अपनी बातः लेखनीः उन्नीस वर्ष का सफर

मित्रों,

मित्रों, लेखनी का पहला अंक ८ मार्च २००७ को इंद्रजाल पर आया था। आज १९ साल बाद १६५ अंक उपरान्त एक बार फिर लेखनी का नया अंक आपके हाथों में है. और एकबार फिर महिला दिवस ही है। पर पूरा विश्व ही नहीं, सोच और व्यवहार में आज की तो महिला भी बदल चुकी है। हम नई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं और पहले से कहीं अधिक आक्रामक और व्यावहारिक भी हो चुके हैं। नई-नई खोज और तरक्की के बाद जहाँ नई-नई सुविधाएँ हैं, नए-नए भय भी हैं। अधिक स्वार्थी हो चुके हैं हम, कहूँ तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी। ऐसे में आदर्श और प्रेरणाओं का महत्व परोक्ष रूप से तो कम हुआ है परन्तु अपरोक्ष रूप से आज भी सब कुछ वही तो है, वही सामाजिक कीड़ा है इनसान और वही ओस-सा कांपता और नाज़ुक उसका अंतर्मन है और आज भी उन्हीं स्तंभों के सहारे खड़ा हैं यह, जिनके बिना इसका अस्तित्व तक सँभल नहीं। और लेखनी का यह अंक उन्ही कुछ ऐसे तृण मूल विचार और व्यक्ति और उनका क्या असर है इनसान पर जैसे विषय पर है? जो जीवन को गढ़ते और आकार देते हैं।

यानी लेखनी का यह अंक प्रेरणा पर है। प्रेरणा जो प्रेरित करती है हमें आगे बढ़ने को। रहन-सहन और सोच को। प्रकृति और पर्यावरण यानी हमारे आसपास और जो आँखों के आगे घट रहा है उसका तो बड़ा हाथ रहता ही है हमारी मानसिक विकास में, ङमारे माता-पिता , शिक्षक और सहपाठियों का भी बड़ा हाथ रहता है हमारी सोच को गढ़ने में। आश्चर्य नहीं कि अधिकांश रचना माता-पिता और गुरु पर मिलीं। सही भी हैं यही तो हैं हमारे बृह्मा और विष्णु, यानी रचयिता, संरक्षक और पोषक। कुछ ऐसी यादें भी हैं उन परिचितों की जिनके सौहाद्र और समझ से हम सदा प्रभावित रहते हैं। इसके अलावा किताब और समकालीन फैशन, व हमारी सदी के श्रेष्ठ पुरुष, नायक और अभिनेता आदि भी वैयक्तिक रुचि अनुसार बड़ा असर डालते हैं हमारी सोच पर, चाहे वह गांधी हों, आइंस्टाइन हों या फिर अमिताभ बच्चन, मधुबाला , मर्लिन मनरो , हिटलर और कोई तत्कालीन क्रूर या उदार व्यक्तित्व, बेहद सफल या अद्भुत क्षमता वाला जैसे टाटा, बिरला, अम्बानी आदि और टैगोर, शेक्सपियर या कबीर और तुलसी भी। सच तो यह है कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हर व्यक्ति की आँखों में एक आदर्श मूरत होती है, जिसके जैसा अगर नहीं, तो अनुसरण अवश्य करना चाहता है वह।
यह अंक ऐसी ही कुछ अविस्मरणीय यादों और संदर्भों से सजकर अब आपके हाथों में है। ब्रिटेन में मार्च में मातृदिवस भी मनाया जाता है। तो ललित हायकू और कविताएँ भी हैं, जननी पर। सभी रचनाकारों को बधाई और तहेदिल से आभार हमेशा की तरह ही इस अप्रतिम रचनात्मक सहयोग के लिए। लेखनी को सजाने संवारने के लिए।
होली का भी मौसम है। तो रंगारंग इस त्योहार की इंद्रधनुषी छटा और लालित्य संजोने के लिए होली पर भी कविता कहानी और आलेख , नई -पुरानी रचनाओं के साथ लेखनी-होली-विशेष है आपके लिए।
इस अंक के साथ लेखनी अपनी किशोरावस्था से निकल कर युवावस्था में प्रवेश कर रही है। अर्थात उन्नीस वर्ष पूरे करके बीसवें वर्ष में प्रवेश कर रही है, इसका गांभीर्य और दायित्व बढ़ रहा है, साथ-साथ क्षमता और धैर्य भी आप जैसे कई सशक्त मित्रों के निरंतर सहयोग व साथ की वजह से ही संभव हुआ यह। बधाई आप सभी लेखक , पाठक व आपकी प्यारी पत्रिका को इस लम्बी और उनन्नीस वर्ष की रोचक व रचनात्मक हयात्रा के लिए।
लेखनी पत्रिका पूर्णतः अव्यवसायिक और साहित्य, कला, व सामाजिक सरोकारों में जुटी, हिन्दी और अंग्रेजी में ब्रिटेन से प्रकाशित एकमात्र द्विभाषीय ई. पत्रिका है, जो मार्च 2007 से अबतक 165 अंक और पाँच सौ से अधिक समकालीन कवि व लेखक और करीब-कराब इतनी ही संख्या में धरोहर और कीर्ति स्तंभ में भारत और विश्व के कई अग्रज लेखक व कवियों को प्रस्तुत कर चुकी है । कविता आज और अभी और कहानी समकालीन में उदीयमान और प्रस्थापित कवियों व लेखकों को प्रस्तुत व प्रोत्साहित करती आ रही है । सन 2014 तक मासिक और तत्पश्चात द्विमासिक यह पत्रिका प्रति माह 27 विभिन्न शीर्षकों के तहत हर उम्र और रुचि के पाठक के लिए सामग्री प्रस्तुत करती आ रही है। आज दस हजार से भी अधिक क्लिक प्रतिदिन पाने वाली लेखनी ई. पत्रिका के पाठक यूरोप, सूरीनाम, चीन, जापान, वियतनाम व रशिया और अमेरिका से लेकर भारत तक पूरे विश्व में फैले हुए हैं।
पाठकों और विद्यार्थियों के आभार पत्र प्रायः मन को असीम सुख और संतोष से भर देते हैं। शांति निकेतन के प्रौफेसर रामचन्द्र रॉय ने लेखनी के संपादकीय की हजारी प्रसाद द्विवेदी के संपादकीयों से तुलना करके मन को स्पृहणीय लक्ष से प्रेरित कर दिया है और जाने माने लेखक रवीन्द्र अग्निहोत्री जी ने लेखनी पत्रिका को धर्मवीर भारती के संपादन में प्रकाशित धर्मयुग व दिनमान के समकक्ष रखकर जो मान बढ़ाया, प्रोत्साहन दिया , प्रार्थना है कि प्रभु उस लक्ष तक पहुंचने की हिम्मत और सूझबूझ दे।
यह कम गौरव और संतोष की बात नहीं कि लोग पत्रिका पढ़ रहे हैं, पसंद कर रहे हैं और इससे लेखक व कवि के रूप में जुड़े हुए हैं। यह लेखनी का सौभाग्य है कि आरंभ के दिनों से ही इसे कई महत्वपूर्ण कवि और लेखकों का सहयोग मिला, जिसमें श्री नरेन्द्र कोहली जी, वेद प्रकाश बटुक जी, अशोक चक्रधर जी , और सीतेश आलोक जी आदि विशेष रूप से याद आ रहे हैं, जिन्होंने अपनी उत्कृष्ट रचनाओं से पत्रिका का मान बढाया। ओम निश्चल जी ने तो तीन साल तक नियमित रूप से कविता में इन दिनों नामक शीर्षक से आधुनिक कविताओं पर कई अप्रतिम आलेख दिए, जिसके लिए पत्रिका सदैव उनकी ऋणी रहेगी। नरेश शांडिल्य , शशिकांत व ताराचंद नादान व शील निगम व रूपसिंह चन्देल जैसे मित्र है जो एक ही आवाज पर तुरंत अपनी रचना से पत्रिका को समृद्ध करते हैं।
प्राण शर्मा, अशोक गुप्ता और विजय सप्पत्ति व सरस्वती माथुर जैसे कई नियमित और सक्षम व स्नेही लेखक थे हमारे जिनका सफर के बीच में ही साथ छूट जाना आज भी दुख देता है और जिनकी रचना के बिना लेखनी का कोई अंक पूरा ही नहीं होता था। पर जब जीवन ही एक यात्रा है तो मुसाफिर तो साथ छोड़ेंगे ही और नए जुड़ेंगे भी। और नए जुड़ रहे हैं , लगातार जुड़ रहे हैं और एक से एक उत्कृष्ट रचनाओं के साथ जुड़ रहे हैं। संतोष बस इस बात का है कि जिनकी उपस्थिति के बिना लेखनी के एकाध अंक ही पूरे हो पाए हैं , ऐसे कई लेखक और कवि मित्र अपनी रचना व स्नेह के साथ आज भी हमारे साथ हैं। इनमें बड़े भाई गोवर्धन यादव जी और छोटी बहन तुल्य, पद्मा मिश्रा, अनिता रश्मि और इंदु झुनझुनवाला का नाम विशेष रूप से लेना चाहूंगी, जो आज भी लेखनी के आधार-स्तंभ हैं।

बाल-साहित्य के साथ हास्य व्यंग्य, पर्यटन, परिचर्चा, मंथन, मुद्दा आदि भांति-भांति के विचारोत्तेजक और रमणीक लेखनी के आलेखों ने पाठकों की ज्ञान और मनोरंजन दोनों ही पिपासा को भलीभांति शांत किया है।

अधिक न कहकर इतना ही कहूंगी कि सदा सत्य शिव और सुन्दर की स्याही में डूबकर ही उकेरा है लेखनी ने खुद को और गागर में सागर भरने का लघु प्रयास कर रही है आपकी लेखनी पत्रिका । पत्रिका का हर अंक एक निर्धारित विषय पर रहता है और कई कई मुद्दे उठाए हैं लेखनी ने अपने पिछले अंकों में जिनमें कुछ समाज की मूलभूत और उपेक्षित समस्याएं हैं जैसे शिक्षा, रंगभेद, निर्बलों और अभागों व नारी के प्रति समाज का भेदभाव व दोयम दर्जे का रवैया, टूटती शादी की प्रथा. गरीबी और भ्रष्टाचार , विछोह व मृत्यु, पैसावादी संस्कृति की मानसिक विक्षिप्तता और युद्ध, तो कई विशुद्ध संस्कृति और कला पर केन्द्रित अंक भी आए हैं जिनमें हमने कला सिर्फ कला के लिए रुख अपनाया है ललित व मनोहारी सृजन के साथ। छहों ऋतुओं पर विभिन्न विशेषांक, त्योहारों पर, पर्यटन पर, रामायण पर, लोक संस्कृति पर, सूरज पर, फूलों पर, बादल पर, माँ की ममता पर, वात्सल्य के बदलते स्वरूप पर, शाश्वत प्रेम पर और प्रेम में धोखे और बेवफाई पर भी। बाल विशेषांक, हास्य विशेषांक, अनुवाद विशेषांक, नारी विशेषांक आदि विभिन्न विषयों को उठाता व रेखांकित करता लेखनी का हर अंक विषयोन्मुख रखने का ही प्रयास रहा है, जिन्हें पाठकों ने खूब खूब सराहा भी है। सामग्री के साथ-साथ लेखनी का प्रस्तुतिकरण व रूप सज्जा भी पाठकों को पसंद आती रही है और यह हमारी मेहनत का बड़ा इनाम है। विद्यार्थी अब इसे संदर्भ कोष की तरह इस्तेमाल करते हैं और साहित्य-रसिकों की विश्राम स्थली बन चुकी है लेखनी।
साहित्य और संस्कारों में रुचि पैदा करना तो हमारा उद्देश्य है ही, लेखनी पत्रिका का ध्येय भारत और ब्रिटेन की संस्कृति के बीच सेतु का काम करना भी है। दोनों संस्कृतियों को जोड़ना है। यही वजह है कि हमने न सिर्फ विश्व का उत्कृष्ट साहित्य पाठकों तक पहुँचाया है, अपितु भारतीय संस्कृति की अमूल्य विरासत को भी धरोहर के रूप में ( कविता कहानी दोनों) पाठकों, विशेशतः भावी पीढ़ी तक पहुँचाने का प्रयास किया है। हम चाहते हैं कि आप सभी के सहयोग के साथ साहित्य प्रेमी ही नहीं युवा पीढ़ी भी इससे जुड़े ताकि इस विरासत को अक्षुण्ण रखा जा सके और हमारा यह साथ व सद्भाव भी बना रहे।…

शुभेच्छु
shailagrawal@hotmail.com
shailagrawal@gmail.com
पुनश्चः लेखनी का आगामी अंक यानी मई-जून अंक बाल विशेषांक है जिसके लिए आपकी हर विधा की बाल रचना व बाल साहित्य पर आलेख आमंत्रित हैं, ऊपर की लाइन के दोनों मेल पर। भेजने की अंतिम तिथि २० अप्रैल है।

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