सोच और संस्कारों की साँझी धरोहर

 Lekhni-taking the heat 

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  तपिश- लेखनी-अंक-4-जून-2007


 

(सर्वाधिकार सुरक्षित) copyrights to writers and publisher only

संरचना व संपादन: शैल अग्रवाल. 

 

                                                        
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         अपनी बात

 इस बार मई-जून की असह्य तपिश में भारत जाने का मौका मिला। प्रचंड सूर्य की किरणों के नीचे दिल्ली हीरे सी चमक रही थी और एयर कंडिशन्ड कार के मंहगे नीले शीशों से अमलताश और गुलमोहर से लदी देहली की साफ-सुथरी वे सड़कें, इंडिया गेट और राष्ट्रपति भवन---सभी, काफी सुन्दर लग रहे थे ---आँखों को चकाचौंध कर रहे थे। नित नए खुलते यूरोपियन स्टाइल के मॉल , भव्य सड़कें और फ्लाई-ओवर व उनसे भी ज्यादा खूबसूरत लोग, अपने यूरोपियन परिधानों में मंहगे सन-ग्लासेज के साथ वाकई में एक समृद्ध भारत के सपने को साकार कर रहे थे पर जैसे ही कोई लाल बत्ती आती और गाड़ी रुकती, एक नया भारत आंखों के आगे आ जाता--भूखा, नंगा भारत--- आज भी दो वक्त की रोटी के लिए तरसता भारत---आंखों में सपने और छटपटाहट लिए, गिड़गिड़ाता और ललचाई आंखों से भरे पेट वालों को तकता भारत---' बस दस रुपए की ही तो बात है, ले लो ना मैडम! बच्चे के लिए खाना लाऊंगी, बहुत भूखी हूं।'  ---उसके बारे में सोचूं भी कि अगले पल ही दूसरा आ जाता ---

' कार की लेटेस्ट मैगजीन ले लो--- मर्सिडीज का नया मौडल अब भारत में --पढ़िए सारी खबरें बस दस रुपए में!' --होठों पर आई मुस्कान देखकर अठ्ठारह बीस साल का वह नौजवान तुरंत ही अपना अन्दाज बदल लेता है, ' ले लो ना दीदी आपके लिए, बस दस रुपए में, गरीब का भला होगा।' किस किस का भला कर पाऊंगी नही जानती,  पर शब्दों के नीचे दबी तड़प मजबूर कर रही है कि सभी का सामान खरीदती जाऊं; ' आगे जाओ, जरूरत नही भाई', जैसे शब्द मझली के कांटे से गले में फंसकर रह जाते हैं--इतना क्रूर. वीतराग और व्य़वहारिक होना भी तो आसान नही---ग्लानि और दुख दे रही है मेरी ही सोच खुद मुझे ही---शर्मिंदगी-सी जगा रही है। पर क्या करूंगी इन अनचाहे टिशू पेपर के डब्बे, धूपबत्ती के पैकेट और तीन चार कार, कम्प्यूटर और आधुनिकतम परिधानों की पत्रिकाओं का? नहीं जानती, फिर भी मन कहता है कि यह भीख मांगने जैसा ही होकर भी भीख मांगने से अच्छा है और मंदिरों में चढ़ावे की जगह ऐसे ही पैसे फेंकना ज्यादा सही भी है! 

जैसा कि दुष्यंत कुमार जी ने लिखा है कि " पर्वत हो गई है पीर, अब तो पिघलनी चाहिए।"  हर भारतीय को इस बारे में सोचना चाहिए। मिल बांटकर जीना भी एक आदत है, डालें तो पड़ सकती है। अगर अरबों से ऊपर की भारत की जनसंख्या में से दस करोड़ भी समृद्ध और हैसियत वाले विवेकी रोज दस, पचास, या सौ रुपए की मदद का  बीड़ा उठा लें, तो शायद भारत की यह गरीबी और गिड़गिड़ाहट अवश्य ही धीरे-धीरे मिटती चली जाएगी बिना किसी पर ज्यादा बोझ बने ---इतने पैसों से तो लोगों का रोज का पान-सुपारी या शौक-मौज, या फिर ब्यूटी पार्लर का बिल भी पूरा नहीं हो पाता, उसीमें यदा कदा कटौती सही।  रोज  संभव नहीं, तो फिर हफ्ते या महीने में एक दिन का , बस एक दिन का दान इन्ही असहाय और गुर्बत में उलझे दरिद्र नरायणों के नाम ? शायद किसी को भारी भी न लगे यह! किटी-पार्टी कल्चर के साथ-साथ अगर अपनी सखी-सहेलियों के साथ मिलकर, महीने-दो-महीने में एक दान-पार्टी भी अन्नपूर्णा गृहणियाँ आयोजित कर लें तो एक सम्पन्न भारत की तरफ निश्चय ही  यह  ठोस कदम होगा---एक अनाथ की वयस्क तक पढ़ाई-लिखाई का बोझ उठाना, उसकी देख-रेख करने वाले अभिभावक बनना, दूसरा कदम हो सकता है, जिसके बारे में भी  सोचा जा सकता है, यदि निजी परिस्थितियाँ अनुमति और सुविधा देती हैं तो? शायद छोटे मुंह यह सब बड़ी बातें लगें पर फैशन की अन्धी दुनिया में इस तरह के फैशन चलाने और प्रोत्साहन देने की बेहद जरूरत है। अक्सर असली मदद और सुधार बड़ी-बड़ी योजनाओं और सम्मेलनों से नहीं, आम आदमी से ही शुरु होते हैं।   

 जीवन में चारो तरफ फैली  यह आंच--- जठरानल, बड़वानल और प्रेमागनि व क्रोधाग्नि , जिससे हर इन्सान अपने अपने तरीके से आजीवन ही लड़ता रहता है, राहत ढूंढता है--- जाने किन-किन विकारों की तीव्रता और  झुलस लिए हुए होती है और हम सब अपने अपने स्तर पर, अपने-अपने तरीके से इन विचारों और अनुभवों के, जीवन के कटु सत्यों के प्रेशर-वाल्व को रिलीज करने की कोशिश में आजीवन ही लगे रहते हैं । किस्मत वाले हैं वह जिन्हें पता होता है कि ऐसा करने के लिए कौनसा बटन दबाना चाहिए, पर जिन्हें होश या समझ नहीं, जो अपनी परिश्थितियों और परेशानियों में आकंठ डूबे हैं, उनकी थोड़ी बहुत मदद हो जाए तो यह व्यक्ति-विशेष के लिए ही नहीं , पूरे मानव समाज के लिए भी अच्छा है। कई मानसिक तनाव, कुंठाएँ और अपराधों से बचाएगा यह हमें। कभी कहा जाता था कि जिओ और जीनो दो, आज के समाज की जरूरत है कि जिओ और दूसरों की जीने में मदद करो।

इस बार लेखनी का यह अंक, ' तपिश ' जीवन की उसी आंच या खलिश...उस बेचैनी से राहत ढूँढता, जीवन के हर उस खूबसूरत पल और आधे- अधूरे सपने व महत्वाकांक्षाओं के नाम, जो अनायास ही इस आंच में झुलस-झुलसकर स्वाहा हो जाते हैं और फटी बिबाइयों के साथ तपती सड़कों पर सहारा ढूंढती जिन्दगी(वह भी बन्द दरवाजों के पीछे बैठे लोगों से---एयर कन्डिशन्स औफिस में सोई सरकार से) मदद मांगती, बेबस और गुमनाम दम तोड़ देती है ।

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गरमीः चन्द कविताएं

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आई पगली

चंदन केवड़ा खस डूबी

बाल-बाल में गूंथे पलाश

फूल कनेर और अमलतास

पैरों में बांधे अग्नि-चक्र

धूल उड़ाती दौड़ती-भागती

आंखों में ले जलता अंगार

देख हंसा दरवाजे गुलमोहर

लो आ गई फिरसे पगली

मिज़ाज ज़रा इसका गरम

पर बुरी तो नहीं यह गरमी।

 

लीची आम से रस डूबे

मस्ती और ये सैर-सपाटे

पहाड़-समुन्दर बाग-बगीचे

ठंडे-ठंडे नदी किनारे

बेल फालसे का शर्बत

और पिय का मनचाहा साथ

गमकेगी फिर रात की रानी

बेला चम्पा और चमेली

मिजाज ज़रा इसका गरम

पर बुरी तो नहीं यह गरमी।

 

कैरम कम्प्यूटर और ताश

परीक्षा हो गई खतम

तो फिर किताबों का क्या काम

कुलफी बर्फ और आइसक्रीम

क्रिकेट पतंग औ धूम-धड़ाका

मन का होगा हर काम

बोले हंस-हंस चहकते बच्चे

खेलेंगे अब हम दिन-रात

मिजाज ज़रा इलका गरम

पर बुरी तो नहीं यह गरमी।  

 

 


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कटघरे में

सुनते हैं सूरज अब

नीचे उतर आया है

फट गए हैं सब कपड़े

और अपनी इस हालत पे बेचारा

बहुत ही परेशान है

ढूंढता है अब वह

घर घर गली गली

कौन है जिसने

लगाई यह सेंध

किसके लालच ने

आसमानी खिड़की को

तोड़-फोड़ डाला है

और हम डरे-डरे

अंधेरे कमरों में बन्द

करते इंतजार

चुपचाप खींच परदे

महीने दो महीने

चार छह महीने

पूरे साल जब भी...

वह निराश होकर

लौट जाएगा

शाम को थक कर

सो जाएगा

या फिर रात के

घुप अंधेरे में

कुछ उसे

नज़र नहीं आएगा

और हम

इस कटघरे से

बाहर आ पाएंगे...  

 

 

 

                  

धूप किनारे पेड़ खड़े हैं साए के नीचे सड़कें

कितने हैं जो यूं दुख सहकर औरों को सुख देते।

                                                          — शैल अग्रवाल

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साहित्य में पर्यावरण की महत्ता

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डॉ. विमला उपाध्याय (धनबाद)

डॉ. बो.ड्रूस ने चेतावनी दी है 1990 से 2020 के बीच हर रोज 50 जीव और पादप प्रजातियां समाप्त हो जाएंगी। अगर वनों के कटान और औध्योगिक गैसों से उत्पन्न तापक्रम वृद्धि पर नियंत्रण न हो पाया तो भयंकर परिणाम होंगे।

चेतावनी जो आज सुनाई पड़ती है वह हमारे ऋषि-मुनियों ने बहुत पहले दी थी। उनकी चिंता निसंदेह दूसरे तरह की थीं। वे पृथ्वी को मां मानते हुए उनकी सुरक्षा, उनको संवारने, वर्षा और वन, जीव-जन्तुओं आदि के प्रति वे सदैव प्रस्तुत थे। इसका कारण था इन सबके प्रति इनका आत्मीय रिश्ता। यह संबन्ध प्राचीन ग्रंथों में मंत्र बनकर संचित है।

वृक्षान् छित्वा पशून हत्वा

         कृत्वा रुधिर-कर्दनम्

 स्वर्ग: चैत गम्यते मर्त्यै:

         नरक केन गम्यते?

   (पेड़ों को काटकर, जीवों को मारकर उनके रक्त को कीचड़ बनाकर ही यदि स्वर्ग जाया जाता हो, तो फिर नरक को जाने का मार्ग कौन सा है !)

वाल्मीकि वनों को पुत्रवत् मानकर उनकी ऱक्षा को सदैव तत्पर रहते हैं और चेतावनी देते हैं कि जो भी मेरे वन के पत्र अंकुर का विनाश और फल-फूल का अभाव करेंगे, वे निश्चित रूप से शाप के भागी होंगे। ऋग्वेद के पृथ्वी सूक्त में है --' माता भूमि पुत्रोsहम पृथ्व्या ' ' भूमि मेरी माता है और मैं इस पृथ्वी का पुत्र हूं।'

नदियां हैं माताएं, पर्वत पिता। पर्वत के आश्रय से नदियां निकलती हैं। नदी सदा नीरा है। कामदुधा पिलाती है, पालती है, पोषती है। नदी को मातृत्व यों ही नहीं मिला है, यह गंगा बनकर सगर के साठ हजार पुत्रों को तारती है-

' सगर सुवन सठ सहस

          परस जल मात्र उधारिणी ' 

एक है भौगोलिक गंगा, जो हिमालय से निकलकर अपने आसपास की भूमि व नगरों का सिंचन करती हुई बंगाल की खाड़ी में गिर जाती है। एक है सांस्कृतिक गंगा, मानस गंगा, जो श्री विष्णु के श्री नख से द्रवित होकर ब्रह्मा के कमंडल की शोभा बनती है, देवताओं का सर्वस्व, शिव के सिर माला और भगीरथ राजा के पुण्य का फल है।

श्री हरिपद नख चंद्र-

     कांतमनि द्रवित सुधारस,

ब्रह्म कमंडल मंडन

      भवखंडन सुर सबरस

शिव सिर मालती माल

       भगीरथ नृपति पुण्य फल

               -सत्य हरिश्चन्द्रः गंगा वर्णन 

यह मानवजाति का सांस्कृतिक सिंचन करती हुई शेषशायी विष्णु में समा जाती है। इसलिए गंगा की पवित्रता, मर्यादा की रक्षा के लिए मैथिल कोकिल विध्यापति गंगा में प्रवेश के पूर्व उनसे प्रार्थना करते हैं। 

एक अपराध छमव मोर जानी

       परसल माय पाय तुम पानी।

पर्यावरण कई तत्वों का संधान है। प्रकृति (पहाड़, नदी, वन, सागर, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, आकाश, ग्रह , नक्षत्र)  के साथ है मनुष्य का व्यवहार जगत। कल-कारखाने, उध्योग, प्रतिष्ठान, खनन, कृषि, आवास, नगरीकरण आदि में पर्यावरण की मर्यादा का ध्यान न रखकर मनमानी करना। कल-कारखानों की खतरनाक गैस को हवा में छोड़ना, कूड़ा-कचरा, मलवा बगल में फेंकना या नदी में बहा देना। कुकुरमुत्तों की तरह उगे घरों का बेतरतीब होना। आबादी के रोजगार के लिए वनों की कटाई, मांस भक्षण के लिए जीव-जन्तुओं की हत्या। संचार की जरूरत के मुताविक वाहनों की अधिकता। पेट्रोल, डीजल गैस के कारण वातावरण का दूषित होना। दिल्ली को निकलिए तो आँखें लाल होंगी और जलने लगेंगी, सांस लेने में तकलीफ होगी। इन सबका समाधान है रिट्रीट-प्रकति की ओर लौट चलना। चिड़िया की तरह प्रकृति के साथ तादाम्य , उसके प्रति उत्सुकता, उससे अभिभूत रहना। 

प्रथम रश्मि का आना

               रागिनी कैसे तूने पहचाना।

कहां कहां हे बाल विहगिनी

                पाया तूने यह गाना।।

वृक्ष के पक्षी अचानक कलरव करने लगते हैं। कौन उन्हे बता देता है कि सूर्योदय होने वाला हैः

कूक उठी सहसा तरुवासिनी

                  गा तू स्वागत का गाना,

किसने तुझकोअंतर्यामिनी,

                   बतलाया उसका आना।

           -प्रथम रश्मिः सुमित्रा नन्दन पंत

प्रकृति से हमारा ऐसा रागात्मक संबन्ध होगा, तभी पर्यावरण असंतुलन घटेगा। हमारे आचार्य पंच नदियों में स्नानभले ही न कर पाते हों, पर स्नान के समय पांचों नदियों का श्रद्धास्मरण अवश्य करते रहे हैं।

पर्यावरण शब्द बना है। परि (चारों ओर से, आस-पास, अच्छी या पूरी तरह) आवरण (ढका हुआ अथवा घेरा) सो यह वातावरण के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है यानी हमारी चारों ओर का घेरा, जिससे हम घिरे हुए  हैं। धरती के जिस भाग में हम रहते हैं, उसे जीव मंडल कहते हैं। इस जीव मंडल की माप लगभग स्थिर है। यह क्षेत्र धरती के लगभग 16 किलोमीटर की उंचाई तक फैला हुआ है। संपूर्ण पृथ्वी को घेरने वाले इस आवरण का क्षेत्रफल लगभग 45 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। इस जीव मंडल में धरती, वायु और जल की समृद्ध संपदा है और ये तीनों ही जीवन के अस्तित्व के लिए अनिवार्य हैं। इनके बिना कोई जीवधारी जीवित नहीं रह सकता। इसलिए मिट्टी पानी और हवा यही सब रोगों की दवा। इनको अपने अनुकूल बनाना पर्यावरण को अनुकूल बनाना है, जिसका आधार है प्रकृति।

जल है तो जीवन है। जल बरसता है मेघ से। मेघदूतम् (कालीदास) में इसकी संरचना है। धूमज्योतिसलिलमरुता, सन्निपातः क्व मेघः, धूप और जल का संघात है मेघ। कालीदास मेघ को कामनाओं का रूपदाता, प्रकृति पुरुष और निष्पाप कहते हैं।
जानामि त्वां प्रकृति पुरुषं कामरूपं मघोनः।

मेघ के जल के कारण ही प्रकृति नाना रूपों में हमें लुभाती है, रमाती है। जल से उपजता है अन्न, जिसे खाकर बनता है , रक्त, वीर्य, जो अजस्र कामनाएं जगाता है। मेघ कहीं ठहरता नहीं है, जो कुछ जल है बरसाता है। किसी से राग-द्वेष नहीं, परहित कारण शरीर ही धारण करता है। अतः है निष्पाप। महादेवी वर्मा ने अपनी तुलना बदली से की हैः

विस्तृत नभ का कोई कोना,

          मेरा न कभी अपना होना।

परिचय मेरा इतिहास यही,

          उमड़ी कल थी, मिट आज चली

मैं नीर भरी दुःख की बदली।

मेघ समय पर आए, खुलकर बरसे, इसके लिए पेड़-पौधे लगाना, नदी तालाब, सागर एवं अन्य जलाशयों को संरक्षित रखना, पर्वतों को कांटना- छांटना नहीं, यही अनिवार्यता है। इसीलिए साकेत के नवे सर्ग में मैथलीशरण गुप्त मेघगीत गाते हैं और उसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हैं:

जड़ चेतन में बिजली भर दो

         ओ उद्बोधन बरसो।

चिन्मय बने हमारा मृगमय

         पुलकांकुर  बन बरसो।

मंत्र पढ़ो छींटे जागो

           सोए जीवन बरसो।

घट पूरो त्रिभुवन मानस रस

    कण-कण, क्षण-क्षण बरसो।

आज भीगते ही घर पहुंचे

     जन-जन के जन बरसो।

दरसो परसो घन बरसो।

कवि छतनार बरगद के पेड़ और तुलसी के बिरवे को नई पीढ़ी व चेतना के प्रतीक गुलाब के समकक्ष रखकर नव मूल्यबोध को स्थापित करने की बेचैनी प्रकट करता है।

छोटे से आंगन में, मां ने लगाए हैं,

                 तुलसी के बिरवे दो

पिता ने उगाया है

                बरगद छतनार,

मैं अपना नन्हा गुलाब कहां रोप दूं।

मुठ्ठी में प्रश्न लिए दौड़ रहा हूं

वन-वन, पर्वत-पर्वत

                रेती-रेती बेकार।

 - केदार नाथ सिंहः एक पारिवारिक प्रश्न

प्रकृति के नाना रंगों, रूपों,छवियों और प्रभावों अंतर्यात्रा करने से एक ही सूत्र हाथ लगता है प्रकृति के साथ तादात्म्य। प्रकृति के समान होना, उसी का स्वभाव, त्याग, लोक संग्रह ऱखना।

कितनी कष्ट सहिष्णुता, कितना धैर्य ' खोद खाद धरती सहै, काट कूट बनराय'। इसके लिए चाहिए ऊपर बढ़ना, बढ़ते जाना पर अपनी जड़ को धरती के भीतर जमाए रखना, पांव जमीन पर हों तभी सिर आसमान में रहता है। 

प्रकृति से रागात्मक संबन्ध, उनके संरक्षण हित की प्राणपन से चेष्टा, तभी उसकी शाखा -प्रशाखाएं आकाश को ललकारेंगी। आकाश यहां ग्रह, नक्षत्र, अंतरिक्ष का ध्योतक है, जिसकी छतरी में हम विश्राम करते हैं। यही है पर्यावरण, जिसकी चिंता-महत्ता का बोध हमारे आचार्यों, शास्त्रों और साहित्य में है।

' नवयुग शंख ध्वनि,

                  हमें जगा रही

तू जाग-जाग मेरे विशाल '

                        - दिनकर

                               *

                 साभार, विकल्प 2006 

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आने पर मेरे बिजली-सी कौंधी सिर्फ तुम्हारे दृग में

लगता है जाने पर मेरे सबसे अधिक तुम्ही रोओगे!

 

मैं आया तो चारण जैसा

गाने लगा तुम्हारा आंगन;

हंसता द्वार, चहकती ड्योढ़ी

तुम चुपचाप खड़े किस कारण?

मुझको द्वार तक पहुँचाने सब तो आये, तुम्ही ना आए,

लगता है एकाकी पथ पर मेरे साथ तुम्ही होओगे !

 

मौन तुम्हारा प्रश्न-चिन्ह है,

पूछ रहे शायद कैसा हूँ?

कुछ कुछ चातक से मिलता हूँ-

कुछ कुछ बादल के जैसा हूँ;

मेरा गीत सुना सब जागे, तुमको जैसे नींद आ गई,

लगता मौन प्रतीक्षा में तुम सारी रात नहीं सोओगे!

 

तुमने मुझे अदेखा करके

संबन्धों की बात खोल दी;

सुख के सूरज की आँखों में-

काली-काली रात घोल दी;

कल को गर मेरे आंसू की मंदिर में पड़ गई जरूरत-

लगता है आंचल को अपने सबसे अधिक तुम्ही धोओगो!

 

परिचय से पहले ही, बोलो,

उलझे किस ताने-बाने में?

तुम शायद पथ देख रहे थे,

मुझको देर हुई आने में;

जगभर ने आशीष पठाए, तुमने कोई शब्द न भेजा,

लगता तुम मन बगिया में गीतों का बिरवा बोओगे!

-राम अवतार त्यागी-

                         

  

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जीवन में एक सितारा था

माना वह बेहद प्यारा था

वह डूब गया तो डूब गया

अंबर के आंगन को देखो

कितने इसके तारे टूटे

कितने इसके प्यारे छूटे

जो छूट गये फिर कहां मिले

पर बोलो टूटे तारों पर

कब अंबर शोर मचाता है

जो बीत गयी सो बात गयी

 

जीवन में वह था एक कुसुम

थे उस पर नित्य निछावर तुम

वह सूख गया तो सूख गया

मधुबन की छाती को देखो

सूखी कितनी इसकी कलियां

मुरझांईं कितनी वल्लरियां

जो मुरझाईं फिर कहां खिलीं

पर बोलो सूखे फूलों पर

कब मधुबन शोर मचाता है

जो बीत गयी सो बात गयी    

 

जीवन  में मधु का प्याला था

तुमने तन मन दे डाला था

वह टूट गया तो टूट गया

मदिरालय का आंगन देखो

कितने प्याले हिल जाते हैं

गिर मिट्टी में मिल जाते हैं

जो गिरते हैं कब उठते हैं

पर बोलो टूटे प्यालों पर

कब मदिरालय पछताता है

जो बीत गयी सो बात गयी

 

मृदु मिट्टी के बने हुए हैं

मधु पर फूटा ही करते हैं

फिर भी मदिरालय के अन्दर

मधु के घट हैं मधु प्याले हैं

जो मादकता के मारे हैं

वे मधु लूटा ही करते हैं

वह कच्चा पीने वाला है

जिसकी ममता घट प्यालों पर

जो सच्चे मधु से जला हुआ

कब रोता है चिल्लाता है

जो बीत गयी सो बात गयी 

-हरिवंश राय बच्चन

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कविता आज और अभी

 

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गली अति सांकरी

 

कैसी होगी...!

कहां रही होगी

वह सांकरी गली

जिसमें दो नहीं समाते थे...

दो भी नहीं समाते थे,

कोई दूसरा जाता

तो एक होकर रह जाता था।

 

आज का युग---

ज्ञान-विज्ञान का

मानवता का

अधिकारों की एकता

और समानता का युग...

नहीं मानता कोई एकाधिकार

कोई अंधविश्वास

कोई तंत्र-मंत्र

वह नृशंस

कल्पना भी

गले नहीं उतरती

वर्तमान चिंतकों के।

 

कहते हैं---

वहां तानाशाह रहा होगा कोई

या कोई तांत्रिक...

शत्रु मानवता का

तभी तो कहलाई वह

सांकरी गली

पर्याय संकीर्णता का

कलंक मानवता के नाम पर।

 

किंतु अब

सबको साथ चलना है

और भला आगे पीछे भी क्यों!

सबको साथ

मिलाकर कंधे से कंधा

लेकर हाथों में हाथ।

 

फिर कैसे बच पाती

वह सांकरी गली!

किसी ने चौड़ा कराया होगा उसे...

गलीवासियों को

किसी अन्य बस्ती में 

ले जाकर बसाया होगा

कौन जाने किसने

उस गली को

मैदान बनाने का बीड़ा उठाया होगा।

 

कोई नही जानता

कहां गई वह गली?

पुरानी--- बहुत पुरानी

पोथियों में मिलता है

उसका उल्लेख

जिनके पीले...

टूटते हुए पृष्ठों को

सहेज पाना भी

दुष्कर हो चला है अब।

 

समय ही कहां है!

और भी बहुत कुछ

सार्थक है करने-धरने को

आज के मानव के पास।

भविष्य की ओर दौड़ते

चौड़े राजमार्गों पर रुककर

कौन होगा

जो उस गली के विषय में सर खपाए?

फिर भला

आज के विशाल साहित्य में

ढाई आखरवाली

उस गली का उल्लेख

कैसे आए!

 

* 

 

 

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उपलब्धि

 

चेचक पर

विजय के बीस वर्ष

पूरे हुए...

यह समाचार आया है।

 

और पता है हमें

यह भी

कि इस बीच---

आतंकवाद और उग्रवाद ने

प्रतिवर्ष

हजारों को

जीवन-बंधन से मुक्त कराया है।

 

हम प्रगति पर हैं...

अब इन्सान

कीड़े-मकोड़ों के हाथों नहीं मारा जाता

अब इन्सान

इन्सान के हाथ मरने का गौरव पाता है।