सोच और संस्कारों की साँझी धरोहर

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Reflecting upon Truth/अंक 2 अप्रैल 2007-

 

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   अपनी बात

 

 

वक्त पंख लगाकर उड़ रहा है और देखते देखते लेखनी का दूसरा अंक आपके हाथों में है। पहले अंक पर जो भी प्रतिक्रियाएं और शुभकामनाएं मिलीं लेखनी आभारी है, ऐसे ही संवाद जारी रहे और लेखनी आप सबके भरपूर स्नेह व रुचि के लायक बनी रहे,  इसी विश्वास के साथ इस बार लेखिनी सच की सियाही में डूब गई है---सच जो सिपाही की तरह जीवन के मोर्चे पर भी है और प्रिय या इष्ट की तरह हृदय में भी, सच जो एक अहसास भी है और एक कर्तव्य भी--- नहीं वह नहीं, जिसे हम आप सच की तरह जानते या मानते हैं, अपितु  हमारे बेहद  निजी और एकाकी सच--- 

 

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स्मृति-शेष

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15 वीं पुण्य तिथि पर

 

बनारस में

जब मैने वहां

आंसुओं की श्रद्धांजली दी थी

और यादों का

एक और दिया

लहरों पर बहाया था

जब मैने वहां

प्रार्थना की थी

उद्दाम उन लहरों से

बहती उन हवाओं से

कि भाव पुष्पों से भरी 

मेरी इस नाव को

तुम तक ले जाएँ वे 

जब मैने वहां

याद किया था

बहते दियों संग

बिछुड़े उन प्राण को

तो बोलो भगवाल

क्या तुमने भी देखा था

कैसे मेरी गंगा मां का

जल से भरा मन

कुछ और ही

उमड़ आया था

और सूखे पत्तों की

नाव में बैठा

अकेला वह दिया

दूर कहीं जाकर

अनन्त;

छू आया था ---

*

शैल अग्रवाल

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अप्रैल--2007.

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अपने अपने सच

शैल अग्रवाल

सच अज्ञान के अँधेरे को चीरता उजाले की तरफ ले जाता है, मोक्ष दिलवाता है और अंत में हमेशा इसीकी जीत होती है, यह तो थी वेदकालीन ऋषि मुनियों की सार्व भौमिक सच की परिभाषा---पर क्या इसके अलावा कुछ और सच भी नहीं, जो बस हमारे अपने होते हैं----  मन की तहों के अन्दर सिमटे-लिपटे,चेतना के आकाश पर ध्रुवतारे से अटल---चन्द यादें और उम्रभर की पसंद,नापसंद, सफलता-असफलता ,---पहुंच से परे की वे नामुराद इच्छाएं--- सुनहरे सपने और सलेटी बादल, आकंक्षाओं के गगन चुम्बी शिखरों के पीछे से झांकते---जहां कभी मंजिल ही रास्ता बन जाती है तो कभी रास्ते खुद मंजिल बनकर आजीवन मार्गदर्शन करते हैं।

जिन्दगी को चाहे हम सिगरेट की तरह कश पे कश पी लें, या यह ही हमें चुटकियों में लेकर धुंए-धुंए उड़ा दे ,एक बात तो निश्चित है कि वक्त की हल्की सी भी हलचल हुई नही कि उंगलियों पर जमी राख पैरों तले बिछे कालीन (यथार्थ) पर आ गिरती है । औरफिर इन्ही आधे अधूरे जलते-बुझते निशानों से उठती है एक कसक, एक चाह, और शुरु हो जाती है आंख मिचौली, एक दीवनगी, जो कभी एक कविता तो कभी एक लक्ष, एक इरादा बनी आंखों में समा जाती है---जीने का संबल और आधार बन जाती है। साधारण आदमी को भी लौह पुरुष बना अदम्य शक्ति का संचार कर देती है। लोहा जितना गरम, प्रहार उतना ही तीव्र---सृजन तो कभी विध्वंस का कारण बनती है। संसार को कभी पिकासो और टर्नर देती है तो कभी एटम बम।

यही सृजन और विध्वंस ही तो प्रकृति के अटल नियम या सच भी हैं। वैसे भी टूटना और जुड़ना, दोनों ही  सृजन  प्रक्रिया के दो अनिवार्य पहलू हैं, एक को पाने के लिए दूसरे से कहीं न कहीं गुजरना ही होता है।  शायद इसी प्रकरण को अरस्तू ने कैथारसिस का नाम दिया था---तोड़कर कुछ जोड़ना, गालिब भी तो कुछ ऐसा ही कह रहे थे, जब दर्द को ही दवा कह रहे थे । यही कुछ बदलने, या तोड़ने और जोड़ने (सुधार) का दर्द ही तो सहिष्णु और ममतामयी गौरी को दुर्गा और काली बनाता है, या फिर शिव से ताण्डव करवाता है।

गौर से देखें तो सच दो तरह के होते हैं; एक तो वह जो स्थूल या प्रमाणित होता है, जैसे आकाश में सूरज चन्दा और धरती पर नदी, पेड़, पहाड़, आदमी, जानवर आदि। इन्हें हम देख सकते हैं और ये करीब करीब एक निश्चित आकार और स्वरूप के ही होते हैं । जैसे जाड़े के बाद बसंत ऋतु, फिर ग्रीष्म और बरसात आदि आदि --यह चक्र सदियों से चला आ रहा है और ऐसे ही चलेगा। दूसरे हैं व्यक्तिगत सच, जो मनुष्य के अपने अनुभव, शिक्षा, परिवेश, और संस्कार, योग्यता, पसंद नपसंद के आधार पर  बनते हैं और उसे भी बनाते या बिगाड़ते हैं---एक सपना, एक याद, एक अनुभव, या फिर एक सीख, एक संकल्प-सी इतनी तीव्र हो जाए कि सांसों सी जीवन की जरूरत बन जाए, तो वही तो है हमारा निजी या व्यक्तिगत सच। वैसे भी जो दिन-रात प्रेरित करे , आँखों से हटे ही नहीं, उसे सच नही तो और क्या कहेंगे ? हमारी शकल -सूरत, परिस्थितियों योग्यता--पहचान की तरह, यह भी  हमारे बेहद अपने और व्यक्तिगत होते हैं, हमारे अपने-अपने निजी सच !

पर शरीर और आत्मा की तरह साथ साथ रहते हुए भी, क्या ये निजी सच, सामूहिक और सामाजिक सच से पूर्ण सामंजस्य रख पाते हैं ? शायद नहीं ! क्योंकि  यही सच देश के लिए प्राण न्योछावर करते वीर का भी है और नफरत में जान लेते हत्यारे या आतंकवादी का भी। दोनों की ही सोच उतनी ही गहरी और सच्ची है उनके लिए। प्रेम या वात्सल्य में अपना सबकुछ लुटा देने वाली ममता हो या फिर परियों और राक्षसों में विश्वास करने वाले बालक का मन--दोनों  ही अपने संसार में पूरी तरह से डूबे रहते हैं और समय के उस पड़ाव पर वही उनके जीवन का सबसे बड़ा सच होता है।  पर इसी टकराव ने तो ऐसे नतीजे पैदा किए हैं,  जिनके बल पर इन्सान चांद पर जा पहुंचा है, गौतम, गांधी और हिटलर, मुसोलिनी पैदा किए हैं। मदर टैरेसा और ईशू जैसी लगन और निष्ठा व समर्पण, बिन लादेन जैसी दीवानगी, सभी का यही तो जिम्मेदार रहा है। यही ताजमहल बनाता है और यही अमेरिका के ट्रेड सेन्टर को उड़ाता है। इसी के बल पर देश जातियां और कुनबे संवरते हैं और इसी के प्रहार से हिरोशिमा व नागासकी का विनाश होता है। जैसे सफेद काले दो ही रंग नही होते, उनके बीच में एक पूरा इन्द्रधनुष समाया होता है, आदमी और उसके सच की संभावनाओं का विस्तार भी अछोह है और रंग भांति-भांति के। मन और अस्तित्व की तहों में रचा-बसा यह सच आजीवन ही हमारे साथ रहता हैं और हमारी मान्यताओं और विचारों पर गहरा प्रभाव छोड़ता है । बीजरूप में यही हमारे व्यक्तित्व की इमारत की नींव का पत्थर है---हमारा अचेतन मन है। इसी सच को नकारने या झुठलाने के प्रयास में आदमी हजार कुंठाएं और रोग भी पाल सकता है और इसी सच के सहारे माटी का पुतला अदम्य साहस भी जुटा पाता है---मुश्किल से मुश्किल काम हंसते-हंसते कर ले जाना ---नश्वर शरीर के होते हुए भी अनश्वर आत्मविश्वास जुटा पाना---- अस्तित्व पर फैले आकाश सा शाश्वत बन जाना, संभव हो पाता है क्योंकि ईश्वर सा ही करीब करीब हर पल यह साथ जो रहता है हमारे। ऐसे कई युग-पुरुषों के उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है, जिन्हे किसी एक घटना ने इतना धिक्कारा, या प्रेरित किया कि उनके जीवन की धारा ही मोड़ दी, फिर चाहे वे युग-पुरुष गान्धी हों या जीवन का सार ढूंढते गौतम बुद्ध--- सहना या लड़ना, दोनों यही तो सिखलाता है हमें। इसी संदर्भ में याद आ रही है दिनकर जी की कविता ''चांद और कवि''--

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।

जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।

आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का
आज बनता और कल फिर फूट जाता है
किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो?
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।

मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,
देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?

मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ,
और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,
इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ।

मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है,
बाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।

स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे-
रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।

तो क्या विचारों का सच भौतिक सच से ज्यादा बलवान है---शायद नहीं। कहीं आप यह तो नहीं सोच रहे कि सच और सपने  से भ्रमित हो रही हूँ और दोनों को गडमड कर रही हूँ, नहीं ! सच और सपने में वही फर्क होता है जो यथार्थ और कल्पना में है, भौतिक या प्रमाणित सच को हम नकार नहीं सकते, पर अपने अस्तित्व को, खुद को नकारना भी तो आसान नहीं। इसी कल्पना और यथार्थ के सच की उलझन और ऊब को बहुत खूबसूरती से चित्रित करती है बच्चन जी की यह कविता,

लो दिन बीता, लो रात गई

सूरज ढलकर पश्चिम पहुंचा,

डूबा, संध्या सी वह संध्या थी,

क्यों उठते उठते सोचा था,

दिन में होगी कुछ बात नई।

लो दिन बीता, लो रात गई।

 

धीमे धीमे तारे निकले,

धीरे धीरे नभ में फैले,

सौ रजनी सी वह रजनी थी

क्यों संध्या को यह सोचा था,

निशि में होगी कुछ बात नई।

लो दिन बीता, लो रात गई।

 

चिड़िया चहकीं, कलियां महकीं,

पूरब से फिर सूरज निकला,

जैसे होती थी सुबह हुई।

क्यों सोते सोते सोचा था,

होगी प्रात: कुछ बात नई।

लो दिन बीता, लो रात गई।

माना हर सपने का जन्म किसी सच की ही कोख से होता है और हर सपना एक सच बनने की गुंजाइश भी रखता है , पर जरूरी नहीं कि हर सपना सच हो (मूर्त रूप ले) नतीजा लगन की तीव्रता और जरूरत के साथ साथ और भी कई तथ्यों पर भी तो निर्भर करता है। पर सच तो दोनों ही हैं, आखिर यही आँखें ही तो सच और सपने, दोनों को ही संजेती हैं।  सच भी सपना बनकर अदृश्य हो सकता है और भटका और तड़पा सकता है और अक्सर एक सपना भी सच्चे साथी-सा (मूर्त या अमूर्त रूप में) साथ रहकर अटूट सामर्थ भर देता है , जीने का मकसद बन जाता है। व्यर्थ के तर्क-वितर्कों में न पड़ते हुए हमें यह मानकर चलना चाहिए कि दोनों ही तरह के (यथार्थ और धारणात्मक) सच की अपनी अपनी जगह और जरूरत है। चाहे कैसा भी और कोई भी सच हो , आंखों-सा ही, यह हमें जरूरत अनुसार ही दृश्य दिखलाता और समझाता आया है या हम वही देखते और समझते हैं, जो देखना या समझना चाहते हैं क्योंकि दुनिया की अन्य सभी जीवित वस्तुओं की तरह इस के भी  भिन्न -भिन्न स्वभाव, जरूरतें और दृष्टिकोण होते हैं, जो सदियों से ही हमारी समझ और राग-द्वेष से तुड़ते-मुड़ते व रंगते रहे हैं। व्यक्तिगत परिस्थिति, परिवेश और समाज के अनुसार सच का रूप ही नहीं, परिभाषाएं तक बदल जाती हैं। किसी एक व्यक्ति का सच आसानी से दूसरे का झूठ भी हो सकता है, जैसे कि हमारी संस्कृति में विवाह के पूर्व शारीरिक यौन संबन्ध असमान्य समझे जाते हैं , तो पाश्चात्य देशों में यह एक साधारण सी बात है और पूरी तरह से सामान्य हैं। विभिन्न सामाजिक मान्यताओं में इस तरह के टकराव के हमें कई उदाहरण मिल जाएँगे। हमारे यहां चचेरे मौसेरे भाई बहनों का रिश्ता भी सगे भाई बहनों सा ही पवित्र है, परन्तु कुछ समुदायों में यही शादी की अनिवार्य सी शर्त है। परन्तु इसका यह मतलब नही कि आज के विश्वीकरण के इस युग में, हर समाज हर सच को अपनी जरूरत और चाहत का चोला पहनाने की, या मनमानी करने की इजाजत देता है, या फिर हम सफेद झूठ का सहारा लेकर मनमानी कर सकते हैं। बेधड़क आगे बढ़ सकते हैं। मनसा, वाचा, कर्मणा, सामाजिक संदर्भ में हमें कल्याणकारी सच को ही अपनाना होगा, या फिर नीर क्षीर विवेकी होकर ही प्रस्तुत करना और पहचानना होगा । हां कला और व्यक्तिगत राग अनुराग में हम इसे कल्पना की उड़ान दे सकते हैं। फिर अक्सर सबकुछ जानते हुए, साहस होते हुए भी हर सच का हिमायती नही बना जा सकता क्योंकि कायदे कानून और प्यार व नफासत के दायरे में बंधा यह समाज ---और इसके नियम यह इजाजत नहीं देते और मनुष्य आजभी , इस इक्कीसवीं सदी में भी एक सामाजिक प्राणी है और यही उसके हित में भी है। हां, कपड़े फाड़कर खुद को पागल करार दे दे, तो बात दूसरी है। हमें तो वैसे ही चलना होगा जैसे समाज या दुनिया चाहती है, चाहे वे अमेरिका के प्रेसिडेंट हों या ईराक के शाषक---इंगलैंड की भावी साम्राज्ञी हो या नेपाल की---वरना नतीजा क्या होगा, सभी जानते हैं !

शायद यही वजह है कि उन्ही दो आँखों में बसकर भी कल्पना और यथार्थ के सच में बहुत अंतर होता है और हमें समाज के अंदर रहते हुए ये दूरी रखनी ही पड़ेगी। कई बार सबकुछ जान समझकर भी चुप रह जाना पड़ता है(सामूहिक हित के लिए धारणात्मक सच की बलि के कई उदाहण हमें आदिकाल से ही मिल जाएंगे, जैसे कि द्रोणाचार्य को कमजोर करने के लिए युधिष्ठिर जो सत्यवादी थे उनके मुंह से अश्वत्थामा हाथी की मृत्यु की खबर का प्रसारण, वह भी योगेश्वर कृष्ण द्वारा) क्योंकि स्थूल सच तो बस सच होता है उसमें अच्छे बुरे का विवेक नही होता और यही विवेक ही स्थूल सच को धारणात्मक सच बनाता है। अपने संत और विद्वान भी तो यही समझा रहे थे  जब उन्होंने कहा था कि ''सत्यं वद्, प्रियं वद्। मा वद्, सत्यं अप्रियम्।'' हां व्यक्तिगत संदर्भ में मन-माफिक सत्य को अपनाने का पूर्ण अधिकार है किसी भी व्यक्ति को, बल्कि अधिकार ही नही, जरूरी भी है यह। पर यहां भी विवेक को तो नहीं ही छोड़ा जा सकता। जड़ वनस्पति भी फलने फूलने के लिए वही अपनाती है जो उसे चाहिए या जो उसके लिए हितकारी है। इस संदर्भ में हमें यह भी नही भूलना चाहिए कि  देखने वाले की योग्यता और दृष्टि कैसे भी देखे, पर सच तो सच ही रहता है--अपरिवर्तनशील और अटूट। जैसे कि हम किसी भी दृष्टि से देखें आधा भरा गिलास, और आधा खाली गिलास दोनों ही सही वक्तव्य हैं और सच भी हैं, बस दृष्टिकोण और विश्वास में फर्क है। अखंड और भौतिक सच ऐसे होते हैं, जिन्हें हम चाहकर भी नहीं बदल सकते, जैसे कि जीवन और मृत्यु का शारीरिक सच। पर अब अगर हर बात, हर जीवन एक सांस-हीन शून्य पर ही अटक जाए तो फिर क्या रहजाता है शेष और अशेष, समझने या समझाने को, ऐसा सोचकर हाथ पर हाथ धरकर भी तो नही बैठा जा सकता--- हमें तो बस यही मानकर चलना चाहिए कि वाकई में सच वही है जो अंधेरे से उजाले की तरफ ले जाए, अब यह अंधेरा चाहे विचारों का हो या फिर इन्द्रियों के यथार्थ का !

कितनी भी हम इस सच की पड़ताल कर लें, इन गुत्त्थियों को सुलझाना इतना आसान तो नही, क्योंकि मात्र बचपन में ही नही, आजीवन ही ' तोड़ने के लिए ही रेत के घरौदे बनाता ' मानव स्वभाव तो नही बदला जा सकता। कितना भी भटकें, समाज और संसार को दोष दें, अक्सर हम खुद ही अपने मित्र और सबसे बड़े शत्रु होते हैं। अमृत और गरल में से क्या पीना है अधिकाशत:, यह स्वेच्छा पर ही होता है। वैसे भी, ज्ञान भी तो बेहद व्यक्तिगत  समझ है और व्यक्ति विशेष की निजी पात्रता पर ही निर्भर करता है। ज्ञान के साथ अगर सुख-शान्ति है, तो ठीक से न पचा पाओ तो गलानि और कुंठाओं की अपच भी तो है, अन्य किसी भी औजार की तरह यह भी एक औजार है और संयम व सिद्ध-हस्तता मांगता है । फिर एक कर्मरत इन्सान को इन वाद विवादों में पड़ने की क्या जरूरत --गीता में भी तो जीवन का सबसे बड़ा धर्म कर्म ही बताया गया है? हां, अति जरूर किसी चीज की भी अच्छी नही होती--कला और साहित्य में तो अतिशयोक्ति एक अलंकरण हो सकता है जीवन में नहीं। कल्पना का संसार कितना भी इन्द्रधनुषी हो, पैरों के नीचे तो आज भी वही यथार्थ की धरती ही चाहिए।  हर सुख दुख को अपनाते, नटी की तरह संतुलन रखते हुए चलते जाना , क्या यही जीवन नहीं---जीवन का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण सच नहीं-----============================================================================

 

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कविता (धरोहर )

सब कुछ कह लेने के बाद
कुछ ऐसा है जो रह जाता है,
तुम उसको मत वाणी देना ।

वह छाया है मेरे पावन विश्वासों की,
वह पूँजी है मेरे गूँगे अभ्यासों की,
वह सारी रचना का क्रम है,
वह जीवन का संचित श्रम है,
बस उतना ही मैं हूँ,
बस उतना ही मेरा आश्रय है,
तुम उसको मत वाणी देना ।

वह पीड़ा है जो हमको, तुमको, सबको अपनाती है,
सच्चाई है-अनजानों का भी हाथ पकड़ चलना सिखलाती है,
वह यति है-हर गति को नया जन्म देती है,
आस्था है-रेती में भी नौका खेती है,
वह टूटे मन का सामर्थ है,
वह भटकी आत्मा का अर्थ है,
तुम उसको मत वाणी देना ।

वह मुझसे या मेरे युग से भी ऊपर है,
वह भावी मानव की थाती है, भू पर है,
बर्बरता में भी देवत्व की कड़ी है वह,
इसीलिए ध्वंस और नाश से बड़ी है वह,

अन्तराल है वह-नया सूर्य उगा लेती है,
नये लोक, नयी सृष्टि, नये स्वप्न देती है,
वह मेरी कृति है
पर मैं उसकी अनुकृति हूँ,
तुम उसको मत वाणी देना ।

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

 

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कविता (धरोहर)


लौट रहा हूँ मैं अतीत से

देखूँ प्रथम तुम्हारे तेवर मेरे समय! कहो कैसे हो?

शोर शराबा चीख़ पुकारें सड़कें भीड़ दुकानें होटल

सब सामान बहुत है लेकिन गायक दर्द नहीं है केवल

लौट रहा हूं मैं अगेय से

सोचा तुमसे मिलता जाऊं

मेरे गीत! कहो कैसे हो?

भवन और भवनों के जंगल चढ़ते और उतरते जीने

यहाँ आदमी कहाँ मिलेगा सिर्फ मशीनें और मशीनें

लौट रहा हूं मैं यथार्थ से

मन हो आया तुम्हे भेंट आऊँ

मेरे स्वप्न! कहो कैसे हो?

नस्ल मनुज की चली मिटाती यह लावे की एक नदी है

युद्धों का आतंक न पूछो खबरदार बीसवीं सदी है

लौट रहा हूँ मैं विदेश से

सबसे पहले कुशल पूछ लूँ

मेरे देश! कहो कैसे हो?

यह सभ्यता नुमाइश जैसे लोग नहीं हैं सिर्फ मुखौटे

ठीक मनुष्य नहीं है कोई कद से ऊंचे मन से छोटे

लौट रहा हूँ मैं जंगल से

सोचा तुम्हें देखता जाऊं

मेरे मनुज! कहो कैसे हो?

जीवन की इन रफ्तारों को अब भी बांधे कच्चा धागा

सुबह गया घर शाम न लौटे उससे बढ़कर कौन अभागा

लौट रहा हूँ मैं विछोह से

पहले तुम्हे बांह में भर लूं

मेरे प्यार! कहो कैसे हो?

चन्द्रसेन विराट 

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कविता आज और अभी

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कहीं

चीखते शहर में

खामोशी का मोहल्ला

कोई तो होगा।

 

कहीं तो होगी

खामोशी की जुबान की बस्ती,

जहां न घंटे घड़ियालों का शोर होगा

न अजानों की आवाजें।

 

कहीं तो होगी

कभी न खत्म होने वाली वो गली

जहां न डींगे होंगी, न दावे

जोर जोर से मेजों पर गिरते।

 

जहां लोग बतियाते हंसते होंगे

खामोशी से।

 

जरूर होगा वो घर

जहां कुछ बांटने के लिए

शब्दों की जरूरत नहीं होती।

 

जरूर होगा ये सब

कहीं न कहीं

इसी चीखते शहर में

 

मैं ढूँढ लूंगा

चुपचाप।

अरुण अस्थाना 

 

*

 

मुखरित मौन

उसकी खामोश चीखों से

तंग आकर मैं उसे

अपने घर में उठा तो लाई

पर अब सोचती हूँ

इसकी आर्त आँखें

और व्यथित हृदय की

पीड़ा को सुनकर भी

क्या मैं कुछ कर पाऊँगी

मैने तो अभी-अभी

इसे भुलाकर भँवरों पर

तैरना सीखा है

कंटीले कांटे वाले

झाड़ को तोड़ा है

वैसे भी इसका साथ तो

किसी को भी रास नही आया

वन वन भटक कर

अग्नि परीक्षा देकर भी

सीता ने सिर्फ

बनवास ही पाया है

राधा का दीवाना कृष्ण भी तो

उसे छोड़ आया था

कभी मर्यादा के नाम पर

कभी कर्तव्य के नाम पर

हर बार

इसी को तो दफनाया गया है

सूली पर चढ़ाया गया है

असफल कामनाओँ का

कफन ओढ़े

घायल हठीला यह सच

अभी तक जिन्दा है, आश्चर्य है

मर जाए तो शायद अमर हो जाए

बेशर्म, मेरी नींद उड़ाकर

मेरे तकिए पर सर रखे

आराम से सो रहा है

और मैं सोच रही हूँ

इसे जगाऊं, बाहर फेंक आऊँ

पर ऐसा कब होता है