अंशु श्री सक्सेना, कनक मोहन, अनिता मिश्रा

पाँच लघुकथा

अंशु श्री सक्सेना
हैदराबाद, तेलंगाना

लघुकथा-१
इंसानियत

वह रेलवे स्टेशन के बाहर भीख माँग कर अपना गुज़ारा करता था। मैले कुचैले फटे कपड़े और बेतरतीब दाढ़ी, यही पहचान थी उसकी। आज कहीं से भूख प्यास से बिलबिलाता, लगभग मरणासन्न अवस्था में नवजात कुत्ते का बच्चा उसके पास आ गया। भिखारी चाय की गुमटी पर गया और बोला,
“आज डबलरोटी नहीं चाहिये, दस रुपये में थोड़ा दूध दे दो, कुत्ते के बच्चे के लिए“
दुकानदार ने आश्चर्य से पूछा, “कुत्ते के बच्चे के लिये खुद भूखे रहोगे?”
भिखारी ने हँस कर कहा,
“मैं एक दिन नहीं खाऊँगा तो मुझे कुछ नहीं होगा लेकिन यदि कुत्ते के बच्चे को यदि आज दूध नहीं मिला तो वह मर जायेगा। मैं अपने पेट के लिये किसी बेज़ुबान की जान नहीं ले सकता“
दुकानदार ने उसे दूध के साथ डबलरोटी का पैकेट थमाते हुए कहा,
“लो भाई, मैं भी धंधे के लिये तुम्हें भूखा रखने का पाप अपने सिर नहीं लेना चाहता“
वहाँ इंसानियत खड़ी मुस्कुरा रही थी।

***

लघुकथा-२
विस्थापन

पौ फटने को थी। मोहन जल्दी जल्दी अपने ठेले पर चाट बनाने की सामग्री जमा रहा था। आलू की बनी टिक्कियाँ, गोलगप्पे और खट्टी मीठी चटनियाँ।
आज जंतर मंतर पर कोई बड़ा धरना प्रदर्शन होने वाला था। मोहन सोच रहा था,
“आज अच्छी बिक्री होगी…लड़कियों की भीड़ तो वैसे भी चाट के ठेले पर मधुमक्खियों के झुंड की तरह टूट पड़ती है।अधिक पैसे मिलेंगे तो कल ही पोस्टऑफिस जाकर माँ को मनीऑर्डर भेज देगा। अगले महीने ही छुटकी का गौना होने वाला है, इन पैसों से जमाई सा के लिए घड़ी का इंतज़ाम हो जाएगा…वैसे भी लड़के वालों की मोटरसाइकिल और घड़ी की ही तो माँग है गौने में…बापू के इस दुनिया से चले जाने के बाद, माँ, सोहन और छुटकी की पूरी ज़िम्मेदारी मुझपर ही तो है। कितनी मुश्किल से तो जंतर मंतर पर ठेला लगाने का परमिट मिला है…भगवान करे ये धरने-प्रदर्शन रोज़ रोज़ हुआ करें”
जंतर मंतर प्रांगण में हज़ारों विस्थापितों की भीड़ जमा थी जिनके फ्लैट्स की बहुमंज़िली इमारतें ढहाने का आदेश माननीय सुप्रीमकोर्ट द्वारा दिया गया था। उनका साथ देने के लिए यूनिवर्सिटी के छात्र-छात्राओं का हुजूम उमड़ पड़ा था। हवाओं में नारे गूँज रहे थे।
“हमारा घरबार ले लिया, हमारा संसार उजाड़ दिया”
“विस्थापितों की सुनो पुकार, मुआवज़ा दो ज़ालिम सरकार”
“रोज़ रोज़ टकराएँगे, मुआवज़ा लेकर जाएँगे”
पंद्रह मिनट की नारेबाज़ी के बाद लोगों का हुजूम मोहन के ठेले पर टूट पड़ा था। तवे पर टिक्कियाँ सेंकते हुए मोहन की आँखों में उसका गाँव जीवन्त हो उठा। झोपड़, खेत-खलिहान, ताल-तलैया, पोखर और गाँव तक जातीं कच्ची पगडंडियाँ ।
विस्थापन गाँवों का भी होता है, जहाँ किसी मुआवज़े का कोई प्रावधान नहीं।

***

लघुकथा-३
तथागत

सरकार ने नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने की तैयारी कर ली थी। इसी बीच नक्सल प्रभावित इलाक़े में लाल आतंक का पर्याय बन चुके नक्सल सरगना महेश और उसके साथियों ने यात्रियों से भरी बस अपने कब्जे में कर, सभी यात्रियों को बंधक बना लिया। महेश ने सभी यात्रियों को एक पंक्ति में खड़ा कर अपने साथियों को निर्देश दिया,
“सरकार हमें मिटाना चाहती है लेकिन हम उसके मंसूबे कभी पूरे नहीं होने देंगे। इन सभी की खोपड़ी उड़ा दो…गोलियों की गूँज सरकार के कानों तक पहुँचनी चाहिये ताकि सरकार हमें हल्के में लेने की भूल न करे”
कहते हुए उसने अपनी बंदूक़ एक निडर से दिख रहे युवक की ओर तान दी।
“क्या नाम है तेरा? बिन बुलाई मौत को सामने देख कर तुझे डर नहीं लगता?“
“तथागत, मेरे नाम का अर्थ ही है जो जैसा आया है वैसे ही जायेगा…मैं बौद्ध धर्म अनुयायी हूँ, इसलिये मुझे मौत से डर नहीं लगता”
गौतम बुद्ध का नाम सुनते ही महेश ठिठक गया। उसे बचपन में माँ द्वारा सुनाई गई अंगुलिमाल की कहानी स्मरण हो आई।
माँ द्वारा गौतम बुद्ध की अनेक कहानियाँ सुनने के कारण बचपन में महेश की बुद्ध के जीवन में गहरी रुचि जागृत हो गई थी।
महेश को याद आया कि उसके दसवें जन्मदिन पर माँ ने भगवान बुद्ध की एक मूर्ति उपहारस्वरूप देते हुए कहा था,
“इस मूर्ति में भगवान बुद्ध की वरद हस्त मुद्रा करुणा और उदारता की प्रतीक है। तू जब भी कोई बुरा क़दम उठायेगा तो इस मूर्ति के बारे में एक बार सोचना।गौतम बुद्ध का ये हाथ तुझे सदा बुरे कर्म करने से रोकेगा“
परन्तु माँ को खो देने के पश्चात महेश ऐसा कहाँ कर पाया था? उसे नक्सलवाद और माओवाद रोमांचित करने लगे थे और वह धीरे धीरे नक्सलवादजनित आतंक के दलदल में घुसता चला गया था।
आज फिर इस तथागत ने उसका परिचय फिर उसी बचपन वाले महेश से करा दिया। महेश ने अपनी बंदूक़ नीची कर अपने साथियों को सारे बंधकों को छोड़ने का निर्देश दिया।
आज फिर एक तथागत ने एक अंगुलिमाल की जीवन दिशा बदल दी थी।

***

4)
गिरगिट

“ क्यों रे बुधिया, इतना बड़ा पेट लेकर क्यों काम पर चली आती है ? तेरे अब आराम करने के दिन हैं”मालकिन अपनी नौकरानी को प्यार भरी झिड़की दे रहीं थीं।
“सच कहूँ मालकिन, मुझसे भी अब काम नहीं किया जाता….पर क्या करूँ घर में शराबी पति और तीन के पेट मेरे पेट से भी बड़े हैं…बस इसीलिये…मालकिन यदि मुझे दो महीनों की पगार एडवांस मिल जाती तो आपकी बड़ी कृपा होती “
बुधिया की आवाज़ में मजबूरी टपक रही थी।
“यही तो दिक्कत है बुधिया….तुम जैसे लोगों से ज़रा सा प्यार से बोलो तो सिर पर चढ़ जाते हो…तेरा क्या ठिकाना, आगे काम कर भी पायेगी या नहीं….मेरे रुपये डूब जायेंगे या नहीं ?”
मालकिन की आवाज़ में प्यार की जगह तल्ख़ी ने ले ली थी और बुधिया को अपने गाँव का रंग बदलता गिरगिट याद आ रहा था ।

***

लघुकथा-5
भ्रमजाल

स्टेशन पर पहुँचते ही मैंने बेचैनी से चारों ओर नज़रें दौडाईं क्योंकि मेरे पास सामान बहुत अधिक था और ट्रेन छूटने में दस मिनट से भी कम का समय बचा था और प्लेटफ़ार्म बहुत दूर था।
तभी सुरीली आवाज़ मेरे कानों में पड़ी,
“कौन सी ट्रेन है बाबू ? किस प्लेटफ़ार्म पर जाना है? चलिये हम पहुँचा दें “
मैंने पलट कर देखा तो दो अधेड़ उम्र की महिलायें सामान ढोने के ठेले के साथ खड़ी थीं।

“राजधानी है बेंगलोर वाली, प्लेटफ़ार्म बारह से…पर तुम दोनों नहीं पहुँचा पाओगी क्योंकि ट्रेन छूटने में बहुत कम समय बचा है “
मैं थोड़ा बेरुख़ी से बोला।
“अरे हमें मौक़ा तो दो बाबू , जब ट्रेन पर बैठ जाओ तभी पैसे देना“
न जाने क्या सोच कर मैंने सहमति में सिर हिलाया और उन महिलाओं की सहायता से जल्दी जल्दी अपना सामान ठेले पर रखने लगा। सामान रख वे दोनों महिलायें तेज़ी से ठेला खींचने लगीं। उनकी फुर्ती देख कर मैं हैरान था क्योंकि उनके साथ चलने के लिये मुझे लगभग दौड़ना पड़ रहा था। उन दोनों महिलाओं ने मुझे समय पर ट्रेन में पहुँचा दिया था। जब मैं उन्हें पैसे देने लगा तो उनमें से एक महिला बोली,
“फिर किसी औरत से न कहना बेटा कि कोई काम उससे न हो पायेगा…हम औरतें हैं इसलिये लोग हमें काम देने से कतराते हैं…सभी सोचते हैं कि हमसे ज़्यादा मेहनत का काम नहीं हो पायेगा…पर अगर हम ठान लें तो कोई भी काम हमारे लिये असम्भव नहीं…हमारे बच्चों ने हमें बेसहारा छोड़ दिया…भीख माँगने से तो अच्छा है न बेटा कि हम मेहनत करके अपना पेट पालें“

मुझे अपनी पुरुषवादी सोच पर ग्लानि हो रही थी। मैं यह भूल गया था कि औरत पुरुष से शायद शारीरिक बल में कमज़ोर हो पर मानसिक रूप से कहीं अधिक मज़बूत और ताक़तवर होती है ।
अपने ही बुने हुए भ्रमजाल से बाहर आने की सुखद अनुभूति, मेरे चेहरे पर मुस्कान बनकर तैर रही थी।


पाँच लघुकथा

कनक मोहन

लघुकथा-१
बेटियां तो वरदान होती हैं……!!
फोन की घंटी के बजते ही सुचित्रा जो मीठी नींद में सोई हुई थी , हड़बड़ा कर उठ बैठी । सामने दीवार पर लगी घड़ी पर उसकी निगाह पड़ी तो उसके मुंह से अचानक ही निकला ,अरे बाप रे ! सात बज बज गए !!
उसने देखा , फोन नीलू का था , वह मुस्कुरा दी । रविवार को अधिकतर उसकी बेटी नीलू, सुबह-सुबह बेटे के जागने से पहले ही उसे फोन लगा देती थी ताकि मां से ढेर सारी बातें हो सकें फिर तो उसे सारा दिन काम में व्यस्त हो जाना पड़ता था । सुचित्रा भी आज आराम के मूड में थी अतः बेटी से बात करके वह पुनः बिस्तर पर पसर गई और अपनी बेटी नीलू के बारे में सोचने लगी । सच में ,नीलू मुझे एक वरदान के ही रूप में तो मिली है ।
इस बात का एहसास मुझे तब हुआ जब उसका विवाह हो गया। जब तक वह घर में रही तब तक तो स्वयं की ही जिम्मेदारियों में उलझी रही । हालांकि तब भी उसके पास जितना भी समय होता था , वह मेरी मदद करने में पीछे नहीं रहती थी ।
उसके विवाह उपरांत तो मुझे लगा कि मेरी बेटी दूर रहकर भी मेरे और नज़दीक आ गई है । छोटे भाई के विवाह के पश्चात् हमारे प्रति उसकी चिंता और बढ़ गई थी। उसे लगता था कि भाई भी नौकरी के कारण दूर चला गया है,अब मां -पापा घर में बिल्कुल अकेले हो गए हैं।
मुझे या उसके पापा को किस चीज की आवश्यकता है इसका पता उसे हम लोगों से पहले ही चल जाता है ।‌ हम लोगों की तबीयत ज़रा भी ढीली हो तो वह बेचैन हो उठती है और तमाम हिदायतें दे डालतीं है।
छोटे भाई के विवाह के आयोजन की सारी योजनाएं लगभग उसी ने तैयार की थीं।
जब भी वह मायके आती है तो मेरे स्वास्थ्य का अंदाज़ वह मेरे घर के रख-रखाव और मेरे बनाव- श्रृंगार से ही भांप लेती है । वह कहती है, ” मां , इस बार घर पहले की तरह व्यवस्थित नहीं है, तुम तो घर बहुत ही चमकाकर रखती थीं, लगता है तुम्हारी तबीयत कुछ ढीली चल रही है ?
तुम मुझे बताती नहीं हो … तुम्हारी बिछिया कितनी काली हो गई है, बालों पर भी कब से कलर नहीं करवाया है ? मैंने आर्डर कर दिया है, इस बार जरूर लगवा लेना और तुम्हें गर्मी बहुत लगती है , मैंने कुछ हल्के कॉटन कुर्ते भी ऑर्डर करें हैं ,उन्हें पहन कर तुम्हें बहुत अच्छा लगेगा।”
इन सभी बातों के लिए चाहे उसे कितना भी मना करो , डांंट लगाओ लेकिन उसकी दलील होती है, “क्या हुआ जो मैंने कुछ भेज दिया ?आजकल बेटी -बेटे में कोई भेद नहीं माना जाता है।”
कभी-कभी सोचती हूं कि अपने जीवन में इतना व्यस्त होकर भी वह मेरी उन ज़रूरतों का अंदाजा कैसे लगा लेती है जिनका एहसास मुझे भी नहीं हो पाता है। सच में बेटियां ईश्वर की बनाई हुई सबसे सुंदर रचना है!

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लघुकथा-२
लिव-इन रिलेशनशिप ‘
दरवाज़े पर लगातार घंटी घनघनाने की आवाज़ से ही मैं समझ गई कि दरवाज़े पर मेरी बिंदास मित्र, बिन्दु है। मैंने दौड़- कर दरवाज़ा खोल दिया।
दरवाजा खुलते ही उसने अपनी दोनों बाहें मेरे गले में डाल दी और बोली, “क्यों री, तू जा रही है किसी खूंटे से बंधने ? सारी ज़िंदगी दुम हिलाती रहना…!”
मैंने कहा, “तेरा इरादा कब है खूंटे से बंधने का?”
वह बोली, “भाड़ में जाए, मेरी तो जूती भी खूंटे से नहीं बंधेगी! मेरे लिए तो यह “लिव- इन रिलेशनशिप” ही अच्छी है। समझी, मेरी बन्नो! मतलब, मौज- मस्ती, वो भी फुल फ्रीडम के साथ!”
मैं आंखें फाड़े आश्चर्य से उसे ताकती रह गई!

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लघुकथा-३

“कोई बात नहीं ”
बात मेरे से दो साल बड़े भाई की है, उस समय वे भी चार-पांच वर्ष के रहे होंगे। माता जी ने उनको यह सीख दी हुई थी कि प्रातः उठकर सभी बड़ों के चरण- स्पर्श किए जाते हैं और सादर- प्रणाम किया जाता है। मेरे भाई का यह नियम बन गया था कि प्रातः उठकर सभी बड़ों के चरण- स्पर्श कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करना ।
एक दिन की बात है, सुबह सदैव की तरह वे खेल रहे थे कि दरवाज़े पर मेरे घर काम करने वाला भंगी अपने महीने का वेतन मांगने के लिए आया और मेरे भाई ने जैसे ही उसे देखा दौड़कर उसके चरण -स्पर्श करके उसको नमस्कार किया । भंगी अचानक ऐसा व्यवहार देखकर पीछे हट गया !! और बोला “अरे…. बाबू , ऐसा नहीं करते हैं!! “और घर में माता जी को बुलाकर बोला,” बहू जी, भैया ने मेरे पैर छू लिए हैं , आप इनके हाथ साफ करवा दीजिएगा ।” माताजी ने हंसकर बोला कोई बात नहीं है।

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लघुकथा-४
‘बंटवारा’
रमादेवी अपनी शून्य आंखों से कमरे की छत को निहार रही थी । पलंग पर उनका निढाल- सा बदन पड़ा हुआ था । सामने उनके तीनों बेटे कुर्सियों पर बैठे हुए आपस में वार्तालाप कर रहे थे। वार्तालाप कहना गलत होगा; उनके बीच बहस छिड़ी हुई थी! बहस का विषय थीं… मां… !! छोटे दो बेटों का कहना था कि…”मां को चार-चार महीने तीनों बेटों को आपस में बांट कर अपने-अपने पास रखना चाहिए !” लेकिन बहस का कारण यह था- कि रमादेवी के दो बेटे तो यहीं स्वदेश में थे किन्तु बड़ा बेटा बाहर विदेश में बसा हुआ था ! बहस का मुद्दा यहीं से शुरू हो रहा था ।
बड़े बेटे की दलील थी कि,” क्या मैं हर-चार महीने में मां को लेने और छोड़ने आऊंगा?? तुम दोनों ही ६-६ महीने मां को अपने घर रखो !!” परन्तु अन्य दो बेटे , दो-दो महीने का यह अतिरिक्त बोझ उठाने को कतई तैयार नहीं थे ।
अभी तक तो रमादेवी अपने पति के साथ अकेले ही किसी तरीके से जिंदगी गुज़ार रही थीं । अभी पांच महीने पहले ही उनके पति स्वर्ग को सिधार गए थे ,तब से वे अकेली ही घर में रह रही थीं । दुर्भाग्यवश पिछले महीने अचानक रसोई में काम करते-करते उनको चक्कर आ गया और वे गिर पड़ीं !! उनके कूल्हे की हड्डी टूट गई थी । अब इन तीनों भाइयों की मुसीबत यह थी कि मां को इस हालत में अकेले छोड़ते हैं तो समाज में क्या मुंह दिखाएंगे ! अतः वे , मां को आपस में बांटकर रखना चाह रहे थे ।
रमादेवी बेबस सी उनके निर्णय की प्रतीक्षा कर रही थीं । उनको याद है कि बचपन में इन तीनों बच्चों में से किसी एक को भी , यदि कोई एक-दो घंटे के लिए अपने साथ ले जाता था, तो वे तड़प उठती थीं ! उनके तीनों बच्चे उनकी आंखों के सामने हर समय रहने चाहिए थे !!
उनकी वृद्ध -आंखों के किनारों से आंसू बह रहे थे और वे अपनी कोख को धिक्कार…. रही थीं !!

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लघुकथा पांच
बारिश का एक दिन’
लेखिका – कनक मोहन
बारिश के दिन थे। पानी ने रोज़ ही अपना बरसने का नियम , दोपहर करीब डेढ़ -दो बजे के आसपास बना रखा था। आज सुबह से ही आसमान में काले- काले बादल छाए हुए थे लेकिन वर्षा नहीं हो रही थी। मैंने सोचा क्यों ना बाजार जाकर सब्जी- भाजी ले आऊं । मैं सब्जी मार्केट पहुंच गई । सामान लेकर मैं लौटने ही वाली थी कि ज़ोरदार बारिश शुरू हो गई । दिन का कोई डेढ़ बजा होगा। मैं अभी कोई सवारी भी नहीं कर पाई थी ।
बारिश के होते ही ये सवारियां भी तो गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो जाती हैं । मैं कोई पेड़ या कोई बिल्डिंग तलाश रही थी ,जिसके नीचे खड़े होकर बारिश के रुकने का इंतजार कर सकूं । अचानक मेरी निगाह एक विशाल पेड़ पर गई ,वहां पर स्कूल से छूटी हुईं 5-6 छात्राएं खड़ी हुई थीं । घने वृक्ष के कारण वे अभी तक बारिश से बची हुई थीं । लेकिन मूसलाधार बारिश जल्दी ही उनको पानी से सराबोर करने वाली थी। मैं भी भाग कर उसी पेड़ के नीचे जाकर खड़ी हो गई, अचानक मेरी निगाह सामने ठेले वालों पर पड़ी! कई ठेले व खोमचे वाले उन छात्राओं को भूखी निगाहों से ताक रहे थे और आपस में बहुत ही अश्लीलता पूर्वक बातें भी कर रहे थे । वे छात्राएं कुछ समझीं या नहीं समझी , यह तो मुझे नहीं मालूम लेकिन मैंने उनकी भूखी निगाहों को अच्छी तरह से पढ़ लिया था । वे इस मौके की प्रतीक्षा कर रही थीं कि कब ये लड़कियां पूरी तरीके से भीगें और उनकी मंशा पूरी हो । मेरे तन- बदन में आग सी लग गई…. ! मेरा खून खौल उठा!! मैंने जलती निगाहों से उन लोगों को घूरा…. !और एक दीवार की तरह उन सभी छात्राओं के सामने मैं खड़ी हो गईं ; उनसे कहा कि “तुम लोग अपने-अपने स्कूल बैग जो पीठ पर टांगे हुए हो, इनको अपने – अपने सीने से चिपका कर खड़ी हो जाओ!!” छात्राओं ने वैसा ही किया। हालांकि इस प्रयास में , मैं पूरी तरीके से तरबतर हो चुकी थी लेकिन मुझे अपनी चिंता नहीं थी।
धीरे-धीरे बारिश धीमी पड़ने लगी और थोड़ी देर के बाद वह रुक -सी गई । मैंने शीघ्रता से उन छात्राओं के पते- ठिकाने पूछे और उन सभी को रिक्शा या ऑटो करवाकर रवाना किया! तत्पश्चात् मैं भी अपने घर के लिए एक ऑटो पर बैठ गई । मुझे अनुभव हो रहा था कि जैसे मैंने स्वयं की ही बेटी को सही-सलामत घर के लिए भेज दिया हो।
समाज के ऐसे वहशी-दरिन्दों का क्या कोई इलाज है…. ??


पाँच लघुकथा

अनीता मिश्रा सिद्धि
बेली रोड विश्राम निवास, कालीकेत नगर, दाना पुर पटना,

लघुकथा-१
कोड नंबर

“मेरे अपनों की सारी भावनाएं, हृदय के सारे विचार अब क्यों मुझ तक नहीं पहुँचते?” अपने आप से बड़बड़ाते हुए सोहन ने कहा–“जब भी माँ-बाबा बीमार होते थे, मुझे पहले ही बिन बताए खबर हो जाती थी।… जब तुम उदास होती थीं, तो जान जाता था।… आज जब इतनी बड़ी घटना घटी, किसी ने बताया भी नहीं! और… मेरा हृदय भी? ओह, किसके लिए मैं मशीन बन, अपनों से दूर काम करता रहा, जब मेरे अपने ही मुझे भूल गए!!! आखिर क्यों?”

उसी समय अट्टहास करता, मेरा साया ही मुझसे कहने लगा–मशीन बनाते-बनाते तुम भी तो मशीन हो गए! तुम्हारे हृदय के सारे स्पंदन ‘गुप्त कोड’ में बदल गए!!… अब उस कोड का नंबर किसी को मालूम हो, तभी तो तुम तक अपनी बात पहुँचा सकेगा।”*

***
लघुकथा-२
इतनी सी बात
बड़े से होटल के लाँन में एक पार्टी चल रही थी । काफी मंहगी सजावट और बहुत ही कम लोग थे । “” कोरोना ” काल के नियम का पालन हो रहा था । सारे वेटरों के चेहरे मास्क से ढके थे , कोई भी चेहरा ठीक से पहचान में नजर नहीं आ था।
किसी अमीर घर के लड़के की ” विवाह की वर्षगांठ” थी ।
” एक फोटो प्लीज हमारी भी ले लें सोनी ने चहकते हुए कहा “।
” अवश्य मैम” रमेश बोला ।
” तुम्हें तमीज नहीं कैसे खाना सर्व करतें हैं, दूर से ही प्लेट में सब डाल रहे हो, सब्जी की तरी ने मेरे सारे कपड़े खराब कर दिए। इतने महगें सुट की धुलाई क्या तुम्हारा बाप… ”
” पैसे के लालच में बैरे बनकर आ जातें हैं, सोचते हैं फाइव-स्टार होटल जैसा खाना भी मिलेगा और ऊपर से बड़े आदमियों से “टिप्स” भी।”
सारी बातें रमेश सुन रहा था ।
मास्क ढके उस बैरे के आँखों से आँसू छलक पड़े ।
दर्द और अपमान से कान लाल हो रहा था ।
” शहर में अच्छी कंपनी में नई नोकरी लगी थी, पर ” कोरोना ” के चलते मालिक ने सभी को कुछ समय के लिए नोकरी से निकाल दिया है। अब कैसे गाँव जाए और क्या कहे पिताजी से रोहित? एक दोस्त ने सलाह दी, “रोहित आजकल बड़ें लोगों के विवाह में बैरे की जरूरत होती है, अच्छे स्मार्ट लड़को की मांग है। तुम्हें तो अंग्रेजी भी बोलनी आती है, बस खाना-पानी देना होता है। पैसे भी अच्छे मिलतें है। बोलो करोगे ये काम?”
” हां करूंगा।”
रमेश ने पास आकर उस बैरे को देखा, उसके चेहरे से पल भर के लिए मास्क फिसला था।
झट रोहित ने मास्क से चेहरा ढक लिया ।
” मगर रमेश के आँखों ने पहचान लिया उसे।”
” जवाब तो दो, क्या बात है, क्यों किया ये काम किसलिए?”
आखिर क्या मजबूरी ऐसी आई,जो बता भी नहीं सके।”
“छोटी की दहेज और बाबूजी ठीक हो जाए, बस इतने पैसे की जरूरत है। गाली सुनकर भी अगर साँस और आस बच जाए तो गाली भी दुआ से कम नहीं?
दोस्त बस इतनी सी बात है ।”

***
लघुकथा–३
माँ के आने की प्रतीक्षा
पंडाल की रंग-बिरंगी रोशनी, ढाक की थाप और हवा में फैली धूप-धुएँ की सुगंध सबको पुलकित कर रही थी। बच्चे नए कपड़ों में झूम रहे थे, युवक-युवतियाँ सेल्फियाँ ले रहे थे।
पर उसी कोने में बैठा आठ वर्षीय अनिल बुत-सा चुप था। उसके चेहरे पर न हँसी थी, न आँखों में चमक। उसकी माँ अस्पताल में भर्ती थी और घर का वातावरण उदासी से भरा हुआ।
पिता ने कहा था – “बेटा, माँ जल्दी ठीक होगी, बस माँ दुर्गा से प्रार्थना करना।”
पंडाल में देवी की मूर्ति सामने थी ।
अनिल ने धीरे से आँखें मूँदीं और प्रार्थना की— “हे माँ दुर्गा, सबकी रक्षा करती हो, तो मेरी माँ को भी जल्दी घर भेज दो। बिना माँ के यह पूजा अधूरी लग रही है।”
उसकी आँखों से आँसू लुढ़क कर धूल में गिर पड़े। तभी पास बैठी बूढ़ी दादी ने कहा,
“बेटा, यही तो पूजा का असली अर्थ है। माँ सब बच्चों की माँ है। विश्वास रखो, तुम्हारी प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाएगी।”
अनिल के पिता ने आकर बताया कि डॉक्टर ने कहा है – स्वास्थ्य सुधर रहा है, माँ जल्दी लौटेंगी।
उसके चेहरे पर पहली बार मुस्कान उभरी—” मानो सचमुच माँ घर आने वाली हो।”

***
लगुकथा-४
अकेला

राहुल रोज़ अपने कमरे की खिड़की से बाहर झाँकता। लोग हँसते, बातें करते, जीवन जीते — और वह बस देखता रह जाता। चारों ओर शोर था, फिर भी भीतर एक गहरा सन्नाटा।
रातें सबसे कठिन होतीं। जब सब सो जाते घर में केवल घड़ी की टिक-टिक और उसकी खुद की धड़कनें सुनाई देतीं। वह बात करना चाहता, किसी से अपनी उदासी साझा करना चाहता, लेकिन शब्द गले में अटक जाते।
लंबी बीमारी के बाद माँ भी चल बसीं — मन में बस एक अधूरा सपना छोड़ गईं, बहू लाने का।
सामने ही पार्क था। राहुल कुछ देर के लिए वहाँ जा बैठा।
एक छोटी बच्ची ने आकर पूछा —“अंकल, आप उदास क्यों हैं?”
राहुल मुस्कुराकर बोला —“कभी-कभी लगता है, कोई नहीं है जो सच में मेरी सुन सके।”
बच्ची हँसी और चली गई। राहुल भी मुस्कुराया, लेकिन भीतर वही सन्नाटा गूँज रहा था।
तभी फोन बजा।
“हेलो सर…”
“राहुल जी,कल समय से पहले ऑफिस आएँ। जो प्रोजेक्ट आपने तैयार किया था, हमारे सभी सदस्यों को बेहद पसंद आया है। इस पर कार्य आरंभ करना है — मेहनत करनी होगी।”
“जी सर!” — राहुल के स्वर में उत्साह था।
अब अकेलापन नहीं, जिम्मेदारी थी — और उसी में उसे अपनी नई राह मिल गई।

***

लघुकथा-५
अपशकुन

बाजार में सावन की धूम मची थी । हरी चूड़ियों, मेहंदी श्रृंगार के समान से दुकान और मॉल सजे हुए थे ।
“मेधा बाजार नहीं जाना क्या? रितेश के साथ दोनो दुल्हनों को सावन -श्रृंगार भेज दो।”
“जी माँजी ”
मेधा जल्दी से तैयार होकर बाजार की ओर चल पड़ी!बड़ी सी दुकान पर मेधा ने अपनी दोनों दुल्हनों के लिए हरी चूड़ियाँ,बिंदी,चुनरी,साड़ी ढेर सारी चीजें पसन्द कर ली थी ।
“अरे मेधा बहुत दिनों के बाद तुम दिखी। ”
अचानक से यह आवाज सुनकर घबरा उठी मेधा। सामने बचपन की मित्र सुरेखा खड़ी थी।
सुरेखा भी बाजार आई थी! सुरेखा को ऐसी हालत में देखकर मेधा को यकीन नहीं हो रहा था- सफेद साड़ी गुलाब सा चेहरा मुरझाया हुआ।
मेधा ने झट से लिपटकर उसे गले लगा लिया, दोनो सखियों की आंखों से आँसुओं की बरसात होने लगी!
” कब आई सुरेखा और यह सब कैसे हुआ?”
“ब्लड -प्रेशर के मरीज थे सुमित तुम तो जानती ही हो, व्यापार में अचानक से घाटा हो गया!
काफी पैसे बाजार से उधार लिया था उन्होंने!
बाजार के सारे व्यापारी अपना उधार माँगने लगे |
इधर कारोबार भी सुस्त चल रहा था|
सोचते -सोचते इन्हें रात भर नींद नहीं आती |
डॉक्टर ने सलाह दी इन्हें आप अच्छे हॉस्पीटल में भर्ती करवा दे|कुछ दिन इलाज के बाद एक रात अचानक ब्रेन-हेमरेज हो गया! ”
“तुमने पहले बताया नहीं?”
“क्या बताती, अचानक सब हो गया। भाभी ने मन बहलाने के लिए मायके बुला लिया।”
” चलो तुम भी पसन्द करो, दुल्हनों के लिए शृंगार का सामान ले रही हूँ।”
” नहीं, नहीं!अपशकुन होता है एक विधवा स्त्री, सुहागन का श्रृंगार पसन्द करे तो।”
सुरेखा के आंखों में नमी थी।
” ऐसा कुछ भी नहीं होता, तुम्हारे मन का वहम है प्यारी सखी। ”
मेधा ने झट से हरी चुनरी सुरेखा को ओढ़ा दी ”
” कितनी प्यारी लग रही हो”
“इसे ही दे दो आप मेरी दुल्हनों के लिए।”

***

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