेद प्रताप वैदिक ने बहुत पते की बातें कही हैं . कामन वेल्थ के सन्दर्भ में भी उनका यह कहना बहुत महत्वपूर्ण है कि अगर यह ” कामन ” है तो ब्रिटेन उसका स्थायी स्वामी क्यों है ? परिचर्चा में ओबामा की चिंता के केंद्र में भारतीय और चौपाल में मोटे अनाज से संभव है भूख और स्वास्थ्य अच्छे गंभीर लेख हैं . प्रेम जन्मेजय के ” तुम ऐसे क्यों आईं लक्ष्मी ” ने खूब गुदगुदाया. . मंथन में ” समंदर पर पुल बांधने का वक्त आया’ , कहानी समकालीन में दिए की लौ , चिड़िया और चील , कहानी धरोहर में ” अमृतसर आ गया है ” माह के कवि में प्राण शर्मा की दोनों कविताएँ अच्छी लगीं . ऐसी सामग्री जुटाने के लिए आपको बधाई।
– रवीन्द्र अग्निहोत्री
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Wed, 3 Nov 2010 16:21:57 +5.30
lekhni se mai bahut prabhavit hoon, apni rachnaaen bhejna chahata hoon, kya koi email address bhi hai jis par rachnaen bhej sakoon,dhanyvaad
Ntyanand Tushar
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1 Nov 2010 18:12:00 +0000
लेखनी को तो आपने महालेखनी बना दिया है . उसमें आपका दिन – रात का परिश्रम लगता है . आप नए – नए आयाम स्थापित करें , मेरी हार्दिक शुभ कामना है .नवम्बर अंक अनुपम है , दीवाली के प्रकाश की तरह . स्तरीय रचनाओं को पढ़ कर पूरा मास आनंद में गुजरेगा . प्राण शर्मा
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Wed, 27 Oct. 2010 4: 11: 20+5.30
VERI GOOD LEKHNI
CHEDI PRASAD , EX PCS
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Mon, 18 Oct. 2010 10:12: 39+ 5.30
आज ही लेखनी पत्रिका देखी. अपनी बात के अंतर्गत आपने बहुत ही सार्थक और ज्वलंत मुद्दा उठाया है. जब तक स्वयं नारी अपने को आज़ाद नहीं मानेगी , संस्कारों के जाल से नहीं निकलेगी, गुलामी से मुक्त नहीं हो पाएगी . अभी पूरा अंक नहीं देख पाई हूँ,पर जितना भी देखा है ,काबिले तारीफ़ पाया है.
-डॉ. पूनम गुप्ता
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Sun , 17 Oct. 2010
लेखनी के अक्तूबर अंक के लिए आभारी हूँ . नारी विमर्श पर केन्द्रित इस अंक के प्रेषण – पत्र की पंक्तियों में ही जैसे पूरे अंक का सार समा गया है और अपनी बात में सम्पादकीय सूझ बूझ सराहनीय है. महादेवी वर्मा की पंक्तियाँ , मंथन में तीन अलग – अलग लेखकों के विचार, कविता धरोहर में सुभद्रा कुमारी चौहान की दोनों कविताएँ , माह की कवयित्री में ‘ बटवारे ‘ शीर्षक कविता , तमिल कहानी ‘ अरविन्दन नाम से एक सखा ‘, सरोकार में माँ को संबोधित अजन्मी बेटी का पत्र, विचार में ‘ बेटी का आनंद ‘ , चाँद, परियाँ और तितली में ‘ मूर्ख पत्नी ‘ की कहानी — सभी सामग्री प्रभावशाली लगी. परिचर्चा में ” देवी से वस्तु होती स्त्री की खुशफहमी ” के लेखक मुझे बहुत भाग्यशाली लगे जिन्हें अधिकांश भारतीय परिवारों में लोग महर्षि मनु के उपदेश ” यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता ” का पालन करते मिले ; वरना मैं तो अब तक अपने कम अनुभव के कारण यही समझता था कि जैसे सरकारी दफतरों में ” शो पीस ” के रूप में महात्मा गाँधी का चित्र टंगा रहता है , वैसे ही हमने मनु का यह श्लोक हाथी के दिखाने वाले दांतों की तरह औरों को सुनाने के लिए याद कर रखा है. अच्छा है, इस बहाने मेरा अनुभव बढ़ गया.
एक बात की ओर मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा. ‘ लेखनी’ जैसी स्तरीय पत्रिका में वर्तनी की भूलें खटकती हैं . स्वत्व छिन (छीन ) कर ले गए, चारों और (ओर ), जड़ से विहिन (विहीन ), काराग्रह (कारागृह ), परिणिति (परिणति ), स्तोत्र (स्रोत) , पूज्यनीय (पूजनीय ) जैसे शब्दों को तो थोड़ी अधिक सावधानी से ठीक किया जा सकता था . कुछ लेखक वह / वे , यह / ये का अंतर हटाकर ” वो ” ” ये ” का प्रयोग करने लगे हैं . ऐसे प्रयोगों के सम्बन्ध में बेहतर होगा कि पत्रिका अपनी एक नीति निश्चित कर ले और इस क्षेत्र में स्वच्छंदता न पनपने दे .
डॉ. रवीन्द्र अग्निहोत्री
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Sat, 16 Oct 2010 14:39:00 +5 30
i have thru your e-magzine it looked really fantastic. i heartly appreciate your endevour.accept my best wishes and gratitudes.
Dr. Ranjan Vishada
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Fri, 8 Oct 2010
i like Lakhni very much.

Pankaj Sharma
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Wed, 6 Oct 2010
aapne tathakathit nari vimarsh ko aaina dikhaya hai
Aloke Satpute
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Tue, 5 Oct 2010
aap ki kahani aur kavitayen padh ke man bhig gaya .bahut sunder shbdon se pare .aap ko bahut bahut badhai.
aap ke bare me kuchh kahana mere bas me nahi .aap sahitya ki har vidha me parangat hain
anviksha ki kahani lene ka shukriya.
– Rachna Srivastava
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Mon, 4 Oct. 2010
Is baar kuchh rachnaaon mein shabdon kaa bikhraav hai .
Pran Sharma
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Mon, 13 Sep 2010 03:17:28 -0700

आदरणीय बहन शैल जी, सादर नमस्ते
लेखनी का सितम्बर अंक प्रेषण पत्र पर जिस सन्देश के साथ मिला, वह स्वयं ही बहुत कुछ कह रहा है. आपकी इस सूझ – बूझ के लिए आपको बधाई. इस अंक को विशेषांक बनाने के लिए आपने जो परिश्रम किया है , उसकी जितनी भी सराहना की जाए, कम है. माह के कवि में अनवर सुहैल की अध्यापक , पिता और माँ से संबंधित कविताओं ने जो समाँ बांधा तो वह उत्तरोत्तर और भी दृढ़ होता गया . धरोहर में भवानी भाई की ” गुलाब” कविता आज के ” इंडिया बनाम भारत ” का दृश्य उपस्थित कर देती है . मुद्दा में वेदमित्र जी का लेख ” हिंदी पकवान में कितनी अंग्रेजी ” , परिचर्चा में रघुवेंद्र सिंह जी का ” उच्च शिक्षा : उधार का सिन्दूर “, सरोकार में वैद्यनाथ झा जी का ” दो पाटन के बीच में “, चौपाल में रामेश्वर काम्बोज ‘ हिमांशु’ जी का “कभी बच्चों का चेहरा पढ़ें, मन पढ़ें ” और “My Column ” में आपके द्वारा की गई शिक्षा की विवेचना – जैसी सामग्री मेरी दृष्टि में स्थायी महत्त्व की है. भरपूर विचारोत्तेजक सामग्री देकर आपने तो जैसे इतिहास ही रच दिया है . इसके लिए मैं आपका हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ . बहुत – बहुत बधाई . इश्वर से प्रार्थना है कि उस की कृपा आप पर बनी रहे और आप इसी प्रकार सरस्वती की आराधना करती रहें . आशा है आप सपरिवार सानंद होंगी . दोनों नवजात शिशु और उनकी माँ – हम लोगों की बेटी – भी स्वस्थ होगी. उन्हें हम लोगों का आशीर्वाद. हार्दिक स्नेह सहित – रवीन्द्र अग्निहोत्री.

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Sat, 4 Sep 2010 12:22:19 -0800

Respected Aunty,
Thank you for publishing my story ‘The Magic Mug.’This is my first time getting my story publish and I am very exited about it.
Also I loved your picture,that you put with my story.
thank you again

Anviksha

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Fri, 3 Sep 2010 12:22:13 -0700

Respected Shail ji

maf kijiyega ki me der se likh rahi aap ka bahut bahut dhnyavad ki aap ne anviksha ki kahani chhapi Abhi us ka test tha to us ko bataya nahi hai aaj bataungi .
aap ki kavita manju ji ki aur himanshu ji ki kavitayen bahut achchhi lagin .laghukatha me jis tarah se bal man ki baten likhin gain hai dil ko chhu gain .
lekhni ke punah ek achchhe ank ke liye aap ko badhai.
aur mujhe lekhni bhejne ka shukriya
saader
rachana
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Thu, 2 Sep 2010 11:57:03 +0530

Priya Shail ji,
Ank ke lekh stareey evam samayanusar upayukt hain. Badhai.
. Mahesh Chandra Dewedy
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Thu, 2 Sep 2010 01:34:27 -0400

Shail jiaapki anoothi patrika samay ki pabandion ko sanwarti hui mili..kahani aur kavitayein bahut achi lagi. Sukesh ji ki laghukathayein padna ek siksha ki pathshala mein baithkar kuch seekhne jaisa hai..aapka sampadakeey apni baat kahne ka ek sashakt mudda hai jo pathneey evam sangrahaneey hai.
Tamam shubhkamnaon ke saathi -Devi Nagrani
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Thu, 2 Sep 2010 15:01:24 +000
लेखनी का नया अंदाज और ज्यादा पसंद आया.कविताएँ बहुत पसंद आई .सुक्ष सहनी कि लघुकथाएँ दिल छु लेती है.किसी मुद्दों को लेकर निकाला गया अंक में काफी तकलीफ उठानी पड़ती है. क्रपया अगला अंक किस बिषय पर होगा उसकी सूचना इसी अंक में मिलती तो ज्यादा अच्छा रहता . शुभकामनाओं सहित आपका,किशोर कुमार जैन गुवाहाटी असम .

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Wed, 1 Sep 2010 08:49:15 -0700

आपकी पंक्तिया अच्छी लगी – रोज सुबह …. | यह पूरी कविता पढ़ना चाहूंगी |
इला
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Wed, 1 Sep 2010 08:30:38 -0400

Priy Shail jee,
Lekhni bhejne ke liye aapkaa aabhaar. Aaraam se padhoonga .lekhni kaa har ank vishesh hota hai.padhkar bahut achchha lagtaahai. lekhni is samay sarvshreshth e.patrikaaon mein hai.
shubh kamnaaon ke saath,
pran sharma

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Tue, 31 Aug 2010 16:50:47 +0530
शैल जी ,

लेखनी के अगस्त अंक में अपनी कवितायें देखीं . बहुत अच्छा लगा. अच्छा इसलिए क्यूंकि हिंदी वेब पत्रिकाओं में लेखनी ने बहुत ही अग्रणी स्थान बना लिया है इसलिए उसमे कवितायें छपना किसे अच्छा नहीं लगेगा. शेष कवितायें भी बहुत अच्छी लगीं.

शुभकामनाओं सहित.

संजीव निगम
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Sun, 29 Aug, 2010 07:25-0000
Aap Ki Laghu Katha ” RANG ” Achi lagi
Badhai Sweekaren
Indu Kant Angiras
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Sun, 22 Aug 2010 04:36:46 -0700
प्रिय बहन शैल जी, सस्नेह नमस्ते.
.मैंने जब आपको पहली मेल भेजी थी तब ‘ लेखनी ‘ की कुछ ही रचनाएँ पढ़ी थीं . अब जब सारी रचनाएँ पढ़ीं तो आपकी योग्यता, प्रतिभा और लगन देखकर मन अभिभूत हो गया आप इतनी विधाओं में लिखती हैं और हर विधा में प्रभावी ढंग से लिखती हैं. इसके लिए मैं आपका हृदय से अभिनन्दन करता हूँ. आप इतनी बड़ी पत्रिका निकाल रही हैं, मासिक आधार पर निकाल रही हैं, अन्य लेखकों से स्तरीय रचनाएँ लिखवाती हैं, उनका सम्पादन करती हैं, स्वयं विपुल साहित्य रचती हैं , इस कार्य में इतना समय लगाती हैं तो निश्चित रूप से आपको अपने परिवार से भरपूर सहयोग मिल रहा है . अतः मैं आपके परिवार का भी अभिनन्दन करता हूँ . परमात्मा से प्रार्थना है कि उसकी कृपा बनी रहे , आप और आपके परिवार में सभी लोग स्वस्थ रहें, आपको इसी प्रकार सहयोग मिलता रहे, आपकी लेखनी अविराम चलती रहे और आप माँ सरस्वती की आराधना करती रहें.
.डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री
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Sat, 21 Aug 2010 21:01:27 +0000
AAJ PAHALI VAR LEKHNI SE RUBARU HO KAR ACHA LAGA.BAHUT HI ACHCHA AUR SAPHAL PRAYAS HAI.
DHANYAWAD.
CHINTAMANI PANDYA
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Fri, 13 Aug 2010 10:46:21 +0000
प्रिय बहन शैल जी,

लेखनी पत्रिका का परिचय अभी हुआ और अगस्त अंक पढ़ा. यह देखकर प्रसन्नता हुई कि पत्रिका देश की समस्याओं से चिंतित ही नहीं है, उनके समाधान के लिए भी यत्नशील है फिर चाहे वह दोहरी नागरिकता की बात हो या उस जाति प्रथा की जो दीमक बनकर भारतीय समाज को अन्दर से खोखला करती आ रही है. भारतीय समाज की जिस कमजोरी को समाप्त करने का प्रयास स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गाँधी जैसे अनेक महापुरुषों ने किया, उसी कमजोरी को जीवन प्रदान करने की कोशिश वर्तमान सरकार करने जा रही है. डा. वेद प्रताप वैदिक और श्री फ्रांसिस ने पाठकों को जागरूक करने का जो प्रयास किया है, और डा. वैदिक ने सरकार के षड़यंत्र को विफल करने का जो उपाय बताया है उसके लिए उनका अभिनन्दन. दोहरी नागरिकता की जिम्मेदारियों की ओर आपने भी बहुत ही सुन्दर ढंग से प्रकाश डाला है. इस अंक की अन्य सामग्री भी आकर्षित करने वाली है . ऐसी रोचक एवं उपयोगी सामग्री जुटाने और उसे पत्रिका के रूप में प्रस्तुत करने के लिए आपको बधाई .डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री

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Date: Thu, 5 Aug 2010 13:20:13 +0530
From: sumitakeshwa
शैल जी,नमस्कार. लेखनी का अंक भेजने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया. यह अंक भी बहुत ही सुन्दर एवं पठनीय रहा. १५ अगस्त और रक्षाबन्धन के शुभअवसर से संबधित लेख अच्छे लगे.आपकी कहानी एक बहन समर्पित है जो बड़ी ही भावुक लगी . सुन्दर संपादन एवं लेखन के लिए बधाई एव शुभकामनाएं. संतोष जी की किताब ‘टेम्स की सरगम’ की समीक्षा प्रकाशित करने के लिए धन्यवाद. रक्षा बन्धन एवं २५ अगस्त की बहुत-बहुत शुभ कामनाएं!!
सादर सहित
सुमीता केसवा

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Date: Wed, 4 Aug 2010 06:14:04 -0700
From: Rachna Srivastava
Respected shail ji
aap ka dhnyavad ki aap ne lekhni ka ank bheja .padh ke aanand aaya .kavitayen bahut sunder hain .sabhi kuchh pathniy hai .aap ki mehnat har kone me dikhai deti hai .ek aur achchhe ank ke liye badhai
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From: usharajesaxena@hotmail.com
Date: Tue, 3 Aug 2010 08:14:48 +0000

अंक को देखा आपने बहुत परिश्रम किया है
सामग्री एकत्रित करने में।

Usha Raje Saxena Co-Editor, PURWAI
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From: siteshaloke@hotmail.com
Date: Tue, 3 Aug 2010 07:05:08 +0000

Shail ji

Aap ko badhai. Bahut samay se aap nirantar apani patrika nikal rahi hain. Punah badhai.

Haan, ant mein With Regards, aur Angrezi mein aap ka naam padhana atapata lagata hai.

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Mon, 2 Aug 2010 00:48:51 -0400
Adarneey Shail ji
samay ke anukool aapki yeh partika sahitya, sanskruthi aur samkaleen vicharamtak drishti ke roop mein apne aap mein parichay ban gayi hai.
shubhkamnaon sahitDevi Nangrani

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Sent: 1 August 2010 08:43
बहिन शैल जी
लेखनी का अगस्त अंक भी बहुत सराहनीय है ।
रामेश्वर काम्बोज
‘हिमांशु’

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Sent: 01 August 2010 08:02:03
आदरणीय शैल जी
आपका इस बार का अंक देखा ,काफी सार गर्भित है.आपको मेरी ओर से भी इस माह पड़ने वाले त्योहारों की हार्दिक शुभकामनाये
विष्णु सक्सेना
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Sent: 01 August 2010 04:48
Adarneey Shail ji
samay ke anukool aapki yeh partika sahitya, sanskruthi aur samkaleen vicharamtak drishti ke roop mein apne aap mein parichay ban gayi hai.
shubhkamnaon sahit, Devi Nangrani
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From: Fazal Immam Mallick Sent:10 July 2010 03:31
lekhni achichi nikal rahi hai. Badhai lein. Fazal
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From: Sunil Parit
Sent: 07 July 2010 10:18:02
i like ur e-magazine. i like that all pems. but wil i contact that poets?
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From: Ravikant Pandey
Sent: 0 7 Jul 2010 05:16:33 +0530
शैल जी,
नमस्कार। “लेखनी” के रूप में आपका प्रयास प्रशंसनीय है।अब तो हर अंक की जैसे प्रतीक्षा सी रहने लगी है।
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From: Ramchandra Roy
Sent: 04 July 2010 06:46:46
Aapki Haiku bahut acchi lagi hai.Wese aapki Apani Baat mein niyamit rup se padhta hoon.Pandit Hazari Prasad Dwivedi jab tak Santiniketan mein rahe tab tak unhone Visva-Bharati Patrika Hindi ki Sampadakiya Apani Baat se likhte rahe.Aaj wahi Apani baat ka sankalan pustak ke rup mein aaye hai.Aasha hai bhavisya mein Lekhni ki Apani Baat bhi Pustak ke rup mein aayegi.
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From: Ashok Gupta
Sent: 02 July 2010 12:05:48

लेखनी का नया अंक देखा. तुम्हारी कहानी पढ़ी. मन को तो छूती ही है, साथ ही इस में सकारात्मक सन्देश भी है. बधाई.

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From: kusum sinha
Sent: 01 July 2010 18:46:17

priy shailji
namaskar
es bar lekhni me kavitayein padhkar bahut achha laga bahut hi sundar kavitayein hain
badhai
kusum
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From: Damodar Lal Jangid
Sent: 01 July 2010 16:37:21
lekhani ka saawan ank rouchak laga.
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From: kunwar bechain
Sent: 01 July 2010 08:44:01
snehmayee shail ji
namaskar

savan ki fuhar banker aapki mail mili. dhanyvad. bahut achha likha hei aapne.

aapka
kunwar bechain
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From: HIMANSHU
Sent: 01 July 2010 06:20:11
बहिन शैल जी

आपका पत्र भी किसी उच्चस्तरीय कविता से कम नहीं होता । रचानाएँ पढ़कर लिखूँगा । सादरआपका भाईरामेश्वर काम्बोज

From: LalBihariGupta
Sent: 14 June 2010 11:46:34

यह जानकर काफी खुशी हुई कि हिन्दी में यह पत्रिका इंटरनेट पर आ रही है।

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From: Bhausaheb Navale
Sent: 14 June 2010 10:35:28
mananiya sampadak, aapaka prayas sarahaniya hai.

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From: sheel nigam
Sent: 12 June 2010 03:21:24

सुमिता केशवा जी से आपका और ‘ लेखनी’ का परिचय मिला.इस माह उनकी भी कविता ‘ लेखनी’. में छपी है. आपकी यह पत्रिका एक उच्च स्तर की इ पत्रिका है.

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From: shamoil ahmad
Sent: 09 June 2010 06:05:59
shail ji
taslimat
lekhni me dressing table dekh kar khushi hui.
bahut bahut shukriya
is baar bhi sapadakiya achha hai. aap waqt ki nabz par haath rakhti hain
bhavdiya

shamoil
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From: ILA PRASAD (ila_prasad1@yahoo.com)
Sent: 06 June 2010 01:36:42.

Liked lekhini’s this issue too. The story woh chehra is very good.Ila

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From: Roop Singh Chandel Sent: 03 June 2010 06:02:42
शैल जी, आपकी कहानी ’जिज्जी’ अभी अभी खत्म की. बहुत ही मार्मिक कहानी है. मुझे १९८३ में साप्ताहिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित अपनी कहानी ’ उनकी वापसी’ याद हो आयी. एक अच्छी कहानी पढ़वाने के लिए आभार और अच्छी कहानी के लिए बधाई. चन्देल

Roop Singh Chandel
www.vaatayan.blogspot.com
wwwrachanasamay.blogspot.com

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From: Vinay Kumar Sent: 22 May 2010 13:38:55

Dear Shail,
Got Lekhni’s latest issue through email. I thought I would read it at leasure but it was so interesting that I read it in one go. Whenever I read Kanupriya, I somehow start searching you therein. Congratulations on dedicating this issue to environment. Selection of Manthan and this month’s poem is associated with environment. How nice and effective it is. Anupam Mishra’s Aaj Bhi Khare Hain Talab is one of the finest books.
Madhavi
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From: Anita Rashmi Sent: 08 May 2010 16:51:04
SHAIL JI
NAMASKAR!
LEKHNI EK AAKARSHAK-ACHHI PATRIKA HAI- HAR TARAH SE. MARCH ANK BHI KAFI ACHHA.US ANK ME MERI LAGHUKATHA AAPNE PRAKASHIT KI. SATH KA CHITRA BHI LAGHUKATHA KE ARTH KO UBHAR RAHA HAI. AAVAR!
A. RASHMI
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From: Sumita Keshwa Sent: 08 May 2010 10:27:17
इस बार भी आपकी पत्रिका हमेशा की तरह बेहद गंभीर लेखन को लेकर साकार हुई है. भीषण गर्मी और पर्यावरण के बदले मिजाज ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि अब तो हमें इस गंभीर विषय पर जागरुक होने की आवश्यकता है. आपकी बात ने इस विषय को बहुत ही गंभीरता के साथ खंगाला है. मंथन भी इसी बात को रेखांकित करता है. हमेशा की तरह सभी रचनाएं उम्दा हैं. आपकी कहानी ‘कनुप्रिया’ बहुत ही अच्छी लगी. जिस तरीके से आप कहानी बुनती हैं उनके धागों में हम उलझ जाते हैं और यह उलझना भी अच्छा लगता है. आपको लेखनी की प्रगति के लिए हार्दिक शुभकामनाएं.धन्यवाद
सादर सहित
सुमीता केशवा.
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From: vishnu saxena Sent: 04 May 2010 16:18:10
बहुत अच्छा विचार है इस बार लेखनी में

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From: Roop Singh Chandel Sent: 02 May 2010 17:13:39
कनुप्रिया का अंत बहुत सुन्दर है शैल जी. एक अच्छी औरे सधी हुई कहानी. जेठ जी के साथ कनु का व्यवहार उचित लगा. बधाई इस नई कहानी के लिए. चन्देल
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From: Nai Azadi Sent: 01 May 2010 02:15:40
“हो सकता है हम अपनी बुद्धि के बल पर हर समस्या का कोई हल निकाल ही लें, पर फिर क्या एक खास चयन प्रकरण नहीं शुरु हो जाएगा और चन्द समर्थों की ही होकर नहीं रह जाएगी यह पृथ्वी?… क्या उस ढलान पर जाने से पहले ही सम्भलना बेहतर नहीं…अपव्यय तो रोकना ही होगा। पेट्रोल के बगैर तो काम चल सकता है, पर पानी के बगैर कैसे काम चलेगा ?संभले नहीं तो शायद सचमें बूंद बूंद को तरस जाएं और अगला विश्व युद्ध पेट्रोल पर नहीं, पानी पर ही हो जाए? ये और कई कई ऐसे जलते सवाल हैं जिन पर आकर बारबार ठहरी है लेखनी।”
लेखनी के इस प्रयास को हमारी इंडिया वाटर पोर्टल की टीम की ओर से शुभकामनाएं स्वीकारें
केसर

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From: BN Goyal
Sent: 02 April 2010 08:48:49
आदरणीया शैल जी,
अंतर्जाल कि अन्य पत्रिकाये भी देखते और पढते हैं – सब का अपना एक दृष्टिकोण और पाठक वर्ग होता हैं सभी अच्छी हैं परंतु ‘लेखनी’ अपने आप में संपूर्ण और अन्य सब से अलग हैं | इस का श्रेय आप को हैं – अतः बधाई स्वीकार करे |

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From: Rachana Srivastava
Sent: 01 April 2010 13:59:51
aap ki bachchon ke liye likhi kavita kahani bahut achchhi lagi.
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From: Omprakash Kashyap Sent: 28 March 2010 07:26:26
सुश्री शैल अग्रवाल जी

सादर नमन,
लेखनी का मार्च अंक अदभुत है. डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी का
आलेख इस अंक की विशिष्टता है.कविताएं पढ़्ते हुए मन फाल्गुनी हो जाता है.
कहनियां और बाकी रचनाएं भी आपकी संपादकीय सूझबूझ का बयान हैं. इतनी अच्छी
सामग्री एक ही स्थान पर उपलब्ध कराने के लिए आभार

ओमप्रकाश कश्यप

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From: Sudarshan Suneja Sent: 11 March 2010 17:28:14
Shail ji,
I go through lekni and find it very literary and classy. Specially I liked your story dhruvtare very much and others too . it has so much depth and it tells the art of telling story you have. Over all you are doing a wonderful job. keep it up and also keep in touch. Thanks for sending me the link from time to time.
with regards
sudarshen’ Priyadarshini’
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Adarniya Shailji ,
Sent: 04 March 2010 07:28:10
March ka ank padha.Main patrika ke sabse pahale Apani Baat padhta hoon.Apani baat se sampadak ki vichardharaon se parichit hota hoon.Maine isse se pahale bhi ek patra diya tha ki lekhani ko kram se prishta sankhya dekar chhapen jisse pathak varg uski pratiya nikalkar yatra ke douran bhi padh sake.Aapka pryas bahut hi sarahniya hai.
Namaskarpoorvak
Ramchandra Roy,Santiniketan
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From: kusum sinha Sent: 05 March 2010 21:22:04
priy shail ji
namaskar
kahani aapki bahut achhi lagi abhi fir se padhi hai etni sundar patrika ke liye meri badhai
kusum
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From: Dinesh M.Srivastava Sent: 03 March 2010 22:12:11

प्रिय शैल जी, नमस्ते|
‘लेखनी’ का मार्च अंक भेजने के लिए अनेक धन्यवाद|यह अंक विभिन्न रंगों तथा रसों से सरोबार है|इंग्लैंड में हिंदी के प्रचार-प्रसार में आपका कार्य बहुत सराहनीय है|
शुभ कामनाओं सहित,
दिनेश श्रीवास्तव
संपादक, हिंदी पुष्प मेलबर्न, ऑस्ट्रेलिया
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From: mahesh dewedy
Sent: 02 March 2010 03:02:20

Badhai shail ji.
Mahesh Chandra Dewedy, Lucknow
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From: kusum sinha Sent: 01 March 2010 21:11:47

priy shailagrawalji
namaskarAapki patrika me apni ek kavita dekhkar bahut khushi hui bahut bahut dhanyawad aapko usme chhapi kahani bhi bahut achhi lagi
kusum
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From: Rachana Srivastava
Sent: 01 March 2010 15:03:37

Respected Shail ji
lekhni ne itana lamba safar tay kiya is ke liye aap ko badhai ho
mujhe khushi hai ki me bhi is uchh stariye patrika me chhapi

Saader
Rachana

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From: alok putul Sent: 01 March 2010 12:43:43
आपको भी बधाई और शुभकामनाएं. लेखनी देख-पढ़ गया हूं. बहुत उम्दा.

सादर
आलोक

www.raviwar.com
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From: shamoil ahmad
Sent: 01 March 2010 09:49:46
shail ji ! taslimat arz hai.mail ke liye shukriya !holi ki mubarakbad qabool karen. is moqe par march ka ank bahut khoob hai. sach poochiye to lekhni meri mahboob ki tarah khoobsoorat hai. aap ki rachnashilta ne ise aur bhi haseen bana diya hai’ , is ke honto par dhoop jaisi saphed muskan hai aur aankhon me dhanak ke tamam rang ghulr hain. ek bar phir badhai.
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From: SITESH ALOKE
Sent: 01 March 2010 07:18:02

Bahut badhai … aur shubhkamanayen.

— Sitesh Alok

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From: HIMANSHU
(Sent: 01 March 2010 04:19:01
सभी रचनाएँ बेजोड़ हैं । श्री नरेश मेहता (मेहता जी के नाम में श्री शामिल था) और रचना श्रीवास्तव की कविताएँ मन को मोह ले रही हैं।बासन्ती बयार की ये पंक्तियाँ
बासन्ती वो बयार
इस पार बही, उस पार बही
मन चुप था, हम चुप थे
तोड़े यह घरद्वार बही।
बासन्ती वो बयार…
अच्छा श्ब्द चित्र हैं।
-काम्बोज
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From: Ashok Gupta
Sent: 01 March 2010 03:18:21
प्रिय शैल,
होली की भोर लेखनी की झलक से शुरू हुई. यार, यह तो ऐसा लगा कि कोई दोस्त पकवान से भरपूर थाल सामने रख कर खुद ओझल हो जाय… अब बताओ क्या करूं ?

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From: vijay gaur
Sent: 01 March 2010 02:34:39
इस सार्वजनिक किंतु बेहद आत्मीय पत्र के साथ भेजी गयी सूचना के लिए आभार। अभी तो लिंक पर क्लिक करके बस पत्रिका का आवरण ही देख रहा हूं, विस्तार से पढ़ने के बाद लिखूंगा। इस सुंदर पत्रिका के लिए शुभकामनाएं।
होली मुबारक हो।

सादर

विजय गौड
C-24/9 Ordnance Factory Estate
Raipur, Dehradun- 248008

Ph. 0135 2789426
09411580467

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From: ILA PRASAD
Sent: 01 March 2010 02:12:05

आदरणीया शैल जी,
आपकी लेखनी से निकली सुन्दर पंक्तियाँ होली का आनंद दुगना कर गईं! आपको भी होली की रंग भरी शुभकामनाएँ!सादर
इला
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From: Omprakash Kashyap
Sent:25 Feb 2010 23:40:14
प्रतिष्ठार्थ, सुश्री शैलबाला अग्रवाल
संपादक‘लेखनी’
लेखनी से पहले भी परिचय था. पर उन दिनों यह केवल अंग्रेजी की पत्रिका थी. अब उसका हिंदी संस्करण देखा तो मन प्रफुल्लित हो उठा. वर्तमान भारत की सांस्कृतिक-साहित्यिक हलचल से दुनिया को परचाने का यह बेहतर माध्यम है. इस सुरुचिपूण आयोजन के लिए आप भी बधाई की पात्रा हैं
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From: vk agarwal Sent: 15 February 2010 11:33:32
Dear Shailji,

Today suddenly I found your story “Basera” . I was deeply moved by the sentiments of we NRIs who miss their home country in a peculiar way, which is not understood by any one around us excepting those who have experienced it personally. Your presentation was sorealistic that it really touched our heart.
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From: B.N. Goyal
Sent: 09 February 2010 04:42:14

Aaj achanak aapki is patrika ko kisi sandarbh se dekha achhi lagi, kya mera e-mail id aap ki mail list mein jud saktaa hai, anugrihat hunga – dhanyavaad ….
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From: aarti mishra
Sent: 06 February 2010 06:13:47
shaliji namaskar,
ak utkrast patrika ke liy badhai.samay ke sakhi ko kathachakra blog par dekhe aur lekhni ki prati bhi bheje
-dr.aarti b-308,soniya gandhi complex,near hajella hospital,bhopal 462003 m.p.
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From: Saumya Prakashan
Sent: 04 February 2010 12:14:01
Nice issue.Regards,
Bhuvendra TyagiChief Sub Editor,Navbharat Times,Mumbai09869176433
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From: ILA PRASAD
Sent: 02 February 2010 21:31:34

Thank you Shail Ji. Your story is too good. Badhai.Ila
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Sent: 14 January 2010 17:22:24

आदरणीया शैल अग्रवाल जी!
नमस्कार!
नेट-पत्रिकाओं को कई वषों से पढ़ रहा हूँ। आपकी ‘लेखनी’ से प्रथम बार साक्षात्कार हुआ। मेरे संज्ञान में तकनीकी एवं साहित्यिक दोनों ही दृष्टियों से ऐसी श्रेष्ट पत्रिका पहले नहीं आयी। इस उत्तम पत्रिका के प्रकाशन के लिए साधुवाद!
सद्भावी-
डॉ. गिरीश कुमार वर्मा
1/388-विकास नगर,
लखनऊ-226022
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Sent: 12 January 2010 14:00:45
मैने अवलोकन किया है। आपने इस अंक को सजाने व पठनीय बनाने में कोई कोर
कसर नहीं रखी। बाल विशेषांक में आपने अपनी संपादकीय कला की सिद्धहस्तता
का बखूबी परिचय दिया है। इसमें आपकी परिपक्वता का परिचय मिलता है। बधाई।
इस माह में पङने वाले त्यौहारों की शुभ कामनांए स्वीकार करें।
किशोर कुमार जैन गुवाहाटी असम.
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Sent: 11 January 2010 20:54:20
respected shail ji
aap ka dhnyavad ki aap ne lekhni ka ank bheja.
pura ank bahut sunder hai kavitayen ek se badh ke ek hai .
aap ki kahani padhi sach maniye bahut roi aur der tak roi ek bachche ki bhawnaon ko bahut khubi se likha hai .lajavab
thanks
regards
rachana

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Sent: 11 January 2010 03:57:02
aa. shail ji,
nav-varsh ka lekhni ka ank kalevar evam kathaya dono me achha laga. kripaya badhai sweekar karen.
mahesh chandra dewedy, lucknow
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Sent: 11 January 2010 05:17:35
Dear Didi Ji You can’t do any simple work. The work you will touch will become of crores. I respect your holy effort. Keep it up. I’m with you. Regards
P.K.Mishra(Varanasi)

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Sent: 10 January 2010 12:39:56
प्रिय शैल,” लेखनी” के बाल विशेषांक का स्वागत है. लेकिन अगर इस अंक में मेरा और तुम्हारा फोटो न हुआ तो बेकार है. तुम और मैं धरती पर सचमुच में बच्चे हैं और उम्र भर रहेंगे क्योंकि हमें दुनिया भर में बचपना कायम रखना है… अन्यथा बचपना एक लुप्त प्रजाति होता जा रहा है… हैं न.आओ हम तुम मिल कर जैक एंड जिल गायें, लेकिन पहले दिखाओ, तुम्हारी मुट्ठी में क्या है..? अशोक गुप्ता
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Sent: 09 January 2010 18:06:21
शैल जी
जनवरी अंक के लिए बहुत बहुत बधाई !
बाल विशेषांक का हर कोना खूबसूरत लगा Iअगले मास किस विधा पर आधारित अंक निकलेगा I यदि पहले से जानकारी मिल जाये तो उसी के अनुरूप रचना भेजी जा सकती है I धन्यवाद सहित —
सुधा भार्गव
sudhashilp .blogspot .com

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Sent: 10 December 2009 02:05:03
” अपनी बात
कला और साहित्य हमेशा से ही, हर तरह के विरोध के बावजूद भी, समाज और उसकी चेतना को ढालने में सक्षम है, इसका उद्देश्य मात्र मनोरंजन कभी नहीं रहा। इसने न सिर्फ दर्पण की तरह समाज को प्रतिबिंबित किया है, अपितु नदी की तरह नई राहें भी बनाई है, नव-जीवन संचार किया है..चाहे वे ह्यूगो और चेखव हों या फिर तुलसी और कबीर।
….एक जानने और सीखने की प्रक्रिया जीवन में लगातार चलती ही रहती है …हम सबके ही जीवन में और कला या व्यवहार; खुद हमारे अपने व्यक्तित्व और जीवन तक में अनुवादित और अभिव्यक्त भी होती रहती है…कभी प्रभावशाली और अनुसरणीय प्रसंग बनी तो..
यह रहेगा ऐसा ही जब
अपने को बूढ़ा पाउँगा |
या चुपके से एक दिन जब
दुनिया से उठ जाऊंगा |

बचपन है जनक जीवन का
यह सत्य सामने पाता हूं |
विशेषतः कवि और लेखकों की तो यही अनुभूतियाँ और मूर्त-अमूर्त छवियां ही मुख्य सहेलियां हैं.. साधारण में असाधरण ढूँढ पाना और असाधारण को बहुत ही साधारण तरीके से कह जाना…।
शायद वक्त की जरूरत ही आदमी की जरूरत होती है। माना विषय गागर में सागर के समान है पर जितना सहेज पाएं वही ठीक। हर कदम मंजिल की ओर जाती यात्रा को कम तो अवश्य ही करता है। लेखनी के सभी पाठकों और मित्रों को नववर्ष की अशेष मंगल कामनाओं के साथ, प्रस्तुत है लेखनी का सद्भावना यानी देश-विदेश की विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों से अनुदित साहित्य विशेषांक। ”
बहुत ही सुंदर रवैये से अपनी बात पाठकों के सामने रखी है . साहित्य का असली मकसद भी यही है जोड़ना..एक पुल कि तरह, जो लेखनी कर पाने में सक्षम है.
सादर
देवी नागरानी

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Sent: 07 December 2009 11:37:58
हमेशा की तरह यह अंक भी बहुत अच्छा है । देश-विदेश की अनूदित कविताएं असरदार हैं । आपने बिलकुल सही फ़रमाया- जब तक जानो नहीं सब अजनबी हैं । सारे कवि कहीं एक ही धागे से बंधे हुए हैं ।
देवमणि पाण्डेय, मुम्बई

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Sent: 04 December 2009 13:27:35

जैसा मन है आप का, वैसी सुन्दर लेखनी
दिन पर दिन होती जाती है देखा बेहतर लेखनी
दूर देश मे रह कर भी जो मिटटी से जुड़ जाती है
वही याद में बसती है, गर रहे पुरअसर लेखनी
शैल सरीखा मन आपका, सदा नेह बिखराए,
जादू ही करती रहे, सदा ये हम पर लेखनी


गिरीश पंकज
संपादक, ” सद्भावना दर्पण”
सदस्य, ” साहित्य अकादमी”, नई दिल्ली.
जी-३१, नया पंचशील नगर,
रायपुर. छत्तीसगढ़. ४९२००१
मोबाइल : ०९४२५२ १२७२०

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Sent: 03 December 2009 16:06:08
respected shail ji
bahut achchha ank hai aap ne jo bal kavitaon ka anuvad kiya hai bahut sunder hai .is ank me bahut hi sunder anuvadid kavitayen padhne ko mili aap ko bahut bahut dhnyavad .aur anuvadak ko bhi mubarakbad.
kahani aur lagu katha bahut sunder hai.
ank mujhe bhejne ka dhnyavad
saader
rachana
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From: Deepti Parmar Sent: 06 November 2009 17:49:09
Utkrust Samagri aur vishay vaividhy ke liye dhanyavad.’Lekhani’ko dher sari shubkamnae. kabhi maibhi apana aalekh bhejungi

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From: Sudha Bhargava Sent: 05 November 2009 10:29:30
आदरणीय शैल जी
नमस्कार
लेखनी का अवलोकन करके बहुत अच्छा लगा !विविध विधाओं के मध्य भ्रमण करते समय लौटने की इच्छा ही नहीं हुई !असल में इसका आकार तो गागर में सागर के समान है !भविष्य में चिर उन्नति की कामना करती हूँ !
सुधा भार्गव
बंगलोर

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respected shail ji
.aap ki dono kavitayen man ko chhune wali hain .kitne sunder tarike se bhagvan ke bare mi kaha hai sach hai pata nahi sunta hai ya nahi .
baki kavitayen bhi sunder hai.rangon me lekhni bahut sunder lagrahi hai
pura ank hi bahut sunder hain.
saader
rachana
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Respected Madam,
Thanks for the new issue. Poems are very nice.Visuals are always a treat to behold.
Warm wishes,
mouli
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From: Devi nangrani (dnangrani@gmail.com)
Sent: 01 November 2009 04:38:09
Adarneey Shaijiaapki lekhni ki oorja barkaraar rahe,
जाकर प्यासा लौ’ट आना नामुमकिन है
सत्यं शिवं और सुन्दरम् की तरफ ले जाने वाली कला और कलाकार क्या दोनों ही आज भटक चुके हैं, या यह भी हमारी हताश आंखों की धुंध मात्र है…कला का एक प्रचलन मात्र है? माना कि धुंध का संबंध अवचेतन मन की यादें और ग्रन्थियों के साथ-साथ चेतन मन के भ्रम और भ्रान्ति…छलावा आदि से भी है…अवसाद से है, परन्तु गहरी-से गहरी धुंध में भी तो पता रहता है..(.आस रहती ही है) कि पीछे सूरज भी है, जो मौका मिलते ही निकल आएगा और सब पुनः साफ नजर आने लगेगा। धुँध हो या चटक धूपः सोच न सिर्फ व्यक्ति की निर्मात्री और अधिधात्री है; चरित्र , आचरण खुद राग-रंग, सफलता-असफलता आदि की सहज सहचरी भी।
प्रस्तुत है लेखनी का यह अंक इसी धुंध यानी कि अंतर्मन(चेतन, अवचेतन) की जटिलताओं पर…इनके अनचीन्हे, अधूरे और जटिल स्वप्नों पर, उनसे निकल पाने की व्यग्र और बेचैन ललक व तड़पड़ाहट पर …

– शैल अग्रवाल

बहुत खूब अभिव्यक्त किया है अपने आप को
एक हाथ से बजी हो ताली ज्यों गूँज ऐसी सुनी है शब्दों में.
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From: Ashok Gupta
Sent: 01 November 2009 04:38:00
प्रिय शैल,
सुबह उठते ही कम्प्यूटर पर इस विश्वास के साथ आ बैठा कि नयी नवेली लेखनी जरूर मिलेगी और मिली भी. किसी भी पत्रिका में सम्पादकीय पहले पढता हूँ. लेखनी का सम्पादकीय पढ़ कर बहुतों की धुंध छंट जायेगी, जैसे मैं उजास से भर गया. सामजिक सन्दर्भों का दर्शन और दर्शनशास्त्र की सामाजिकता इस विद्वतापूर्ण आलेख में रेशा रेशा साफ़ है…
एक जरूरी बात तो छूट ही गयी.. लेखनी का सबसे सशक्त और मोहक पक्ष उस में प्रयुक्त तस्वीरें है. कई बार तो पढ़ते पढ़ते मन फिर उन्हीं की ओर दौड़ जाता है. बधाई.

१६ अक्टूबर को गुणाकर मुले और २५ अक्टूबर को कमला सांकृत्यायन इस संसार से विदा हो गये. अगले अंक में इन पर कुछ दें.

अशोक गुप्ता
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From: Anand Saran
Sent: 29 October 2009 07:37:34
adarniya sampadak ji
Sadar Pranam,

Lekhni Patrika ka sadasya banna chahata hun. Patrika ka star kafee uncha rakha gaya hai iskeliye meri hardik badhai.

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From: Sandeep Kumar Srivastava
Sent: 12 October 2009 02:43:54
आदरणीय शैल जी ,
सादर प्रणाम ,
सर्वप्रथम आपको लेखनी के सफल प्रकाशन के लिए कोटि-कोटि बधाई. आपने जो प्रयास किया है वह काबिले तारीफ़ है. मै इलाहाबाद से हूँ. मै पत्रकारिता का शोध छात्र हूँ. इसके अलावा मै पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग नेहरु ग्राम भारती विश्वविद्यालय, इलाहाबाद में अतिथि प्रवक्ता हूँ. मैंने पत्रकारिता विषय पर एक पुस्तक भी लिखी है. इसके अलावा मै आकाशवाणी इलाहाबाद में वार्ताकार एवं दूरदर्शन इलाहाबाद के लिए एक वृत्त-चित्र का निर्माण भी कर चूका हूँ. मैंने कई राष्ट्रीय हिंदी एवं अंगरेजी दैनिक के लिए भी काम कर चूका हूँ. लेकिन मैंने कभी ऐसे प्रयास की कल्पना भी नही की थी. जो प्रयास आपने अपनी भाषा के लिए किया है. आपको बहुत- बहुत साधुवाद.
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From: Rachana Srivastava
Sent: 01 October 2009 13:14:45
aap ki diwali pr tino kavitayen aur bapu pr aap ki kavita bhaut achchhi lagi.
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From: nikhil kaushik
Sent: 09 April 2009 20:16:17

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From: pransharma@talktalk.net
Shail jee,
Aapkee laghukatha ” laanat” aur Devi Nangrani kee laghukatha” Mamta ka karz” aaj ke navyuvak samaaj ka sajeev
lekha-jokha hai.Dono laghukathayen kathya ,bhasha-shailee aur shilp ke drishti se sashakt hain.Aap dono ko badhaaee.
Pran Sharma

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Sent: 28 July 2008 07:14:00
Respected Shail Agrawal ji,
I just read your story “Visarjan” on the back drop of Varanasi. I have read many stories in my life time – Long, short. English, Hindi, translated works etc. etc.- but your story has penetrated deep into my soul. There was an instant communication between mind and heart and I realized my eyes full of tears and I fell into prolonged crying. What a subject and what an expression!! I am deeply impressed!! For a moment I thought as if I was the central charecter of your story. Even if I am not, I would like to be like him. But, towards the end of my life when I am able to meet and hug “The Mother” then I am not going to let go of her, come what may, I will simply hold on to her and move wherever she takes me. Life or death I simply would not care as long as I am with her. While I am still crying I feel myself at the loss of words to ventilate my feelings about the whole situation expressed in the story. Even if I try to use all the english vocabulary at my disposal, I shall not be able to explain how deeply “Visarjan” has touched me. I tried to look inside of you and relate to the person who lives there and I found he is quite like me. I am extremely extremely impressed with your thoughts, your noble and pious nature. Please believe, it is for the first time that I am writing to a writer because something inside me said that it is necessary.
I am a Railway engineer presently working in Malaysia as a consultant. I also feel like writing something some times on same subjects that attarct you, but not yet began. I shall be highly obliged if you could recommend somemore reading on the similar subject like “Visarjan”. I remember, after my marriage in Allahabad, my father-in-law (Dr. Subodh adaval-Ex. HOD education depptt.) had taken me and archana to Mahadevi ji’s residance and the way she treated me and things she said to me is again something which can not be put in words (she happened to be related to Dr. Subodh being sister-in law of Dr. Babu Ram saxena, once Vice Chanceller of Allahabad University). After this insidence, I seem to be having similar feelings for you even without meeting you. I feel I have developed a deep respect for the person who live inside of you.
May god bless you with peace and harmony in life which I believe is otherwise also prevalent in your life.
With deepest reverence,
Your brother,
Rajendra Kumar Khare
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From: roop kamal choudhary
Sent: 15 September 2009 15:01:19
august,2009 ka ank dekha,sadhuvad.asha hai Patrika aur adhik sajegi tatha apane utkarsh par pahuchegi.santiniketanvisva bharati visva vidyalay me sikshak hun,tatha tis lekh bhi chape hai.apake lekhakon ke prati avarihun.
sadar namaskar.
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From: sanjiv nigam
Sent: 10 September 2009 11:04:22
शैलजी,

लेखनी के सितेम्बर अंक में आपका यात्रा वृतांत पढ़ा. इसी एक वृतांत से आपकी लेखनी की धार का एहसास मिल जाता है. एक बहुत ही सहज प्रवाह है पूरे लेख में. इतना बड़ा लेख है पर मैंने जब पढना शुरू किया तो स्वयम को एकसाथ पूरा पढने से नहीं रोक पाया और लेख ख़त्म करते ही आपको मेल लिखने के लिए बैठ गया. हार्दिक बधाई. मुझे आपके लेख में विभिन्न स्थलों के वर्णन ने तो प्रभावित किया पर उससे ज्यादा प्रभावित किया हमारे धार्मिक स्थलों पर चलते पैसे और गंदगी के व्यवहारों पर आपकी नज़र ने. मैं स्वयम भी इसके खिलाफ कोई सार्थक पहल करने का मार्ग सोचता रहता हूँ पर अभी तक कुछ समझ नहीं आया है. शायद कभी कुछ समर्पित लोगो का साथ मिला तो संभव हो पायेगा.

संजीव निगम

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From: hari joshi Sent: 04 September 2009 12:12:46
Lekhni is an excellent literary magazine indeed.Selection of your articles and poems deserve admiration.

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From: pran sharma
Sent: 03 September 2009 17:42:21
Shail jee,
Aapkee laghukatha ” laanat” aur Devi Nangrani kee laghukatha” Mamta ka karz” aaj ke navyuvak samaaj ka sajeevlekha-jokha hai.Dono laghukathayen kathya ,bhasha-shailee aur shilp ke drishti se sashakt hain.Aap dono ko badhaaee. Pran Sharma
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From: Ashok Gupta
Sent: 03 September 2009 02:10:36
हिमालय मुझे कितना अभिभूत करता है, यह मैं ही जानता हूँ. तुमने इतना खजाना भेज दिया है, मैं कैसे आभार प्रकट करूँ ? एक एक शब्द पढ़ कर फिर कुछ कहूँगा . अभी तो मन में यही सोच रहा हूँ कि हिमालय पर लेखनी का यह अंक केन्द्रित करते समय, तुमने मेरा इच्छा पत्र पढ़ लिया था क्या..?
अशोक गुप्ता
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From: Girish Pankaj
Sent: 22 August 2009 06:09:25
शैलजी, नमस्ते. लन्दन में आपसे जो मुलाकात हुई थी, वह अब तक याद है. कुछ ही दिन हुए है, घर पर नेट लगा है. सर्च करते- करते अचानक आपकी सुन्दर लेखनी के दीदार हो गए. अच्छा लगा. कोशिश करूँगा कि इसे देखता रहू. अभी तो लिखने का अभ्यास जारी है. स्पीड आये तो बड़ी रचनाये भेजूंगा. फिलहाल कुछ ग़ज़ले ही दे सकूँगा. मेरे एक-दो समाचार है, भेजूंगा. मेरी पत्रिका सद्भावना दर्पण के लिए भी कुछ भेजिए. ये अनुवाद पत्रिका है. वहा के साहित्य का हिंदी अवुवाद मिल सके तो कृपा होगी. आप अपनी रचनाये भी भेज सकती है. सद्भावना दर्पण को भी नेट पर देना है. स्नेह बनाये रखे. आपका- गिरीश पंकज
गिरीश पंकज
संपादक, ” सद्भावना दर्पण”

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From:Usha Raje SAXENA
Sent: 04 August 2009 21:12:54
प्रिय शैल, आपकी पत्रिका लेखनी दिनों-दिन परिपक्कव होती जा रही है। सामग्री और चयन दोनों ही उत्कृष्ट है। साधुवाद! शुभकामनाओं के साथ उषा राजे सक्सेना
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From: Rachana Srivastava
Sent: 02 August 2009 17:59:33
respected shail ji
lekhni bhejne ka bahut bahut dhnyavad
abhi kavitayen padhi hai jo bahut hi achchhi lagin .

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From: LL Sent: 01 July 2009 18:25:45
Shail ji , Sunder hai ees baar ka Ank bhee —
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From: Naveen Tewari Sent: 01 July 2009 16:39:01
Lovely!

Thanks for sharing this beautiful magazine.
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from: Devmani Pandey Sent: 01 July 2009 15:29:08
लेखनी का जुलाई अंक भी हमेशा की तरह अच्छा लगा । धरोहर में फ़ैज और मज़ाज की रचनाएं पढ़कर दिल को बहुत सुकून मिला ।

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From: Rameshwar Kamboj Sent: 01 July 2009 10:27:54
लेखनी की सामग्री गम्भीर एवं उपयोगी है ।
‘हिमांशु’

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From: ILA PRASAD Sent: 28 April 2009 17:20:51
bahut sundar ank hai yah bhi. tamaam samagri acchi lagi. aur Anamika ki kavitaein padna to apne aap main ek anubhav hai.
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From: Devi nangraniSent: 12 April 2009 13:45:23

aapki site par jaakar laut aana muskil sa hai itne sare sandarbh har rang shamil hai jinmein. bahut acha laga. aapko shubhkamnayein ho jo is sahity ko pul banakar pravasi sahitya ko jod rahe hain, ILa ji ko pada.
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From: Chandra Mouli Sent: 02 April 2009 17:49:38

Dear Shail ji,
NAMASTE.
A very impressive issue , pl.
Enjoyed poems and other interesting features.Great going.
Haardik badhayee.
chandra mouli,
Hyderabad.

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From: Rachana Srivastava Sent: 01 April 2009 13:37:42
respected shail ji
lekhni ate hi pata chal jata hai ki pahli tarikh aagai sach aaj yad nahi tha ki pahli tarikh hai lekhni ka ank dekh ke yad aaya .haan aap ki kavita padhi kitna sunder likha hai ki man ki handi aur kalikh puti saf karne pe bhi saf na hui .sochne vali baat hai .

sabhi kuchh padha sab bahut achchha hai ila ji ki kavita bhi bahut achchhi hai.
saader
rachana

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From: Ashok Gupta
Sent: 01 April 2009 11:21:01

Aapki Lekhni dekhi aur Sampadakeeya padh kar sachmuch hil gaya. Bahut bebaak aur sach baat aapne kahi hai.

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From: David Francis
Sent: 27 March 2009 22:16:18
Dear Sirs,

I am a singer-song-
writer and poet based
in New York. A CD
“Anthem for Green
England” was released
on 27 February to
protest 910 acres of
greenfields in West
Sussex being destroyed
to build an “ecotown.”
Please see more at
http://www.monochrome
museum.co.uk

Thank you and best
regards,
David Francis
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From: ashok gautam
Sent: 13 March 2009 14:23:41
आदरणीय शैल जी,
नमस्कार!
आशा है स्वस्थ सानंद होएंगे. नेट पर लेखनी देखी. मन खुश हो गया. बधाई .
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From: Rachana Srivastava
Sent: 03 March 2009 21:15:36
respected shail ji
wah maja aagaya padh ke bahut hi achchha hai.stik vyang aap ne jo harkui likhi hai bahut sunder hai
aap ki mehnat ko naman
saader
rachana

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From: kishore kala
Sent: 10 February 2009 15:47:03
visited lekhani .it is very nice. ab to bina apke yaad dileye bhi man me rahata hai ki is par apani najare dodaun. bastaw me apka parisram sarthak hai. patrika ke pathakon ke liye kahin bhi nirash hone ki gunjais nahin hai.aisi achi aur saf suthari patrika ki tarif me shabdon ki kami ka ahsas ho raha hai.

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From: Kishore Kumar Jain
Sent: 08 February 2009 16:26:21
shailji,
aap agar mujhe na bhi batae fir bhi mujhe har mahine lekhani ka bekarari se intajaar rahata hai.bastaw men ek manograhi,behatarin patrika ka aap sampadan kar rahi ha. maine apaki rachanaen bhi padhi hai. we bhi dil ko chu leti hai. mera ek blog hai “kishorekatha.blogspot.com” ICHA HAI LEKHAN KE MARFAT PATRIKA SE JUDUN. ek bae punah dhanyawad.

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From: Devmani Pandey
Sent: 04 February 2009 05:42:32
लेखनी ने जिस तरह सहित्य की विरासत को संजोया है, वह बेहद काबिले तारीफ़ है।
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From: Shuchita Mital
Sent: 03 February 2009 07:51:42
Brilliant piece. The beautiful imagery makes it poetry in prose. There is one mistake, though. Sheereen-Mahiwal should either have been Sheereen-Farhad or Sohni-Mahiwal.
Thanks,
Shuchita

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From: V Sharma
Sent: 03 February 2009 04:09:04
शैल जी ,

वसंत के इतने भावपूर्ण और उल्लसित स्वागत से मन मयूर नाच उठा और तो और गुलज़ार साहब की ये बात मन में गहरे तक उतर गई — ‘ वक्त की शाख से लमहे नहीं तोड़ा करते। ‘
ओस की बूंदों से…पंखुरियों से नाजुक ये पल… इन्हें तो बस स्मृति में ही संजोया जा सकता है। पल जो तस्बीर से फ्रेम में सजकर मन की दीवार पर लटक जाते हैं… जीवन की गड़ती चुभती कीलों के साथ आखिरी सांस तक साथ चलते हैं । हम सब तक इसे प्रेषित करने के लिए विजय जी को हार्दिक धन्यवाद !

वशिनी शर्मा

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From: Rachana Srivastava
Sent: 01 February 2009 17:19:58
respected shail ji
lekhni ka ank padh ke bahut achchha laga
aap ki kahani aur kavita dono bahut hi sunder hai kya bhav hai dil ko chhu gaye
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From: Anil Gupta
Sent: 01 February 2009 16:04:23
आपकी वेव साइट का मैं नियमित पाठक बन गया हूं । यह मुझे बहुत ही रोचक एवं ज्ञानप्रद लगी। भारत से दूर रहते हुए आपने जिस तरह अपने लिये भारत की माटी ,भारत की सुगन्ध ,भारत की संस्कृति एवं साहित्य से जोड के रखा है वह अपने आपमें सराहनीय है । आपकी साधना, आपकी लेखनी एवं आपकी जिजीविषा को मैं प्रणाम करता हूं ।
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rom: Anil Janvijay
Sent: Fri, 23 Jan 2009 05:49:16 -0800
आदरणीय शैल जी! आप ‘लेखनी’ बहुत अच्छी निकालती हैं। हर अंक आरम्भ से अन्त तक पूरा पढ़ जाता हूँ।

शुभकामनाओं के साथ। सादर अनिल जनविजय सदस्य गद्य-कोश टीम
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From: Renuka Bhalla
Sent: 20 January 2009 07:49:33
I would like to subscribe to your e-magzine. Kindly let me know the procedure.
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From: Shrutika Vyas
Sent: 27 December 2008 11:33:23
Lekhni is a beautiful attempt to bring all hindi lovers on one platform, who can share their views, ideas, creastions and experiences with others on this portal. I congratulate all those who are engaged in making ‘Lekhni’ a reality.
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From: OM NISHCHAL
Sent: 20 December 2008 10:39:07
Shail ji,
Lekhni ke ankon se aaj phir gujra. Achha laga. Banaras aakar aapne jo batcheet ki, usse man bhavvibhor ho utha.
mera pranaam swikaaren.
aasha hai samvad banaye rakhengi–
aadar sahi,
aapka
OM NISHCHAL

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From: सुशील कुमार
Sent: 08 December 2008 20:03:35
“लेखनी” तो हिंदी साहित्य की मानक और अप्रतिम पत्रिकाओं में से एक है। इसने न सिर्फ़ हिंदी का देश-वेदेश में मान बढ़ाया है, बल्कि अपनी विरासत को भी सहेज कर रखा है। बस आप यूँ समझिये कि हिंदी की दो-चार गिनी-चुनी पत्रिकाओं में “लेखनी” का भी स्थान है। यह मैं आपको खुश करने के लिये नहीं कह रहा । यहाँ भ्रमण कर कोई स्वयं ही महसूस कर सकता है कि इसकी सामग्री कितनी स्तरीय और गुणवत्तायुक्त है ! सबसे बड़ी बात यह कि यु. के में बैठकर आप ऐसी पत्रिका निकाल रही हैं, यह आपके दिलोदिमाग में गहरे घँसे भारतीय अस्मिता की धरोहर का और आपके अथक श्रम का ही प्रतिफल है जिसे मैं हिंदी जगत की थाती मानता हूँ, वर्ना आज घटिया ब्लॉग और वेब -पत्रिकाओं की भी कमी नहीं है जहाँ आदमी एकदम से भटक जाता है।
सादर।- सुशील कुमार।

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Sent: 01 December 2008 02:36:53
From: manu”be-takkhllus”

मुझे अपनी रचना भेजने के लिए आप का ई मेल पता ढूँढने में परेशानी हो रही है……पत्रिका देख कर इस में छपने को लालायित हो उठा हूँ ..
यदि आप इस योग्य समझें तो ………कृपया मुझे ई मेल करने का पता बताएं
मनु “बे-तक्ख्ल्लुस”

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Date: Wed, 26 Nov 2008 11:52:32 -0800
From: Sudha Om Dhingra

शैल जी,
सृजन गाथा पर आप की कहानी भीगता पानी पढ़ी.
कथा-विन्यास, विषय वस्तु सराहनीय—
आपकी इस कहानी ने मुझे बहुत कुछ याद दिला दिया,
अपने अतीत के पन्ने तो मैं शायद न खोल पाऊँ पर इतना
ज़रूर कहूँगी कि आप की कहानी पढ़ कर मैं रोई बहुत हूँ,
कहानी पढ़ते हुए, रोते हुए अंदर कहीं रहत मिली है. इतनी
अच्छी कहानी देने के लिए मैं आभारी हूँ. लेखनी तो मैं हर
माह पढ़ती हूँ बस अलस्यता समझें कि टिप्पणी नहीं लिख पाई.
अच्छा काम कर रहीं हैं-लिखते रहिये
मंगलकामनाओं के साथ,
सुधा
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Date: Fri, 14 Nov 2008 12:44:40 -0800
from: Rachna Srivastava
aap ki kahani ghar ka thooth padhi bahut sunder kahani likhi hai
saader
rachana

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From: kishore kala
Sent: 06 November 2008 03:43:12
maine nov ank dekha apka prayas sarahniya hai. maine apne friens ko bahi kaha hai.
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From: malti-shail
Sent: 05 November 2008 11:09:27
Lekhni is wonderful. Whenever I go on line I read one or two poems. I forwarded the website to a couple of our friends who I thought would be interested.
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From: Harish Joshi
Sent Wednesday, November 05, 2008 12:24 PM:
Plz. accept our hearty and very BIG THANKS for forwarding us such a nice web site….. about LEKHNI,indeed a very good e.zine in Hindi/ English.

You are the person,who knows us nicely so for as our interest in literature is concerned and that too in HINDI perticularly. We both have enjoyed few items and came to common conclusion that ” LEKHNI ” is just superb
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From: Ramchandra Roy
Sent: 02 November 2008 14:50:37
YAH AANK SACHMUCH MEIN HI BAHUT HI ACCHA ANK HUA HAI.AAJ DIN BHAR SABHI RACHANEN PADHI HAIN.
MERA EK SUJHAW HAI AAGAR ISE KARNA SAMBHAVA HO TO KARNE KA PRAYAS KAREN.LEKHNI KE PRATYEK ANK KO KRAMBADDHA DHANG SE KITAB KI TARAH PRISTHA SANKHYA DEKAR NIKALE KA SOCHEN TO AACHA HOGA.KYONKI ISE PRINT KARKE RAKHA JA SAKTA HAI.PRINT RAHANE PAR YATRA KE DOURAN BHI PADHA JA SAKTA HAI EVAM BHAVISYA MEIN SANDARBHA KE ROOP MEIN KAM KAR SAKE.

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From: Devmani Pandey
Sent: 02 November 2008 07:23:31
आपकी पत्रिका देखी। विविधतापूर्ण रचनाओं से समृध्द ‘लेखनी’ अच्छी लगी।
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From: Rachana Srivastava
Sent: 02 November 2008 04:42:36
hamesha ki hi tarah sahitya se saja hai lekhni ka ye ank bhi bahut khoob .

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From: Chandra Mouli
Sent: 01 November 2008 16:01:26
Your poems are exquisitely sculpted pieces of poetry. Congrats.

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From: kishore Jain
Sent: 07 October 2008 14:16:47
pahali bar lekhani ko clik kiya to dekhkar dang rah gaya ki itani behatarin patrika bhi ho sakati hai.bahut bahut badhai.bibhinnatao se bhari hai patrika.bijoya dasami ke sath sath deepawali ki agrim badhai swikar kare. assamia se hindi me anudi rachanae bhejana chahunga agar provision ho to.

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From: Chandra Mouli
Sent: 01 October 2008 14:34:50

Many thanks for publishing my poems.Pictures chosen are excellent. They have lent elegance and beauty to the poems.I am, in deed, honoured.
The issue is splendid like all earlier issue.Article on Sri Ramji’s relevance is highly commendable. A well documented argument has been put forth. Congrats.
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Rachana Srivastava
Sent: 01 October 2008 14:02:01
bahut achchha ank hai .ram ki shakti puja padh ke purane din yad aagaye

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Sharma Anil
Sent: 01 October 2008 11:57:14
kavita ki prastuti sunder lagi. dhanyavad

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S R Harnot
Sent: 01 October 2008 07:08:01
Lekhani ka issue bahut achha hai…….Hum intzaar karte rahte hain.
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Dr. Durgaprasad Agrawal
Sent: 01 October 2008 04:29:54
लेखनी का नया अंक देखा, रचनाओं का चयन उत्तम है और प्रस्तुतिकरण बहुत सुरुचिपूर्ण है. बधाई लीजिए.

A nice effort. Keep it up.With compliments,

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From: Subhash Neerav
Sent: 04 August 2008 16:24:02
आदरणीया शैल जी
आप लिंक भेजें या ना भेजें मैं स्वयं ही “लेखनी” को हर माह देखता – पढ़ता हूँ। आप जो यह काम कर रही हैं, इसकी जितनी भी सराहना की जाए, कम है।
सुभाष नीरव
09810534373
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From: rdkamboj
Sent: 02 August 2008 15:29:49
आदरणीया शैल जी
नमस्कार !
लेखनी के अंक देखे ।विषयवस्तु एवं सज्जा दोनो ही दृष्टि से आपका यह कार्य सराहनीय है ।
-रामेश्वर काम्बोह ‘हिमांशु’

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From: R K Bharati
Sent: 18 July 2008 15:36:33
dear SHAIL JI — PRYAS JARI RAKHEN —R K BHARATI–

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From: Ramchandra Roy
Sent: 07 July 2008 11:14:00
ADARNIYA

AAPKI KAVITA NEW YORK MEIN VIHSWA HINDI SAMMELAN KE DOURAN SUNKAR MUGDH HUA THA EVAM AAPKO DHANYAVAD BHI GYAPIT KIYA THA.
LEKHANI KE JULY ANK MEIN MAINE AAPKE TIN STAMBHA PADHA HAI- APANI BAAT,PARIS CHAND SABDA CHITRA EVAM UPANYAS KE ANSHA ASHESH.MEINE IN TINON STAMBHA KO VISHESHKAR AAPKO SAMJHANE KE LIYE PADHA HAI.AAPKI LEKHANI MEIN EK GAMBHIRATA HAI.EK SOCH HAI.BHASHA MAIN LOCH HAI.VACHAN MAIN SAHAJATA HAI.YAH SAB AANE KE PICCHE AAPKE PAS ANGREJI EVAM SANSKRIT HAI.
NAMASKAR POORVAK
SADAR
RAMCHANDRA ROY
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From: S R Harnot
Sent: 01 July 2008 05:24:31
Priya Shail ji

Lekhni ka issue bahut achha hai…videsh mein rahte huye apni bhasha aur sanskaaron ko yaad rakhna aur uske liye kaam karte rahana bari baat hai….aap ko bahut badhai

aapka

S.R.Harnot

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From: Ravishankar Shrivastava
Sent: 01 July 2008 01:53:57
Shail Ji,

My wishes for Lekhni. It is going great day by day.

Regards,
Ravi
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From: sita ram gupta
Sent: 01 June 2008 07:31:10
LEKHNI ka taza ank dekha, bahut khoob!
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From: Tejinder Sharma
Sent: 01 June 2008 05:21:38
शैल दी
लेखनी की निरंतरता और इसके स्वरूप में निखार इस बात का सुबूत है कि आप एक दृड़-निश्चय व्यक्ति हैं। आपके उपन्यास के लिये बधाई। आपकी लगन और मेहनत को सलाम।
तेजेन्द्र
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पंकज मिश्र ‘अटल’ sent: 18 May 2008
सादर श्रीमती अग्रवाल जी,
आप हिन्दुस्तान से दूर रहकर जिस त्वरा और लगन के साथ हिन्दी साहित्य और भाषा के उत्थान में रत हैं गौरव का सूचक है। ‘लेखनी’ धरोहर है हम सबकी, हिन्दी की और हिन्दुस्तान की। आपके इस सतत जारी साहित्यिक यज्ञ में मेरा रचनात्मक सहयोग निरंतर जारी रहेगा।
शुभेच्छु,
पंकज मिश्र ‘अटल’
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From: shailendra chauhan
Sent: 02 May 2008 07:19:10
Shail ji.
Namaskar!

Aapake kaam me nishchit roop se ek aesthetic aur srijanatmk drishti ka samanvay hai. Yah baat Lekhni ko auron se alag karati hai. Apaka presentation aur samagri exclusive hain, is hetu badhaaee.
Apaka
Shailendra

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From: Aruna kilaru
Sent: 01 May 2008 23:50:23

Dear Shail,
I am glad that ‘Lekhni’ encourages and provides a platform for children to express themselves. Rachana was very happy to see her work in print.
Thanks again,
Aruna

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From: Chandra Mouli
Sent: 01 May 2008 16:41:23

Dear Shaili ji,
Hope, you do not mind if I refer our journal to my friends.
wishing all the concerned best of luck.
warm regards,
chandra mouli.
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From: Usha Raje Saxena Sent: 01 May 2008 01:37:16
Lekhani her mah parati hoon . Din prati din nikhar rahi hai. Aap jaisi karmatt aur pratibhshali kum log hi hote hai jo is tarah ke chunautiwale karya is kushalata se kur lete hain. naman
shubhkamnaon sahit
Usha Raje SAxena

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From: Dr.Kavita Vachaknavee
Sent: 01 May 2008 09:22:46

ank bahut hi suruchipoorna hai. man bha gaya. aap ko atishay dhnyavad.

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From: rakesh dubey Sent: 07 April 2008 11:16:50
Lekhni is progressing well.
Regards,

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From: Rachana Srivastava (Sent: 06 April 2008 14:21:02)

नवीन लेखनी
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नए स्वरूप मे लेखनी लगी बहुत प्यारी
जैसेनए परिधान मे हो दुल्हन कोई न्यारी
शैल जी के प्रयास से शैल सी बनी विशाल
साहित्य के छेतर मे बनी बेमिसाल
लेखकों और पाठकों का दिल लुभालिया
बड़े बच्चों सब को आपना बना लिया
इंग्लिश या हिन्दी हर भाषा की ये है धनि
ढूँढने से भी मिलती है न इसमे कोई कमी
लिखनी के लेखकों के उत्तम बहुत हैं विचार
हम व्यक्त करते सादर उनका आभार
शैल जी का सभी के प्रति है बहुत प्यार
मै करती हूँ उनको शत् शत् नमस्कार
लेखनी लेखकों की कर्मभूमि बनती रहे
वर्षों वर्ष लेखनी यू ही महकती रहे चहकती रहे

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Date, 3 Mar 2008 09:07:18 +0530

सुश्री शैला जी,

लेखनी देखा – पढ़ा. प्रशंसा के लिए शब्द नहीं हैं. क्या मैं अपने नए उपन्यास का अंश भेज सकता हूं.

रूपसिंह चन्देल
www.vaatayan.blogspot.com
wwwrachanasamay.blogspot.com

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Sent: 02 February 2008 04:01:57
Shail ji
Namaskr
Aaj LEKHNI ka ank dekha….. Bahut achha Aur sukhad anubhav hua. Hardik badhayi.Dwarika prasad Maheswari ji ki bahut sunder kavitayen Aapne di hain. In kavitayon ko maine kayi baar Maheswari ji ke Mukh se suna hai…..Punah Badhayi
Dr.jagdish vyom

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Sent: 01 February 2008 07:44:44 Priya Shail ji

Lekhni ka taazza issue bahut achha hai…aap bahut mehnat kar rahi hain. congratulations.

aapka

Harnot

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Sent: 25 January 2008 09:49:01
Respected Sir,

Congratulations!

So beautiful Lakhni.

Sanjeev Kumar

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Sent:17 January 2008 15:46:44
प्रिय मित्र,
इंटरनेट पर आपकी पत्रिका लेखनी दिखी .बहुत ही अच्छा प्रयास है.
मेरी शुभ कामनाएं स्वीकार करें
जगदीश मोहंती
लेखक के बरे मी अधिक जानने के लिए निम्न संपर्कों पर क्लिक्क करें http://en.wikipedia.org/wiki/Jagadish_Mohanty http://www.sarojinisahoo.com/jagadish_mohanty.htm

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Sent: 10 January 2008 07:25:05

My dear Shail Bhabhiji,

Greetings from Dhaka !

Thank u very much for your new yr. greetings which v reciprocate by heart !

I read the first issue of Lekhnai 2008, it is just superb as b4.

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Sent: 10 January 2008 04:09:20
पल-पल पुलक प्रतीति पूर्ण रहे,
पग-पग प्राप्त नूतन हर्ष हो।
श्वास-श्वास में विश्वास व्याप्त हो विरंच वत्
वेदना-विहीन भावनाओं में विकर्ष हो।
हिन्दी की ” आदेश” करो सार्थक सेवा शुचि,
नए कीर्तिमान गढ़ो, सदा उत्कर्ष हो।
” लेखनी” की सक्षम संपादिका कुशल वीर,
शैल अग्रवाल शुभ तुम्हें नव वर्ष हो।
श्रीमती शैल अग्रवाल जी! नया वर्ष शुभ हो।
आपकी ” लेखनी ” से प्रथम बार परिचय हुआ। प्रभावित हुआ। “अपनी बात ” तथा 2007 का ” सिंहावलोकन ” पढ़ा। एक-एक पंक्ति हृदय में उतरती गयी। यथार्थ का इतना आदर्श चित्रण सराहनीय है। आपकी लेखनी हिन्दी की अनन्य सेवा कर रही है। प्रभु से प्रार्थना है कि इसी प्रकार अनवरत् चलती रहे। ईश्वर आपको स्वस्थ, सुखी तथा दीर्घायु करे।
शुभेच्छु,
महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश
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Sent: 02 January 2008 06:16:11

Shail ji bahaut achha issue hai. badhai.

harnot s r

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Sent: 02 January 2008 04:22:00

Prastuti suruchipoorn hai. Happy.
Thanks.
— Mahendra Bhatnagar

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* प्रिय शैल जी..

सादर प्रणाम

लेखनी का हर अंक पढ़ती हूँ, सराहती भी हूँ पर यहाँ मेरी प्रतिक्रिया लिखना रह ही जाता है। हर स्तंभ बहुत ही बढ़िया होता है, मुझे ख़ास कर आपकी अपनी बात बहुत ही बढ़िया लगती है। आपकी कोशिश बहुत ही सराहनीय है इसमें कोई दोराय नहीं। शुभकामनासहित

दीपिका जोशी ”संध्या”

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* From: pratibha mudliar
Sent: 04 December 2007 11:59:18
To: shail agrawal (shailagrawal@hotmail.com)

Priya Shail ji Lekhani ka dec ank dekha….
.Aapka Hindi ko baRhava dene ka prayas kabil-e- tarif hai…..Abhinandan.Ank mein samiilit samgri pathaniya hai. Mera khud ka pasandida vishay kavita aur Gazal hone ke karan mujhe yah ank aur bhi jyada accha laga.Is patrika ke sunahre bhavishya ke liye ashesh shubhakamnayen. Bhavdiya Pratibha

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* From: mahendra bhatnagar

Sent: 03 December 2007 10:54:53

To: shailagrawal@hotmail.com
Respected Shree Shail Agrawal ji,

Kripayaa bataaeyn ki kavitaaeyn kaise bhejoon.

81 varshiya retd. Professor hoon. 18 kavitaa sankalan chhap chuke hain.

Aapkee website se jurnaa chaahtaa hoon.

Aashaa hai ruchi lengee.
Dhanyawad.

— Mahendra Bhatnagar, Gwalior-INDIA
Phone : 0751-4092908

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* From: LL
Sent: 02 December 2007 21:57:46 प्रिय शैल जी,
नमस्कार !
आपसे, ८ वां विश्व हिन्दी सम्मेलन हुआ और जो कवि सम्मेलन हुआ उस समय मुलाक़ात हुई थी -आपकी पत्रिका हर माह देखती हूँ और बहुत सुन्दर लगती है – सादर स्नेह – लावण्या

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* From: RAJESH CHETAN
Sent: 02 December 2007 08:10:00
To: shail agrawal (shailagrawal@hotmail.com)
bahut hi sundar prayas hai, badhai
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From: rima chaturvedi
Sent: 01 December 2007 06:54:05
To: shail agrawal (shailagrawal@hotmail.com)
respected shailji,
lekhani ka cover page bahut hi sunder hai.badhai.rima.

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* Respected Shail Ji,
I am thankful to you that you sent me Lekhani magazine through e-mail. I read it throughly & liked very much. I would like to send my short stories & poems for the same. Hope you will give proper attentation. Rest is fine here.
NEERAJ NAITHANI
SRINAGAR GARHWAL INDIA.
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* Priya Shail ji

Lekhani ke issues har baar parhta hoon. Is baar Baapu ji par kendrit issue bahut achha aur mahatavpuran hai. aapko bahut bahut badhaie. aapne bapu ji par bahut achha likha hai. aur samgri bhi achii hai.

aapka

Harnot

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* From: संपादक (सृजनगाथा) (srijangatha@gmail.com)
Sent: 05 October 2007 03:02:11 To: shail agrawal (shailagrawal@hotmail.com)

दीदी जी,
लेखनी के माध्यम से आप न केवल हिंदी की संस्कृति को विश्वव्यापी बना रही हैं बल्कि आप साहित्यिक पत्रकारिता के मूल्यों को भी संरक्षण दे रही हैं । अस्तु आप समानधर्मा हैं, सो आप पर आत्मीय विश्वास है । मैं इस समय खास तौर पर अक्टूबकर अंक के संपादकीय (अपनी बात)की चर्चा करना चाहूँगा – ” अटूट संयम और विलक्षण आत्मबल … उनके सत्याग्रह का आज पूरा विश्व कायल है ! जन्मदिन, दो अक्टूबर को आज विश्व ने अहिंसा दिवस की तरह मनाने का आवाहन किया है…शायद हिंसा, स्पर्धा और घृणा से जर्जर विश्व, उनके जीवन से, उनके आदर्शों से कुछ सीख ही सके…कुछ पा ही जाए…विनाश के कगार से वापस मानवता की ओर मुड़ ही ले…मिलजुलकर एक कोशिश तो करनी ही होगी! ” । यह दिशा है 21 वीं सदी की हिंसक शक्तियों के लिए । संपादक यदि यह न कहे तो और कौन कहे ? वह पाठकों के मध्य मुखिया होता है । आप इस धर्म का निर्वाह कर रही हैं । इस संपादकीय से मैं सहमत हूँ । बधाई । बधाई संपादकीय में प्रयुक्त भाषा के लिए भी। ब्रिटेन की हिंदी पत्रकारिता में आपका नाम अवश्य स्वर्ण अक्षरों में जुड़ेगा, बशर्ते कि आप लगतार इन्हीं मूल्यों को आगे बढ़ाती रहें । अब तक के सभी अंकों की रचनाओं, खासकर कविताओं, वैचारिक लेखों तक मेरी दृष्टि गई है। मैं आश्वस्त हूँ कि लेखनी पत्रिका निंरतर आगे ही आगे बढ़ती जायेगी।

छोटा भाई जयप्रकाश मानस
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* From: Veena Vij Sent: 16 September 2007 22:05:10 To: shailagrawal@hotmail.com

Shailji,Hearty Congrates!

Never knew you more than a writer.Lekhni…a v. brave attempt.Its beautiful! I had gone through it in a single sitting.Liked it.

All the best for its future.With warm regards,….Veena Vij “UDIT”
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Sent: 09 September 2007 12:18:06

शैल जी, आपकी पत्रिका “लेखनी” अंतरजाल पर देखी। बहुत ही अनुपम और सराहनीय कार्य है आपका। द्विभाषिक पत्रिका का इतना सुन्दर समायोजन कम ही देखने को मिलता है। आप अपना प्रयास जारी रखें। – सुभाष नीरवसंपादक – सेतू साहित्य(www.setusahitya.blogspot.com)
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Sent: 01 September 2007 04:19:47 To: shail agrawal (shailagrawal@hotmail.com)

Dear Shail jee,
Many many Thanks for informing me about your attractive Hindi site. It is
really good. I’ll try to send my any article for this site. Thanking you.
Regards
Jainandan

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* From: pratibha mudliar Sent: 01 September 2007 11:33:44 To: shail agrawal (shailagrawal@hotmail.com)

Hello Shail jii
It is so nice of you to send me the web magzin..Lekhani , the name it self attracted my attention first of all. First of all let me congratulate you on your commendable work of art and literature that too in abroad, I am deeply touched with your creativity and simplicity. I liked each and every aspect of your magzin. Keep it up. I wish you the best for yr sincer efforts, Even i do write poems and i will send few of them for your kind reference and publication. I just wish to knowi s it okie if i send it in mangal font? it is on ms word . plz let me know and once again अनेक बधाइयाँ. शुभ कामनाओं के साथ
प्रतिभा (साउथ कोरिया)
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* aadarneey Shail ji

Lekhni ka August ank dekha. sundar ban pada hai.

reg
atmaram
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* My dear Shail Bhabhi ji,

Greetings from Dhaka !

“ Lekhni ka Varsha Ritu Ank padha.

Man ke taron ko chhoo gaya.

Bichhoh ki agni prajwalit ho gayi !

Par ek bat samajh nahi aayi,

Ki ……

pratibha ke is samudra ko

itne sal kaise

aur kanha chhupa kar rakha ?

jo ab lekhni ke roop me foot pada ?

Aur net par chha gaya ! “

With my regards to Dr Agrawal.

Dr RP Mathur

Consultant Nephrology & Transplant Physician

Apollo Hospitals dhaka
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* शैल जी..
लेखनी का अंक देखा.. अति सुंदर.. मेरी हार्दिक बधाइयां स्वीकार करें।
आपकी लेख्ननी उतरोत्तर प्रगति करे.. मेरी शुभकामनाएं…शीघ्र ही काव्य स्तंभ के लिए कुछ प्रेषित करूंगा। आपका .. कवि कुलवंत

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* Congratulations.

It is excellent.

Would visit it regularly.

Minu
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* Shail Agrwal Ji
Lekhni ka ank dekha aur aapke parishram se parichit hua. Nishchit hi aap bahut jeevat ka kaam kar rahi hain . aapke kahani aur kavitayen pad gaya. angreji men haath kamzor hone ke karan aur kavita ki kum samajh hone ke karan kavitayen thodi kam samajh aayeen par kahani samajha aayee aur usne prabhavit bhi kiya. Narendra Kohli ka vyangya uchh koti ka hai
ank ke liye aapko badhaee
sadar
prem janmejai

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* Dear Shail ji,
Thanks for sending me this mail.I have enjoyed reading your poems,story in Hindi and an article in English.It seems you have multiple talents in addition to being a poet.Well done and congratulations for your venture.I wish you success.More next sunday when we meet.Regards to MrAgrawal.
Best wishes,
Satya Vrat
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* Congrats! I Liked each and every aspect of Lekhni!

I must say, World Class!

Ravi
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* Dear Shail
Thank you for this link to LekhniI liked the layout and the contents…very easy to navigate. Have you received my latest bilingual book Ogura Hyakunin Isshu?Please give me your correct postal address,thank you.
With best wishes and congratulations,
angelee
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* Aadarniya shail ji, and jija ji ko mera namaskar,
aapko sayad ham yaad nahi, tabhi to www.srijangatha.com ka jikra tak ya link tak aapke web site me nahi hai. aap log kaise hain, aapse jo bhent london aur anya sahro me hui thi , aaj tak uski yaad hai. sadar, aapki patrika bhahut badiya hai. badhai
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* Hi Shail

Thank you for reminding me of my archived poems, it was lovely to read them again. I can remember what I felt and what inspired me to write them. Good luck with you website it is truly beautiful.

Angela McNab
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* Dear Shail,
What a delightful and proffessional looking literary site! I’m so proud of u. Congrats!!
love,
Angela.
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* प्रिय शैल
‘ लेखनी’ जैसी समसामयिक द्विभाषीय पत्रिका के प्रकाशन पर ढेरो शुभकामनाएँ और बधाई। यह कार्य साहस और सूझ-बूझ दोनों ही माँगती है। संयोग से दोनों ही तुम्हारे पास है। दोनों ही अंकों में सामग्री के साथ पत्रिका का कला पक्ष (ग्रैफिक) भी उभरा है। यह तो आरंभ है।…..मुझे पूरी आशा है कि तुम इसे अनगिनत ऊँचाइयों तक ले जाओगी। ‘मंथन’, ‘घरोहर’ और ‘My colmn’ जैसे स्तंभ आज की ज़रूरत हैं। कविता ‘चाँद प्रिया, और तितली’ अच्छी लगी।
शुभकामनाओं के साथ….
उषा राजे सक्सेना

Usha Raje Saxena
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*sundar our suruchipoorn patrika ke liye badhai, apaka lekh bhi bahut accha he
aaage star banaye rakhen.
kritya ab ek sanstha ban gayi he, isaka karya kshetra badh gaya heapase sahyog ki apeksha rahegi
Rati Saxena
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* प्रि‍य शैल जी, सबसे पहले तो बहुत बहुत बधाइयां, इस अनुपम और सराहनीय कार्य के लि‍ए । ऐसी सुन्‍दर संकल्‍पना के साथ आपने जो यह कार्य प्रारम्‍भ कि‍या है उसके यशस्‍वी होने की हार्दिक शुभ कामनाएं भी । यह देखकर बहुत अच्‍छा लगा कि‍ महि‍ला दि‍वस पर यह अंक आया और अपनी सुषमा एवं सुगन्‍ध से हमें सराबोर कर गया । बहुत बहुत बधाइयां ।
सादर, राकेश दूबे(London)
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*achchha aur saarthak prayas hai. Vishwas hai ki aur paripakvata ke saath jeri rahega. naye ank bhejti rahiyega.
Shubhkamnaein.

Arun Asthana(India))
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*My dear Shail Bhabhi ji,

I am thrilled to receive your web magazine, the articles are overwhelming and touch the cords of heart.
I m forwarding it to Mamta at Jaipur.
Pl. convey my regards to Dr Agrawal. We remember you very frequently.
CONGRATULATIONS ! indeed for your very valuable effort LEKHNI.With warm regards

Yours sincerely

Dr RP Mathur
MD,DM (Nephrology)AIIMS
ISN Scholar
Clinical Fellow (Nephrology),Manchester Royal Infirmary,UK
FICP
Cosultant Nephrologist & Transplant Physician
Apollo Hospitals, Dhaka

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*Shail ji:

I read all the Kavita. I enjoyed yours short one Sun, Grass very much.
I still need your address to send you my latest Kahani Collection. I need to get your books too. Renu (U.S.A)
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*Dear Editor,
First of all let me congratulate you on your commendable work of art and literature in both languages , Hindi & English. I am deeply touched with your creativity and simplicity. I enjoyed every word and I am proud of your efforts. Keep up the good work. Good Luck! Shail ji.