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कहानी समकालीन

लावणया शाह (यू .एस.ए)
ज़िंदगी ख्वाब है ...
-भागः1
उस रात रोहित को काम करते करते समय वक्त किस तेज़ी से गुज़रा, उसका एहसास ही नहीँ रहा। जब आँख उठाई फाइल की चौकोर सीमा से तो हाथ की कलाई भी सुन्न पड गई थी। उसे जैसे तैसे सहलाते हुए अपनी नई चमचमाती पाकेट फिलिप घड़ी के नक्शेदार मूँगे से बने गोलार्ध को देखा तो हीरे से बनी बड़ी सूँइ अब ९ पर थी। आह ! आज भी शालू नाराज़ होगी। वह हठात् सोचने लगा शालू और अपने बारे मेँ .... शालू रास्ता देख रही होगी !..और रोहित हडबडाकर उठ बैठा। उसका अपना व्यवसाय था। तकनीकि क्षेत्र में, उसकी कँपनी का नाम अब प्रतिष्ठित हो चुका था। पर कितनी कडी मेहनत की थी उसने। पहले अमरीका आया.....यू, एस. सी से तकनीकि डिग्री हासिल की और उस के काम शुरु करते ही मानोँ इन्टर्नेट की दुनिया मेँ एक विस्फ़ोट आया और तेज़ रफ्तार से रौकेट अँतरिक्ष मेँ उड़े, ऐसी प्रगति आई, जो उसे एक आम तकनीकि विशेषज्ञ से सफल व्यापारी बनाती गई। उसने जल्दी भाँप लिया था कि अमरीका मेँ कई सारे, उसी के जैसे लोगोँ की आवश्यकता बढेगी और वह बँबई जाने के साथ साथ हैद्राबाद और बँगलूर की हवाई टिकट लेकर सीधा भारत पहुँचा था - सबसे पहले १० प्रतिभावान छात्रोँ का इन्टर्व्यू लिया था उसने! किसी को कैण्टीन मेँ ही मिला था रोहित तो किसी को कोफी हाउस मेँ! तै किया था उन की माँगोँ को। अपना कोन्ट्रेक्ट उसने हवाई जहाज यात्रा के दौरान, अपने ही पीसी पर बहुत सोचने के बाद तैयार किया था - कुछ शर्तेँ भी रखी थीँ अपनी - कि ये लोग कम्स्कम २ साल उसके लिये काम करने पर अनुबँधित होँगेँ और करार पर हस्ताक्षर करेँगे - और उसकी कँपनी "गणमान्य" - अपने तहत्` काम करने वाले को अमरीका की किसी भी कँपनी मेँ काम करने के लिये भेज सकेगी। एक तरह का यह " व्यक्ति व्यापार " था - उसे मन ही मन ये भी विचार आया था कि "क्या मैँ यह ठीक कर रहा हूँ ? " -फिर उसके रेशनल दिमाग ने कहा था, " अगर ये तुम नहीँ करोगे रोहित तो कोई और करेगा !"
इसके बाद अपने वकील से पूछकर रोहित ने भारत से काम पर अनुबँधित कर्मचारीयोँ के अमरीकन वीज़ा के बारे मेँ उसके इन्तजामात तैयार किये थे। मामला एक के बाद एक बातोँ से गुजर कर अपने आप ठीक से बैठ रहा था।
इससे पहले ऐसा हुआ नहीँ था।... आज अमेरीका और पश्चिम के मुल्कोँ को भारत के तकनीकि विशेषज्ञ वहाँ पहुँचेँ उसकी सख्त्` जरुरत थी और उनके बीच की जोडनेवाली कडी रोहित की कँपनी थी!
उसने आलस से अपने केशोँ मेँ हाथ फेरा ...और याद आई उसे शालिनी की ...कितनी शालीन थी शालू ! उसने भी अमरीका आकार पर्यावरण विषय लेकर उसी क्षेत्रमेँ काम किया था और उसके शहर मेँ पर्यावरण को दूषित होने से बचाने वाले व्यक्तियोँ मेँ शालू के प्रयोगोँ की, नवीन उपायोँ की, सराहना ही नहीँ की गई थी, उसे सम्मान देकर नवाज़ा भी गया था। और उस शाम जब शालू सुफेद लिबास मेँ सज कर सभारँभ मेँ स्टेज पर अपना पारितोषक ले रही थी तब रोहित को कई दिनोँ के बाद अपने दिल से उठी शायरी पर सुखद आश्चर्य हुआ था। ओहो ..तो अब तक शायराना अँदाज़ बाकी बचा है जहन मेँ !
ये व्यापार, तकनीकि दौड मेँ, भागते भागते, शुष्क नहीँ हुआ मैँ ! वह सोचता रहा ... और गाडी मेँ , जब वे दोनोँ घर लौट रहे थे तब तक उसने , अपने शेर को कई दफे गुनगुना भी लिया था ..शालू के साड़ी को सहेज कर बैठते ही उसने कहा था, " बधाई हो मेम सा'ब ! आपको ये ऐवोर्ड मिला हमेँ बड़ी खुशी हुई ! " --" अरे, थेन्क्यू थेन्क्यू जनाब!" शालू ने हँसते हुए कहा ..और शीशे पर एक उँगली से ठँड मेँ शीशे पर छाये धुँध पर " रोहित आइ लव यू " लिख दिया था।
तो रोहित ने अपनी रौबदार आवाज़ को थोडा नीचे कर के आखिरकार सुना ही दिया शालू को अपना नया शेर , " सुनिये, शालू जी, आपकी खिदमत मेँ अर्ज़ किया है , ' रुई के नर्म फाहोँ जैसे मेरे अह्सास, और तुम, मिट्टी के इत्र की शीशी, सिमटी है खुश्बु सारे कायनात की बिखरती जा रही खयालातोँ मेँ मेरे ! '
' तुझसे मिलने का मौसम, बिछुडने के पल भी, हसीं ख्वाबोँ मेँ लिपटी तारोँ की बारात, वह झीनी सी बारिश,हल्का सा धुँधलका
कोहरे से भरी, तेरे काजल में डूबी -सी रात!"
वाह वाह ! सुभान अल्ल्लाह ...क्या बात है ! आज़ तो आप के भीतर मियाँ गालिब की रुह दाखिल हुई हो ऐसा लग रहा है"
...शालू ने मुस्कुराते हुए कहा ..पर उसका सलोना चेहरा खिल उठा था। रोहित रास्ते को देखता रहा और कनखियोँ से शालू को भी देखे जा रहा था। जो मँद मंद मुस्कुराती बडी भली लग रही थी। अचानक शालू सँज़ीदा हो गई बोली, "R " ..
( जब भी वे अकेले होते वह उसे सिर्फ यही कहती थी )।
" प्रि-दीदी ( डो.प्रियँका मेहता ) का फोन आया था - बुला रहीं हैँ हमेँ ! कहतीँ थीँ देर ना करो ! बताओ कब चलेँ ? "
" चलेंगे...चलेँगे" ...आहिस्ता से अब रोहित की आवाज़ आयी -" बहोत सा काम बाकी है शालू ।"
" ' ओके ओके' ..तुम बात कर लेना नही तो दीदी मुझ पे गुस्सा होगीँ। ठीक है ना ? " और उसने रोहित का हाथ अपने हाथोँ मेँ लेते हुए सहलाया। अब रात के सन्नाटे मेँ उन दोनोँ की चुप्पी गाड़ी की तेज रफ्तार के साथ साथ गहरी होती चली गयी। घर आया तो नीचे गराज मेँ रोहित ने कार को पार्क किया। तब तक शालू उनके अपार्टमेन्ट का दरवाज़ा खोलकर दाखिल हो चुकी थी। रात मेँ थके हुए लौटे थे दोनोँ, तो झट रात के खुले, आरामदेह कपडे पहनकर सोने चले गये। पर उस रात रोहित को देर तक नीन्द न आई। वह कभी खिडके पे झूलते पर्दोँ के पार गहराये बादलोँ को देखता तो कभी शालू को, जो थककर सो रही थी। वह उठा और खिडकी के सामने खडा हो गया -- याद आया उसे जब उसने पहली बार शालू को देखा था, जैसे वह कल की सी बात थी। कालिज से एक शाम वह अपने दोस्त प्रकाश के घर चला गया था। प्रकाश और वह, बचपन के सहपाठी थे। पर प्रकाश की शादी हो गई थी राजश्री से ! उन्हेँ एक नन्ही सी प्यारी गुडीया सी बच्ची भी हो गई थी। और उनसे मिलने शाम को टहलता हुआ पहुँच जाता था। आज शाम जब रोहित उनके घर पहुँचा तो बहाँ प्रकाश की माँ बाहर झूले पर अपनी बेटी के साथ दिखलाई दीँ। रोहित ने नमस्ते किया। दीदी वसुँधरा से भी बातचीत होने लगी। तब दीदी ने ही कहा, " अरे रोहित, तुम्हारा दोस्त मेरे ससुराल गया है और आप यहाँ बैठी हैँ।''
रोहित ने हँसते हुए कहा..." अभी आई ना। बाज़ार ले गई थी माँ को ..अब चलते हैँ। चलोगे मेरे साथ?"
उन्होँने उठते हुए माँ से कहा, " चलूँ माँ ? कल आऊँगी फिर " और रोहित प्रकाश की दीदी के साथ उनके ससुराल की ओर चल पड़ा। वहाँ प्रकाश उसे मिलने आया देखकर बडा खुश हुआ! दोनोँ दोस्त, हँसी मज़ाक मेँ डूब गये। तभी एक १९ या २० वर्षीय लडकी शर्माती हुई कमरे मेँ दाखिल हुई, तो प्रकाश की पत्नी राजश्री ने तपाक्` से उन दोनोँ का परिचय करवा डाला, " रोहित मिलो, ये है शालिनी ! शालिनी, मीट रोहित दवे ! " " हेल्लो " एक मीठे स्वर को रोहित ने सुना तो उसे भी सलीका याद आया -"हेल्लो हेल्लो ", उसने भी कहा पर आगे कुछ सूझा नहीँ कि और क्या कहे ? पर उसने देखा था एक सलोने चहेरे को जो उसे ध्यान से देख रहा था बडी बडी सँवेदनाशील आँखोँ नेँ एक सँज़ीदगी थी और एक चौकन्ने होने का स्वभाव भी बना हुआ था। आम लडकियोँ की तरह नहीं, शालिनी अपनी युवावस्था मेँ भी कुछ कुछ गँभीर थी। हाँ जब भी वह अनायास मुस्कुराती तब मानोँ उसका पूरा चेहरा खिल उठता था!
बिना चाहे भी अपनी आदतानुसार इतना सब कुछ रोहित ने देख लिया था। दूसरे क्षण उसने अपना ध्यान हटा लिया था। सही है कि वह आजकल लडकियाँ देख रहा था - उसने तकरीबन्` २० २५ लडकिय़ोँ से बातचीत की थी अपनी शादी के सिलसिले मेँ --- वह जाता नाश्ते पर तो कभी खाने का निमँत्रण मिलता -- बातेँ होतीँ। किसी लडकी के रँगरुप उसे जचते , किसी के घरवालोँ से मिलकर खुशी होती, तो किसी की प्रतिभा से वह प्रभावित होता । परँतु आजतक ऐसी लडकी उसे नहीँ दिखी थी जो उसे पहली नज़रोँ मेँ भा जाये ! शायद शालिनी से वह कुछ हद तक प्रभावित ज़रुर हुआ था, परँतु दूसरे ही पल उसने सोचा, " अरे यार ! ये तो मुझसे उम्र मे बहुत छोटी लगती है ! " और फिर वह पूरा समय प्रकाश और नन्ही पँखुरी से खेलता रहा --
"याद है ..एक बार बँगाल गया था तब सध्य स्नाता सुँदरी को घाट पर देखा था मानोँ कवि रवीँद्र की कविता मूर्त हो उठी हो. समीप के मँदिर मेँ जा कर दीप जलाती उस कन्या का स्वरुप आजतक मेरे मन मेँ अकँपित लौ की तरह विराजमान है !" उसने प्रकाश से कहा था तो दोनोँ हँस पडे थे. अब राजश्री भी आ गई थी और बातेँ सुन रही थी -उसी ने कहा था, वो बोली, " सुनो ...मेरी मरज़ी है कि तुम शालिनी और हम इस इतवार को उस नये रीवोल्वीँगरेस्तराँ मेँ लँच लेने जायेँ कैसा है आइडीया मेरा ? " " अरे मियाँ बीबी मेँ हमेँ हड्डी नहीँ बनना भाभी " रोहित ने कहा तो राजश्री और भी ज्यादा ज़िद्द करने लगी थी . इस तरह दूसरी बार शालिनी से मुलाकात उसी घूमते रेस्तराँ मेँ हुई थी. खाना लज़ीज़ था और खाने के बाद शालिनी ने कहा था कि उसे अपनी मम्मी से मिलने , नानी जी के यहाँ जाना है तो रोहित ही उसे वहाँ तक पहुँचा आया था और दोनोँ से शिष्टाचार वश मिला भी पर चाय या कोफी के लिये मना करते हुए जल्द ही निकल कर अपने घर जाने को निकल पडा था -- . राजश्री ने बहुत बार पूछा पर उसका यही कहना था, "वो मुझसे १२ साल छोटी है ! " जिसे सुनकर राजश्री ने कहा, " जब उसे ऐतराज़ नहीँ तब तुम्हेँ क्यूँ इतनी छोटी लग रही है, हुम्म रोहित ! " रोहित ने बात को टाल कर फिर आगे बढने न दी और वह उसके बाद भी कई लडकियाँ देखता रहा था और आखिर डाक्टर माता पिता की इकलौती सँतान रीना से उसने शादी कर ली थी। सोचा था, पढे लिखे परिवार से है तो उसके साथ अच्छी निभ जायेगी. पर शुरु से ही रीना का अपने माइके ही सुबह से चले जाना, बात बात पर रोहित के परिवार के छोटे फ्लेट के बारे मेँ मुँह फूलाना और माँग करना कि "जब अपना अलग और बडा फ्लेट खरीदोगे तभी वहाँ आऊँगी " ये सब रोहित को सहमा गया था. भविष्य मेँ और भी माँगेँ बढेँगीँ वो ये जान गया था. शादी के आगामी ३ वर्ष रोहित की ज़िँदगी के सबसे दुख्दायी, मस्तिष्क को जकडकर,त्रस्त करनेवाले, सबसे ज्यादा परेशानी वाले साबित हुए ! रीना और रोहित के बीच हर छोटी बात के लिये झगडा होना आम बात होने लगी थी। अगर वह किसी दोस्त को खाने पे न्योता देता तो वह माइके चली जाती या बहाना करती कि सर दर्द है । अपने नये फ्लेट के कमरे मेँ चली जाती। रोहित को मेहमान के साथ बाहर खाना पडता। उसके माता पिता से वह झूठ बोलता कि " खाना खा लिया "। जबकि कई दिन उसे भूखे पेट सोने की नौबत आई थी और दूसरे दिन फिर सुबह काम के लिये भागना और रीना का मैके चले जाना ! हद्द हो गई ! पर रोहित करता भी तो क्या ? सोचता, " क्या शादी के बाद सब की ऐसी हालत होती है " पर जवाब उसे पता था - "नहीँ प्रकाश और राजश्री को ही देख लो ! कैसे दोनोँ एकदूसरे का खयाल रखते हैँ।" - हाँ उनका प्रेम विवाह हुआ था और उन्होँने परिवार वालोँ को कई साल समझाते हुए बिताये थे पर क्या उसकी तरह लडकी देखभाल कर, घर परिवार की टोह लेने के बाद शादीयाँ होतीँ हैँ, वे भी तो सुखी होते हैँ ! शायद कसूर उसके भाग्य का था। पर अब वह जैसे तैसे निभाने की कोशिश किये जा रहा था ... तेरा देर से आना, आकर मुझे रुलाना,
वादे कसमेँ तोडने का लम्बा सिलसिला, और मुकर जाना बात बात पे वो रोना,
क्यों करतीँ थीँ झूठे बहाने, ऐसे हरदम ?...
..मरता क्या न करता ! कौन मानेगा उसकी बात अगर वह कह भी दे कि उपर से सँभ्राँत कुलीन दीखनेवाली यही रीना कुपित होकर कैसी तीखी भाषा मेँ उसे अपमानित करते बिलकुल हिचकती न थी ! और उसके परिवार के प्रति मोह इतना कि भागी चली जाती थी हर सुबह. शाम लौटती तो उसकी मम्मी जी रसोइया और २ आयाओँ को भी साथ भेज देतीँ -- बेबी को खाना खिला देना और बाई , रसोई का सारा काम निपटाके ही घर वापुस आना समझीँ ? " उनकी हिदायत होती और तीन नौकर २ सेठ और सिठानी !! माने रीना और रोहित की सेवा करते. बिस्तर लगता और ऐरकन्डीशन की तेज़ ठँडी हवा कमरे को और भी ठँडा बना कर रख देत और रोहित परेशान अगले दिन काम के बारे मेँ सोचता हुआ सो जाता। सुबह वो तैयार होकर कालबा देवी तक जाता और रीना उसीके साथ अपनी मम्मी जी के यहाँ चली जाती ! खैर ! उसका कारोबार बढने लगा तो उसे अमरीका के दौरे भी जल्दी लगने लगे जिससे रीना को चिढ हो आई थी। वह हमेशा कहती, " क्या रखा है वहाँ ? क्यूँ भागे जाते हो ? " वो कहता, " तुम्हारा वीज़ा आये तो तुम भी चलना मेरे साथ!" तो वह तुनककर कहती, " जाये मेरी जूती ! हमेँ वहाँ नौकरानी बनाने ले जाओगे ? हमेँ नहीँ आना ...! वहाँ ..तो बहुत काम करना पडता है मालूम है ... मेरी कई सहेलियाँ ऐसी गल्तियाँ करके अब पछता रहीँ हैँ !"
"अरे वहाँ भी काम करनेवाले मिल जाते हैँ। ", वो धीरे से कहता तो वो मुँह फूला के कमरे से मँथर गति से ऐसे निकल जाती मानोँ सुना अनसुना कर रही हो ! एक बार वो नई फीयाट लेके मैके चली गई। वो घर आया तो ड्राइवर को भेजा कि "मेमसाहिबा से जाकर गाडी ले आओ और रर्जिस्ट्रेशन करवा लाओ " ड्राइवर खाली हाथ, भीगी बिल्ली बना लौट आया।
पूछा तो बोला, " मालकिन ने साफ मना किया है। कह रहीँ कि गाडी उनकी है। " उसने गर्दन झुकाके नज़रेँ नीची कर लीँ।
अब रोहित झल्ल्ला उठा, " हाँ उन्हीँ की है पर रजिस्ट्रेशन तो करवाना जरुरी है ! " रोहित की खीज, मायूसी मेँ बदली तो उसने फोन मिलाया और रीना को समझा बुझा कर काम करवाया। गाडी तो आ गयी पर दूसरे दिन शाम को जब रोहित घर लौटा तो किचन मेँ जाते उसकी आँखेँ आश्चर्य से खुली की खुली रह गईँ ! देखता क्या है कि समाचार पत्र खुला हुआ था पूरे फर्श पर और उस पर सारी दालेँ, चावल, आटा, हल्दी, मिरची , धनिया सब उलट दिया गया था! अजीब तस्वीर बन गई थी सारे मिश्रण से! ये किसने नुकसान किया? उसकी कल्पना के बाहर की द्रश्यावली देखकर रोहित का चेहरा फक्क पड गया था। रुँआसा हो गया था वह! उसका मन प्रश्न किये जा रहा था -- पर वहाँ तो आज कोई नहीँ था उसे जवाब देने के लिये । कहाँ होगी रीना ? उसने सोचा और फोन घुमा दिया ससुराल, " हेल्लो, नमेस्ते पापा जी, जी हाँ रीना है? दीजियेगा उसे फोन। आभार - थैन्क्स! " रीना आयी तो उससे रहा नही गया, पूछा, " हमारे फ्लेट के किचन मेँ ये किसने बिखराया है सब? "
" मैँने"
उसने शाँति से कहा तो उसका पारा भी सातवेँ आसमान पर चढ गया;
" ये क्या बचकानी हरकेतेँ करती हो! यही सीखा है ? "
अब रीना भी चीखती हुई बोली,
" वो सारा सामान मेरा था। मेरे मम्मी पापा ने दिया था । जैसे तुम्हारी कार है, वैसे वो मेरा सामान था। इसलिये कूड़ा कर के फेँक दिया।"
रोहित ने फोन पटक दिया और अपना माथा पकड कर पहली बार उसे भीतर तक गुस्सा आ गया। दूसरे दिन बिना बतलाये अमेरीका की फ्लाइट लेकर भारत से, रीना से, अपने परिवार से, सभी से, वह ह्ज़ारोँ मील दूर चला गया था।
........
समय : २ साल बाद : बहारेँ आयेँगीँ, मुझे ले जायेँगीँ, फिर,
उन मस्त अमिया के बागोँ मेँ चुपचाप,
आँख मिचौनी खेला करते थे हम तुम,
आँखोँ मेँ हँसती थी हर मुबारक रात!
उस बात को शायद रोहित भूल ही जाता अगर एक दिन जब वह बँबई के कालबा देवी के भीड़ भरे इलाके से गुजर रहा न होता और वहीँ प्रकाश भी सामने से आता हुआ दीखाई दे गया। प्रकाश के मुख पर एक रहस्यमय मुस्कान थी -
"क्योँ बर्खुदार, कहाँ की सवारी है? शादी क्या कर ली तुम तो इद का चाँद बन गये लाला! कैसी हैँ रीना जी? "
उसने पूछा तो रोहित ने बतला दिया कि अभी अभी वीजा के खास खास डोक्युमेन्ट्स तैयार करने मेँ उसने दिनभर कितनी भागदौड की है !
"अच्छा शाम को घर आ जा, साथ खाना खाते हैँ। और ठीक ७ बजे पहुँच जाना -- "
" क्या... ? ७ बजे डीनर खाते हो?", रोहितने पूछा।
अब हँसने की बारी प्रकाश की थी -वो बोला,
" अरे ! तू बडा लेट लतीफ है यार! और मेरा महाराज ९ बजे रसोई घर बँद कर देता है! समझे? तो आ जाना वक्त पे! "
अब तो रोहित भी उतावला भागा । चूँकि शहर के आफिस के इलाके से उपनगर तक जाते जाते २ घँटे का समय तो लगने ही वाला था । प्रकाश ने आकर राजश्री को बता दिया कि उसका मित्र रोहित भी आ रहा है। तो राजश्री ने कहा," अरे उससे कहा ना कि जल्दी आये ? वो हमेशा देरी से आता है ! "
प्रकाश ने कहा, " मैँने जानबूझकर उसे २ घँटे पहले का समय बतलाया है, तुम देख लेना मेरा यार ९ बजे तक आ ही जायेगा! और क्या पता अब बीवी के साथ शायद टाइम का पाबँद भी हो गया हो! मुझे देख लो! आपके साथ रहकर हम घडी के काँटोँ के साथ साथ साँस लेना सीख गये हैँ!" "अजी जाओ जाओ .." राजश्री ने कहा, " सारा दोष मेरा ही तो है ...अब इस जनम मेँ तो भुगतना ही है भाग्य मेँ!"
और वही हुआ ! रोहित आया ९ बजे और वह भी रीना के बगैर! बहाना बना गया। पर अब दोस्तोँ ने मिलकर खाना खाया -- बडे अर्से बाद रोहित कुछ स्वस्थ हुआ। रोहित को प्रकाश के महाराज, यानी खानसामा साहब के हाथ का बना भोजन बहुत प्रिय था! सबने छक्क कर खाया। फिर बाग मेँ बँधे बडे से झूले पे तीनोँ सुस्ताने लगे। पँखुरी भी राजश्री की गोद मेँ झूलते-झूलते कब सो गई पता भी नहीँ चला। फिर अचानक बातेँ शालिनी की ओर मुड गईँ ।
"कैसी है वो ? " रोहितने पूछा तो राजश्री ने लँबी साँस छोडते हुए कहा, " वो अब यहाँ नहीँ रहती अपनी नानी जी के यहाँ कालिज के फाइनल ईयर मेँ है --"
" उसके पापा कहाँ हैँ?" उसने प्रश्न किया- तब प्रकाश ने समझाते हुए कहा, " शालिनी के मम्मी पापा का तलाक हो चुका है . मगर शालिनी अपनी दादी और काकी याने के मेरी दीदी वसुँधरा के साथ ही रहना चाहती थी और रह रही थी -- इँटर पास किया -- बडी काबिल और नेक लडकी है। " उसने भूमिका बाँधते हुए कहा।
अब राजश्री ने आगे बात बढायी " क्या कहते हो ? इतनी सारी लडकियोँ को तो देख चुके थे -- पर आखिर रईसजादी रीना जी पर हमारे रोहित का दिल आ गया! क्योँ आईँ नहीँ हमारे यहाँ खाने पे ?" उसने यूँ ही मजाक किया तो रोहित सँजीदा हो गया।
"मेरी मानते तो शालिनी ही तुम्हारे लिये सही जीवन साथी बनने की क्षमता रखती थी!"
"राजश्री -- अब रहने दो ये बातेँ " प्रकाश ने डाँट लगायी तो राजश्री को रोहित के उदास चेहरे का ध्यान हो आया।
रोहित ने एक कोशिश की और अपने आपको सहज करते हुए हँसते हुए पूछा,
" अरे बाबा ! मुझे मिलाने मेँ कोयी कसर नहीं रखी थी तुमने पर उपरवाले की रज़ा न थी -- "
राजश्री बोली, " जब उसे कोयी आपत्ति नहीँ थी पर, आज तुम क्यूँ ये सारी बातोँ को इतना तूल दे रहे हो ! "
" चलो छोडो बेकार की बातोँ मे कहीँ बित न जाये रैना __ "
प्रकाश ने कहा तो रोहित भी उठ खडा हुआ -
" तुमसे मिलने के लिये अब कब का अपोइन्टमेन्ट दे रहे हो ? उसने पूछा तो
" अच्छा तब तो लँच पक्का रहा -- आ जाऊँगा -" इतना कह कर रोहित चला गया । वह प्रकाश और राजश्री के साथ उसी नियत किये रेस्तराँ मेँ मिला था -- कुछ खास बातेँ तो नहीँ हुई पर उस बार रोहित उखडा-उखडा सा रहा सारा वक्त! बस, १० मिन्टोँ तक एक औपचारिक सी मुलाकात हुई थी उन दोनोँ से!
यह थी उनकी दूसरी भेँट! रोहित सोचता रहा, " हम अचानक क्यूँ मिलते हैँ खास व्यक्तियोँ से?"
फिर बात आयी गयी हो गई --उसे फिर अमरीका जाना पडा था - काम बढ रहा था ---
रोहित को मानोँ अपने जीवन के बारे मेँ उस वक्त सोचने का समय नहीँ था। आज अचानक उसे ये सारी बातेँ अतीत के पन्नोँ से निकल कर याद आ रही थीँ शालिनी उसे। अपने जीवन से कहीँ दूर करके उसने रीना से नाता जोड तो लिया पर एक दबी चिनगारी सी उसे शालिनी याद आ जाती -- कभी उसे पूरी दुनिया से नाराजगी हो जाती।
वह सोचने लगा, किस तरह सब अचानक हुआ था ---माता पिता की एकमात्र सँतान! बहोत समृध्ध परिवार की कन्या के बारे मेँ सँदेशा आया। देखते देखते बात तै हो गई । शादी भी हो गई। और उसके बाद के ३ वर्ष रोहित के जीवन के सबसे कठोर, ह्रदयविदारक, आघात जन्य साबित हुए! ना तो कन्या का कसूर था ना उसके घरवालोँ का !
लाड प्यार मेँ बडी हुई रीना को रोहित के मित्रोँ से कितनी चिढ थी -- ये उसका अहम् भाव ही था। वो किसी को खाने पे बुलाता तो वह बहाना बना कर मैके चली जाती...ये भी कोई बात हुई ? वो सोचता रहा।
बार बार उसे अपने माता पिता से झूठ बोलना पडा था जब वे पूछते, " बेटे खाना खा लिया ? कैसे हो तुम लोग? "
" ठीक हैँ हम " इतना ही कह पाता खाली पेट, दुविधा मेँ रोहित। ये कैसे बतलाता कि उसका वैवाहिक जीवन नर्क यातना से गुजर रहा है? आख़िर कब तक ऐसे चलता ? बात इतनी पटरी से उतरती गई की रीना ने ही तलाक के कागज़ भेजे --
रोहित ने पहली फीयट पद्मिनी गाडी खरीदी थी। उसे भी रीना मैके लेकर चली गई । उसे अपना पति जो धीरे धीरे मेहनत करके अपना नया कारोबार जमा रहा था, अत्यँत नापसँद था । तलाक के कागज़ात मेँ रीना ने उससे ५० लाख रुपये का हर्जाना भी माँगा था, जिसे देखकर रोहित को आघात लगा - ये कैसी अजीब लडकी है ? क्या करूँ? उसके माता पिता को भी भनक आ गयी तो उन्होँने बेटे को अमरीका फोन किया और चिँता व्यक्त की। एकबारगी रोहित को लगा कि वह सो रहा है और ये सारी घटनाएँ एक बुरे स्वप्न की तरह चलती जा रहीँ हैँ जिनपर उसका कोयी जोर नहीँ। पर वास्तविकता दूसरे क्षण उसे ठोस धरातल पर ला पटकती। उसने भी वकील रख लिया और सँदेशा भेजा कि भारत आने पर आगे की कार्यवाही होगी। तब तक रीना को मिसेज दवे, यानी रोहित की पत्नी का तमगा लगाये ही समाज मेँ घूमना पडेगा। जिसका उसे खेद है ।
रोहित इस वक्त काम मेँ ऐसा उलझ के रह गया था कि, उसे इतने समय की मोहलत माँगनी पड रही थी। भारत जाकर अपने वृद्ध माता पिता से क्या कहेगा वह? ये सोच-सोच कर रोहित का क्षोभ बढता जा रहा था। जैसे तैसे काम निपटा कर उसने अपनी डाक्टर बडी बहन जो केन्सास रहती थीँ, उन्हेँ फोन करके सारी बì |