
पाँच लघुकथा 
अन्जना मनोज गर्ग
कोटा राजस्थान
लघुकथा-१
नये रंग
उसके पिता यही चाहते थे इसलिये उसने पहले अपने मन को भी पापा के पक्ष में करना चाहा था क्योकिं किसी बात पर एकमत होने के लिये मनों का एक होना भी तो जरूरी है।
एक मल्टी-नेशनल कम्पनी में कार्यरत सौम्या की मम्मी को गुजरे लगभग एक साल होने को आया था। इस एक साल में वह कितना ही याद कर पायी थी मम्मी को,दिन भर अति-व्यस्त शेड्यूल और रात को बिस्तर पर पडते ही नींद।
मम्मी की सारी यादों को मन की दीवार के एक कोने में टांग वह जीवन की आगे की तस्वीरों में खो गयी थी,किन्तु पापा उन्होनें तो अपने मन की पूरी दीवार ही मम्मी के नाम कर दी थी,जिस पर बार-बार वही लिखना, वही मिटाना,यही करते-करते वो दीवार अब काली पड़ने लगी थी। घोर स्याह पडते इस मन से अब पापा का जी घबराने लगा था लेकिन वह कहाँ अनुभव कर पायी थी पापा के मन की इस घबराहट को।
आज पापा ने जैसे ही अपने दूसरे विवाह की बात कही तो सहसा चौंक उठी थी वह।
“अब इस उम्र में?”
“पचपन साल के ही तो हुये है।”
मन तर्क-वितर्क करने लगा।कभी उसके पाले में तो कभी पापा के पाले में।
“समाज क्या कहेगा।”
“समाज तो बस कहने के लिये ही है,उसकी क्या परवाह करना।”
“पापा,ऐसा सोच भी कैसे सकते है? क्या उन्हें मेरा और समाज मे मेरी इज्जत का ध्यान नहीं आया?”
“क्यों नहीं सोच सकते भाई? तुम्हारे लिये ही तो सोचा था अभी तक, आज पहली दफा अपने लिये और अपने मन के सम्मान के लिये सोच रहे है,जिसे वह पिछले एक साल से यादों के हथौडों से रौंदते आ रहे है। उनके जीवन का बहुत कुछ शेष है अभी और फिर! जो नि:शेष हुआ, उसके लिये अपनी शेष जिंदगी को भी राख कर देना…।
अब उसका मन भी पापा के मन की सियाह पडी दीवार को उजला कर उसे नये रंगों से सजाने के लिये उत्साहित हो उठा था।
***
लघुकथा-२
दहलीज की हँसी’
कमरे की दहलीज मुस्करा उठी थी पास बैठी परिधि के यूँ बिलख कर रोने से।
रात के अँधेरे में हँसती हुयी दहलीज की हँसी की मँदम सी रोशनी से भी घबरा गयी थी परिधि। हक्की-बक्की सी हुयी वह रोना आँखों में थाम कर और शब्दों को गले में ही रोक कर कभी दारु में धुत्त औंधे पडे वरुण को देखती थी तो कभी हँसती हुयी कमरे की दहलीज को देखती थी।
पिछले दो महिने से जब से वह वरुण के साथ घर छोड कर भागी थी तब से यह दहलीज ही तो थी जिसके पैंताने बैठ वह रोज रात को रोती हैं, किन्तु इतना सब देखने के बाद भी यह हँस रही है?
‘क्या देख रही हो,परिधि’ दहलीज इतना ही धीरे से बुदबुदायी ताकि वह ही सुन सके और कोई नहीं। रात और उसका फैला अँधेरा भी तमाशबीन ही तो थे उस समय।बाहर फैला अँधेरा तो पुरजोर बराबरी कर रहा था कमरे में फैले अँधेरे से।
परिधि की तरफ से कोई जबाब न पाकर दहलीज फिर धीमे किन्तु कुछ तीखे स्वर में बोली—
‘क्यों अच्छा नहीं लग रहा होगा न तुम्हे तुम्हारे रोने पर भी मेरा यूँ हँसना,लेकिन यह मैनें तुमसे ही तो सीखा है।’
अब परिधि एकदम चौंक उठी थी किन्तु फिर कंपित सी बोली में बोली—–
‘मुझसे, वो कैसे’
हँसना छोड दहलीज अब कुछ याद करते हुये बोली—-
‘याद करो,दो महिने पहले जब तुम अपने पिता के घर से हँसते हुये बेपरवाह होकर आधी रात को वरुण के साथ भागी थी,तब क्या तुमने सोचा था कि तुम अपने माता-पिता की हँसी को हमेशा के लिये उनकी आँखों के अश्रुओं में कैद करके जा रही हो। तुम्हारे जाने के बाद उनकी स्थिति को उनके घर की दहलीज ने जो मेरी सहेली है ने देखा है और मुझे भी बताया——
परिधि की आँखो से गिरती हुयी आँसुओं की धार शान्त अपने अतीत को सुन रही थी।
‘पता है तुम्हें जब से तुम भागी हो तब से उनकी सुबह होना तो बंद ही हो गया है,दुनिया के भय से अब चौबीसों घण्टे बन्द रहने वाले दरवाजे से सूर्य की किरणे प्रवेश करें भी तो कैसे?’—-
‘उस घर की दहलीज कहती है कि पहले कोई अकारण मेरी तरफ देखने की सोच भी नहीं सकता था लेकिन ऐसी मैं अब तुम्हारे भागने के बाद नगरवधू सी हो गयी हूँ। कोई भी आता है और मुझे रौंदते हुये घर में घुसा चला जाता है—–
‘पर मैनें तो प्यार किया था वरुण से’ मानो खुद से भागती-घबराती सी परिधि बोली
‘ओह प्यार किया था’ व्यंग्य से दहलीज मुस्करायी, ‘तभी ये तुम्हार प्यार औंधे मुँह पडा है यहाँ,कितना जानती थी तुम इसके बारें में? अभी साल-छह महिने से न और इतने समय में ही तुम इसे पूरा जान गयी,वाह!
‘जिनके साथ तुम पूरे बीस साल रही,उनके मन को तनिक न पढ पायी और इस पर इतना विश्वास कि अपनी पूरी जिंदगी इसके नाम कर दी और माता-पिता के बीस साल के स्नेह पर इतना अविश्वास कि उनके पूरे जीवन को अपमान के गहरे गड्डे में धकेल दिया —-
जो तुम्हें परी-परी कहते थकते न थे,उन माता पिता को तुम राक्षसी दंश देकर चली आयी इस राक्षस के पीछे—
‘खैर पिता के मन की दहलीज तो तुमने उसी समय पार कर ली थी जब वरुण के साथ भागने का प्लान बनाया था। तुमने अपना सुख,अपनी हँसी ही देखी न घर से भागने में और तुम यह भी अच्छी तरह जानती थी कि मेरा इस तरह भागना मेरे मम्मी-पापा को खून के आँसू रुलायेगा फिर भी तुम भागी ही न तो बस यही कारण था मेरा हँसने का।’
हाँफती हुयी दहलीज अब धीरे-धीरे शान्त होने की कोशिश कर रही थी और परिधि पश्चाताप के गहरे समुद्र में ऊब-डूब हो रही थी।
***
लघुकथा-३
“समय की सोच”
कॉलोनी में झाडू लगाती हुयी मेहतरानी इमरती ने पेट से पूरनमासा अपनी बहू रज्जो को अब भी अपने साथ काम पर लाना नहीं छोडा था| आज भी इमरती रज्जो को साथ लेकर ही आयी थी कॉलोनी में झाडू लगाने|
सामने बने आलीशान मकान में सुमन आंटी की बहू भी पूरनमासा चल रही थी| सुमन आंटी ऐसी कट्टर कि इमरती को अपने फाटक तक से हाथ न लगाने देती थी और जब भी कुछ देना होता था इमरती को तो वह वस्तु अपने हाथ इतने ऊपर करके देती थी कि चाहे वह चीज नीचे गिर भले ही जाये, पर उनका हाथ स्पर्श न हो जाये इमरती की हथेली से|
झाडू लगाते-लगाते रज्जो को सहसा प्रसव-पीडा शुरू हो गयी थी| वह कराहती हुयी वहीं सुमन-आंटी के घर के बाहर बैठ गयी| तडपती हुयी रज्जो को अस्पताल ले जाने के लिये इमरती ने कॉलोनी में सभी से कहा किन्तु सभी इधर-उधर देखकर अगल-वगल हो लिये, किसी ने कोई सहायता नही की|
उधर मकान के अन्दर सुमनआंटी की बहू के भी प्रसव-पीडा प्रारम्भ हो गयी थी| सुमन आंटी के बेटे ने तुरन्त गाडी निकाली, सुमन आंटी ने कराहती अपनी बहू को उसमें बिठाया और खुद बैठने वाली ही थी कि उनकी नजर सडक पर कराहती,तडपती रज्जो पर पडी,साथ ही उसे सहलाती इमरती की आँखों की वेदना-मिश्रित मूक याचना को भी उन्होंने देखा|
सुमन आंटी ने झटपट रज्जो को सहारा देकर उठाया और उसे अपनी बहू के साथ बिठा कर आप भी इमरती को साथ ले गाडी में जा बैठी|
कुछ घण्टों बाद अस्पताल में रज्जो और सुमन आंटी की बहू अगल-बगल के बिस्तरों पर लेटी थी| उनके पास बैठी सुमन आंटी और इमरती के हाथों में अपने-अपने शिशु थे|
इमरती बेहद कृतज्ञ थी सुमन आंटी के प्रति| बोली,”आज यदि आप नही होती तो पता नहीं क्या होता| कॉलोनी में सभी का रूखा व्यवहार देख कर मैनें तो आपसे भी आशा छोड दी थी| किन्तु आपने तो…|”
बीच में ही मुस्करा कर सुमन आंटी बोली,”देख इमरती,उस समय न मैनें तुमको देखा,न तुम्हारी जात देखी, उस समय तो मुझे बस आने वाले उस नन्हें शिशु का जीवन दिख रहा था जो इस जाँत-पाँत के आसमाँ से बिल्कुल परे था|खैर, कल से तुम वही इमरती हो और मैं वही सुमन आंटी| ठीक है न|”
सुन कर सुमन आंटी के साथ इमरती भी हौले से मुस्करायी ।
***
लघुकथा-४
‘साँझ में भोर का सूर्य’
आज शीला को उदास देख कांता उसके कंधो हाथ पर रख कर बोली…
“क्या हुआ बहन,आज इतनी सुस्त क्यों हो।“
“वो पुराने दिन आ गए कांता बहन, जब हम-तुम दोनों पड़ोसने अपनी-अपनी गृहस्थी में अपने-अपने पति ओर बाल-बच्चों सहित बहुत सुखद जीवन जीते थे,और आज देखो कैसा अकेलापन है दोनों के जीवन में, ये किराए का मकान है और केवल हम दोनों है”भरभराई सी आवाज में शीला बोली।
“अरे याद ही क्यूँ करती हो उन दिनो को शीला,अच्छा एक बात तो बताओ’
“हाँ, कहो”
“हमारे दोनों के पति जब इस दुनिया मे नहीं रहे, तब क्या तुम अपने बेटा-बहू के साथ उस घर मे खुश थी, मै तो बिलकुल खुश नहीं रही।“
“हाँ कांता बहन,मैं भी उस घर मे उनके जाने के बाद कभी सुकून से नहीं रही,कभी समय पर खाने के लिए तरस जाती थी तो कभी दो मीठे बोलों के लिए मन तरस जाता था। जीवन रूखे झाड सा हो गया था और बेटे-बहू तो इंतजार कर ही कर रहे थे इस झाड के गिरने का।“
बेहद थकी,किन्तु अब कुछ ठहरी-सी आवाज में शीला बोली।
“याद करो वो दिन, जब पड़ोस मे रहने वाली हम दोनों सखियों ने अपने घरों मे अपना हाल देख कर अलग कमरा लेकर साथ रहने की सोची और ये बात जब अपने-अपने बेटो को बताई तब उन्होने भी अपनी मौन स्वीकृति दे दी थी। आज यह कमरा छोटा जरूर है, पर हम दोनों की भावनाओं ओर हुनर से गुलजार है। वहाँ बहुत बड़ा घर ओर बहुत लोग होते हुए भीं हम दोनों निपट अकेले पड़ गए थे।“कांता शायद शीला के साथ खुद भी संबल दे रही थी।
हुनर की बात सुन शीला झट से बोई उठी —-
“हाँ कांता बहन,मैंने रसोई का और तुमने कशीदाकारी का जो हुनर बचपन से पाया था और जिसकी अभी तक किसी की नजर में कोई कदर नहीं थी,वही हुनर आज हमारे जीवन को सजा रहा है।“
“तो बहन निराशा किस बात की,जिस आत्मनिर्भरता की हम पूरी ज़िंदगी बात ही करते रहते थे कि काश हम भी कमाने वाले होते तो आज वही तो हैं हम “आत्मनिर्भर।” अपने आस-पास की महिलाओं और लड़कियों को ये कला सिखाने के कारण आज इन सब लोगों में हम-दोनों का सम्मान भी है और कमाने का जरिया भी,अभी तक दूसरों के लिए जी रहे थे शीला बहन,अब अपने लिए भी जी लेते हैं क्यों सही कह रही हूँ ना,अभी न जाने कितना चलना बाकी है।“वाणी के उतार-चढ़ाव के साथ कांता जी बोली।
“लेकिन जीवन की ये साँझ…”
“अरे शीला बहन,ये अपनी उम्र की साँझ अबश्य है पर हमारे जीवन की नहीं। यह तो हमारे जीवन की भोर है जिसमें आत्मनिर्भरता के हमारे सूरज का उदय हुआ है।“
कहकर खुद भी विह्वल सी हुई कांता बहन शीला बहन को गले लगाने लगी।
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लघुकथा-५
पुनरावृत्ति
आज सोमेश के पिता का श्राद्ध था।कहते हैं श्राद्ध के इन पन्द्रह दिनों में सभी पितर एकत्रित होकर पृथ्वीलोक में रहने आते हैं।
सो पितर रूप में सोमेश के पापा देख रहे थे कि आज सुबह से ही सोमेश और उसकी बहू रीमा दौड-दौड कर काम कर रहे थे। रसोई को पूरी तरह साफ करके खाने में उनके पसंद की सभी चीजें बनवायी गयी थी।
ब्राह्मण को न्योता दे दिया गया था और सबसे आश्चर्य की बात थी जो सोमेश के पापा देख रहे थे वह थी रीमा का नहाधो कर रसोई में घुसना जिसके कारण जब वो जिन्दा थे तब कई बार घर में कलह भी हो जाती थी।
पितर रूप में ही साथ में बैठी अपनी पत्नी से सोमेश के पिता बोले—–
‘देख रही हो न,जब हम जीवित थे तब तो बहू एक दिन नहा कर रसोई में नहीं गयी और आज अब मैं और तुम देखने वाले नहीं है,तब यह नहा कर सारे काम कर रही है और सोमेश को देखो तो अब सारे पकवान मेरी पसन्द के बनवा रहा है लेकिन जब मैं था तब कहने के बाबजूद भी ध्यान नहीं देता था,वाह रे,जब थे, तब कुछ नहीं और अब नहीं हैं, तब सब कुछ।’
सोमेश के पिता का यह दुख सुन पास बैठे सोमेश के दादाजी गम्भीर स्वर में धीरे से बुदबुदाये—–
“यही तो मानवीय जीवन की अनन्त पुनरावृत्ति है।”

पाँच लघुकथा. 
तेज बीर सिंह सधर
दस्युआ होशियारपुर
लघुकथा-१
रेडिओ
रेडिओ : एक लघुकथा।
वह रेडियो जैसी थी. जब भी घर आती पूरे मोहल्ले की ख़बर मुफ्त में सुना जाती. एकदम बिना रुके, उसकी जुबान कैंची की तरह थी. जुबान के बाहर दो होंठ एक दम खूनी लाल रंग में पुते हुए सुनने वाले की आँखों में जादू कर देते. मुझसे तो कम लेकिन गुलनार से ज्यादा बातें करती वह. यह अलग बात थी कि सुनने वाला तो फिर, कब, क्या या अच्छा ही बोल पाता.
आज जब वह आयी तो मैं घर पर अकेला ही था. “भाभी घर पर हैं ?” उसने पूछा तो मैंने भी एक सवाल दाग दिया, “गुलनार नहीं होगी तो अन्दर नहीं आओगी ?” वह छुई मुई सी शरमा गई. अपनी स्कूटी को ताला लगा कर मेन गेट की कुण्डी लगा कर वह अंदर आ गई बिना किसी भय के. आज उसने मोहल्ले की बातें नहीं की. मेरी किताबों की आलमारी के पास खड़ी किताबों को उलटने पलटने लगी. उसने इस्मत चुगताई, मंटो, पीयूस मिश्रा, बलवंत सिंह, अमृता प्रीतम और बहुत से लेखकों की बातें की. मेरी लिखी दोनों किताबों की भी.
उसके अकेले मेरे साथ होने के बावजूद भी पाप का एक कतरा भी मुझे छू नहीं पा रहा था. चाय या काफी पूछने पर उसने पहले तो ‘न’ कहा फिर किताबों को छोड़ कर चाय बनाने लग पड़ी.
“फ्रिज में जो गिलास में दूध पड़ा है वही लेना. पतीले वाले दूध को मत छूना.” मेरे इतना कहते ही जैसे उसको बिजली का झटका लगा हो.
“ओह ! मैनें तो गैस पर दूध रखा था.” एक झटके में उसने गैस बंद की और बालों में गुथी हुई परांदी को लहराते हुए स्कूटी चालू कर निकल गई. ऐसी थी वह रेडियो!
***
लघुकथा-२
माँ
ज़िन्दगी में सब कुछ हासिल कर लेने के बाद भी उम्र एक वक़्त खूँटी पर टंगे कपड़ों सी लगने लगती है. टंगे हैं तो पहने जाने को तैयार और अगर पहने जा चुके हैं तो फिर से धुल कर खूंटी पर टंगे जाने को बेताब. यानी उम्र है तो कभी दौड़ती बुढ़िया सी, कभी बिस्तर पर आखरी सांसें लेती सी. बचे हुए उम्र के यही पल घड़ी की टिक टिक से दिल की धड़कन के साथ ताल से ताल मिलायेंगे ही.
माँ की उम्र भी खूंटी पर टंगे कपड़ों जैसी हो गई है. “कितने दिन और लेटी रहूँगी इस बिस्तर पर ? जहर की पुड़िया ही दे देते. किसको पता चलेगा ?” माँ दर्द से कराहते हुए अपनी एक सौ तीन साल की उम्र से छुटकारा चाहती है. शायद उसे बुढ़ापे और कमजोरी ने परेशान कर दिया है. कमाल तो यह है की इस उम्र में भी माँ देख लेती है और अपनी साँसों को अच्छी तरह महसूस करती है.
माँ मेरे और मेरे बड़े भाई के पोतों पोतियों को भी पहचान लेती है. यह अलग बात है कि घर में ढेर सारे बच्चों की चिल्ल पों से कभी कभी परेशान भी हो जाती है. उस वक़्त हम उसके कानों में पलग लगा देते हैं. मतलब वह सुन भी लेती है. माँ गुड़ की बहुत शौक़ीन है और इतना जानती है गुड़ गोरे के बेलन से ही आना चाहिए, हाईवे वाले बेलन से नहीं- जहाँ मिलावट और केमिकल डाला जाता है.
माँ अब पूजाघर में अगरबत्ती करने भी नहीं जा पाती. लेकिन जिस दिन अगरबत्ती की ख़ुशबू में फर्क हो वह बिस्तर पर लेटे लेटे ही मेरी पत्नी को पूछ लेती है, “आज की अगरबत्ती कल वाली से अलग है न ?” जवाब में मैं अपनी सफ़ेद लम्बी दाढ़ी पर हाथ फेरते कई बार कह चुका हूँ- “हांजी बेबे.” मेरी घरवाली कम बोलती है.
कुल मिलाकर माँ का दिल, कान, जुबान, स्वाद और नज़र उम्र के हिसाब से बहुत अच्छे चल रहे हैं. बस शरीर में ताकत नहीं रही कि वह बिस्तर से उठ सके.
इन सब के समानांतर उसके सामने लगी दीवार घड़ी भी अपना काम बखूबी कर रही है. टिक……टिक…..टिक….. लेकिन ज़हर की पुड़िया मांगती माँ कभी अपने दिनों में इतनी कमजोर नहीं दिखी थी मुझे. माँ को अच्छी तरह से रजाई में ढकते हुए मैंने दीवार घड़ी की तरफ डरते हुए देखा. ‘कहीं सूईयाँ रुक न जायें !’
टिक…..टिक…..टिक…..
रात होते ही आसमान में बिजली चमकने लगी. बादलों के टकराने की आवाजें तेज होने लगी. आँगन में ओले गिरने की आवाज को माँ ने सुनते हुए मुझे इशारा किया. मैनें आँगन में जायजा लिया तो देखा- आँगन ओलों से भरा हुआ था. अँधेरे में चमकते हुए – टपके महुए जैसे.
मुझे बचपन का वह दिन याद आया जब एक रात ऐसा ही मंज़र था. मैं बुखार से तप रहा था. माँ मुझे रजाई में छिपा लेने की कोशिश कर रही थी. मेरा सिर दर्द से फटा जा रहा था. बापू दवा लेने पड़ोस में वज़ीर सिंह के घर गए हुए थे. कुछ ही देर में बिजली चमकने और फिर नजदीक ही गिरने की आवाज आयी थी. बारिश के रुकने के बाद आधी रात को घर में माँ और बड़ी बेबे की रोने की तेज आवाजें आने लगी थीं.
“यहाँ इधर लेटाओ.” कोई कह रहा था. बड़ी देर बाद मुझे समझ आया था कि बापू बिजली गिरने से जल गए थे. उनके काले पड़े मृत शरीर से लिपट कर माँ बिलख रही थी. घर में मेरे सामने पहली बार कोई मरा था.
और अब आज का दिन है माँ साठ साल बाद बिस्तर पर पड़ी है और मैं दरवाजे से ही चमकती बिजली और ओलों को देख रहा हूँ. तब से ही माँ ने कभी बारिश में हम दोनों भाईयों को बाहर निकलने नहीं दिया, न ही किसी और पारिवारिक सदस्य को. दीवार घड़ी अब भी अपने चलने का सबूत दे रही है. टिक……टिक…..टिक…… माँ ने मेरे फिर उसके पास आने पर मुझे छू कर देखा है. मैं जिन्दा था.
अब मुझे पता नहीं क्यों बहुत डर लगने लगा है घड़ी से. मेरी यह आदत हो गई है कि मैं जब भी घर में होता हूँ घड़ी की टिक टिक से मेरे कान नहीं हटते. मैंने अपना बिस्तर भी माँ के बगल में उस कमरे में ही लगा रखा है. मेरी घरवाली दूसरे कमरे में सोती है. उसे नाहक क्यों परेशान करूं ? जब कभी मैं किसी काम से बाहर होता हूँ तो मेरा फ़र्ज़ मेरी घरवाली रज्जी निभाती है. उसकी जेठानी और मेरा भाई दोनों अब इस दुनिया में नहीं हैं.
टिक टिक के बीच मेरी आँख कब लग गई मुझे पता ही नहीं चला. सुबह उठते ही मेरी आँखों के सामने माँ होनी चाहिए – जिसका दिल धड़कता हुआ हो – यह मेरी पहली सोच होती है.
गुरुद्वारे से कीर्तनियों की मधुर आवाज आ रही है- ‘जित्थे जाये बसे मेरा सतगुरु… वो थान सुहावा राम राजे…..’ जी धन्य हो गया है. माँ को रज्जी के पास छोड़कर मैंने स्नान किया और तेज चलता हुआ आज फिर ईश्वर को धन्यवाद कर आया हूँ. हलकी ठण्ड के बीच कीचड़ से गुजरते हुए मुझे बहुत डर लगा है.
दोपहर तक माँ कुछ खा पी नहीं रही थी. ‘मुझे …..भूख नहीं है. तेरा बापू खड़ा दिख रहा है.’ माँ की बात सुन कर मैं डर गया हूँ. घड़ी अभी भी टिक टिक बजा रही थी. मैं दो मिनट के लिए रसोई में गया. “रज्जी ! जरा जल्दी से मसूर की दाल बना पतली जेही. माँ को चम्मच से पिलाऊंगा.” रज्जी डिब्बे से दाल ढूँढने लगी. वापस माँ के कमरे में घुसते ही मेरी नज़र माँ और दीवार घड़ी पर पड़ी है.
घड़ी शांत है. कोई टिक टिक नहीं. माँ की आँखें खुली हुई हैं. बेहद शांत माँ छत की तरफ देख रही है. “मेरी माँ चली गई.” सुनते ही रज्जी के हाथ से कूकर जमीन पर गिर गया।
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लघुकथा-३
रेलवे बेंच
लाहौरी गाड़ी से उतरते ही बारिश का जो मंजर देखा उसने नानी याद करा दी. लाहौरी एक नम्बर प्लेटफोर्म पर आई थी लेकिन उतरना ऐसे पड़ा जैसे पाँव भारी वाली कोई संभ्रांत स्त्री उतर रही हों. संभ्रांत इस लिए क्योंकि एसी से सफ़र कर अपने आप को हाई क्लास समझने का दंभ था अपने अन्दर.
बारिश में बस अड्डे जाना मुश्किल था क्योंकि बस अड्डा दूर था और फिसल कर या रपट कर गिरने का डर था. वह वाली उम्र भी नहीं कि दोनों अपने ट्राली व्हील वाले ब्रीफ केस फेंक कर गाने लगें – ‘आज रपट जाएं तो हमें न उठयियो.’
एक बेंच थोड़ी खाली मिली. एक पान जैसे मुँह वाली मोटी महिला एक तरफ बैठी थी और दूसरी तरफ उसका कोई साथी. बीच में जगह खाली थी. मगर स्टेशन की छत टपक रही थी. वह पचास साल की टेढ़ी मेढ़ी महिला एक तरफ खिसक गई और ‘मिल बाँट कर बैठने की दावत दे गई.’ हम टपकते में ही हिलते डुलते दोनों बैठ गए क्योंकि बारिश के कारण लगता था सारा शहर स्टेशन में घुस आया था. जगह जगह भिखारी और गरीब लोग बरसातों की लक्जरी का आनन्द लेते सोये हुए लग रहे थे.
ये यात्री गाड़ी का पता करने चली गयीं. इस बीच मैं भी जगह सुरक्षित करने के लिए चौड़ा हो गया. महिला भी मेरी तरफ मुखातिब होकर बांडिंग करने को तैयार हो गयी.
“कहाँ से आये हो ? कहाँ जाना है.” मुझे वो बोली तो मैनें अपनी पत्नी का सेर भर का हैण्ड बैग कस कर थाम लिया. मुझे लगा कि कुछ भी हो सकता है. इस दौरान उसके साथ वाला आदमी कभी उठता और बगल में भीड़ भरे रेस्ट रूम में झाँकता. मेरा एंटीना एक दम खड़ा हो गया. “हम माता के दर्शन करने जाते हैं हर हफ्ते. आज भी जाना है. आरती के समय रात आठ बजे से दस बजे रहते हैं और सुबह बस पकड़ फिर वापस आ जाते हैं.” वह फटे हाल स्त्री हर हफ्ते अस्सी किलोमीटर आने और जाने की यात्रा की बात कर रही थी. उसके पहले कि वह मेरे और करीब आकर बोलते हुए अपने थूक के छींटे मेरे मुँह पर मारे मैं पीछे को हटा.
शायद उसका कहने का मतलब था कि अगर हम चाहें तो वह हमारा पैसा भी वहां माता की पेटी में डाल सकती है. इस मामले में मैं अब काफी सावधान रहता हूँ. बहुत बार ऐसे तीर्थ यात्रियों को दिया लेकिन किसी भगवान् ने मुझे कुछ ख़ास नहीं दिया. जब वह माता रानी के दर्शन की बात सुनाते सुनाते थक गई तो साथ वाले से बोली ‘चलो चलें.’ मैंने घर वाली का भारी पर्स कस कर पकड़ लिया. ये भी आकर मेरे साथ बीच में बैठ गयीं.
दाल न गलती देख वह उठ कर टाटा नगर एक्स्प्रेस की भीड़ में खो गई. साथ वाला आदमी उठ कर रेस्ट रूम के अन्दर चला गया. हम दोनों अगली गाड़ी की बातें करने लगे जो पठानकोट से आकर वापस उसी रास्ते पर हमारे गंतव्य की तरफ देर में जाने वाली थी.
तभी रेस्ट रूम के अन्दर से एक महिला भागती हुई आई – “मेरा पर्स कोई ले गया. मैं सो रही थी.” मेरी श्रीमती जी ने भी अपना पर्स कस कर पकड़ लिया.
वे दोनों कहीं नहीं दिखे !
***
लघुकथा-४
स्वयंसिद्धा
प्रकाश से तेज चलने वाले मन की मालकिन हैं वो.
उससे मेरी मुलाक़ात बनारस के एक घाट पर एकांत में बैठ गंगा की लहरों को देखते हुए हुई. उम्र यही कोई सत्तर के पास रही होगी लेकिन उनके शांत गहरे सांवले मुख को देखकर लगा जैसे वह अभी भी बलिष्ट और तनावरहित रहती होगी. उनको देखने मात्र से मैं उनके व्यक्तित्व को समझ नहीं सकता था.
“मैं बैठ जाऊँ यहाँ ?” उसके पैरों से टकराकर गंगा भी आत्मविभोर हो रही होगी. मैनें सोचा और उनकी अनुमति लेकर उनके पास अपनी चप्पलें उतारकर बैठ गया. साधारण से परिचय के बाद मैनें बात को आगे बढ़ाते हुए पूछा – “कितना मनोरम है गंगा का यूँ बहना !” उन्होनें बिना मेरी तरफ देखे कहा – “है तो भैय्या. लेकिन सोचिये न यह गंगा पहाड़ों से निकल कर जमीन पर कितने ख़तरे उठाती हुई सागर में मिल जाती है ?” मुझे लगा वे कुछ और भी कहना चाहती हैं. शायद गंगा को देखते वे अपने जीवन के बारे में सोच रही थीं. उन्होनें मुझे निःशब्द कर दिया था. कभी कभी अकेला इंसान मुखर होने के लिए किसी का साथ चाहता है.
“इस संसार में आने के के बाद हमारे सामने बहुत सी चुनौतियाँ होती हैं जिनके लिए आप स्वयं दोषी नहीं होते. गंगा को ही देख लीजिये. अगर वह पानी की जगह वाष्प रूप में ही होती और उसे स्वयं को उसी रूप में रखने की चुनौती होती तो क्या आज हम उसे देख या छू सकते ? नहीं ना !” मैं अब भी निःशब्द था.
“हर व्यक्ति के जीवन में कुछ चुनौतियाँ होती हैं. किसी के कम और किसी के ज्यादा. कोई पार पा लेता है और कोई टूटकर बिखर जाता है. गंगा अपनी चुनौतियों से पार पा गई और विशाल सागर में मिल गयी.” मैं इस बार उनसे बहुत प्रभावित हुआ. इस वार्तालाप के बाद वो अपने गहरे सांवले हाथों और पैरों को निहारने लगीं. मुझे उनके जीवन की चुनौतियों का आभास हो गया.
मुझे समझ आ गया था कि उनके जीवन की चुनौती क्या थी. गहरे सांवले रंग के बावजूद भी उनके विचार मुझे बहुत प्रभावित कर गए थे. पिछले डेढ़ सालों से मैं फोन के माध्यम से अपनी चुनौतियों का समाधान उनसे हासिल करता रहता हूँ. वाह बहना !
***
लघुकथा-५
ढेरियाँ
सरदारी लाल ने हिन्दुस्तान का बंटवारा देखा था और उसे सर माथे लगा लिया था. खून ख़राबे से भरे बंटवारे ने इसे बहुत कुछ सिखा दिया था इसीलिए उसने अपने और आशारानी के रहते अपनी बारह किल्ले की जमीन की दो ढेरियाँ कर अपने बेटे आत्मा सिंह और दर्शन लाल को बाँट दी थीं. दर्शनलाल का एक बेटा ख़ुशी से सिंह सज गया था जिसपर सरदारी लाल के परिवार को नाज़ था.
सरदारी लाल ने हिन्दुस्तान के बंटवारे से इंडिया आकर ब्यास रेल स्टेशन के दक्षिण में बारह किल्ले जमीन खरीदी थी और वहीँ बस गया था. बाद में दोनों बेटों की शादियाँ कर खेतों में ही रहने लगा था. ब्यास बगल में ही बहती थी लेकिन बहुत शांत थी.
जब सरदारी लाल ने अपनी जमीन का बटवारा किया था तो सब कुछ ठीक ठाक चला लेकिन ब्यास में १९८८ में जो पानी का उबाल आया उसमें दर्शन लाल की जमीन के कुछ हिस्से को बाढ़ खा गयी और बिना सोचे समझे उसने अपने भाई आत्मा सिंह साथ थाना पुलिस और कोर्ट कचहरी का खेल शुरू कर दिया. ‘जमीन फिर से बांटी जाये.’ इस मुकद्दमे में दोनों भाईयों को एक दूसरे का दुश्मन बना दिया. इस सब से दुखी सरदारी लाल और उसकी बीवी ने एक एक कर अपने प्राण त्याग दिए. आत्मा सिंह और दर्शन लाल दोनों बहुत बूढ़े हो गए और आत्मा के बेटों के खून समय के साथ और गर्म हो गए. आत्मा सिंह के दो बेटे थे और दर्शन लाल की तीन बेटियां जो बयाह की उम्र में पहुँच रही थीं.
उम्र के अंतिम पड़ाव में राखी के अगले दिन आत्मा सिंह का ज़मीर जाग उठा वह दर्शन लाल की दहलीज पर पहुंचा और बोला – ‘दर्शन तैयार हो जा और चल मेरे साथ. कोर्ट चलना है.’
“दर्शन ! कितने साल हो गए हमें मुकद्दमे लड़ते हुए. कुछ भी हासिल नहीं हुआ. हम एक दूसरे से मुकद्दमे लड़ते रहे. क्या यह मुकद्दमे ब्यास नदी पर नहीं होने चाहिए थे जो हमारी जमीन को खा गई ?”
शाम को दोनों भाई ढेर सारी गर्मागर्म जलेबियों के साथ एक संयुक्त परिवार में बैठे थे. दर्शन की बेटियां आत्मा के बेटों को राखी बाँध रही थीं.
दूर रेलवे पुल पर वन्दे भारत दौड़ रही थी.

पाँच लघुकथा 
संगीता सेठी
लघुकथा-१
घर-खर्च
पड़ौस की नीलम सुबह-सुबह दरवाजे पर खड़ी थी । दरवाज़ा खोला तो अपनी बैंक की पासबुक के साथ 100 के 20 नोट पकड़ाते हुए कहा-“ भाभी ! ये भैया को दे देना । बैंक में जमा करवा देंगे । घर मे रहेंगे तो खर्च ही हो जायेंगे । ” पीछे मुड़ते हुए बोली-“ पिताजी को मत बताना और पासबुक भी आप ही रख लेना , मैं फिर कभी आकर ले जाऊँगी । ” उसका इशारा अपने ससुर जी पर था ।
वंदना ने दरवाजे पर खड़ी नीलम से बैंक पासबुक और पैसे लेकर अपने पति को सौंप दिये जो बैंक मे कार्यरत हैं । सोचती रही कि नीलम ने सही ही कहा कि घर में तो खर्च ही हो जाते हैं । कितनी मुश्किल से कमाती है नीलम । पति तो शराबी ठहरा । अगले ही दिन नीलम के ससुर जी दरवाजे पर खड़े थे । हाथ में बीमा की रसीद और पूरे चार हज़ार दो सौ पैंसठ रुपये…पाँच का सिक्का अलग हाथ में पकड़े हुए । मुझसे बोले – “ यह पोती के नाम से पॉलिसी का प्रीमियम जमा करवा देना ली है । ” पिताजी जानते हैं कि वंदना बीमा कम्पनी में काम करती हूँ । वंदना रसीद देखकर तारीख देखी तो बोली ” अभी तो इसमें पूरे बीस दिन बाकी हैं । एक महीने की पूरी छूट मिलती है जमा करवाने में ”
वो बोले – “ घर में तो खर्च ही हो जाएंगे । सोचता हूँ नीलम की कुछ मदद ही कर दूँ । इसलिये पेंन्शन मिलते ही ज़रूरी खर्च पहले ही ज़मा कर देता हूँ । ” ना जाने कौनसा सपना देखा रहे थे पिताजी और वंदना लौटते हुए पिताजी की पीठ पर घर-खर्च की परिभाषा ढूंढने की कोशिश कर रही थी ।
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लघुकथा-२
#पहचान#
“बीबी जी ! कल नहीं आऊँगी काम करने…आधार कार्ड बनवाने जाना है । ”प्रिया की बाई बिंदे ने कहा तो उसे याद आया कि विक्रम भी तो उसे कितने दिनों से याद करवा रहा है कि कॉलेज से निकल कर आधार कार्ड बनवा लो पर उसे तो फुर्सत ही कहाँ ।
वोट डालने का दिन भी आ गया था । आधार कार्ड के बिना इस बार वोट नहीं डालने देंगे । “ अरे मुझे कौन नहीं डालने देगा वोट ” प्रिया ने सोचा । वो कॉलेज की विख्यात लेक्चरर है । उसके पति विकास शहर के एस.पी. हैं । बरसों से इस शहर में रह रही है ” सोचते हुए प्रिया ने अपनी गरदन को झटका दिया । वोटिंग लाइन में प्रिया खड़ी ही थी कि बिंदे उसके पीछे आकर खड़ी हो ग़ई । उसके हाथ में चमचमाता आधार कार्ड था । तिरंगी लाइनों से सजा कार्ड प्रिया को आकर्षित कर रहा था । पर उसके हाथ में तो वार्ड की पर्ची के अलावा कोई भी पह्चान पत्र नहीं था ।
“ बीबी जी ! इसके बिना तो हमारी कहीं पहचान नहीं होती । ” बिंदे ने अपना आधार कार्ड लहराया तो प्रिया ने उपेक्षा से देखा । वोट डालने वालों की लाइन आगे बढ रही थी । सिपाही ने प्रिया को रोक कर आधार कार्ड पूछा । तब तक बिंदे को वोट डालने के लिए अंदर जाने के लिये दिया । प्रिया सिपाही से अपनी पहचान के लिये उलझती रही तब तक बिंदे अपनी अंगुली पर निशान लगा कर इतराते हुए निकल गई।
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लघुकथा-३
ये कैसा विकास ?
मंजरी ऑफिस से निकलते ही रोज़ ताज़ी सब्ज़ी ,दूध और फल के लिये उस चौराहे पर रुकती है । चौराहे पर बनी पाँच-छ: गुमटियों पर रोज़मर्रा का सामान भी मिल जाता है ।
ओह ! आज तो सारी सड़क ही खोद दी थी । सुना है नए मुख्यमंत्री शहर का जल्द से विकास करना चाहते हैं । मंजरी ने स्कूटर घुमा कर दांयी तरफ ले लिया ताकि चौराहे पर बनी गुमटियों पर पहुँच सके ।
पर ये क्या ? एक भी गुमटी नहीं थी वहाँ । सब धराशाही । चौराहे का सौंदर्यीकरण शहर का विकास…आधुनिकीकरण…ना जाने क्या-क्या परिभाषाएँ देखी थी आज अखबार में । पर वो गुमटी वाले…..वो सब्ज़ी वाले रामू काका….वो दूध वाले श्याम हलवाई….वो फल वाले सिद्दकी मामू…सब कहाँ ग़ए ।
मंजरी ने स्कूटर से उतर कर अपना चश्मा उतारा….नज़र घुमाई….। “ आलू है…भिंडी है….टमाटर है….प्याज़ है…..” एक हाक सुनाई दे रही थी । दूर रामू काका के सिर पर रखी टोकरी से सब्ज़ियाँ झाँक रही थी ।
भला ये कौनसा विकास था शहर का । मंजरी की आँखों में नमी तिर आई थी ।
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लघुकथा-४
बाथरूम
ऋचा जब से विदेश बस गई है उसका सफाई के प्रति दृष्टिकोण ही बदल गया है । वो जब भी माँ के घर दिल्ली आती है सफाई में नुक्ताचीनी करती रहती है । इस बार ऋचा आई तो बाथरूम को लेकर उपदेशों से भरी हुई थी । माँ तुम अपने नौकरों से भी सफाई नहीं करवा सकती और हम वहाँ खुद अपने बाथरूम साफ करते हैं । ऋचा की बातों पर माँ मुस्कुरा देती है ।
आज ऋचा ने माँ के बाथरूम की टाइलें रगड़-रगड कर साफ की हैं । पाइप और टोंटियों को साफ किया है । साबुनदानियों को ब्रश से साफ किया है । बाथरूम की तमाम चीज़ों को शेल्फ पर करीने से सजाया है । आज वो माँ को ही नहीं रामू काका और मीना बाई को भी दिखाएगी कि कैसे बाथरूम की सफाई की जाती है । जो इस घर की सफाई देखते हैं । उसने रामू काका और मीना बाई को बुलाकर बाथरूम दिखाते हुए कहा ” देखो ऐसा रहना चाहिये मेरी माँ का बाथरूम…और आज तुम लोग भी अपने-अपने घर जाकर बाथरूम साफ करना….”
“ हमारे घर कहाँ बाथरूम….” रामू काका बोले
“ और हमारे घर तो टाट-पट्टी वाला है बीबी जी ”मीना बाई बोली थी
“ क्या…?? ” ऋचा के हाथ में पकड़ा बाथरूम के दरवाजे का मूठ छूट गया था । बाथरूम का दरवाजा बंद हो चुका था ।
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लघुकथा-५
प्लास्टिक की थैली
नंदिता पर्यावरण अभियान मे हमेशा अग्रणी रहती है | प्लास्टिक की थैलियों का प्रयोग वो ना तो खुद करती है ना ही अपने बच्चों को करने देती है | “ थैली मुक्त हो दुनिया सारी ” दुकानदारों को संदेश देती है | सब्जी लेने जाये या किराना का सामान यहाँ तक कि कपड़े की खरीद पर भी थैलियाँ नहीं लेती |
उस दिन सब्जी के ठेले से सब्जी ली| उसने कपड़े का थैला लेने के लिए स्कूटर की डिक्की का ताला खोला ही था कि ठेले वाले ने प्लास्टिक की काली थैली में झट से सब्जी पैक कर दी |
“ अरे अरे ! रुको ! भैया मैं प्लास्टिक की थैली नहीं लेती | मालूम है ना कल थैली मुक्त भारत की रैली भी निकाली थी हमने ” मुसकुराते हुए नंदिता ने कहा और प्लास्टिक की थैली की सारी सब्जी कपड़े के थैले में पलट ली |
“ आप जैसे सब हो जाएँ तो प्लास्टिक की थैली खत्म ही हो जाए ” ठेले वाले भैया ने कहा |
“ आप थैली में दिया ही मत करो ना ” नंदिता ने अति उत्साह मे बोली |
“ लोग मुझसे सब्जी लेना ही बंद कर देंगे मैडम ! और आप पहले फैक्ट्री बंद करवाइए ना प्लास्टिक की थैलियों की | अपने आप भारत मुक्त हो जाएगा प्लास्टिक की थैली से | मुझ गरीब पर ही मार क्यों ? ”
नंदिता के हाथ से कपड़े का थैला छूटता-सा लगा | ढेर सारे प्रश्नों के बीच स्कूटर की रेस धीमी हो गई थी | सैंकड़ों प्रश्न उसके मस्तिष्क पर हथोड़ों-सी मार कर रह थे |