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सोच और संस्कारों की साँझी धरोहर
July-2007 बरखा विशेषांक...
Quote of the month
Hearing is one of the body's five senses. But listening is an art.
-Frank Tyger
(सर्वाधिकार सुरक्षित) copyrights to writers and publisher only
संरचना व संपादन: शैल अग्रवाल.
संपर्क -सूत्र- editor@lekhni.net , shailagrawal@hotmail.com
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अपनी बात

विरही की पीर और नीर बहाती बदरी...उमड़ते-घुमड़ते बादल और आवेगी मन... नायिका के घने लहराते कुंतल, पर्वतों से उन्नत उरोज...रूप और यौवन की उफनती निर्झरणी और फूलों से लदी-फंदी वल्लरी-सी सुकुमार नायिका ...साहित्य-संदर्भ में वर्षा ऋतु का नाम लेते ही महाकवि कालीदास के मेघदूत की छवि ही सर्वप्रथम आंखों में तैरती है। अषाढ़ का प्रथम मेघ और विरही, एकाकी, वह निष्कासित यक्ष, नेह-संदेश ले जाते बादल, पथ का सारा सौंदर्य, सदा के लिए ही तो अमर हैं काव्य-प्रेमियों के मानस-पटल पर।
एक मेघदूत ही नहीं, वर्षा-ऋतु तो सदियों से ही ललित कला में पूरे श्रृंगार, करुणा व आवेग ...एक अकथनीय गरिमा के साथ सतरंगी छटा लेकर उभरी है, प्रसंग विरह का हो या फिर मिलन का। क्रोधी- भयावह, करुण और कोमल--- वर्षा के हर रूप को ही कवि और चित्रकारों ने सराहा है। अषाढ़ के उमड़ते-घुमड़ते बादल, सावन की भीनी-भीनी रिमझिम, भादों की मूसलाधार, या फिर काली डरावनी रात में आकाश का सीना चीरती चपल विद्युत-रेखा... सदियों से ही वर्षा ऋतु के हर रूप को मानव संवेदनाओं से जोड़ा गया है और नए-नए मानकों के साथ शब्दों और रंगों में उकेरा गया है। सौम्य रूप में तो बरखा प्रियतमा और जीवन-दायिनी है ही।
ग्रीष्म-ऋतु की तपन के बाद जब बर्षा से नम धरती पर हरियाली फैलती है---नए अंकुर फूटते हैं और लजीली कोपलें फूलों के गहने धारण करती हैं, तो पूरा-का-पूरा देश लहलहा उठता है। यही वजह है कि साहित्य ही नहीं, भारतीय जन-जीवन में भी राग-रस से स्निग्ध बरखा-ऋतु का अपना एक अलग ही और उल्लासमय स्वरूप है।
स्नेह-फुहारों से भिगोती यह ऋतु हर्ष और उल्लास के कई-कई त्योहार लेकर आती है, चाहे वह शिव पार्वती के अटूट मिलन का पर्व (हरितालिका या हरियाली तीज, गनगौर) हो या फिर भाई बहनों के संबन्धों की रेशमी डोर। गदराई डालों पर लटकते झूले, बागों में नाचते मयूर, पीहू-पीहू कुहुकते पपीहे...झींगुर और दादुर सभी का तो अपना-अपना संगीत है और साथ ही रंग-बिरंगे परिधानों में सजी-संवरी रमणियां; सावन की छटा मनमोहिनी है और पहली बरसात का तो आज भी बेचैनी से ही इन्तजार होता है।
फूलों का सिंगार, झूले, मेंहदी, चूड़ी, बिन्दी, महावर और साथ में कजरी और बिरहे के उल्लासित भीगे-भीगे स्वर... मीठी-मीठी छेड़छाड़... प्रकृति ही नहीं, इस ऋतु की सरस परम्पराएं और तरह-तरह के गीत, जन-जीवन में भी उतने ही लुभावने और प्रचिलित हैं, जितने कि मध्यकालीन मुगल और राजपूत चित्रकला या काव्य व साहित्य में दिखाई देते हैं।
शहरों में जीवन भले ही बदल जाए, पर गांवों और छोटे शहरों में जन-मानस आज भी वहीं-का-वहीं है...प्रकृति के करीब और जोशीला ! सैकड़ों सालों से चले आ रहे इन त्योहारो को... ऋतुओं के परिवर्तन को आजभी वैसे ही गाजे बाजे से, हर्षोल्लास के मेले के रूप में ही मनाया जाता है।
और शायद यहीं आकर भारत अन्य देशों से भिन्न हो जाता है। अति व्यस्त जीवन-शैली के होते, जहां पाश्चात्य देशों में क्रिसमस को छोड, सभी त्योहार... हर खुशी सप्ताहांत तक ही सीमित रहती है (वैसे भी जहां बारहों महीने बरसात हो...न आने का पता, न जाने का, तो भरपूर स्वागत कैसे हो पाए और जहां मां-बाप, भाई-बहनों या पारिवारिक सदस्यों तक का खुले मन से स्वागत न हो, वहां ऋतुओं का कैसा! न किसी के पास वक्त है और ना ही चाह।) परन्तु भारत में आज भी हर ऋतु के आगमन को त्योहार की तरह ही मनाया जाता है, और ये उत्सव कभी-कभी तो एक दो दिन नहीं, महीनों या पूरे-पूरे पखवाड़े(पन्द्रह-पन्द्रह दिन तक) चलते हैं, फिर वर्षा तो वैसे भी ऋतुओं की रानी है।
भारतीय मनीषियों और ऋषियों ने हर महीने एक पर्व की परिकल्पना यही सोचकर की थी कि थके-हारे परिवार पुनः उत्साहित और प्रसन्न-चित हो सकें... मिल-बैठकर हंस बोल लें। आज जब पूरा विश्व ही निराशा और कुंठाओं से ग्रस्त है...हंसी ढूंढता, बेचैन रहता है, तो इन त्योंहारों का महत्व और भी स्पष्ट और सार्थक हो जाता है।
बचपन से ही जिन रस्मों और यादों में जिया जाए, उनसे निकल पाना प्रायः संभव नहीं, क्योंकि यही वे स्मृतियां और अनुभव हैं जो जीवन में नींव के पत्थर बनते हैं। विचारों और सोच में रंग भरते हैं। ये तीज-त्योहार ही तो हमें हमारे विलक्षण भारतीय संस्कार और तौर-तरीके सिखाते हैं। आपस में जोड़ने का काम करते हैं।
सावन के पहले सोमवार से ही बनारस के जन-जीवन में बढ़ता वह हर्षोल्लास, भीड़-भाड़, आजतक भुलाए नहीं भूलती। इस अद्भुत नगरी में यह वह महीना है जब प्रकृति और परमेश्वर एक हो जाते हैं। बाबा विश्वनाथ अपने पूरे श्रृंगार के साथ सड़कों पर घूमते दिखाई देते हैं और हर मन्दिर, हर गली में एक मेला-सा लग जाता है। नव-विवाहिताओं के सिंदूर और महावर की चमक तो गली-गली और कोने-कोने बिक रहे फूलों से होड़ लेने लग जाती है...हो भी क्यों न, श्रंगार और सावन का चोली-दामन का जो साथ है!
माना कि सावन की झांकी के नाम पर स्वनियंत्रित मानस-मंदिर की वे मूर्तियां गरिमा की जगह कौतुक ही अधिक पैदा करती हैं और लाउड-स्पीकर पर बजते , कजरी, बिरहा और देवी-गीतों को अनसुना कर पाना बच्चे-बूढ़े क्या, किसी के लिए भी संभव नहीं ...(न तब और न शायद आज ही!) पर आसपास के गांवों से आई और उमड़ती भीड़, इस बात की गवाह है कि भगवान के सजे-धजे इस यंत्रीकरण का जनता पूरे साल इन्तजार करती है।
विधालय में भी यह वर्षा-महोत्सव बहुत जोर-शोर के साथ एक विशिष्ट रूप में मनाया जाता था। करीब-करीब चौदह साल तक लगातार यही सिलसिला था (शिशु-बिहार से स्नातक तक)। पचास-साठ बालिकाओं के सामूहिक नृत्य के साथ सुबह-सुबह सात बजे ही प्रभात फेरी...फिर शान्ति-निकेतन की ही परम्परा पर विविध और अनोखे सांस्कृतिक कार्यक्रम। नए-पुराने बाउल-गीत, रविन्द्र-संगीत, मनीपुरी नृत्य सभी का समावेश, हर साल ही एक नया समां बांध देता था। अल्पना और फूलों से गुंथे मंच के साथ-साथ लकड़ी के पीढ़े और स्तंभ...सभी महीनों पहले से ही रंगने-संवारने शुरू हो जाते थे और हर साल ही छोटे-बड़े सभी ये काम विद्यार्थी खुद-ही तो किया करते थे, वह भी गए साल के दुगने उत्साह से। हरेक को बस एक ही फिक्र रहती थी कि कुछ और नया व अच्छा कर पाए! फिर एक सावन वह भी आया जो शान्ति -निकेतन में गुजरा, आजतक भुलाए नहीं भूलता। कला और परम्पराओं की मानो बाढ़ आ गई थी चारो तरफ। हर दिन त्योहार... एक नया महोत्सव। घने पेड़ों की शाखों से टपकती बूंदों के नीचे भीगते अक्सर ही लम्बी सैर पर निकल जाया करते थे सान्थाल-गांवों की तरफ। वहां घरों के दरवाजे पर बंधी बंदनवार, और घंटियां, नित-नई अल्पना, नए-नए बाउल गीत (बंगाल के गांवों में गाए जाने वाले भक्ति रस में डूबे भिक्षु गीत)---और आदिवासियों के हाथों बनाया गया वह बेंत और चमड़े का सामान, बातिक और एम्बौस् टेक्नीक से बहुत ही कलात्मक ढंग से सजा-संवरा...उन पिछड़ी जातियों की लोक परम्परा और अनूठी प्रतिभा को बेहद पास से देखने और जानने का अद्भुत मौका था वह!
ऋतु की भीनी-भीनी स्मृति सुगन्ध...उल्लासपूर्ण अनूठे गीत-संगीत, सभी को समेटकर (कीचड़ व उमस तक को भूले बगैर) आप तक पहुंचाने का प्रयास है यह अंक ... किस अंतस को कितना भिगो पायीं ये फुहारें...काश, जान पाते!
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ऋतु विशेषः
(यूं तो भारत के हर प्रान्त में ही वर्षा का स्वागत जोश से होता है परन्तु उत्तर प्रदेश और राजस्थान में वर्षा की छटा निराली है। स्वागत की कई-कई रसीली और गीत-संगीतमय परंपराएँ हैं। स्मृति कोष से यादों के उन्ही चन्द छींटें को लेकर आ पहुंची हैं कादम्बरी मेहरा।)

बरखा ऋतु और तीज-त्योहार
-कादम्बरी मेहरा-
आई सावन की बहार, पड़े बूंदन फुहार
देखो भींजत अंगनवां , अरे संवरिया।। देखो...
गोरिया के माथे सोहे लाली रे टिकुरिया।
सिर पे धानी रे चुनरिया, अरे संवरिया।।
भारत का श्रावण मास ! श्रावण नक्षत्र से श्रावण यानी सावन। 'मासे मासोत्तमे श्रावणमासे।'
बैसाख, जेठ व आसाढ़ की तपिश के बाद घने काले मेघों का मास जिनकी उदारता मौसम को ठंडा बना देती है। मौसम की यह जीवन-दायिनी शीतलता, कौन इससे वंचित रहना चाहेगा। अंग्रेजों ने भी इसके अभ्यागत असर को अनुभव किया । मौसम से ही शब्द ढाला मौनसून। यूं तो आसाढ़ से ही मेघ आकाश पर छा जाते हैं परन्तु सावन आते-आते सारी सृष्टि अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित हो जाती है। मैं ठहरी रंग रसिया। सघन भूरे संवलाए आकाश के नीचे हरियाली के सारे स्वर ! सावन मास न केवल रंगों का वरन् स्वरों का भी मास है। एक ओर घन-गर्जन व जल-नर्तन, दूसरि ओर पशु-पंछियों का कलरव और इम सबसे सर्वोपरि किशोरियों के स्वर,
आयो सावन अधिक सुहावन
वन मां बोलन लागे मोर।
दामिनी दमकें मेघा गरजें
रिमझिम मेंह मचावें शोऱ।।
कदाचित निरंतर श्रवण के लिए इस ऋतु का नाम श्रावण रखा गया होगा।
भारत के सभी कवियों ने श्रावण मास की सुन्दरता व उसके प्रभाव को व्यक्त किया है। रामायण में श्री राम सिया को ढूंढते समय कहते हैं,
घन घमंड नभ गर्जत घोरा। पिया बिनु डरपत मन मोरा।
दामिनी दमक रही घन माहीं। खल की प्रीत जथा चिर नाहीं।।
साधु सन्तों के लिए यह प्रवचन का समय है,
पावस आइल देखि कै कोइल साधै मौन।
दादुर जब वक्ता भये पूछत हमको कौन।।
या फिर
बढ़त बढ़त संपत्ति सलिल, मन सरोज बढ़ि जाय।
घटत घटत फिर ना घटै, बरु समूल कुम्हलाय।।
सावन ऋतु में भरे जलाशयों में कमल के विकास को देखकर कवि ने लालच का वर्णन किया है ।
किसान के भाग्य खुल जाते हैं। नम धरती। बोआई का समय। पशु के भाग्य खुल जाते हैं। नम घास। चराई का समय। स्त्रियों के भाग्य खुल जाते हैं। भरे जलाशय। पानी भरने की छुट्टी। मेले झूलों के लिए समय मिल जाता है।
श्रावण मास। धरती की अंगड़ाई के साथ ही युवा जगत भी अंगड़ाई लेता है। रोमांस का समय। किसी का मिलन । किसी की जुदाई। मौसम की ठंडक का फायदा उठाकर कमाई करने शहर हाट चले जाते हैं। विशेषकर कला-जीवी। गर्मियों में छप्पर के नीचे बैठकर जो हाथ की कुशलता से सामान तैयार किया था वही मेलों में बिकेगा। कुछ बेचेंगे, कुछ खरीदेंगे,
रानीः -राजा लश्कर जइयो जी तो लइयो मोरी धानी चुनरी।
राजाः -रानी मैं क्या जानूं जी कि कैसी तोरी धानी चुनरी ।।
रानीः -ऊदा ऊदा दढिया होय किनारों चहुंओर जड़ी।
राजाः -रानी अबकी जइहों जी शहर से लइहों धानी चुनरी।
रानीः - राजा इहां कैसे ओढ़ेंगे नजरिया लागे धानी चुनरी।।
राजाः - रानी पीहर जइहो जी , उहां पै ओढ़ौ धानी चुनरी।
राजाः -रानी हम कैसे देखेंगे कि कैसी लागे धानी चुनरी।
रानीः - ओ राजा तीज पै अइहो जी तो तब देखो धानी चुनरी।।
सावन में मायके जायेगी। क्योंकि सावन भाई बापू की खैर मनाने का मास है। घर में दूध-दही, फल, अनाज की बहुतायत होती है। बेटी का मरद परदेस चला गया तो बेटी को मायके बुला लिया जाता है। कवि शैलेन्द्र ने ऐसी ही एक किशोरी की हृदय विदारक अरज एक गीत में उतारी है,
अबके बरस भेज भइया को बाबुल
सावन मां लीजो बुलाय रे।
अंबुआ तले जब झूले पड़ेंगे
ठंडी पड़ेंगी फुहारें
लौटेंगी जब तेरे आंगन में बाबुल
सावन की ठंडी बहारें
पूछेंगी जब मेरे बचपन की सखियां
दीजो संदेशा भिजाय रे।
आज भी जब बेटी बेटे ब्याह गये, माता पिता स्वर्ग सिधार गये, यह गीत आंसुओं से रुला जाता है। झूले को देखकर किसे मायके की याद नहीं आती ?
मैने देखा पूरे भारत में जितना झूले का चाव है अन्य किसी सभ्यता में नहीं। स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व के भारत पर दृष्टि डालें तो बगीचे रखना रईसों का शौक था, खासकर गंगा और जमुना किनारे वाले शहरों में। यह बगीचे वनस्पति संग्रह के लिए कम और ऐशो-आराम संग्रह के लिए अधिक होते थे। इनमें बाकायदा आरामगृह, वीथियां झरोखे, गोल गुम्बददार जालियां (गजीबो), शिकारगाह, अमराइयां, संगीतकारों के रहने के इंतजाम आदि होते थे। श्रावण मास में झूले डलवाये जाते थे और मित्रों का जमघट लगता था। बनारस ऐसे बगीचों के लिए प्रसिद्ध है। अपने बचपन की यादों में ऐसे बगीचों में की गई पिकनिक की याद है। पिताजी के ननिहाल में ऐसा ही एक बगीचा था। अब वहां पिताजी की नानी, नारायणी देवी के नाम पर नारायण नगर बस गया है। ननिहाल वाले मकान में एक ओर घर-वालियां रहती थीं और दूसरी ओर दीवानखाना था जिसमें शाम को संगीत की महफिलें सजती थीं। उस समय की मशहूर गायिका थीं स्वर्गीया श्रीमती जद्दन बाई, जो श्रीमती नरगिस दत्त की मां थीं।
तब ना टी.वी. था, ना रेडियो। संगीतकार इन्ही महफिलों के दम पर अमर संगीत रच पाये। रेडियो का युग आया तो श्रीमती जद्दनबाई स-दल-बल मुंबई पधार गयीं। संगीत का स्वर्ण-युग यों ढल गया। हमारे भाग्य में रह गया सेकेंड हैंड संगीत-श्रवण, यानि असली गायन के सी.डी, टेप आदि।
फिर भी जब शुभा गुर्टू की स्वर-लहरी गूंजती है,
झूला, धीरे से झुलाओ बनवारी रे
सांवरिया बनवारी रे
झूला झुलत मोरा जिया डरत है
याद आते हैं मौलश्री के फूल, तुलसी के नन्हे नन्हे गाछ, मेले से लाई पैसे पैसे की गागर, सुराही और धानी, गुलाबी रंगों की पुड़िया। जाने कितनी छोटी छोटी लकीरें रंगके हम सजाते थे अपनी कपड़े की गुड़ियाँ। कुर्सी के डंडे में उनके लिए झूला बांधा जाता था। खाटों के पीछे उनकी ससुराल और बरांडे के दूसरी ओर मायका। क्या वह कल्पना का अछूता स्वर्ग कभी साकार हो पाया किसी अल्हड़ बाला के यथार्थ में ? संदेह है,
बैरन जवानी ने झूले सजाये
और मेरी गुड़िया चुराई
बाबुल रे मै तेरे नाजों की पाली
काहे को हो गई पराई...
थोड़े हाथ-पांव लम्बे हुए तो कुछ लच्छन सीखो की गुहार पड़ने लगी। जन्माष्टमी के ड्रामे। माखनचेर लीला !
बरांडे में एक ओर चादरों में नाडा डालकर पर्दा बनाया जाता था, उसके पीछे तखत बिछाकर स्टेज। स्टेज से सटा कोठरी का दरवाजा-यानि हमारा नेपथ्य ! पांवों से भारी सेर सेर भर के घुंघरू बांधकर नाच ! तबले से अधिक तखत की पट पट ताल !
अरे नागनिया बन के डस गई मोहन
तेरी बांसुरिया।
रिमझिम रिमझिम मेंहा बरसे
चमके बिजुरिया।
अरे मै कैसे आऊँ मोहन मेरी
भीगे चुनरिया। अरे नागनिया...
कारे कारे बदरा गरजें
डरपत रे जियरा
अरे मैं कैसे आऊँ मोहन
नाहीं सूझे डगरिया।
तब क्या अभिसारिका नायिका का अर्थ पता था ? क्या हमारी मां दादी को भी पता था ?
झूले पर पेंग चढाते । धक्का देती कहारिन गंगाजली ! समवेत स्वर गूंजता,
उड़ि जाओ रे सुगनवा गंगा पार
खबर लाओ साजन का।
जिया सावन में लरजे हमार
बताय जाओ साजन का।
सोने की थाली में जेवना परोसा
उड़ि जाओ से सुगनवा गंगा पार
खिलाय आओ साजन का।
रूपे की गागर गंगाजल पानी
उड़ि जाओ से सुगनवा गंगा पार
पिलाय आओ साजन का।
मोगरा के फूलन बिछौना लगाया
उड़ि जाओ से सुगनवा गंगा पार
बुलाय लाओ साजन का।
कोई नवोढ़ा परदेस गये पिया को याद कर रही है सावन में। तोते को दूत बना रही है संदेश भिजवाने के लिए। तोते से याद आयी---कच्चे अमरूदों की ललक ! काले नमक की चोरी। तोते के झूठे ज्यादा मीठे होते हैं ! तोते का काटा खाओगी, जुबान पैनी हो जायेगी। संस्कृत के रूप अच्छी तरह रट पायेंगे। और वह कच्चे करौंदे, कंटीली झाड़ियों में घुस-घुसकर झोली भरते थे उनसे। यहां उसे क्रेनबरी कहते हैं। आयुर्वेद ने उसे सौ गुणों से युक्त माना है। उन्ही से सीखकर इस देश में क्रेनबरी हर चीज में परोसी जा रही है जबकि भारत में इसकी उपज और प्रयोग नगण्य है।
सावन की बात चली तो गीता दत्त की याद आई। कितना सटीक वर्णन,
हौले हौले हवाएं डोलें, कलियों के घूंघट खोले
आना मेरे मन के राजा पिहू पिहू पपीहा बोले।।
कारे कारे बदरा छाये और संदेशा लाये
सावन सुहावन आया, पिया मोरे तुम ना आये।।
बिरही गगन रोये, मेरे दो नयन रोये
पिया तुम पास नहीं कहां किस देस खोये।
घन घन बदरा गाजे घन घन पायल बाजे
छाई छाई हाय बहार, तुम बिन जिया ना लागे।।
विरहा बात चली तो मीराबाई की सानी कहां ?
बरसे बदरिया सावन की, सावन की मनभावन की
सावन मे उमग्यो मेरो मनवा भनक सुनी हरि आवन की
उमड़ घुमड़ चहुं दिसि से आयो दामन दमके झर लावन की
नान्ही नान्ही बूंदन मेहा सीतल पवन सोहवन की
मीरा के प्रभु गिरधर नागर आनंद मगन गावन की।
श्रावण नक्षत्र के साथ ही चौमासा शुरु होता है। यानि देवता सो जाते हैं या कहिए छुट्टी पर चले जाते हैं। चौमासा यानि सावन, भादों, क्वार व कार्तिक ! असाढ़ मास की चांदनी एकादशी को देव-शयनी एकादशी भी कहा जाता है। तबसे लेकर कार्तिक मास की देव-उठनी एकादशी तक चौमासा। देव उठनी एकादशी को तुलसी विवाह होता है, फिर सब ठीक। इस काल में हिंदु विवाह आदि नहीं करते थे। कारण था स्वास्थ्य ! बरसात में जलचरों का बाहुल्य, मच्छरों, मक्खियों एवं कुकुरमुत्ते का उद्भभव अनेकों मौसमी संक्रामक रोगों को जन्म देता है। इसी कारण से जैन धर्मावलम्बी मूलक सब्जियां नहीं खाते। दही भी नहीं खाया जाता क्योंकि उसमें बैक्टीरिया होते हैं और बरसाती दही अक्सर बुड़क जाता है। भारत में कढ़ाही में तला भोजन अदिक शुद्ध माना जाता है क्योंकि उसमें संक्रामक रोगाणु नहीं बच सकते। इधर पानी बरसा उधर पकौड़ों की मांग आई। चाय और पकौड़े। तले समोसे, अंदरसे, जलेबियां, पतावड़, पुलबड़ियां आदि बरसातों के प्रिय व्यंजन हैं। सावन मास में धूप न निकलने के कारण संक्रामक रोगों के कीटाणु मर नहीं पाते। कीट-पतंगे जलाशयों में पानी भरने से बहुलता से जन्मते हैं। ताजी तुलसी की पत्ती व अदरक की चाय गुणकारी होती है।
श्रावण मास के प्रमुख त्योहार सोमव्रत एवं मंगलागौरी पूजन है। पूरा महीना शंकर पार्वती को अर्पित है। सावन के सोमवारों को मंदिरों में श्रंगार किया जाता है। अनोखे श्रंगार। बनारस के मारवाड़ी मन्दिर में मक्खन की बट्टियों का श्रंगार देखा। मक्खन को शुद्ध करके उसी के फूल-पत्ती, झूले, मूर्तियां, खंभे, पशु-पक्षी ! पिघलता भी नहीं था। भारत की हस्तकला देखने का सबसे सुन्दर अवसर इसी समय प्राप्त होता है।
श्रावण मास के मंगल किशोरियां पति प्रप्ति के लिए व्रत रखती हैं एवं विवाहिता स्त्रियां पुत्र कामना से गौरी का पूजन करती हैं।
कामिका एकादशी व्रत कृष्णपक्ष की एकादशी को रखा जाता है, जिसके प्रभाव से पाप नाश होते हैं।
सारी दुनिया को अचंभित करने वाला श्रावण मास का अनूठा त्योहार है नाग-पंचमी। पूरे भारत में नागों को बुलाकर दूध पिलाया जाता है। विश्वास है कि ऐसा करने से सांप नहीं काटता। दरअसल वर्षा के आगमन से सांपों के बिलों में पानी भर जाता है और वह बिलबिलाकर बाहर निकल पड़ते हैं। मेढकों का स्वर्णकाल यही होता है और शिकार करने का सांपों के लिए इससे अच्छा समय और क्या होगा।
नागपंचमी की कथा बड़ी मार्मिक है। एक ब्राह्मण के सात पुत्र थे। सावन ऋतु आने पर उनकी स्त्रियां अपने-अपने मायके चली गईं। सातवीं को लिवाने कोई नहीं आया क्योंकि उसके कोई भाई नहीं था। अकेली उदास बैठी वह शेषनाग जी का ध्यान करने लगी। शेषनाग जी दयावश, तुरंत मानव रूप में प्रकट हुए और उसे नागलोक लिवा ले गये। अर्थात धरती के गर्भ में। वहां उन्होंने उसे अपनी बहन बनाया। तभी नागरानी ने असंख्य पुत्रों को जन्म दिया। उसने इस बहन का आगमन अति शुभ माना और उसे पुत्रों का वरदान दिया। साथ ही एक चमत्कारी दीपक प्रदान किया, जिसकी ज्योति सदा जलती रहती थी और वह स्व-प्रकाशित था। गलती से वह दीपक उसके हाथ से छूट गया जिससे पास ही खेलते हुए नागपुत्रों की पूंछ जल गई। क्रुद्ध होकर नागरानी ने बहन को वापस मृत्युलोक में उसकी ससुराल भेज दिया।
अगले बरस इसी दिन की याद में बहन ने सावन की पंचमी वाले दिन दीवाल पर नागों के चित्र उकेरे और अपने भाई-भतीजों को याद करती उनकी पूजा करने बैठी। इधर वह नाग बालक अपनी कटी पूंछ का बदला लेने उसे डसने आए। जब देखा वह तो उन्ही का पूजन कर रही है, उन्हे बहुत अच्छा लगा। नागों को देखकर बहन ने स्वागत में उन्हें दूध पिलाया। तभी से नागों को नागपंचमी के दिन दूध पिलाकर भाई-भतीजों की कुशल मनाई जाती है।
भाइयों की कुशल मनाने का सबसे निराला त्यौहार एकमात्र भारत में मनाया जाता है-रक्षा-बन्धन ! भाई बहन के रिश्ते का पवित्र उत्सव। मैं समझती हूं कि इस त्योहार को हमें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित करना चाहिए। यदि भारत में वेलेंटाइन डे मनाने का रिवाज चल पड़ा है तो क्यों नहीं हम प्रवासी जन मिलकर रक्षा-बन्धन का प्रचार करते? प्रेम का पविक्ष स्वरूप अधिक गुणकारी होगा बजाय वेलेंटाइन की हूड़बाई ( अनोखा, अर्थमय शब्द। मेरा मां की भाषा से) के ।
राखी धागों का त्यौहार
बसा हुआ है इस धागे में भाई बहन का प्यार।
या फिर
भइया मेरे राखी के बंधन को निभाना
भइया मेरे छोटी बहन को ना भुलाना।
श्रावण पूर्णिमा सदा-सदा आती रहे और भारतवर्ष---हमारा बिछड़ा भाई हमें सदा-सदा याद रखे।
वर्षा-ऋतु भादों में और भी अधिक गदरा जाती है। भादों की पहली तीज को कजरी तीज कहते हैं, जो रक्षा-बन्धन के तीन दिन बाद आती है। कजरी या कजली शब्द काले रंग का पर्याय है। कदाचित बादलों के घने काले रंग, दिन में भी रात का आभास देने वाली घटाओं से प्रेरित कजली शब्द जुड़ा होगा। परन्तु ऐसा कहा जाता है कि बनारस मिर्जापुर क्षेत्र के आसपास कजली वन था। इसी के नाम पर कजली तीज का नाम पड़ा।
इस दिन झूले डाले जाते हैं। सुहागिनें फूलों का श्रंगार करके कजरी खेलती हैं । कजरी के गीत प्रसिद्ध हैं।
एक किशोरी घर से निकलती है तो उसकी भाभी उसे रोकती है,
भाभी- कैसे खेलन जैहो सांवन मां कजरिया, बदरिया घिर अइलें ननदी।
ननदीः- हम तो खेलन जइबे सावन मां कजरिया, बदरिया लागें नीकी भउजी।
भौजीः- तू तो जात हौ अकेली तोहरे संगे सखी ना सहेली, छैला रोक लैहें तुहरी डगरिया।
बदरिया घिर अइले ननदी।
ननदीः- भौजी बोलेलू तू बोली हमके लागे जइसे गोली, कौने रोक लैहें हमरी डगरिया
बदरिया घिर अइले भौजी।
भौजीः - जब तू चलिहो नाचत गावत गावत लचलच अपनी कमर लचकावत, उनके जियरा पे गिरबै बिजुरिया
बदरिया घिर अइळे ननदी।
ननदीः- कितने गोली खा खा मरिहैं कितने देहन फांसी चढ़िहैं, कितने पीसत हुइहैं जेलन मा चकरिया
बदरिया घिर अइले भौजी।
भाभीः- तोके गंगा माई कसम जाय न देबै तोके हम , जब तुम जाये लगिहौ छिकबै दुअरिया
बदरिया घिर अइले ननदी।
वर्षा-ऋतु पर भारत की अर्थ-व्यवस्था निर्भर है। क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है। वर्षा ना होने से अन्न की कमी हो जाती है। सभी तीज त्योहार वर्षा के उत्सव हैं। एक समवेत प्रार्थना। हर तरह से देवताओं को प्रसन्न करने का प्रयास। ईश्वर भले ही ना हो कहीं परन्तु वर्षा पर मानवों का या किसी भी अन्य भौतिक शक्ति का जोर नहीं। अंत में प्रार्थना ही मनुष्य का एकमात्र संबल रह जाता है। हमारे शास्त्रों में इंद्रदेव को वर्षा का अधिकारी माना जाता है। अतः उनको प्रसन्न करने के अनेकों मंत्र-तंत्र, योग-विधान हैं। पूरा वृष्टि यज्ञ किया जाता है। सन 76 में इंगलैंड में वर्षा नहीं हुई। जिसके कारण जल का अभाव हो गया। फसलें नष्ट होने लगीं। तब विश्व हिन्दु परिषद व अन्य धार्मिक संस्थाओं ने वृष्टि यज्ञ लंदन में किया। इसमें हजारों परिवारों ने भाग लिया। जिस दिन पूर्ण आहुति हुई उस दिन पानी बरसा और यह विश्व-व्यापी समाचार बन गया। इन्द्र को प्रसन्न करने के लिए भारत में संगीतज्ञों ने भी अपूर्व साधना की है युगों से। मेघ-मल्हार गाने से वृष्टि होती है। वृंदावनी सारंग और मेघ मल्हार, शुद्ध मल्हार आदि राग सावन की ऋतु में गाए जाते हैं और अनेकों गीत इन रागों में सावन का गुणगान करते हैं।
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रवीन्द्रनाथ ठाकुर के काव्य में

पावस-परिदृश्य :डोमन साहू ' समीर '

अपनी गीतांजलि (बंगला) की रचनाओं पर साहित्य विषयक विश्विवख्यात नोबेल पुरस्कार (1913 ई.) में प्राप्त करके विश्व कवि के रूप में प्रतिष्ठित होने वाले कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचनाओं में नैसर्गिक प्रकृति और मानवीय प्रवृत्ति का अदभुत् समन्वय है। प्रकृति के कण-कण में परमसत्ता की अनुभूति भारतीय मनीषा की विशेषता रही है, जिसकी सफल अभिव्यक्ति उनके काव्य में भूरिशः हुई है। सूर्य-सोम, पवन-प्रकाश, वन-पर्वत, जीवन-मरण, शयन-जागरण इत्यादि प्रकृति के प्रत्येक पदार्थ और प्रत्येक घटना में परमात्मा की प्रतीति उनकी रचनाधर्मिता की कालजयी सार्थकता है। ऋतु-वर्णन काव्य-कला का एक प्रमुख विषय रहा है जो केवल अभिधात्मक ही नहीं, उद्बोधात्मक भी हुआ करता है। यों तो वर्ष भर की सभी ऋतुओं के बहुरंगी चित्रण विभिन्न भाषाओँ के काव्य-साहित्य में होते ही रहे हैं, परन्तु शिशिर, वसन्त और पावस को उसमें प्रमुखता प्राप्त रही है। महाकवि रवीन्द्रनथ ठाकुर का काव्य इस दृष्टि से अतीव उत्क्रष्ट रहा है। काव्य कला के समष्टिगत लक्ष्य 'सत्यं शिवं सुन्दरम्' का परिपादन उनकी रचनाओं में सर्वतः ही परिलक्षित है। यहां पावस विषयक उनकी कतिपय रचनाओं का संक्षिप्त विवेचन किया जा रहा है। अपनी एक रचना में वह कहते हैं; आषाढी संध्या घिर आई, दिन अब बीत गया; लगातार हो रही वृष्टि है, रुक-रुककर देखो। घर के कोने में बैठो एकाकी, क्या-क्या सोच रहा हूं मन में ! सजल वायु क्या जाने, क्या कह जाती, पैठी इस जुही के वन में! लहर उठी है आज हृदय में मेरे, खोज नहीं पाता हूं कूल कहीं; प्राण रुला जाता है सौरभ आके, भीग रहे हैं वन के फूल कहीं। रात अँधेरी, पहर-पहर को भर दूं, किस स्वर से कुछ सोच नहीं पाता; सब कुछ भूले आकुल हूं मैं भूल कौन-सी है? (क्या जानूं मैं!)
पावस का प्रारंभ आषाढ़ मास के प्रथम दिवस से माना जाता है, जिससे उत्प्रेरित होकर संस्कृत के महाकवि कालिदास ने अपनी युगजयी कृति मेघदूतम की रचना की थी। वह आषाढ़ कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचनाधर्मिता को भी उत्प्रेरित करे, यह स्वाभाविक ही है। तदनुसार वर्षा की झड़ी के साथ ही परमात्मा की उपस्थिति की प्रतीति उनकी एक रचना में इस प्रकार शब्दायित हैः आज गहन सावन-घन-प्रेरित चरणों से तुम आ धमके हो। नीरव रजनीवत् चुपके-से सब लोगों की दृष्टि बचाए। आज नयन मूंदे प्रभात है, पवन वृथा करता पुकार है, निलज नील आकाश ढंके यह सघन मेघ किसने प्रेरा है? कूजनहीन पड़ा है कानन, द्वार बंद हैं सभी घरों के; पथिक कौन तुम, भला, अकेले पथिक -शून्य पथ पर आ धमके! मेरे सखा, प्राणप्रिय मेरे! द्वार खुला है मेरा, देखो; स्वप्न-सरीखे होकर सम्मुख, मुझे उपेक्षित कर मत जाओ।। स्पष्ट है कि वर्षा की झड़ी के साथ परमसत्ता की समुपस्थिति और उसमें अपनी संलिप्त की रहस्यात्मकता कविवर की काव्यकला की उत्कृष्टता है। इनकी एक अन्य रचना में कहा गया हैः आज वारि लो झरता झर-झर भरे हुए मेघों से हैं; फोड़ गगन आकुल जल-धारा थमती नहीं कहीं भी है। शाल विपिन में दल के दल हैं मेघों से लग गई झड़ी; झूम-झूम मैदानों में है इधर-उधऱ वर्षा होती। जटा बिखेरे मेघों की यों कौन आज है नाच रही! अजी, खुला है मन मेरा यह लुटा झड़ी में हो जैसे ! वक्षस्थल-पूरित तरंग है पड़ती पांवों पर किसके? अंतस् में कलरव यह कैसा? खुला द्वार का पट ज्यों; हृदय-बीच जागा पागल-सा मास भाद्रपद में हूं यों! आज रात-भर बाहर ऐसा कौन मत्त हो रहा भला? असीम परमसत्ता के साथ जीवात्मा का अद्वैत भाव भारतीय आध्यात्मिकता और दार्शनिकता का सार तत्व है। उस परम तत्व को अपने सखा, अपने बंधु के रूप में अभिकल्पित करते हुए कविवर रविन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा हैः आज झड़ी की रात हुआ आगमन तुम्हारा हैः रोता है आकाश हतास्-सा, नहीं नींद है नयनों में मेरे; द्वार खोलके हे प्रियवर!बार-बार मैं तुम्हे निहार रहा। प्राण-सखा, हे मेरे बन्धु! बाहर कुछ मैं देख न पाता, सोचा करता हूं कि भला, पथ किधर तुम्हारा है! किस सुदूर सरिता के पार, किस दुर्गम जंगल के पास, किस गंभीर तमिसा होकर हो जाते हो पार, भला, तुम? प्राण-सखा हे मेरे बंधु! सारांशतः पावस वर्णऩ के क्रम में परमात्मा के साथ एकात्मकता की सहज अनुभूति और उसकी सफल अभिव्यक्ति महाकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचनाधर्मिता की अभिनंदनीय विशिष्टता है।

साभार (आजकल)
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कविता ( धरोहर)

राजा वसन्त वर्षा ऋतुओं की रानी लेकिन दोनों की कितनी भिन्न कहानी राजा के मुख में हँसी कण्ठ में माला रानी का अन्तर द्रवित दृगों में पानी
डोलती सुरभि राजा घर कोने कोने परियाँ सेवा में खड़ी सजा कर दोने खोले अंचल रानी व्याकुल सी आई उमड़ी जाने क्या व्यथा लगी वह रोने
लेखनी लिखे मन में जो निहित व्यथा है रानी की निशि दिन गीली रही कथा है त्रेता के राजा क्षमा करें यदि बोलूँ राजा रानी की युग से यही प्रथा है
नृप हुये राम तुमने विपदायें झेलीं थी कीर्ति उन्हें प्रिय तुम वन गयीं अकेली वैदेहि तुम्हें माना कलंकिनी प्रिय ने रानी करुणा की तुम भी विषम पहेली
रो रो राजा की कीर्तिलता पनपाओ रानी आयसु है लिये गर्भ वन जाओ
रामधारी सिंह ' दिनकर'
मैं सदा बरसने वाला मेघ बनूँ
तुम कभी न बुझने वाली प्यास बनो।
संभव है बिना बुलाए तुम तक आऊँ
हो सकता है कुछ कहे बिना फिर जाऊँ
यों तो मैं सबको बहला ही लेता हूँ
लेकिन अपना परिचय कम ही देता हूँ।
मैं बनूँ तुम्हारे मन की सुन्दरता
तुम कभी न थकने वाली साँस बनो।
तुम मुझे उठाओ अगर कहीं गिर जाऊँ
कुछ कहो न जब मैं गीतों से घिर जाऊँ
तुम मुझे जगह दो नयनों में या मन में
पर जैसे भी हो पास रहो जीवन में ।
मैं अमृत बाँटने वाला मेघ बनूँ
तुम मुझे उठाने को आकाश बनो।
हो जहाँ स्वरों का अंत वहाँ मैं गाऊँ
हो जहाँ प्यार ही प्यार वहाँ बस जाऊँ
मैं खिलूँ वहाँ पर जहाँ मरण मुरझाये
मैं चलूँ वहाँ पर जहाँ जगत रुक जाये।
मैं जग में जीने का सामान बनूँ
तुम जीने वालों का इतिहास बनो।
याद बन-बनकर गगन पर
सांवले घन छा गए हैं
ये किसी के प्यार का संदेश लाए
या किसी के अश्रु ही परदेश आए।
श्याम अंतर में गला शीशा दबाए
उठ वियोगिनी देख घर मेहमान आए।
धूल धोने पांव की
सागर गगन पर आ गए हैं
रात ने इनको गले में डालना चाहा
प्यास ने मिटकर इन्हीं को पालना चाहा
बूंद पीकर डालियां पत्ते नए लायीं
और बनकर फूल कलियां खूब मुस्काईं
प्रीति रथ पर गीत चढ़ कर
रास्ता भरमा गए हैं
श्याम तन में श्याम परियों को लपेटे
घूमते हैं सिंधु का जीवन समेटे
यह किसी जलते हृदय की साधना है
दूरवाले को नयन से बांधना है
रूप के राजा किसी के
रूप से शरमा गए हैं ।
रमानाथ अवस्थी
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कविता आज और अभी

शहर में बरसात
(दुबई में कार के भीतर से, जहां बरसात कभी कदा ही होती है)
शहर में बरसात हुई
भीगी-सी ठंडी-सी रात हुई।
भली लगीं खिड़की पर
शीशे से टकराती
कीमती बौछारें
सड़कों पर मन्द हुई
तेज़-तेज़ दौड़ रही
कार की कतारें
प्रतिबिम्बित होती हैं बहुरंगी बत्तियां
सजधज बाजारों की
बड़े बड़े ग्लो साइन
बारिश की धारों में अजब समा देते हैं
धुंधलाता है सामने का कांच
कठिन श्रम करते हैं वाइपर
परे सिमटती है
कोलाहल भरी भीड़
छोटे से कैफे में
शीशे गिराता है लड़का
सिमटा मुस्कुराता-सा
कड़ाहे में पलटता है बार-बार
फिलफिल के पकौड़ों को
दौड़-दौड़ कर परोसता है कावा के गर्म प्याले
गहराई सड़कों पर
टिप-टिपकर बहुत तेज़
होता है टंकित
नया गीत वर्षा का
कौन है लिपिक?
पूर्णिमा बर्मन

एक बौनी बूंद
एक बौनी बूंद ने
मेहराब से लटक
अपना कद
लंबा करना चाहा
बाकी बूंदें भी
देखा-देखी
लंबा होने की होड़ में
चाहे पल भर के लिए ही सही
धक्का-मुक्की
लगा लटकीं
पल भर के लिए
लंबी हुईं
फिर गिरीं
जा मिलीं
अन्य बूंदों में
पानी-पानी हो उठीं
नादानी पर अपनी !
दिव्या माथुर

लंदन में बरसात
ऐसी जगह पे आके बस गया हूं दोस्तो बारिश का जहां कोई भी होता नहीं मौसम पतझड़ हो या सर्दी हो या गर्मी का हो आलम वर्षा की फुहारें बस, गिरती रहें हरदम
मिट्टी है यहां गीली, पानी भी गिरे चुप चुप ना नाव है काग़ज़ की, छप छप ना सुनाई दे वो सौंघी सी मिट्टी की ख़ुशबू भी नहीं आती वो भीगी लटों वाली, कमसिन ना दिखाई दे
इस शहर की बारिश का ना कोई भरोसा है पल भर में चुभे सूरज, पल भर में दिखें बादल क्या खेल है कुदरत का, ये कैसे नज़ारे हैं सब कुछ है मगर फिर भी ना दिल में कोई हलचल
चेहरे ना दिखाई दें, छातों की बनें चादर अपना ना दिखे कोई, सब लगते हैं बेगाने लगता ही नहीं जैसे यह प्यार का मौसम है शम्मां हो बुझी गर तो, कैसे जलें परवाने
तेजेन्द्र शर्मा

एक कहानी हो बादल!
मैं सैलानी तुम सैलानी
गति दोनों की ही मनमानी
पलती है भीतर दोनों के
एक कुंआरी पीर अजानी।
दोनों में है घुटन भरी
दोनों में पानी है
बादल! मेरी और तुम्हारी
एक कहानी है।
अनगिन रूप धरे जीने को
लिए लिए छलनी सीने को
कहां कहां भटके हैं हम तुम
लेकर अपना यौवन गुमसुम।
फिर गांव, बस्ती में बन में
कुछ न कहीं पाया जीवन में
फिर भी हंसते रहे सदा-
कैसी नादानी है।
हमने जितने स्वप्न संजोए
मौसम पर बंधक हैं सारे
कितने ही दिन हम, ऋतुओं के
आगे रोए---हाथ पसारे।
कहकर सबसे दुआ बंदगी
धुंआ धुंआ हो गई जिन्दगी
हम पर बची नहीं
कोई भी नेह निशानी है।
-कन्हैयालाल बाजपेयी
आंखों ले बरखा औ बिजुरी
भटक रही कजरारी बदरी
निर्मोही वो चंदा पिय-सा
दिखता ना अंधियारी रात।
पागल है...
यह बादल मन-सा
गरजा बरसा और टूटा
सब कुछ ही तो एक साथ।
छपक छपक गंदले पानी में
कागज की वो बिखरी नैया
ले डूबी है सारा जंगल
बरसाती सब ताल तलैया।
शैल अग्रवाल
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कहानी-धरोहर

बूढ़ी काकी

-मुंशी प्रेमचन्द
बुढापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है। बूढ़ी काकी में जिह्वा-स्वाद के सिवा और कोई चेष्टा शेष न थी और न अपने कष्टों की ओर आकर्षित करने का, रोने अतिरिक्त कोई दूसरा सहारा ही। समस्त इन्द्रियां, नेत्र, हाथ और पैर जवाब दे चुके थे। पृथ्वी पर पड़ी रहती और घर वाले कोई बात उनकी इच्छा के प्रतिकूल करते, भोजन का समय टल जाता या उसका परिणाम पूर्ण न होता अथवा बाजार से कोई वस्तु आती और न मिलती तो ये रोने लगती थीं। उनका रोना-सिसकना साधारण रोना न था, वे गला फाड़-फाड़कर रोती थीं।
उनके पतिदेव को स्वर्ग सिधारे कालांतर हो चुका था। बेटे तरुण हो-होकर चल बसे थे। अब एक भतीजे के अलावा और कोई न था। उसी भतीजे के नाम उन्होंने अपनी सारी सम्पति लिख दी। भतीजे ने सारी सम्पति लिखाते समय खूब लम्बे चौड़े वादे किए, किन्तु वे सब वादे केवल कुली डिपो के दलालों के दिखाए हुए सब्जबाग थे। यद्यपि उस सम्पति की वार्षिक आय डेढ़-दो सौ रुपए से कम न थी तथापि बूढ़ी काकी को पेट भर भोजन भी कठिनाई से मिलता था। इसमें उसके भतीजे पंडित बुद्धिराम का अपराध था अथवा उसकी अर्धांगिनी श्रीमती रूपा का, इसका निर्णय करना सहज नहीं। बुद्धिराम स्वभाव के सज्जन थे, किंतु उसी समय तक जब कि उनके कोष पर आंच न आए। रूपा स्वभाव से तीव्र थी सही, पर ईश्वर से डरती थी। अतएव बूढ़ी काकी को उसकी तीव्रता उतनी न खलती थी जितनी बुद्धिराम की भलमनसाहत।
बुद्धिराम को कभी-कभी अपने अत्याचार का खेद होता था। विचारते कि इसी सम्पति के कारण मैं इस समय भलामानुष बना बैठा हूं। यदि भौतिक आश्वासन और सूखी सहानुभूति से स्थिति में सुधार हो सकता हो उन्हें कदाचित् कोई आपत्ति न होती, परन्तु विशेष व्यय का भय उनकी सुचेष्टा को दबाए रखता था। यहां तक कि यदि द्वार पर कोई भला आदमी बैठा होता और बूढ़ी काकी उस समय अपना राग अलापने लगती तो वह आग हो जाते और घर में आकर उन्हें जोर से डांटते। लड़कों को बुड्ढों से स्वाभाविक विद्वेष होता ही है ौर पिर जब माता-पिता का यह रंग देखते तो वे बूढ़ी काकी को और सताय करते। कोई चुटकी काटकर भागता, कोई इनपर पानी की कुल्ली कर देता। काकी चीख मारकर रोतीं परन्तु यह बात प्रसिद्द थी कि वह केवल खाने के लिए रोती हैं, अतएव उनके संताप और आर्तनाद पर कोई ध्यान नहीं देता था। हां, काकी क्रोधातुर होकर बच्चों को गालियां देने लगतीं तो रूपा घटनास्थल पर आ पहुंचती। इस भय से काकी अपनी जिह्वा कृपाण का कदाचित् ही प्रयोग करती थीं, यद्यपि उपद्रव-शान्ति का यह उपाय रोने से कहीं अधिक उपयुक्त था।
संपूर्ण परिवार में यदि काकी से किसी को अनुराग था, तो वह बुद्धिराम की छोटी लड़की लाडली थी। लाडली अपने दोनों भाइयों के भय से अपने हिस्से की मिठाई-चबैना बूढ़ी काकी के पास बैठकर खाया करती थी। यही उसका रक्षागार था और यद्यपि काकी की शरण उनकी लोलुपता के कारण बहुत मंहगी पड़ती थी, तथापि भाइयों के अन्याय से कहीं सुलभ थी। इसी स्वार्थानुकूलता ने उन दोनों में सहानुभूति का आरोपण कर दिया था।
(2)
रात का समय था। बुद्धिराम के द्वार पर शहनाई बज रही थी और गांव के बच्चों का झुंड विस्मयपूर्ण नेत्रों से गाने का रसास्वादन कर रहा था। चारपाइयों पर मेहमान विश्राम करते हुए नाइयों से मुक्कियां लगवा रहे थे। समीप खड़ा भाट विरदावली सुना रहा था और कुछ भावज्ञ मेहमानों की "वाह, वाह" पर ऐसा खुश हो रहा था मानो इस वाह-वाह का यथार्थ में वही अधिकारी है। दो-एक अंग्रेजी पढ़े हुए नवयुवक इन व्यवहारों से उदासीन थे। वे इस गंवार मंडली में बोलना अथवा सम्मिलित होना अपनी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल समझते थे।
आज बुद्धिराम के बड़े लड़के मुखराम का तिलक आया है। यह उसी का उत्सव है। घर के भीतर स्त्रियां गा रही थीं और रूपा मेहमानों के लिए बोजन में व्यस्त थी। भट्टियों पर कड़ाह चढ़ रहे थे। एक में पूड़ियां-कचौड़ियां निकल रही थीं, दूसरे में अन्य पकवान बनते थे। एक बड़े हंडे में मसालेदार तरकारी पक रही थी। घी और मसाले की क्षुधावर्धक सुगंधि चारों ओर फैली हुई थी।
बूढ़ी काकी अपनी कोठरी में शोकमय विचार की भांति बैठी हुई थीं। यह स्वाद मिश्रित सुगंधि उन्हें बेचैन कर रही थी। वे मन-ही-मन विचार कर रही थीं, संभवतः मुझे पूड़ियां न मिलेंगीं। इतनी देर हो गई, कोई भोजन लेकर नहीं आया। मालूम होता है सब लोग भोजन कर चुके है। मेरे लिए कुछ न बचा। यह सोचकर उन्हें रोना आया, परन्तु अपशकुन के भय से वह रो न सकीं।
" आहा कैसी सुगंधि है? अब मुझे कौन पूछता है। जब रोटियों के ही लाले पड़े हैं तब ऐसे भाग्य कहां कि भरपेट पूड़ियां मिलें?" यह विचार कर उन्हें रोना आया, कलेजे में हूक सी उठने लगी। परंतु रूपा के भय से उन्होंने फिर मौन धारण कर लिया।
बूढ़ी काकी देर तक इन्ही दुखदायक विचारों में डूबी रहीं। घी और मसालों की सुगंधि रह-रहकर मन को आपे से बाहर किए देती थी। मुंह में पानी भर-भर आता था। पूड़ियों का स्वाद स्मरण करके हृदय में गुदगुदी होने लगती थी। किसे पुकारूं, आज लाडली बेटी भी नहीं आई। दोनों छोकड़े सदा दिक दिया करते हैं। आज उनका भी कहीं पता नहीं। कुछ मालूम तो होता कि क्या बन रहा है।
बूढ़ी काकी की कल्पना में पूड़ियों की तस्बीर नाचने लगी। खूब लाल-लाल, फूली-फूली, नरम-नरम होंगीं। रूपा ने भली-भांति भोजन किया होगा। कचौड़ियों में अजवाइन और इलायची की महक आ रही होगी। एक पूड़ी मिलती तोजरा हाथ में लेकर देखती। क्यों न चलकर कड़ाह के सामने ही बैठूं। पूड़ियां छन-छनकर तैयार होंगी। कड़ाह से गरम-गरम निकालकर थाल में रखी जाती होंगी। फूल हम घर में भी सूंघ सकते हैं , परन्तु वाटिका में कुछ और बात होती है। इस प्रकार निर्णय करके बूढ़ी काकी उकड़ूं बैठकर हाथों के बल सरकती हुई बड़ी कठिनाई से चौखट से उतरीं और धीरे-धीरे रेंगती हुई कड़ाह के पास जा बैठी। यहां आने पर उन्हें उतना ही धैर्य हुआ जितना भूखे कुत्ते को खाने वाले के सम्मुख बैठने में होता है।
रूपा उस समय कार भार से उद्विग्न हो रही थी। कभी इस कोठे में जाती, कभी उस कोठे में, कभी कड़ाह के पास जाती, कभी भंडार में जाती। किसी ने बाहर से आकर कहा---" महाराज ठंडई मांग रहे हैं।" ठंडई देने लगी। इतने में फिर किसी ने आकर कहा---" भाट आया है, उसे कुछ दे दो ।" भाट के लिए सीधा निकाल रही थी कि एक तीसरे आदमी ने आकर पूछा---" अभी भोजन तैयार होने में कितना विलंब है? जरा ढोल, मजीरा उतार दो।" बेचारी अकेली स्त्री दौड़ते-दौड़ते व्याकुल हो रही थी, झुंझलाती थी, कुढ़ती थी, परन्तु क्रोध प्रकट करने का अवसर न पाती थी। भय होता, कहीं पड़ोसिनें यह न कहने लगें कि इतने में उबल पड़ीं। प्यास से स्वयं कंठ सूख रहा था। गर्मी के मारे फुंकी जाती थी, परन्तु इतना अवकाश न था कि जरा पानी पी ले अथवा पंखा लेकर झले। यह भी खटका था कि जरा आंख हटी और चीजों की लूट मची। इस अवस्था में उसने बूढ़ी काकी को कड़ाह के पास बैठी देखा तो जल गई। क्रोध न रुक सका। इसका भी ध्यान न रहा कि पड़ोसिनें बैठी हुई हैं, मन में क्या कहेंगीं, पुरुषों में लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे। जिस प्रकार मेंढक केंचुए पर झपटता है, उसी प्रकार वह बूढ़ी काकी पर झपटी और उन्हें दोनों हाथों से झटककर बोली---ऐसे पेट में आग लगे, पेट है या भाड़? कोठरी में बैठते हुए क्या दम घुटता था ? अभी मेहमानों ने नहीं खाया, भगवान को भोग नहीं लगा, तब तक धैर्य न हो सका? आकर छाती पर सवर हो गई। जल जाए ऐसी जीभ। दिन भर खाती न होती तो जाने किसकी हांडी में मुंह डालती? गांव देखेगा तो कहेगा कि बुढ़िया भरपेट खाने को नहीं पाती तभी तो इस तरह मुंह बाए फिरती है। डायन न मरे न मांचा छोड़े। नाम बेचने पर लगी है। नाक कटवाकर दम लेगी। इतनी ठूंसती है न जाने कहां भस्म हो जाता है। भला चाहती हो तो जाकर कोठरी में बैठो, जब घर के लोग खाने लगेंगे, तब तुम्हे भी मिलेगा। तुम कोई देवी नहीं हो कि चाहे किसी के मुंह में पनी न जाए, परन्तु तुम्हारी पूजा पहले ही हो जाए।
बूढ़ी काकी ने सिर उठाया, न रोईं न बोलीं। चुपचाप रेंगती हुई अपनी कोठरी में चली गईं। आवाज ऐसी कठोर थी कि हृदय और मष्तिष्क की सम्पूर्ण शक्तियां, सम्पूर्ण विचार और सम्पूर्ण भार उसी ओर आकर्षित हो गए थे। नदी में जब कगार का कोई वृहद खंड कटकर गिरता है तो आस-पास का जल समूह चारों ओर से उसी स्थान को पूरा करने के लिए दौड़ता है।
(3)
भोजन तैयार हो गया है। आंगन में पत्तलें पड़ गईं, मेहमान खाने लगे। स्त्रियों ने जेवनार-गीत गाना आरम्भ कर दिया। मेहमानों के नाई और सेवक गण भी उसी मंडली के साथ किंतु कुछ हटकर भोजन करने बैठे थे, परन्तु सभ्यतानुसार जब तक सब-के-सब खा न चुकें कोई उठ नहीं सकता था। दो-एक मेहमान जो कुछ पढ़े-लिखे थे, सेवकों के दीर्घाहार पर झुंझला रहे थे। वे इस बंधन को व्यर्थ और बेकार की बात समझते थे।
बूढ़ी काकी अपनी कोठरी में जाकर पश्चाताप कर रही थी कि मैं कहां-से-कहां गई। उन्हें रूपा पर क्रोध नहीं था। अपनी जल्दबाजी पर दुख था। सच ही तो है जब तक मेहमान लोग भोजन न कर चुकेंगे, घर वाले कैसे खाएंगे। मुझसे इतनी देर भी न रहा गया। सबके सामने पानी उतर गया। अब जब तक कोई बुलाने नहीं आएगा, न जाऊंगी।
मन-ही-मन इस प्रकार का विचार कर वह बुलाने की प्रतीक्षा करने लगीं। परन्तु घी की रुचिकर सुवास बड़ी धैर्य़-परीक्षक प्रतीत हो रही थी। उन्हें एक-एक पल एक-एक युग के समान मालूम होता था। अब पत्तल बिछ गई होगी। अब मेहमान आ गए होंगे। लोग हाथ पैर धो रहे हैं, नाई पानी दे रहा है। मालूम होता है लोग खाने बैठ गए। जेवनार गाया जा रहा है, यह विचार कर वह मन को बहलाने के लिए लेट गईं। धीरे-धीरे एक गीत गुनगुनाने लगीं। उन्हें मालूम हुआ कि मुझे गाते देर हो गई। क्या इतनी देर तक लोग भोजन कर ही रहे होंगे। किसी की आवाज सुनाई नहीं देती। अवश्य ही लोग खा-पीकर चले गए। मुझे कोई बुलाने नहीं आया है। रूपा चिढ़ गई है, क्या जाने न बुलाए। सोचती हो कि आप ही आवेंगीं, वह कोई मेहमान तो नहीं जो उन्हें बुलाऊं। बूढ़ी काकी चलने को तैयार हुईं। यह विश्वास कि एक मिनट में पूड़ियां और मसालेदार तरकारियां सामने आएंगीं, उनकी स्वादेन्द्रियों को गुदगुदाने लगा। उन्होंने मन में तरह-तरह के मेसूबे बांधे---पहले तरकारी से पूड़ियां खाऊंगी, फिर दही और शक्कर से, कचौरियां रायते के साथ मजेदार मालूम होंगी। चाहे कोई बुरा माने चाहे भला, मैं तो मांग-मांगकर खाऊंगी। यही न लोग कहेंगे कि इन्हें विचार नहीं? कहा करें, इतने दिन के बाद पूड़ियां मिल रही हैं तो मुंह झूठा करके थोड़े ही उठ जाऊंगी ।
वह उकड़ूं बैठकर सरकते हुए आंगन में आईं। परन्तु हाय दुर्भाग्य ! अभिलाषा ने अपने पुराने स्वभाव के अनुसार समय की मिथ्या कल्पना की थी। मेहमान मंडली अभी बैठी हुई थी। कोई खाकर उंगलियां चाटता था , कोई तिरछे नेत्रों से देखता था कि और लोग अभी खा रहे हैं या नहीं। कोई इस चिंता में था कि पत्तल पर पूड़ियां छूटी जाती हैं किसी तरह इन्हें भीतर रख लेता। कोई दही खाकर चटकारता था, परन्तु दूसरा दोना मांगते संकोच करता था कि इतने में बूढ़ी काकी रेंगती हुई उनके बीच में आ पहुंची। कई आदमी चौंककर उठ खड़े हुए। पुकारने लगे---अरे यह बुढ़िया कौन है। यहां कहां से आ गई? देखो किसी को छू न दे।
पंडित बुद्धिराम काकी को देखते ही क्रोध से तिलमिला गए। पू़ड़ियों का थाल लिए खड़े थे। थाल को जमीन पर पटक दिया और जिस प्रकार निर्दयी महाजन अपने किसी बेइमान और भगोड़े कर्जदार को देखते ही उसका टेंटुआ पकड़ लेता है उसी तरह लपककर उन्होंने काकी के दोनों हाथ पकड़े और घसीटते हुए लाकर उन्हें अंधेरी कोठरी में धम से पटक दिया। आशा रूपी वटिका लू के एक झोंके में विनष्ट हो गई।
मेहमानों ने भोजन किया। घरवालों ने भोजन किया। बाजे वाले, धोबी, चमार भी भोजन कर चुके, परंतु बूढ़ी काकी को किसी ने न पूछा। बुद्धिराम और रूपा दोनों ही बूढ़ी काकी को उनकी निर्लज्जता के लिए दंड देने क निश्चय कर चुके थे। उनके बुढ़ापे पर, दीनता पर, हत्ज्ञान पर किसी को करुणा न आई थी। अकेली लाडली उनके लिए कुढ़ रही थी।
लाडली को काकी से अत्यंत प्रेम था। बेचारी बोली लड़की थी। बाल-विनोद और चंचलता की उसमें गंध तक न थी। दोनों बार जब उसके माता पिता ने काकी को निर्दयता से घसीटा तो लाडली का हृदय एंठकर रह गया। वह झुंझला रही थी कि हम लोग काकी को क्यों बहुत सी पूड़ियां नहीं देते। क्या मेहमान सब-की-सब खा जाएंगे? और यदि काकी ने मेहमानों से पहले खा लिया तो क्या बिगड़ जाएगा? वह काकी के पास जाकर उन्हें धैर्य देना चाहती थी, परन्तु माता के भय से न जाती थी। उसने अपने हिस्से की पूड़ियां बिल्कुल न खाईं थीं। अपनी गुड़िया की पिटारी में बन्द कर रखी थीं। उन पूड़ियों को काकी के पास ले जाना चाहती थी। उसका हृदय अधीर हो रहा था। बूढ़ी काकी मेरी बात सुनते ही उठ बैठेंगीं, पूड़ियां देखकर कैसी प्रसन्न होंगीं ! मुझे खूब प्यार करेंगीं।
(4)
रात को ग्यारह बज गए थे। रूपा आंगन में पड़ी सो रही थी। लाडली की आंखों में नींद न आती थी। काकी को पूड़ियां खिलाने की खुशी उसे सोने न देती थी। उसने गु़ड़ियों की पिटारी सामने रखी थी। जब विश्वास हो गया कि अम्मा सो रही हैं, तो वह चुपके से उठी और विचारने लगी, कैसे चलूं। चारो ओर अंधेरा था। केवल चूल्हों में आग चमकरही थी और चूल्हों के पास एक कुत्ता लेटा हुआ था। लाडली की दृष्टि सामने वाले नीम पर गई। उसे मालूम हुआ कि उस पर हनुमान जी बैठे हुए हैं। उनकी पूंछ, उनकी गदा , वह स्पष्ट दिखलाई दे रही है। मारे भय के उसने आँखें बंद कर लीं। इतने में कुत्ता उठ बैठा, लाडली को ढाढ़स हुआ। कई सोए हुए मनुष्यों के बदले एक भागता हुआ कुत्ता उसके लिए अधिक धैर्य का कारण हुआ। उसने पिटारी उठाई और बूढ़ी काकी की कोठरी की ओर चली।
(5)
बूढ़ी काकी को केवल इतना स्मरण था कि किसी ने मेरे हाथ पकड़कर घसीटे, फिर ऐसा मालूम हुआ कि जैसे कोई पहाड़ पर उड़ाए लिए जाता है। उनके पैर बार-बार पत्थरों से टकराए तब किसी ने उन्हें पहाड़ पर से पटका, वे मूर्छित हो गईं।
जब वे सचेत हुईं तो किसी की जरा भी आहट न मिलती थी। समझी कि सब लोग खा-पीकर सो गए और उनके साथ मेरी तकदीर भी सो गई। रात कैसे कटेगी? राम! क्या खाऊँ? पेट में अग्नि धधक रही है। हा! किसी ने मेरी सुधि न ली। क्या मेरा पेट काटने से धन जुड़ जाएगा? इन लोगों को इतनी भी दया नहीं आती कि न जाने बुढ़िया कब मर जाए? उसका जी क्यों दुखावें? मैं पेट की रोटियां ही खाती हूं कि और कुछ? इस पर यह हाल। मैं अंधी, अपाहिज ठहरी, न कुछ सुनूं न बूझूं। यदि आंगन में चली गई तो क्या बुद्धिराम से इतना कहते न बनता था कि काकी अभी लोग खाना खा रहे हैं फिर आना। मुझे घसीटा, पटका। उन्ही पूड़ियों के लिए रूपा ने सबके सामने गालियां दीं। उन्हीं पूड़ियों के लिए इतनी दुर्गति करने पर भी उनका पत्थर का कलेजा न पसीजा। सबको खिलाया, मेरी बात तक न पूछी। जब तब ही नदीं, तब अब क्या देंगे? यह विचार कर काकी निराशमय संतोष के साथ लेट गई। ग्लानि से गला भर-भर आता था, परन्तु मेहमानों के भय से रोती न थी। सहसा कानों में आवाज आई ---" काकी उठो, मैं पूड़ियां लाई हूं।" काकी ने लाडली की बोली पहचानी। चटपट उठ बैठी। दोनों हाथों से लाडली को टटोला और उसे गोद में बिठा लिया। लाडली ने पूड़ियां निकालकर दीं। काकी ने पूछा---क्या तुम्हारी अम्मा ने दी है? लाडली ने कहा---नहीं, यह मेरे हिस्से की हैं। काकी पूड़ियों पर टूट पडीं। पांच मिनट में पिटारी खाली हो गई। लाडली ने पूछा---काकी पेट भर गया। जैसे थोड़ी-सी वर्षा ठंडक के स्थान पर और भी गर्मी पैदा कर देती है उस भांति इन थोड़ी पूड़ियों ने काकी की क्षुधा और इक्षा को और उत्तेजित कर दिया था। बोली---नहीं बेटी, जाकर अम्मा से और मांग लाओ। लाडली ने कहा---अम्मा सोती हैं, जगाऊंगी तो मारेंगीं। काकी ने पिटारी को फिर टटोला। उसमें कुछ खुर्चन गिरी थी। बार-बार होंठ चाटती थीं, चटखारे भरती थीं। हृदय मसोस रहा था कि और पूड़ियां कैसे पाऊं। संतोष सेतु जब टूट जाता है तब इच्छा का बहाव अपरिमित हो जाता है। मतवालों को मद का स्मरण करना उन्हें मदांध बनाता है। काकी का अधीर मन इच्छाओं के प्रबल प्रवाह में बह गया। उचित और अनुचित का विचार जाता रहा। वे कुछ देर तक उस इच्छा को रोकती रहीं। सहसा लाडली से बोलीं---मेरा हाथ पकड़कर वहां ले चलो जहां मेहमानों ने बैठकर भोजन किया है। लाडली उनका अभिप्राय समझ न सकी। उसने काकी का हाथ पकड़ा और ले जाकर झूठे पत्तलों के पास बिठा दिया। दीन, क्षुधातुर, हत् ज्ञान बुढ़िया पत्तलों से पूड़ियों के टुकड़े चुन-चुनकर भक्षण करने लगी। ओह दही कितना स्वादिष्ट था, कचौड़ियां कितनी सलोनी, खस्ता कितने सुकोमल। काकी बुद्धिहीन होते हुए भी इतना जानती थी कि मैं वह काम कर रही हूं, जो मुझे कदापि न करना चाहिए। मैं दूसरों की झूठी पत्तल चाट रही हूं। परंतु बुढ़ापा तृष्णा रोग का अंतिम समय है, जब संपूर्ण इच्छाएं एक ही केन्द्र पर आ लगती हैं। बूढ़ी काकी में यह केन्द्र उनकी स्वादेन्द्रिय थी। ठीक उसी समय रूपा की आँख खुली। उसे मालूम हुआ कि लाडली मेरे पास नहीं है। वह चौंकी, चारपाई के इधर-उधर ताकने लगी कि कहीं नीचे तो नहीं गिर पड़ी। उसे वहां न पाकर वह उठी तो क्या देखती है कि लाडली जूठे पत्तलों के पास चुपचाप खड़ी है और बूढ़ी काकी पत्तलों पर से पूड़ियों के टुकड़े उठा-उठाकर खा रही है। रूपा का हृदय सन्न हो गया। किसी गाय की गरदन पर छुरी चलते देखकर जो अवस्था उसकी होती, वही उस समय हुई। एक ब्राह्मणी दूसरों की झूठी पत्तल टटोले, इससे अधिक शोकमय दृश्य असंभव था। पूड़ियों के कुछ ग्रासों के लिए उसकी चचेरी सास ऐसा निष्कृष्ट कर्म कर रही है। यह वह दृश्य था जिसे देखकर देखने वालों के हृदय कांप उठते हैं। ऐसा प्रतीत होता मानो जमीन रुक गई, आसमान चक्कर खा रहा है। संसार पर कोई आपत्ति आने वाली है। रूपा को क्रोध न आया। शोक के सम्मुख क्रोध कहां? करुणा और भय से उसकी आँखें भर आय़ीं। इस अधर्म का भागी कौन है? उसने सच्चे हृदय से गगन मंडल की ओर हाथ उठाकर कहा---परमात्मा मेरे बच्चों पर दया करो। इस अधर्म का दंड मुझे मत दो, नहीं तो मेरा सत्यानाश हो जाएगा। रूपा को अपनी स्वार्थपरता और अन्याय इस प्रकार प्रत्यक्ष रूप में कभी न देख पड़े थे। वह सोचने लगी---हाय! कितनी निर्दय हूं। जिसकी सम्पति से मुझे दो सौ रुपया आय हो रही है, उसकी यह दुर्गति। और मेरे कारण। हे दयामय भगवान! मुझसे बड़ी भारी चूक हुई है, मुझे क्षमा करो। आज मेरे बेटे का तिलक था। सैकड़ों मनुष्यों ने भोजन पाया। मैं उनके इशारों की दासी बनी रही। अपने नाम के लिए सैकड़ों रुपए व्यय कर दिए, परन्तु जिसकी बदौलत हजारों रुपए खाए, उसे इस उत्सव में भी भरपेट भोजन न दे सकी। केवल इसी कारण तो, वह वृद्धा असहाय है। रूपा ने दिया जलाया, अपने भंडार का द्वार खोला और एक थाली में सम्पूर्ण सामग्रियां सजाकर बूढ़ी काकी की ओर चली। आधी रात जा चुकी थी, आकाश पर तारों के थाल सजे हुए थे और उन पर बैठे हुए देवगण स्वर्गीय पदार्थ सजा रहे थे, परन्तु उसमें किसी को वह परमानंद प्राप्त न हो सकता था, जो बूढ़ी काकी को अपने सम्मुख थाल देखकर प्राप्त हुआ। रूपा ने कंठारुद्ध स्वर में कहा---काकी उठो, भोजन कर लो। मुझसे आज बड़ी भूल हुई, उसका बुरा न मानना। परमात्मा से प्रार्थना कर दो कि वह मेरा अपराध क्षमा कर दें। भोले-भोले बच्चों की भांति, जो मिठाइयां पाकर मार और तिरस्कार सब भूल जाता है, बूढ़ी काकी वैसे ही सब भुलाकर बैठी हुई खाना खा रही थी। उनके एक-एक रोंये से सच्ची सदिच्छाएं निकल रही थीं और रूपा बैठी स्वर्गीय दृश्य का आनन्द लेने में निमग्न थी।
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छाता हाथ में लेकर

:शरद जोशी
वे जब बाहर जाते, हाथ में तलवार लिए रहते। पुराने क्षत्रिय। निश्चित बोर हो जाते होंगे। हमेशा क्या जरूरत, पर वजन लादना पड़ता था। बाद में सिर्फ़ कटार की चल गयी। हल्की, तेज़। ली और निकल गये। सोचो ज़रा उनका कष्ट। मैं तो अनुमान लगा सकता हूँ। चार-पांच रोज़ से इधर छाता लेकर घूम रहा हूँ। यहां-वहां भूल भी जाता हूँ। छाते में यही एक बीमारी है, जब-तब छूट जाता है, कहीं भी। क्षत्रिय वीर भी जहां-तहां तलवार भूल जाते होंगे। लड़ने-भिड़ने वालों का दिमाग यों भी खास तेज़ नहीं होता । इसलिए बाद में कमर में म्यान कसी जाने लगी जिसमें तलवार डाले रहते कि भूलने का सवाल ही न उठे। आजकल वैसे क्षत्रिय नहीं रहे। होते तो अपनी कमर में एक तलवार और एक छाता कसे घूमते नज़र आते। जब जिसकी ज़रूरत वही निकाल दिया। पुराने समय में नौकर पीछे-पीछे छतर लेकर चलता था और खुद मालिक तलवार लेकर। अब तलवार बेज़रूरत हो गयी और छतर उठाने वाला अलग कर दिया गया। अब हम अपना छतर खुद उठाये चलते हैं। जैसे मैं चार-पांच दिनों से छाता उठाय़े घूम रहा हूँ।
अक्सर जब छाता लेकर घर से निकलते हैं, वर्षा नहीं होती। बादल बिचक जाते है। कौन बरसे? फायदा क्या ? लोग भीगने को ही राज़ी नहीं तो व्यर्थ पानी क्यों गंवाया जाए? ऐसी हालत में छाता एक समस्या हो जाती है। इसे कैसे उठाया जाए? पिछले दिनों मैंने अलग-अलग ढंग से छाता उठाने के प्रयोग किए हैं। जैसे एक सामान्य शरीफ़ाना अन्दाज़ यह है कि आप छाते को बांए हाथ पर लटका लें। बांयें अथवा दाहिने हाथ पर। ऐसा मैने अक्सर किया है। विशेष रूप से स्टैंड पर किसी का इन्तज़ार करते हुए या किसी से बातें करते समय। पर यह मुद्रा ज्यादा देर चल नहीं पाती। कोहनी से हाथ बराबर नब्बे डिग्री का कोण बनाए वज़न सहता है। अपने देशी मरदाने छाते आम तौर पर हल्के नहीं होते। इस पोज़ में चलने में असुविधा होती है। छाते का निचला भाग (पता नहीं छाते का निचला या ऊपरी भाग किसे कहेंगे क्योंकि खुलने पर छाते का जो भाग ऊपर होता है, छाता बन्द करने पर वही भाग नीचे आ जाता है)। बार-बार पैरों से टकराता है। मज़बूरन आप हाथ को शरीर से थोड़ा अलग हटाकर चलते हैं जैसे पूजा की थाली लेकर मन्दिर जानेवाली औरतें थालीवाले हाथ को अपने बदन से दूर रखे बिना तेज़ी से नहीं चल सकतीं। आपका पोज़ भी कुछ वैसा बन जाता है। नज़रें नीची, ज़मीन पर कीचड़ होने के कारण, दर्द करते हाथ और धीमी चाल। आपका पूरा व्यक्तित्व एक प्रकार से सुस्त, निष्क्रिय और अर्थहीन लगने लगता है। तब आपके पास कोई चारा नहीं रह जाता कि आप छाते को किसी दूसरी तरह से उठाने लगें।
क्या कीजिएगा? एक तरीका यह है कि आप ग्रामीणों की तरह छाता लेकर चलें। यानी जैसे कन्धे लठ्ठ लेकर चलते हैं, वैसे। इसमें एक लाभ स्पष्ट है कि चाल तेज़ रहती है। पर मैं इस तरीके को अपना नहीं पाता। एक तो यही पूर्वाग्रह काम करता है कि यह ढंग गंवारू है। गांवों की खुली सड़कों पर छाता उठाने की यह शैली सुविधाजनक रहती है। भीड़ नहीं रहती और यह भय नहीं कि छाते की नोक किसी पीछे आनेवाले की आंख या नाक से टकराएगी। शहर की भीड़ में आप ऐसे कन्धे पर छाता रखे चलेंगे तो जल्दी ही किसीकी गालियां सुनेंगे। थोड़ा भी इधर-उधर घूमे कि किसी की गरदन पर पड़ी या सीने में चुभी किरिच-जैसी। शहर में सौदा खतीदने जो गांववाले आते हैं उन्हें इस ढंग से छाता उठाने के कारण अक्सर झिड़कियां खानी पड़ती हैं। कुछ तो मैने देखा है कि बन्द छाते को भी वैसे ही उठाए रहते हैं जैसे खुले छाते को। झण्डे की तरह लिए चले जा रहे हैं। कृष्णलीला के पुराने चित्रों में जैसे गोपिकाएँ छड़ी उठायी रहती थीं। किसी ने गड़बड़ किया तो दिया कसकर। इस तरह छाता उठाना सोद्देश्य लगता है। चेहरे पर तनाव-सा आ जाता है, खुद अपने से हम आतंकित होने लगते हैं। ताश के पत्तों में हुकुम का बादशाह या हुकुम का गुलाम या चिड़ी का बादशाह जिस तरह हाथ में शस्त्र लिए तने नज़र आते हैं उस तरह।
इसलिए जब छाता हाथ में होता है तो इच्छा होती है कि पानी बरस जाए तो ठीक। खोल लेंगे तो कोई असुविधा नहीं होगी। दाहिने हाथ में छाता है और बांए हाथ से कपड़े ऊपर चढ़ाए कीचड़ से बचते चले जा रहे हैं। मेरा पतली मोहरी का पैंट ऊपर चढ़ाने से नहीं चढ़ता। यह सुख तो पज़ामे कुरते में है। एक हाथ से दोनों के पांयचे ऊपर कर लो, दूसरे हाथ में छाता ले मज़े-मज़े से चले जाओ। " संवरिया सावन बीता जाये" गाते। यह भ्रम है कि छाता खोल लो तो बदन नहीं भीगता। जिस तरह से असूर्यम्पश्या लड़कियों पर भी राह-चलतों की नज़र पड़ ही जाती है उस तरह कुछ बूंदें तो बदन पर गिरती ही हैं। कमर के नीचे का भाग भीग जाता है। अच्छा है।
कई बार मैने सोचा कि सराफ़े के छोटे दलालों की तरह छाता बगल में दाब लिया जाए और घूमते रहें। दलाल इसमें बड़े चुस्त नज़र आते हैं जो उनके व्यवसाय के लिये आवश्यक है। मैं ऐसा करूं तो कस्बे के मिडिल स्कूल का पुराना मास्टर नज़र आऊँ। आदर्श, मध्यमवर्गीय , ईमानदार और एक ऐसी लड़की का बाप जिसके लिए लड़का नहीं मिल रहा हो या मिल गया तो दहेज़ नहीं जुट रहा हो। पुराने न्यू थियेटर्स या बाम्बे टाकीज़ की फिल्मों में जैसे टिपिकल बाप होते थे, पम्प शू, चौखाने का कोट, गोल टोपी और धोतीवाले। वे ज़ब बाहर जाते थे छाता बगल में रखते थे। कहीं भूलते नहीं थे। बगल में छाता दाबे शायद मैं वैसा ही लगूँ। महिलाएं और खासकर नौकरीपेशा महिलाएं अपना छाता बगल में दाबकर चलती हैं। एक तो इनके छाते छोटे-छोटे होते हैं। वज़न में हल्के और इनमें वह भालेनुमा नोंक नहीं होती जैसी मरदाने छातों में होती है। पता नहीं इसके मूल में छाता बनानेवालों का तर्क क्या है? यदि पुरुष अपना छाता बगल में दबाकर चले तो उनके पीछे आनेवाले को असुविधा होती है। वह भालेनुमा नोक चुभ सकती है। पर महिलाओं का पीछा करने में ऐसा कोई खतरा नहीं है। मरदों की किस्मत में लम्बे छाते लिखे हैं। छड़ी-जैसे लिए चलना पड़ता है।
जिन दिनों स्कूल जाते थे, छाता कन्धे पर लटका लेते थे। दोनों हाथ खाली रहते थे और बड़े मज़े से आवारागर्दी की जा सकती थी। कन्धे मोटे नहीं थे, छाता फिट आ जाता था। अब कन्धे पर छाता रख चार कदम चलना कठिन है। नहीं जमता। कन्धे पर सुग्गा बिठाकर चलनेवाले का ध्यान जिस तरह कन्धे पर ही लगा रहता है, वैसा हो जाता है।
कुछ समझ नहीं आता। चार-पांच दिनों से हाथ में छाता लेकर शहर में घूम रहा हूँ और हर तरह से कोशिश करके देख चुका, छाता लेकर चलना एक मुसीबत है। एक छोटी-सी साधारण वस्तु मेरे पूरे व्यक्तित्व को आकार देने लगती है। मैं अपने को सुस्त और व्यर्थ अनुभव करने लगता हूँ। चाहे हूं नहीं पर स्मार्ट लगना चाहता हूं। छाता लगने नहीं देता। अजीब देसी मध्यवर्गीय नजर आता हूँ। उम्र ज्यादा लगने लगती है---कुछ ढीला और निराश-सा आदमी मुसीबत में फंसा अपने को बचाता हुआ, सुरसा की तलाश में फूंक-फूंककर कदम रखकर चलनेवाला, अपने को बड़ा होशियार लगानेवाला। मूर्ख। कल मैने दिन भर यों किया कि बन्द छाते को बिल्कुल बीच से ऐसे पकड़ लिया जैसे पुलिसवाले डंडा पकड़ते हैं। मैंने सोचा कि इस तरह मैं इस छाते को अपने व्यक्तित्व का हिस्सा नहीं बनने दूंगा। वह मुझसे अलग लगेगा जैसे किसी दूसरे का छाता हो और मैं उसे लौटाने जा रहा हूं। पर एक तनाव-सा बना रहा। पुलिसवाले जैसे डंडे को पकड़ते हैं यदि उस तरह छाता पकड़ूंगा तो तनाव रहेगा। कुछ समझ नहीं आता । (छाते को नापसंद करने का यह अर्थ नहीं कि रेनकोट का भक्त हूँ। उसमें तो अजब ज़मादार नज़र आता हूँ या सी. आई. डी. का शक्की आदमी। उससे उबरकर ही मैं चार-पांच दिन से छाता लिए घूम रहा हूं।
आज सुबह से घर में हूं। निकलूंगा तो छाता हाथ में लेकर जाना होगा। अपने कमरे में छाता उठाने की विभिन्न शैलियों को जांच-परख चुका हूं और परेशान हूं। मुझे लगता है कि एक अच्छी-खासी उपयोगी चीज़ ( पुष्तकों में लिखा है कि छाता उपयोगी वस्तु है, यह वर्षा और गर्मी दोनों से बचाता है) मेरे लिए पुरानेपन का प्रतीक बन गयी है। मैं इसे साथ रख अपने को युवा अनुभव नहीं करता। मैं इससे अपने को अलग करना चाहता हूं। इस बरसात में यह संभव नहीं। इस छाते को हाथ में रखे तो किसी भी बरसात में संभव नहीं।
एक बड़ी-सी घटा आकाश के एक छोर से इधर बढ़ती आ रही है। आधा घण्टा बाद लगता है बरसेगी। मुझे बाहर जाना है। पर...।
(साभार, यत्र तत्र सर्वत्र)
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 चाँद परियाँ और तितली
बादल और बारिश
 नन्हे-नन्हे बादल जब पवन के कन्धों पर बैठकर घूमने निकले तो मारे खुशी के झूम रहे थे। घर के अन्दर बैठे-बैठे तो उन्होंने प्रकृति का ऐसा नज़ारा कभी नहीं देखा था। ज्यादा-से ज्यादा अगर समन्दर ने खिड़की खोल दी तो कुछ रंग-बिरंगी मझलियां जरूर देखने को मिल जाती थीं, वरना पानी लाना और नीले-पनीले फेनिल आंचल से खेलना, मात्र यही एक मनोरंजन था उनका और लहरें तो उन्हें इतनी प्रिय थीं कि उनके साथ खेले बगैर तो सो तक नहीं पाते थे वे।
आज पहली बार पवन के कन्धों पर बैठकर उन्हें बाहर की दुनिया की सैर का अवसर मिला था और वे बेहद खुश थे...इतने खुश कि मारे खुशी के आसमान पर जा बैठे थे... दिन के सूरज को ढक लिया था और रात के चंदा तारे सब अपनी झोली में छुपा लिए थे।
वाटिका, उपवन, ग्राम, शहर न जाने क्या-क्या दिखाई दे रहे थे उन्हें।
पर बादल तो बादल, जरा-सी पवन की आंख झपकी नहीं कि चुपचाप कन्धों से सरके और आगे-आगे दौड़ने लगे। जोश में एक दूसरे का हाथ तक छोड़ दिया और पापा पवन, मां पृथ्वी, यहां तक कि घर, सबसे ही दूर...बहुत दूर निकल गए। भूलगए कि रोज़-रोज़ धरती-मां उन्हे क्या सिखलाती थी---अकेले घर से दूर मत जाना, अजनबियों से बातें मत करना, वगैरह...वगैरह।
अब किसी बादल के आगे उंचे-उंचे पर्वत थे तो किसी की आँखों के नीचे गहरा नीला समन्दर। किसी के आगे फैला मरुथल का विस्तार था तो कोई सावन का अन्धा अभी भी हरी-भरी वादियों में ही विचर रहा था।
थोड़ी ही देर में जब पवन को पता चला कि सारे ही बादल पीछे कहीं छूट गए हैं, तो वह बहुत घबराया। लगा पागलों की तरह उन्हें ढूंढने। पास खड़े एक-एक पेड़ तक से पूछ डाला। नदियों से पूछा, सूरज की किरनों से पूछा ...सबसे पूछा--- तुमने कहीं मेरे बच्चों को तो नहीं देखा। पर सबका एक ही उत्तर था--- अभी-अभी तो यहीं खेल रहे थे।
बादलों को ढूंढता, तेजी से दैड़ता परेशान पवन बारबार उन्ही रास्तों पर गोल-गोल चक्कर लगाने लगा, पर बादल कहीं नहीं दिखे। नाम ले-लेकर कई-कई आवाजें भी दीं, परन्तु एक भी जबाव नहीं मिला, कहीं कोई अता-पता नहीं था उनका। खिसिया-खिसियाकर अब वह कभी उन्हें डांटता-फटकाराता तो कभी अपनी ही लापरवाही पर दुखी हो जाता। कहां ढूंढे, किससे पूछे, कुछ समझ में नहीं आ रहा था उसके। लोग परेशान थे--यह पवन को क्या हो गया आज, कैसी आंधी उठ खड़ी हुई है ... घबराकर सभीने अपने-अपने खिड़की, दरवाजे सब बन्द कर लिए।
उधर अकेले-अकेले घूमते जब बादल थक गए और अंधेरा हो गया तो उन्हें डर लगा और घर की याद आने लगी। परन्तु घर वापस जाने का रास्ता तो मालूम ही नहीं था उन्हें। लगे सब घबराकर जोर-जोर से रोने। इतना रोए कि आंसुओं ने टपटप टपटप पूरी पृथ्वी गीली कर दी। सूखे ताल-तलैया सब भर दिए और बहती नदियों में उफान आ गया। दरअसल रोते-रोते बेहाल हो गए वे। नतीजा यह कि जिधर देखो, उधर ही बाढ़ आ गई। जानते हो बच्चों, यह पृथ्वी पर पहली-पहली ऐसी बारिश थी जो कि आजतक सभी को याद है।
पर करुणामयी और समझदार पहाणियों से उनका दुख देखा न गया और थके हारे बादलों को गोदी में उठाकर उन्होंने खूब उन्हें बहलाया-फुसलाया...चुप कराया। कान्धे से लगा-लगागर थपकी दी और समझाया कि रोने की तो कोई बात ही नहीं, रोने से तो कुछ हासिल नहीं होता---यही नहीं नीचे बिखरी वादी में बसे उनके घर का रास्ता तक दिखला दिया उन्हें। तब पर्वतराज के कहने पर रेशे-रेशे बिखरे और बेहाल रोते उन बादलों को कुछ समझदार किरनों ने गोदी में उठाया, कुछ जो थोड़े बड़े थे उनकी भी उंगली पकडकर, सबको घर तक छोड़ गईं वे।
तो इस तरह से जैसे तैसे वे थके, भूखे-प्यासे बादल वापस अपने घरतक वापस पहुंच पाए। उस दिन तो उनके पास कोई लन्च बौक्स भी नही था, जो रोज़ पानी लाते समय वे अपने साथ ले जाया करते थे। उसके बाद से तो बादल जब भी पवन के साथ घूमने जाते हैं, न उंगली छोड़ते हैं और ना ही अपनी धरती मां को ही आंखों से दूर होने देते हैं। बच्चों अब तुम पूछोगे कि फिर यह बारिश अब भी कैसे और क्यों होती रहती है, तो यह कोई रोने की थोड़े ही है, यह तो खुशी की बरसात है। गौर से देखेगो तो आज भी आकाश में बादल तुम्हें खेलते और खिल-खिलाकर हंसते और दौड़ते-भागते दिख जाएंगे। पवन के कन्धे पर बैठ कर सैर करती उनकी किलकारियों की आवाज भी साफ-साफ सुनाई देगी। कभी-कभी ज्यादा खुश होने पर भी तो आंसू निकल आते हैं और यही वह बारिश है जिसका हम सभी को इन्तजार रहता हैं; इस सुख-वर्षा के गिरते ही चारो तरफ तरह-तरह के नए-नए फल-फूल उग आते हैं, फसलें लहलहा जाती हैं और हरियाली-ही-हरियाली छा जाती है। हां--शायद कभी-कभी एकाध भूला-भटका, अकेला दौड़ता बादल आजभी तुम्हे परेशान और थका दिख ही जाए, पर यह भी अन्य सभी नटखट और शैतान बच्चों की तरह जल्दी-ही समझ जाएगा...सबक सीख लेगा!
वर्षा
कुछ बाल कविताएं
(1)
हवा ने मारी सीटी
बादल ने लगाई छलांग
बरखा रानी छमछम नाचें
परियों की शादी में आज।
(2)
रिमझिम बूंदे उझलें कूदें
आंगन हिलमिल लंगड़ी खेलें
हाथ बढाऊं तो फिसली जाएं
बादल ने कैसे मोती बिखराए।
(3)
काले बादल में भूत छुपा
गोरी बिजुरी हाथ तलवार
रुके कैसे ये युद्ध घमासान
मेंढक राजा करें विचार।
(4)
छतरी रानी तनी खड़ीं
बरखा से हैं खूब लड़ीं
रोज रोज तू सताती है
गरज बरस भिगो जाती है
अबकी बारिश जब लाएगी
डरा नहीं तू पाएगी।
-शैल अग्रवाल
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ज्ञान-भारती

वैदिक-संस्कृतिः
-आचार्य डा. उमेश यादव
वैदिक वाड़्मय का बहुत ही गरिमामय शब्द है संस्कृति। यजुर्वेद में आया है " सा संस्कृति प्रथमा विश्ववारा " वह संस्कृति ही पहली है जिसने विश्व को धारण कर ऱखा है। वह यही वेद की संस्कृति है। पहले हमें संस्कृति शब्द को जानना होगा। संस्कृति शब्द को तोड़ें तो सम + कृति बनता है। सम उपसर्ग हमें अच्छाई की ओर ले जाता है और कृति कर्म की ओर। कृ-करणे धातु से निर्मित यह शब्द कृति हमें सदैव कर्म की ओर ही प्रेरित करता है। जो सुन्दर व श्रेष्ठ कर्म है वही संस्कृति है। प्रभावशील और प्रेरित करने वाला, अच्छाई की तरफ ले जाने वाला कर्म कृति तक सीमित नहीं होता, बल्कि सुन्दर व श्रेष्ठ कृति, अनुकरणीय कृति ही आगे चलकर संस्कृति बन जाती है। वेद विश्व का प्रथम ज्ञान है , प्राचीनतम ज्ञान पुष्तक के रूप में विश्व के सभी विद्वान इसे स्वीकारते हैं। सार्वभौमिक व पूर्णतया मानव मूल्यों को जन्म देने वाला यह वैदिक ज्ञान वैज्ञानिक और मौलिक है और मानव संस्कृति का मूल है व सभी संस्कृति का परिचायक है। मानवीय उत्तम गुण, कर्म , स्वभाव को जो ज्ञान एक उचित दिशा दे वही तो मानवोचित मूल्य है। वेदों का उपदेश श्रेष्ठता पूर्ण कृति संपादक है अतः वह एक श्रेष्ठतम संस्कृति को जन्म देता है। उदाहरण के तौरपर एक वेदमंत्र हम लेते हैं।
" ओइम विश्वानि देव् सवितर्दुरितानि परासुव । यद् भद्रं तन्नासुव।"
यहां कहा गया है कि हे सवितः देव अर्थात सर्व उत्पादक एवं सर्व सुखों के दाता परमेश्वर! हमारे सारे दुर्गुण दूर कर दें। और जो उत्तम गुण ,कर्म , स्वभाव और पदार्थ हैं, उन्हें हमें प्राप्त कराइये।
इस मंत्र में सविता देव की उपासना हो रही है। सविता का सामान्य अर्थ उत्पन्न करने वाला होता है। सर्वेषां देवानाम् प्रसदिता इति सविता। सभी देवताओं को जो पैदा करता है वही सविता है। भौतिक अर्थ में सविता सूर्य को भी कहते हैं। मनुष्य के जीवन में सूर्य भी अपने तेज से अनेक उत्तमताओं को पैदा करता है। अपने जीवन में सूर्य के प्रकाश का महत्व हम जब विश्लेषित कर सकने में सक्षम होंगे तब सविता के महत्व को जान सकेंगे।
देव शब्द का मतलब देने वाला होता है। निरक्ताचार्य यास्क कहते हैं-देव कस्मात्--देव किस कारण से?
उत्तर हैः देवो दानाद् धूपनाद् द्योतनाद् द्विस्थानो वा भवतीतिक। अर्थात देव देने से, प्रकाश करने से, मार्ग दर्शन से अथवा द्विस्थली होने से। यहां माता, पिता, आचार्य, मित्र, बन्धु इत्यादि सब देव हैं क्योंकि ये हमें कुछ देते हैं। राह दिखाते हैं। सूर्य , चन्द्र, तारे आदि भी देव हैं क्योंकि प्रकाशकीय पदार्थ हैं; द्यौलोक के पदार्थ हैं।
इस प्रकार उक्त मंत्र से मनुष्य सद्गुण धारण करता है। दुर्गुण छोड़ता है तथा सर्व सुख दायक परमेश्वर से जुड़ता है। यह एक विश्वास है कि जब सर्व सत्रा (सबके आधार) प्रभु सत्रा सविता देव को अपने अन्दर धारे, तब मन शुद्ध और पवित्र होने लगता है और उत्तम संकल्पों का आना प्रारंभ हो जाता है, जिससे हमारा जीवन केवल शुद्धता को ग्रहण करता है और अशुद्धता से प्रथक होने लगता है। यही मानवीय संस्कृति है जो सदैव शुद्धता की ओर अग्रसर करती है। अन्दर बाहर सब तरफ से। जैसे साबुन और जल मिलकर गन्दे वस्त्रों से मैल बाहर निकालते हैं, यह संस्कृति भी गन्दे व्यवहार व गन्दी आदतों से अलग करके शुद्धाचरणों से जोड़ती है।
मानव जीवन की सुखद सफलता के लिए शुद्धाचरण की ही आवश्यकता है। कर्मठता के साथ शुद्धाचरण मिल जाए तो ये दोनों साबुन और जल का काम करते हैं। निःसंदेह सविता देव प्रेरक बनकर हमारे जीवन को सदा जीवन्त अर्थात सार्थक बनाते हैं और हर बुराई से प्रथक करते हैं।
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:Shail Agrawal.
How often we all have yearned- what...if...! But what is this 'what' and 'if ‘? A need of the hour or a desire to break free from the boundaries or myths of any given society or circumstance... even the demon of one's own dreams! This need is always so personal and circumstantial that it is difficult to define it in a universal frame or formula; in a parched and dry land rain-cloud is a welcoming sight, while in a deluge a dreaded one!
Like an individual life path, Society has always visualized music or art in a certain frame and order, yet always rebels of new generation have toyed with various and different ideas! Mad or modern , sometimes even a puritan or genius...call them what ever one may like ---but these are the one, who again and again, have broken all the rules and boundaries...and funnily enough these are the one, who while causing quite a few ripples, have often bumped into new horizons...found new ideas...given a new vision or hope to the dull and dying culture.
But what makes one object a piece of sculpture another coffee table or an ordinary stand! (A scull embedded with many million pounds worth of solitaire diamonds and titled ' for the fear of God' was recently recognized as unique piece of art and drew the attention of the whole world's art lovers and critics. No body dared to call it madness or grotesque and it fetched an exuberant price in a prestigious art sale and was labeled as the most expensive art piece ever!)

Most Expensive
( here is a clip from the article at its first appearance)
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Here's a flagship show by our best and most renowned maker of phenomenal objects, Damien Hirst. With all the skills of a superlative, luxury goods craftsman, and a fanatical vision, Hirst's work combines idolatry and high religious orthodoxy - Mexico's 'Day of the Dead'---The exhibition features a life-sized cast of a human skull in platinum, with a multitude of diamonds set in it. This fabulously expensive piece of artistic merchandise may even be, as the press release says, 'without precedent in the history of art', although the truly rich may deem it puzzlingly incomplete without the rest of its skeleton. |
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| So then, can we say confidently that beauty lies in the eyes of beholder...a doubtful statement perhaps... yet somehow deep inside, all of us will agree with this statement and want to say ‘yes’ to it sometimes! Then, may I ask again what is this art...is this inner dilemma... restlessness of soul...body and mind...an urge to express in a unique fashion!
Same goes for literature...Take poetry for instance...one may marvel at technique or revel in the meaning. Some suggest ( similar to the devotees of every thing classical please!) that true poetry must rhyme because it has musicality; it is not the meaning of what is written but the sound which is equally or more important and this is the one of the reason why poetry can not be translated! While others may suggest that it should capture in a concise way the essence of something---of an experience or an observation, or even a flow of pressing or urgent thought. While for somebody else it may just be a technique to shock and surprise. Can we ever find a true definition then, which encompasses all and suits everybody? Perhaps not! Poetry is as diverse, as people: apart from like or loath it, one can write it, Read it or even perform it!
Can it be taught in a classroom ...disciplined into words and rhythm...propelled to zenith or new heights? Is a genius born only?
These questions will always remain unanswered. Like any other craft one can only be equipped with the tools and taught how to use them, what one does with it; will entirely depend on the individual vision and skill ... piece of art or end result will still depend on the user's innate ability.
Like its own diverse nature Art will always be different. Best is not to judge; leave an individual to his or her own creativity: imagination or expectations!
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Favourites Forever
Two Poems : by Amrita Pritam
Daily Wages

In a corner of blue sky
The mill of blue sky whistles,
A white thick smoke
Pours from the moon chimney.
In dreams many furnaces
Labourer love
Is stroling all the fires
I earn our meeting
Holding you for a while,
My day's wages.
I buy my soul's food
Cook and eat it
And set the empty pot in the corner.
I warm my hand at the dying fire
And lying down to rest
Give God thanks.
The mill of night whistles
And from the moon-chimney
Smoke rises, sign of hope.
I eat what I earn,
Not yestrday's left overs,
And leave no grains for tomorrow.
Translated from punjaby by Charles Brasch
with Amrita Pritam
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I will meet you again

I will meet you yet again How and where I know not Perhaps I will become a figment of your imagination and maybe spreading myself in a mysterious line on your canvas I will keep gazing at you.
Perhaps I will become a ray of sunshine to be embraced by your colours I will paint myself on your canvas I know not how and where — but I will meet you for sure.
Maybe I will turn into a spring and rub foaming drops of water on your body and rest my coolness on your burning chest I know nothing but that this life will walk along with me.
When the body perishes all perishes but the threads of memory are woven of enduring atoms I will pick these particles weave the threads and I will meet you yet again.
Translated from punjabi by
Nirupama Dutta.
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Here and Now
Introducing Birmingham poet
:Paritosh Sharma
Desert Rain

The scorching heat of the Sun I could not stand,
No human, animal or plant to be found on this barren land,
I being the only one in the desert,
No force to save myself, having lost my alert,
Sweaty, burnt, thirsty I suffered,
I awaited relief from this condition which couldn’t be tougher,
I was not expectant of what was to happen,
All my bitter feelings this would dampen,
It started with the sky’s darkening,
Then the roar of the thunder like a storm awakening,
Water drops began to fall from the sky,
Though small in the beginning was this heaven’s cry,
I was joyed so much when they cooled my body and face,
They grew and grew in intensity till my position I couldn’t trace,
I was in the rain lost once again,
This time though I did not go insane,
Finally I could relish the rain,
It drew away all my sorrow, my suffering and my pain.
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The Garden

As green as ever,
Is my garden beyond,
Nourished by the rain, the air,
Nourished by me,
It is the abode of all life,
That is found around my house,
It is the abode of the plants,
Of the insects,
Of the mammals,
They find it to be their natural home,
Their master though, as one may say,
Prefers his own house,
Built by his own kind,
Artificial though it may be called,
To stay in comfortably, cosily and with ease,
As well as go out whenever he may please,
To the garden.
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An Introduction to a classic

Meghdoot : by Kalidas
A towering signature in sanskrit literature Kalidas wrote Meghdoot when sanskrit was a living language.Some may consider the collection of poems laced with eroticism. Nonetheless, these poems are very descriptive and at the same time very expressive in the sense that the poems pour out human emotions. For example, many a complementary forces or principles that encompass all aspects or phenomena of life are present in these verses .
In this masterpiece collection of poems by this legendery poet of North India , Newly wed Yaksha is exiled by his elders, for not paying enough attention to his duties and wrapped only in the arms of her beloved. Lovelorn Yaksha found a place to live in a hermitage in Ramgiri Parvat. There was a lake next to the hermitage. According to legend, Sita also bathed in this lake making its water holy. At the advent of monsoon season, Yaksha saw towering dark clouds, coming from the south and moving northwardly towards Alaka where his beloved lives, making him yearn more for his beloved and seperation more intense and unbearable. Lonely Yaksha wanted to send a sandesh or kushalkshem (news) to the beloved through these magnificent and powerful rain clouds, which roam everywhere sprinkling cool soothing rain on all .
Yaksha approaches the cloud with reverence, greets him with affectionate words and then tells the cloud how to get to Alaka from Ramgiri. He also tells the cloud what to say when he meets her beloved thus Megh(cloud) becomes his messenger . The entire 118 verses describe in vivid detail the landscape, lore of the land , love ballad, longing and other human qualities of a desolate life Yaksha was leading. In the last line of Meghdoot, Yaksha warns the cloud not to seperate from lightening in his long journey that lies ahead of him because he knows the pain of seperation from one's beloved. Every one needs a lover even the thunder producing cumulus cloud has 'Lightening ' as its consort , just as Shiva has Parvati.
There are many translations available of these verses. These four verses illustrated below (verses 5 to 8.) are in a way a beautiful prelude to the classical masterpiece; to grasp and understand that etherial essence of these verses, one has to read the entire book. Translation here (from the original in sanskrit) is done by well known bengali writter Nivedita Das sen;
Yaksha muses: what is a cloud, after all,
But a chemistry of smoke air and water.
But what are my messages, after all, to be
Silenced by the inanity of sending them by cloud?
I am a passionate lover eager to reach my beloved
There is no difference between reality and fantasy
To a man who Yearns to see her.
O Cloud your lineage is noble
Yet you assume a myrad of forms.
I, so far away from my beloved ,beseech you.
Anger will not strike me if you refuse,
For it is better to be rejected by a noble soul
Than pampered by a mongarel!
O cloud, cool refuge of overheated men.
Will you take my news to her from whom
My master, King Kubera, caused seperation
And utter woe? Visit the city of Yaksha's lord,
Descend on the garden by moon light,
Surreally illuminated like Shiva's crown.
Loving consorts toss their locks
To glimpse you as you fly by,
Hoping their sweethearts would soon return home.
A man not indentured to service who, unlike me,
Need not work for his living---
Can he ever neglect his spouse as I do now?
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story-here & now
Old Slippers

By:Shail Agrawal.
He could see her, as always; standing at the same spot near the window in the kitchen. A glass full of water hung between her lips and hand, as if it has lost the way to her mouth. Omu felt like that himself, lost and confused, his casualty bag and stethoscope still clinging to his tired hands after a constantly busy night at the hospital. That window, facing the back garden frames his mother now almost twenty hours a day every month of every single year. She was standing there at that same spot, her shoulders very tense, a tired nerve in her neck twitching frantically. Yes, she was upset ..It must be his wife, leaving the kitchen work top untidy or sink full of empties.
Silently Omu tiptoed, " Mum, these azaleas are coming up nicely..." Before he could finish his sentence, to his utter horror, he noticed how sad and miserable she was, just like those tired drooped flowers , just a shadow of their last evening's glorious display. Those kittens have chewed them all. The pink and white cascading flowers, lush green leaves, everything was gone and the flower bed, an ugly and dirty sight with a freshly done job by cats. That fence of the garden on the right side, wasn't done, will never be done, for god knows last how many years. It was a stale mate between these two neighbors. And Mum's garden, a convenient , accessible play-ground for their bombarding footballs, their unruly cats and kittens and their foul irrigating litter. Or may be it was undone because it was simply planned that way.
Their neighbors were keen cat lovers. Four, five cats scraping in the house alongside with a rowdy robust teenager was their normal house hold. After all it is an animal loving nation and who could stop? Mum has put up with it all for a good long time, twenty years at least. Advancing age has made her a little bit more agitated now, lets say, less tolerant. Omu remembered when she was young, nothing used to upset her. Once fed up by these boisterous neighbors he complained, "Why life cant run smoothly and peacefully Mum ? Why out of all these people in the world, we have to get these insensitive neighbors?"
She smiled and replied, " So our days don't turn flat and boring my dear boy."
That was mum, twenty years ago, taking every challenge in her stride. Fighting all alone in this big bad world with only a seven year old son by her side and enjoying every moment of it, defending each and every little bit of her own corner. But today she just turned around and said wearily, "You know Omu , I'm going to take a shot-gun soon and shoot these nasty kittens. If I can't find a gun, I will strangle them with my bare hands. They are playing on my frayed nerves." Omu noticed how her voice was still very soft and hands very delicate. It was just that steely determination in her greying eyes which had scared Dr Amiya Choudhary. " You shouldn't get upset on such small matters Mum. Just tell me what is bothering you and what you want?"
Amiya felt a little helpless and inadequate. Mum always knew what he wanted." Don't worry, Mum ! Straight away I will ask Peter to put this fence up." "No", Mum's voice was stern , "It is there job .It is their side of the fence. why should we incur this expense!" Omu exactly knew what she wanted. It was a declaration of war. The battle was on. Since when she has started counting these pennies?
She was brought up like a princess, lived like a princess. Only her loved ones took care of those financial side of the things. Money was never an end in her life. Only a means to make life more comfortable and enjoyable for her and everyone around her. Even rainy days could not have disturbed her calm because she always covered herself and everything she cared for, with a sturdy and thick umbrella of love. But things are different with Tara, she is a practical women. "We need somebody strong and sensible like her in our family". After Omu's repeated resistance, one day Mum just declared; "Only Tara is going to be my daughter in law."
Omu surrendered, what else could he do, can not upset his Mum. Anyway it was Mum only, who took all the decisions for him. Knew exactly what is best for him, what he wanted or liked, -down from his necktie to food, music or even his friends and he was happy with his life. He even forgot about Kate who was exactly like his Mum and him in nature. Gentle, loving and always caring. Both he and Mum got along fine with her, just like a house on fire, infact even better then that. Then why did Omu let her go? Is it that bliss is always too hot to handle?
It is nearly two years now since he has married Tara. Omu remembers the dismal fact clearly. Like two wild cats it didn't take the two women very long to be on each others nerves. Omu kept himself painfully out and apart. Though it often wrenched his heart to see his mum sad and he often withdrew himself into his own shell. Infact both of them have understood it and accepted their plight. They all were living together under a dark shadow of anticipation with their eyes closed... praying and still believing , one day ... one day hopefully every thing will be all right. Every person in the family will exactly know what the other wants, exactly how it used to be in his childhood !
To be precise both Omu and Mum were living on a hope that one day Tara will understand. But a relationship grew between them exactly like that of their next door neighbors- dangling between dismay and hope of a better and elusive tomorrow. Omu knew right from the beginning that this relationship was different, a little bit more complicated, too close for comfort and he was saddened by the looming dark clouds on his horizon. After all he was a cautious chap, always ready for every eventuality, always avoiding risks. His thirty years of existence had been a happy, loving and peaceful one .
"Mum and dad are coming from Tanzania, they will stay with us for a month", thumping that flat cushion Tara declared rather in an aggressive and decisive tone.
"Why are you so upset then ? Its good news, isn't it ? " Omu teased her lovingly .
"No, not really. How can they live in such a crowded house ?" her voice was shivering cold.
"Crowded ?" Omu couldn't understand, we are only three in this six roomed house. " We can manage." Omu cleared his throat and tried to clarify the situation, remembering that though there were six rooms in the house, there were only two bedrooms.
" Their luggage can be put in our room and the sleeping arrangements can be done on sofa-bed in the sitting room."
"No", Tara announced in a hurried tone, " they are coming only for a month . Your mum has to go!"
" Where?" Omu almost lost control of his voice.
"In a home or hostel."
"What?", gasping for air Omu grabbed the arm-chair.
Looking at his tense face ,"You know what I mean." ,she replied sheepishly. "We will call her back on Christmas. By then, Mum and Dad will go back. Haven't I got even this much right in this house? " she stamped her foot in authority.
Omu was too numb to reply. Words were just slipping than shattering. Only one thought was persistently hammering his tired un-slept, overworked head, how someone can talk like that about mum, that also in her own house? It is his Mum's house, has always been Mum's house, even Dad knew that. They all knew that. He left for work that morning puzzled and sad, without breakfast and with untied shoe laces . Things were dull and grey again, a storm was looming and Omu was frightened like his own pensive heart... Somehow he always knew that this will happen one day. Mum' s room was empty... a sad, big, helpless space and Tara was re-arranging it. There were fresh flowers and a welcome home card on the bed side table, where Mum kept their old childhood photographs. He silently slumped on Mums favorite easy chair.
Tara was talking fast as if she wanted every thing done and over with, sooner rather then later.
"Oh! she is a little angel. Didn't say ' no', not even once, to anything . Didn't even pack anything, just said, 'Everything, I will need, will be there.' Any way Grange-Hill Nursing Home is such a lovely place. She will get used to it. Lot of people of her age are there. I am sure she will have a lot of company, she will have a lovely brake, away from us all." Wiping the sweat from her forehead, Tara spoke fast and in one breath and then bent over him to open the window to clear the damp and frosty air of the room.
Mum 's old slippers wrapped in polythene were ready for a redundant broom cupboard. Clutching them close to his chest, Omu shot out like a person possessed or touched by an electric volt. He didn't know how he managed to drive upto that nursing home with those blurry eyes and steamy windows . On every turn of every corner, only one thought was persistent in his head, 'Mum must be very uncomfortable without her slippers.' She can never walk bare-foot. And she certainly cannot wear those pointed pencil heels twenty four hours.
It was ten o'clock in the night when he reached there. Those big sad unfriendly doors were locked. Visiting time was over. Frantic Omu was buzzing the doorbell again and again. No light, no movement, as if everything was dead ins... no, just sleeping inside. Omu couldn't even finish that dreaded thought. After-all his mum was also inside. Omu knew she could never sleep early. He remembered how she always read for hours and hours before she could fall asleep. Tomorrow he will definitely bring some good books for her and some latest music-releases too. They will listen together. Let Tara's parents stay there in that house.
Suddenly Omu felt his house wasn't a friendly place anymore. He buzzed the doorbell again. At last a head popped out of that locked front, "Please come in the morning. We open around seven, until unless its an emergency."
"Yes, Its an emergency." Omu was almost distraught with pain. "You see my mum can't sleep anywhere else except in her own bed and I have come to take her back ." "Oh, are you talking about the old woman who came this morning ? Yes she couldn't settle nicely at first. The problem was she wouldn't say or ask for anything, like all the other old people. She is very quiet and gentle, almost withdrawn within herself. Won't ask for anything. But don't worry we have managed quite a few old bags like her." He laughed like a villain with his old yellow broken teeth. "We have given her some sleeping pills for tonight. Bless her little soul, she is sleeping peacefully now."
"You mean you doped her" Omu couldn't hear anymore . His eyes were open wide in disbelief.
Let anyone come and go, even Tara can go if she wants to or if she can't handle this. One thing was finally decided now and forever... Mum will stay in her room in her own house, where she belonged, where both of them belonged. There were still ten more hours to the morning. Dragging his feet, he managed to reach the car and with a heavy heart and thumping head slumped on that cold indifferent back seat, still clutching those slippers to his chest. He didn't know what to do or even think now. Omu was tired and his mind totally blank . This fear and guilt was so new to him, he has never waited for his own mum before, not so long anyway.
Omu wanted to cry, only if he knew that to be a grown up will be so painful, so villainous ? An obstinate sob gushed up his throat and got stuck there... totally choking him.. He knew if he won't cry now he will die, here in the back seat of his own car. And he didn't want to die, not till he had seen his mother comfortable throughout her life... he should not cry loud, after all he was thirty years old and a grown up man. And that night Dr Amiya Choudhary cried to his hearts content, undisturbed, uncomforted and uncared, like an abandoned, punished five year old.
A gentle tap on the car window woke him from his solitude. It was morning at last.
"Omu, when will you learn to look after yourself?"
Yes, it was his Mum all right. Same affectionate eyes, same loving smile, same old familiar house-coat but those pointed heel shoes underneath looked very uncomfortable, ugly and villainous. He sprang out of the car and hugged her with a painful urgency. After making Mum comfortable on the passenger seat, Omu started to take those hideous shoes off from her feet.
"Remember Mum, life should always be very comfortable and familiar like these old slippers. Nobody should be allowed to change this simple fact. How did you forget this mum, how many times you yourself have told me this?" His tears were flowing unashamedly. He didn't even wipe them... gently and soothingly soaking him, running all over his face now, his shirt, everywhere, quenching the fire which burnt inside him for the whole of the last night. Suddenly a few tiny tears slipped silently somehow straight to his heart burning a big hole and straightaway Omu recognized them .They were softer, smaller, gentler yet very painful, very disturbing tears. The warmth of these tears told him they were not his. Almost sobbing, he whispered,
"No mum don't cry, I am here now !"
Silently she looked at him. Her legs were not hurting anymore. Her old slippers were there with her now, in her own feet. They were comfortable and very reliable like her own son. At last she can rest now. She just looked at him again and smiled. Words never came too easily to her and anyway there was no need for them anymore.

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