
सितंबर का महीना उदासी का है, अँधेरे का है पर नव सृजन की तैयारी का भी तो, जब पुराना छूटता और टूटता है ताकि नया पनप सके? गहराए अंधेरे को चीर कर ही भोर आती है। यही नियम है। उसने कहा उजाला तो चारो तरफ उजाला हो गया। फिर उसने सृष्टि रची थी कभी। नदी पहाण और झरने बनाए थे, पेड़ पौधे, हरियाली और बदलते मौसम, सभी कुछ। फिर भी मन नहीं भरा तो अपनी ही परछांई को आकार देकर इनसान का पुतला बनाया होगा और उसमें प्राण फूंक दिए थे देखने को उसकी सामर्थ, उसके करतब।
अब वह चल फिर रहा था, सब देख और समझ रहा था। तब तरह-तरह के अन्य जीव-जन्तु भी बनाए थे उसी ईश्वर ने, ताकि विविधता से भरा यह संसार सदा मनोरम रहे, सुंदर लगे और सुचारु चल सके एक दूसरे के सहयोग और जरूरत अनुसार। पर कोई बडा या छोटा नहीं था वहाँ, सभी बराबर।
परन्तु ऐसा तो प्रभु सोचते थे, उनके द्वारा रचित मानव नहीं। वह तो खुद को पूरी सृष्टि का राजा समझने लगा था। जैसे-जैसे उसकी बुद्धि और जरूरतें विकसित हुईँ, हर चीज का इस्तेमाल करना शुरु कर दिया उसने अपने स्वार्थ के लिए, फायदे और सुख-सुविधा के लिए।
जानवरों से जंगल छीन लिए, पक्षियों से पेड़ । अब हर जगह बस उसे ही रहना था और मनमानी चलती थी उसकी ही। नदियों की बहती धारा तक मन-माफिक मोड़ ली बांध बना-बनाकर । कहीं रेगिस्तान में घास उगाता और कहीं हरियाली को उजाड़ और मरु बना देता बमों से और जीव ही नहीं प्रकृति का भी मालिक बन बैठा वह। दोहन करता दिनरात खनिज का और जीवों का। उ
इन्हें अपने नैसर्गिक जीवन से खदेड़कर पालतू ही नहीं बनाया अपितु सब्जी तरकारी की तरह जानवरों की भी खेती शुरु कर दी। इनपर सवारी की, बोझा ढुलवाया, खेतों में हल चलवाए इनसे और जो किसी काम के न थे उन्हें अपना भोजन बनाकर चट करने में भी संकोच नहीं किया। विशालकाय और हिंसक शेर हाथी तक अब उसके कब्जे में थे…कहीं सरकस दिखाने को मजबूर, तो कहीं चिडियाघर के पिंजरे में बन्द।
बात यहीं पर नहीं रुकी, जब उनके रूप रंग पर मोहित हुआ तो प्रदर्शन और मनोरंजन की वस्तु तक बना डाला उन्हें। उनकी चमड़ी से और सींगों से घर और खुदको सजाने लगा। कहीं-कहीं तो भूसा भरकर अपने वर्चस्व की शान बघारने को बैठकी तक में खड़ा कर लिया। पसंद ही नहीं अबतक वह खुद भी बेहद वीभस्त और व्यावहारिक हो चुका था। उपचार ही नहीं श्रंगार प्रसाधनों के अविष्कार तक के लिए उनपर तरह-तरह के प्रयोग करने लगा। यातनाएँ दीं। जिन्दा तो जिन्दा, मरने पर भी नहीं छोड़ा । अवशेषों में भी अपने फायदे की औषधियाँ ढूंढने लगा। चमड़ी नोंचकर खुद पहन ली। कभी मौसम की मार से बचने के लिए तो कभी आत्म-श्लाघा और प्रदर्शन व फैशन मात्र के लिए ही बस। पर इतनी यातना और दुर्व्यवहार के बाद भी यह निरीह और मूक सहवासी आज भी हमारे साथ हैं, हमारे बीच हैं, आश्चर्य की ही तो बात है। हमारी मर्जी अनुसार जी और मर रहे हैं अभी भी। इनमें से कई तो हमारे घरों में भी रहते हैं। कभी पल बढ़कर तो कभी जबर्दस्ती घुसकर। कई तो परिवार के सदस्य जैसे भी हो जाते और हमसे निस्वार्थ प्रेम करते हैं इनमें कुत्ते, बिल्ली, गाय बकरी और उंट घोड़े और गधों का नाम तो आएगा ही, तोता, मैना और बुलबुल को भी जोड़ सकते हैं हम, जिन्होंने जाने कितनों का एकांत बांटा है, उनके एकाकी पलों के साथी बने हैं।
ऐसे ही कुछ साथ रह रहे मूक सहवासियों को समर्पित है यह सितंबर-अक्तूबर का लेखनी/LEKHNiका वर्तमान अंक। बहुत ही प्यार व शिद्दत के साथ याद किया है लेखनी के लेखक व कवियों ने हमारे इनके साथ के आपसी संबंधों को। बस कभी- कभी सोचती हूँ आज सभ्यता के इतने बरस बाद भी क्यों इतना फरक है इनमें और हममें, रहन-सहन और सुख-सुविधा में? क्यों हम जितना लेते हैं इनसे उतना संरक्षण नहीं कर पाते इनका? बुद्धि के बल पर हम इनका इस्तेमाल तो करते हैं, पर क्या इनकी भावना और जरूरतों का भी ख्याल रख पाते हैं? कुछ करना तो दूर क्या कभी सोचते भी हैं इनके बारे में? शायद नहीं। अगर करते तो छोटी बड़ी कई ये प्रजातियाँ, पैन्डा, शेर चीते, तितली और वीर बहूटी आदि जीव-जन्तु ही नहीं , फूल-पत्ति और प्राणदायी पौधे तक नष्ट न होते चले जाते, वह भी इतनी तेजी से? आप कहेंगे आत्म-संरक्षण भी तो कोई चीज है अब हम इनके आहार बनकर मुँह में तो नहीं जा बैठेंगे?
पर हमारे ऋषि-मुनियों ने अवश्य ही सोचा था इस बारे में और तभी तो कई हजार योनियों की कल्पना ही नहीं योजना भी बना डाली। क्योंकि धर्म से, अज्ञात से अभी भी डरता है आदमी, मृत्यु से तो खासकरके। और इसके रहस्य, नियम व दंड विधान को समझाने के लिए, ताकि मनुष्य डरे, समझे ,थमे संभले स्वर्ग-नरक की प्रस्थापना कर दी, ताकि क्रूरता और भेदभाव रुके अन्य जीवों के प्रति। जोर देकर यहाँ तक कहा कि एक इनसान या छोटा-बड़ा जीव-जन्तु ही नहीं, पेड़-पौधे कुछ भी बनकर पैदा हो सकते हैं हम अगले जन्म में । जैसे करम वैसा ही जनम। चौरासी लाख योनियों से गुजरकर मिलता है मानव जन्म। एक दुर्लभ , विशिष्ट और बेहद सक्षम योनि है यह जिसके द्वारा निर्वाण भी मिल सकता है और लख चौरासी की गर्तों में भी पुनः गिर सकता है इनसान। जैसे कर्म करेंगे वैसा ही फल मिलेगा। यहूदी, ईसाई और साथ-साथ निकले धर्मों में भी कुछ ऐसी ही बातें हैं। अच्छे-बुरे कर्मों पर निर्णय लिया जाता है। बस वहाँ आत्मा चोला नहीं बदलती, इंतजार करती है उस अंतिम निर्णायक दिन का। लगता है समाजशास्त्र का, इनसान की जिम्मेदारियों का धर्म के साथ आदिकाल से ही संबंध रहा है। कुछ धर्मों में तो नन्हे से नन्हे जीव को मारने तक से निषेध या परहेज है। मुँह पर कपड़ा बांधकर रखते हैं इसके अनुयाई ताकि छोटे जीव अनायास ही आती-जाती सांस द्वारा काल-कवलित न हो जाएँ। यही नहीं जड़ दिखते पेड़-पौधे तक जीव हैं और सब सहते महसूस करते और जीते मरते हैं ऐसा भी माना जाता है कई धर्मों में और इन्हें भी जीव का ही दर्जा देना चाहिए। देखभाल और पोषण चाहिए। कुछ ऐसे भी हैं जहाँ प्रथा के नाम पर या किसी सिद्धि की आस में आज भी निरीह जानवरों की बलि और कुर्बानी दी जाती है।
मदान्ध और सभ्यता के शिखर पर बैठा मानव आज भी तो स्वार्थ और मुनाफे का चश्मा लगाए ही बैठा है। कब सुनता समझता या मानता है दूसरों के दुख दर्द को यह! डरा कब है वह इस तरह की मान्यता या उपदेशों से, खास करके अब इस आधुनिक इक्कीसवीं सदी में जब उसने शरीर के ही नहीं, सूरज, चांद, तारों तक के सारे रहस्य जान लिए हैं और उसकी पहुँच करीब-करीब बृह्मांड के हर गृह और नक्षत्र तक है, हर चीज की मिनट -मिनट की जानकारी है उसके पास। कृतिम बुद्दिमत्ता जैसा सहायक है उसके साथ पलपल के मार्ग दर्शन और अज्ञात का झरोखा बनने के लिए । नफे-नुकसान की लालची आग में और हवा देती सुविधाओं का नतीजा भी सामने आएगा ही। तेज और तेज और अमीर और अमीर। जो पिछड़े उनके लिए जगह ही नहीं क्योंकि रिश्तों का संतुलन बिगड़ चुका है, प्रकृति में भी और हृदय में भी। कहीं बाढ है तो कहीं सूखा। चारो तरफ ही बढ़ते जाते सोचहीन अतिक्रमण और आक्रमणों ने अब जानवरों की कौन कहे इनसानों को भी अपने घरों से निकाल दिया है, बेघर कर दिया है। शोषण और दुष्कर्म आम बातें हैं। कोई हिचक नहीं अब स्वार्थी होने से, मनमानी करने से किसी को। पहले जंगल जलते थे अब शहरों तक में यह आग फैल चुकी है और बुझाने के साथ-साथ हमें यह भी सोचना ही होगा- कहीं यह हमारे द्वारा नित नए उठाए कौंक्रीट जंगलों का ही तो परिणाम नहीं…नदी समंदर में मिलते रासायनिक वेस्ट का विष ही तो नहीं जो चारो तरफ तरह-तरह की जानलेवा बीमारी बनकर फूट पडा है ?… चारो तरफ फूटते ये बम और हिंसा का ही तो असर नहीं कि प्रकृति भी इतनी उग्र हो गई है और अपना संतुलन खो बैठी है। ये धसकते पहाण और पिघलते हिम-खंड, हाल ही का नेपाल का वह हादसा…अचानक ही आई उस तीव्र बाढ़ में छिन्न-छिन्न भरोसा… सैकड़ों लापता हुए, हजारों बेघर हुए। जाने कितने डूब गए, खो गए । उफान खाती लहरों के साथ डूबते-उतराते लोगों का अनियंत्रित बह जाना… जाने कितनों ने कितनी चोट खाई, पीड़ा सही तब जाकर जीवन से मुक्ति पाई। दुख हुआ था इनसानों को भी टूटे वृक्षों के साथ-साथ वैसे ही असहाय और बेहोश , निर्जीव-सा बहते हुए देखकर। बारबार याद आया कि हम मानें या न मानें सृष्टि में हर चीज का ही एक जैविक संबंध है। एक भी कील निकली तो पूरा यंत्र ही गड़बड़ाया।
उदार और संवेदनशील न भी हों हम, तो भी जीने के लिए ही सही इस संतुलन का ध्यान रखना ही होगा और स्वार्थी और फायदे के दृष्टिकोण से बाहर निकल कर छोटे-बड़े हर जीव जन्तु के बारे में सोचना होगा। उन्हें जीने के साधन देने ही होंगे। वे रहेंगे तो हम रहेंगे। वे बचेंगे तो हमारी पृथ्वी का आपसी और अन्य गृहों से भी संतुलन रह पाएगा। प्रकृति में कोई भी जीव या वनस्पति अन्यथा नहीं। हरेक के होने का एक उद्देश्य है, एक निर्धारित कर्म और क्रम है हर चीज का। माना देर हो चुकी है पर अगर अभी भी जग गए तो शायद यह प्रलयंकारी दृश्य बारबार न देखने को मिलें… फिर अगर हम अपनी सहायता नहीं कर सकते तो महाकाल भी नहीं कर सकते, कैलाश और मानसरोवर की यात्रा पर भी नहीं।…
इस अंक में हम स्वागत कर रहे हैं लेखनी परिवार में मुंबई की स्मिता बतरा जी का उनके एक बिल्लियों पर खूबसूरत संस्मरण के साथ। सुखद संयोग है कि लेखनी का यह अंक ठीक जन्माष्टमी के दिन आपके हाथों में पहुँच रहा है और भाई-बहन के पावन त्योहार राखी की सेवइयों की खीर और घेवर की मिठास भी अभी बाकी है। प्यार की डोर भाइयों की कलाई पर और तृप्त चमक बहनों की आँखों से गई नहीं है अभी जीवन की इस आपाधापी में।
आने वाला अक्तूबर का तो पूरा महीना ही त्योहारों की एक खूबसूरत श्रंखला का है, दुर्गा के नवरूपों के आगमन का है। विजय-दीपों की झिलमिलाहट और सजावट के उत्साह और तैयारी का है। इतिहास और उसकी गौरव गाथाओँ को याद करने का है। आश्चर्य नहीं कि इस उजास में सोए देवता तक जाग जाते हैं। हाल ही में गुजरे और आगामी सभी त्योहारों और यादगार दिवस जैसे हिन्दी दिवस और गांधी जयंती आदि की बहुत-बहुत बधाई के साथ पहली नवंबर तक के लिए विदा लेती हूँ अब अभी के लिए। नवंबर में फिर मिलेंगे हम एक और नए अंक के साथ जो कृतिम बुद्धिमत्ता पर रखने का मन बनाया है हमने इसबार। आप क्या सोचते हैं इस विषय पर, यह हमारी शत्रु है या मित्र? कितने फायदे या नुकसान हैं इसके? गुनन-मनन करिए और लिख डालिए। विषयोन्मुख हर विधा में लिखी आपकी रचनाओं का हमें इन्तजार रहेगा। भेजने की अंतिम तिथि २१ अक्तूबर है और भेजने का पता है-
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आपकी मित्र
शैल अग्रवाल

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