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सोच और संस्कारों की साँझी धरोहर
लेखनी-अँक-6-अगस्त 2007
Indians rediscovering themselves !
Quote of the month
" अंग्रेजी का माध्यम भारतीयों की शिक्षा में सबसे बड़ा कठिन विघ्न है।...सभ्य संसार के किसी भी जन समुदाय की शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं है। "
-महामना मदनमोहन मालवीय-
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संरचना व संपादन: शैल अग्रवाल.
संपर्क -सूत्र- editor@lekhni.net , shailagrawal@hotmail.com
पत्रिका प्रति माह की पहली तारीख को परिवर्तित की जाती है।
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राष्ट्र-संघ में हिन्दी
सकल्प या सरोकार !
13 से 15 जुलाई तक न्यूयौर्क मे विश्व हिन्दी सम्मेलन हुआ और पूरा न्यूयौर्क ही हिन्दीमय हो गया। हर हिन्दी प्रेमी की आखे न्यूयौर्क पर थी और मनचाहे निष्कर्ष के लिए ललायित थीं। पर एकबार फिर सैकड़ो परचे और घंटो की प्रदर्शनियों और चर्चों के बाद मात्र एक घोषणापत्र के साथ विद्वत् समाज विदा हुआ...हिन्दी की दशा या दुर्दशा नही, अगली साल की जगह और तारीख के बारे में सोचते हुए...निष्कर्ष रूप पारित घोषणा-पत्र में से कुछ योजनाओं ने ध्यान जरूर आकर्षित किया ...योजनाएं जो जाने कबसे शुरु हो जानी चाहिए थीं:
-सम्मेलन प्रधानमंत्री जी के इन उद्गारों का भी स्वागत करता है कि बाहर बसे अनिवासी भारतीय लेखकों का हिंदी साहित्य भी पाठ्यक्रम में लिया जाए और दुनिया के अन्य देशों में हिंदी पढ़ाए जाने के लिए मानक पुस्तकें बनाई जाएं। सम्मेलन प्रधानमंत्री जी के द्वारा हिंदी को इंटरनेट की ताकतवर भाषा बनाने के लिए अच्छे हिंदी सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर और खोज इंजन बनाने की व्यवस्था ...।
और मुख्यतः
7. केंद्रीय हिंदी संस्थान भी विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार व पाठ्यक्रमों के निर्माण में अपना सक्रिय सहयोग दे। "
इन प्रस्तावों को अगर वाकई में कार्यान्वित किया गया और इनपर ठीक से ध्यान दिया गया तो हिन्दी और प्रवासियों के हित में विदेशों में लिया गया यह एक सफल और ठोस कदम होगा। आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन का संपूर्ण घोषणा-पत्र विश्व हिन्दी सम्मेलन की औफिशियल वेव-साइट पर पढ़ा जा सकता है।
तो पहले दूसरे और तीसरे की तरह यह आठवां सम्मेलन भी समाप्त हो ही गया, यादों की स्मारिका में एक नया पन्ना जोड़कर विद्वत व उत्साही जनसमुदाय ने एकबार फिर एक दूसरे से विदा ली...परन्तु एक प्रश्न तो फिर भी सबकी ही आंखों के आगे सांप-सा कुंडली मारे ही बैठा रह गया 'अब आगे और क्या '...बारबार पूछने को मन करता है उनसे जिन्होंने आठों सम्मेलनों में भाग लिय़ा -कितनी प्रगति हुई, कितने सार्थक दिखते हैं ये प्रयास ? प्रश्नों के उत्तर तो शायद आज भी भविष्य की गोद में ही सोए पड़े हैं परन्तु मानस पटल पर हिन्दी का वह पर्व जरूर ही अपनी खट्टी मीठी यादें संजोए जा बैठा है और शायद भुलाए भी न भूलें हिन्दी के वे अद्बुत तीन दिन !
एक कोलाज था चारो तरफ...घटनाओं का...समस्याओं का ...लोगों का। कही आखें ही आखें थीं, सब देखती, समझती, तो कहीं बस कान थे, लगातार सुनते, मनमानी गढ़ते और सबको घेरे हुए था एक विशाल उत्साही जन समुदाय ... भीड़ के रेले के साथ-साथ पल-पल ही संचालित और यंत्रवत् दौड़ता-भागता, अजस्र वाग्धारा की उर्जा पर, अदम्य जिज्ञासा पर, कुछ नए, कुछ पुराने मित्रों के संग मिल-बैठने की बेइन्तहां ललक पर... दो पैरों के अथक वाहन ... और सद्भावना के संकल्प पर।
मात्र तीन दिन के छोटे-से समय में कई-कई बड़ी-बड़ी समस्याओं के हल ढूंढने थे ...हिन्दी का भविष्य, भारत का भविष्य और साथ-साथ प्रवासियों से लेकर भारतवासियों तक के लिए, कई महत्वाकांक्षी और सार्थक योजनाएं ...विश्व-भारती का कुटुम्ब सम्मेलन था वह।
सार्थक और निरर्थक शब्दों के ठहाकों और तरह-तरह की हिन्दी के प्रति चिन्ताओ के कोलाहल में डूबा, हिन्दी के उत्थान के लिए उत्साहित व परेशान, इधर से उधर दौड़ता-भागता वह हिन्दी-प्रेमी समुदाय वास्तव में पूर्णतः निमग्न लगा। संक्षेप मे लिखूं तो बिल्कुल कुंभ के मेले-सा ही वातावरण था, जहां विद्वान और साधू, सिद्धहस्त योगी व आत्मविभोर श्रद्धालु और छद्मवेशी सभी आ पहुचे थे हिन्दी की वैतरणी में डुबकी लगाने।
तीन दिन के लिए न्यूयौर्क की वह सेवेन्थ एवेन्यू हिन्दी का राजमार्ग बन चुकी थी, जिसपर चौबीसो घटे हिन्दी की ही सवारी चल रही थी। आते-जाते टैक्सी-ड्राइवर, इस अद्भुत और रंग-बिरंगी भारतीय छटा से अभिभूत थे। पूछ रहे थे, " कैसा और क्या महोत्सव चल रहा है यहांपर...क्यों इतने सारे भारतीय जमा हैं ...क्या कोई भारतीय फैशन शो है (सारे कार्यक्रम फैशन इन्स्टीट्यूट मे ही तो थे, इसलिए उनका ऐसा सोचना भी तो सहज और व्यवहारिक ही था और फिर वह भारतीय महिलाओ के रंग-बिरंगे परिधानों की अभूतपूर्व छटा...उससे भला कोई कैसे बच पाता)?"
ऐसा नही कि बस बदहवासी और उन्माद के पंखो पर ही जिए जा रहे थे हम। बहुत कुछ ऐसा हो रहा था पलपल, जो सार्थक भी था और इतिहास भी रच रहा था। पहले ही दिन की सुबह जब यू.एन.ओ में हिन्दी गूंजी, तो मानो हर भारतीय और हिन्दी प्रेमी का दिवा-स्वप्न जी उठा और दिन भर की चहल-पहल और गंभीर चर्चे व पर्चों के बाद, हर शाम एक अलग तरह का ही ललित और जोशीला रंग लेकर आई।
कवि सम्मेलन में जब बहु-चर्चित हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा ने अपने तीखे व्यंग्यों को प्रस्तुत किया तो उपस्थित श्रोताओं का हंसते-हंसते बुरा हाल था ( उनका वह आयकर के साथ कवि सम्मेलन में मिले हजारों जूतों पर भी इनकम टैक्स देने वाली लाइन जहां सटीक थीं वहीं इनकम टैक्स वालों का जबाब कि नहीं आप ही रखो हमारी तरफ से तो एक लाख तक की छूट है वाकई में नहले पर दहला था)। यही नहीं, तीनों दिन गंभीर विचार विमर्श के साथ-साथ कितने रोचक और यादगार भी होंगे, इसका भी भरपूर आभास मिल गया हमे उस पहली ही शाम से।
विवेकी और सरस श्री अशोक चक्रधर जी के संचालन में संचालित और उनके प्यार भरे लवस्कार के साथ कवि सम्मेलन कविता-सा ही बहता रहा तीन घंटे तक। एक-के-बाद-एक कई भावभीने और गरिमामय काव्यपाठ हुए। कविताओं के नए-नए रंग आए और भावनाओं का एक बहुरंगी इन्द्रधनुष। परन्तु समय इतना कम लगा और काव्य पिपासा इतनी जगी कि बाद में छोटे-छोटे और भी निजी सम्मेलन हो ही गए और गई रात तक चले भी।
दूसरी शाम थी भारत की सुरीली ललित कलाओं की धरोहर के नाम, जब विलायत खां के साहबजादे शुजाद अली और उनके सुपुत्र ने सभागार का मन जीतने के लिए अपने सहयोगियों की संगत में सितार और गिटार उठाए और पूरे ही परिसर को मंत्रमुग्ध कर दिया। फिर नृत्यांगना पद्मश्री गीता चंद्रन का अपने ग्रूप के साथ मनोहारी नृत्य...मन घंटों सुनने और देखने के बाद भी और-और ही मांगता रह गया। तीसरी शाम आयी गजल सम्राट पंकज उधास को लेकर, जिनकी मखमली आवाज को किसी भी परिचय की दरकार नहीं, परन्तु व्यक्तिगत मजबूरियों की वजह से जिसे सुने बिना ही इंगलैंड वापस लौटना पड़ा मुझे। परन्तु यदि अनुभव के आधार पर लिखूं, तो जो थे, या जिन्होंने उन्हें सुना होगा , अवश्य ही इस समापन सांस्कृतिक शाम में केक पर शीर्शस्थ चेरी जैसा ही आनन्द उठाया होगा ...क्योंकि सुर...साज और सोज़ के अद्भुत संगम का ही तो नाम है पंकज उधास।
सच कहूं तो कई-कई गरिमामय पल आए उन बहत्तर घंटो मे, जिनसे प्रभावित व अभिभूत मन भावुक हो चला और आँखें पूर्णतः नम। पल जिन्होने याद दिलाया कि इसी न्यूयौर्क मे खड़े होकर कभी हमारे पूर्वज और मनीषी स्वामी श्री विवेकानन्द जी ने भी अपना पहला आख्यान दिया था, जिसने भारतीय धर्म ( समाज के स्थाई संकल्प) और दर्शन ( मुख्य विचारधाराओं) की दुंदुभी बजा दी थी इस' बिग एपल ' में...और उपस्थित हर मन में भारतीयता के झंडे लहरा दिए थे।
विवेकी मंत्री महोदय श्री आनन्द शर्मा जी के आग्रह पर जब य़ू. एन. ओ के मुख्य सभागार में सत्र की शुरुवात जन-गण-मन अधिनायक से हुई, तो उपस्थित समुदाय के उल्लासित चेहरों पर इरादों की कुछ और दृढता व सच्ची निष्ठा आ मिली थी। फिर संयुक्त राष्ट्र संघ के सचिव वान की मून ने अपने आत्मीय और भावभीने भाषण में भारत और भारतीय भाषा हिन्दी के साथ आत्मीय सबन्धो का उद्घोष करके , बारबार हिन्दी और कोरियन मिले-जुले उत्पादन के इन्तजार की बात करके (उनकी बेटी ने एक भारतीय नवयुवक से विवाह किया है) वातावरण की गरिमा को बनाए रखते हुए भी, माहौल को एक नया और उल्लासमय सदर्भ दे दिया ...झीनी ही सही हिन्दी को एक आत्मीय मान्यता देते हुए उन्होंने हिन्दी और विश्वभाषा की दूरियो को, असफलता के भय को कुछ और कम कर दिया ... इतना कम कि माननीय मंत्रीजी तक खुद को न रोक सके और कह बैठे कि अब तो आपकी समझ में आ ही गया होगा कि हमारा यही सभागार चयन करना, मुहिम को यहांतक लाना कितना अधिक सही था।
परन्तु अगले पल ही, अगली बार क्या क्या प्रयास होने चाहिए, और क्या क्या होगा कि हिन्दी विश्व-भाषा बन सके जैसी वार्ताओं ने तुरत ही उस सुनहरी आशा की धूप पर गहन काली शंकाओं के बादल भेज दिए और भूला-बिसरा एक दुख मन को रह-रहकर फिरसे सालने लगा ---क्या हम अपने और देश के कोष को और अधिक सोच, कौशल और उपयोगिता के साथ इस्तेमाल नही कर सकते ...कुछ भी कहें, अभी भी कई-कई भयावह सिन्डरैला समस्याएँ हैं समाज और जीवन में, जिनकी तरफ ध्यान देना आजभी, भारत के इस हाल ही में उपलब्ध व्यापारीकरण के सफल युग में भी, अत्यंत जरूरी है ।
कुल मिला-जुलाकर न्यूयार्क के उन तीन दिनो की सबसे बड़ी और मुख्य उपलब्धि थी,कई-कई विद्वानो और प्रियजनो का एक बेफिक्र और खुले माहौल मे मिलना-जुलना, आपस में विचार-विमर्श करना। कई-कई गरिमामय और औजस्वी वाक् सरस्वती में मानस ने अनगिनित डुबकियां लीं। और कई-कई मनीषी विचारधाराओं का आपस में टकराव, हिन्दी और भारत के विश्व-परिवार के लिए सोच में एक नई उर्जा की उत्पत्ति कर गया। हां एक ही समय मे दो-दो सत्र होने की वजह से समय और चयन की उलझन जरूर थी, फिर भी जो भी मिला,प्रसाद की तरह उसे ही ले-देकर मन सतुष्ट भी था और स्फूर्त भी। वार्ताओ के आयाम बहुरगी और विविध थे। ग्याना की युवा और नई पीढ़ी की महिला का भारत और भारतीय संस्कृति से लगाव व हनुमान-चालीसा का पाठ मन जोड़ने वाला था और उनकी हिन्दी शिक्षण पुस्तिकाओ और शिक्षको के लिए की गई भावभीनी फरियाद मन को छू गई...दूसरी याद जो मुखर है वह है श्रीगुलजार जी की हिन्दी फिल्मी गीतो पर एक बेहद रोचक वार्ता...' जहा गोली मार भेजे में, भेजा शोर करता है' और ' बीड़ी सुलगा ले जिगर से पिया, जिगर मा बड़ी आग है' और ' तेरे बिना जिन्दगी से----' आदि तरह- तरह के रसीले और भावोत्तेजक गीत कैसे चरित्रानुसार उनकी कलम से निकले ---जैसी अपनी रचना प्रक्रिया उन्होने श्रोताओ के साथ बांटी और साथ में ही जापानी हिन्दी प्रेमियों की उपस्थिति में बारबार ' मेरा जूता है जापानी,ये पतलून इंगलिस्तानी, सरपर लाल टोपी रूसी, फिरभी दिल है हिन्दुस्तानी। ' गीत का उल्लेख हर भारतीय मन को अद्भुत काव्यमय राष्ट्रीयता से ओतप्रोत कररहा था वहीं दोनें अमरीकी शिक्षिकाओं के अनुभव भी कम रोचक नहीं थे। इन्होने बताया कि कैसे हिन्दी फिल्मी गीतों के सहारे वे हिन्दी व्याकरण जैसे क्लिष्ट विषय को भी अपने शिष्यों को समझा पाती हैं। बहुत ही आँख खोलने वाला अनुभव था वह...वाकई में जहां चाह वहां राह ! सुषम जी का प्रवासियों से आत्म-निरीक्षण का आवाहन भी प्रशंसनीय था। हर लेखक का अपना पाठक और आलोचक होना उतना ही जरूरी है जितना कि रचना प्रक्रिया में डूबना, तभी तो वह नीर-क्षीर विवेकी होकर उत्कृष्ट व विशिष्ट कृतियां दे पाएगा।
श्री करण सिह जी का ओजस्वी समापन भाषण उस ज्ञान-भोज का यादगार स्वादिष्ट मिष्ठान था...एक विद्वान देश और भाषा-प्रेमी संत के सहज उद्गार थे, जिसे आजभी गर्व है अपनी संस्कृति और संस्कारों पर।
यों तो उन बहत्तर घटो की अनगिनित खट्टी-मीठी यादे बिखरी पड़ी हैं, परिचित और नव परिचितों की...हिन्दी प्रेमियों के बढ़ते परिवार की। कुछ समयाभाव की वजह से, कुछ न जानने की वजह से कई प्रिय जनों से न मिलपाने का , और कईयों से न मिलने जैसा ही मिलने का अफसोस भी रहा, परन्तु साथ साथ कई नए अच्छे लोगों भी मिले और मेरे जैसे संकोची व्यक्ति के लिए इतना ही बहुत था। उन सभी यादो में जगमग एक विशेष याद है, प्रिय कथाकारा सूर्यबाला जी से एक छोटी-सी परन्तु आत्मीय मुलाकात और वह भी अचानक ही ब्रेकफास्ट टेबल पर---एक और बेहद प्यारी बहन का कुंभ के मेले में यूं अचानक ही मिल जाना एक सुखद संयोग ही था क्योंकि माहौल वाकई में बेहद आत्मीय था। बचपन में पढ़ी सूर्यबाला जी मेरे सामने थीं...कबसे मिलना चाहती थी उनसे। (वो भी उसी शहर से हैं और वहां के स्थानीय आज अखबार में अक्सर उनकी रचनाएं आती और आकर्षित करती थीं।)... कई-कई प्यारी रचनाओं के साथ जुड़ा एक पूर्व परिचित नाम, जिसे इस सम्मेलन ने एक आत्मीय चेहरा ही नहीं, प्यारी-सी , यादों भरी पहचान भी दे दी।
अंत में देश और भाषा के प्रति लिए गए हर सही और सार्थक संकल्प के संपूर्ण व सफल होने की कामना करते हुए अपनी बात मैथली शरण गुप्त के शब्दों में समाप्त करना चाहूंगीः
'मानस -भवन में आर्यजन,
जिसकी उतारें आरती
भगवान भारतवर्ष (और विश्व) में
गूँजे हमारी भारती।। '
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15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस विशेष
( गदर आन्दोलन के 150 वर्ष पूरे हो चुके हैं और देश की स्वाधीनता के साठ वर्ष। स्वतंत्र भारत के इस गौरवमय और ऐतिहासिक पल पर लेखनी की ओर से सभी देश-विदेश में बसे भारतीय और भारतवंशियों को कोटि-कोटि बधाइयां और देश के सभी उन वीर सैनानियों को भावभीनी श्रद्धांजली, जिनके रक्त की एक-एक बूंद के हम चिर ऋणी हैं।)

सारे जहां से अच्छा
सारे जहां से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलसितां हमारा
गुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में
समझो वहीं हमें भी, दिल हो जहां हमारा
पर्वत वो सबसे ऊंचा, हमसाया आसमां का
वो संतरी हमारा, वो पासवां हमारा
गोदी में खेलती हैं, जिसमें हजारों नदियां
गुळशन है जिसके दम से, रश्के जिनां हमारा
ऐ आबे-रौंदे-गंगा, वो दिन है याद तुझको
उतरा तेरे किनारे जब कारवां हमारा
मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्तां हमारा
यूनान, मिस्र, रोमा, सब मिट गए जहां से
अबतक मगर है बाकी, नामो निशां हमारा
कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन, दौरे जहां हमारा
इकबाल कोई मरहूम, अपना नहीं जहां में
मालूम क्या किसी को, दर्दे निहां हमारा
-मोहम्मद इकबाल-
*

ऐ मेरे वतन के लोगो
ऐ मेरे वतन के लोगों तुम खूब लगा लो नारा ये शुभ दिन है हम सब का लहरा लो तिरंगा प्यारा पर मत भूलो सीमा पर वीरों ने है प्राण गँवाए कुछ याद उन्हें भी कर लो - जो लौट के घर न आये -
ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आँख में भर लो पानी जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो क़ुरबानी
जब घायल हुआ हिमालय खतरे में पड़ी आज़ादी जब तक थी साँस लड़े वो फिर अपनी लाश बिछा दी संगीन पे धर कर माथा सो गये अमर बलिदानी जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो क़ुरबानी
जब देश में थी दीवाली वो खेल रहे थे होली जब हम बैठे थे घरों में वो झेल रहे थे गोली थे धन्य जवान वो आपने थी धन्य वो उनकी जवानी जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो क़ुरबानी
कोई सिख कोई जाट मराठा कोई गुरखा कोई मदरासी सरहद पर मरनेवाला हर वीर था भारतवासी जो खून गिरा पर्वत पर वो खून था हिंदुस्तानी जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो क़ुरबानी
थी खून से लथ-पथ काया फिर भी बन्दूक उठाके दस-दस को एक ने मारा फिर गिर गये होश गँवा के जब अन्त-समय आया तो कह गये के अब मरते हैं खुश रहना देश के प्यारों अब हम तो सफ़र करते हैं क्या लोग थे वो दीवाने क्या लोग थे वो अभिमानी जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो क़ुरबानी
तुम भूल न जाओ उनको इस लिये कही ये कहानी जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो क़ुरबानी
जय हिन्द... जय हिन्द की सेना जय हिन्द, जय हिन्द, जय हिन्द।
रामचंद्र द्विवेदी "प्रदीप"
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-शैल अग्रवाल
आठवां विश्व हिन्दी सम्मेलन

हिन्दी और प्रवासी साहित्य
(14 जुलाई-2007)
भारतेन्दु हरिश्चन्द ने कभी कहा थाः
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषा ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।
उन्नति पूरी है तबहि, जब घर उन्नति होय।
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।।
निज भाषा उन्नति बिना, कबहूँ न ह्यौंहिं सोच।
लाख उपाय अनेक यों, भले करो किन कोय।।
इक भाषा इक जीव इक मति, सब घर के लोग।
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।।
और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात।
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।।
तेहि सुनि पावैं लाभ सब, बात सुनै जो कोय।
यह गुन भाषा और मंह, कबहू नाहीं होय।।
कितनी खरी है उनकी यह बात आज भी! आज भी तो भाषा की यह पीर एक पर्वत-सी ही खड़ी है हमारे सामने और देश की अस्मिता व छवि, दोनों को ही अपंग कर रही है। दुनिया में बोली जानेवाली दूसरी सर्वाधिक भाषा होकर भी विश्व-भाषा मान्यता प्राप्त छह भाषाओं में हिन्दी नहीं है, कहीं न कहीं यह तथ्य हम भारतीयों की कमज़ोरी और आत्म-विश्वास की कमी को दर्शाता है। हमारी आपसी फूट, गुट बाजी और नासमझी का परिणाम है। चीन जैसे देश आज इसलिए इतने आगे बढ़ पाए क्योंकि उन्होंने मातृभाषा के महत्व को समझा। देश की शिक्षा, व्यापार आदि, सभी को अपनी मातृभाषा में ही रखा। संसार ने अपनी जरूरत मुताबिक उनसे समझौता किया, उन्होंने दूसरों की भाषा के साथ नहीं।
दीवानगी जब हद से गुजर जाए तो जुनून बन जाती है और अगर चार दीवाने मिल बैठें तो एक मुहिम एक आन्दोलन भी। समय आ गया है कि यदि लांघ नही सकते तो कम-से-कम इस पर्वत को पिघलाने का तो भरपूर प्रयास हमें करना ही होगा। मातृभाषा हिन्दी के संदर्भ में बारबार याद आ रही है कभी पढ़ी अंग्रेजी की एक कविता, "नौट वेविंग बट ड्राउनिंग"। असहाय हिन्दी डूब रही है, मदद मांग रही है और हम यही समझकर आराम से बैठे हैं कि हिन्दी तो बहुत सशक्त है, इसे कुछ नही हो सकता। हजारों साल से चली आ रही है, आगे भी ऐसे ही चलती रहेगी। पर क्या आज भारत के महानगरों में या विदेशों में बसे भारतवंशियों के घरों में... कम-से-कम आपस की पारिवारिक बातचीत तक में, हिन्दी अपना वर्चस्व रख पाई है!
देश की संस्कृति और संस्कारों से प्यार न हो, तो भाषा से प्यार नहीं हो सकता और जब तक अभिव्यक्ति सार्थक व प्रभावशाली न हो, दूसरे भला हमें कैसे समझ पाएँगे...दूसरों की तो छोड़ो क्या हम खुदको समझ सकते हैं ऐसे? ना ही, दूसरों की भाषा कभी हमारी अपनी एक अलग आवाज और पहचान बन सकती है... न संयुक्त राष्ट्र संघ में, और ना ही विश्व के हित में लिए गए किसी अन्य फैसले में।
संस्कृति और संस्कार, -आत्म विश्वास , भाषा और पहचान या अस्मिता, ये चारो ही अविच्छिन्न हैं। गहरे जुड़े हुए हैं और अलग नही किए जा सकते...क्योंकि ये एक दूसरे के पूरक भी हैं और संवाहक भी। मां के दूध-सी हिन्दी हमारी रग-रग में है इसलिए हमें हिन्दी के प्रति चिन्तित होने की नहीं, बस सजग होने की जरूरत है। विचारने की जरूरत है कि आज जब करीब 250 लाख भारतीय करीब 110 देशों में बिखरे हुए हैं परन्तु क्या वजह है कि विश्व में दूसरे नम्बर पर बोली जाने वाली भाषा (यदि पाकिस्तान आदि अन्य देशों के नागरिकों को भी जोड़ लिया जाए तो शायद यह संख्या पहले नं. पर भी पहुंच सकती है, क्य़ोंकि लीपि भले ही अलग हो, बोलने में तो हिन्दी और उर्दू में कोई फर्क नहीं)अभी भी विश्व-भाषा नहीं बन सकी और आबादी के हिसाब से विश्व में दूसरे नम्बर पर जा पहुंचे हम सभी भारतवासी अभी भी अपनी भाषा को उचित सम्मान न तो दे पाए हैं, और ना ही विश्व के आगे दिला ही पाए हैं? आज भी बस हिन्दी-दिवस मनता है... देश- विदेश में वैश्विक स्तर पर हिन्दी सम्मेलन होते हैं और हम फिरसे इन्तजार करते रह जाते हैं अगले वर्ष का...एक और सम्मेलन का ? दुनिया की और किसी भाषा के साथ तो ऐसा नहीं है ...क्यों हमें हिन्दी हमेशा, देश की आजादी के साठ साल बाद भी, मरणासन्न और बीमार ही नजर आती है, और यदि अगर वाकई में ऐसा है भी, तो किसने पहुंचाया इसे इस आपदकालीन स्थिति में?
बज़ाय एक-दूसरे का मुंह तकने के, हम सभी को अपने-अपने गिरेबां में झांकना होगा...क्या हम खुद अपने दैनिक जीवन में हिन्दी को यथोचित सम्मान और महत्व दे पाए हैं? जबतक भारत में, या विश्व के कोने-कोने में फैले भारतीय ही हिन्दी को उचित सम्मान न देंगे, अपने ही देश में मजदूर और अनपढ़ों की भाषा समझी जाने वाली हिन्दी- विश्व-सभागार में उचित स्थान कैसे ले पाएगी?
जरूरतें, किसी भी भाषा के विस्तार को गति देती हैं। हिन्दी की जरूरत को भी जिन्दा रखने की जरूरत है। इसके लिए हमें हिन्दी को अपने देश में, और सारी दुनिया के सामने भी, रोटी-रोजी, व्यापार, उच्च-शिक्षा व तकनीकी आदि से जोड़ना होगा...मीडिया व्यापार और प्रचार से जोड़ना होगा। अपने देश और भाषा में गौरव लेते हुए, विश्वीकरण के इस युग में सिर्फ दुनिया ही नहीं, भारत में भी अंग्रेजी के समकक्ष, हिन्दी के प्रति उदासीन जन-समाज को बताना होगा कि हिन्दी भी उतनी ही सशक्त और सक्षम भाषा है जितनी कि गुलामी के साथ आई और आजतक हिन्दी पर राज करती, उसे मुंह चिढ़ाती अंग्रेजी है। बल्कि हिन्दी तो अपने देश की संजीवनी बूटी है...पूर्वजों की सोच... भारत मां के दूध-सी, भारतीयता के सभी पोषक तत्व...अपना इतिहास... संस्कार और युगों के तप और मनन सभी का सार लिए अमूल्य शब्द गंगा है...गीता, रामायन... वेद, पुरान है।
विदेश की मिट्टी पर जब भी कोई अपना घर बनाता है तो नींव की पहली ईँट जहां सपनों की मिट्टी से रची और महत्वाकांक्षा की आंच में तपी होती है, दूसरी निश्चय ही यादों से बनी होती है। यादों की मिट्टी में रची, यादों की आंच में तपी---और आंसुओं से बुझी व तरी। जमीं पर खड़े घरों को शायद समय और प्रकृति नष्ट भी कर दे परन्तु मन के अन्दर गुनी-चुनी ये इमारतें तो वक्त के साथ-साथ हमारी यादों, तौर-तरीके और संस्कारों का संग्राहलय बनती चली जाती हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी भाषा और संस्कृति को सुरक्षित रखती हैं, ... एक बृहद संदर्भ कोष बनी, विषम या नई परिस्थिति में दुधारू दृष्टिकोण और तुलनात्मक सोच के साथ...परिस्थितियों की बेहतर और स्पष्ट समझ देती जाती हैं। भारत के बाहर बसे या बैठकर लिख रहे लेखकों का यह बारबार भारत या अपने अतीत की तरफ देखना और मुड़ना बस एक भावनात्मक राग या नौस्टैलजिया ही नहीं पनपने की अनिवार्य शर्त है। जड़ों से कटकर ना तो कोई जीव जी सकता है और ना ही संस्कृति!
शक्ति के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपनाना। दुनिया के किसी भी कोने में हों, अधिकांशतः भारत-वंशी आजभी विचारों और संस्कारों से भारत को ही अपनी आत्मा में संजोए हुए हैं। न सिर्फ खाने-पीने और रहन-सहन के अन्दाज से कईयों ने स्वयं को भारतीय रखा है, वरन् भारत के लिए कुछ कर गुजरने की ललक ( भारत के जिस गांव या कस्बे से वे या उनके पूर्वज आए थे, उस ओर) बारबार उन्हें वापस भारत की ओर खींचती है और आज भारत के कोने-कोने में ऐसे गांवों का झुरमुट उठता चला आ रहा है जिनकी काया-कल्प में इन भारतवंशियों का हाथ स्पष्ट है। पहले कभी जब जबर्दस्ती बंधुआ मजदूरों की तरह लोगों को विदेश ले जाया जाता था, प्रवासी शब्द त्रासदी रहा होगा, आज तो यह शब्द देश का गौरव है और प्रवास में रहना प्रगतिशीलता की निशानी बनता जा रहा है।
समृद्धि, साहित्य और संस्कृति का यह भारतीय पौधा जो आज प्रवासी विदेशों की मिट्टी में रोप रहे हैं, अगर भारत से इसे सराहना और सद्भावना की धूप मिले, सोच का पानी मिले, तो निश्चय ही न सिर्फ यह एक सुखद अमराई बनकर सभी को छांव देगा अपितु अनगिनत मीठे फल भी।
इसके लिए भारतीयों को भी इन्हें खुले मन से अपनाना होगा। आपसी गुटबाजी और अहम को भूलकर हिन्दी और हिन्दीवासियों को आपस में जोड़ना और उनसे जुड़ना होगा। हिन्दी और हिन्दी-लीपि (लीपि के बिना भाषा अन्ततोगत्वा मिट ही जाती है, इसलिए लीपि पर भी ध्यान देने की बेहद जरूरत है, मात्र रोमन लीपि में ही हिन्दी लिखपाने वाली प्रवृत्ति को आगे बढ़ने से रोकने की जरूरत है।) के प्रचार प्रसार के साथ-साथ बिना किसी भी भेदभाव के हिन्दी में रचे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य को भी जनता के सामने लाना होगा, चाहे वह विश्व के किसी भी कोने में बैठकर क्यों न रचा जा रहा हो, ताकि पाठकों की, आम आदमी की रुचि हिन्दी और हिन्दी साहित्य में बनी रह सके और विदेश में जन्मा, पला, बढ़ा प्रबुद्ध युवा यह कहने पर मजबूर न हो कि पचास प्रतिशत भारतीय फिल्मों की तरह इस साहित्य में भी आधा माल तो कचरा , या निम्न श्रेणी का ही है।
रचनाकार जो भारत से बाहर बैठकर साहित्य सृजन कर रहे हैं वह भी, भारत में या किसी भी अन्य साहित्यकार की तरह ही, जीवन जीते विभिन्न मनोभावों और दबावों से गुजर रहे होते हैं, बस उनका मंथन और दृष्टिकोण दोहरा हो जाता है क्योंकि उनकी रचनाशीलता दो संस्कृतियों से गुजर रही होती है, दो सभ्यताओं के मूल्यों को लेकर चलती है, जो कि अक्सर ही आपस में टकराते हैं, और पात्रों को ही नहीं, स्वयं रचनाकारों को भी, खुद का व परिस्थियों का मनोविश्लेषण करने पर मजबूर करते हैं और भावों का यही संघर्ष, विदेशी अंधड़ पानी के मौसम में स्व-रोपण...अस्मिता और जीवन के स्थाई मूल्यों की तलाश...साथ-साथ जड़ों से जुड़े रहने की ललक, यही दुधारी और जुझारू सोच ही भारत से बाहर लिखे जा रहे हिन्दी साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति है, कोई भावात्मक भटकन या कमजोरी नहीं, भारतीयता की यात्रा का एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। हां अगर निष्कर्ष पर पहुंचने का माध्यम ही निष्कर्ष बन जाए तो जरूर एक भटकन ही कहलाएगी... अविरल रुदन नहीं चाहिए किसी को, न जीवन में और ना ही साहित्य में।
हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अभिव्यक्ति का माध्यम चाहे कुछ भी हो परन्तु दर्द हर मनुष्य का एक ही होता है, जैसे कि तृप्ति के आयाम कई हो सकते हैं, परन्तु भूख एक ही होती है। इन्सान प्रवासी हो सकता है पर साहित्य नहीं, कहीं भी बैठकर किसी भी भाषा में लिखा जाए, साहित्य बस साहित्य होता है, और जिस भाषा में उसका सृजन हो रहा है उसी समूह का परिचायक भी। साहित्य और भाषा दोनों का ही संबन्ध संस्कार और परम्पराओं से होता है ...देश परिवार और समाज से होता है... इन्सान या जाति के पूरे इतिहास...हर संघर्ष, हर आकांक्षा, उपलब्धि और निराशा से होता है, उसके आज और आने वाले हर कल से होता है। औस्ट्रेलिया, न्यूजिलैंड, अमेरिका या कहीं भी अंग्रेजी में रचा जा रहा साहित्य अंग्रेजी साहित्य ही है जैसे कि फ्रेंच का भी । कहते हैं सृजनरत इन्सान रचयिता के सर्वाधिक करीब होता है क्योंकि उन पलों में वह स्व से निकलकर समस्त से जुड़ जाता है। अब ऐसे उद्दाम पलों को कैसे हम भौगोलिक सीमाओं में बांध सकते हैं। हां जगहों की अपनी-अपनी भाषा, अपने-अपने अन्दाज और अपनी अभिव्यक्तियां हो सकती हैं जिससे आंचलिकता और विविधता आती है, काल और परिवेष के बिन्दु-विशेष की छवियां उभरती हैं, परन्तु भाव रस और गुण तो वही शाश्वत ही होते हैं। किसने सृजन किया, कहां बैठकर किया, उससे इतना फर्क नहीं पड़ेगा, महिला ने किया, या पुरुष ने किया उससे भी नहीं; , जितना कि क्यों और किन-किन परिस्थितियों को जीते हुए किया गया यह सृजन। दृष्टिकोण का फर्क हो सकता है जैसे गुलाबी चश्मे से देखो तो गुलाबी और हरे से हरा व नीले से नीला पर दृश्य तो अन्ततः वही-का-वही रहता है। गुलाबी चश्मे से दिख रहे पहाड़ को गुलाबी पहाड़ नही कहा जा सकता, वह भी बस पहाड़ ही है, हम सभी यह बात जानते हैं... जो गुलाबी चश्मे से देख रहे हैं वे भी और जो खुली आँखों से,वे भी।
आप प्रवासी लेखक, कवि या साहित्यकार कहिए, सही है पर साहित्य जिसमें मन रमता है...भाव रमते हैं वह कैसे प्रवासी हो सकता है, क्योंकि यह तो स्वभाव से ही काल और जगह की सीमा से परे हैं। शाश्वत या चिर् है। जो सहित की भावना से उत्पन्न हो... जुड़ने की चाह लेकर आगे बढ़े, उसे कैसे हम खेमों में बांट सकते हैं, दराजों में रख सकते हैं।
चिड़िया की बोली को चहकना और सांप की बोली को फुंकारना और शेर की बोली को दहाड़ना व कुत्ते की बोली को भोंकना कहते हैं। आदमी की बोली में ये सब गुण होते हुए भी आदमी, आदमी ही कहलाता है, कुत्ता शेर या सांप नही बन जाता!
बंबइया और कलकतिया हिन्दी की तरह ही ब्रिटिश अमेरिकन या गिरमिटिया और खाड़ी की हिन्दी भी बस हिन्दी ही है ---उसके मानक मुहावरे सब भारतीयों के अपने अनुभव और आम जीवन के संघर्ष... दो सभ्यताओं के टकराव से उपजे हैं। स्थानीय चन्द शब्दों और अभिव्यक्तियों से सजा यह हिन्दी का एक नया और अनूठा कलेवर है जिसे सभी हिन्दी-भाषियों को न समझने में दिक्कत होनी चाहिए और ना ही अपनाने में। अंग्रेजी इसलिए विश्व की संपर्क भाषा बन सकी क्योंकि इसने कभी विदेशी शब्दों से आपत्ति या परहेज नही किया। कबीर ने भी भाषा को बहता जल ही कहा है। और हम सभी जानते हैं प्रवाह को जीवित रखने के लिए समिश्रण कितना जरूरी है। चिन्ता की कोई बात नही जो उपयोगी होगा वही साथ बहेगा और अनचाही कीचड़ व पत्थर स्वयं ही बैठते चले जाएंगे।
हमने बड़े-बड़े विद्वानों को अक्सर कहते सुना है कि मुख्य धारा से जुड़ने के लिए हमें पता होना चाहिए कि क्या-क्या नए प्रयोग हो रहे हैं और कौन-कौन से नए मानक आ रहे हैं साहित्य में। मेरे ख्याल से तो साहित्य की कोई जाति या अनिवार्यता या शर्त नहीं होती, जिससे बंधकर ही रचनाकार को चलना होगा, तभी वह एक विशिष्ट खेमे में बैठने लायक होगा। मौलिक साहित्य किसी खास पद्धति या परम्परा से प्रभावित होकर नहीं रचा जा सकता। यह निर्झरणी तो स्वतः ही फूटती है। मानव और प्रकृति की तरह इसकी नैसर्गिक विविधता ही इसकी सुन्दरता भी है और अनश्वरता भी। सही है अगर रास्तों का पता हो तो यात्रा सुलभ होती है, परन्तु फिर नवीन की खोज और रोमांच भी तो छूटेगा! अनुसरण के सहारे अन्वेषण नहीं हो पाता, इसके लिए तो अनजान छलांगें लेनी ही पड़ती हैं।
जीकर और भोगकर , भले ही कल्पना में ही क्यों न, रचा जाए तो विशिष्ट काल और परिस्थिति को अभिव्यक्त करता साहित्य ही रचा जाएगा और यह साहित्य खुद ही नए मानक और नई अभिव्यक्तियों से लैस भी होगा। उसकी यह विविधता ही उसकी विशिष्टता बनेगी। सृजन में खुद के प्रति और समाज के प्रति ईमानदारी और जिम्मेदारी ही किसी कलाकार की सर्वोपरि रचना-धर्मिता है, बजाय किसी भी तरह की खोज और जुड़ने की चाह के या विस्मित करने के प्रयास के। जानती हूं जीवन में एक लेखक या कवि जितनी उड़ानें लेता है वह सब वास्तव में जीना या भोगना असंभव है परन्तु यहीं आकर तो कला और जीवन अलग हो जाते हैं और अद्भुत बात यह है कि जुड़ते भी हैं...जुड़ते इसलिए कि साहित्य अलग होकर भी जीवन से अलग नहीं किया जा सकता, या जी सकता है...जीवन वृक्ष के सहारे ही तो ये सभी ललित लताएं पुष्पित और सुरभित हो पाती हैं
अब सवाल उठता है कि क्यों करता है कोई भी इसान सृजन, या क्या जरूरत है इन नयी-नयी कलाकृतियों और रचनाओं की समाज को? अन्न, जल और हवा, पानी की तरह इसकी भी क्या अवश्यंभावी जरूरत है जीवन को या समाज को ? इसके लिए हमें समझना होगा क्या है जो बाध्य करता है कलाकार को सृजन के लिए... कुछ बदलने की चाह जैसे कि सामाजिक अन्याय अत्याचार या कुरीतियां...जैसा कि अपने अपने समय में तुलसी और कबीर ने किया, प्रेमचन्द ने किया। कुछ बांटने की चाह... एक दर्द, एक खुशी, एक आश्चर्य, एक जिज्ञासा एक अनुभूति इतनी तीव्र कि दबाए न दबे, इतनी तीव्र कि खुद ही छलक पड़े, सदियों से नवों रसों के साहित्य की अविरल बहती धारा को शायद हम इसी श्रेणी में रखेंगे । या फिर कुछ बिल्कुल ही नया और अनूठा कर गुजरने की ललक... (आर्ट फौर आर्ट सेक) कला के लिए कला---आधुनिक और प्राचीन सभी प्रयोग और शैलियां...सभी ललित कलाकार व कला प्रेमी इससे भलीभांति परिचित हैं क्योंकि मानव स्वभाव से ही चंचल है और सतत् नए की खोज में रत रहता है।
किस उद्देशय से किया जा रहा है सृजन, यह जानना जरूरी है। उद्देश्य की बात इस लिए जरूरी है क्योंकि लक्षहीन गन्तव्य नहीं पा सकता। माना दृष्टिकोण का फर्क नए रंग, नए आयाम देता है परन्तु हर क्रिया का कोई-न-कोई कारक तो होता ही है और चेतन अवचेतन उसे नहीं भूला जा सकता। अब आप कहेंगे कि फिर ये रंगीन चश्मे क्यों ... और खास करके तब, जब वही यथार्थ ही चित्रित या वर्णित होना है?
यह व्यक्तिगत पसंद और खुशी का सवाल है, लेखक या रचनाकार की अपनी संवेदनशीलता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का सवाल है...आसपास जो घट रहा है , कितना उसे विचलित या असंतुष्ट कर रहा है, इस तरह के कई पहलू जुड़ जाते हैं कलाकार की सृजन धर्मिता से और एक प्रवासी को तो यह सब अनुभूतियां और भी तीव्रता से महसूसस होती हैं क्योंकि उस नए माहौल में सबकुछ नया है और उस नए से सामंजस्य की लड़ाई आम लड़ाई नहीं, उसके मूल्यों की लड़ाई है, उसके अपने अस्तित्व की लड़ाई है। ऐसी परिस्थिति में उसका अति भावुक होना और अतीत की तरफ बारबार देखना दोनों ही स्वाभाविक हैं, क्योंकि वहीं से तो वह अपनी उर्जा ले रहा है...इस अपरिचित समाज से लड़ने की सारी विधाएँ और परिचित अस्श्र-शस्त्रों का वही तो एकमात्र भंडार है उसके पास। माना नई प्रेरणाओं के अधीन नए आकर्षण और नए प्रयोग होंगे... परन्तु विश्वसनीयता परख और प्रमाण मांगती है। हरेक के जीवनमें यह अदृश्य गर्भनाल अजस्र जीवन स्रोत्र बनकर हमेशा ही साथ रहती है। जिसदिन यह सूखती है, इसपर से विश्वास उटता है, आदमी नितान्त अकेला हो जाता है और विषमता से तो जूझा जा सकता है, एकाकीपन से नही...अक्सर अंतस का यही एकाकीपन ही तो प्रेरित करता है कल्पना लोक के सृजन के लिए।
क्या है प्रवासियों की यह जीवटता जो मरु में भी शीतल जल-लहरी सी सींचती है ---प्रष्फुटित और पल्लवित होती है... कहां से आती है यह अथक जूझने की शक्ति...? उनकी रचना व जीवन के इस विलक्षण गुण को देशवासी न सिर्फ धैर्य और सहानुभूति से समझ सकते हैं वरन् इससे लाभान्वित भी हो सकते हैं । नए वातावरण में पनपते प्रवासी लेखक अपने जीवन की तरह ही न सिर्फ अनुकूल जमीन तलाश और पा रहे हैं वरन फलफूल भी रहे हैं। ना सिर्फ अपने अपनाए देश को मातृ-भूमि के करीब ला रहे हैं अपितु दोनों ही किनारों पर खड़ी उनकी सोच, पुल सी संस्कृतियों को जोड़ रही है। और इस पछुआ हवा की गंध में मिश्रित उनके श्रम-बिन्दु, देश के भी किसी काम आ सकें, किसी तपिश या तिरकती धरती को सींच पाएं , छोटे से छोटा भी योगदान दे पाएं तो यह आनन्द दोहरा हो जाएगा। आज भारतीयों की विद्वता, समझ और सुरुचि को विश्व सराह और संजो रहा है, भारत खुद अपने इन दूर बैठे भारतवंशियों को खुदसे जोड़कर आगे बढ़ सकता है और भारतवंशी भी भारत से जुड़कर गौरान्वित और सार्थक महसूस कर पाएंगे। दूरी का दर्द कुछ कम महसूस करेंगे। विकसित देशों में ऊंचे-ऊंचे पद सम्भाले भारतवासी साहित्य के साथ-साथ अपने देश को तकनीकी, चिकित्सा और वैज्ञानिक-शिक्षा आदि में भी भरपूर मदद दे सकते हैं...देश को अपनाए गए विकसित देशों की आधुनिकतम तकनीकियों से अवगत करा सकते हैं।
प्रवासियों और हिन्दी भाषा के संदर्भ में चन्द प्रस्ताव हैं, जिनपर हमें मिलजुलकर ध्यान देना चाहिएः
1.हिन्दी वर्ण माला और अभ्यास पुष्तिकाओं की विदेशों में सुलभ उपलब्धि या फिर विदेशी भारतीय परिवारों में स्वैच्छिक वितरण।
2. बहुत छोटी उम्र से ही हिन्दी सीखने के लिए प्रोत्साहन प्रोग्राम और देश में अंग्रेजी से टक्कर लेते, हिन्दी के अंतर्राष्ट्रीय स्तर के उच्च कोटि की पाठशालाओं की अवधारणा व स्थापना।
3. सभी आई. ए. ए एस और डां. इन्जीनियरिंग, वैज्ञानिक व कम्प्यूटर आदि की शिक्षा और इम्तहानों में हिन्दी का पूरा और सार्थक विकल्प। यदि ऐसा हुआ तो हिन्दी खुद ही स्वयं को स्थापित कर लेगी।। त्रिभाषषीय फार्मूला बचपन से ही।
4. दोनों देशों की लोककथाओं और धार्मिक पौराणिक कहानियां व आधुनिक कहानियों का दोनों देशों के बच्चों के साथ मिला जुला मंचन। इन्हें भारत से जुड़े विशेष दिन जैसे पन्द्रह अगस्त, होली, दिवाली, क्रिसमस और ईस्टर आदि से जोड़ा जा सकता है।
5. संस्कृति और शिक्षा के आदान प्रदान के लिए संस्थाएं और परिवार, देश विदेश में आपस में जुड़ें। विद्वान और कलाकार व साहित्यकारों में आपसी संपर्क-सूत्र हों। लगातार कुछ ऐसा होता रहे कि नई पीढ़ी की भारत में रुचि कायम रह सके और वे गौरव महसूस करें अपने देश पर। खुदको उसका हिस्सा मानें।
6. भारत और विदेशों से हर साल कम-से-कम छह चयनित किताबों का देश-विदेश की लाइब्रेरियों और पुष्तकालयों में वितरण और सुलभ उपलब्धि कराई जाए।
7. हर देश में हिन्दी की स्तरीय लाइब्रेरी खुलें। सरकार सहयोग दे।
8.प्रवासी रचनाओं के प्रकाशन व पुष्तकों के वितरण की एक सुचारु व व्यवहारिक व्यवस्था कराई जाए। जिससे कि किताबें बस धूलखाने के लिए न लिखी जाएँ।
9. रचना चयन व प्रकाशन में प्रवासी के नाम पर या अन्य किसी वजह से कोई छूट न दी जाए। कोशिश यह रहे कि उत्कृष्ट साहित्य ही जनता को पढ़ने को मिले चाहे रचनाकार वासी हों या प्रवासी। जिससे कि जनता की रुचि और विश्वास दोनों ही साहित्य में बने रह पाएँ। किसी तरह की दलबाजी या अन्य किसी तरह के दबाव के अंतर्गत ये निर्णय जहां तक संभव हो न लिए जाएँ। प्रवासी रचनाकारों की उत्कृष्ट कृतियां भी पाठ्यक्रम में ली जाएं।
10 . सरकार की तरफ से प्रकाषक या वितरकों को इसके लिए प्रोत्साहन व आर्थिक सहयोग मिले ताकि वह अधिक रुचि ले पाएं।
सूखी रेत सा जो हम सभी की आंखों के आगे टूट-टूटकर बिखर रहा है... उसे बचाने (संरक्षण और संचय) की चाह, जो बहुमूल्य है और बन्द मुठ्ठी में टिकाकर नहीं रखा जा सकता उसका अनश्वर संचय... रचना की शायद यही सबसे बड़ी अनिवार्यता है और धर्मिता भी ---इसी के अधीन तो प्रकृति और पुरुष दोनों ही सतत रचनाशील रहे हैं... गुफा में रहने वालों से लेकर आज के बृहमांड में बिचरते वैज्ञानिक सभी। यह.भाषा, संस्कृति ...मानवता के सूक्ष्म चक्षाणु , इन्हें तो बचाना ही है, हर पीढ़ी को धाती की तरह अगली पीढ़ीतक पहुंचाना ही है, क्योंकि इनमें ही तो नश्वर मानव के अमरत्व का सार है और किसी भी साहित्य की शायद यही सबसे बड़ी चुनौती भी रही है। संक्षेप में कहूं, तो वही साहित्य, साहित्य (स-हित) है, जो काल की कसौटी पर खरा उतरे, जिसमें सत्यं शिवं और सुन्दरम् तीनों का ही संतुलित समावेश हो; और ऐसे साहित्य का संरक्षण व प्रचार और प्रोत्साहन हर समाज हर मानव का, चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने में हो, मानवता के पारस्परिक उत्थान और सद्भावना के हित में सर्वोपरि कर्तव्य है!
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कविता ( धरोहर)

सूरदास
(कृष्ण की बाल-लीलाओं का जैसा सजीव, सरस और मनोहारी चित्रण सूरदास ने अपने पदों में किया है, वह आजतक अप्रतिम है और हिन्दी साहित्य व कृष्ण भक्तों की अमूल्य धाती है)
1.
जसोदा हरि पालने झुलावै।
हलरावै दुलरावै मल्हावै जोई सोइ कछु गावै।।
मेरे लाल को आउ निंदरिया काहे न आनि सुवावै।
तू काहै नहिं बेगहिं आवै तोको कान्ह बुलावै।।
कबहुं पलक हरि मूंद लेत हैं कबहुँ अधर फरकावैं।
सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि करि सैन बतावै।।
इहि अंतर अकुलाइ उठे हरि जसुमति मधुरै गावै।
जो सुख सूर अमर मुनि दुरलभ सो नंद भामिनी पावै।।
2.
काहू जोगी की नजर लागी है मेरो कुंवर, कन्हैया रोवै।।
घर घर हात दिखावे जसोदा, दूध पीवे नहीं सोवै।।
चारो डंडी सरल सुन्दर, पालने भेजु झुलावै।।
मेरी गली तुम छिन मति आवो, अलख अलख मुख बोलै।।
राई लवण उतारै यसोदा सुरप्रभु को सुलावै।
3.
मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो।
भोर भई गइयन के पाछै, मधुवन मोहि पठायो।
चार पहर बंसीबट भटक्यो, सांझ परे घर आयो।।
मैं बालक बहिंयन को छोटो,छींको केहि विधि पायो।
ग्वाल बाल सब बैरि पड़े हैं, बरबस मुंह लपिटायो।।
यहि लै अपनी लकुटि कंमरिया, बहुतहि नाच नचायो।
सूरदास तब बिंहसि जसोदा,लै उर कंठ लगायो।।
4.
मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ।
मोसौं कहत मोल कौ लीन्हौ, तू जसुमति कब जायौ?
कहा करौं इहि के मारें खेलन हौं नहि जात।
पुनि-पुनि कहत कौन है माता, को है तेरौ तात?
गोरे नन्द जसोदा गोरी तू कत स्यामल गात ?
चुटकी दै-दै ग्वाल नचावत, हँसत-सबै मुसकात।
तू मोहीं को मारन सीखी, दाउहिं कबहुँ न खीझै।
मोहन मुख रिस की ये बातैं, जसुमति सुनि-सुनि रीझै।
सुनहु कान्ह बलभद्र चबाई, जनमत ही कौ धूत।
सूर स्याम मौहिं गोधन की सौं, हौं माता तू पूत॥
5.
मैया मोरी कबहुं बढ़ैगी चोटी।
किती बेर मोहि दूध पियत भइ यह अजहूं है छोटी॥
तू जो कहति बल की बेनी ज्यों, ह्वै है लांबी मोटी।
काढ़त गुहत न्हवावत जैहै नागिन-सी भुई लोटी॥
काचो दूध पियावति पचि पचि देति न माखन रोटी।
सूरदास त्रिभुवन मनमोहन हरि हलधर की जोटी॥
6.
ग्वाली तैं मेरी गेंद चुराई, ग्वाली तैं मेरी गेंद चुराई।
खेलत गेंद परी तेरे अंगना, अंगिया बीच छिपाई।।
काहे की गेंद काहे का धागा कौन हाथ बनाई।
फूलन की गेंद रेशम का धागा जसुमति हाथ बनाई।।
झूटे लाल झूट मति बोलो अंगिया तकत पराई।
जो मेरी अंगिया में गेंद जो निकसे भूल जावो ठकुराई।।
हंस हंस बात करत ग्वालिन सों उतते जसोदा आई।
सूरदास प्रभु चतुर कन्हैया एक गये दो पाई।।
7.
बूझत स्याम कौन तू गोरी।
कहां रहति, काकी है बेटी, देखी नहीं कहूं ब्रज खोरी॥
काहे कों हम ब्रजतन आवतिं, खेलति रहहिं आपनी पौरी।
सुनत रहति स्त्रवननि नंद ढोटा, करत फिरत माखन दधि चोरी॥
तुम्हरो कहा चोरि हम लैहैं खेलन चलौ संग मिलि जोरी।
सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि बातनि भुरइ राधिका भोरी॥
* * *
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मां हिन्दी
कितना और सहे माँ हिन्दी
कितना और सहे-
अपनों से ना कहे तो बोलो
किससे आज कहे-
कितना और सहे माँ हिन्दी...।।
धरती उसकी अम्बर उसका
उसके नदिया नाले
आंगन उसका-घर भी उसका
उसके चाबी ताले
लेकिन उसको जगह नहीं है
जाकर कहाँ रहे-
कितना और सहे माँ हिन्दी...।।
चला गया घर से परदेसी
छोड़ गया है भाषा
उसने सचमुच बना दिया है
हमको एक तमाशा
षडयंत्रों के महाज्वार में
क्यों कर देश बहे-
कितना और सहे माँ हिन्दी...।।
छीन रहे हैं माँ के मुँह से
बच्चे आज निवाला
लगता है दे देंगे हम ही
माँ को देश निकाला
अपमानों के दावानल में
कितना और दहे-
कितना और सहे माँ हिन्दी.
कितना और सहे।।
-बालकवि बैरागी
(साभार प्रवासी टाइम्स)
प्रवास से
आत्महत्या कर ली है
मेरी मां काकी दादी
नानी और परनानी ने
क्योंकि डीलिया स्मिथ
सिखला रहीं हमें
दाल चावल सब्जी
और रे स्मिथ
सिखला रहे रोटी बनाना.....
आओ श्राद्ध करें आज हम
हिन्दी का भारतीयता का
अपनी अस्मिता का
वाल्मीकि और पाणिनी की आत्मा
तर्पण मांगती हमसे
भागीरथी वह सूखी पड़ी
विदेशी हस्तक्षेप से
अपने ही घर में चुप हम
बोलेंगे अब बस यही
बहस होगी हमारे अपने
कल और आज पर
आचरण और व्याकरण
भूले सब हम
विदेशियों से मांग-मांग
अपना ही परिचय
देश भाषा और नाम पता
तुम ही लिख दो श्रीमान
यहां छुके इस माथे पर...
हम तो आज भी
किसी लायक ही नहीं !
.--शैल अग्रवाल
* * *
मेरी भाषा
भाषाओं के ढेर मे
अपनी भाषा तलाशते
आधी उम्र बीती
अपनी भाषा
देश में
अपनी भाषा
परदेश में
अपनी भाषा
दुनिया में
सब अपनी-अपनी भाषाएं
छांट कर ले गए
सब अपनी-अपनी भाषाएं
बोलते हैं
राजसी ठाठ हैं सभी भाषाओं के
मेरी भाषा कहां है
पूर्णिमा बर्मन
***
पारित प्रस्ताव
चर्चों पर चर्चें भी बहुत हो गए
पर्चों पर पर्चे भी बहुत हो गए
और अब तो मेरे दोस्तों
खर्चे पर खर्चे भी बहुत हो गए।
काम नहीं चलेगा अब
अध्याय में विराम से
यात्रा में विश्वास से।
जो लिखा, जो पढ़ा, जो सुना
इस दैर की जिस दौड़ को, हमने चुना
जाती है वह उस सीढ़ी की ओर
जो सीढ़ी जाती है नई पीढ़ी की और।
अब यदि हमने नहीं दी गति
स्वयं को दौड़ कर
ये खर्चे, ये चर्चे, ये पर्चे
सब सो जाएंगे
यहीं, कफन को ओढ़कर!
एकबार फिर,
किनारे ही डूब जाएगी नाव,
हम पर हंसेगा
एक और नया पारित प्रस्ताव।
पद्मेश गुप्त
* * *
मां बोली
पहले अपनी बोली बोलो
फिर चाहे तुम कुछ भी बोलो
इंगलिश बोलो, रूसी बोलो
तुर्की बोलो, स्पैनिश बोलो
अरबी बोलो, चीनी बोलो
जर्मन बोलो, डैनिश बोलो
कुछ भी बोलो लेकिन पहले
अपनी मां की बोली बोलो
अपनी बोली मां की बोली
मीठी-मीठी, प्यारी-प्यारी
अपनी बोली मां की बोली
हर बोली से न्यारी-न्यारी
अपनी बोली मां की बोली
अपनी बोली से नफरत क्यों
अपनी बोली मां की बोली
दूजे की बोली में खत क्यों
अपनी बोली का सिक्का तुम
दुनिया वालों से मनवाओ
खुद भी मान करो तुम इसका
औरों से भी मान कराओ
मां बोली के बेटे हो तुम
बेटे का कर्तव्य निभाओ
अपनी बोली मां होती है
क्यों न सर पर इसे बिठाओ!
प्राण शर्मा
* * *
हिन्दी अपने घर की रानी
हिन्दी नहीं किसी की दासी
हिन्दी अपने घर की रानी
हिन्दी है भारत की भाषा
हिन्दी है गंगा का पानी
हिन्दी अपने घर की रानी।।
1.
भारत में ही जन्मी हिन्दी
भारत में परवान चढ़ी
भारत इसका घर आंगन है
नहीं किसीसे कभी लड़ी
सबको गले लगाकर चलती
करती सबकी अगवानी
हिन्दी अपने घर की रानी।।
2.
खेतों खलिहानों की बोली
आंगन-आँगन की रंगोली
सत्यम्, शिवम्, सरलतम्, सुन्दर
पूजा की यह चन्दन रोली
जनम जनम जन-जन की भाषा
कण-कण की वाणी कल्याणी
हिन्दी अपने घर की रानी।।
3.
भूख नहीं है इसे राज की
प्यास नहीं है इसे ताज की
करती आठों पहर तपस्या
रचना करती नव समाज की
याचक नहीं-नहीं है आश्रित
दा सनातन अवढर दानी
हिन्दी अपने घर की रानी।।
-बाल कवि वैरागी-
* * *
हिन्दी हम सबकी परिभाषा
कोटि कोटि कंठों की भाषा
जन-गण की मुखरित अभिलाषा
हिन्ही है, पहचान हमारी,
हिन्दी हम सबकी परिभाषा।
आजादी के दीप्त भाल की,
बहुभाषी बसुधा विशाल की,
सहृदयता के एक सूत्र में,
यह परिभाषा देशकाल की।
निज भाषा जो स्वाभिमान को
आम आदमी की जुबान को
मानव-गरिमा के विहान को
अर्थ दे रही संविधान को।
ङिन्दी आज चाहती हमसे
हम सब निश्छल अंतस्तल से,
सहज विनम्र अथक यत्नों से
मांगे न्याय आज से, कल से।
-श्री लक्ष्मीमल सिंघवी
* * *
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पिया वही
जो दुल्हन मन भाए
( कहानी-समकालीन)

रेणु 'राजवशी' गुप्ता
नाम था उसका रोजी...। वास्तविक नाम था ' राजेश्वरी सिन्हा '। परन्तु रोजी नाम सबकी जुबान पर ऐसा चढ़ा कि वह सबके लिए रोजी ही बन गई। ' राजेश्वरी सिन्हा' नाम कानूनी दस्तावेजो मे सिमट गया। हम भारतवासी भी अजूबे हैं। अग्रेज चले गए, अग्रेजियत कुछ इस तरह हमारी व्यवस्था पर छा गई कि हम और परतंत्र हो गए। इसलिए गोरा रंग श्वेत वर्ण बहुत लुभावना लगता है। विवाह के विज्ञापन में सांवली कन्या को माता-पिता गोरी या श्वेतवर्णी ही दिखाते हैं। अंग्रेजी नाम भी बड़े भाव से रखे जाते हैं। अतः जूली, रोजी, पिंकी, स्वीटी, बेबी आदि नाम बच्चों से लेकर कुत्तों तक के मिल जाएंगे।
तो सिन्हा दम्पति ने बड़े चाव से अपनी गहरी सांवली कन्या का नाम रोजी रखा था। यह तो मात्र संयोग था कि रोजी जब दो वर्ष की थी तब सिन्हा साहब को अमरीका आने का अवसर मिला। बीस वर्ष पूर्व सिन्हा परिवार अमरीका के छोटे से नगर में आकर बस गया। साथ में आए थोड़े कपड़े लत्ते... रामचरितमानस की प्रति, दीपक, पूजा की सामग्री, मिठाई, अचार, गरम मसाले, पापड़, हींग...। तब यहां यह सब सुलभ नहीं था। बिना हींग के दाल कैसे बनेगी, श्रीमती सिन्हा के लिए यह चिंता का विषय था। जो भी हो, सिन्हा परिवार नवीन वातावरण में र-बस गया।
दो वर्ष की रोजी अपनी मम्मी के साथ घर पर रहती थी। मम्मी की बिहारी एवं टी.वी. की अँग्रेजी में तालमेल बिठाती रहती। सिन्हा दम्पति जब भारत से चले थे, तब टी.बी. का एक ही चैनल आता था । बिजली की अनियमितता के कारण आधे कार्यक्रम देखे भी नहीं जाते थे। अमरीका में रंगीन टी.वी., उस पर बीस-बीस चैनल, सारे दिन तरह-तरह के कार्यक्रम। यह तो भूखे के आगे हलवा रख देने वाली बात हुई। तो रोजी का प्रथम साथी बना टी.वी. और कार्टून पात्र। यह टी.वी. भी चोर की तरह सेंध लगाकर हमारी बुध्धि में प्रवेश करता है और बुद्धि को कब निष्क्रिय बनाकर सोच की शक्ति चुरा ले जाता है, इसका पता बाद में लगता है।
हमारी रोजी भी धीरे-धीरे हिन्दी-बिहारी भूलने लगी। अंग्रेजी बोलने लगी। पांच-छह वर्ष की होते-होते रोजी ने अपने पापा-मम्मी को अंग्रेजी में बात करने के लिए बाध्य कर दिया। जब चार वर्ष बाद सिन्हा परिवार भारत गया, तब रोजी का सिर्फ अंग्रेजी बोलना बहुत ही असुविधाजनक रहा। दादी-नानी से मौसी-बुआ से मेलमिलाप हो ही नहीं सका।
हां तो रोजी का नाम अमरीका में रोजी ही रहा। अब उसका सांवला चेहरा सचमुच गुलाब की भांति गोरे चेहरों के बीच चमकता था। उसका रंग प्रशंसा का पात्र था और काले घने लम्बे बाल सराहने के माध्यम बने।
रोजी अमरीका-भारत, घर-बाहर, हिन्दी-अंग्रेजी के बीच झूलती बड़ी होती गई। पहला झटका सिंहा दंपती को तब लगा, जब बारहवर्षीय रोजी ने बताया कि उसकी सहेली 'डैबी' 'डेट' पर जाती है। बात कुछ इस प्रकार बढ़ी कि शुक्रवार की शाम को रोजी अकेली, उदास बैठी थी। मम्मी ने कहा कि पड़ोस में जाकर खेल आ।
रोजी ने झुंझलाकर उत्तर दिया, 'डैबी डेट पर गई है।'
रोजी तब तेरह वर्ष की थी। यह डेट क्या होती है? कहां से शुरु होकर कहां पहुंचती है? कितनी लम्बी होती है आदि प्रश्न श्रीमती सिन्हा को मथरहे थे। मैं डेट पर क्यों नहीं जा सकती हूं? क्या फर्क है मुझमें और डैबी में ? यदि वह डेट पर जाएगी तो कौन-सा लड़का उसके साथ होगा? वह डेट पर जाना भी चाहती है या नहीं? ये प्रश्न रोजी को भीतर-बाहर उछाल रहे थे। श्रीमती सिन्हा इसी उधेड़बुन में थीं कि यदि रोजी ने डेट पर जाने की इच्छा प्रकट की तो वो किस तर्क से उसे रोकेंगी।
इस घटना के पश्चात् सिन्हा दंपति रोजी पर सूक्ष्म दृष्टि रखने लगे। श्रीमती सिन्हा टी.वी. देखते समय रोजी के पास बैठतीं। क्या कार्यक्रम वह देखती है, फोन पर कितनी लम्बी बात करती है, कौन-से उसकमित्र हैं, किस तरह के परिवार से आते हैं? कभी-कभी रोजी का स्कूल बैग झाड़ लेती थीं, कमरे की सफाई के बहाने कमरे की तलाशी ले लेती थी।
कहते हैं कि संकट में हम अपनी मां को याद करते हैं। प्रवासी भारतीय संकट में अपने धर्म और संकट में अपनी संस्कृति मां को याद करते हैं। रोजी को हिन्दू-धर्म और संस्कृति समझाने और पढ़ाने के प्रयास हुए। आस-पास भारतीय परिवारों के समवयस्क बच्चों की खोज जारी हुई। रविवार को पूजा के कार्यक्रम निर्धारित किए गए।
श्रीमान सिन्हा ने पढ़ रखा था कि बच्चों से सीधा वार्तालाप होते रहना चाहिए। प्रायः शाम को रोजी के साथ बैठते, बातचीत का सिलसिला आरंभ करते, भारतीय विवाह के मूल्यों, अन्य सामाजिक मूल्यों के विषय में समझाते। बाजार ले जाते आइसक्रीम खाने के बहाने रोजी का हृदय टटोलते।
इस तरह पूर्व-पश्चिम की दो नावों पर चलते-चलते रोजी हाईस्कूल में पहुंच गई। समयानुसार अनुकूल-प्रतिकूल परिवर्तन रोजी में दिखाई देने लगे। नित नवीन केश सज्जा, नए-नए रंग के लिपस्टिक , छोटे बेढंगे परिधान, ऊंची हील की सैंडिल में अपनी ही बेटी अपरिचित लगने लगती। षोडशी रोजी अपनी मां से लम्बी थी। बार-बार श्रीमती सिन्हा को टोकना अच्छा नहीं लगता था। लेकिन एक टीस सी उनके हृदय में थी। उनका मन करता कि रोजी के इधर-उधर छितरे बालों को बांधकर चुटिया बना दें। उसकी उंची ड्रेस खींचकर लंबी कर दें। पर वह अधिक कुछ कह नहीं पाती थीं।
उस समय अमरीका में अधिक भारतीय परिवार बसे हुए नहीं थे। अतः रोजी के अधिकतर मित्र अमेरिकन ही थे, जिनके विचार पारिवारिक मूल्य, विवाह के प्रति निष्ठा सिन्हा परिवार के बिल्कुल विपरीत थी। दसवीं कक्षा तक आते-आते होम कमिंग, प्राम आदि एवं डांस पार्टी शुरु हो जाते हैं। रोजी उनमें जाने के लिए सदैव उत्साहित रहती। सिन्हा दंपति कभी हां करते, कभी ना करते। तहकीकात रखते कि रोजी किस लड़के के साथ जा रही है? कितने बजे वापस आएगी? कभी-कभी माता-पिता से छिपकर भी रोजी अपने मित्रों के साथ बाहर घूम आती। सिन्हा दम्पति के लिए यही संतोष था कि रोजी किसी लड़के से अंतरंग मित्रता नहीं हुई थी। कालेज में आकर भी रोजी में विशेष परिवर्तन नहीं हुआ। कभी-कभी डांस पार्टी तक ही सीमित रहा। रोजी के उन्नीस वर्ष में लगते ही सिन्हा दंपति ने रोजी को भारत से आए दो तीन रिश्तों के लिए बताया। उन्होंने दबाव देने के साथ-साथ तर्कसहित समझाया कि अपने धर्म, अपने देश में विवाह करना उचित रहता है। भारत के डाक्टर दामाद की कद्र अमरीका का प्रत्येक गृहस्थ जानता है।
उसी गर्मियों में सिन्हा परिवार ने भारत जाने का कार्यक्रम बना डाला। लड़के वालों को भी आने की सूचना दे दी। श्रीमती सिन्हा ने परोक्ष रूप से विवाह की तैयारी भी कर ली।
इस बार सिन्हा दंपति का उत्साह चौगुना एवं तैयारी दस गुना थी। वे तो मानो दामाद को अपने साथ लेकर आने की तैयारी में थे। जैसे-जैसे समय निकट आ रहा था, रोजी की मनःस्थिति विचित्र हो रही थी। वह स्वयं को उलझन में बंधा हुआ महसूस कर रही थी। एक ओर भारतयात्रा का चाव तो दूसरी ओर माता-पिता का अतिरिक्त उत्साह रोजी के ठहरे हुए मन को उद्वेलित कर रहा था। उसे यह तो आभास था कि उसके रिश्ते की बात होगी, संभवतः वह अपने भावी जीवन-साथी से मिलेगी. परन्तु क्या वही उसके सपनों का साकार रूप होगा? कैसी सूरत होगी, पापा जैसा दीखता होगा या छोटो मामा जैसा, कैसा उसका व्यवहार होगा? चाचा जैसी ऊटपटांग अंग्रेजी बोलेगा तो उसके दोस्त हंसेंगे। क्या उसके दोस्त ' फिल' जैसा होगा? नहीं, नहीं! उसके जैसा कैसे हो सकता है? जैसे पापा-मम्मी से व्यवहार करते हैं क्या वह भी उसके साथ वैसा ही व्यवहार करेगा? वह न तो स्वयं को मम्मी के चौखटे में खड़ा कर पा रही थी और न ही किसी लड़के को पापा के चौखटे में। इसी उहापोह में रोजी के दिन बीत रहे थे।
रोजी ने देख-सुन रखा था कि भारतीय पुरुष घर के काम में सहयोग नहीं करते हैं। वहां अधिकार जमाते हैं। परंतु उसे यह भी ज्ञात था कि भारतीय पुरुष नारी को सुरक्षा-कवच पहनाते हैं। रोजी को या उसकी मम्मी को यह भय नहीं था कि आज शाम पापा वापस घर नहीं आएंगे। या अपनी महिला मित्र लेकर आ जाएंगे और कह देंगे कि तुम्हारा-हमारा कोई संबन्ध नहीं है।
हवाई जहाज में बैठकर रोजी को यही लगा कि वह अथाह सागर के बीच एक छोटी-सी नाव में बैठी है। लहरों से घिरी उसकी नाव डगमगा रही है। सुदूर किनारे पर एक धुंधली-सी आकृति उसका आवाहन कर रही है; परन्तु वह वहां तक पहुंचना भी चाह रही है या नहीं, इसका निर्णय नहीं कर पा रही है।
डगमग नैया में बैठी रोजी भारत पहुंची। सर्वत्र उसके विवाह की चर्चा थी। मामी-मौसी, चाची-बुआ और विशेष रूप से नाना-नानी, दादा-दादी में इस संबंध में अद्भुत उत्साह था। घर-बाहर मानो शहनाई-सी बज रही थी।
श्रीमती सिन्हा ने इस बात का विशेष ध्यान रखा कि सब कार्य रोजी के सुविधानुसार हों. दो-तीन लड़कों की फोटो देखकर बात आगे बढ़ाने के लिए चुना गया। रोजी को ध्यान है , जिस रोज शरद को आना था। हां वही तो था उसके सपनों का बसंत या पतझड़...। रोजी ने स्पष्ट कह दिया था कि वह सलवार कुर्ता ही पहनेगी। उसके सर्वत्र फैले बालों को बांधा गया। श्रीमती सिन्हा ने विशेष हिदायत दी की पटर-पटर करके जल्दी से मत चली आना। आंखें उठाकर, सीधे बात मत करना। लड़के वाले भी काफी संवेदनशील थे। सिंहा दंपति के लिए लड़का डाक्टर था एवं शिक्षित परिवार से था। लड़के वालों के लिए रोजी अमरीका की नागरिक थी। यह पर्याप्त था। चूंकि रोजी ने 'न' नहीं किया था, अतः विवाह की तिथि निश्चित हो गई। समयाभाव के कारण तीन सप्ताह बाद ही विवाह होना निश्चित हुआ।
इधर रोजी के लिए तीन सप्ताह मानो तीन दिन की भांति उड़े जा रहे थे। जिस दिन संबंध तय हुआ रोजी की मनःस्थिति बिल्कुल बदल गई। अब तक जिसे वह लापरवाही से ले रही थी, आज वही बात जीवन की सबसे गंभीर घटना बन गई। विवाह का क्या अर्थ होता है, वह पापा-मम्मी के जीवन से सीख चुकी है। अब रोजी को लगने लगा कि वह संभवतः इतनी शीघ्र इसके लिए तैयार नहीं थी। उन्नीसवर्षीय रोजी शरद के साथ हुई दो-तीन संक्षिप्त भेंटों में कोई तार नहीं जोड़ पाई। इधर रोजी खोई-खोई..., उधर शरद चुप-चुप, कुछ सतर्क। भाषा, परिवेश, अमरीका , भारत ने खासी दखलंदाजी की दोनों के बीच।
अपने-अपने संसार में खोए दो प्राणियों का विवाह घर के आंगन में बनी विशाल वेदी पर हो गया। तन जुड़ना अधिक मायने नहीं रखता, यदि मन न जुड़ा हो। यूं भी रोजी को शीघ्र ही लौटना था। शरद के लिए ' वीसा' के लिए कागज तैयार करने थे। शरद को भी अपनी नौकरी से त्यागपत्र देना था।
अमरीका पहुंचकर रोजी ने कालेज जाना शुरु कर दिया। शरद को बुलाने के सारे कागज श्रीमान सिन्हा ने तुरंत बनवाने आरंभ कर दिए। वे चाहते थे कि शरद अतिशीघ्र अमरीका आकर अपना घर बसाए। रोजी ने एक-दो बार फोन भी किया। फिर दोनों 12 हजार मील दूर अपने संसार में रम गए। जहां शरद अमरीका जाने के दिन उत्कंठा से गिन रहा था, वहीं रोजी निकट आते प्रत्येक दिन को संदेह की दृष्टि से देख रही थी।
एक दिन रोजी अपने मित्रों के साथ पिजा हट गई। वहां का मैनेजर परिचित लगा। यह तो बिलावल है। एक-दो क्लास साथ-साथ ली थीं। तीस वर्षीय विलावल में कैसा आकर्षण था कि उनका प्रथम परिचय शाम के भोजन, शनिवार इतवार को साथ-साथ घूमने से लेकर शयनकक्ष तक ले गया। कहते हैं प्रेम अंधा होता है। यदि मैं कहूं कि प्रेम गूंगा-बहरा भी होता है तो अतिशयोक्ति न होगी।
एक दिन अचानक श्रीमती सिन्हा ने रोजी पर शरद के आगामी रविवार को आने का शुभ समाचार सुनाकर वज्रपात कर दिया। वह तो भूल ही गई थी शरद को...इधर श्रीमती सिन्हा दामाद के आने की तैयारी में तत्पर थीं। उधर रोजी क्या करे, क्या न करे की इसी उलझन में थी। कितना भी वह शरद का चेहरा देखने का प्रयत्न करती , बिलावल का चेहरा उसे ढक लेता। बिलावल ही रोजी के तन-मन पर चिन्हित था। अब वह यह तन-मन शरद को कैसे सौंप दे? तो क्या रोजी विवाह...पति...भारतीय मर्यादा के अर्थ भूल चुकी है? पति भावात्मक ही नहीं सामाजिक सेहरा भी है। विवाहोपरान्त किसी पुरुष का ध्यान भी आना सर्वथा निषेध है। पति के अतिरिक्त किसी का स्थान हो ही नहीं सकता है।
रोजी को यही चिंता थी कि शनिवार को जब उसे शरद के कमरे में धकेल दिया जाएगा तो वह क्या करेगी? यह तन-मन अब शरद को सौंपना, शरद एवं बिलावल दोनों के साथ अन्याय होगा।
आज रोजी के अमरीकन संस्कार मुखरित हो रहे थे। अब तक ओढ़े हुए भारतीय संस्कारों को वह उतार फेंकना चाह रही थी। भीतर-बाहर बिलावल के चुंबकीय आकर्षण में बिंधी रोजी अपना अमरीकन होना दिखाना चाह रही थी। प्रथम रात्रि में ही उसने शरद को जता दिया कि वह अभी किसी प्रकार का संबंध बनाने या बनाए हुए संबंध बढ़ाने के लिए तैयार नहीं है। उसे कुछ समय और चाहिए।
शरद के लिए तो अमरीका, पत्नीगृह या श्वसुरगृह में प्रथम रात्रि थी। क्या-क्या देखना होगा उसे? लंबी यात्रा के बीच संजोई मधुर कल्पनाएँ प्रश्नचिन्ह बन गईं। दिन बीतते गए। रोजी की चाल-ढाल सिन्हा दंपति को खटकने लगी। जितना वे रोजी को शरद के साथ रहने को प्रोत्साहित करते उतना ही रोजी पढ़ाई नौकरी के बहाने दूर भागती।
वह दिन श्रीमती सिन्हा के लिए सबसे अधिक दुखदायी था, जब उन्होंने रोजी बिलावल को हाथ में हाथ लिए देखा। श्रीमती सिन्हा को तो मानो पर्वत-शिखर से सागर तल में धकेल दिया गया हो। शरद रेजिडेंसी खोजने में लगा हुआ था, तन-धन से सिन्हा परिवार पर आश्रित था। रोजी के रवैये ने मन तो कूट-कूटकर मिट्टी में मिला ही दिया था। रोजी-बिलावल के प्रेम-प्रसंग ने जब घर के भीतर प्रवेश किया तो घर धुँआ-धुँआ चिता-सा जल उठा और घर को मरघट बना दिया।
सिन्हा साहब तो न स्वयं को मुंह दिखाने लायक रह गए, न अपने दामाद को। बेटी ने उन्हे हृदय रोग दिया। उच्च रक्तचाप की पीड़ा दी।
शरद के संस्कार-पोषित व्यक्तित्व ने विशालता का परिचय देते हुए कहा 'मैं छह महीने तुम्हारे लिए प्रतीक्षा कर सकता हूँ। मेरे हृदय के द्वार अभी तक खुले हैं।'
सिन्हा दंपति के लिए विवाह एक अटूट बंधन है, पावन संस्था है। रोजी को शरद के पास आना ही होगा अन्यथा उससे कोई संबंधनहीं रहेगा।
रोजी बिलावल के आगोश में इस तरह डूबी हुई थी कि ' मैं बिलावल के अतिरिक्त किसी और व्यक्ति की अपनी जिन्दगी में कल्पना नही कर सकती हूं। विवाह मेरा शरद के साथ हो गया था, परन्तु प्यार मैं बिलावल से ही करती हूं।'
रोजी तुरंत तलाक देने के लिए कोर्ट में अपील करने को व्याकुल थी। सिन्हा साहब ने उसे एक वर्ष तक रोके रखा। जब तक शरद को रेजिडेंसी नहीं मिल जाती एवं ग्रीन कार्ड पक्का नहीं हो जाता है, तब तक रोजी कोर्ट में नहीं जाएगी।
शरद अपनी नौकरी पर भूतपूर्व सास-ससुर के चरण स्पर्श कर अकेला चला गया। रोजी बिलावल के साथ जकर रहने लगी। सिन्हा दंपती अपने नीड़ में अकेले रह गए। अमरीका का यह प्रसाद सिन्हा दंपति को मिल ही गया।
आज हर प्रवासी भारतीय डरे मन से स्वयं से यही प्रश्न कर रहा है कि यदि उनकी बेटी ने भी उनके साथ यही किया तो...!
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शताब्दी

एक्सप्रेस का टिकट
-नरेन्द्र कोहली
" लखनऊ शताब्दी में लखनऊ तक के लिए एक टिकट ।" मैने खिड़की बाबू से कहा।
" फारम भरो।" उसने आदेश दिया।
"फार्म भर कर आपके सामने ऱखा है।" मैने कहा, " अपना सिर उठाइए। उसपर कृपादृष्टि डालिए।"
उसने वह फार्म उठा कर मेरी ओर फेंक दिया," अंग्रेजी में भरो। यह ऐंडा बैंडा लिखा हुआ कौन पढ़ेगा यहां ? झुमरीतलैया समझ रखा है। यह दिल्ली है, कैपिटल औफ इन्डिया। "
"यह ऐंडा बैंडा नहीं है।" मैने कहा, "यह हिन्दी है। भारत की राष्ट्र भाषा।"
" तो इसे राष्ट्र भाषा विभाग में ले जाओ।" वह बोला, " हम तो रेलवे के आदमी हैं। अंग्रेजी में काम करते हैं, जो सारे संसार की मातृभाषा है। "
" गाड़ी दिल्ली से चलेगी?" मैने पूछा।
" बिल्कुल दिल्ली से चलेगी। होनोलुलू से तो चलने से रही।" वह बोला।
" तो दिल्ली हिन्दी प्रदेश है।" मैने अपना स्वर ऊंचा कर लिया।
" नक्शे में है। जरा बाहर निकल कर देखो बाज़ार में एक भी बोर्ड हिन्दी में है? पैखाना उठाने की भी लिखत पढ़त अंग्रेजी में होती है यहां" वह बोला,"प्यारे भाई ! सपनों से जागो। यथार्थ से आंखें मिलाओ। पता नहीं, दिल्ली अंग्रेजों के हृदय में बसती है या नहीं, पर दिल्ली के हृदय में अंग्रेजी बसती है। प्रधान मंत्री से लेकर द्वार द्वार भटकने वाला, साधारण सेल्समैन तक अंग्रेजी ही बोलता है। कोई भला आदमी मुँह खोलता है तो उसमें से अंग्रेजी ही झराझर बरसती है।"
मैने चुपचाप अंग्रेजी में फार्म भर दिया, " यह लो। "
उसने तब भी मुझे टिकट नहीं दिया। एक फार्म और आगे सरका दिया।, " ज़रा इसपर भी अपने औटोग्राफ दीजिए।"
"यह क्या है?"
"पढ़े लिखे हो, पढ़ लो। "
"नहीं! मैं पढ़ा लिखा नहीं हूं। " मैं बोला, " तुम ही बताओ।"
"वह तो मैं पहले ही समझ गया था। अनपढ़ हो, तभी तो हिन्दी हिन्दी कर रहे हो।" वह बोला, " अब जरा ध्यान से सुनो। इस गाड़ी में सारी घोषणाएं अंग्रेजी में होंगी। इस कागज पर लिखा है कि तब तुम कोई आपत्ति नहीं करोगे?"
" हिन्दी में कोई घोषणा नहीं होगी?"
" होगी। पर वह तुम्हें समझ में नहीं आएगी।"
"क्यों? मेरी मातृभाषा हिन्दी है। मैं हिन्दी पढ़ा लिखा हूँ। और हिन्दी में काम करता हूं। " मैने कहा।
" इसलिए कि घोषणा करने वालों का साउंड बॉक्स विदेशी है।" वह बोला, " तो नहीं करोगे न आपत्ति?"
" नहीं करूंगा।"
" करो साइन। "
" मैने हस्ताक्षर कर दिए।"
" अखबार अंग्रेजी का मिलेगा।" वह बोला,"तुम हिन्दी का अखबार नहीं मांगोगे।?"
" हो ना तो यह चीहिए कि सबको हिन्दी का समाचार पत्र दिया जाए?" मैने कहा, " कोई विशेष आग्रह करे तो उसे अंग्रेजी का दे दिया जाए। सब पर अंग्रेजी क्यों थोप रहे हो?"
" टिकट लेना है या नहीं। लखनऊ जाना है या नहीं?"
" लेना है। लेना है।" मैने घबराकर कहा।"
" तो, साइन करो। "
" किया। " मैने हस्ताक्षर कर दिए।
" बैरा अंग्रेजी बोलेगा।" उसने कहा, " तुम्हें बाबूजी नहीं, ' सर' बोलेगा, ' राम राम नहीं करेगा, गलत उच्चारण में 'गुड मार्निंग' कहेगा। नाश्ते को 'ब्रेकफास्ट' कहा जाएगा, खाने को लंच। पानी को वाटर। बिस्तर को बेड। बोलो, आपत्ति तो नहीं करोगे?"
" पर ऐसा क्यों होगा?"
" टिकट चाहिए या नहीं?"
"चाहिए।"
" तो साइन करो। सवाल जवाब मत करो।"
" किया।"
" स्टेशनों और दूसरी चीजों के विषय में जो सूचनाओं की पट्टी आएगी, वह अंग्रेजी में आएगी। हिन्दी की पट्टी की मांग नहीं करोगे।"
" क्यों नहीं करूंगा...यह भारत है...अमरीका नहीं।"
" तो बैलगाड़ी या टमटम से लखनऊ चले जाओ।" वह बोला," शताब्दी एक्सप्रेस का टिकट नहीं मिलेगा।"
" मैने हस्ताक्षर कर दिए।"
" यात्रा के अंत में एक छोटा सा फारम दिया जाएगा, उसे भरना होगा और अंग्रेजी में भरना होगा। तब यह कहकर इंकार नहीं कर सकोगे कि तुम्हें अंग्रेजी नहींआती। जितनी भी आती है, उसी में भरना होगा।"
"पर क्यों ?"
"टिकट चाहिए या नहीं।"
" चाहिए।"
"तो साइन करो।"
"मैने हस्ताक्षर कर दिए।"
"अपनी ओर से किसी से भी कोई प्रश्न अंग्रेजी में नहीं करोगे।"
"क्यों?"
"क्योंकि उनमें से किसी को भी अंग्रेजी नहीं आती।"
"तो फिर यह सब...?"
"टिकट चाहिए या नहीं?"
"चाहिए।"
" तो साइन करो। और हिन्दी में नहीं अंग्रेजी में।"
"मैने हस्ताक्षर कर दिये।"
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 चाँद परियाँ और तितली
बच्चों इसबार हम आपके लिए नार्वे की एक लोककथा लेकर आए हैं। जिसका नार्वेजियन भाषा से हिन्दी में अनुवाद किया है नार्वे के प्रसिद्ध भारतीय मूल के लेखक श्री शरद आलोक जी ने। लीजिए उन्ही की कलम से सुनिए आप, सुन्दर और उत्तरोत्तर बसे इस देश नार्वे के बारे में जहां अर्धरात्रि में भी सूरज उगता है ---
नार्वे

नार्वे विश्व के उत्तरोत्तर (सबसे उत्तर) में स्थित एक छोटा, शान्तिप्रिय और सुन्दर देश है। यहां वर्ष में पांच महीने सर्दी पड़ती है। जून-जुलाई के महीने में नार्वे के उत्तरी भाग जहां पर उत्तरी ध्रुव रेखा जाती है, उसके आस-पास आधी रात को भी सूरज चमकता रहता है इसलिए नार्वे को आधी रात का सूरज वाला देश भी कहते हैं। नार्वेवासियों के रहन-सहन का स्तर विश्व के पांच शीर्ष देशों में है। नार्वे का मुख्य व्यवसाय मझली, पेट्रोल, समुद्री यातायात आदि है। नार्वे की आबादी 45 लाख है। नार्वे का राष्ट्र-धर्म ईसाई है, पर सभी लोगों को किसी भी धर्म को अपनाने और धर्म पालन करने का समान अवसर है। नार्वे के हजारों लोग किसी धर्म को नहीं मानते, उन्हें मानववादी कहते हैं।
नार्वे के लोग ईमानदार और प्रायोगिक होते हैं और अत्याधुनिक आधुनिक हैं। नार्वे के लोग खेल भावना से ओत-प्रोत हैं और स्वतंत्र ख्याल के होते हैं। वे किसी के निजी मामले में हस्तक्षेप नहीं करते और स्वयं निजी स्वतंत्रता पसंद करते हैं। एक छोटा देश होने के अतिरिक्त नार्वे का विश्व की मुख्य संस्थाओं में विशिष्ट स्थान है। श्रीलंका और इजराइल में शान्ति स्थापना में प्रयासरत नार्वे ने भारत को स्वतंत्रता मिलने पर सबसे पहले स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता दी थी।
नार्वे की लोक कथा-
घास में गुड़िया

एक राजा था। उसके बारह बेटे थे। जब वे बड़े हो गए, तब राजा ने उनसे कहा -"तुम्हे अपने अपने लिए एक-एक पत्नी ढूंढकर लानी है। लेकिन वह पत्नी एक ही दिन में सूत कातकर कपड़ा बुने, फिर उससे एक कमीज सिलकर दिखाए, तभी मैं उसे बहू के रूप में स्वीकार करूंगा।"
इसके बाद राजा ने अपने बेटों को एक-एक घोड़ा दिया। वे सभी अपनी-अपनी पत्नी खोजने निकल पड़े। कुछ ही दूर गए थे कि उन्होंने आपस में कहा कि वे अपने छोटे भाई को साथ नहीं ले जाएंगे।
ग्यारह भाई अपने छोटे भाई को अकेला छोड़कर चले गए। वह रास्ते में सोचने लगा कि वह आगे जाए या लौट जाए। उसका चेहरा उतर गया था। वह घोड़े से उतरकर घास पर बैठ गया और रोने लगा। रोते-रोते अचानक चौंक गया। उसके सामने की घास हिली और कोई सफेद चीज उसकी ओर आने लगी। जब वह चीज राजकुमार के पास आई, तो उसे एक नन्ही-सी लड़की दिखाई दी।
उसने कहा- " मैं छोटी-सी गुड़िया हूँ। यहां घास पर ही रहती हूँ। तुम यहां क्यों आए हो? "
राजकुमार ने अपने बड़े भाइयों के बारे में बताया। उसने अपने पिता की शर्त के बारे में भी बताया। फिर उसने गुड़िया से पूछा-" क्या तुम एक दिन में सूत कातकर, कपड़ा बुनकर एक कमीज सिल सकती हो? अगर यह कर दोगी, तो मैं तुमसे शादी कर लूंगा। मैं अपने भाइयों के दुर्व्यवहारों के कारण आगे नहीं जाना चाहता।"
गुड़िया ने 'हाँ' कर दी। तुरंत ही उसने सूत काता कपड़ा बुना और एक छोटी-सी कमीज लेकर महल की ओर चल पड़ा। जब वह महल में पहुंचा तो उसे शर्म आ रही थी, क्योंकि कमीज बहुत छोटी थी। फिर भी राजा ने उसे विवाह करने की अनुमति दे दी।
राजकुमार गुड़िया को लेने चल पड़ा। जब वह घास पर बैठी गुड़िया के पास पहुंचा, तो उसने गुड़िया से घोड़े पर बैठने को कहा। गुड़िया ने कहा- " मैं तो अपने दो चूहों के पीछे चांदी की चम्मच बांधकर उसमें बैठकर जाऊंगी।"
राजकुमार ने उसका कहना मान लिया। राजकमार घोड़े पर सवार हो गया। गुड़िया चूहों के पीछे बंधी चांदी की चम्मच पर सवार हो गई। राजकुमार सड़क के एक ओर चलने लगा, क्योंकि उसे डर था कि कहीं उसके घोड़े का पांव गुड़िया के ऊपर न पड़ जाए। गुड़िया सड़क के जिस ओर चल रही थी, उस ओर एक नदी बह रही थी। अचानक गुड़िया नदी में गिर गई। लेकिन जब वह नदी के अंदर से ऊपर आई, तो राजकुमार के समान बड़ी हो गई थी। राजकुमार बहुत प्रसन्न हुआ।
राजकुमार महल में पहुंचा, तो उसके सभी बड़े भाई अपनी-अपनी होने वाली पत्नियों के साथ वहां आ चुके थे। लेकिन उसके भाइयों की पत्नियों का न व्यवहार अच्छा था , न ही वे सुन्दर थीं। जब उन्होंने अपने भाई की सुन्दर पत्नी को देखा, तो वे सभी जल-भुन गए। राजा को पता चला कि बड़े पुत्रों ने छोटे राजकुमार के साथ दुर्व्यवहार किया है, तो उसने बड़े बेटों की खूब निंदा की। फिर छोटे बेटे को गद्दी सौंप दी। छोटे राजकुमार का विवाह गुड़िया के साथ धूमधाम से हुआ। अब छोटा राजकुमार राजा था और गुड़िया रानी। दोनों सुख से रहने लगे।
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है धरती जैसा ही चंदा

शशिकांत
मम्मी तुम हमको बहलातीं
चंदा को मामा बतलातीं
टीचर ने हमको समझाया
क्या है सारा भेद बताया
समझ गये हम गोरखधंधा
है धरती जैसा ही चंदा
मानव उस पर जा बैठा है
सारा रहस्य वह पा बैठा है।
* * *
गाय

डां. शेरजंग गर्ग
कितनी भोली, कितनी प्यारी
सब पशुओं में न्यारी गाय
सारा दूध हमें दे देती
आओ इसे पिला दें चाय।
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तीज त्योहार

-शैल अग्रवाल
सावन और भादों महीने के मुख्य त्योहार हैं- शिवजी के व्रत और मेले, नागपंचमी, ऱक्षा-बन्धन, हरियाली तीज, अनन्त-चतुर्दशी, श्री कृष्ण जन्माष्टमी, हरितालिका तीज और गणेश चतुर्थी।
प्यार-मनुहार और आभार के कई-कई, बड़े-बड़े पर्व लेकर आता है अगस्त का महीन। भाई बहन के आपसी स्नेह का पर्व, योगेश्वर श्री कृष्ण का जन्मोत्सव और देश की आजादी का उत्सव... राखी, जन्माष्टमी और पन्द्रह अगस्त तीनों का नाम लेते ही यादों की बाढ़ आ जाती है और आंखें मछली सी मचल-मचल स्मृति-प्रवाह से तैर जाती हैं।
व्यक्तिगत स्तर पर राखी की अनगिनत खट्टी-मीठी यादें हैं। भाई-बहन की आपसी छेड़छाड़ और अनगिनत वे मीठे पल जब भाइयों की आरती उतारकर, उनकी कलाइयों पर खुद की बनाई नई-नई डिजाइन की राखियां बांधा करते थे हम...एक दूसरे को मन पसंद मिठाइयां और पकवान खिलाते न थकते थे ...भाई-बहन के प्यार और रिश्ते का महत्व समझते-समझाते पूरा दिन ही मीठी-मीठी यादों और कहकहों में गुजर जाता था...और उस एक दिन, राखी की दुहाई दे-देकर, एक-दूसरे से हंस-हंसकर कुछ भी करवा लिया करते थे।
राखी का त्योहार कब और कैसे शुरु हआ इसके बारे में भी कई-कई कहानियां हैं। मुख्यतः बहन भाई की कलाई पर अपने स्नेह का धागा बांधकर उसकी लम्बी उम्र की कामना करती है, सदा विजयी होने का आशीर्वाद देती है और भाई उसकी मान-मर्यादा और हर खुशी की रक्षा का वचन देता है। इसीलिए राखी के त्योहार को रक्षाबन्धन भी कहते हैं जिसमें महत्व पूर्ण बस भाई बहन का पारस्परिक स्नेह है...वह राखी का एक धागा...या नेह की डोर है जिसको बहन भाई की कलाई पर प्रेम पूर्वक बाधती है और भाई बहन की रक्षा के वचन में उस डोर के साथ आजीवन बंध जाता है।
हर साल ही इस एक दिन को त्योहार की तरह मनाकर भाई-बहन अपने नेह-संकल्प को दृढ़ करते हैं|
अन्य त्योहारों की तरह, रक्षा बन्धन के साथ भी कई कहानियाँ जुडी हुई हैं कि कैसे यह त्योहार मनाना शुरु हुआ| एक कहानी यह भी है कि एक बार राजा इन्द्र की राक्षसों से लडाई छिड गई। लडाई कई दिनों तक होती रही। न राक्षस हारने में आते थे, न इन्द्र जीतते दिखाई देते थे। इन्द्र सोच में पड़गए। वह अपने गुरु वृहस्पति के पास आकर बोले ,"गुरुदेव, इन राक्षसो से मैं न जीत सकता हूँ न हार सकता हूँ। न मैं उनके सामने ठहर सकता हूँ न भाग सकता हूँ। इसलिये मैं आपसे अन्तिम बार आर्शीवाद लेने आया हूँ। अगर अबकी बार भी मैं उन्हें हरा न सका तो युद्ध में लडते लडते वहीं प्राण दे दूँगा। उस समय इन्द्राणी भी पास बैठी हुई थी। इन्द्र को घबराया हुआ देखकर बोली, " पतिदेव, मै ऐसा उपाय बताती हूँ जिससे इस बार आप अवश्य लडाई में जीतकर आयेगे। इसके बाद इन्द्राणी ने गायत्री मंत्र पढ़कर इन्द्र के दाहिने हाथ मे एक डोरा बाँध दिया और कहा, पतिदेव यह रक्षाबन्धन मै आपके हाथ में बाँधती हूँ। इस रक्षाबन्धन को पहन कर एक बार फिर युद्ध में जायें। इस बार अवश्य ही आपकी विजय होगी। इन्द्र अपनी पत्नी की बात को गाँठ बांधकर और रक्षा बन्धन को हाथ में बधवाकर चल पड़े। इस बार लड़ाई के मैदान में इन्द्र को ऐसा लगा जैसे वह अकेले नही लड़ रहे इन्द्राणी भी कदम से कदम मिलाकर उनके साथ लड रही है। उन्हे ऐसा लगा कि रक्षाबन्धन का एक-एक तार ढ़ाल बन गया है और शत्रुओं से उनकी रक्षा कर रहा है। इन्द्र जोर शोर से लड़ने लगे। इस बार सचमुच इन्द्र की विजय हुई। तब से ही रक्षाबन्धन के त्योहार का प्रचलन हुआ। यह त्योहार सावन की पूर्णिमा को मनाया जाता है इसलिये इसे सावनी या सलूनो भी कहते हैं।
परन्तु यह बहन की भाई को राखी बाँधने की प्रथा भारत में राजस्थान से शुरु हुई मानी जाती है। वहां यदि किसी औरत पर कोई मुसीवत आती थी तो वह मनोनीत वीर पुरुष को अपना भाई कहकर राखी भेज दिया करती थी। राखी का मतलब होता था बहिन की रक्षा का भार उठाना। कहते हैं कि एक बार रानी कर्णवती ने बादशाह हुमायूं को इसी उद्देश्य से राखी भेजी थी। वह मुसलमान था फिर भी राखी का न्योता पाकर अपनी मुँहबोली बहिन की रक्षा के लिये आया। कहते हैं तभी से बहिनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बाधने लगी हैं। कहीं कहीं गुरु और शिक्षक भी समाज के समर्थ वर्ग को उनकी दीर्घायु की कामना करते हुए राखी बांधते हैं और बदले में उनसे अपनी और समाज की रक्षा का वचन लेते हैं।
इसी महीने आता है वह लाडला पंद्रह अगस्त का दिन भी...जिसके लिए हम भारतीयों के मन में एक अलग ही गौरव, एक पूरा इतिहास है। पूरे देश ही नहीं, पूरे विश्व में ही हर भारतीय इस दिन मन ही मन भारत से जरूर ही जुड़ जाता है। भारत में तो बच्चे-बड़ों सभी के लिए यह आज के स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा त्योहार है ही। और यह जोश व श्रद्धा सुबह से ही दिखने लग जाती है। बच्चे-बच्चे का सुबह-सुबह ही सफेद उजले कपड़े पहनकर ध्वजारोहण के लिए जाना और अभूतपूर्व उत्साह मन में लिए वे देशभक्ति के तरह-तरह के गीत समवेत स्वरों में गाना और हर बोल का उपस्थित हर मन पर गहरा और स्थाई असर छोड़ जाना, याद दिलाना कि इस आजादी के लिए पूर्वजों और अग्रजों ने क्या -क्या त्याग नहीं किए ...सुख-चैन क्या, अपनी जानतक वार दी थी देश पर...कभी-कभी तो शायद यह तक सोचना कि उस समय क्यों नहीं पैदा हुए हम, जाने कितने युग पुरुषों को एकसाथ देखने सुनने का अवसर मिल जाता!
विध्यालय के प्रांगण में लहराते तिरंगे से उड़ती वे सफेद गुलाब और गेंदे की केसरिया पंखुरियां हरी पत्तियों के संग-संग जब जन-गण-मन की स्वर-लहरियों पर तैरती हुई परिसर में बिखरती हैं, तो पूरे ही तो रंग जाते हैं सब, हरे सफेद और जोगिया, तिरंगे के तीन रंगों में... और एक वह गीत जो कोई गाए या नहीं गाये, स्वतः ही दिनभर कानों में गूंजता रहता है...' मेरा रंग दे बसंती चोला.. '।
वैसे भी ये वे दिन हैं जब बातबात पर मन रोमांचित हो उठता है...उमंगों के पंख-चढ़े पैर हवा से बातें करते हैं और सपनों में डूबी देश की युवा आंखें देश और समाज के लिए...परिवार के लिए नित नए संकल्प लेती हैं। हम सभी तो कभी कुछ ऐसे ही थे और फिर हरसाल ही तो एक साल और सयाने हो जाया करते थे ...देश, परिवार, इतिहास और रीत-रस्मों के बारे में कुछ और नया जानने व सीखने के लिए...।
अभी एक जोश और उल्लास से उबर ही पाते हैं हम कि जन्माष्टमी की धूम शुरू हो जाती है...
भगवान श्री कृष्ण का भादो कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन जन्म हुआ था। इस स्मृति में जन्माष्टमी का त्यौहार आज भी भारत के विभिन्न प्रान्तों में विशेषतः उत्तर प्रदेश और राजस्थान में खूब ही धूमधाम से मनाया जाता है। कृष्ण आज भी भारतीय चेतना में ज्ञान और आनन्द के प्रतीक हैं। कर्मयोगी हैं। जो जी भरकर जीने में...शाश्वत आनन्द में विश्वास करते हैं। रास रचाते हैं। मुरली बजाते हैं। भक्तों के भक्त हैं और दुष्टों से संहारक हैं। बचपन से ही उन्हें नवनीत या जो कि मूल तत्व है, वही पसंद है। त्वरित बुद्धि हैं साथ में नीर क्षीर विवेकी भी, इसीलिए योगेश्वर कहलाए। होठों पर सुख -शांति और आनंद का संगीत है। बांसुरी है और उंगलियों पर दुष्ट संहारक चक्र। सर पर मोरपंख है जिसकी आंख दिव्य दृष्टि की तरह सब देख और समझ रही है। नेह, कपट, धूर्तता, सरल वात्सल्य सब। कृष्ण समय और परिस्थितियों के पारखी हैं। गोकुल में माखन खाने वाले ने वृंदावन में रास रचाया और मथुरा जाकर शंखनाद किया चक्र उठाया। चक्र जो असुरों को भ्रमित करता है। नचाता- दौड़ाता है। उनका नाश करता है। ऐसे अलौकिक सखा कृष्ण की तरफ हम आज भी आत्मोत्थान के लिए देखते हैं। शान्ति सुख चैन के लिए देखते हैं। भगवान मानते हैं और उनके जन्मोत्सव पर प्रमुख मंदिरों में आज भी कृष्ण लीला की झाकियाँ सजती हैं । जगह-जगह शोभायात्रा निकाली जाती हैं और आधी रात को कृष्ण जन्म के बाद ही श्रद्धालु भोजन करते हैं।
बड़ों के ब्रजवासी(हमारी पीढ़ी शुद्ध बनारसी थी) होने की वजह से हमारे यहां भी जन्माष्टमी का एक विशिष्ट महत्व था और हर साल ही जन्माष्टमी बहुत ही उत्साह व धूमधाम से मनाई जाती थी। बीसियों वे झांकियां जो हम भाई बहनों ने मिलकर हर साल ही सजाई थीं, आजभी तो रेखांकित हैं मानस पटल पर! घर के बड़ों का व्रत होता था जन्माष्टमी के दिन, पर हम बच्चों को खुली छूट थी फलाहारी पकवान और मेवा से बने तरह-तरह के व्यंजनों का दिनभर भोग लगाते रहने की। एक अथक उत्साह से भरे सुबह-सुबह ही गंगा जल से धुले पूजा के उस कमरे में जब हम मां, दादी,ताई, चाची, सभी की रंग-बिरंगी और मंहगी बनारसी साड़ियों को (चाहे वे चाहें या न चाहें) दीवार पर लटका दिया करते थे तो तुरंत ही वह कमरा एक अद्भुत दिव्य रेशमी आभा से झिलमिलाने लग जाता था। फिर इसपार से उसपार तक कमरे को ढकते दो बड़े तख्त बिछवाए जाते थे, जिसपर कृष्ण-लीला की झांकी के लिए मंच बनता था और उनपर सफेद बुर्राक नयी पल्लियों के बिछते ही मन एक अजीब शान्ति और सौम्यता से भर उठता था। फूल-माला, तुलसी व कदम्ब और वैजन्ती के फूलों से गुंथी अशोक के पत्तों की बनी, मनोहारी बन्दनवार के लटकते-लटकते तो अच्छी तरह से महसूस होने लगता था कि आज का दिन विशिष्ट है और श्री कृष्ण व कृष्ण-लीलाओं को ही समर्पित है। बुरादे को रंग-रंगकर बेहद लगन और धैर्य के साथ सड़कें बनाई जाती थीं, बाग-बगीचे , पूरी मथुरा नगरी और नंदगांव सभी कुछ बनता था। घर के बड़े-बूढ़े, नौकर चाकर सभी को लपेट लेते थे हम अपने उस बाल-सुलभ जोश में। कोठरी से वह भारी बक्सा निकलवाया जाता था जिसके अन्दर सजे-धजे बैठे कृष्ण भगवान गोपियों सहित पूरे साल आराम फरमाते रहते थे...और तब राधा कृष्ण ही नही, वासुदेव, देवकी, यशोदा ,राजा नन्द व गोपी, ग्वाले...यहां तक कि कंस और उसके तरह तरह के राक्षस, गाय-बछड़े सभी तो निकल आते थे अपना वार्षिक दर्शन देने के लिए।
बेहद तरतीब और लगन से सजते थे वे कृष्ण-लीला से जुड़े भांति-भांति के खिलौने---वासुदेव की टोकरी में बैठे नंदगांव जाते कृष्ण, जिनकी वर्षा से रक्षा स्वयं शेषनाग कर रहे होते थे और यमुना नदी का पानी जो उनके पैर छूने के लिए ही उमड़ आता था व नवजात कृष्ण के पैर छूते ही, तुरंत ही उतर भी जाया करता था...सभी कुछ तो अनहोने आश्चर्य से भर देता था मन को।
माखन खाते कृष्ण, पूतना वध करते कृष्ण, और बिजली के सहारे घूम-घूमकर रासलीला करते कृष्ण---जितनी गोपियां उतने कृष्ण...पूरा वह कमरा ही कृष्णमय हो उठता था , फूलों और धूपबत्ती से महकता-गमकता। दिन भर कृष्णलीला के तरह-तरह के गीत गूंजते रहते थे चारो तरफ ...हारमोनियम ढोलक और मंजीरे लिए बैठी भक्त मंडली के साथ-साथ, कमरे-कमरे रेडियो पर और मां-दादी के होठों पर भी। मानो जैसे उस एक दिन के लिए हमारा घर, घर न होकर, नन्दगांव, बरसाना बन जाता था, मथुरा बृंदावन बन जाता था। सामने बड़े-बड़े थालों में तरह-तरह के मेवा-पकवान और कतरियां व फल-फूल सजे रहते और वहीं रंग बिरंगी बत्तियों की आभा में झिलमिलाते हम सभी बच्चे-बूढ़े पालथी मारे बेसब्री से रात का इन्तजार करते, जब एक तरफ मथुरा के मन्दिर से कृष्ण के जन्मोत्सव का रेडियो पर आंखों देखा हाल आता और दूसरी तरफ शंखनाद और घंटों की आवाज के बीच चांदी के पालने में खीरे के अन्दर छुपे लड्डू गोपाल हमारी कौतुकमय और नींदभरी आंखों के आगे पुनः जनमते। अजीब उल्लास और भक्ति की लहर छा जाती थी खुशी से दमकते चेहरों पर, जितना उल्लास सजे-धजे पालने में बैठे कृष्ण को झुलाने का होता था उतना ही स्वादिष्ट प्रसाद- पंजीरी और चरणामृत पाने को भी तो...।
औरफिर अंत में वह पहली बार इंगलैंड आने के कुछ महीने बाद ही, भाई का आंसू भीगा पत्र, जिसमें लिखा था अबकी बार जन्माष्टमी पर कुछ अच्छा नहीं लगा, कोई उत्साह नहीं था कहीं, आप जो नहीं थीं। मानो विछोह के उस पल ने हमें दूर ही नहीं किया, जीवन की जिम्मेदारियों से बांधकर, तुरंत ही बेबस होना...बड़ा होना भी सिखला दिया। और तब पहली बार पता चला कि स्नेह जो हमें जी भर-भरकर पुलकाता है, रुलाता भी है ... इतने वर्ष बाद, आज भी, चाहे-अनचाहे याद आ ही जाता है सब।

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ज्ञान-भारती

बृंदावन जाऊंगी
-योगेश्वर
'तुम्हारी राजधानी न भावै राणा वृंदावन जाऊंगी।' मीरा का यह संगीत संपूर्ण भारत का संगीत है। भारतभूमि का संगीत-संदेश है। संतों, भक्तों महात्माओं की साधना का संगीत है। राजधानी नहीं, वृंदावन भारत का अंतर्मुखी जीवन-संदेश-वृंदावन चलो। राजधानी छोड़ो। सुख-शान्ति राजधानी नहीं वृंदावन में है। जहां आनन्द कृष्ण की मुरली बज रही है। नाम ले-लेकर बज रही है। 'नाम समेतं, कृत संकेतं '। वृंदावन जाने का संकेत। राधा-राधा कहकर बज रही है। मीरा, मीरा बोल रही है। वन-पर्वतों, नदी-झरनों, पथ-वीथियों आदि के घेरों को तोड़ती-फोड़ती बज रही है। कहीं कोई दीवार नहीं। रोक रुकावट नहीं। देश-काल की सीमा लांघती भारत के कोने-कोने में बज रही है। वंशी धुन सुनने के लिए काल ठहर गया है। असंख्य कानों, अंतहीन, अनंत रोमछिद्रों से सुनी जा रही है। मुरली ध्वनि की हवा बह गई है। मंद-मंद मुरली वायु। मुरली की मंद-मंद वायु । सभी दिशाओं में एक साथ बह रही है। खिड़की दरवाजों का कोई बन्धन नहीं। आंगन, अमराई एवं करील कुंजों में बज, बह रही है।
वृंदावन की इस मधुर ध्वनि को राजस्थान में मीरा, बंगाल में चैतन्य, असम में शंकरदेव, माधवदेव, तामिल आलवार, तैलंग वल्लभाचार्य, निंबार्क, महाराष्ट्र के महानुभाव, विठ्ठल भक्त, कन्नड़ के मध्वाचार्य, गुजरात में नरसी आदि सुन रहे हैं। यह ध्वनि संपूर्ण भारत को जोड़े हुए है। कंधार के महानुभाव मंदिर में भी यह ध्वनि गूंज रही है। सभी दिशाओं के कान खुल गए हैं। असंख्य रोमांचित हैं। कोटि-कोटि कान, दिशा-विहीन कान ब्रजबल्लभ के संगीत से उद्वेलित हैं। सृष्टि में पहली बार ऐसा मधुर, मोहक संगीत बजा है। नहीं, बजता नित्य है। संगीत सनातन है, अनादि, अनंत है। पहले के लोगों ने भी सुना होगा, हम नहीं जानते। शायद महाभारत के शंखनाद में यह संगीत दब गया हो। कौन बताए? आज तो सभी जातियों, वर्गों, धंधों के स्त्री, पुरुष यह संगीत सुन रहे हैं। चांदनी रात में, अंधेरे के शून्य में यह ध्वनि और मधुर-मादक बन जाती है। यह परा वाणी है। जन-जन की परा, पश्यंती, मध्यमा से एकाकार हो रही है। परा की परिणति वैखरी गूंगी होकर चिल्लाती है---कृष्ण...कृष्ण...कृष्ण। कृष्ण पुकार साकार हो गई है। लोक और वेद साथ-साथ बज रहे हैं। सन्यासी और गृहस्थ दोनों प्रणत हैं। दोनों के हृदय में बज रही है।
यह ध्वनि वसंत की प्रतीक्षा नहीं करती। स्वयं वसंत हैं। वसंत बनाती है। इसे सुनकर वसंत भागता आता है। मधु भी, माधव भी। मधूक पुष्पों में रस छलक रहा है। पलाश वन दहक रहे हैं। रस लोभी भ्रमर सहकार के लिए दौड़ रहे हैं। आधी रात पावलों ने अपना हृदय खोल दिया है। लोक मन में उचाट है। भोग छूट रहा है। घर वन और वन घर हो रहा है। वृंदावन की गोपियों ने घर छोड़ दिया है। पति, पुत्र, माता-पिता, गुरुजन कुछ भी नहीं। जो जैसे हैं वैसे ही भागी आ रही हैं। रेती पर रमण, रेती रमण। कृष्ण...कृष्ण...कृष्ण...क्या चमत्कार है इस बांस बंसुरिया में? माधव की मादक मदिरा भरी फूंक में? सारे कंठ कृष्ण-कंठ हो गए हैं। कंठ-कंठ में कृष्ण हैं। टहकार चांदनी का रास शुरु हो गया है। चंद्रमा का आनन्द प्रकाश है। आनन्द...आनन्द...और आनन्द ...अनन्त आनन्द। आनक दुंदुभि के नंदन का आनंद नाद।
कृष्ण में कर्ष है। खींचना। खींचते जाना। कृष्ण सबको खींच रहे हैं। सबकी ओर खिंच रहे हैं। राधा पर खिंचे हैं, गोपी भाव में खिंचे हैं। राधा...राधा...राधा...राधा कृष्ण पर खिंची है। कृष्ण, कृष्ण पुकार रही है। श्रंगार बाधन बन गए हैं। प्रियपथ पर चलती, कहते श्रृंगार राधा में माधव के, माधव में राधा के श्रृंगार बज रहे हैं। एक कृष्ण अनेक हो गए हैं। एक-एक गोपी गले | |