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प्रस्तुत है लेखनी के पाठकों के लिए भारत की प्राचीन संस्कृति और जीवन शैली को उजागर करता हुआ आचार्य श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का एक रोचक आलेख;
प्राचीन भारत में मदनोत्सव

संस्कृत के किसी भी काव्य, नाटक, कथा और आख्यायिका को पढ़िए, वसन्त ऋतु का उत्सव उसमें किसी-न-किसी बहाने अवश्य आ जाएगा। कालीदास तो बसन्त-उत्सव का बहाना ढूँढते रहते थे। मेघदूत वर्षा ऋतु का काव्य है, पर यक्षप्रिया के उद्यान के वर्णन के प्रसंग में प्रिया के नूपुरयुक्त वामचरणों के मृदुल आघात से कन्धे पर से फूट उठने वाले अशोक और मुखमदिरा से सिंचकर खिल उठने को लालायित बकुल की चर्चा उसमें आ ही गयी है। वस्तुतः अशोक और बकुल को इस तरह खिला देने का उत्सव बसन्त में ही मनाया जाता था। बसंत का समय प्राचीन भारत में उत्सवों का काल हुआ करता था। 'कामसूत्र' में इस समय के कई उत्सवों की चर्चा आती है। इसमें दो बहुत प्रसिद्ध हैं-मदनोत्सव और सुवसन्तक। ' कामसूत्र ' के टीकाकार यशोधर ने दोनों को एक ही मान लिया है, पर अन्य ग्रन्थों से स्पष्ट है कि ये दोनों उत्सव अलग-अलग दिनों को मनाये जाते थे। भोजदेव के अनुसार सुवसन्तक वसंतावतार का उत्सव है-आजकल का वसंत-पंचमी का उत्सव। मदनोत्सव आज भी पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। वात्सायन के 'कामसूत्र ' में भी इसका उल्लेख है।
पुराने ग्रन्थों से पता चलता है कि फागुन से आरम्भ करके चैत के महीने तक वसंतोत्सव कई प्रकार से मनाया जाता था। इसके दो रूप बहुत प्रसिद्ध थे। एक सार्वजनिक धूमधाम का और दूसरा कामदेव के पूजन का। सम्राट हर्षदव की ' रत्नावली ' नाटिका में इन दोनों प्रकार के उत्सवों का बड़ा ही सरस और जीवन्त वर्णन मिलता है। उस दिन सारा नगर पुरवासियों की करतल ध्वनि, मधुर संगीत और मृदंग क मादक घोष से मुखरित हो उठता था। नागराजन मदमत्त हो उठते थे। राजा अपने प्रसाद की सबसे उँची चन्द्रशाला में बैठकर नगरवासियों के आमोद-प्रमोद का रस लेते थे। नागरिकाएँ मधुमास से मत्त होकर सामने पड़ जाने वाले किसी भी पुरुष को पिचकारी (श्रृंगक) के रंगीन जल से सराबोर कर देती थीं। राज-मार्गों के चौराहों पर मदल नाम के ढोल और चर्चरी गीत की ध्वनियां मुखरित हो उठती थीं। सुगन्धित पिष्टातक (अबीर) से दिशाएं रंगीन हो उठती थीं। केशरमिश्रित पिष्टातक से राजपथ और प्रसाद इस प्रकार आच्छादित हो उठते थे कि प्रातःकालीन उषा की छाया का भ्रम होने लगता था। नागरजनों के शरीर पर शोभमान हेमालंकार और सिर पर धारण किए हुये अशोक के फूल इस सुनहरी आभा को और भी बढञा देत थे। ऐसा जान पड़ता था कि कुबेर को भी अपनी समृद्धि से जीतने का दावा करने वाली सारी नगरी सुनहरे रंग में डुबो दी गयी है।
कीर्णौःपिष्टातकौधैः कृतदिवसमुखैः कुंकुमसिनात गौरेः
हेमालंकारभाभिर्भरनमितशिखैः शेखरैः कैकिरातैः।
एषा वेषाभिलक्ष्यस्वभवनविजिताशेषवित्तेशकोषा
कौशाम्बी शातकुम्भद्रवखजितजनेवैकपीता विभाति।
-'रत्नावली', 1.11
उस दिन बड़े घरों के सामने आंगन में फव्वारे पूरे वेग से छूटते रहते थे और नागरिकों की, अपनी पिचकारी में पानी भरने की उल्लास-लालसा को पूरा करने में सहायक हुआ करते थे। इस स्थान पर पौर-युवतियों क बारबार आते रहने से उनके सीमंत के सिन्दूर और कोपलों के अबीर झरते रहते थे और सारा फर्श लाल कीचड़ से भर जाता था, फर्श सिन्दूरमय हो उठता थाः
धरायंत्रविमुक्तसंततपथः पूरलुप्ते सर्वतः
सद्यःसान्द्रविमर्दकर्दमकृतकोड़े क्षणं प्रांगणे।
उद्दामप्रमदाकपोलनिपतत् सिन्दूर रागरूणैः
सैन्दूरीक्रियते जनने चरणन्यासैः पुरः कुट्टिमम्।।
मगर इस उत्सव का सर्वाधिक हुड़दंगी रूप वार-वनिताओं के मुहल्ले के वर्णन में मिलता है। निस्सन्देह यह होली का पुराना रूप है।
इसके साथ ही इस उत्सव का एक शांत-स्निग्ध चित्र भी मिलता है। भवभूति के 'मालती माधव' नामक प्रकरण में एक मदनोत्सव का चित्र है। इससे पता चलता है कि मदनोद्यान- जो विशेष रूप से इस उत्सव के लिए ही बनाया जाता था - इसका मुख्य केन्द्र हुआ करता था। उसमें कामदेव का मन्दिर हुआ करता था। इसी उद्यान में नगर के स्त्री-पुरुष एकत्र होकर भगवान कन्दर्प की पूजा करते थे। यहाँ पर लोग अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार फूल चुनते, माला बनाते, अबीर-कुंकुम से क्रीडा करते और गीत-नृत्य आदि से मनोविनोद किया करते थे। इस मंदिर में प्रतिष्ठित परिवारों की कन्याएँ भी पूजनार्थ आया करती थीं और मदनोत्सव की पूजा करके मनोवांछित वर की प्रार्थना करती थीं। जनता की भीड़ प्रातःकाल से ही शुरु हो जाती थी और मध्यकाल से अबाध गति से आती रहती थी। ' मालती-माधव' से पता चलता है कि अमात्य भूरिवसु की कन्या मालती भी इस उद्यान में कन्दर्प-पूजन के लिए आयी थी। इस पूजन में धार्मिक बुद्धि की प्रधानता होती थी और शोरगुल और हुड़दंग का नाम भी नहीं था। यह मंदिर नगर के बाहर हुआ करता था।
मदनोत्सव की एक पूजा चैत्र के महीने में होती थी। अशोक वृक्ष के नीचे मिट्टी का कलश स्थापित किया जाता था। सफेद चावल भरे जाते थे। फल और ईख का रस इस पूजा के नैवेध्य थे। कलश को सफेद वस्त्र से ढका जाता था। चन्दन भी उस पर सफेद ही छिड़का जाता था। कलश के ऊपर ताम्रपत्र पर केले के पत्ते रखे जाते थे, जिस पर कामदेव और रति की प्रतिमा उतारी जाती थी और नाना भांति के गन्ध, धूप, नृत्य, गीत आदि से देवताओं को तृप्त किया जाता था। वह 'मत्स्य पुराण' की बात है। इसके दूसरे दिन चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को भी पूजा होती थी। लोग व्रत रखते थे।
' शिल्प रत्न', ' विष्णु धर्मोत्तर पुराण' आदि ग्रन्थों में कामदेव की प्रतिमा बनाने की विधियां दी गयी हैं। ' विष्णुधर्मोत्तर' के अनुसार उसके आठ भुज हैं, तार पत्नियां: परन्तु 'शिल्परत्न ' में केवल यही कहा गया है कि वह अपूर्व सुन्दर हो और उसके बाँयी ओर अभिलाषवती रति और दाहिनी ओर गृहकर्म-निरता प्रीति, ये दो पत्नियां हों। स्थायी मन्दिरों में दोनों प्रकार की मूर्तियां बनती थीं, पर अशोक वृक्ष के नीचे जो मूर्ति बनती थी वह द्विभुज ही होती होगी। 'रत्नावली' नाटक में राजा को अशोकवृक्ष के नीचे बैठा देखकर रत्नावली को भ्रम हो गया था कि कामदेव साक्षत आकर पूजा गृहण करते हैं।
कालीदास के 'मालविकाग्निमित्र' और श्री हर्षदेव की 'रत्नावली' में इस उत्सव के सर्वाधिक सरस अनुष्ठान, अशोकवन में पुष्प ले आने का विवरण मिल जाता है। भोजराज और श्री हर्षदव की गवाही पर कहा जा सकता है कि उस दिन सुन्दरियां कुसुम्भी रंग की साड़ी पहनती थीं। तुरंत स्नान करने से रानी वासवदत्ता की शरीर-कान्ति और भी निखर आयी थी, वह कौसुम्भराग से रंजित साड़ी पहनकर जब अशोकवृक्ष के नीचे कामदेव की पूजा कर रही थी तो उसकी साड़ी का लाल पल्ला फड़फड़ा उठा था। उस समय राजा को ऐसा लगा था, जैसे तरुण प्रवाल-विटप की लता ही लहरा उठी हो।
प्रत्यग्रमज्जनविशेष विविक्त कान्तिः
कौसुम्भरागरुचिस्फुरदंशुकान्ता।
विभ्राजसे मकरकेतनमर्च्चयन्ती
बालप्रवालविटपिप्रभया लतेव।
' मालविकाग्निमित्र' से पता चलता है कि मदनदेवता की पूजा के बाद ही अशोक में फूल खिला देने का अनुष्ठान होता था। 'रत्नावली' में भी इसकी चर्चा है। इस अनुष्ठान का रूप इस प्रकार था- कोई सुन्दरी सर्वाभरणभूषिता होकर, पैरों को अलक्तकराग से रंजित करके, नूपुर सहित बांये चरण से अशोकवृक्ष पर आघात करती थी। इधर नूपुरों की हल्की झनझनाहट, उधर अशोक का सोल्लास कन्धे पर से ही फूल उठना। साधारणतः रानी यह कार्य करती थी। पर 'मालविकाग्निमित्र' में बताया गया है कि उस रानी के पैर में चोट आ गयी थी, इसलिए उन्होंने मालविका को भेज दिया था। मालविका अशोकवृक्ष के पास गयी, पल्लवों का गुच्छा हाथ से पकड़ा और बांये पैर से अशोक पर मृदु आघात किया।कालिदास की लेखनी ने इस मादक चित्र को अपूर्व गरिमा से भर दिया है।
परब्रह्म की उस मानसिक इच्छा का, जो संसार की सृष्टि में प्रवृत्त होती है, मूर्तरूप ही 'काम' है। जब यह सृष्टिरचना के अनुकूल होती है तो विष्णु और शिव का साक्षात रूप कही जाती है। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि मैं जीवमात्र में धर्म के अविरुद्ध रहने वाला 'काम' हूँ, परन्तु जो व्यक्तिगत इच्छा धर्म के विरुद्ध जाती है, वह अपदेवता है। काम का एक रूप धर्म के अविरुद्ध जाने वाला है, दूसरा धर्म के विरुद्ध जाने वाला। पहला साक्षात विष्णुरूप है। 'बृह्मसंहिता' में कहा गया है कि जो आनंद और चेतनामय रस से मन को भरता है, प्राणियों के मन में 'स्मर' या 'काम' रूप से प्रतिफलित होता है और इस अशेष भुवनों को जीतकर नित्य विद्यमान है, उस आदिपुरुष गोविन्द को मैं स्मरण करता हूँ(46)। 'मत्स्यपुराण' में ' काम्नाम्ना हरेरर्चा' कहकर बताया गया है कि वस्तुतः 'काम' नामक हरि की ही पूजा की जाती है। इसलिए मंदिर और मूर्ति बनाकर जिस दवता की पूजा की जाती है, वह साक्षात् विष्णु ही है। श्रीकृष्ण-गायत्री और काम-गायत्री में कोई फर्क नहीं है।
परन्तु इसका एक दूसरा रूप भी है, जो व्यक्ति के विवेक को दबा देता है। पश्चिम में 'किउपिट्' नामक देवता (या अपदेवता) को अन्धा माना गया है, क्योंकि वह विवेक को नष्ट करता है, मनुष्य को अन्धा बना देता है। शिव ने इसी मादक मदनदेवता को भस्म किया था। उसके भावात्मक ' मानसिक' रूप को बचा लिया था। यह आश्चर्य की बात है कि हमारे शास्त्रों में वार-वनिताओं के लिए जिस मदन-मूर्ति का विधान किया गया है, उसकी आँखों पर सोने के पत्तर की पट्टी बँधवा दी जाती है। 'किउपिट्' देवता की तरह उसे अन्धा तो नहीं कहा गया, पर अन्धे-जैसा बना अवश्य दिया गया है। 'हेमनत्र परावृतम् ' में पट्टी सोन की होने पर भी दृष्टिशक्ति का अभाव तो हो ही जायेगा। कामदव वसन्त-ऋतु का मित्र है। परन्तु 'कुमारसंभव' में वर्णित वसन्त अकाल का वसन्त है; अस्वाभाविक , बलादानीय, अपदवता। शिव ने इसी को ज्ञान के नेत्र उन्मीलित करके भस्म किया था।
शास्त्रों में काम के बाण और धनुष फूलों के बताये गये हैं। अरविन्द, अशोक, आम, नवमल्लिका और नीलोत्पल, ये उसके पांच बाण हैं, जिन्हें क्रमशः उन्मादन, तापन, शोषण, स्तम्भन और सम्मोहन भी कहा गया है।
संसार की सभी सभ्य आदमजातियों में वसन्तकाल में उद्दाम यौवन-उन्माद के उत्सव पाए जाते हैं। कहीं-कहीं ये उत्सव बहुत ही स्थूल यौन-वासना रूप में पाये जाते हैं, कहीं संयत और सुरुचिपूर्ण रूप में। प्राचीन भारत में इस उत्सव के उद्दाम रूप को संयत, सुरुचिपूर्ण और धर्माविरुद्ध देवता के रूप में सँवारन का सफल प्रयत्न किया गया था। अपेक्षाकृत निम्न स्तर के लोगों में सदा वह सीमातिक्रमण करके प्रकट होता रहा और दुर्भाग्यवश अभी भी किसी-न-किसी रूप में जी रहा है, परन्तु इस सहज उद्दाम लीला को शान्त, संयम और शिष्ट रूप में डालने का प्रयत्न अवश्य श्लाघ्य माना जायेगा। आदिम सहजात वृत्तियों को सुरुचिपूर्ण, संयत और कल्याणमुखी बनाकर ही मनुष्य ' मनुष्य' बना है, नहीं तो वह पशु ही रह गया होता। प्राचीन भारत के मदनोत्सव में मनुष्य के इस प्रयत्नशील तत्व को ही चरितार्थता प्राप्त होती है।
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