उम्मीदें कब टूटती हैं?
आखिरी साँस तक प्रार्थना जारी रहती है कि शायद कुछ चमत्कार हो ही जाए? विवेक और सद्बुद्धि आ ही जाए और विनाश का आसन्न क्रूर ताण्डव जो चारो तरफ़ युद्ध के बादलों के रूप में दिख रहा है टल ही जाए!
पर एक जटिल समय में जीने का यह भी एक अभिशाप ही है कि आम आदमी पूर्णतः निरीह और लाचार हो जाता है, दूसरों के निर्णय के मकड़जाल में फंसा और उलटा लटका। और आज की हमारी यह इक्कीसवीं सदी कुछ ऐसी ही तो सिद्ध होती जा रही है। पहले अनुचित सोच और स्वार्थ से उत्पन्न महत्वाकांक्षाएँ, जो करोना जैसी महामारी बनकर दुनिया को घोटती और मारती रहीं और अब दुनिया के कोने-कोने में चल रहे युद्धों की वजह से लाखों न सिर्फ अपने ही घरों से बेघर हो रहे हैं, भूख और कंगाली की हालत पर पड़े मृत से भी बदतर हैं बिना किसी उम्मीद या सहायता के।
पहले हम सोचते थे कि विकसित और शक्तिशाली देशों के शासक और नेता समझदार हैं। कोई ग़लत निर्णय नहीं लेंगे, बेवजह ही विश्व की शांति को युद्ध की अग्नि में नहीं झोकेंगे? पर…
लेखनी के इस जुलाई-अगस्त अंक में यही प्रश्न ज्वलंत हैं। कितना योगदान है प्रकृति का और कितने हम ख़ुद ज़िम्मेदार हैं, हमारे अनैतिक निर्णय लेते नेता ज़िम्मेदार हैं, इस उथल-पुथल के? सोचना भी होगा और रोकना भी होगा।
गिरते को उठाना साहित्य का भी धर्म है और मानवता का भी।
आज जब पहाणों पर भू स्खलन, जंगलों में आग और शहरों पर गिरते बमों के हम आदी-से होते जा रहे हैं, कैसे समझा सकते हैं कि अगर चेते नहीं तो आगे आने वाले परिणामों की कल्पना तक असंभव है हमारे लिए। जीवन की दैनिक और साधारण जरूरतों के लिए भी, जैसे कि शुद्ध जल और वायु तक के लिए तरसना पड़ेगा। अभी तो सिर्फ बोतलों में पानी ही खरीदते हैं, वह दिन दूर नहीं, जब हवा भी खरीदनी पड़ जाएगी। कहते हैं वक्त के रहते एक उघड़ी बखिया को ठीक कर लो तो दस की मेहनत बच जाती है।
पर जब अपने अलावा किसी को भी दूसरा कोई और दिखाई ही नहीं दे, तो सही सोच और सही निर्णय की कैसी और किससे उम्मीद ?
कुछ सिरफिरों को अपनी ताकत और सत्ता का नशा है, धर्म का नशा है, आणविक शक्ति का नशा है। और सिर्फ अपनी और अपनी ही परवाह है। आज और अभी पर ही दृष्टि है इनकी, कल क्या नतीजा होगा न तो इसकी फिक्र है और ना कोई सपना।
लेखनी पत्रिका एक बहुत छोटे ही रूप में सही, एक सामूहिक अभियान है, एक सी सोच वालों की एक मिली-जुली आवाज़ है। एक उम्मीद है आस की किरण-सी, निऱाशा और अवसाद के ख़िलाफ़। अन्याय के ख़िलाफ़ । हर अनुचित और अत्याचारी कदम के ख़िलाफ़।
लेखनी विशेषतः आभारी है उन सभी मित्रों की जो इस अभियान से जुड़े हैं। और निरंतर पत्रिका को रचनात्मक रक्तदान देते आए हैं और आगे भी देते रहेंगे।
इस अंक में हम स्वागत कर रहे हैं, दो नए लेखक मित्र पूजा अग्निहोत्री और महेश चन्द्र धारवाले जी का उनकी कहानियों के साथ । उम्मीद है आपका भरपूर स्नेह मिलेगा इन्हें। अन्य हमारे सभी परिचित लेखक और कवि मित्रों की सशक्त रचनाओं से सज्ज यह अंक अब आपके हाथों में है और आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार कर रहा है।
आपकी प्रतिक्रियाएँ न सिर्फ प्रोत्साहित करती हैं अपितु मार्गदर्शन भी करती हैं।
१ सितंबर को एक नए विषय और नए अंक के साथ आपसे फिर मिलते हैं, मित्रों। तबतक, स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें और रचनाशील रहें,
अशेष शुभकामनाओं के साथ,
शैल अग्रवाल

संपर्क सूत्रः shailagrawal@hotmail.com
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