सच शाश्वत है, अपरिवर्तनीय है। इसे बदला या तोड़ा मरोड़ा नहीं जा सकता है । हमेशा एक ही रहता है और एक ही रहेगा। फिर इतने तोड़े-मरोड़े और विकृत रूपों में क्यों दिखता है यह ..कोर्ट कचहरी से लेकर…जन जीवन तक में, राजनीति और व्यापार से लेकर परिवार तक में?
शास्त्रों में कहा गया शिव यानी कल्याणकारी और सुंदर है यह, फिर इसके अनुयाइयों को सूली पर क्यों चढ़ाया गया , गोलियों से क्यों भूना जाता रहा है? हमेशा घायल, कराहता और गूंगा…लाचार क्यों दिखता है यह?
क्या सिर्फ इसलिए कि हमारे ज्ञानी पूर्वजों ने यह भी कहा कि ‘सत्यं वद्, प्रियं वद्। मा वद् सत्यं अप्रियं।’ यानी कि सच बोलो पर मीठा सच बोलो, जो कड़वा या अप्रिय सच है उसे मत कहो। और इस तरह से शायद एक नैतिक लाइसेंस मिल गया सभी को सच को तोड़ने-मरोड़ने का, झूठ की चासनी में वपेटकर परोसने का। आज धड़ल्ले से नेता समाज से और बेटा बाप से व भाई-भाई से आधे सच या आधे झूठ से काम चला रहा है।
सच को आधे झूठ की चासनी में लपेटकर तो चालाक मानव आदिकाल से ही परोसता आ रहा है। महाभारत काल में ही नहीं …नरो वा या पुंगरो जैसे उदाहरण तो हमें हर सदी और हर समाज में मिल जाएँगे। कभी एक प्रहार तो कभी एक कवच , कभी योजना तो कभी मरहम है सफेद झूठ। विष और औषधि दोनों ही तरह से इसका इस्तेमाल हुआ है।
पर अब आजकी इस अति आधुनिक और अवसरवादी समाज में तो चना-चबैना बन चुका है सफेद झूठ और सच-झूठ को जान पाना, अलग कर पाना कभी संभव ही नहीं तो कभी असभ्य या सुख-चैन गंवाने जैसा हो चुका है। फलतः बह रहे हैं सभी और सच-झूठ की इस बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं सभी।
हमारा यह लेखनी का अंक ऐसी ही कुछ सफेद सच पर आधारित रोचक रचनाओं को लेकर आपके समक्ष आया है। कुछ सफेद झूठ जो निश्चल और अबोध हैं, कभी कवच तो कभी बहलाने-फुसलाने वाली चौकलेटी मिठास लिए हुए हैं। तो कुछ पूर्णतः बख्तरबन्द भी हर तरह के आघात से बचाते और कवच पहनाते।
इस अंक में अपनी पाँच लघु कथाओं के साथ जुड़ रही हैं लेखनी परिवार में। तहेदिल से आपका स्वागत है वीणा सिंह जी और आपके चुटीले व्यंग्यों का आनंद लेखनी के पाठक भी ले पाएंगे। हिन्दी पखवाड़ा भी आ पहुँचा है तो इसके अलावा कुछ हिन्दी पर भी नई पुरानी सामग्री लेकर आए हैं हम। उम्मीद हैं अंक आपको पसंद आएगा। अंक कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया अवश्य भेजें।
लेखनी का वर्षांत अंक संग्रहणीय और बंपर लघुकथा अंक होगा। हम सभी उसके लिए बहुत मेहनत कर रहे हैं। अंक पहली नवंबर को प्रकाशित होगा।
आगामी आस्था और ज्योति के सभी त्योहारों की बहुत-बहुत बधाई के साथ,

शैल अग्रवाल
संपर्क सूत्रः shailagrawal@hotmail.com
shailagrawal@gmail.com