14 सितम्बरःहिन्दी दिवस पर विशेषः
हिन्दी ही आखिर क्यों???

जब तक आपके पास राष्ट्रभाषा नहीं आपका कोई राष्ट्र भी नहीं।
मुंशी प्रेमचन्द

लोकतंत्र हिन्दी के बिना चल नहीं सकता और यदि चलता है तो झूठा है। ...आज भाषा का संबन्ध विस्तृति से इतना ही जितना सस्कृति से है। आज संस्कृति के नये दायरे बन रहे हैं। मनुष्य संवेदना की खोज कर रहा है और हिन्दी उसकी सेवा मे उपस्थित है।
जैनेन्द्र कुमार

नागरी लिपि में सभी भारतीय भाषाएँ लिखी जाने पर उनमें भेद की दीवारें समाप्त हो जाएँगी।
अज्ञेय

हिन्दी हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक व्यवहार में आने वाली भाषा है।...देवनागरी दुनिया की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है।
राहुल सांकृत्यान

अगर हम सधारण बुद्धि से काम लें, तब हमें पता पता चलेगा कि हमारी कौमी ज़बान हिन्दी ही हो सकती है।
सरोजनी नायडू

जिसके लिए हमारी जनता का हृदय फट चुका है, उसकी भाषा अंग्रेजी के प्रति अपना मोह हमें छोड़ देना चाहिए।
रामधारी सिंह दिनकर

यदि हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के विरुद्ध अंग्रेजी के षडयंत्र को विफल न किया गया तो जनतंत्र मखौल बनकर रह जाएगा।
श्री नरायण चतुर्वेदी

हिन्दी से किसी भी भारतीय भाषा को भय नहीं है, यह सबकी सहोदरा है।...दक्षिण की भाषाओं ने संस्कृत से बहुत कुछ लेन-देन किया है, इसलिए उसी परम्परा में आई हुई हिन्दी बड़ी सरलता से राष्ट्रभाषा होने के लायक है। हिन्दी प्रेम और सौहार्द की भाषा है। आजादी के लिए लड़ाई के समय हिन्दी देश की एकता और राष्ट्रीयता की भाषा रही है। ऐसी भाषा कभी भी विघटन की भाषा नहीं हो सकती।
महादेवी वर्मा

हिन्दी हमारे राष्ट्र की अभिव्यक्ति का स्त्रोत है।...हिन्दी में जो ध्वनि संगीत है, जो शांति की सूक्ष्म झंकार परिव्याप्त है, जो पवित्रता है वह बेजोड़ है। भावी मनुष्यत्व के तत्वों से हिन्दी परिपूर्ण होगी। भविष्य में संस्कृति का जो नवीन संस्करण होगा, उसे हिन्दी अपने में समाहित करेगी।
सुमित्रानन्दन पंत

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समुद्र के किनारेः

-वंशीधर त्रिपाठी
जैसे मौसम के अनुसार पक्षी एक स्थान से उड़कर दूसरे स्थान पर चले जाते हैं वैसे ही मेरी भी आदत बन गई है। जाड़े में जब उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड पड़ती है, लोगों की कपकपी छूटती है तो मैं दक्षिण भारत की ओर सरक जाता हूँ। इस बार वाराणसी से उड़कर मैं चेन्नई आ गया हूँ। यहाँ मेरी पुत्री पूनम रहती है। उसके पति नितिन पांडेय यहाँ नेस्ले कंपनी में कर्यरत हैं। यहाँ पूनम का परिवार वाल्मीकि नगर में रहता है। यहाँ से समुद्र का किनारा पास में ही है। समुद्र की ध्वनि पूनम के आवास (श्रीकृपा) से सुनाई पड़ती है। समुद्र की यही ध्वनि ब्राह्म मुहूर्त में मुझे जगाती है। बिस्तर पर पड़ा-पड़ा मैं समुद्र-गीत सुनता रहता हूँ। फिर बिना किसी को जगाए चल पड़ता हूँ समुद्र दर्शन के लिए। ज्ञातव्य है कि बाहर जाते समय दरवाजा ओठगाने पर स्वचलित रूप से उसमें ताला लग जाता है।
मैं समुद्र के किनारे आ जाता हूँ। क्या बताऊँ कैसा लग रहा है वहाँ, सबकुछ वर्णातीत है। समुद्र के किनारे टहलता हूँ। ठँडी-ठँडी हवाएँ मुझे स्पर्श करके आगे बढ़ जाती हैं। समुद्र के किनारे बालू की राशी से लहरें टकराती हैं। इस टकराव से उनका नीलापन समाप्त हो जाता है, वे सफेद हो जाती हैं। अरे, यह तो गुणात्मक परिवर्तन है। कहाँ नीलापन, कहाँ सफेदी! सबकुछ ' टकराहट' का परिणाम है। ऐसा माना जाता है कि टकराहट से नए गुणों की उत्पत्ति होती है। वस्तु में प्रच्चन्न गुणों का उद्भव टकराहट से ही तो होता है। किसी उर्दू शायर ने ठीक ही कहा है--- ' सुर्खरू होता है इन्साँ ठोकरें खाने के बाद/रँग लाती है हिना पत्थर पे पिस जाने के बाद।' अरे हाँ, कार्ल मार्क्स ने भी तो कुछ ऐसी ही बात कही थी। उसने कहा था -टकराव (संघर्ष) की स्थिति में मात्रात्मक से गुणात्मक परिवर्तन होता है। समुद्र के नीले जल का सफेद होना गणात्मक परिवर्तन ही तो है। मुझे लगता है। मुझे ऐसा लगता है कि कार्ल मार्क्स का यह सिद्धाँत जड़-जगत में तो लागू होता है, पर चेतन जगत्, मानव जगत् इस सिद्धांत की सीमा से बाहर पड़ता है। चेतन जगत् का व्यापार जड़-जगत की भांति यंत्र चलित नहीं होता। इसलिए जड़-जगत् से संबंधित उक्तियों एवं दृष्टांतों को चेतन-जगत् पर आरोपित नहीं करना चाहिए। मार्क्स ने अपने सारे दृष्टांत जड़-जगत् से उठाकर चेतन् जगत के मस्तक पर चस्पाँ कर दिए हैं। दृष्टांतों की यही तो कमी है। इनकी सहायता से बात तो झट से समझ में आ जाती है, पर इनसे विषय की यथार्थ व्याख्या नहीं हो पाती।
साहित्य और दर्शन में तो दृष्टांतों की भरमार है। दृष्टांतों के माध्यम से लोगों के मस्तिष्क में ऐसी-ऐसी बातें भर दी जाती हैं, जो यथार्थ से कोसों दूर होती हैं। इस संबंध में साहित्य से एक उदाहरण। 'उत्तररामचरितम्' में भवबूति कहते हैं--- ' जैसे एक ही जल भँवर, बुदबुद और लहरों का रूप धारण कर लेता है वैसे ही करुण रस निमित्त भेद से भिन्न-भिन्न रसों में रूपान्तित होता है।'
एको रसः करुण एव निमित्तभेदाद्
भिन्नः पृथक् पृथगिवाश्रयते विवर्तान्।
आवर्तबुदबुदतरड्गमयान् विकारा
नम्भो य़था सलिलमेव हि तत्समस्तम्।।
यहाँ कवि ने यह मान लिया है कि तत्वतः रस अनेक नहीं, एक है करुण। इसी एक करुण रस का रूपांतरण विभिन्न स्थितियों में होता रहता है जिससे अन्य रसों की सृष्टि होती है। मुझे ऐसा लगता है कि करुणरस को महिमामंडित करने के लिए कवि ने जल के दृष्टांत का सहारा लिया है। यह दृष्टांत यथार्थ पर परदा डालता है। वास्तविकता यह है कि विभिन्न रसों की अपनी अलग-अलग सत्ता होती है। हाँ, इनका अधिष्ठान एक होता है, मानव-चित।
अरे, मैं कहाँ से कहाँ चला गया। कहाँ समुद्र का यह मनोरम दृश्य, कहाँ मार्क्स की नीरस व्याख्या और भवभूति की कल्पनात्मक उड़ान। हाँ, तो समुद्र के किनारे मुझे केकड़े दिखते हैं। लहरें आती हैं, उनका घरौंदा बिगाड़ देती हैं। थोड़ी देर में किलबिलाते हुए वे अपने बालू-घर से बाहर आते हैं और तीर की तरह दूसरी ओर भाग जाते हैं। इतने छोटे जीव को भी अपने प्राण-रक्षा का ढंग आता है। कितना गहरा है प्रकृति का रहस्य। किसने इन क्षुद्र जीवों को बताया है कि खतरे की स्थिति में क्या करना चाहिए। मेरे पैर मुझे ढोकर आगे ले जा रहे हैं। एक जगह कुछ मछुआरे मिलते हैं। वे समुद्र में अपना जाल फैलाते हैं। जाल का एक सिरा एक के हाथ में और दूसरा सिरा दूसरे के हाथ में। कुछ देर बाद वे जाल लिए-दिए बाहर आते हैं। उनके जाल में कुछ मछलियाँ फँस जाती हैं। जाल किनारे पर फैलाकर एक मछुआरा उसमें फँसी मछलियों को बीनता है। कमर में लटके अपने छोटे जाल में उन्हें डालकर समुद्र में फिर उतरता है। कमर के जाल में रखी मछलियों को शायद यह भ्रम हो सकता है कि वे पुनः अपने घर आ गई हैं, पर जाल की सीमा उन्हें यथार्थ का बोध कराती होगी। अब उनका निस्सीम घर ससीम हो गया है। वे जल में रहते हुए भी जल में नहीं हैं, जाल में हैं। 'जल' और 'जाल' इन दोनों शब्दों में अंतर तो एक मात्रा का ही है, पर मात्रा का यह अंतर अर्थ में, यथार्थ में कितना अंतर पैदा कर देता है, यह तो आप मछलियों से ही पूछें।
हाँ, तो मछुआरों का मत्स्य व्यापार चल रहा है। लहरों का अपना व्यापार चल रहा है। मैं समुद्र के किनारे टहलते-टहलते आगे बढ़ रहा हूँ। फिर पास में दिखता है एक शिव-मन्दिर। किनारे से चलकर मैं शिव-मन्दिर पर पहुँच जाता हूँ। वहाँ मूर्ति के सम्मुख 'शिवमहिम्नस्त्रोत' का सस्वर पाठ करता हूँ। आस-पास के तामिल-भाषी लोग मुझे सस्वर पाठ करते देख मेरी ओर आकर्षित होते हैं और मुझे ध्यान से सुनते हैं। भारतीय संस्कृति का यह विस्तार मेरे मन में आल्हाद पैदा करता है। आपको शिव-मन्दिर कश्मीर में मिलेगा, कन्याकुमारी में मिलेगा , राजस्थान -गुजरात में मिलेगा, असम में भी मिलेगा, पूरे भारत में मिलेगा।
प्रार्थना के बाद मैं मंदिर के चबूतरे पर बैठ जाता हूँ। सामने विशाल समुद्र लहरा रहा है। मछुआरों की छोटी-छोटी नौकाएँ दूर समुद्र में तैरती दिखती हैं। नौकाओं से उछलकर मेरी दृष्टि लहरों पर चली जाती है। मन अतीत की ओर बेतहाशा भागता है। कौतुहल जगता है, आखिर कब से यह समुद्र लहरा रहा है? इसके किनारे बसी कितनी पीढ़ियाँ इन लहरों को देखते-देखते मृत्यु की गोद में समा गईं। क्या कभी ये लहरें सोती भी हैं? जब दिन-रात ये चलती ही रहती हैं तो आखिर सोती कब हैं? आदमी रात में सोकर प्रातः समुद्र के किनारे आता है पर लहरें तो रात में भी जागती रहती हैं। ये कभी सोती ही नहीं। विगत हजारों-लाखों वर्षों से इसी प्रकार जाग रही हैं। ये लहरें साक्षी हैं मानव विकास की। हजारों-लाखों वर्ष पूर्व मानव का क्या रूप था, आज क्या रूप है, लहरें दोनों स्थितियों की साक्षी हैं। समुद्र की छाती पर पहले नाव चलती थी, बेड़े चलते थे, आज जलयान चल रहे हैं। समुद्र के आकाश पर वायुयान उड़रहे हैं। समुद्र सारा कुछ देखता आ रहा है और आगे भी देखता रहेगा। मानव-संस्कृति की विकास यात्रा का असली साक्षी तो समुद्र ही है। वैसे वस्तुस्थिति का यह उज्ज्वल पक्ष है। दूसरा एक घिनौना पक्ष भी है, जो पहले भी था और आज भी है। आज भी समुद्र के किनारे नंग-धड़ंग लोग पेट-खलाए घूमते रहते हैं। आज भी झोपड़ियां हैं। इन झोपड़ियों में आधुनिक युग की किसी सुख-सुविधा का नामोनिशान तक नहीं है। हजारों-लाखों वर्ष पूर्व जिस स्थिति में लोग रहते थे उसी स्थिति में रहने वाले आज भी यहाँ हैं।
मंदिर में बैठे-बैठे एक बार फिर समुद्र का नीलापन मेरे मन पर छा जाता है। फिर तो राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त की पंक्तियाँ मेरे होठों पर इठलाने लगती हैं---
नीलांबर परिधान हरित पट पर सुंदर है,
चंद्र-सूर्य युग मुकुट मेखला रत्नाकर है।
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की,
हे मातृभूमि तू सत्य ही सगुण मूर्ति सर्वेश की।
समुद्र से दृष्टि समेटता हूँ तो क्या देखता हूँ कि मन्दिर के पास पोलाव के कुछ कण बिखरे पड़े हैं। कौए उन्हें चुगने के लिए आपस में लड़ते हैं। उनके साथ उनके छोटे बच्चे भी हैं। छोटे बच्चे स्वयं दाना नहीं चुगते। मादा कौआ दानों को अपनी चोंच में भरकर बच्चों के खुले मुँह में डालती है। बच्चे दानों को गटककर फिर अपनी चोंच खोल देते हैं। अब मादा कौआ खुद खाए या बच्चों को ही खिलाती रहे। मैं देखता हूँ, मादा कौआ खिलाती ही जा रही है बच्चों को, स्वयं नहीं खाती। तो यह है ममता का जाल। मादा कौए को उसकी माता ने खिलाया और वह अपनी संतान को खिला रही है, यह है प्रकृति। इसमें किसी संस्कृति, किसी ज्ञान की आश्यकता नहीं, यह प्राणिणात्र की प्रवृत्ति है। जलचर, थलचर, नभचर, पशु-पक्षी, अंडज, पिंडज सभी में यह प्रवृत्ति पाई जाती है। संभवतः स्वेदज और उदिभज जगत इस प्रपंच से मुक्त है।
संतति की ममता प्रकृति है, सहज प्रवृत्ति है। संस्कृति इस प्रवृत्ति में थोड़ा सौष्ठव लाती है। संस्कृति पूर्वजों, अग्रजों की भी सेवा का पाठ पढ़ाती है। स्वाभाविक रूप से लोग अपनी संतान का भरण-पोषण करते हैं। सांस्कृतिक प्रभाव के कारण इस वृत्ति में प्रतिलोमता आ जाती है। जब लोग संस्कृति की उपेक्षा करते हैं तो समाज में विकृति का वातावरण पैदा होने लगता है।
मैं मंदिर के चबूतरे पर बैठे-बैठे ऊबने लगता हूँ और पास में सड़क पर टहलने के लिए चल पड़ता हूँ। सड़क के किनारे सीमेंट की कुछ बेंचे बनी हैं। इन्हें ए. राम सुब्बू ने बनवाया है। सभी बेंचों पर उसका नाम उत्कीर्ण है। मैं रामा सुब्बू द्वारा बनवाई गई एक बेंच पर बैठ जाता हूँ। समुद्र-दर्शन के साथ-साथ मैं मानव-स्वभाव की पहेली से भी जूझने लगता हूँ। यह पहेली मुझसे उत्तर चाहती है। कहती है, ' बताओ, मेरा असली रूप क्या है?' अब मैं क्या उत्तर दूँ। फिर भी प्रयास करता हूँ। मनुष्य स्वार्थी होता है या परोपकारी? यदि मात्र स्वार्थी होता तो समुद्र के किनारे लोगों की सुख सुविधा के लिए बेंचें क्यों बनवाता? लोग गरीबों में भोजन क्यों बंटवाते हैं? अन्न-क्षेत्र क्यों चलवाते हैं? वस्त्रहीनों को वस्त्रदान क्यों करते हैं? दूसरों का जीवन बचाने के लिए अपने जीवन की बाजी क्यों लगा देते हैं? मेरा उत्तर कुछ इस प्रकार है ---मनुष्य के स्वार्थ दो प्रकार के होते हैं---स्थूल और सूक्ष्म। जब व्यक्ति मात्र अपनी अपनी सुख-सुविधा तक सीमित हो जाता है, तो वह स्थूल स्वार्थ में प्रवृत्त होता है। जब वह वस्त्रदान करता है , भूखों को भोजन देता है, दूसरों को बचाने में अपनी जान गंवा देता है तो वह परोपकार तो करता है, पर इसमें उसका सूक्ष्म स्वार्थ भी सन्निहित रहता है। सूक्ष्म स्वार्थ है यश की कामना। उसे लगता है, परोपकार करने से लोक में यश मिलेगा। भारतीय चिंतक ऐसा मानते हैं कि व्यक्ति में तीन एषणाएँ हैं --- पुत्रैषणा, वित्तैषणा, लोकैषणा। प्रथम दो एषणाएँ तो स्थूल स्वार्थ की कोटि में आती हैं और तीसरी एषणा सूक्ष्म स्वार्थ की कोटि में आती है। यदि सूक्ष्म एषणा का आकर्षण समाप्त हो जाए तो शायद लोग परोपकार करना छोड़ दें। रामा सुब्बू ने समुद्र के किनारे बेंचें क्यों बनवाईं और उनपर अपना नाम क्यों खुदवाया, इस प्रश्न का उत्तर मेरे उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट हो जाता है।
जो लोग ऐसा मानते हैं कि निःशेष स्वार्थ बिना परोपकार संभव है, वे मुगालते में हैं। वस्तुतः स्वार्थ का मूल वास-स्थान अहं है। अहं एक ऐसा तत्व है, जो प्राणिमात्र के स्वत्व का मूलाधार है। जब तक अहं रहेगा तबतक स्वार्थ रहेगा, अतः स्वार्थ भी सर्वदा रहेगा।
अब इसी प्रश्न का उत्तर एक कथा के माध्यम से। एक थे ऋषि। उन्होंने गुरुकुल में छात्रों को सम्पूर्ण शिक्षा दी। क्षात्रों ने शिक्षा कितनी गृहण की, यह जानने के लिए ऋषि ने उनकी व्यावहारिक परीक्षा लेने का मन बनाया। उन्होंने क्षात्रों को आमने-सामने करके दो पंक्तियों में बैठा दिया। पंक्तिबद्द छात्रों के सामने पत्तल पर भोजन परोसा गया। इसके बाद उनके उनके दाहिने हाथ की केहुनी से लगाकर डंडा बांध दिया गया। इतना सब होने के बाद ऋषि छात्रों से बोले, 'अब आप लोग भोजन प्रारंभ करें।' भोजन की अनुमति के बाद जब छात्र पत्तल से कौर उठाने लगे तो हाथ में बंधे डंडे के कारण वह उनके मुख की ओर न जाकर सिर के ऊपर चला जाता था। अब छात्र परेशान। जब छात्रों को कोई उपाय नहीं सूझा तो ऋषि ने उन्हें ' यजुर्वेद' का यह मंत्र सुनाया---
देहि मे ददामि ते नि मे धेहि नि ते दधे।
निहारं च हरसि मे निहारं निहरणि ते।।
अर्थात् तुम मुझे दो और मैं तुम्हें दूँ। इस आदान-प्रदान से अहँ एवं पर दोनों के स्वार्थ की सिद्धि हो जाएगी। छात्रों ने इसी विधि से भोजन किया। अपना कौर स्वयं अपने मुँह में न डालकर सामनेवाले के मुँह में डाला और विनिमय में सामनेवाले ने भी ऐसा ही किया। तो सारा समाज अदृश्य विनिमय सूत्र में बँधा है। इस विनिमय-सूत्र का एक सिरा अहं से जुड़ा है और दूसरा पर से। ध्यातव्य है कि वेद मंत्र में 'मे' (मुझे) और 'ते' (तुझे) बाद में। इसका अभिप्राय यह है कि विनिमय-सूत्र में 'पर' की तुलना में 'अहं' का पलड़ा भारी रहता है।
एक दूसरी कथा। यह कथा 'वृहदारण्यक उपनिषद' की है। ऋषि य़ाज्ञवल्क्य अपनी पत्नी मैत्रेयी को सामाजिक य़थार्थ के निरूपण क्रम में बताते हैं---
न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवति,
आत्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति।
न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रियो भवति,
आत्मनस्तु कामाय जाया प्रियो भवति।
न वा अरे पुत्रस्य कामाय पुत्रः प्रियो भवति,
आत्मनस्तु कामाय पुत्रः प्रियो भवति।
अर्थात् पत्नी को पति इसलिए प्रिय नहीं होता, क्योंकि वह पति है, वरन् पत्नी को पति इसलिए प्रिय होता है, क्योंकि पति से उसके हित की सिद्धि होती है। इसी प्रकार पति के लिए पत्नी इसलिए नहीं प्रिय होती क्योंकि वह पत्नी है। पति के लिए पत्नी इसलिए प्रिय होती है, क्योंकि पत्नी से पति क्योंकि पत्नी से पति के स्वार्थ की सिद्धि होती है। पुत्र मात्र इसलिए प्रिय नहीं होता, क्योंकि वह पुत्र है। माता-पिता के लिए पुत्र इसलिए प्रिय होता है, क्योंकि पुत्र से उनके हितों की सिद्धि होती है।
तो यथार्थ यही है। इसको झुठलाना हवा में उड़ने जैसा है। वैसे जो भी हवा में उड़ता है, चाहे पक्षी हो या मानव, उसे यथार्थ की धरा पर उतरना ही पड़ता है।
जबतक चेन्नई में रहता हूँ, नियमित रूप से सायं-प्रातः समुद्र-दर्शन करता हूँ। यदा-कदा मेरा पांच वर्षीय दौहित्र मेरे साथ चलने का हठ करता है, लेकिन मैं उसे नहीं ले जा पाता। कारण मैं ठहरा मीटर, वह है सेंटीमीटर: मैं ठहरा ऊँट, वह रहा नेवला। अब मीटर-सेंटीमीटर और ऊँट-नेवले का साथ कैसे चल सकता है। एक बात और, पार्थ है उदीयमान, मैं हूँ स्तमान्; अब उदीयमान और अस्तायमान के बीच युति कैसे बन सकती है।
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जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलावे में भूला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मेला जितना भड़कीला रंग-रंगीला था,
मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी,
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,
जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,
उतना ही रेले तेज ढकेले जाते थे,
क्रय-विक्रय तो ठण्ढे दिल से हो सकता है,
यह तो भागा-भागी की छीना-जोरी थी;
अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँ
क्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया,
वह कौन रतन अनमोल मिला ऐसा मुझको,
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया,
यह थी तकदीरी बात मुझे गुण दोष न दो
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली,
जिसको समझा था आँसू, वह मोती निकला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,
मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का।
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा -
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहाँ खड़ा था कल उस थल पर आज नहीं,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं
केवल छूकर ही देश-काल की सीमाएँ
जग दे मुझपर फैसला उसे जैसा भाए
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के
इस एक और पहलू से होकर निकल चला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

1
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!
यह चाँद उदित होकर नभ में
कुछ ताप मिटाता जीवन का,
लहरा लहरा यह शाखाएँ
कुछ शोक भुला देतीं मन का,
कल मुर्झाने वाली कलियाँ
हँसकर कहती हैं मगन रहो,
बुलबुल तरु की फुनगी पर से
संदेश सुनाती यौवन का,
तुम देकर मदिरा के प्याले
मेरा मन बहला देती हो,
उस पार मुझे बहलाने का
उपचार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!
2
जग में रस की नदियाँ बहती,
रसना दो बूंदें पाती है,
जीवन की झिलमिल-सी झाँकी
नयनों के आगे आती है,
स्वर तालमयी वीणा बजती,
मिलती है बस झंकार मुझे,
मेरे सुमनों की गंध कहीं
यह वायु उड़ा ले जाती है;
ऐसा सुनता, उस पार, प्रिये,
ये साधन भी छिन जाएँगे;
तब मानव की चेतनता का
आधार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!
3
प्याला है पर पी पाएँगे,
है ज्ञात नहीं इतना हमको,
इस पार नियति ने भेजा है,
असमर्थ बना कितना हमको,
कहने वाले, पर कहते है,
हम कर्मों में स्वाधीन सदा,
करने वालों की परवशता
है ज्ञात किसे, जितनी हमको ?
कह तो सकते हैं, कहकर ही
कुछ दिल हलका कर लेते हैं,
उस पार अभागे मानव का
अधिकार न जाने क्या होगा !
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा !
4
कुछ भी न किया था जब उसका,
उसने पथ में काँटे बोये,
वे भार दिए धर कंधों पर,
जो रो-रोकर हमने ढोए ;
महलों के सपनों के भीतर
जर्जर खँडहर का सत्य भरा,
उर में ऐसी हलचल भर दी,
दो रात न हम सुख से सोए ;
अब तो हम अपने जीवन भर
उस क्रूर कठिन को कोस चुके;
उस पार नियति का मानव से
व्यवहार न जाने क्या होगा !
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा !
5
संसृति के जीवन में, सुभगे
ऐसी भी घड़ियाँ आएँगी,
जब दिनकर की तमहर किरणे
तम के अन्दर छिप जाएँगी,
जब निज प्रियतम का शव, रजनी
तम की चादर से ढक देगी,
तब रवि-शशि-पोषित यह पृथ्वी
कितने दिन खैर मनाएगी !
जब इस लंबे-चौड़े जग का
अस्तित्व न रहने पाएगा,
तब हम दोनो का नन्हा-सा
संसार न जाने क्या होगा !
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा !
6
ऐसा चिर पतझड़ आएगा
कोयल न कुहुक फिर पाएगी,
बुलबुल न अंधेरे में गागा
जीवन की ज्योति जगाएगी,
अगणित मृदु-नव पल्लव के स्वर
‘मरमर’ न सुने फिर जाएँगे,
अलि-अवली कलि-दल पर गुंजन
करने के हेतु न आएगी,
जब इतनी रसमय ध्वनियों का
अवसान, प्रिये, हो जाएगा,
तब शुष्क हमारे कंठों का
उद्गार न जाने क्या होगा !
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा !
7
सुन काल प्रबल का गुरु-गर्जन
निर्झरिणी भूलेगी नर्तन,
निर्झर भूलेगा निज ‘टलमल’,
सरिता अपना ‘कलकल’ गायन,
वह गायक-नायक सिन्धु कहीं,
चुप हो छिप जाना चाहेगा,
मुँह खोल खड़े रह जाएँगे
गंधर्व, अप्सरा, किन्नरगण;
संगीत सजीव हुआ जिनमें,
जब मौन वही हो जाएँगे,
तब, प्राण, तुम्हारी तंत्री का
जड़ तार न जाने क्या होगा !
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा !
8
उतरे इन आखों के आगे
जो हार चमेली ने पहने,
वह छीन रहा, देखो, माली,
सुकुमार लताओं के गहने,
दो दिन में खींची जाएगी
ऊषा की साड़ी सिन्दूरी,
पट इन्द्रधनुष का सतरंगा
पाएगा कितने दिन रहने;
जब मूर्तिमती सत्ताओं की
शोभा-सुषमा लुट जाएगी,
तब कवि के कल्पित स्वप्नों का
श्रृंगार न जाने क्या होगा !
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा !
9
दृग देख जहाँ तक पाते हैं,
तम का सागर लहराता है,
फिर भी उस पार खड़ा कोई
हम सब को खींच बुलाता है;
मैं आज चला तुम आओगी
कल, परसों सब संगी-साथी,
दुनिया रोती-धोती रहती,
जिसको जाना है, जाता है;
मेरा तो होता मन डगडग,
तट पर ही के हलकोरों से !
जब मैं एकाकी पहुँचूँगा
मँझधार, न जाने क्या होगा !
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा !
-हरिवंश राय 'बच्चन'-
–
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कविता आज और अभी

अकेलापन
बहुत कम मिलता है
अकेलापन
मिलता है पर जब भी
बहुत आत्मीयता से
अपनेपन से मिलता है
मैं नहीं छोड़ना चाहता
अपना अकेलापन
पर न जाने क्यूँ
कोई है जो
हमेशा हमारे बीच
प्रत्यक्ष या अप्रत्य़क्ष
और फिर मैं रह जाता हूं
आस में बस
अकेलापन
मिलता है कम
और भी कम।
-निखिल कौशिक

नन्हे मुन्ने सपनों की...
नन्हे मुन्ने सपनों की दहलीज़ पर
मैं गुमसुम बैठा
अपने अतीत के दर्पण में ऐसे झाँकूँ
कि मेरा चेहरा
हर लम्हा बदलता जाए
यह आँख किसकी है?
होंठ यह किसके हैं?
नाक और कान हैं किसके?
किसके कांधों ने मेरे सर को सजा रखा है?
मेरे कांधे पर यह सर किसका है?
मेरे सर के वो घने बाल
मेरे बालों में सफेदी कैसी
मैने कब धूप में बालों की स्याही खो दी?
समय कब आँख चुराकर मुझसे दूर निकल गया?
मेरे चेहरे पे इन झुर्रियों का बसेरा कब से?
कब पड़े समय के पांवों के निशान
मेरे माथे और मेरी सोच की तख्ती पर?
कब मेरे दोस्त बिछड़े मुझसे
मेरी सांसों, मेरे सपनों
और मेरे बीते दिनों की तरह
कब?
कब?
सोहन राही

कोहरा
घर, खेत, सड़क, पहाड़
किनारों तक सरककर
समुन्दर में
कूदने को तैयार
एक आदाज पक्षी
अपने ही पंखों के
विस्तार में भटका
पहचान ढूँढता---
जाने कब खोल पाए
आकाश के ढक्कन से
ढकी धरती की
बन्द यह डिबिया।
शैल अग्रवाल
एक फूल बड़ा सा
गुलदाउदी, डहेलिया
तथा अन्य तमाम फूलों के पौधों को
तमाम दिशाओं की शाखाओं-प्रशाखाओं को
काटते जायें,
केवल एक ही दिशा में
होने दें विकास
तो एक खूब बड़ा फूल
खिलता है।
क्या यही सच है
मनुष्य के जीवन में भी ?
गिरीश पाण्डे

सन्नाटा
सन्नाटा है
चुप-सी लगी है
सब कुछ जमा हुआ-सा लगता है।
मन के अंदर उग आए परदेश में,
कहीं कोई झिझकते हुए भी
सांकल नहीं खटखटाता
लगता है एक पूरा-का-पूरा
शब्द समूह खो गया है।
हवा गूँगी हो गई है
आकाश बहरा हो गया है।
दीवारें कुछ और ठोस हो गई हैं।
खिड़कियां भी बंद हैं।
छत से लटकता, अकेला बल्ब
आंखें मिचमिचाता
मेरे होने और न होने पर
एक जलता हुआ
प्रश्न-चिन्ह लगाता है।
आंख में ठहरा हुआ आँसू
पलकों पर लटक गया है।
अंगीठी में जलते हुए, लाल
अंगारों से पूछती हूं---
कहीं मैं भी तो
जला हुआ कोयला नहीं
जिसकी राख में
एक नन्ही-सी सुर्ख चिंगारी
तड़कने का खामोशी से
इंतजार कर रही है?...
ऊषा राजे सक्सेना

शब्दों के भीतर की आवाज
शब्दों से
पुकारती हूँ तुम्हें
तुम्हारे शब्द
सुनते हैं मेरी गुहार
तुम्हारी हथेलियों से
शब्द बनकर उतरी हुई
हार्दिक संवेदनाएँ
अवतरित होती हैं
आहत वक्ष भीतर
अकेलेपन के विरुद्ध
बचपन में साध-साधकर
सुलेख लिखी हुई कापियों के कागज़ से
कभी नाव, कभी हवाई जहाज़
बनानेवाली उँगलियाँ
लिखती हैं चिठ्ठियाँ
हवाई यात्रा करते हुए शब्द
अंतरिक्ष के भीतर
गोताखोरी करते हुए
डूब जाते हैं मेरे भीतर
अकेलेपन के विरुद्ध
सलोने संयोग की प्रतीक्षा में
-प्रो. पुष्पिता
* * *
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कहानी-समकालीन

(भारत से)
कागज की नावें, चांदी के बाल

-सूर्यबाला
मैं बहुत छोटी हूँ। वैसा ही वह भी। सिर्फ दो दर्जे ऊपरवाली क्लास में। अपनी कोठी की घुमावदार सीढ़ियों पर बैठी मैं रंग-बिरंगे चित्रोंवाली किताब से ' सुनहरे बालोंवाली राजकुमारी ' की कहानी जोर-जोर से पढ़ रही हूँ---वह ठोढ़ी पर हाथ धरे सुन रहा है।
एक थी राजकुमारी। वह बहुत सुन्दर थी। उसके बाल सुनहले थे। जब वह हँसती थी तो केतकी के फूल झरते थे और जब रोती थी ढुर-ढुर मोती। एक दिन राजकुमारी नदी में नहा रही थी। उसका एक सुनहला बाल टूट गया। राजकुमारी ने उस बाल को पत्तों के एक दोने में रखा और नदी की धारा में बहा दिया। धार में बहते-बहते दोना बहुत दूर निकल गया; जहां एक राजकुमार शिकार खेलने आया था। थके-मांदे राजकुमार को प्यास लगी तो वह नदी के किनारे आया। राजकुमार अंजली में भरकर पानी पीने ही जा रहा था कि उसे बहते हुए दोने में सुनहला बाल दिखा। राजकुमार ने बाल निकाल लिया और महल लौटकर गठ कर बैठा राजा से कि पिताजी! मुझे तो सुनहले बालोंवाली राजकुमारी चाहिए।
' तूने किसी राजा का राजमहल देखा है?' अचानक वह ठोढ़ी से हाथ हटाकर पूछता है।
' नहीं तो---लेकिन एक बार पिताजी एक जागीरदार साहब की हवेली में ले गए थे---खूब बड़ी हवेली थी उनकी--- '
' तुम्हारी कोठी से भी? खूब बड़ी?'
' हाँ---बहोत। '
' और राजा लोगों के महल उससे भी कहीं ज्यादा बड़े! न!'
' और नहीं तो क्या तुम्हारी पंचकुठरिया जितने---? '
वह ठिलठिलाकर हँस पड़ा। मैं खुद भी। उसकी पंचकुठरिया और राजमहल की आमने-सामने कल्पना ही इतनी हास्यास्पद थी कि हम दोनों को हँसा-हँसाकर लोटपोट किए दे रही थी। और बाकी आसपास कामकाज में लगे हुए छोटे बड़े लोग हमें अजीब बेवकूफी-भरी और नागवार नजरों से घूरे जा रहे थे।
पंचकुठरिया हमारी कोठी के सामने बंजर मैदान में बनी एक अधफूटी-सी इमारत थी; जिसमें एक सीधी कतार में किसी ने सिर्फ पाँच कोठरियाँ और पाँच दालान किसी ने किराए पर उठा देने की गरज से बनवा दिए थे। इन्ही में से एक कोठरी में वह अपने माँ-बाप और छोटे भाई-बहनों के साथ रहता था।
हम दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे। वह दो दर्जा ऊपर मैं दो दर्जा नीचे। मैं ताँगे से स्कूल जाती, वह पैदल। लेकिन तब भी हम घर से एक ही टाइम पर निकलते और एक ही टाइम लौटते थे।क्योंकि वह पैदल-पैदल गली, मैदान और छोटी पगडंडियों के सहारे फलाँगता फलाँगता जल्धी पहुँच जाता; जबकि मेरा ताँगा चौड़ी तारकोली सड़क से हटो बच्चों पुकारता खदराता हुआ जाता। वह चप्पलें पहनता मैं बक्सुए वाली सैंडलें। अक्सर जब मैं स्कूल से लौटकर ताँगे से उतर रही होती तो वह भी मैदान के बीचोबीच से रास्ता काटकर हाथ के बस्ते को चरखी की तरह घुमाता , उछलता-कूदता लौट रहा होता। फिर हम दोनों खूब बातें करते कि आज हमें यह पढ़ाया गया और हमें यह। हमें इस कविता की यह ट्यून बताई गई , हमें यह। हम अपनी सीखी कविताएँ भी गाकर एक-दूसरे को बताते और उस दिन के सीखे पहाड़े दुहराते। फिर वह अपनी पंचकुठरिया में चला जाता, मैं अपनी कोठी में।
मुझे कोठी के बाहर जाने की इजाजत नहीं थी, उसे कोठी के अन्दर आने की। यह कभी किसी ने कहा नहीं, बस एक समझी, स्वीकारी हुई बात थी। उसके आने की कोई मनाही नहीं थी। वह आता---हम दोनों बाहर सायबान या अगल-बगल अपने आहते में उछल-कूद लेते। और साथ-साथ ढेर सारी रंग-बिरंगी कहानियां पढ़ लेते। वह कौतुक से पूछता---' राजा लोगों के महल कितने बड़े होंगे आखिर ?'
या फिर
' राजकुमारियाँ कितनी सुन्दर होती होंगी ? '
मैं ईर्ष्या से हुमककर कहती---' हुँह, सोने चाँदी के बाल होंगे तो सुन्दर दिखेगी ही---है कि नहीं?'
एकाएक वह खिलखिलाकर हँस पड़ा। मैने पूछा, क्यूँ हँसा? तो बोला---
' मैं सोच रहा हूँ, अगर तेरे बाल सुनहले हो जाएं तो कैसी दीखेगी?'
यकायक अपने लिए इतनी जबर्दस्त कल्पना मैं नहीं कर पाई। अचकचाकर बोली---
' अरे बुद्धु! मेरे बाल सोने के कहां से हो जाएंगे---मैं कोई राजकुमारी हूँ?'
' अच्छा तो चाँदी के ही सही, रुपहले-रुपहले बाल--- '
एकाएक मुझे याद आया, रुपहले बाल तो बूढ़ी बुआजी के हैं...
' अरे, तब तो मैं बूढ़ी हो जाऊंगी। बिल्कुल बूढ़ी-सी---अच्छी क्या खाक दीखूँगी? '
' वाह! क्यूँ नहीं दीखेगी? खूब अच्छी दीखेगी---खूब अच्छी। जैसी अभी दीखती है, उससे भी ज्यादा अच्छी, चाँदी के तारों जैसे बालों में।'
वह मेरी 'बूढ़ी' की कल्पना के करीब फटके बिना वैसा ही मगन हंसता हुआ कहे जा रहा था। बेहद हँसोड़ा था वह। नकलें भी बड़ी बढ़िया उतारता। स्कूल के टीचरों के डपटने, चपरासी के हड़काने औप प्रार्थनावाले पंडितजी के नकनकाने की; हम जब भी इकठ्ठे होते, वह एक के बाद एक नकलें उतारता जाता, मैं खिलखिलाती जाती। फिर आदत ऐसी पड़ गई कि वह आसपास न भी होता तो भी मैं उसकी किसी नकलवाली मुद्रा को सोचकर ही खिलखिला पड़ती।
तब आसपास वाले फिर हमें हैरत से देखने लगते...। यह एक बहुत पुराना सिलसिला अभी तक, अधेड़ होने तक चला आता है। जाने-अनजाने प्रसंगों के बीच अचानक उसकी कोई बात याद आ पड़ती है और मैं बरबस मुसकरा पड़ती हूँ। ध्यान तब आता है जब मेरे पति या बच्चे मुझे टोककर होश में आने के लिए कहते हैं। और क्षणभर के लिए मैं एक अनाम अपराधबोध से ग्रस्त हो जाती हूँ। लेकिन चूँकि ऐसा बहुत कम ही होता है जबकि मैं पति बच्चों से घिरी रहती होऊँ, इसलिए मौका पाते ही 'वह' खिड़की से अन्दर फलाँग लेता है और हमारी बेबात की हँसी-ठिठोली शुरु हो जाती है। कभी-कभी गंभीर वार्तालाप भी---
जैसे एक-दूसरे के डब्बे का टिफिन खाते हुए।
मैं कहती हूँ ' तुम्हारे डब्बे की रोटियाँ खूब नरम होती हैं न!'
' हाँ, मेरी माँ उनमें घर का ताजा मक्खन चुपड़ती है। बहुत थोड़ी-सी शक्कर भी---तुम भी अपनी माँ से मक्कन चुपड़ने को कह दो---'
मैं कहती हूँ-' मेरी माँ नहीं है---'
और उसक चेहरा हैरत से उतरता चला जाता है--- ' तो तुम्हें टिफिन कौन देता है?'
' मिसरानी---'
' तुम्हारी चोटियाँ कौन गूँथती है?'
' बड़ी बुआजी---'
' और बीमार पड़ने पर दवा कौन देता है?'
' कभी पिताजी, कभी मिसरानी, कभी चमेली---'
' और गलती करने पर चाँटे कौन लगाता है?'
' कोई नहीं---'
वह उसके लिए बेहद अजूबी बात थी। वह थोड़ी देर गुमसुम सुनता रहा, जैसे कहीं फटाफट नोट करता जा रहा हो---फिर जैसे एकदम पूछ गया---
' तुम्हें रात में कभी डर नहीं लगता?'
प्रश्न इतना छोटा नहीं था। इससे लंबा था और इससे बहुत गहरा भी---कि तब तुम क्या करती हो?
' ऐसे ही बड़ी बुआजी को बुलाने लगती हूँ---पर उन्हें तो कम सुनाई पड़ता है न---तो चमेली---लेकिन वह भी थकी होती है। उनींदी आवाज में कहती है---अरे कहाँ...कुछ भी तो नहीं बिटिया...या फिर हनुमान चालीसा पढ़ने को कहकर करवट बदल खुद सो जाती है।'
फिर मैं उससे पूछती हूँ--- ' तुम्हारी माँ हैं?...कैसी हैं?'
वह उसी तरह खिलखिलाकर हँस पड़ा---' मेरी माँ? तुम देखोगी तो खूब हंसोगी--- वह तुम्हारी बुआजी की तरह सफेद झक साड़ी थोड़ी न, एकदम लुगड़ी-फुगड़ी-सी साड़ी पहनती हैं और सिन्दूर का टीका लगाए, चूल्हे में गोल-गोल रोटियाँ फुलाती रहती हैं। क्रीम पाउडर नहीं उसके पास; लेकिन वह सिर्फ आधा सेर दूध में ही छाछ, दही मक्खन सब कर लेती हैं और फिर उन्ही उँगलियों से हाथ-मुँह सब चिकना कर लेती हैं और पैरों में ढेर सारा महावर लगा लेती हैं।'
' तुम मुझे अपनी माँ को दिखाओगे?'
'हाँ-हाँ,चलना; लेकिन कैसे?'
ऐसे कि एकदिन मैं दोपहरी को चुपके से खिड़की फलाँग गई थी और बेतहाशा उसका हाथ पकड़े हाँफते-हाँफते पंचकुठरिया पहुँच गई थी।
उसकी माँ और बहनें मुझे देखकर चकित चमत्कृत थीं---जैसे वह कोई वर्जित, लेकिन साहसिक काम कर गुजरा हो, कुछ बेहद दुर्लभ-सी चीज उठा लाया हो...
'यह---यह राजी है---कोठीवालों की लड़की---राजरानी---'
उसकी माँ मुझे किसी बड़ी प्यारी, कोमल और कीमती वस्त्र की तरह मुग्ध दृष्टि से देखे जा रही थी।
' तुम्हारी मक्खन और शक्कर चुपड़ी रोटी रोज यही खाती है---इसे अपनी मिसरानी के तेल बोथे पराँठे, सब्जी और अचार बिल्कुल नहीं भाते। मोहनथाल और इमरतियाँ भी नहीं।' वह प्रशंसा के भाव से बिल्कुल नहीं, सिर्फ हकीकत के तौर पर बयान करता जा रहा ता।
उसका छोटा भाई मेरी रेशमी फ्रॉक पर आराम से हाथ फेरता जा रहा था और उसकी बहनें मेरी बक्सुए वाली सैंडलें आँखें बचा-बचाकर देखे जा रही थीं... मैं उन सबकी उस दिन की उपलब्धि थी।
अचानक वह कह बैठा---
' इसके 'माँ' ही नहीं हैं!' ( दुःख, सहानुभूति नहीं यहाँ भी। मात्र हकीकत बयानी।)
और तड़ाक---जैसे हर किसी के चमत्कृत से दीखते चेहरों पर सनसनाकर कुछ बैठ गया हो। सबके चेहरे अवाक्---तब वह जैसे सबको जगाता सा बोला---
' लेकिन इसके घर मिसरानी, चमेली दरबान और बड़ी बुआ जी हैं। भोंपूवाला ग्रामोफोन और बघर्रे की खालें भी...इसके दरबान के पास भी कोट है और पिता के पास विलायती हैट!...' जैसे किसी दूसरे लोक की अजीबोगरीब बातें बता, सुना रहा हो।
खुद मैंने ही क्या कुछ कम अजूबी बातें देखीं उसके यहाँ! मेरी फ्रॉक और बक्सुएदार सैंडलों का सम्मोहन तो बहुत थोड़ी ही देर रहा। उसके बाद तो उसकी एक बहन मेरे दोनों हाथ पकड़ तेज-तेज चकरी घूमने लगी और दूसरी घर के सामने इकड़ी-दुकड़ी खँचाने लगी। छोटा भाई और बहन सड़क से गुजरते रंग-बिरंगे गुब्बारों और पिपहरी के लिए माँ के कन्धों पर झूलकर ठुनकने लगे। भाई तो इतना जिदियाया कि उसकी पीठ पर एक भरपूर धौल भी पड़ा, धप्प से। इससे बाकी सारे खिलखिलाकर हँसने लगे और भाई पैर फैलाकर चीखने लगा। तबतक बन्दर के नाचवाला आ गया और सब बच्चों के साथ भाई भी रोना भूलकर नाच देखने के लिए भागा। लेकिन चूँकि उसका छुटका भाई बड़े बच्चों के बराबर तेज भाग नहीं सकता था, इसलिए बड़ी बहन ने उसे अपनी गोद में लाद-सा लिया।
नाच देखकर लौटे तो उसकी माँ ने पीतल की एक तश्तरी में तुरत-फुरत चूल्हे पर सिंकी और जरा-सी मक्खन चुपड़ी खूब नरम-सी रोटी मुझे खाने को दी।
फिर बड़े प्यार से पूछा---
'तुम्हें अच्छी लगती है न?'
मैने खाते-खाते 'हाँ' में गरदन हिलाई।
' मैने अभी ही जरा-सा मक्खन निकाल लिया---ये सब तो रोज ही खाते हैं।'
वह हँसा---' इसका मतलब हम सब कल रूखी रोटी और नमक खाएँगे न!'
' तो क्या?'
उसका छोटा भाई बड़े भोलेपन से बोला---' जो यह रोज आएगी तो हम रोज रूखी रोटी खाएँगे?'
सबके सब जोर से हँस पड़े।
माँ बोली---' रोज इसे आने ही कौन देगा? अब इसे जल्दी से पहुँचाओ। नहीं तो डाँट पड़ेगी।'
उसकी माँ ने ठीक कहा था।
लौटने पर पिता की कड़कदार आवाज गूँजी और उसीके साथ एक भरपूर चाँटा। बुआजी जल्दी से खींचकर ले गईं और मेरे गालों पर उबरी ललछौंही कतारों पर मरहम मलने लगीं। मरहम मलते-मलते बुआजी समझाए जा रही थीं---अपनी खानदानी इज्जत और साख समझाकर बेटी। तेरे पिताजी की इससे तौहीन होती है न!...तुझे क्या पता , वे कोरट में कितने मुकदमे की पेशियाँ, कितना पैसा पानी की तरह बहाने के बाद तुझे तेरी माँ से जीतकर लाए हैं।
उसदिन मैने एक खबर की तरह जाना कि मेरी भी माँ है। ...उतनी छोटी मुझे, खानदान, कोठी, दबदबा जैसे शब्द साफ-साप समझ में नहीं आ रहे थे, लेकिन 'तौहिनी' का मतलब समझते वक्त अचानक मेरी आँखों में गरम रोटी पर धरी एक छोटी-सी मक्खन की डली पिघलने लगी, बस। बड़े होने पर जाना कि चूँकि मेरे पिता मुझे खानदानी इज्जत के रूप में, अपने दबदबे के बल पर कोर्ट से जीतकर लाए थे, इसलिए कहीं-न-कहीं यह जरूर चाहते थे कि मैं उनकी बेटी की तरह रहूँ---अपनी माँ की बेटी की तरह नहीं। मेरी माँ और मेरे पिता की यह कहानी मेरी जिन्दगी के हर छोटे बड़े मोड़ पर मुझसे उलझती, ठोकरें लगाती रही। सारे मान-सम्मान और समाज में बाइज्जत हाथों हाथ ली जाती हुई मैं अलग हो गई माँ और अलग हो गए पिता की बेटी के दयनीय सच के साथ हमेशा जोड़ी गई। ससुराल में भी। बेटी-बेटों के सामने भी---सिर्फ चर्चा भर ही। मेरी बुराई, आलोचना कुछ नहीं।
उस दिन के बाद फिर कभी नहीं गई उसके घर। हफ्ते दस दिनों बुखार में पड़ी रही। अच्छी होन पर भी नौकरों को मेरी हर सुख-सुविधा के लिए मिले निर्देशों की कड़ी निगरानी में...कोठी में ही आंगन, दालान, बारजों, बरसातियों में टहलती-भटकती रही।
अचानक एक दिन देखा---एक ठेले पर कुछ खाट-खटोली, गद्दे-गद्दियों और चूल्हे चौके के मर्तबानों सहित, सारा सामान लदा चला जा रहा है, वे सब भी उसी ठेले के पीछे-पीछे जा रहे हैं; उसी शहर में कहीं और रहने।
मैं अब भी उसी शहर में हूँ। पिता मुकदमे में जीती हुई अपनी बेटी को इस कोठी सहित सारी जमीन-जायदाद दे गए हैं। मेरे पति-बच्चे सब कुछ संभाल रहे हैं।
लेकिन मैं एक असंभव-सी प्रतीक्षा कर रही हूँ। अक्सर अन्दर एक हलकोर-सी उठती है---जब लगता है कि वे सब-के-सब भी इसी शहर में कहीं होंगे।
वह सब कुछ उस उम्र के साथ ही क्यों नहीं खत्म हो गया? क्यों एक कचोट-सी अभी तक बाकी है---और किस बात की ? क्यों वह उम्र की सारी सीढ़ियां फलांगता इन उतरती सीढ़ियों पर भी मुझसे पहले ही बैठा ठिलठिलाकर हँसता नजर आता है?...
जब भी उदास होती हूँ---वैसा ही खिलखिलाता, मैदान पार की पगडंडियों से दौड़ता वह मेरी खिड़की के रास्ते उचककर अंदर फलांग जाता है। मेरी साड़ी तब चुन्नटदार फ्राकों में बदल जाती है---और पाँवों में बक्सुए वाले सैंडलें...
'राजी! आओ चलें...'
' कहाँ?'
'जंगली बेरों की भीटों पर---या फिर तुम्हारी कोठी के ही पिछवाड़े, झाड़-झंखारों के बीच लाल घुंघरुओंवाली घुंघचियां तोड़ने---पीपल की पत्तियों को पान बनाकर बीड़े लगाने और सूखी चिलबिलों से चिरौंजियां निकालने।'
अरे, इसे कैसे मालूम कि सचमुच मेरा मन कोठी की पुरानी दीवालों की दरारों में उग आए पीपल के पत्तों के पान बनाने को करता है। लाल घुँघचियाँ और सूखी चिलबिल बीनने का भी...
' लेकिन मेरे पति, बच्चे, उनका नाश्ता खाना...'
' उन सबसे कोई रोकता थोड़ी है तुम्हें--- सब सलाटकर या उन्ही के बीचोबीच...'
सचमुच ?
जैसे अभी; अचानक शीशे के सामने खड़े होकर माथे के दाहिने किनारे से उठती सपेद बालों की एकमुश्त कतार दीकी है, मन अनजाने अवसाद में डूबा है कि पीछे से वह ठिलठिलाकर हँस पड़ा है---मैं कहता था न कि तू खूब अच्छी दीखेगी, खूब अच्छी। चाँदी के तारों जैसे बालों में।
बस, मैं पूर्ण विश्वस्त, परम निश्चिन्तता से मुड़ गई हूँ। जैसे माथे पर चाँदी का ' ताज ' पहना हो।
बाहर धाराधार बारिश हो रही है और दूर मैदान के बीचोबीच चिलबिल का पेड़ भीग रहा है।
मैं अचानक मुड़ी हूँ और चमकीले कागजोंवाली पुरानी पत्रिकाओं से चिकने, मोटे कागज निकालकर डेर सारी रंग-बिरंगी नावें बनाने लगी हूँ।
मेरा समझदार, बड़ा हो गया बेटा हैरत से टोकता है---मम्मी, यह...यह क्या ?
' नावें... ' मैं खुशी से किलकती हुई कहती हूँ---चलो इन्हें सड़क के किनारे तेजी से बहते पानी में बहाते हैं---थोड़ी नावें नावें तू भी पकड़ तो...
हतबुद्धि-सा वह पहले अचकचाता है, फिर बाकी बची नावें उठा लेता है---नावें हथेलियों में दुबकी चिड़िया-सी दीखती हैं।
और बरसाती बूँदों में, मेरा हठ रखने को ही, मेरे पीछे-पीछे ईकर, ढाल पर इकठ्ठा हो तेजी से बहते पानी की धारा में एक के बाद एक नावें बहा देता है।
मैं माथे का पानी निचोड़ती मुग्ध, उत्फुल्ल देखती हूँ---नावें चली जा रही हैं, नाचती, थिरकती, अटकती, फिर बहती---तेज-तेज ढलान की धार में...
और अचानक एक सपना सा देखती हूँ मैं। ...बरसाती बरसात का यह हलकोरता पानी ढलानों से बहता हुआ एक कोठरी के दरवाजे से जा लगा है। वहाँ एक छोटा-सा चहककर एक नाव उठा लेता है और कुतूहल से देखता है---उसमें रखा एक रुपहला चाँदी के रेशे-सा बाल...

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हिन्दी मैयाः एक परी पुराण
(शुद्ध विलायती हिन्दी में)

-शैल अग्रवाल
सुनते हैं सर-मुँडे पंडितजी और पर-कटी परी ने शादी कर ली - अब आप पूछेंगे कि आख़िर इसमें नई बात क्या है - ऐसी शादियाँ तो यहाँ विलायत में रोज़ ही होती रहती हैं, सिवाय इसके कि परी पर-कटी कैसे और पंडितजी सर-मुँडे क्यों? सो बात वास्तव में यह है कि जब पंडितजी के पिता दीनदयालजी का परलोक गमन हुआ तो सर तो मुँडवाना ही था, भले ही वे बरसों से यहीं विदेश में ही रह रहे थे। पर पड़ौसन को चैन कहाँ - (आख़िर पड़ौसिनें तो सब एकसी ही होती हैं ना, चाहे वह अपने देश की हों या विदेश की) झटपट आटे से सने हाथ पोंछ, सर-मुँडे पंडितजी को बुलवा लिया और सर से पैर तक दुखी पंडित जी को देखकर बोलीं, 'रघुबीर पुतर क्या सूरत बना ली है तूने - कौन इतना सोख मनाता है औ़र फिर प्यो को गए तो हफ़्तों बीत गए। लगता है त्वाडा हेयर-ड्रेसर बहुत ही यूजलेस है, चारो तरफ़ बाल छुटे दिखते हैं। बिल्कुल ही गेटअप नहीं बनता। अच्छी बात नहीं यह। ये मुए बाल नहीं, टेलिविजन का एरियल होते हैं। इन्हींके थ्रु तो त्वाडा प्यो रोज़-रोज़ पुतर नाल आ जाता है।
असमंजस में सिर पे हाथ फेरते पंडित जी एक बात तो बिल्कुल ही नहीं समझ पाए कि आख़िर उनका बापू स्वर्ग जा कर विडियो-फ़िल्म की रील कैसे बन गया? चुपचाप समझदार पड़ौसन की बात सुनते-समझते खड़े-खड़े मन ही मन बार-बार गुनते-बुनते रह गए। पड़ोसन भी तो बिना रुके धारा-प्रवाह बोले जा रही थी 'बाप के मरने पर इसी वजह से तो बाल मुँडवाए जाते हैं। पर तुम वरी मत करना मैन, सब ठीक हो जावेगा। तुसी नलके से ज़रा कोल्ड वाटर ला दो अ़सी फ्लावर बनावेंगे औ़र हाँ आज शामको तुसी डिनर-शिनर यहीं करना साडे नाल।' असल में पंडित जी इतनी ज़रा-सी बात पर इतने उदास हो जाएँगे यह तो उसने सोचा ही नहीं था। गुमसुम पंडित जी चुपचाप पानी का गिलास पकड़ा घर लौट आए। आप सोच रहे होंगे कि ठंडे पानी से इंसटैंट 'फूल' कैसे बनाए जा सकते हैं तो अब सोचना बंद कीजिए यह विलायत है, यहाँ सब संभव हैं।
पंडित जी को याद आया कि शायद बचपन में भी यह बाल और एरियल वाली बात उन्होंने किसी और से भी सुनी थी। सारी पोज़ीशन क्रिस्टल-क्लीयर थी। बस आगे और क्या करना है य़ही सोचना बाकी रह गया था। फिकर में बिचारे खाना-पीना सबकुछ भूल गए भ़ूख प्यास औल लौस्ट एंड फौरगौटेन। कहीं मन उनसे ही जुड़ा रह गया तो बेचारे बापू भारत कैसे पहुँच पाएँगे? ऐसी सिचुएशन में तो मरकर भी यहीं ट्रैप रह जाएँगे? रघुवीर सहाय को मालूम था कि बापू पिछले आठ-दस साल से ही देश वापस जाना चाहते थे बस खर्चे की वजह से नहीं जा पा रहे थे। चलो, अब कम-से-कम यह टिकट वगैरह का चक्कर तो नहीं रहा पंडित जी ने ठंडी आह भरकर सोचा।
हमारे कर्मकांडी, पितृभक्त पंडित जी घोर दुविधा में थे। रघुवीर सहाय जी आख़िर पिता का दुख कैसे सह पाते - बात दरअसल यह थी कि बापू की आत्मा न भटके इसलिए सब काम उत्तम से उत्तम करना ज़रूरी था और जोश में बिचारे उस्तरे की जगह हेयर रिमूविंग क्रीम का पूरा-का-पूरा ट्यूब ही सरपर लगा बैठे। फिर तो देखते-देखते सर की उपजाऊ ज़मीन ऐसी बंजर हुई कि पिता की कौन कहे अपने कंघे तक से कौनटेक्ट नहीं कर पाए। एक बाल तक नहीं उपजा और पंडित जी तरह-तरह के पूजा-पाठ, जप-तप में लगे रहते, द़िन-रात दुआ माँगते बालों की सेहत की। बेचारों ने कई सम्मेलन तक आयोजित कर डाले इस विषय पर। बड़े-बड़े विद्वान आए - क्या नेता क्या मिनिस्टर, पर कोई पंडित जी को ढाढस ही नहीं दे पाया। एक दिन किसी ऐसी ही मनोदशा में पंडितजी जब आँखों में आँसू भरकर आकाश तक रहे थे 'काहे भगवन काहे, हमरे साथ ही अईसन अन्याय काहे-कम-से-कम हमरी ई बिलायती पोजीसन का ध्यान तो रखना ही चाहिए था आपको? ' असल में हमारे पंडितजी भारत में भोलेबाबा की नगरी से थे और जब भी प्रभु से डायरेक्ट लाइन पर बात करते थे तो मादरी जुबाँ ही बोलते थे, इस उम्मीद में कि शायद प्रभु को उनकी बात जल्दी ही समझ में आ जाए। या फिर लोकल कनेक्शन का तगड़ा और अच्छा असर पड़े दो-तीन बार एक्सप्लेन करने की ज़रूरत ना ही पड़े।
उनकी दुखभरी याचना का ठाकुर जी ने तो कोई जवाब नहीं दिया, हाँ ठीक उसी समय वह मनचली परी, जो सैर करने निकली थी एक चमकदार तारे में उलझकर गिर पड़ी, धड़ाम से वहीं, अपने पंडितजी के चमकते विलायती आकाश में। वैसे गिरी सो तो कोई बात नहीं थी, पर बिचारी अध-कटे हसुली जैसे चंद्रमा पर जा अटकी और पंडित जी ने आकाश में यह दृश्य देखा तो उन्हें बड़ा ही दुख हुआ। ऐसा अनर्थ तो फायरब्रिगेड वालों के साथ भी नहीं होता कितना-कितना ऊपर चढ़ जाते हैं वे लोग तो। पंडित जी आश्चर्य से अभिभूत भी थे और दुखी भी। बड़ी दया आ रही थी उन्हें इस सुंदर असहाय दिव्य-बाला पर। झटपट अंदर गए और किताब में छुपाई बापू की लंबी चुटिया उठा लाए। असल में उन्हें पड़ौसन की एरियल वाली बात भूली नहीं थीं - शायद बापू का यह एरियल ही दिमाग़ के दूरदर्शन में कोई नया सुझाव भेज सके, आकाश में पहुँचने का रास्ता बता सके और वह इस दुर्घटना-ग्रस्त सुंदरी की कुछ मदद कर पाएँ?
वैसे तो उन्हें स्पेस-मिशन के बारे में भी सबकुछ पता था - आख़िर वह रोज़ टेलिविजन पर पूरी ख़बर सुनते थे और ' टुमौरोज़ वर्ड' प्रोग्राम भी ठीक से ही देखते थे - वह भी हर हफ़्ते। अब आप से क्या छुपाएँ असली बात तो यह थी कि अपने रघुवर सहाय जी जानते थे कि न तो उनके पास इतनी हिम्मत ही थी कि रॉकेट में बैठकर ब्लास्ट हो पाएँ और ना इतनी धन-माया कि स्पेश-शटल की टिकट ख़रीदकर परी तक झटपट पहुँच जाएँ। कोई वॉएबल प्लान ही सोचना पड़ेगा ज़ान गँवाकर जान बचाना भला कहाँ की समझदारी है?
' जान है तो जहान है' अपनी समझदारी पर पंडित जी ने शानसे गरदन झटक दी। घड़े के ऊपर चुटिया प्रतिष्ठित किए बैठे पंडित जी परिवारवालों और मित्रों के साथ, पूरे तीन दिन तक अखंड जाप करते रहे पर कोई भी नया सुझाव सर की बंजर ज़मीन पर नहीं उपजा। उन्होंने तो परी-उत्थान के लिए चंदा तक जमा करना शुरू किया पर चौथे दिन जब अमावस की काली रात आनेवाली थी और चंद्रमाँ अपने आप सिकुड़कर छुटिया गया, तो वह आकाश में अटकी परी खुद-ब-खुद, सीधी उनके घड़े पर आ गिरी, वह भी धड़ाम से। मानो भगवान के यहाँ से सीधा प्रसाद आया हो। दरअसल घड़ा भी तो ठीक चंदा के नीचे ही रखा था और आकाश में अब परीके लटके रहने का भी कोई जुगाड़ नहीं बचा। परी बिचारी के तो दोनों पर ही इस दुर्घटना में टूट गए। अब उनके सहारे उड़ना बिल्कुल ही असंभव था। यहाँ तक कि वह तो अब अपना रास्ता भी ठीक से मैन्यूवर नहीं कर सकती थीं। उड़ना तो दूर ऐसी हालत में अगर वह यहाँ का ड्राइविंग टेस्ट तक लेती तो भी निश्चित ही, पंडित जी से भी ज़्यादा बार फेल हो जाती।
इस गिरने-टूटने के चक्कर में बिचारा चंद्रमाँ तो पूरा-का-पूरा ही मिट चुका था। जहाँ परी लटकी थी वहाँ परमनेंट दाग पड़ गया सो अलग। गोरा सुंदर मुँह ख़ामखाँ ही बिगड़ गया। जी हाँ, वही आपका चरखा बुनती बुढ़िया की कहानी वाला दाग़। वैसे आपको शायद मालूम नहीं कि यह कहानी भी चंदा की माँ ने बेटे की इज़्ज़त बचाने के लिए उसी समय गढ़ी थी। अब आपको बचपन से बुद्धू बनने की आदत है तो इसमें बिचारी चंदा की माँ या परी का क्या दोष? चलें कहाँ यह अकल की बात ले बैठे हम भी - हमलोग तो अपने पंडित जी की विपदा की बात कर रहे थे। एक तो बेचारे दुखी, ऊपर से कीमती घड़ा टूटा सो अलग। वैसे भी यहाँ मिट्टी का घड़ा भी बीस पच्चीस पौंड से कम का नहीं आता। बिचारे पंडित जी अब समझ नहीं पा रहे थे कि पहले टूटे घड़े का भुगतान इंश्योरेंस से क्लेम करें या इस पैर टूटी पर-कटीं परी की सहायता? वैसे भी अब तो कोई इससे शादी नहीं करेगा कभी? कहाँ बिठाएँ - कहाँ रखें? और सहृदय पंडित जी ने तुरंत ही अपनी आहुति दे डाली। यही सबसे सस्ता और टिकाऊ उपाय था अब उनके पास। मृत पिता की इच्छा व आज्ञा मानकर उस परकटी परी से शादी कर ली उन्होंने तुरंत, वहीं उसी समय। आख़िर जजमान, मेहमान सभी तो हाज़िर हैं क़ौतुक में आई भीड़ को देखकर पंडित जी ने सोचा। वैसे भी उन्होंने ही तो बुलाया था इसे यहाँ इस धरती पर और इस बिचारी का है ही कौन उनके सिवा यहाँ पर? और फिर पिता जी ने ही तो भेजा है इसे। अब बापकी आज्ञा मानने का भी तो कोई फर्ज़ बनता है उनका!
पंडित जी को अब बालों की अलौकिक महिमा पर पूरा और अटल विश्वास हो चला था। वह उनकी महत्ता को अच्छी तरह से जान गए थे। शीशे के आगे उदास खड़े अपनी सपाट खोपड़ी पर हाथ घुमाते हमने भी कई बार देख है उन्हें। आख़िर हरक्यूलिस भी ऐसे ही तो कोई बड़े-बड़े बाल नहीं रखता था और फिर हमारे यहाँ, वहाँ भारत में भी तो बड़े-बड़े ज्ञानी-ध्यानी, सर की कौन कहें दाढ़ी-मूँछ तक के बाल नहीं कटवाते। ऋषि-मुनियों की तस्वीरें पंडित जी ने ही क्या आपने भी देख ही रखी होंगी? और हमारे पंडित जी ने उसी पल निश्चय ले लिया कि अगर सर पर बाल नहीं तो क्या मुँह पर तो रख ही सकते हैं कसम खाई कि अब एक भी बाल नहीं कटवाएँगे भले ही खीर वगैरह खाने में कितनी ही दिक्कत क्यों न हो? सृष्टि के सारे रहस्य धीरे-धीरे पंडित जी की समझ में आ रहे थे। अक्सर ही अकेले-अकेले वह पश्चाताप करते आख़िर क्यों बापू की यह चुटिया सँभालकर रखी? वैसे भी तो परी से शादी करना कोई मज़ाक की बात नहीं, वह भी एक परकटी परी से तो, कतई ही नहीं! सुना हैं लोगों के ऊपर सर मुँडाते ही ओले पड़ते हैं, यहाँ पंडित जी के ऊपर तो पूरी-की-पूरी परी ही आ गिरी थी।
जब भी परी का मन घूमने को करता वह अपने लिए वर्ड-ट्रिप बुक करा आती। अब बिचारी के पास पंख तो थे नहीं जो कहीं भी आ-जा पाए जैसे-तैसे हवाई-जहाज़ वगैरह से ही अपना काम चला रही थी वह। और आप खुद ही सोचिए स्वर्ग और आकाश चारों तरफ़ घूमने वाली, भला एक-दो देश से कैसे संतुष्ट हो पाती? वह भूल जाती कि उसे कोई इनस्टीटयूशन या गवर्नमेंट स्पौंसर नहीं कर रही थी किसी विश्व-सम्मेलन में जाने के लिए और बिचारे पंडित जी के पास तो बस बहुत ही लिमिटेड रिसोर्सेज थे। जल्दी ही पंडितजी के बारह बज गए। उनकी पूरी दान दक्षिणा, सीधा-भाजी सब परी की सेवा में ही अर्पण होने लगे। अपने खाने-पीने की कौन कहे अब तो ठाकुर जी के भोग तक के लाले पड़ गए और मंदिर में श्रद्धालु भक्तों की रोज़-रोज़ की खुसर-पुसर अलग से सुनाई देने लगी।
पंडितजी अपनी यह झटपट शादी अब रिग्रेट कर रहे थे। गनीमत थी कि उनके ठाकुर जी का मंदिर यहाँ फॉरेन में था कैसे भी काम चल ही जा रहा था। गुज़र-बसर हो ही जाती थी। वरना तो जान पर ही आ बनती। पंडित जी अब दिन-रात परी से जान छुड़ाने का कोई विनम्र और सभ्य तरीका ढूँढ़ने लगे। उन्हें याद आया कि उनकी परी का जी जब भी खुला आकाश देखने को करता है वह उनके बगीचे में सबसे ऊँचे पेड़ पर जा बैठती है और फिर घंटों आकाश को एक टक घूरती रहती है। अगली बार जैसे ही परी हवाई-जहाज़ पर लंबी घुमाई के लिए गई, पंडित जी दौड़कर वुलवर्थ से एक दर्जन क्विक-फिक्स ग्लू ख़रीद लाए और पूरी कि पूरी गोंद, परी के उस प्रिय पेड़ की सबसे ऊँची फुनगी पर चिपका दी।
पंडित जी के षडयंत्र से अनभिज्ञ परी जब अपने प्रिय पेड़ पर चढ़ी तो बस वहीं-की-वहीं ही बैठी रह गई। अब तो उसके उतरने की भी कोई गुँजाइश नहीं गिरकर भी नहीं इ़ंग्लैंड के इस विंडी, आँधी-पानी के मौसम में भी नहीं। क्योंकि पेड़ों के साथ तो पूर्णिमा या अमावस का कोई चक्कर ही नहीं होता। और परी को वही हवा में लटकी छोड़, पंडित जी चल पड़े देश से अपनी मैया को लिवाने। पहले जब बापू के बुलाने पर मैया आ रही थीं तो माई ने सोचा था कि चलो चलते-चलते आख़िरी बार गंगा ही नहा ली जाए, पर गंगा जी तो उन्हें देखते ही लगीं बुक्का फाड़कर रोने। बोलीं पूरे देशपर मलेच्छों की छाया पड़ चुकी है। तुम भी चली गई तो हमारी बात कौन सुने-समझेगा? हम किसके मन में अपनी परछाई तक देख पाएँगे अ़पने दुख-दर्द बाँट पाएँगे?
गंगा जी का विलाप सुनकर हिंदी-मैया का मन ऐसा दुखा कि आजतक बस वही गंगा किनारे ही छपिया तानकर रह रही हैं। सुनते हैं जब बहुत उदास हो जाती है तो वही गंगा किनारे-किनारे ही टहलती रहती हैं घाट-घाट भटकती रहती हैं। विदेश की कौन कहे अब तो उनके पाँव आस-पास के शहरों की तरफ़ भी नहीं उठ पाते। दिल्ली, कलकत्ता भी सपने जैसी बात है। हाँ, बस आसपास के कस्बे, गाँव और हाट-बाज़ारों में ही दिखाई-सुनाई दे जाती हैं चलते-फिरते।
ज्ञानी-विद्वान सब परेशान हैं इनकी लाचार हालत पर। ऐसे तो मिट जाएँगी यह। उनके उत्थान-प्रयास में लगे रहते हैं सब लोग। दिन-रात कहते फिरते हैं कि वी मस्ट डू समथिंग अबाऊट थिस। रोज़ बड़े-बड़े रिजोल्यूशन पास करते हैं यहीं नहीं विमान पकड़कर विदेश तक जा पहुँचे हैं अब तो क्या इंग्लैंड और क्या त्रिनिदाद, फिजी व सूरिनाम। आख़िर हिंदी मैया की बात हैं हिंदी की बिंदी की बात है? चार दिन तक सबने मिल-बैठकर यहाँ इंग्लैंड में भी यही समझा और समझाया था। हमने भी देखा-सुना था। सब लोग बार-बार सदमें में यही बात दोहरा रहे थे कि हिंदी मैया घाट किनारे बहुत ही बुरे हाल में हैं। उसे भी नहीं तो, यहाँ अब अपने पास विदेश में ही बुला लो।''
सारी कहानी सुनकर आप आख़िर में यह मत पूछ बैठिएगा कि हिंदी मैया कैसी हैं और उनके सपूत ई पंडित जी आखिर कवन हैं, कहाँ से आए हैं, कहाँ पर रहते हैं अउर उनका नाम पता क्या है वगैरह-वगैरह? इतना तो अब आपको भी मानना ही पड़ेगा कि यह तो वही बात हो जाएगी कि सारी रामायण ख़त्म, और हम पूछें ' सीता केकर बापू रहिलें?'
हमारी राय में तो यही नहीं, अब तो आपको यह भी मालूम हो जाना चाहिए कि क्रिसमस-ट्री पर परी पहुँची तो पहुँची कैसे और वास्तव में यह प्रथा किसने, कब, कहाँ और कैसे शुरू की !