बहुत दिनों से आँखों में एक सपना पल रहा था कि हम विश्व में फैले भारतीयों का ( भारतीयों का ही क्यों, हर उस इन्सान का जो सुन्दर और कल्याणकारी का हिमायती है) एक ऐसा मंच हो जहाँ से आप सभी (एक सी सोच वालों) तक पहुँचा जा सके, अपनी कही और आपकी सुनी व समझी जा सके--- प्रयास यही रहेगा कि विश्व की हर संस्कृति और साहित्य में जो जानने और समझने लायक है और हमारी पहुँच के अन्दर है आपतक पहुँचे। जो बचाने लायक है, बचाया जा सके। आने वाली पीढ़ियों के मन से भेदभाव दूर करते हुए उन्हें कुछ ऐसा दिया जा सके जो नफरत और कुकर्मों की ढलान पर खड़ी मानवता के लिए ठोकर या फिसलन का नही, सहारे का काम करे और एक दूसरे से जोड़े--- संस्कृति और विचारों की एक ऐसी साँझी धरोहर --- एक ऐसी त्रिवेणी, जिसमें डुबकी मारते ही सारे गिले शिकवे भूलकर हम एक दूसरे के पास आ सकें—कुछ पल के लिए ही सही सुखद सानिध्य पा सकें। कोई दावा नही कर रही कि पूरी तरह से ऐसा हो ही पाएगा परन्तु एक प्रयास (आप सबका, अपने मित्रों का सहयोग के लिए आवाहन) तो जरूर ही करना चाहूँगी---इरादे नेक हों और अपनों का साथ हो तो रास्ते भी खुद ब खुद निकल ही आते हैं।
कोपल कोपल ही जब नव-जीवन संदेश ले आया है और बसंत ( हर्ष-उल्लास और रंग-रूप) की तैयारी में है तो इससे अच्छा और कौन सा समय हो सकता है लेखनी के इन्द्रजाल पर आने या प्रथम प्रयास के लिए----चाहती तो थी कि बसंत पंचमी के दिन माँ सरस्वती के आशीष के साथ पत्रिका इंद्रजाल पर आए, परन्तु बसन्त पंचमी की कौन कहे अब तो होली भी आकर चली गई---चलिए, जब जो हो जाए वही शुभ है। एकबार फिर जुड़ने का आग्रह करते हुए और सहस्त्र शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत है इस अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर नारी के विभिन्न रूपों को उकेरती आपकी अपनी लेखनी--- आशीर्वाद और प्रतिक्रिया का इन्तजार रहेगा।
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मंथन

साहित्य और नारी ; एक खोज वेदों से खेदों तक
शैल अग्रवाल
''सारी बिच नारी है कि नारी बिच सारी है। सारी की ही नारी है कि नारी की ही सारी है।''
आदिकाल से ही साहित्य और नारी भी कुछ ऐसे ही एक दूसरे से लिपटे हुए हैं। इन्द्र-धनुषी शब्दों के जाल से नारी का रूप-रंग निखारता साहित्य कभी तो कृष्ण की तरह उसका रक्षक बन जाता है, कभी दुश्साशन की तरह उसका नग्न रूप देखना और दिखाना चाहता है। एक शाश्वत सत्य सी खड़ी नारी को तत्कालीन साहित्य जाने कबसे दर्पण की तरह उसके अपने ही बिम्ब-प्रतिबिम्ब दिखलाता चला आ रहा है। अब छवि कितनी स्पष्ट या कलुषित होगी, यह तो दर्पण की शुद्धता और प्रखरता पर ही निर्भर है। वैसे भी ''जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तिन देखी तैसी '' की तरह यह चित्रण लेखक की मन:स्थिति, पात्र-कल्पना और व्यक्तिगत अनुभवों का संकलन और संस्मरण ही तो है। भौगोलिक और सामाजिक विषमताओं के बाद भी विश्व-साहित्य में तत्कालीन नारी की छवि लगभग एक सी ही उभरकर आती है---चाहे वह वैदिक काल की भारतीय नारी हो या दान्ते की बीयट्रिस।
आदि नारी नैसर्गिक सौंदर्य के साथ एक ठहराव लिए हुए है। यहां भाव और भाषा दोनों ही सरल हैं। नारी पूज्य है और सुख-शान्ति देने वाली है। फिर आया कालीदास और शेक्सपियर जैसे लेखकों का स्वर्ण-युग, जब मन-मोती भावनाओं के अति सुकुमार धागों से बिंध गया, क्योंकि अबतक आध्यात्मिकता भौतिकता से मिल चुकी थी। भाव बहुरंगी हो गये और चरित्र-चित्रण गूढ़। अब छंद जबतक तुरीण से निकले तीर की तरह अंत:स्थल को न बींधे, व्यर्थ था। कालीदास की शकुन्तला हो या शेक्सपियर की औफीलिया, दोनों के अधर प्रणय गीतों से सजे हुए थे और सपने बुनती आंखें अश्रु-पूर्ण । यही विरोधाभास इस साहित्य की शक्ति और सौंदर्य बना। कुमार संभवम् और कामसूत्र जैसे ग्रन्थों ने मन के साथ-साथ नारी के तन को भी खोजना शुरु कर दिया था। शील का आंचल सरकने लगा। प्रि-रैफेलाइट्स के आते-आते तो नारी के मांसल शरीर को चित्रित करना भी शुरु हो चुका था। जबकि मैटाफिजिकल कवियों ने नारी को बौद्धिकता का एक झीना आवरण पहना रखा था। इधर भारत में भी हवा का रुख कुछ-कुछ ऐसा ही था, श्रृंगार-रस के कवि खुसरो, भृतहरि, केशव, बिहारी वगैरह भी भक्तिरस और सूफीबाद की आड़ में नारी के नयन और वक्षस्थल में ही खोये रहे। उसका कामुक और उद्दाम चित्रण करते रहे। ''कसके छाती पकड़े रहे, मुंह से न बात कहे, ऐसा है कामिनी का रसिया। क्यों सखि साजन, ना सखि अंगिया। '' या फिर '' खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग, तन मन मेरा पीउ का भयो इक रंग। ''
उन्नीसवीं सदी के आते-आते हार्डी, टॉल्सटॉय, शरदचंद्र, बंकिम बाबू और टैगोर व प्रेमचन्द जैसे लेखकों ने स्त्रियों के दलित, उपेक्षित जीवन और उनकी सिसकियों को अपने साहित्य का केन्द्र बिन्दु बनाया। विधवा-विवाह, बाल -विवाह और सती-प्रथा उन्मूलन जैसे प्रश्नों से साहित्य के पन्ने जल उठे। शरद की अर्ध सुलगती पारो की घुटन, टेस का दर्द और निर्मला का असहाय जीवन आज भी मन को कचोटता है। सहानुभूति ने जोर पकड़ा और शुरु हो गया नारी जागरूकता का युग, साहित्य में भी और समाज में भी। जेन ऑस्टिन जैसी लेखिकाओं की नायिकाओं ने सोचना शुरु कर दिया और प्रश्नोचित उत्तरों के अलावा वह घटनाओं को इच्छानुसार मोड़ भी देने लग गईं। भारत में भी प्रसाद जैसे संवेदन शील कवियों ने रूढ़िगत मूल्यों और खोखले समाज पर प्रश्न चुन्ह लगा दिए, '' मत कहो यही सफलता कलियों के लघु जीवन की। मकरंद बनी खिल जाएं, तोड़ी जाएं बेमन की।''
रांगेय राघव, चतुर सेन शास्त्री, कन्हैया लाल मुंशी, अमृता प्रीतम, कृष्णा सोबती, शिवानी, मन्नू भंडारी जैसे लेखक और लेखिकाओं ने नारी के लिए आवाज उठाई और खुद नारियों ने भी अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करना शुरु कर दिया। महादेवी वर्मा, सरोजिनी नायडू, सुभद्रा कुमारी चौहान और सुमित्रा कुमारी सिन्हा जैसी लेखिकाओं की कविता में नारी जोश और सोच की धूप-छांव में खड़ी दिखलाई दी।
''शशि मुख पर घूंघट डाले, आंचल में दीप छुपाए '' नारी कौतुहल सी साहित्य चेतना में आ चुकी थी। उसका हर रूप एक आल्हाद और उन्माद था। नारी के छलनामय रूप में भी पुरुष जाति को एक सुख, एक आश्वासन मिल रहा था।
'' इतना सुख जो न समाता, अन्तरीक्ष में जल थल मे। उनकी मुठ्ठी में बन्द था, आस्वासन के छल में।'' जयशंकर प्रसाद।
उसका रोना, हंसना, चलना, देखना, सभी कुछ मनमोहक है।
'' कांस सी मेरी व्यथा बिखरी चतुर्दिक, बाढ़ सा उमड़ता प्यार
मेघ भावों के झमाझम झर रहे जो, शरद सी तुम कर रही होगी कहीं श्रंगार।'' शिवमंगल सिंह सुमन।
शायद यही वजह थी कि समुद्र मंथन के बाद जब देवताओं और असुरों को अमृत और विष पिलाना था तो विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया। रत्नावली के प्रेम में विवश शव को नैया बनाकर तूफानी रात में पत्नी से मिलने जाने वाले तुलसीदास की यह आत्म-विह्वल परवशता ही तो थी जो ज्ञान और वैराग के दिनों में इतने कठोर शब्दों में अभिव्यक्त हुई। '' ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी। '' जीवन की धूप छांवी यात्रा में या तो पुरुष द्वारा नारी छली जाती है या फिर नारी की मायावी छलना में वह खुद ही अपना सर्वस्व निछावर कर देता है।
'' One day in lovely spring a woman came in my lovely woods
In the lovely form of beloved, came to give my songs melodies; to give my dreams sweatness.
Suddenly a wild wave broke over my heart-shores and drowned all language.'' Tagore.
प्रसाद कहते हैं '' मानव जीवन वेदी पर परिणय है विरह मिलन का। सुख दुख दोनों नाचेंगे, है खेल आंख का मन का। '' चूँकि आंख और मन के इस खेल में दोनों सहभागी हैं , बराबर के दोषी हैं। '' कलियों को उन्मुक्त देखा, सुनते वह कपट कहानी, फिर देखा उड़ जाते मधुकर को कर मनमानी।'' छल का यह प्रश्न तो हमेशा से नारी पुरुष के संदर्भ में उमड़ता घुमड़ता रहा है, पर नारी अपनी मोहक सतरंगी छाया में बार बार प्रवंचना को ही पकड़ पायी है। शरदचन्द्र ने देवदास में लिखा है कि नारी हृदय तो एक स्वच्छ आइने की तरह होता है। जिसकी भी छाया उसपर पहले पड़ती है वही उसके अंत:स्थल में बस जाता है। टैगोर के अनुसार नारी एक सुकुमार लता की तरह पास खड़े वृक्ष का सहारा ले लेती है। अमृता प्रीतम अपने उपन्यास सागर, सीपी और समन्दर में लिखती हैं कि डायरी सिर्फ वह नही होती जो कलम से कागज पर लिखी जाए, कभी कभी यह मन के पन्नों पर दर्द की स्याही से भी लिखी जाती है। पुरुष ने नारी की इस कमजोरी को भलीभांति समझा, परखा और उसे छला। पुरुषों द्वारा अभिसारित, फिर प्रताड़ित नारियों के इतिहास से साहित्य भरा पड़ा है।, चाहे वह कालीदास की शकुन्तला हो, रामायण की अहल्या, उर्मिला, सीता या फिर मैथिलीशरण गुप्त की यशोधरा। इसी संदर्भ में लिखी गईं उनकी निम्न पंक्तियां तो नारी के भाग्य पर पाषाण-शिला सी अंकित हॉ गयी हैं। '' अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध और आंख में पानी। ''
प्रगतिवादी और आद्यात्मवादी कन्हैयालाल मुंशी जी की नायिका तन्मन ज्यादा तत्कालीन है। वह लिखते हैं ''मैने एक ऐसी स्त्री की रचना की है जिसे इच्छानुसार प्रेम करने और अपने ढंग से रहने का अधिकार है। यही नहीं, उसे भी पुरुषों की तरह एकीकृत मन और इच्छाओं का आनन्द मिलना चाहिए। जीवन को पूर्णत: सहज भाव से जीने का आनन्द। और इन सबसे ऊपर छद्म लज्जा, रूढ़िवाद परम्परा और पीढ़ियों के नश्वर फैशन से भी ऊपर और परे सुन्दरता की खोज और चित्रण का आनन्द। इससे भूखी आत्मा तृप्त होती है और जीवन आनन्द की तीर्थ-यात्रा बन जाता है।'' पर क्या समूचा पुरुषवर्ग ऐसा सोच पाया ! मनु से य़ाज्ञलव्य तक जिन काम-कलाओं का विकास किया गया वे सभी औरतों को जीतने, उसे गुलाम बनाने की विधियां हैं। कालीदास लिखते हैं कि जीवन-वाटिका की सबसे अद्भुत लता नारी है, जो राग-ऋतु में अमृत-फल और द्वेष-ऋतु में विषाक्त फल लाती है। पर क्या यह मानव- जाति का ही सस्वभाव नहीं? अरस्तू, नीत्से, शौपेनहावर, तुलसीदास , कौटिल्य आदि ने जिस दृष्टिकोण का परिचय दिया है , वही आजभी कायम हैं। न तो समाज नारी के साथ न्याय कर पाया है और ना ही साहित्य।
जीवन के सुख-दु:ख , संयोग-वियोग, सफलता-विफलता, आदि विरोधी त्तवों से बनी समग्रता ही साहित्य को जन्म देती है , परन्तु जीवन में सम की अपेक्षा की जाती है। इसके लिए सन्तोषजनक समाधान समझना आवश्यक है। हमारे ऋषि-मुनि इस बात को हजारों साल पहले ही समझ चुके थे। ''प्रजनार्थ स्त्रिय़: सृष्टा सन्तान कार्य: मानवत्।'' अर्थात दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। इसलिए साधारण से साधारण धर्म-कार्य का अनुष्ठान भी पत्नी के साथ ही होना चाहिए। जहाँ पति-पत्नी एक-दूसरे को बहु भांति खुश रखते हैं, उसी कुल में सब सुख और ऐश्वर्य निवास करते हैं। ऋगवेद में नारी को प्रसन्न रखने का एक ही उपाय बताया गया है, 'हृदय की शुद्धि' जो मन में हो, वही व्यवहार में , और व्यवहार मन से हो। अन्यथा स्त्रियों का मन नाना रूपवाला है और विविध बातें सोचने पर मजबूर हो जाता है। (श्लोक. 36)। नारी के लिए ओजस्विनी होना आवश्यक है । उसमें अपने चरित्र की रक्षा करने की सामर्थ हो और वह समाज में अपना अधिकार प्रस्थापित कर सके। (51) । नारी अजेय और शत्रु-विजयनी है। उसे सहस्त्र-वीर्या कहा गया है, अर्थात एक नही, सहस्त्र सामर्थ वाली है। (47)संकोच छोड़कर आगे बढ़ती है और अज्ञानरूपी अंधकार दूर करती है। (50)। ऐसी नारी की शिक्षा का दायित्व समाज का है। जहां नारी की पूर्ण सुरक्षा हो वही राष्ट्र सुरक्षित है।(83)। वह नृत्यकला आदि सीखती है। सुन्दर वस्त्र, स्वर्णाभूषण आदि पहनती और सुगन्ध लगाती है। पलंग पर सोती है। अर्थात वैदिक नारी तिरस्कृत और उपेक्षित तो कदापि नहीं थी। ऋगवेद में नारी को ''कल्याणीजया '' यानि सुमंगला और '' कुलपा '' अर्थात परिवार का पालन-पोषण करने वाली कहा गया है। गृहिणी ही घर है ऐसा भी कहा गया है। लज्जाशील, मधुर-भाषिणी और प्रसन्नचित होना उसके प्रमुख गुण बताए गए हैं। उसे प्रेम या स्वयंबर विवाह करने का अधिकार है। प्रेम या योग्यता के आधार पर हुआ विवाह ही श्रेष्ठ है। मनु स्मृति में कन्या के रजस्वला होने के तीन वर्ष उपरान्त ही विवाह का विधान बताया गया है, इस तरह बाल विवाब वर्जनीय हुआ। आत्मरूप पुत्र, पुत्री समान हैं। '' य़थैव आत्मा तथा पुत्र: , पुत्रेण दुहिता सम:।'' नारी हित का जितना सुन्दर वर्णन वेदों में है , अन्यत्र कहीं नहीं। यदि हम आज अपनी हजारों साल पुरानी वैदिक संस्कृति पर चल रहे होते तो भारत आज एक सशक्त समाज होता और यहां देवताओं का वास होता। मनु स्मृति से उद्धृत '' यत्र नार्या: पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता '' तो प्राय: सभी ने सुना होगा, पर ऋगवेद में भी माता, पिता, आचार्य और अतिथि के साथ स्त्री के लिए पति और पति के लिए पत्नी ये पांच देवता बताए गए हैं। । इनकी पूजा पंचायतन और वेदानुकूल देव-पूजा है। इतनी सहनशील और स्वार्थ-हीन संस्कृति कम समाजों में ही देखने को मिलती है, परन्तु सैकड़ों साल की पराधीनता ने भारत को अपंग और असहनशील समाज बना दिया। साहित्य और संस्कार नष्ट से हो गए। कौटिल्य शास्त्र में लिखा है कि जिस समाज को नष्ट करना हो उसका साहित्य नष्ट कर दो। विदेशी अतिक्रमण सहते सहते भारत की सहस्त्रवीर्या और कुलपा नारी अबला बन गई। जर और जोरू की तरह उसका भी आरक्षण जरूरी हो गया और घूंघट डालकर उसे घर में बिठा दिया गया।
कौटिल्य ने कहा, स्त्रियों का विश्वास मत करो, उनमें समझदारी और समाज का अनुभव नहीं होता। उनका अति सहवास दोष उत्पन्न करता है। शायद यही वजह थी कि तुलसीदास ने भी उसे ताड़ना का अधिकारी बताया। मूढ़ अधम जड़मति नारी कहा। कोमल और कमजोर तो वह हमेशा से ही थी और पुरुष के बिना अभूरी भी, ''जिउ बिन देह, नदी बिन बारी, तैसेहु नाथ पुरुष बिन नारी।'' फिर भला आरक्षण में कैसे वह अपने को सबला सिद्ध कर पाती? मनचलों का मनोरंजन जरूर बनकर रह गई। '' अबला जीवन अब तुम्हारी बदल गई कहानी, आंचल में छिपी आरक्षित जवानी।'' या फिर '' एक नहीं, दो दो मात्रायें, नर से भारी है नारी। ''
विश्व चाहे कितना भी उन्नतिशील क्यों न हो जाए, नारी आजभी वहीं-की-वहीं खड़ी है। पुरुष पर आश्रित। आश्रय चाहे पिता का हो, भाई का , पति का या पुत्र का। आज की नारी पुरुष की समस्या नहीं कठपुतली बनगई है। पुरुष प्रधान समाज में उसे पुरुष के बताए मार्ग पर ही चलना होगा। यदि वह स्वयं स्वतंत्र मार्ग अपनाती है तो पग-पग पर शोषण और विघटन का शिकार बनती है। वस्तुत: समाज और साहित्य की सबसे बहिष्कृत और बदनाम वही नारियां हैं ,जो अपने शरीर और मन को अपने अभिभावकों और स्वामियों तक सीमित नहीं रख पाई हैं। सतीत्व पर उंगली उठने पर सीता को भी अग्नि-परीक्षा देनी होगी। बुद्धत्व की खोज में निकला गौतम पत्नी यशोधरा को यूं ही, बिना बताए ही त्याग सकता है। द्रोपदी का जुआरी पति उसे दांव पर लगा सकता है। नारी वास्तव में एक वस्तु ही तो है। भोग व संतानोत्पत्ति का साधन। संपति की तरह उसे लूटा जा सकता है। लड़कर जीता जा सकता है। और जरूरत पड़ने पर द्रौपदी की तरह आपस में बांटा भी जा सकता है।
अपराधी चाहे कोई भी हो, अपराध हमेशा नारी का ही सिद्ध होता है। क्योंकि जज और ज्यूरी दोनों ही पुरुष हैं। गौतम की अहिल्या की तरह सैकड़ों नारियां आजभी पाषाण प्रतिमा बनी आत्म-संताप के जंगल में तिरस्कृत खड़ी हैं, क्योंकि छलने वाला इन्द्र और श्राप देनेवाला गौतम दोनों ही पुरुष हैं। राम जैसे सहृदय और उद्धारक तो बिरले ही इनकी कुटिया में आते हैं। सारा ढांचा ही पुरुष के पक्ष में है। वस्तुत: वह चारो तरफ से नारी को घेरे हुए है और अपने चंगुल में फंसाने के प्रयत्न में निरंतर रत भी है। जो नहीं फंसती, या बलात्कारी कहकर न्याय मांगती हैं, बदचलन सिद्ध होती हैं। यदि कहीं किसी स्त्री ने पुरुष को पाना चाहा तो उसे क्रोध और पश्चाताप की अग्नि में जलना पड़ता है। शूर्पणर्खां की तरह नाक-कान कटवाने पड़ते हैं। पति कैसा भी हो, '' वृद्ध,रोगवश, जड़, धनहीना,अंध, बधिर, क्रोधी, अति दीना/ऐसेहु पति का किया अपमाना, नारी पावहु जमपुर दुख नाना।'' उसके लिए तो '' सपनेहु अन्य पुरुष जग नाही।'' काश ! तुलसीदास भी सूरदास की तरह नारी का हृदय पहचान पाते ! जान पाते कि नारी के पास तो बस एक ही हृदय होता है, जिसे वह प्यार और समर्पण के साथ एक ही आराध्य को सौंप पाती है। '' ऊधो मन नाही दस बीस/एक हुतो जो गयो श्याम संग / को आराधै ईस। '' प्रेम-विह्वल मीरा के भी तो सिर्फ एक ही गिरधर गोपाल हैं। ''दूसरा न कोई। ''
परन्तु मां के रूप में नारी की हर साहित्य और समाज, दोनों ने ही भरपूर प्रशंस्ति की है। '' जननी, जन्मभूमि स्वर्गातपि गरीयसी।'' (वाल्मीकि रामायण) । '' नास्ति मातृसम गुरु।'' या '' माता निर्माता भवति।'' (महाभारत) वगैरह वगैरह। श्रद्धा के रूप में प्रसाद द्वारा वर्णित नारी समस्त भारतीय समाज और साहित्य का गौरव बनी। ''नारी तुम केवल श्रद्धा हो, पीयूष श्रोत सी बहा करो जीवन के सुन्दर समतल में।'' निश्चय ही पुरुष ने नारी की पूजा भी की है और उसके लिए बड़े से बड़े त्याग भी किए हैं। पर आधुनिक नारी को इस एकाग्र आस्था का प्रत्यक्ष प्रमाण चाहिए। वह अब और दीवारों पर टंगी तस्बारों सी चुप नही रह सकती , सुन्दर सजी गुड़िया बनकर जीते-जीते ऊब चुकी है वह। खोखले पुरुषत्व का शून्य उसे दिखाई देने लगा है। '' तुम इतने रीते से, बीते से, चटकती धूप के निर्वीकार उजीते से, अपने व्यक्तित्व को मुझमें उड़ेल देना चाहते हो/ मैं कैसे जानूँ यह बड़ा सा शून्य तुम्हारा स्वभाव है या अभाव।''(ममता कालिया)।
परन्तु राजा और रानी दोनों में से एक भी अनुपस्थित हो तो न तो कोई कहानी बनती है , ना ही जीवन। नर और नारी, दोनों को ही समस्त आपसी अभाव और विषमताओं को भूलकर एक दूसरे को अपनाना होगा। वैसे भी नारी की महत्ता को तो नर और नारायण सभी जानते हैं, शायद यही वजह है कि मां के आगे प्रकृति ने शिशु को नतमस्तक ही भेजा है और शिव भी परमत्व अर्धनारीशवर रूप में ही पा सके हैं। अपने वात्सल्यपूर्ण हृदय और सृजनात्मक क्षमता के संग नारी बहु कल्याणी है और सहज रूप से ही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में योगदान का सामर्थ रखती है। अनसूइया की तरह गंगा बहाकर ला सकती है। सावित्री बन मृत-पति सत्यवान को पुन: जीवन दिला सकती है। वह तो झांसी की रानी की तरह शूर वीरा है और उर्मिला व सुमित्रा सी त्याग-मूर्ति है। मदर टेरेसा की तरह दीन-हीनों की मां बनना जानती है। राजनीति, समाज-सेवा, साहित्य, हर क्षेत्र में उसने नेतृत्व किया है। इतिहास इसका साक्षी है। सरस्वती, दुर्गा, काली, सीता, राधा, शारदा, शैव्या जैसी देवियां आजभी हमारे बीच में ही रहती हैं। जरूरत है उनके सात्विक गुणों को उभारने की। जरूरत है उस साहसी जन-समुदाय की, जो एक प्रज्वलित प्रकाश-पुंज-सी दीप्त नारी को मशाल की तरह हाथ में उठाकर पथ को उजागर करने की क्षमता रखता हो। कोई स्वयं को जला ले तो यह अग्नि का दोष नहीं होता। त्रसित, क्षुब्ध नारी, क्षुब्ध अग्नि की तरह सिर्फ कलुषित धूमिल रेखा ही है, यह सच नहीं। उसके अंश-अंश में बसी सौंदर्य और कल्याण की चिनगारियां भला कब और कौन बुझा पाया है!
Mock me not
As a weaker sex
I will rise again and again
From my own ashes
Like the Phoenix
But who gave this
Woe to my name
In this man dominate world
Yes, I'm the wo(e)man
Power absolute.
King maker.
Not a mere king!
(extract from Woman by Shail Agrawal)
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कविता (धरोहर)