सोच और संस्कारों की साँझी धरोहर 

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"ज्योति-पर्व"

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"A candle loses nothing by lighting another candle."

                            

 लेखनी-अँक-9.

 

 

 (सर्वाधिकार सुरक्षित)

copyrights to writers and publisher only.

     संरचना व संपादन:: शैल अग्रवाल. 

संपर्क -सूत्र-  editor@lekhni.net  ,  shailagrawal@hotmail.com

      पत्रिका प्रति माह की पहली तारीख को परिवर्तित की जाती है।

 


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 -अपनी बात  

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        -शैल अग्रवाल-  

अब जब रातें गहरा आई हैं और दिन छोटे लगने लगे हैं, एकबार फिर  त्योहारों का मौसम आ गया है। कहीं गरबा की मनोहारी छटा है, तो कहीं ईद की सेवईयों की मीठी खुशबू। कहीं दिवाली और गाइ-फौक्स के पटाखों का शोर है, तो कहीं उपहारों से लदे-फंदे फादर क्रिसमस के आगमन की उत्साह पूर्ण तैयारियाँ। यहाँ इंगलैंड में तो आजकल दिवाली और ईद के लिए जो सजावट होती है अधिकांशतः क्रिसमस के बाद ही उतर पाती है और तब काली-से-काली और थरथराती रातें भी नए उल्लास में उष्मित हो जगमगाने लगती हैं...  झिलमिल करते घर-आँगन, बाजार, मोहल्लों की तरह ही ...।

       अंधेरे और पतझड़ के इस मौसम में जब अंधेरा नभ से उतर-उतरकर आंखों में भरता जाता है, मन की तहों में जमने लगता है, हर समाज दीप और ज्योति के पर्व मनाता है, जिससे कि हम याद रख सकें कि अंधेरे को दूर करना जरूरी है। कीचड़ से भी कमल उग आता है -जरूरत है तो बस थोड़े-से आत्म-विश्वास की। एक लौ (लगन) की; लौ- ज्ञान की, लौ-सेवा-सहकार की, लौ- अच्छाई में विश्वास की, लौ-एकता ... विश्व-बन्धुत्व की...। फिर हमारे पास तो पूर्वजों की जगमग यादे हैं। ज्ञान की अनमोल धरोहर है। एक लौ-सा ही दीप्त  सजग और कर्मठ इतिहास है।

       इस वर्ष क्यों न हम आप  आस्था और विश्वास के कुछ नए दीप जलाएँ--- जोत जो न सिर्फ अमा को चीरे, अपितु  निश्चित दिशा उजागर करे। आइये एक दूसरे के गले मिलकर एक नया दशहरा, नई दिवाली, नई ईद...और नया क्रिसमस मनाएँ !

                                                                   

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दीपावली विशेषः

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"तमसो मा ज्योतिर्गमय "

 

जल मेरे दीप अभी और जल

बुझ रही बाती कुछ और जल।

 

अपने उर का नेह पिला

तूने जो लौ लगाई थी

अंतस की चिनगारी ले वह

अँधियारे से लड़ आई थी।

 

बुझ न जाए यूँ तिलतिल

कुछ और उर में नेह भर

नेह का यह कर्ज तुझ पर

जल मेरे दीप और जल ।

 

इरादों की दुनिया में

रिवाजों का अर्थ नहीं

अंतः सलिला में डूबने

या उबरने का तर्क नहीं।

 

उदधि हो जा इसके लिए

उमंगों की तरंग बन

मुट्ठियों में ले ले अँधेरे

जल मेरे दीप और जल ।

 

बादल और सिन्धु-सा

कर्ता और कर्म-सा

साथ है यह उम्र का

हार कर पीछे न हट।

 

शब्दों के अभाव में

अर्थ बन जा

सूरज-सा

हर राह पे चमक ।

 

तेरे पथ में कर्मयोगी

हारने का विकल्प नहीं

डूबे ना वो आखिरी किरन

डूबती सांसों से लड़।

 

जल मेरे दीप

सुबह होने तक जल ! 

-शैल अग्रवाल-

 

 

 

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दिया और बाती

 

रात थी घनेरी

बात भी अकेली

उर में सब नेह भरे

बैठा रहा एक दिया

बाती की आस में

अंतस जगमगाने को

भीग गई बाती तब

दिए के नेह से

तिलतिल  

जल जाने को...

 

-शैल अग्रवाल- 

 

 

 

 

 


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जो है, क्या वही सही है...या हम चाहते हैं...क्या नियति को स्वीकारना ही जीवन है...मूल्यों का यह टकराव और सामंजस्य की बेड़ियां... कहां तक सही हैं नेह और विश्वास की सीमाएं...? जीवन की उहापोह उतनी ही शाश्वत है जितना कि जीवन खुद और हम; पुरुष व प्रकृति- रंगभूमि के दो स्थाई पात्र...पर क्या सब जान-समझकर भी कुछ बदल पाते हैं! 

टूटता-झरता पतझर यूरोप में एक बेहद अनूठा और खूबसूरत मौसम है। पेडों से गिरते कई-कई रंगों के सूखे पत्ते धरती को मानो रंग-बिरंगे परिधान पहना देते हैं...और तब निर्झर आंसूओं में डूबी प्रकृति कई-कई सवाल खड़े कर देती है...सवाल जो बिखरे हैं चारो तरफ...सवाल जिनके जबाव हर जाती ऋतु बसंत से पूछती ही रह जाती है।

मन्थन में इसबार प्रस्तुत है अज्ञेय जी का एक मार्मिक एवं विचारोत्तेजक आलेख 'बर्लिन की डायरी से'- 

 

पतझर का एक पात

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                              सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'

आज जैसे जंगल पहले न देखे हों, ऐसा नहीं, पर पत्तियों के ऐसे जलते रंगों का पुंज---वह नहीं देखा...हमारे यहां इक्के-दुक्के पेड़ ऐसे देखने को मिल जाते हैं, बहुत हुआ तो आठ-दस पेड़ों की पांत। पर इस वनखण्डों में सभी कुछ ऐसी भड़कीली लाल-पीली-सुनहली पोशाक पहने थे, और नीचे बिछे पत्तों पर पड़ते हुए धूप के वृत्त सोने के मुकुट-जैसे चमक जाते थे। हमारे पैरों से रौंदी जाकर पत्तियां एक तीखी परन्तु हृद्य गन्ध दे रही थीं---और मुझे बचपन की स्मृतियों में डुबाए दे रही थीं।

मेरी साथिन ने, जो जर्मन है पर यहां के एक भारतीय विद्यार्थी की वाग्दत्ता है और इसी से मेरी परिचित हुई, सहसा कहा, " मुझे बचपन की याद आ रही है---पिता के साथ इस वन में घूमने आया करती थी। वह भी ऐसे ही तुम्हारी तरह ही तेज चलते थे---अब तो लोग तेज चलते ही नहीं।"

मैं कहने को हुआ " और लड़कियां कौन तेज चलती हैं? खासकर हमारे देश में तो---" पर चुप रहा मुसकरा दिया।

सामने कई पैरों की चाप सुनाई दी, थोड़ी देर में पगडंडी के मोड़ के आगे लोग दीखे। एक छोटी सैनिक टुकड़ी---नायक के साथ आठ सैनिक जिन्हें शायद मार्च का अभ्यास कराया जा रहा था। वे आकर दूसरी ओर निकल गये, हम आगे बढ़ते रहे। 

चुपचाप। पर मौन से भी मुझे लगा कि कुछ बदल गया है। साथिन से पूछा, " क्या बात है?" और उसके बदले हुए स्वर से चौंक गया--- " इन सिपाहियों ने आकर सब कुछ बिगाड़ दिया!" 

मैने कहा " वे तो गये। पत्तियां तो अब भी वैसी ही रंगीन हैं, और धूप---" 

उसने आविष्ट स्वर में कहा, " नहीं, मैं और सैनिक नहीं देखना चाहती! क्यों सब जगह सैनिक हैं?"

प्रसंग बहुत ही नाजुक था---हर जर्मन के लिए होता, पूर्वी बर्लिन में और भी अधिक क्योंकि वहां सैन्य-सत्ता कहीं अधिक दृश्य है, और नागरिक जीवन पर उसकी छाप कहीं अधिक गहरी।...मैं उससे उनके युद्धकालीन अनुभवों की बात पूछना चहता---पर दूसरे के जीवन को कुरेदने का अधिकार तभी मिलता है जब पहले सहानुभूति का सम्बन्ध स्पष्ट हो चुका हो---क्या वैसी स्थिति मेरी है? मैने कुछ पूछा नहीं---उस समय...पर कितने प्रश्न मेरे मन में थे---हैं...

वन में एक छोटी झील मिली, उसमें तिरते पत्तों को हम देखा किये। जर्मन स्वभाव की कल्पनाशीलता जागी, उसने कहा, "ये पत्तियां परियों की डोगियां हैं। जाड़ों में ये बर्फ के नीचे छिप जाएँगी; वसंत में फिर निकलेंगीं। अगले वर्ष--- " पर अगले वर्ष के उल्लेख से वह फिर उदास हो गयी।

लौटकर विदा लेने से पहले मैने उसे भोजन पर आमंत्रित किया, और हम लोग एक रेस्तरां की ओर बढ़े। रास्ते में उसने कहा," तुम मुझे जर्मनी से बाहर कहीं---या अपने देश में ---कोई काम नहीं दिला सकते---मैं झाड़ू-बरतन के लिए भी तैयार हूं।"

मैने चौंककर कहा," क्यों?" क्योंकि मुझे मालूम है वह एक दैनिक-पत्र में काम करती है।

उसने इधर-उधर देखकर कहा, " क्योंकि बर्लिन अब रहने लायक नहीं रह गया है। मैं शान्ति के वातावरण में रहना चाहती हूं।"

मैने पूछा, " तो क्या पश्चिमी बर्लिन में नहीं जाया जा सकता?"  

" पर मैं काम लेकर जाना चाहती हूं---भागकर नहीं। यहां असह्य है---पर शरणार्थी बन जाना भी तो---भविष्य गिरवी रख देना है।"

मैं थोड़ी देर चुप रहा। फिर मैने कहा, " वे राजनीतिक शरणार्थी तो बड़े आदमी होते हैं---तुम तो एक बिचारी लड़की--- "

उसने जोर से कहा," नहीं, नहीं, नहीं! भागकर नहीं जाऊंगी, शरणार्थी नहीं बनूंगी! यहां गुलामी है, पर गुलाम विद्रोह तो कर सकते हैं, और अनेक साथ होते हैं। पर शरणार्थी सब अकेले होते हैं---और लड़ेंगे किससे?"

खाने बैठे तो हमें पासपोर्ट दिखाने को कहा गया---पूर्वी बर्लिन में बिना इसके खाना नहीं मिल सकता---क्योंकि अगर पश्चिमी जर्मन का हो तो उसे खाना नहीं दिया जाएगा। पहले चौंका, फिर मुझे स्थिति याद आ गयी, चुपचाप पासपोर्ट दिखा दिया।

अब रात में पश्चिमी बर्लिन के इस छोटे होटल की तीसरी मंजिल से बाहर का प्रकाश देखता हुआ सोच रहा हूं: कौन-सा अच्छा है---अपने देश में दासवत् रहना, या दूसरों के बीच अनाथवत्? 

वह कहती थी, हिन्दुस्तानी भोले होते हैं; ठीक ही है; पर भोलापन खोने को इतिहास ने उन्हें बाध्य भी नहीं किया। यह उनका सौभाग्य रहा है। वे यूरोप के असमंजस का हल नहीं निकाल सकते, पर सहानुभूति तो दे सकते हैं... 

 

                                                   *  

 

 

 

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कविता (धरोहर)

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गोपालदास "नीरज"

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अंधियार ढल कर ही रहेगा

आंधियां चाहें उठाओ,
बिजलियां चाहें गिराओ,
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

रोशनी पूंजी नहीं है, जो तिजोरी में समाये,
वह खिलौना भी न, जिसका दाम हर गाहक लगाये,
वह पसीने की हंसी है, वह शहीदों की उमर है,
जो नया सूरज उगाये जब तड़पकर तिलमिलाये,
उग रही लौ को न टोको,
ज्योति के रथ को न रोको,
यह सुबह का दूत हर तम को निगलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

दीप कैसा हो, कहीं हो, सूर्य का अवतार है वह,
धूप में कुछ भी न, तम में किन्तु पहरेदार है वह,
दूर से तो एक ही बस फूंक का वह है तमाशा,
देह से छू जाय तो फिर विप्लवी अंगार है वह,
व्यर्थ है दीवार गढना,
लाख लाख किवाड़ जड़ना,
मृतिका के हांथ में अमरित मचलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

है जवानी तो हवा हर एक घूंघट खोलती है,
टोक दो तो आंधियों की बोलियों में बोलती है,
वह नहीं कानून जाने, वह नहीं प्रतिबन्ध माने,
वह पहाड़ों पर बदलियों सी उछलती डोलती है,
जाल चांदी का लपेटो,
खून का सौदा समेटो,
आदमी हर कैद से बाहर निकलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

वक्त को जिसने नहीं समझा उसे मिटना पड़ा है,
बच गया तलवार से तो फूल से कटना पड़ा है,
क्यों न कितनी ही बड़ी हो, क्यों न कितनी ही कठिन हो,
हर नदी की राह से चट्टान को हटना पड़ा है,
उस सुबह से सन्धि कर लो,
हर किरन की मांग भर लो,
है जगा इन्सान तो मौसम बदलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा ।

 

 

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मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा !

यह जो रात चुरा बैठी है चांद सितारों की तरुणाई,
बस तब तक कर ले मनमानी जब तक कोई किरन न आई,
खुलते ही पलकें फूलों की, बजते ही भ्रमरों की वंशी
छिन्न-भिन्न होगी यह स्याही जैसे तेज धार से काई,
तम के पांव नहीं होते, वह चलता थाम ज्योति का अंचल
मेरे प्यार निराश न हो, फिर फूल खिलेगा, सूर्य मिलेगा !
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा !

सिर्फ भूमिका है बहार की यह आंधी-पतझारों वाली,
किसी सुबह की ही मंजिल है रजनी बुझे सितारों वाली,
उजड़े घर ये सूने आंगन, रोते नयन, सिसकते सावन,
केवल वे हैं बीज कि जिनसे उगनी है गेहूं की बाली,
मूक शान्ति खुद एक क्रान्ति है, मूक दृष्टि खुद एक सृष्टि है
मेरे सृजन हताश न हो, फिर दनुज थकेगा, मनुज चलेगा !
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा !

व्यर्थ नहीं यह मिट्टी का तप, व्यर्थ नहीं बलिदान हमारा,
व्यर्थ नहीं ये गीले आंचल, व्यर्थ नहीं यह आंसू धारा,
है मेरा विश्वास अटल, तुम डांड़ हटा दो, पाल गिरा दो,
बीच समुन्दर एक दिवस मिलने आयेगा स्वयं किनारा,
मन की गति पग-गति बन जाये तो फिर मंजिल कौन कठिन है?
मेरे लक्ष्य निराश न हो, फिर जग बदलेगा, मग बदलेगा !
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा !

जीवन क्या?-तम भरे नगर में किसी रोशनी की पुकार है,
ध्वनि जिसकी इस पार और प्रतिध्वनि जिसकी दूसरे पार है,
सौ सौ बार मरण ने सीकर होंठ इसे चाहा चुप करना,
पर देखा हर बार बजाती यह बैठी कोई सितार है,
स्वर मिटता है नहीं, सिर्फ उसकी आवाज बदल जाती है।
मेरे गीत उदास न हो, हर तार बजेगा, कंठ खुलेगा !
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा !

  

 

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जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना

अन्धेरा धरा पर कहीं रह न जाये |


नयी ज्योति के धर नये पंख झिलमिल,

उडे मर्त्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,

लगे रोशनी की झडी झूम ऐसी,

निशा की गली में तिमिर राह भूले,

खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,

उषा जा न पाये, निशा आ ना पाये |


जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना

अन्धेरा धरा पर कहीं रह न जाये |


स्रजन है अधूरा अगर विश्व भर में,

कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,

मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,

कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,

चलेगा सदा नाश का खेल यूं ही,

भले ही दिवाली यहां रोज आये |


जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना

अन्धेरा धरा पर कहीं रह न जाये |


मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ जग में,

नहीं मिट सका है धरा का अंधेरा,

उतर क्यों न आयें नखत सब नयन के,

नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,

कटेंगे तभी यह अंधरे घिरे अब,

स्वय धर मनुज दीप का रूप आये |


जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना

अन्धेरा धरा पर कहीं रह न जाये |

 

 

 

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तुम दीवाली बनकर जग का तम दूर करो,
मैं होली बनकर बिछड़े हृदय मिलाऊंगा !

सूनी है मांग निशा की चंदा उगा नहीं
हर द्वार पड़ा खामोश सवेरा रूठ गया,
है गगन विकल, आ गया सितारों का पतझर
तम ऎसा है कि उजाले का दिल टूट गया,
तुम जाओ घर-घर दीपक बनकर मुस्काओ
मैं भाल-भाल पर कुंकुम बन लग जाऊंगा !

तुम दीवाली बनकर जग का तम दूर करो,
मैं होली बनकर बिछड़े हृदय मिलाऊंगा !

कर रहा नृत्य विध्वंस, सृजन के थके चरण,
संस्कृति की इति हो रही, क्रुद्व हैं दुर्वासा,
बिक रही द्रौपदी नग्न खड़ी चौराहे पर,
पढ रहा किन्तु साहित्य सितारों की भाषा,
तुम गाकर दीपक राग जगा दो मुर्दों को
मैं जीवित को जीने का अर्थ बताऊंगा !

तुम दीवाली बनकर जग का तम दूर करो,
मैं होली बनकर बिछड़े हृदय मिलाऊंगा !

इस कदर बढ रही है बेबसी बहारों की
फूलों को मुस्काना तक मना हो गया है,
इस तरह हो रही है पशुता की पशु-क्रीड़ा
लगता है दुनिया से इन्सान खो गया है,
तुम जाओ भटकों को रास्ता बता आओ
मैं इतिहास को नये सफे दे जाऊंगा !

तुम दीवाली बनकर जग का तम दूर करो,
मैं होली बनकर बिछड़े हृदय मिलाऊंगा !

मैं देख रहा नन्दन सी चन्दन बगिया में,
रक्त के बीज फिर बोने की तैयारी है,
मैं देख रहा परिमल पराग की छाया में
उड़ कर आ बैठी फिर कोई चिन्गारी है,
पीने को यह सब आग बनो यदि तुम सावन
मैं तलवारों से मेघ-मल्हार गवाऊंगा !

तुम दीवाली बनकर जग का तम दूर करो,
मैं होली बनकर बिछड़े हृदय मिलाऊंगा !

जब खेल रही है सारी धरती लहरों से
तब कब तक तट पर अपना रहना सम्भव है !
संसार जल रहा है जब दुख की ज्वाला में
तब कैसे अपने सुख को सहना सम्भव है !
मिटते मानव और मानवता की रक्षा में
प्रिय ! तुम भी मिट जाना, मैं भी मिट जाऊंगा !

तुम दीवाली बनकर जग का तम दूर करो,
मैं होली बनकर बिछड़े हृदय मिलाऊंगा !

 

 


                                               *
 

 


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कविता आज और अभी

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(माह के हस्ताक्षर) 

.दिविक रमेश 

.नरेश शांडिल्य

 

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 अंधेरों के ख़िलाफ़ः

 

बाबजूद बेशुमार दुआओं के

मेरी ओर

लगातार बढ़ रहा है

अंधेरे का एक भयावह सैलाब

शह और मात की

शतरंजी दहशत का

एक बेचैन सा दबाब

 

दूसरी ओर

हज़ारों बद्दुआओं के बावजूद

मेरे मग़ज़ की भित्तियों में

कहीं पलकें झपकाता रहता है...एक जुगनू

अंधेरों के खिलाफ

अदब के साथ

रह-रहकर चमकता है मौन

 

ताज्ज़ुब है

उसकी खामोश और अदना-सी मौजूदगी भी

चर्चा का विषय है

माफ़िया अंधेरों की

रोज़-रोज़, रात-रात

आपात बैठक का

 

कैसा भी

कितना भी हो प्रकाश

प्रकाश से डरता है...अंधकार

              नरेश शांडिल्य   

 

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         डर  

 

बस इतना ही मालूम था मुझे

 

कि एक डोर है यह

जिसका यह सिरा मेरे हाथ में है।

 

कहां है दूसरा सिरा

सब कुछ अदृश्य था

जितना भी खींच लूं

हिला लूं कितना भी

कहीं कोई तनाव नहीं था डोर में

हालांकि

आ बसा था तनाव

पूरा

मेरी देह में

 

डर भी था कितना

और वह भी अजाना

कि नहीं छोड़ पा रहा था डोर को।

 

तभी किसी विचार की तरह

 

न जाने कैसे सूझा

और पाया

वह डोर, डोर थी ही नहीं

      

एक उंगली थी किसी दैत्य की।

 

मेरा हिलना डुलना

यहां तक कि चलना भी

उसी उंगली के वश था

 

मैं स्वयं

जैसे उसी के वशीभूत था

उसकी अद्भुत आत्मीयता से

 

उसकी उंगलियों से ही

निरंतर उतर रही थीं

उदासियां

मेरी देह में

कि तन रही थीं जो निरंतर

 

और मैं

कुर्बानी की हद तक

स्वीकार कर रहा था जिन्हें।

 

कितनी कठोर होती है सच की समझ

मैने जाना था।

 

झटक दिया था

एक ही झटके में 

मैने उस दैत्य की उंगली को

 

आश्चर्य!

न डर था, न तनाव

मैं स्थिर था

मेरी उदासियां तक

कुर्बान हो चली थीं

खुद मुझ पर।  

दिविक रमेश         

    

 

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जो साथ सफर में तुम होते

 

जो साथ सफ़र में तुम होते

काहे को इतने गम होते

 

कन्धों पर पंख उगे रहते

कदमों पर फ़लक झुके रहते

क्या जाने फिर क्या हम होते

 

चंदा, सूरज, अरबों तारे

इस झोली में होते सारे

हम कौन खुदा से कम होते

 

फिर आज़ आज़, कल कल होता

हर पल का कोई हल होता

दीदे ना इतने नम होते

          नरेश शांडिल्य 

 

 

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खुशी

खुशी को मैने

 

उंगलियों में पकड़ा

और सहलाया उसकी उंगलियों को

 

पाया

खुशी सर्माते शर्माते

सकुचा गई थी

 

मैने

थोड़ा खोला खुशी की पंखुड़ियों को

 

पाया खुशी

मेरी खुशी में

सम्मिलित हो गई थी

 

मैने खोल दिया पूरा

और कर दिया अर्पित उसे

उस पूरी दुनिया पर

जहां नहीं थी वह

 

पाया

मैने कभी नहीं देखा था खुशी को

इससे ज्यादा खुश

पहले कभी

 

ताज्जुब

मेरी खुशी तक मना रही थी जश्न

जैसे मुक्त हो गई हो मेरी कैद से।

दिविक रमेश

 

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पुनर्जन्म

 

निरर्थक प्रश्नों

और वाहियात उत्तरों के बावजूद

पेड़ के हर ठूँठ में

सोई है एक प्रतीक्षा

करवट ले रहा है एक हरा स्वप्न

कमर कस रहा है

एक निश्चित संघर्ष

 

अपने होने

न होने की बहस से

बहुत ऊपर उठ चुका है

होने का फिर फिर होना

             नरेश शांडिल्य

   

         

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कहानी (धाती)

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यशपाल

 

करवा का व्रत

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न्हैयालाल अपने दफ्तर के हमजोलियों और मित्रों से दो तीन बरस बड़ा ही था, परन्तु ब्याह उसका उन लोगों के बाद हुआ। उसके बहुत अनुरोध करने पर भी साहब ने उसे ब्याह के लिए सप्ताह-भर से अधिक छुट्टी न दी थी। लौटा तो उसके अन्तरंग मित्रों ने भी उससे वही प्रश्न पूछे जो प्रायः ऐसे अवसर पर दूसरों से पूछे जाते हैं और फिर वही परामर्श उसे दिये गये जो अनुभवी लोग नवविवाहितों को दिया करते हैं।

हेमराज को कन्हैयालाल समझदार मानता था। हेमराज ने समझाया-बहू को प्यार तो करना ही चाहिए, पर प्यार से उसे बिगाड़ देना या सिर चढ़ा लेना भी ठीक नहीं। औरत सरकश हो जाती है, तो आदमी को उम्रभर जोरू का गुलाम ही बना रहना पड़ता है। उसकी जरूरतें पूरी करो, पर रखो अपने काबू में। मार-पीट बुरी बात है, पर यह भी नहीं कि औरत को मर्द का डर ही न रहे। डर उसे ज़रूर रहना चाहिए ...मारे नहीं तो कम-से-कम गुर्रा तो ज़रूर दे। तीन बात उसकी मानो तो एक में ना भी कर दो। यह न समझ ले कि जो चाहे कर या करा सकती है। उसे तुम्हारी खुशी-नाराजगी की परवाह रहे। हमारे साहब जैसा हाल न हो जाये।...मैं तो देखकर हैरान हो गया। एम्पोरियम से कुछ चीजें लेने के लिये जा रहे थे तो घरवाली को पुकारकर पैसे लिये। बीवी ने कह दिया-' कालीन इस महीने रहने दो। अगले महीने सही', तो भीगी बिल्ली की तरह बोले ' अच्छा!' मर्द को रुपया-पैसा तो अपने पास में रखना चाहिये। मालिक तो मर्द है।

कन्हैया के विवाह के समय नक्षत्रों का योग ऐसा था कि ससुराल वाले लड़की की विदाई कराने के लिये किसी तरह तैयार नहीं हुये। अधिक छुट्टी नहीं थी इसलिये गौने की बात ' फिर' पर ही टल गई थी। एक तरह से अच्छा ही हुआ। हेमराज ने कन्हैया को लिखा-पढ़ा दिया कि पहले तुम ऐसा मत करना कि वह समझे कि तुम उसके बिना रह नहीं सकते, या बहुत खुशामद करने लगो।...अपनी मर्जी रखना, समझे। औरत और बिल्ली की जात एक। पहले दिन के व्यवहार का असर उस पर सदा रहता है। तभी तो कहते हैं कि ' गुर्बारा वररोजे अव्वल कुश्तन'- बिल्ली के आते ही पहले दिन हाथ लगा दे तो फिर रास्ता नहीं पकड़ती।...तुम कहते हो, पढ़ी-लिखी है, तो तुम्हें और भी चौकस रहना चाहिये। पढ़ी-लिखी यों भी मिजाज दिखाती है।

निःश्वार्थ-भाव से हेमराज की दी हुई सीख कन्हैया ने पल्ले बाँध ली थी। सोचा- मुझे बाजार-होटल में खाना पड़े या खुद चौका-बर्तन करना पड़े, तो शादी का लाभ क्या? इसलिए वह लाजो को दिल्ली ले आया था। दिल्ली में सबसे बड़ी दिक्कत मकान की होती है। रेलवे में काम करने वाले, कन्हैया के जिले के बाबू ने उसे अपने क्वार्टर का एक कमरा और रसोई की जगह सस्ते किराये पर दे दी थी। सो सवा साल से मजे में चल रहा था।

लाजवन्ती अलीगढ़ में आठवीं जमात तक पढी थी। बहुत-सी चीजों के शौक थे। कई ऐसी चीजों के भी जिन्हें दूसरे घरों की लड़कियों को या नयी ब्याही बहुओं को करते देख मन मारकर रह जाना पड़ता था। उसके पिता और बड़े भाई पुराने ख्याल के थे। सोचती थी, ब्याह के बाद सही। उन चीजों के लिये कन्हैया से कहती। लाजो के कहने का ढंग कुछ ऐसा था कि कन्हैया का दिल इनकार करने को न करता, पर इस ख्याल से कि वह बहुत सरकश न हो जाये, दो बात मानकर तीसरी पर इनकार भी कर देता। लाजो मुँह फुला लेती। लाजो मुँह फुलाती तो सोचती कि मनायेंगे तो मान जाऊँगी, आखिर तो मनायेंगे ही। पर कन्हैया मनाने की अपेक्षा डाँट ही देता। एक-आध बार उसने थप्पड़ भी चला दिया। मनौती की प्रतीक्षा में जब थप्पड़ पड़ जाता तो दिल कटकर रह जाता और लाजो अकेले में फूट-फूटकर रोती। फिर उसने सोच लिया- ' चलो, किस्मत में यही है तो क्या हो सकता है?' वह हार मानकर खुद ही बोल पड़ती।

कन्हैया का हाथ पहली दो बार तो क्रोध की बेबसी में ही चला था, जब चल गया तो उसे अपने अधिकार और शक्ति का अनुभव होने लगा। अपनी शक्ति अनुभव करने के नशे से बड़ा नशा दूसरा कौन होगा ? इस नशे में राजा देश-पर-देश समेटते जाते थे, जमींदार गाँव-पर-गाँव और सेठ मिल और बैंक खरीदते चले जाते हैं। इस नशे की सीमा नहीं। यह चस्का पड़ा तो कन्हैया के हाथ उतना क्रोध आने की प्रतीक्षा किये बिना भी चल जाते।

मार से लाजो को शारीरिक पीड़ा तो होती ही थी, पर उससे अधिक होती थी अपमान की पीड़ा। ऐसा होने पर वह कई दिनों के लिये उदास हो जाती। घर का सब काम करती। बुलाने पर उत्तर भी दे देती। इच्छा न होने पर भी कन्हैया की इच्छा का विरोध न करती, पर मन-ही-मन सोचती रहती, इससे तो अच्छा है मर जाऊँ। और फिर समय पीड़ा को कम कर देता। जीवन था तो हँसने और खुश होने की इच्छा भी फूट ही पड़ती और लाजो हँसने लगती। सोच यह लिया था, ' मेरा पति है, जैसा भी है मेरे लिये तो यही सब कुछ है। जैसे यह चाहता है, वैसे ही मैं चलूँ।' लाजो के सब तरह अधीन हो जाने पर भी कन्हैया की तेजी बढ़ती ही जा रही थी। वह जितनी अधिक बेपरवाही और स्वच्छन्दता लाजो के प्रति दिखा सकता, अपने मन में उसे उतना ही अधिक अपनी समझने और प्यार का संतोष पाता।

क्वार के अन्त में पड़ोस की स्त्रियाँ करवा चौथ के व्रत की बात करने लगीं। एक-दूसरे को बता रही थीं कि उनके मायके से करवे में क्या आया। पहले बरस लाजो का भाई आकर करवा दे गया था। इस बरस भी वह प्रतीक्षा में थी। जिनके मायके शहर से दूर थे, उनके यहाँ मायके से रुपये आ गए थे। कन्हैया अपनी चिठ्ठी-पत्री दफ्तर के पते से ही मँगाता था। दफ्तर से आकर उसने बताया, ' तुम्हारे भाई ने करवे के दो रुपये भेजे हैं।'

करवे के रुपये आ जाने से ही लाजो को संतोष हो गया। सोचा, भैया इतनी दूर कैसे आते? कन्हैया दफ्तर जा रहा था तो उसने अभिमान से गर्दन कन्धे पर टेढ़ी कर और लाड़ के स्वर में याद दिलाया- ' हमारे लिए सरघी में क्या-क्या लाओगे...?'           

और लाजो ने ऐसे अवसर पर लाई जाने वाली चीजें याद दिला दीं। लाजो पड़ोस में कह आई कि उसने भी सरघी का सामान मँगाया है। करवा चौथ का व्रत भला कौन हिन्दू स्त्री नहीं करती? जनम-जनम यही पति मिले, इसलिए दूसरे व्रतों की परवाह न करने वाली पढ़ी-लिखी स्त्रियां भी इस व्रत की उपेक्षा नहीं कर सकतीं।

अवसर की बात, उस दिन कन्हैया लंच की छुट्टी में साथियों के साथ कुछ ऐसे काबू में आ गया कि सवा तीन रुपये खर्च हो गये। वह लाजो का बताया सरघी का सामान घर नहीं ला सका। कन्हैया खाली हाथ घर लौटा तो लाजो का मन बुझ गया। उसने गम खाना सीखकर रूठना छोड़ दिया था, परन्तु उस साँझ मुँह लटक ही गया। आँसू पोंछ लिए और बिना बोले चौके-बर्तन के काम में लग गयी। रात के भोजन के समय कन्हैया ने देखा कि लाजो मुँह सुजाये है, बोल नहीं रही है, तो अपनी भूल कबूल कर उसे मनाने या कोई और प्रबंध करने का आश्वासन देने के बजाय उसने उसे डाँट दिया।

लाजो का मन और भी बिंध गया। कुछ ऐसा खयाल आने लगा-इन्ही के लिए तो व्रत कर रही हूँ और यही ऐसी रुखाई दिखा रहे हैं।... मैं व्रत कर रही हूँ कि अगले जनम में भी 'इन' से ही ब्याह हो और मैं सुहा ही नहीं रही हूँ...। अपनी उपेक्षा और निरादर से भी रोना आ गया। कुछ खाते न बना। ऐसे ही सो गयी।

तड़के पड़ोस में रोज की अपेक्षा जल्दी ही बर्तन भांडे खटकने की आवाज आने लगी। लाजो को याद आने लगा-शान्ति बता रही थी कि उसके बाबू सरघी के लिये फेनियाँ लाये हैं, तार वाले बाबू की घरवाली ने बताया था कि खोए की मिठाई लाये हैं। लाजो ने सोचा, उन मर्दों को खयाल है न कि हमारी बहू हमारे लिये व्रत कर रही है; इन्हें जरा भी खयाल नहीं।

लाजो का मन इतना खिन्न हो गया कि सरघी में उसने कुछ भी न खाया। न खाने पर भी पति के नाम का व्रत कैसे न रखती। सुबह-सुबह पड़ोस की स्त्रियों के साथ उसने भी करवे का व्रत करने वाली रानी और करवे का व्रत करने वाली राजा की प्रेयसी दासी की कथा सुनने और व्रत के दूसरे उपचार निबाहे। खाना बनाकर कन्हैयालाल को दफ्तर जाने के समय खिला दिया। कन्हैया ने दफ्तर जाते समय देखा कि लाजो मुँह सुजाए है। उसने फिर डांटा- ' मालूम होता है कि दो-चार खाये बिना तुम सीधी नहीं होगी।'

लाजो को और भी रुलाई आ गयी। कन्हैया दफ्तर चला गया तो वह अकेली बैठी कुछ देर रोती रही। क्या जुल्म है। इन्ही के लिये व्रत कर रही हूँ और इन्हें गुस्सा ही आ रहा है।...जनम-जनम ये ही मिलें इसीलिये मैं भूखी मर रही हूँ।...बड़ा सुख मिल रहा है न!...अगले जनम में और बड़ा सुख देंगे!...ये ही जनम निबाहना मुश्किल हे रहा है।...इस जनम में तो इस मुसीबत से मर जाना अच्छा लगता है, दूसरे जनम के लिये वही मुसीबत पक्की कर रही हूँ...।

लाजो पिछली रात भूखी थी, बल्कि पिछली दोपहर के पहले का ही खाया हुआ था। भूख के मारे कुड़मुड़ा रही थी और उसपर पति का निर्दयी व्यवहार। जनम-जनम, कितने जनम तक उसे ऐसा ही व्यवहार सहना पड़ेगा! सोचकर लाजो का मन डूबने लगा। सिर में दर्द होने लगा तो वह धोती के आँचल सिर बाँधकर खाट पर लेटने लगी तो झिझक गई-करवे के दिन बान पर नहीं लेटा या बैठा जाता। वह दीवार के साथ फर्श पर ही लेट रही।

लाजो को पड़ोसिनों की पुकार सुनाई दी। वे उसे बुलाने आई थीं। करवा-चौथ का व्रत होने के कारण सभी स्त्रियाँ उपवास करके भी प्रसन्न थीं। आज करवे के कारण नित्य की तरह दोपहर के समय सीने-पिरोने, काढ़ने-बुनने का काम किया नहीं जा सकता था; करवे के दिन सुई, सलाई, और चरखा छुआ नहीं जाता। काज से छुट्टी थी और विनोद के लिए ताश या जुए की बैठक जमाने का उपक्रम हो रहा था। वे लाजो को भी उसी के लिये बुलाने आयी थीं। सिर-दर्द और मन के दुःख के करण लाजो जा नहीं सकी। सिर-दर्द और बदन टूटने की बात कहकर वह टाल गयी और फिर सोचने लगी-ये सब तो सुबह सरघी खाये हुये हैं। जान तो मेरी ही निकव रही है।...फिर अपने दुःखी जीवन के कारण मर जाने का खयाल आयाऔर कल्पना करने लगी कि करवा-चौथ के दिन उपवास किये-किये मर जाये, तो इस पुण्य से जरूर ही यही पति अगले जन्म में मिले...।

लाजो की कल्पना बावली हो उठी। वह सोचने लगी-मैं मर जाऊँ तो इनका क्या है, और ब्याह कर लेंगे। जो आएगी वह भी करवाचौथ का व्रत करेगी। अगले जनम में दोनों का इन्हीं से ब्याह होगा, हम सौतें बनेंगी। सौत का खयाल उसे और भी बुरा लगा। फिर अपने-आप समाधान हो गया-नहीं, पहले मुझसे ब्याह होगा, मैं मर जाऊँगी तो दूसरी से होगा। अपने उपवास के इतने भयंकर परिणाम की चिंता से मन अधीर हो उठा। भूख अलग व्याकुल किये थी। उसने सोचा-क्यों मैं अपना अगला जनम भी बरबाद करूँ? भूख के कारण शरीर निढाल होने पर भी खाने को मन नहीं हो रहा था, परन्तु उपवास के परिणाम की कल्पना से मन मन क्रोध से जल उठा; वह उठ खड़ी हुई।

कन्हैयालाल के लिये उसने सुबह जो खाना बनाया था उसमें से बची दो रोटियाँ कटोरदान में पड़ी थीं। लाजो उठी और उपवास के फल से बचने के लिये उसने मन को वश में कर एक रोटी रूखी ही खा ली और एक गिलास पानी पीकर फिर लेट गई। मन बहुत खिन्न था। कभी सोचती-ठीक ही तो किया, अपना अगला जनम क्यों बरबाद करूँ? ऐसे पड़े-पड़े झपकी आ गई।

कमरे के किवाड़ पर धम-धम सुनकर लाजो ने देखा, रोशनदान से प्रकाश की जगह अन्धकार भीतर आ रहा था। समझ गई, दफ्तर से लौटे हैं। उसने किवाड़ खोले और चुपचाप एक ओर हट गई।

कन्हैयालाल ने क्रोध से उसकी तरफ देखा-' अभी तक पारा नहीं उतरा! मालूम होता है झाड़े बिना नहीं उतरेगा !'

लाजो के दुखे हुये दिल पर और चोट पड़ी और पीड़ा क्रोध में बदल गई। कुछ उत्तर न दे वह घूमकर फिर दीवार के सहारे फर्श पर बैठ गई।

कन्हैयालाल का गुस्सा भी उबल पड़ा- ' यह अकड़ है!...आज तुझे ठीक कर ही दूँ।' उसने कहा और लाजो को बाँह से पकड़, खींचकर गिराते हुये दो थप्पड़ पूरे हाथ के जोर से ताबड़तोड़ जड़ दिये और हाँफते हुये लात उटाकर कहा, ' और मिजाज दिखा?...खड़ी हो सीधी।'

लाजो का क्रोध भी सीमा पार कर चुका था। खींची जाने पर भी फर्श से उठी नहीं। और मार खाने के लिये तैयार हो उसने चिल्लाकर कहा,' मार ले, मार ले! जान से मार डाल! पीछा छूटे! आज ही तो मारेगा! मैने कौन व्रत रखा है तेरे लिये जो जनम-जनम मार खाऊँगी। मार, मार डाल...!'

कन्हैयालाल का लात मारने के लिये उठा पाँव अधर में ही रुक गया। लाजो का हाथ उसके हाथ से छूट गया। वह स्तब्ध रह गया। मुँह में आई गाली भी मुँह में ही रह गई। ऐसे जान पड़ा कि अँधेरे में कुत्ते के धोखे जिस जानवर को मार बैठा था उसकी गुर्राहट से जाना कि वह शेर था; या लाजो को डाँट और मार सकने का अधिकार एक भ्रम ही था। कुछ क्षण वह हाँफता हुआ खड़ा सोचता रहा और फिर खाट पर बैठकर चिन्ता में डूब गया। लाजो फर्श पर पड़ी रो रही थी। उस ओर देखने का साहस कन्हैयालाल को न हो रहा था। वह उठा और बाहर चला गया।

लाजो पर्श पर पड़ी फूट-फूटकर रोती रही। जब घंटे-भर रो चुकी तो उठी। चूल्हा जलाकर कम-से-कम कन्हैया के लिए खाना तो बनाना ही था। बड़े बेमन उसने खाना बनाया। बना चुकी तब भी कन्हैयालाल लौटा नहीं था। लाजो ने खाना ढँक दिया और कमरे के किवाड़ उड़काकर फिर फर्श पर लेट गई। यही सोच रही थी, क्या मुसीबत है जिन्दगी। यही झेलना था तो पैदा ही क्यों हुई थी?...मैने क्या किया था जो मारने लगे।

किवाड़ों के खुलने का शब्द सुनाई दिया। वह उठने के लिये आँसुओं से भीगे चेहरे को आँचल से पोंछने लगी। कन्हैयालाल ने आते ही एक नजर उसकी ओर डाली। उसे पुकारे बिना ही वह दीवार के साथ बिछी चटाई पर चुपचाप बैट गया।

कन्हैयालाल का ऐसे चुप बैठ जाना नई बात थी, पर लाजो गुस्से में कुछ न बोल रसोई में चली गई। आसन डाल थाली-कटोरी रख खाना परोस दिया और लोटे में पानी लेकर हाथ धुलाने के लिए खड़ी थी। जब पाँच मिनट हो गये और कन्हैयालाल नहीं आया तो उसे पुकारना ही पड़ा, ' खाना परस दिया है।'

कन्हैयालाल आया तो हाथ नल से धोकर झाड़ते हुये भीतर आया। अबतक हाथ धुलाने के लिए लाजो ही उठकर पानी देती थी। कन्हैयालाल दो ही रोटी खाकर उठ गया। लाजो और देने लगी तो उसने कह दिया ' और नहीं चाहिये।' कन्हैयालाल खाकर उठा तो रोज की तरह हाथ धुलाने के लिये न कहकर नल की ओर चला गया।

लाजो मन मारकर स्वयं खाने बैठी तो देखा कि कद्दू की तरकारी बिलकुल कड़वी हो रही थी। मन की अवस्था ठीक न होने से हल्दी-नमक दो बार पड़ गया था। बड़ी लज्जा अनुभव हुई, ' हाय, इन्होंने कुछ कहा भी नहीं। यह तो जरा कम-ज्यादा हो जाने पर डाँट देते थे।' 

लाजो से दुःख में खाया नहीं गया। यों ही कुल्ला कर, हाथ धोकर इधर आई कि बिस्तर ठीक कर दे, चौका फिर समेट देगी। देखा तो कन्हैयालाल स्वयं ही बिस्तर झाड़कर बिछा रहा था। लाजो जिस दिन से इस घर में आई थी ऐसा कभी नहीं हुआ था।

लाजो ने शरमाकर कहा, ' मैं आ गई, रहने दो। किये देती हूँ।' और पति के हाथ से दरी चादर पकड़ ली। लाजो बिस्तर ठीक करने लगी तो कन्हैयालाल दूसरी ओर से मदद करता रहा। फिर लाजो को सम्बोधित किया, ' तुमने कुछ खाया नहीं। कद्दू में नमक ज्यादा हो गया है। सुबह और पिछली रात भी तुमने कुछ नहीं खाया था। ठहरो, मैं तुम्हारे लिये दूध ले आता हूँ।'

लाजो के प्रति इतनी चिन्ता कन्हैयालाल ने कभी नहीं दिखाई थी। जरूरत भी नहीं समझी थी। लाजो को उसने 'चीज' समझा था। आज वह ऐसे बात कर रहा था जैसे लाजो भी इन्सान हो; उसका भी खयाल किया जाना चाहिये। लाजो को शर्म तो आ ही रही थी पर अच्छा भी लग रहा था। उसी रात से कन्हैयालाल के व्यवहार में एक नरमी-सी आ गई। कड़े बोल की तो बात क्या, बल्कि एक झिझक-सी हर बात में; जैसे लाजो के किसी बात के बुरा मान जाने की या नाराज हो जाने की आशंका हो। कोई काम अधूरा देखता तो स्वयं करने लगता। लाजो को मलेरिया बुखार आ गया तो उसने उसे चौके के समीप नहीं जाने दिया। बर्तन भी खुद साफ कर लिये। कई दिन तो लाजो को बड़ी उलझन और शर्म महसूस हुई, पर फिर पति पर और अधिक प्यार आने लगा। जहाँ तक बन पड़ता घर का काम उसे नहीं करने देती, 'यह काम करते मर्द अच्छे नहीं लगते...।'

उन लोगों का जीवन कुछ दूसरी ही तरह का हो गया। लाजो खाने के लिये पुकारती तो कन्हैया जिद करता, ' तुम सब बना लो, फिर एक साथ बैठकर खायेंगे।' कन्हैया पहले कोई पत्रिका या पुष्तक लाता था तो अकेला मन-ही-मन पढ़ा करता था। अब लाजो को सुनाकर पढ़ता या खुद सुन लेता। यह भी पूछ लेता, ' तुम्हे नींद तो नहीं आ रही ? '

साल बीतते मालूम न हुआ। फिर करवाचौथ का व्रत आ गया। जाने क्यों लाजो के भाई का मनीआर्डर करवे के लिये न पहुँचा था। करवाचौथ के पहले दिन कन्हैयालाल दफ्तर जा रहा था। लाजो ने खिन्नता और लज्जा से कहा, ' भैया करवा भेजना शायद भूल गये।' 

कन्हैयालाल ने सांत्वना के स्वर में कहा,' तो क्या हुआ? उन्होंने जरूर भेजा होगा। डाकखाने वालों का हाल आजकल बुरा है। शायद आज आ जाये या और दो दिन बाद आये। डाकखाने वाले आजकल मनीआर्डर के पन्द्रह-पन्द्रह दिन लगा देते हैं। तुम व्रत-उपवास के झगड़े में मत पड़ना। तबियत खराब हो जाती है। यों कुछ मंगाना ही है तो बता दो, लेते आयेंगे, पर व्रत-उपवास से होता क्या है ? ' सब ढकोसले हैं।'

'वाह, यह कैसे हो सकता है! हम तो जरूर रखेंगे व्रत। भैया ने करवा नहीं भेजा न सही। बात तो व्रत की है, करवे की थोड़े ही।' लाजो ने बेपरवाही से कहा।

सन्ध्या-समय कन्हैयालाल आया तो रूमाल में बँधी छोटी गाँठ लाजो को थमाकर बोला, ' लो, फेनी तो मैं ले आया हूँ, पर ब्रत-व्रत के झगड़े में नहीं पड़ना।' लाजो ने मुस्कुराकर रूमाल लेकर आलमारी में रख दिया।

अगले दिन लाजो ने समय पर खाना तैयार कर कन्हैया को रसोई से पुकारा, ' आओ, खाना परस दिया है।' कन्हैया ने जाकर देखा, खाना एक ही आदमी के लिये परोसा था- ' और तुम?' उसने लाजो की ओर देखा।

' वाह, मेरा तो व्रत है! सुबह सरघी भी खा ली। तुम अभी सो ही रहे थे।' लाजो ने मुस्कराकर प्यार से बताया। 

' यह बात...! तो हमारा भी ब्रत रहा।' आसन से उठते हुये कन्हैयालाल ने कहा।

लाजो ने पति का हाथ पकड़कर रोकते हुये समझाया, ' क्या पागल हो, कहीं मर्द भी करवाचौथ का व्रत रखते हैं!...तुमने सरघी कहाँ खाई?'  

'नहीं, नहीं, यह कैसे हो सकता है ।' कन्हैया नहीं माना,' तुम्हें अगले जनम में मेरी जरूरत है तो क्या मुझे तुम्हारी नहीं है? या तुम भी व्रत न रखो आज!'

लाजो पति की ओर कातर आँखों से देखती हार मान गई। पति के उपासे दफ्तर जाने पर उसका हृदय गर्व से फूला नहीं समा रहा था।  

 

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दो लघु-कथाएँ

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एस.आऱ.हरनोट

 

मोबाइल 

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उसके छोटे-छोटे पांव थे। देख कर नहीं लगता था कि किसी बच्चे के होंगे। लम्बे, बेतरतीब बढ़े हुए नाखूनों से ढके उंगलियों के छोर। चमड़ी ऐसी मानो किसी नाली में कीचड़ के बीच महीनों से पड़ा पुराने जूते का चमड़ा हो। नंगे पांव जैसे ही ज़मीन पर पड़ते, बिवाईयां उघड़ने लगतीं। दर्द की टीस उठती पर भीतर ही भीतर कहीं दब कर रह जाती। उनसे खून रिसता रहता। लोगों की नजरें उन पर कम, बच्ची की अधनंगी टांगों पर ज्यादा फिसलती रहती। इससे पहले कि आखें कुछ टटोलती हुई मैली-फटी फ्राक के बीच जाए, वह झटपट कटोरा उनके मुंह के आगे कर देती,

 "दे दो बाबू दे दो, भगवान के नाम से दे दो। भला होगा।"

वह कुछ पल उनके हाव भाव परखती। तिलों में तेल न देख कर आगे चल देती। वही सब दोहराते गिड़गिड़ाते। किसी ने कभी एक दो रुपए का सिक्का कटोरे में फेंक दिया तो टन्न की आवाज से उसके चेहरे पर धूप की चमक छा जाती। पथराई और उनींदी सी आंखे सहज ही भोर होने लगती। यह सिलसिला सूर्य से सूर्य तक चलता रहता। दिन भर सिक्के समेटने के चाव में उसकी भूख प्यास उसी तरह गायब रहती जैसे उसकी देह से बचपना।  

 उसके हाथ का कटोरा खाली नहीं रहता। उसमें दिन-बार के हिसाब से भगवान जी बैठे रहते। सोमवार को भगवान शिवजी की मैली फटी फोटो और उसके आगे धूप की जलती हुई बत्ती। इस रोज शिव सेना के कार्यकर्ता और सोमवार के व्रती लोग खूब सिक्के डाल कर पुण्य कमा लेते। शिव मन्दिर के आगे उसने कई बार बैठने का प्रयास भी किया, लेकिन उधर पहले से अड्डा जमाए सीनियर भिखारी उसे भगा देते। उस वक्त अपने छोटे होने का मलाल उसे अवश्य होता।

मंगल को भगवान जी बदल जाते। शिवजी की जगह हनुमान जी ले लेते। कटोरे के ओर-छोर सिंदूर पुता रहता। हनुमान मन्दिर के रास्ते एक जगह डेरा जमा देती। लेकिन पूरे दिन मुश्किल से दस-बारह सिक्के भी नसीब न होते। लेकिन कटोरा प्रसाद से अवश्य भर जाया करता। कभी भाग्य में वह भी न होता। मांगते-मांगते दिन भर की थकान से अनायास जब भी उसकी आंख लगती तो हनुमान भक्त शरारती बन्दर कटोरा छीन लेते। आधा उनके पेट में तो आधा नीचे बिखर जाता। उसकी आँख जगती तो उन्हें भगाने-डराने की बहुत कोशिश करती पर बन्दरों पर कोई असर न होता। उल्टा जैसे उसकी खिल्ली उड़ा रहे हो। देवदार के पेड़ पर चढ़ते हुए कटोरा फैंक देते। परसाद के बीच रखे सिक्के जगह-जगह बिखर जाते। नालियों में। छलानों पर उगी हरी घास के बीच। वह मन में रोती-बिलखती उन्हें तलाशती रहती। अच्छी-खासी मशक्कत करनी पड़ती। उसके बैठने की जगह के आसपास सिंदूर पुता रहता। बाहर से आए पर्यटकों के लिए यह जगह भी श्रद्धेय हो गई थी। कई बार तो बच्ची जब वहाँ नहीं होती तो दो-चार सिक्के उधर फैंके रहते।

बुध और वीरवार को बच्ची का कटोरा खाली होता। उस दिन पता नहीं क्यों कोई भगवान उसमें नहीं होते। वह जगह-जगह भटकती रहती। जैसे ही कोई विदेशी पर्यटक दिखता, दौड़ती उनके पास पहुंचती। मुंह से कुछ न कहती। जानती होगी कि ' दे दो बाबू' से यहां काम चलने वाला नहीं। अंग्रेजी तो वह नहीं जानती। जिस अंग्रेज का पीछा पकड़ती उससे लेकर ही कुछ हटती। दिन भर यदि चार छः अंग्रेज मिल भी गए तो और दिनों की बनिस्बत कटोरे में अधिक धन इकट्ठा हो जाता। शाम ढलते ही वह खिलखिलाती अपनी झोंपड़ी की ओर भागती। झोंपड़ी सड़क के नीचे एक पैरापिट के नीचे बनी थी। उतरते-उतरते उसका वास्ता कभी बकरी, कभी कुत्ते और कभी बच्चों से पड़ जाता। पर वह अपने में मस्त उन्हें प्यारती-दुलारती चली जाती---क्षणों में जैसे उसका बचपना लौट आया करता। उसके अम्मा-बापू भी इस कमाई से बहुत खुश हो जाते। एवज में उस दिन उसे खूब खाना मिल जाता ।

शुक्रवार को संतोषी माता की तस्बीर कटोरे की मालिक हो जाती। कंवारी लड़कियों का पीछा बच्ची तब तक नहीं छोड़ती, जब तक वह एक-आध रुपया न ले ले। शनिवार को कटोरा शनिदेव जी का हो जाता। सरसों के तेल से भरे कटोरे में एक पुराने टीन के जंग लगे टुकड़े का भगवान डोलता रहता। बच्ची को इस दिन बहुत भाग-दौड़ करनी पड़ती। असली पंडों से बचती-बचाती वह कई बार गिर भी पड़ती।

इतवार को बच्ची नहीं दिखती थी। शायद अवकाश पर रहती होगी।                           

    

· 

 

    

    

 आज जब वह काम पर निकली तो सड़क में पहुंचते ही उसका सामना एक चुनाव पार्टी से हो गया था। उसे यह पता नहीं था कि चुनाव का मौसम आ गया है। और दिनों की बनिस्बत हर जगह चहल-पहल हो गई थी। पार्टी ने उसे घेर लिया और कटोरे में पहले से विराजमान भगवान जी की जगह उन्हें देवी नुमा मुकुट पहने किसी महिला की तस्वीर सजा दी। पल भर में उसका कटोरा सिक्कों से भर गया। नए भगवान से बच्ची खूब प्रसन्न हो गई। उससे पहले कभी भी उसने उस तस्बीर को नहीं देखा था।

लेकिन दूसरे दिन उसका सामना एक दूसरी पार्टी से हो गया। उन्होंने बच्ची को खूब गालियां दीं। उसका कटोरा नीचे फेंक दिया। कटोरे में विराजमान तस्वीर को अपने पैरों तले रौंद दिया। जो कुछ सिक्के उसमें थे उन्हें भी गिरा दिया। लेकिन एक नेता ने अपने साथियों को तत्काल समझा बुझा कर शांत कर दिया। वह बच्ची के पास गया और उसे प्यार से दुलारा। खूब स्नेह जताया। फिर अपने झोले से एक भगवे रंग में रंगा कटोरा निकाला और उसके हाथ में पकड़ा दिया। फिर एक फोटो उसमें रख दी। कहा कि यह भगवान राम की है। बच्ची एकटक देखती रही। उसके लिए भगवान राम नए रूप में थे। रथ पर बैठे,  पगड़ी बांधे, हाथ में धनुष पकड़े हुए हल्की छोटी मूछों वाले भगवान। उनके गले में लाल-हरे रंग का पट्टा था। जैसे ही फोटो कटोरे में सजी, सिक्कों की बरसात होने लगी। कई बार कटोरा भर जाता तो वह भाग कर मां को दे आती और फिर निकल जाती। स्टिकरनुमा धनुरधारी भगवान उसे दूसरे भगवानों से ज्यादा पावरफुल लगे थे।

अगले दिन जब इसी भगवान को कटोरे में सजा कर वह सड़क पर पहुंची तो अचानक उसका सामना पहले वाली पार्टी से हो गया। कार्यकर्ता उसके कटोरे में धनुषधारी भगवान को देख कर आग बबूले हो गए। एक-दो कार्यकर्ता जैसे ही उसकी तरफ बढ़े, दूसरी पार्टी अचानक धमक गई। फिर क्या था सभी एक दूसरे पर टूट पड़े। बच्ची जान बचा कर भाग निकली। उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था।

उस दिन हर जगह शहर में दंगे हुए थे। बच्ची के मां-बाप ने उसे कई दिनों बाहर नहीं भेजा। लेकिन न कमाने का मलाल उन दोनों के चेहरों पर बना रहा।

 

 

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चुनाव का मौसम शान्त हुआ तो एक दिन जैसे ही बच्ची अपने काम पर निकली, एक नई पार्टी से उसका सामना हो गया। उस पार्टी ने उसे प्यार से अपने पास बिठाया। घर का अता-पता पूछा और उसे वापिस घर ले आए। उसके मां-बाप घर पर ही थे। उन्होंने बच्ची का सौदा अपने मोबाइल के विज्ञापन के लिए तय कर दिया। मां-बाप को एक बार ही इतने पैसे मिल गए जितने बच्ची ने आज तक की मेहनत से भी न कमाए थे। इस पर हर महीने पांच हजार और। उन्हें क्या चाहिए था।

अब बच्ची के हाथ में न कोई कटोरा होता और न कोई भगवान। न मैली फ्राक से उसका बदन ही ढका रहता। वह बिल्कुल नंगी होती। उसके नंगे बदन पर कंपनी के नाम और मोबाइल फोन के स्टिकर चिपके रहते। वह दिन भर कम्पनी के बताए रास्तों पर चलती रहती। शाम होती तो कम्पनी वाले उसके बदन से अपने विज्ञापन उतार देते और वही पुरानी फ्राक पहनाकर उसे घर भेज देते।

उस मोबाइल कम्पनी ने पहाड़ों के दूर-दराज इलाकों तक पहुंचने की जद्दोजहद में अब भोले-भाले लोगों और उनके बच्चों का पुरजोर इस्तेमाल करना शुरु कर दिया था। लेकिन लोगों के पास यह सोचने का समय ही नहीं था कि यह घुसपैठ बाजार को उनकी बहु-बेटियों के कमरों तक ले जा रही है।

 

 

      

 

                                      

 

 

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रोबो

 

एक आदमी नेता बन गया। कुछ दिनों बाद उसकी ताजपोशी मन्त्री के पद पर हो गई। उसे लगने लगा कि अब वह दुनिया का सबसे खुश और ताकतवर प्राणी है। कुछ दिनों बाद उसके साथ अजीबोगरीब घटनाएं घटने लगीं। उसे हर कहीं नींद आ जाती और तरह-तरह के भयानक सपने दिखने लगते। रात-दिन वह कई तरह के भय से परेशान रहने लगा था।                                       

स्वप्न में कभी उसे लगता कि जिस कार से वह दौरे पर जा रहा है, वह अचानक दुर्घटनाग्रस्त हो गई है या उसमें किसी उग्रवादी या विपक्षी दल के आदमी ने बम रख दिया है और रिमोट से कार के परखचे उड़ा दिए हैं।---और कभी उसे यह भी नजर आता कि वह खुद ही अपने जिस्म के लीथड़ों को इकट्ठा कर रहा है।

कभी जब वह अपने दफ्तर में काम कर रहा होता तो अचानक कुर्सी पर बैठे ही उसे नींद आ जाया करती। तब उसे यह लगता कि उसके सुरक्षा गार्ड, चपरासी और निजी स्टाफ के कर्मचारी किसी दूसरे देश से आए जासूस या उग्रवादी हैं। उन सभी के पास एके-47 हैं और वे उसकी हत्या करने के लिए उसके पीछे दौड़ रहे हैं।

मन्त्री को सपने में यह भी दिखता कि जिस जनसभा में वह भाषण दे रहा है, अचानक एक-दो नकाबपोश भीड़ को चीरते हुए उसकी तरफ दौड़ते आ रहे हैं। उन्होंने उस पर धड़ाधड़ गोलियां बरसा दी हैं और वह वहीं ढेर हो गया है।

अपने कमरे में आराम फरमाते कभी वह अचानक चीखने लगता। उसे कमरे की दीवारें, खिड़कियां और सारा सामान हिलता नजर आता। फर्श और छतें गिरतीं-ढहतीं लगने लगतीं। जैसे भयानक भूकम्प आ गया हो, बादल फट गए हों या फिर उसके ऊपर आसमानी बिजली गिर पड़ी हो। कभी नजर आता कि किसी नदी में भयंकर बाढ़ आ गई हो और वह अपने मकान, सरकारी कार और बच्चों व प्रेमिकाओं सहित उसमें बह गया हो।

कभी वह सपने में ही सख्त बीमार हो जाता। उसे लगता कि वह दिल की बीमारी से मर रहा है। कैंसर से जूझ रहा है। एड्स ने उस पर हमला कर दिया है। उसकी सांस फूलने लगी है। उसे दमा हो गया है। वह पीलिए से ग्रस्त है। उसके हाथ, बाजू और टांगें टेढ़ी-मेढ़ी हो गई हैं।

कभी उसे लगता कि उसके अंग अपनी जगह पर नहीं हैं। जहां नाक होनी चाहिए वहां कान उग गए हैं, जहां कान होने चाहिए वहां आंखें लग गई हैं और सिर टांगों के बीच लटका हुआ है। कई बार चलते-फिरते, महत्वपूर्ण बैठकों में भाग लेते हुए भी उसे महसूस होता कि उसके गले में किसी ने एक ढोलकी टांग दी है और वह हिजड़ों के बीच नाचने लगा है।

                                             

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इस स्वप्न-संभ्रम ने उसे अन्दर से हिला सा दिया था। इसे न तो वह किसी के सामने प्रकट कर पाता और न तत्काल ऐसी विचित्र मनोस्थिति से निजात पाने का उसे कोई उपाय ही सूझता। उसने इस संकट का गहराई से विश्लेषण किया था। सोचा कि वह तो एक मन्त्री है...। आम आदमी नहीं है। कोई डर या भय उसके नजदीक कैसे आ सकता है। यकीनन वह ऐसी पोजीशन में है कि अपनी सुरक्षा के पुख्ता इन्तजाम कर सके। क्योंकि अगर वह सुरक्षित है तो उसका घर, उसकी गृहस्थी सुरक्षित है, जनता सुरक्षित है, प्रदेश तथा देश दोनों सुरक्षित हैं। इसलिए उसने इस भय को मूल से समाप्त करने के उपाय ढूंढने शुरु कर दिए। 

पहला उपाय कार दुर्घटना से बचने का किया गया। विदेश से ऐसी कार मंगवाई गई जिस पर देशी मौसम, गोला-बारूद, ईंट-पत्थर का कोई प्रभाव न पड़ सके। इसी के साथ उसने अपने लिए बुलेट प्रूफ गांधी टोपी, नेहरू-कट सदरी, कुरता-पायजामा और बूट भी मंगवा लिए थे।                                            

 दूसरे उपाय थे भूकम्प इत्यादि से बचने के लिए सुरक्षा। उसने अपने लिए एक ऐसी कोठी बनवाई जिसके निर्माण के लिए विदेशी इंजीनियर और कारीगर लाए गए। उसमें हजारों-लाखों टन लोहा कूटा भरा गया। यानी अपने क्षेत्र की मीलों लम्बी रेल पटरियां, सिंचाई योजना की पाइपें, स्कूलों, स्वास्थ केन्द्रों तथा दूसरे भवनों में लगने वाला सरिया, सिमैंट, रेत और बजरी सब उस मकान में खपा लिए गए। इस आलीशान कोठी में कई अत्याधुनिक उपकरण भी लगाए गए थे जो भूकम्प आने, बादल फटने या बाढ़ें आने की पूर्व सूचना देने में सक्षम थे।

मन्त्री ने तीसरा उपाय अपने सुरक्षा कर्मियों, निजी स्टाफ इत्यादि के अचानक आक्रमण से बचने का भी कर दिया। उस विदेशी कार के साथ कई रोबोगार्ड और रोबोडॉग तैनात थे जो हर समय मन्त्री महोदय के साथ रहते थे।

चौथे विकल्प के तहत थे बीमारियों से निजात पाने के उपाय। देशी डाक्टरों के बजाय कई विदेशी डाक्टर नियुक्त कर लिए गए थे। उन्हें अपनी कोठी और दफ्तर के आसपास रखा गया था। मन्त्री सदा जवान बना रहे उसके लिए दूसरे महकमों के साथ उसने अपने मंत्रालय के साथ स्वास्थ्य विभाग भी नत्थी कर लिया था।

यानी सपनों में जो भी चीजें मन्त्री को भयाकान्त करती रहती थीं उनसे तत्काल निजात पाने का वह उपाय ढूँढ ही लेता। जो भी धन अपने राज्य की योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिए आबंटित होता उसे वह सहज ही इन उपायों पर खर्च कर डालता। इन उपायों को अमल में लाते-लाते उसकी सरकार के पांच साल निकल ही गए। उसे न अपने परिवार की फिक्र रही, न गांव की, न जनता और अपने प्रदेश व देश की। सुरक्षा के इन उपायों के बीच उसे पता भी न चला कि कब चुनाव आ गए। कुछ चमचे किस्म के लोग जरूर मन्त्री के साथ आगे-पीछे रहते जिनका सारा दाना-पानी उसकी ही बदौलत चलता था।

मन्त्री जैसे अब गहरी नींद से जागा था। अपने चारों तरफ के सुरक्षा कवच को देखा और मन ही मन मुस्कुरा दिया। दूसरे पल चुनाव का ख्याल आया तो जैसे कबाब में हड्डी पड़ गई। उसने एक भद्दी गाली अपने देश की जनता को दी जिसके पास वोट मांगने जाना उसकी मजबूरी थी। उसे विश्वास था कि उसके पास इतने साधन हैं कि वह अपने जीतने योग्य वोटें तो अर्जित कर लेगा। 

  

                                                

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बरहाल वह दौरे पर निकल पड़ा। हालांकि उसके पास विदेशी कार थी, रोबोगार्ड और रोबोडॉग थे। बुलेटप्रूफ टोपी, सदरी, कुरता पायजामा और बूट थे। लेकिन जनता यकीनन रोबो नहीं थी। वो तो वही नंगे-भूखे लोग थे। रास्ते में मन्त्री कहीं भी कार से नहीं उतरा। जब अपना गांव आया तो उतरना पड़ा। अब तक लोगों की बुरी हालत हो चुकी थी। उनके पास न रोटी थी, न मकान थे और न तन ढकने के लिए कपड़ा। जो सामान्य जन सुविधाएं लोग चाहते थे, वे सभी नदारत थीं। इसलिए जनता में रोष था। मन्त्री जानता था कि लोगों के पास रोष व्यक्त करने के लिए कुछ भी नहीं है। न तो ये भूकम्प ला सकते हैं, न बाढ़ें, न इनके कहने से बादल ही फट सकते हैं। न इनके पास ए-47 ही है। वैसे भी नंगों-भूखों के पास होता ही क्या है, यह बात मन्त्री बखूबी जानता था। पर हुआ कुछ और ही। पल भर में ही मन्त्री की यह धारणा गलत सिद्ध हो गई। जनता ने मन्त्री को कई तरह से भयाक्रान्त कर दिया।

एक मोची ने मन्त्री पर चमड़े वाला पानी फैंक दिया। एक नाई ने काटे बालों का टोकरा उस पर उड़ेल दिया। एक लक्कड़हारे ने उस पर एक ऐसी लकड़ी फेंकी जिसे कोई भी अपने चूल्हे में जलाता नहीं था। एक किसान ने अपने हल, मोई और जुंगड़े की रस्सियां और जोच मन्त्री पर डाल दिए। अभी वह सम्भला भी नहीं था कि एक दुकानदार सामने से आया और अपनी तकड़ी उसकी कार के आगे पटक दी। मन्त्री और उसके चमचों को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। तभी गांव का एक लुहार भागता हुआ आया र उसपर अपने आरन की राख बिखेर दी। एक जुलाहे ने अपना राछ और एक तुरी ने अपना छोल उसके आगे फेंक दिया। एक पंडित ने जय श्री राम बोला और अपनी चोटी काट कर मन्त्री के मुंह पर दे मारी। एक ठाकुर कनैत ने अपनी मूछें मुड़वाई और खेत के मुंडेर के ऊपर से मन्त्री की गांधी टोपी पर छाड़ दी। एक युवा बेरोजगार ने अपने ऊपर मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगा दी। एक भूखा-नंगा बच्चा कहीं से आया, दीवाल पर खड़ा हुआ और मन्त्री पर मूत दिया। एक सुन्दर लड़की ने उसके सामने अपने कपड़े फाड़ दिए और निपट नंगी हो गई। फिर एक सुहागिन आई और उसने अपने दांए बाजू की चूड़ियां पत्थर पर हाथ पटक कर तोड़ डालीं जिनकी बारीक कंचरें मन्त्री और चमचों की आंखों में घुस गईं। इससे पहले कि मन्त्री अपनी कार में घुसता, एक बुढिया ने उस पर थूक दिया।

मन्त्री के गांव से भागने से पूर्व कुछ और अप्रत्याशित घटनाएं घटीं। एक कौवे ने सूखे पेड़ की टहनी से कार पर बीट कर दी थी। एक काली बिल्ली ने उसका रास्ता काट दिया और एक कुत्ते ने जोर से अपने कान फड़फड़ा दिए।                                                      

   

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 कार धूल उड़ाती भाग निकली लेकिन मन्त्री गांव के इस अनूठे और चकित कर देने वाले आघातों को नहीं सह पाया क्योंकि उसे इस तरह के स्वप्न कभी भी पिछले पांच सालों में नहीं दिखे थे और न ही उसने इस तरह की घटनाओं की कभी कल्पना तक की थी। वह सोच रहा था कि जब उसके अपने गांव में ये सब कुछ घट गया तो अभी तो उसका अपना पूरा चुनाव क्षेत्र है जहां पता नहीं और क्या कुछ हो सकता है।

 

मन्त्री अपनी सुरक्षित कोठी में था। परन्तु उसे अब पहले सपनों से अलग सपने दिखने शुरु हो गए। वह पहले की तरह ही हर कहीं सो जाता। ---घर में, दफ्तर में, अपनी कार में, उठते-बैठते, चलते-फिरते, खाते-पीते, नहाते-हगते-। उसको दिखता कि मोची, नाई, ठाकुर, दुकानदार, लुहार, किसान, लक्कड़हारा सब बारी-बारी से उसके पीछे भाग रहे हैं। यानी जो कुछ भी उसके साथ गांव में घटा था वह अब कुछ दूसरे रूप में सपनों में आने लगा था। ऐसा ही कुछ-कुछ उन सभी चमचों के साथ भी होने लगा था जो मन्त्री के साथ थे। इस भय का कोई उपाय-इलाज मन्त्री को नजर नहीं आ रहा था। उसे जब ये सपने दिखते तो वह कभी अपनी कोठी के बंकर में घुस जाता, कभी अपनी बुलेट फ्रूफ कार में, तो कभी विदेशी डाक्टरों के मकानों में, परन्तु इससे छुटकारा पाना अब उसके लिए सचमुच मुश्किल हो गया था।  इस भय से मन्त्री कहीं पहले से ज्यादा परेशान भी था। अधिक घबराया हुआ। इस भय ने उसे भीतर ही भीतर जला दिया था---मार दिया था---वह लाखों-करोड़ों का मालिक होते हुए भी अपनी सुरक्षा के इस नए भय से मुक्ति के लिए कोई जतन नहीं करवा पा रहा था। वह भय भी अब न जाने कितनी बद्दुआओं में तबदील हो चुका था।

---और ऐसे हालात का मारा मन्त्री एक दिन अपने ही बाथरूम में मृत पाया गया।

 

 

                                                     

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ज्ञान-भारती

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आलोक-पर्व की

ज्योतिर्मय देवी

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आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी

'मारकंडेय पुराण' के अनुसार समस्त सृष्टि की मूलभूत आद्याशक्ति महालक्ष्मी है। वह सत्व, रज और तम तीनों गुणों का मूल समन्वय है। वही आद्याशक्ति है। वह समस्त विश्व में व्याप्त होकर विराजमान है। वह लक्ष्य और अलक्ष्य, इन दो रूपों में रहती है। लक्ष्यरूप में यह चराचर जगत ही उसका स्वरूप है और अलक्ष्य रूप में यह समस्त सृष्टि का मूल कारण है। उसी से विभिन्न शक्तियों का प्रादुर्भाव होता है। दीपावली को इसी महालक्ष्मी का पूजन होता है। तामसिक रूप में वह क्षुधा, तृष्णा, निद्रा, कालरात्रि, महामारी के रूप में अभिव्यक्त होती है; राजसिक रूप में वह जगत का भरण-पोषण करने वाली 'श्री' के रूप में उन लोगों के घर में आती है, जिन्होंने पूर्व-जन्म में शुभ कर्म किये होते हैं; परन्तु यदि इस जन्म में उनकी वृत्ति पाप की ओर जाती है तो वह भयंकर अलक्ष्मी बन जाती है। सात्विक रूप में वह महाविद्या, महावाणी, भारती, वाक्, सरस्वती के रूप में अभिव्यक्त होती है। मूल आद्याशक्ति ही महालक्ष्मी है।

शास्त्रों में ऐसे वचन भी मिल जाते हैं , जिनमें महालक्ष्मी या महासरस्वती को ही आद्याशक्ति कहा गया है। जो लोग हिन्दू शास्त्रों की पद्धति से परिचित नहीं होते हैं, वे साधारणतः इस प्रकार की बातों को देखकर कह उठते हैं कि यह बहुदेववाद है। यूरोपिय पण्डितों ने इसके लिये ' पालिथीज्म ' शब्द का प्रयोग किया है। पालिथीज्म या बहुदेववाद से एक ऐसे धर्म का बोध होता है, जिसमें अनेक छोटे-बड़े देवताओं की मण्डली में विश्वास किया जाता है। इन देवताओं की मर्यादा और अधिकार निश्चित होते हैं। जो लोग हिन्दू शब्दों की थोड़ी भी गहराई में जाना आवश्यक समझते हैं, वे इस बात को कभी नहीं स्वीकार कर सकते। मैक्समूलर ने बहुत पहले बताया था कि वेदों में पाया जाने वाला ' बहुदेववाद' वस्तुतः बहुदेववाद है ही नहीं, क्योंकि न तो वह ग्रीक-रोमन बहुदेववाद के समान है, जिसमें बहुत-से देव-देवी एक महादेवता के अधीन होते हैं और न अफ्रीका आदि देशों की आदिम जातियों में पाये जाने वाले बहुदेववाद के समान है, जिसमें छोटे-मोटे अनेक देवता स्वतंत्र होते हैं। मैक्समूलर ने इस विश्वास के लिये एक शब्द सुझाया था-हेनोथीज्म, जिसे हिन्दी में ' एकैकदेववाद ' शब्द से कुछ-कुछ स्पष्ट किया जा सकता है। इस प्रकार के धार्मिक विश्वास में अनेक देवताओं की उपासना होती अवश्य है, पर जिस देवता की उपासना चलती रहती है, उसे ही सारे देवताओं से श्रेष्ठ और सबका हेतुभूत माना जाता है। जैसे, जब इन्द्र की प्रार्थना का प्रसंग होगा, तो कहा जाएगा कि इन्द्र ही आदिदेव है; वरुण, यम, सूर्य, चन्द्र, अग्नि सबका वह स्वामी है और सबका मूलभूत है। पर जब अग्नि की उपासना का प्रसंग होगा, तो कहा जायेगा कि अग्नि ही मुख्य देवता है और इन्द्र, वरुण आदि का स्वामी है और सबका मूलभूत देवता है, इत्यादि।

परन्तु थोड़ी और गहराई में जाकर देखा जाये तो इसका स्पष्ट रूप अद्वैतवाद है। एक ही देवता है, जो विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त हो रहा है। उपासना के समय उसके जिस विशिष्ट रूप का ध्यान किया जाता है, वही समस्त अन्य रूपों में मुख्य और आदिभूत माना जाता है। इसका रहस्य यह है कि साधक सदा मूल अद्वैत सत्ता के प्रति सजग रहता है। अपनी रुचि और संस्कारों और कभी-कभी प्रयोजन के अनुसार वह उपास्य के विशिष्ट रूप की उपासना अवश्य करता है, परन्तु शास्त्र उसे कभी भूलने नहीं देना चाहता कि रूप कोई हो, है वह मूल अद्वैत सत्ता की ही अभिव्यक्ति। इस प्रकार हिन्दू शास्त्रों की इस पद्धति का रहस्य यही है कि उपास्य वस्तुतः मूल अद्वैत सत्ता का ही रूप है। इसी बात को और भी स्पष्ट करके वैदिक ऋषि ने कहा था कि ' जो देवता अग्नि में है, जल में है, वायु में है, औषधियों में है, वनस्पतियों में है, उसी महादेव को मैं प्रणाम करता हूँ।'

आज से कोई दो हजार वर्ष पहले से इस देश के धार्मिक साहित्य में और शिल्प और कला में यह विश्वास मुखर हो उठा है कि उपास्य वस्तुतः देवता की शक्ति होती है। यह नहीं है कि यह विचार नया है, पहले था ही नहीं, पर उपलब्ध धार्मिक साहित्य और शिल्प और कला सामग्री में यह बात इस समय से अधिक व्यापक रूप में और अत्याधिक मुखर भाव से प्रकट हुई दिखती है। इस विश्वास का सबसे बड़ा आवश्यक अँग यह है कि शक्ति और शक्तिमान में कोई तात्विक भेद नहीं है, दोनों एक हैं। चन्द्रमा और चन्द्रिका की भाँति वे अलग अलग प्रतीत होकर भी एक हैं- ' अन्तरं नैव जानीमश्चन्द्र-चन्द्रिकयोरिव।' परन्तु उपास्य शक्ति ही है। जो लोग इस विश्वास को अपनी तर्कसम्मत सीमा तक खींचकर ले जाते हैं, वे शाक्त कहलाते हैं। जो शक्ति और शक्तिमान् के एकत्व पर अधिक जोर देते हैं, वे शाक्त नहीं कहलाते। मगर कहलाते हों या न कहलाते हों, शक्ति की उपासना पर विश्वास दोनों का है। जिन लोगों ने संसार की भरण-पोषण करने वाली वैष्णवी शक्ति को मुख्य रूप से उपास्य माना है, उन्होंने उस आदिभूता शक्ति का नाम ' महालक्ष्मी' स्वीकार किया है। दीपावली के पुण्य-पर्व पर इसी आद्याशक्ति की पूजा होती है। देश के पूर्वी हिस्सों में इस दिन महाकाली की पूजा होती है। दोनों बातों में कोई विरोध नहीं है। केवल रुचि और संस्कार के अनुसार आद्याशक्ति के विशिष्ट रूपों पर बल दिया जाता है। पूजा आद्याशक्ति की ही होती है। मुझे यह ठीक-ठीक नहीं मालूम कि देश के किसी कोने में इस दिन महासरस्वती की पूजा होती है या नहीं। होती हो तो कुछ अचरज क बात नहीं होगी। दीपावली का पर्व आद्याशक्ति के विभिन्न रूपों के स्मरण का दिन है।

यह सारा दृश्यमान जगत-ज्ञान, इच्छा और क्रिया के रूप में त्रिपुटीकृत है। ब्रह्म की मूल शक्ति में इन तीनों का सूक्ष्म रूप में अवस्थान होगा। त्रिपुटीकृत जगत की मूल कारणभूता इस शक्ति को ' त्रिपुरा' भी कहा जाता है। आरम्भ में जिसे महालक्ष्मी कहा गया है उससे यह अभिन्न है। ज्ञान रूप में अभिव्यक्त होने पर यह सत्वगुणप्रधान सरस्वती के रूप में, इच्छा-रूप में रजोगुण-प्रधान लक्ष्मी के रूप में और क्रियारूप में तमोगुण-प्रधान काली के रूप में उपास्य होती है। लक्ष्मी इच्छा रूप में अभिव्यक्त होती है। जो साधक लक्ष्मी-रूप में आद्याशक्ति की उपासना करते हैं, उनके चित्त में इच्छाशक्ति की प्रधानता होती है, पर बाकी दो तत्व ज्ञान और क्रिया भी उसमें सहायक होते हैं। इसीलिए लक्ष्मी की उपासना 'ज्ञानपूर्वा क्रियापरा' होती है, अर्थात वह ज्ञान द्वारा चलित और क्रिया द्वारा अनुगमित इच्छा-शक्ति की उपासना होती है। 'ज्ञानपूर्वा क्रियापरा' का मतलब है कि यद्यपि इच्छाशक्ति ही मुख्यतः उपास्य है, पर पहले ज्ञान की सहयता और बाद में क्रिया का समर्थन इसमें आवश्यक है। यदि उलटा हो जाये, अर्थात इच्छा-शक्ति की उपासना क्रियापूर्वा और ज्ञानपरा हो जाए, तो उपासना का रूप बदल जाता है। पहली अवस्था में उपास्या लक्ष्मी समस्त जगत के उपकार के लिये होती है। उस लक्ष्मी का वाहन गरुण होता है। गरुण शक्ति, वेग और सेवावृत्ति का प्रतीक है। दूसरी अवस्था में उसका वाहन उल्लू होता है। उल्लू स्वार्थ, अन्धकारप्रियता और विच्छिन्नता का प्रतीक है। लक्ष्मी तभी उपास्य होकर भक्त को ठीक-ठीक कृतकृतय करती है जब उसके चित्त में सबके कल्याण की कामना रहती है। यदि केवल अपना स्वार्थ ही साधक के चित्त में प्रधान हो, तो  वह उलूक-वाहिनी शक्ति की ही कृपा पा सकता है। फिर तो वह तमोगुण का शिकार हो जाता है। उसकी उपासना लोककल्याण मार्ग से विच्छिन्न होकर बन्ध्या हो जाती है। दीपावली प्रकाश का पर्व है। इस दिन जिस लक्ष्मी की पूजा होती है, वह गरुण-वाहिनी है-शक्ति, सेवा और गतिशीलता उसके प्रमुख गुण हैं। प्रकाश और अन्धकार का नियत विरोध है। अमावस्या की रात को प्रयत्नपूर्वक लाख-लाख प्रदीपों को जलाकर हम लख्मी के उलूकवाहिनी रूप की नहीं, गरुणवाहिनी रूप की उपासना करते हैं। हम अन्धकार का, समाज में कटकर रहने का, स्वार्थपरता का प्रयत्नपूर्वक प्रात्याख्यान करते हैं और प्रकाश का, सामाजिकता का और सेवावृत्ति का आव्हान करते हैं। हमें भूलना न चाहिए कि यह उपासना ज्ञान द्वारा चलित और क्रिया द्वारा अनुगमित होकर ही सार्थक होती है।
सर्वहया दया महालक्ष्मीस्त्रीगुणा परमेश्वरी।
लक्ष्यालक्षस्वरूपा या व्याप्त कुत्सनं व्यवस्थिता।।
                                               ( आलोक-पर्व से)

 

                                              

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पी. दयाल श्रीवास्तव

मंत्री जी और बारे लाल

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'मंत्रीजी मैं बोल रहा हूँ बारे लाल दलबदलपुर से।'

' हां-हां बारे लाल जी कैसे हैं, क्या हाल है?'

' हाल तो बेहाल है मंत्रीजी। यहां शापिंग काम्पलेक्स में आग लग गई है, दमकल आफिसर को तीन बार फोन कर चुका हूँ। फायर ब्रिगेड अभी तक नहीं पहुंचा है।'

' देखो बारे मुझे सूचना मिल गई है शहर में आग लग गई है। दमकल अधिकारियों से मैने बात की है फाइल का मामला है। फाइल आगे बढ़ी है पर ससुरी अटक गई है। '

' पर यहां तो दुकानें जल रही हैं।'

' भैये मैने पूर्ण जानकारी प्राप्त कर ली है। यह जो दमकल अधिकारी है न, उसने फायर ब्रिगेड भेजने का आदेश हरी स्याही से मतलब ग्रीन इंक से टीप दिया है। इस अधिकारी के बाप यानि बड़े अधिकारी ने उससे जवाब मांगा है कि टीप हरी स्याही से क्यों लिखी जबकि इंडियन काँस्टीट्यूशन में साफ लिखा है कि आग बुझाने का आदेश सुर्ख लाल स्याही में लिखे जाना चाहिये।'

' परन्तु इससे हमें क्या लेना देना है। आग फैलती जा रही है भ्रष्टाचार की तरह, दूसरी दुकानें भी चपेट में आ गई हैं।'

' बारे लाल आखिर यह कार्यालीन क्रिया है समय तो लगेगा ही। वैसे मैने दमकल अधिकारी को फौरन फायर ब्रिगेड भेजने को कहा है किन्तु बड़ा अधिकारी मान ही नहीं रहा है। उसका कथन है कि हरी स्याही शस्य श्यामला यानि हरे भरे होने का प्रतीक है जबकि आग लाल होती है।'

' मंत्रीजी आग तीसरी दुकान की तरफ फैल रही है। दमकल भेजने की व्यवस्था करें और लापरवाह अधिकारी पर कार्यवाही करें।'

' हमने दमकल अधिकारी  सस्पेंड कर दिया है। बड़ा अधिकारी जवाब का इंतजार कर रहा है फाइल उसकी टेबल पर पड़ी है।'

' मंत्रीजी तीन दुकानें स्वाहा हो चुकी हैं जल्दी करें। आग तेजी से बढ़ रही है।'

' हमने बड़े अधिकारी को भी सस्पेंड कर दिया है और हरी स्याही वाली टीप पर एक जांच आयोग बिठा दिया है। एक रिटायर्ड जज की एक सदस्यीय टीम उसकी जांच करेगी।'

' मंत्रीजी चार दुकानें खाक हो गई हैं आग तेजी से बढ़ रही है शीघ्रता करें।'

' बारे लाल धीरज से काम लो। हमने उस बाबू तक को संसपेंड कर दिया है जिसने टीप लिखने के लिये हरी स्याही का पेन दमकल अधिकारी को दिया था।'

' मंत्रीजी पांच दुकानें जल चुकी हैं आग पूरी बाजार में फैल चुकी है। बहुत जल्दी करें।'

' देखिए हमने उस चपरासी तक को सस्पेंड कर दिया है जो बाजार से हरी स्याही का पेन लाया था। वह पेन बिना परमीशन के मंहगे दामों पर खरीदा गया था। पेन की यथार्थ कीमत पांच रुपये है। जबकि वह पचास रुपये का बिल बनाकर पैंतालीस रुपये डकार गया है।'

' मंत्रीजी चपरासी गया भाड़ में आग बढ़ती जा रही है। पूरा बाजार आग की चपेट में है।'

' बारे लाल बिल्कुल आश्वस्त रहो। हम हैं न। जैसे आयोग अपना फैसला देगा हम आदेश प्रसारित कर देंगे।'

' मंत्रीजी आयोग अभी क्या कर रहा है फैसला आने में कितना समय लगेगा?'

' देखिये आयोग अभी सम्बन्धित दस्तावेज फाइल में लग रहा है, फाइल में छेद कर रहा है। कागज में छेद कर रहा है। एक लेस से कागज फाइल में बांध रहा है।'

' मंत्रीजी अब तो फाइल तैयार हो गई होगी अब आयोग क्या कर रहा है, शहर जल रहा है लोग चिल्ला रहे हैं। '

' अब आयोग फाइल लेकर फोटो कापी कराने गया है। तुम्हे मालूम है कि सरकारी काम और फोटो कापी का तो चोली दामन का साथ है।'

' अब तो आधा शहर जल चुका है। अब वह आयोग का बच्चा क्या कर रहा है?'

' देखो बारे लाल अनपार्लियामेंट्री लेंग्वेज का यूज मत करो। वह फोटो कापी कराकर अभी तक वापस नहीं आया है। विलंब से बचने के लिए त्वरित कार्यवाही करते हुए मैने एक आयोग और बिठा दिया है। वह आयोग पहले वाले आयोग के पीछे गया है और मालूम कर रहा है कि फोटो कापी करने में इतना अदिक समय क्यों लग रहा है?'

' मंत्रीजी आग टेलिफोन बूथ के पास आ गयी है जहां से मैं बोल रहा हूं। अब दूसरा आयोग क्या कर रहा है ? '

' दूसरा आयोग पहले आयोग का स्टिंग आपरेशन कर रहा है और उसकी फाइल बना रहा है।'

' मंत्रीजी हमारे टेलीफोन बूथ में आग लग चुकी है मैं मर रहा हूँ।'

' वारे भाई मरना है तो ठीक से मरना। नियम कायदों के दायरों में ही मरना और सबूत छोड़ जाना कि मरने वाले तुम्ही हो। हमारा देश कानून और नियम कायदों का पक्का है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और लोकतंत्र की रक्षा के लिए कानून का पालन अनिवार्य है इसलिए यदि नियम से मरोगे तो लाख दो लाख का मुआवजा मिल जायेगा।'

' अबे मंत्री के बच्चे जब मैं मर जाऊंगा तो मुआवजा किसे दिलायेगा।'

' तुम्हारे बच्चे हैं न बीबी भी है, पिछली बार जब मैं तम्हारे गांव आया था तब मिली थी मुझसे। तुमने घर बुलाया था। मुझे खाना खाने के लिये। अहा कितना अच्छा खाना बनाती है सुन्दर भी है।'

' अरे वह तो सब मर गये आग में जल गये।'

' तुम्हारे नाती पोते हैं उन्हें तीन लाख दिला देंगे।'

' हाय मैं मर रहा हूं, कुछ तो ख्याल करो दमकल भेजो।'

' मेरी इच्छा है कि अभी तुम जिन्दा रहो, चुनाव तक जिन्दा रहते तो हमें तुम्हारी मदद मिल जाती।'

' मंत्रीजी मैं मरा हाय मैं मरा। दमकल...।'

' हैलो-हैलो मैं मंत्री बोल रहा हूं। वह कमबख्त दमकल अदिकारी तभी बहाल होगा जब तुम्हे मुआवजा मिल जायेगा। अरे हां अब टीप लाल स्याही में लिखकर आ गयी है। दमकल भेज रहा हूं। अभी मरना मत आग बुझेगी अवश्य बुझेगी। मेरे क्षेत्र में आग न बुझे कैसे हो सकता है।' और दमकल दौड़ रही है आग के शहर की ओर पांच साल बाद। पूरा शहर कबका जलकर खाक हो चुका है।

दूसरे दिन के अखबार अग्निकांड से भरे पड़े हैं।

' मंत्रीजी के गांव को उनके विरोधियों ने जलाकर राख कर डाला। अभी तक तीन अपराधियों को पकड़ लिया है बाकी की सरगर्मियों से तलाश की जा रही है।'

 

                                                                          साभार 'सरस्वती सुमन'

 

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" आज अक्टूबर महीने की तेरह तारीख को दिल्ली के एक प्राइवेट अस्पताल में दिन के एक बजकर छियालीस मिनट पर श्री लक्ष्मीमल सिंघवी जी का देहावसान हो गया।"  खबर पढ़ते ही एक अजीब -सा अविश्वास... मतिभ्रम हुआ, जो प्रायः ऐसी खबरों के साथ होता है, पर खबर सच थी। भाई राजेश चेतन जी ने ई. मेल से दी थी और करीब-करीब तुरंत-सी ही दी थी। तुरंत ही परिवार का ध्यान आया, छाया-सी साथ निभाती कमला जी का ध्यान आया...।  असह्य उनकी यह क्षति... क्या कभी इसकी भरपायी हो सकती है... मित्र, शुभचिंतक भी कुछ नहीं कर सकते, सिवाय सहानुभूति, शक्ति व धैर्य की प्रार्थना के। फिर चन्द यादों का... आधे सोचते, आधे मुस्कुराते सिंघवी जी के चेहरे का आंखों के आगे उभर आना भी स्वाभाविक था।

...पिछले एक दशक से हिन्दी से जुड़ी कोई भी बात हो, ब्रिटेन में सबसे पहले उन्ही की तरफ देखा  जाता था, मार्गदर्शन और संरक्षण दोनों के लिए ही। यहां की प्रायः सभी हिन्दी या भारतीय भाषाओं से जुड़ी संस्थाओं के वे संरक्षक बने और सभी की निश्वार्थ भाव से मदद भी की। ...वक्त वेवक्त न सिर्फ मार्ग-दर्शन दिया, अपितु आँधी-पानी ...हर मौसम में कंधे-से कंधा मिलाकर खड़े दिखे। यही वजह है कि सिंघवी जी का ब्रिटेन के हिन्दी प्रेमियों के मन में वही आदर और सम्मान है जो परिवार में एक बड़े-बुजुर्ग का होता है।

...ब्रिटेन में हिन्दी ... हिन्दी के प्रति भारतीयों की रुचि में और उसके पुनर्जीवन में सिंघवी जी का बड़ा हाथ रहा, विशेषतः सृजन के क्षेत्र में। यह वह समय था जब खुद हिन्दुस्तानी घरों में भी ही हिन्दी हेय थी...गर्मी, गर्दा और गरीबी से जुड़ी हिन्दी, उपयोगिता और समय की जरूरतों के आगे, दाल-रोटी की तरह पिज़ा और बर्गर से पीछे छूट चुकी थी...कोई गौरव नहीं था इसका। और तब हिन्दी के एक के बाद एक सार्थक कार्यक्रम करके, पत्रिकाएं निकलवाकर उन्होंने हिन्दी प्रेमियों को जोड़ा और सिर्फ यहां ही नहीं, अपितु पूरे यूरोप में हिन्दी को अपना गौरवमय स्थान वापस मिल सका।

प्रस्तुत हैं लेखनी की तरफ से चन्द श्रद्धा-सुमन; कवि सिंघवी: कुछ चुनिंदा पंत्तियां और मुठ्ठीभर यादें...  

 

मैं कवि नहीं मनुज का मन हूं

सहज हृदय का संवेदन हूं

लिए हुए अनुभव का क्षण हूं

मैं क्षण की शाश्वत धड़कन हूं।

 

*

 

प्रश्नों से भयभीत नहीं, पर

मैं उत्तर से आशंकित हूं

प्रश्नों का सिलसिला सतह पर

मैं उत्तर में खुद अंकित हूं।

 

*

 

आभार बहुत झेले हैं मैने जीवन भर

भारी लगता है सखी आज क्यों अपनापन

उपकारों का प्रतिदान चुकाता विनिमय में

अपनेपन का भुगतान नहीं कर पाता मैं।

ऋण ही होता तो मैं किश्तों में दे पाता

नाते-रिश्ते का समीकरण निभ जाता

पर सखी, तुम्हारे मौन समर्पण से व्याकुल

अपने को आज अधूरा अक्षम पाता मैं। 

एक संवेदनशील कवि और विचारक सिंघवीजी को रचनाओं के माध्यम से जितना-जितना जाना, उतना ही सम्मान जागा मन में। कविताएँ सुनकर, विचार पढ़कर एक आत्मीय विश्वास हो चला ... कौतुकमय विस्मय  के साथ... एक राजनीतिज्ञ और वकील...और इतने संवेदनशील व सुलझे...! उलझी से उलझी स्थिति में भी संयत ही पाया था उन्हें। मन श्रद्धा से भर आता...सोचती कुछ और सुन पाती, सीख पाती  ... पर मौका ही नहीं मिला... हां, एकाध बार उनकी और कमला जी की कुछ और कविताएं जरूर सुनने को मिलीं। फिर अचानक 2006 में उन्हीं के हाथों उन्ही के नाम का कविता सम्मान मिला। खुश थी, जरूर सिंघवी जी को मेरी कविताएँ अच्छी लगी होगीं ...। पर जब समारोह के दौरान उन्होंने किताब देखने को मांगी तो मन बुझ गया। पुरष्कार बेमानी लगने लगा...फिर तुरंत ही खुद को संयत किया व समझाया। जरूरी नहीं जिसके नाम से सम्मान जुड़ा हो वह उसे पढ़े ही  ... यथार्थ की दुनिया में तो ऐसे ही होता है...वक्त नहीं होता कभी, तो कभी अहमियत नहीं होती!

 

चुपचाप न सिर्फ सम्मान लिया और फोटो खिंचवाईं, वरन् आग्रह करके माइक पर आयोजकों व सभागार को इस अप्रत्याशित सम्मान के लिए धन्यवाद भी दिया। मन में चल रही सारी उथल-पुथल...मेरे सारे अटपटेपन के बावजूद भी, वहां कई ऐसे थे जिनकी आंखों में भरपूर स्नेह था और एक उस अपनेपन के भाव ने सभी संशयों को काफी हद तक समाप्त भी किया। अंत में सिंघवी जी भी आए और कहा---'इन्हें...इन्हें...और इन्हें भी अपनी किताब दें।' जिस-जिसके लिए कहा...शाम को सादर उतनी ही किताबें लेकर पहुंच भी गई।

इस साल 2007 में  दो बार मिले सिंघवी जी; जनवरी में देहली में और फिर जुलाई के महीने में पुनः न्यूयौर्क में। ...दोनों ही बार वे व्हील-चेयर पर थे और बेहद कमजोर दिख रहे थे। ...औपचारिक अभिवादन के बाद पता नहीं कैसे मुंह से निकल गया, ' यह कैसे?'...और तब उनका आधा जबाब सुने बगैर ही बोल पड़ी, ' पर आप व्हील चेयर पर कतई अच्छे नहीं लगते, जल्दी-से ठीक हो जाईये।' उत्तर स्वरूप चेहरे पर उभरे क्षण भर के दर्द ने सब कुछ कह दिया ।... उनके हिन्दी-प्रेम के प्रति मन में और भी आदर उमड़ आया... इस उम्र में, अस्वस्थता के बावज़ूद  भी इतनी लगन और निष्ठा ...।

फिर...जुलाई में और भी आश्चर्य चकित थी जब वह वैसे ही, उसी हालत में, न सिर्फ वहां आए अपितु हर कार्यक्रम में उपस्थित भी रहे।

...डाइनिंग ह़ॉल की वह भीड़-भरी छोटी-सी बातचीत कल-सी याद आ रही है। इधर-उधर की बातों के दौरान स्वयं ही बोले कि इंद्रजाल पर ' लेखनी ' पत्रिका देखी, और अच्छी लगी उन्हें। अच्छा काम कर रही हूं मैं। फिर बोले कि अब वे ' साहित्य-अमृत' पत्रिका का सम्पादन कर रहे हैं और मुझे 'साहित्य-अमृत' के लिए भी कुछ लिखना चाहिए...क्या मैने यह पत्रिका देखी है? "हां," एक संक्षिप्त सा उत्तर देकर मैं खो गई 'साहित्य-अमृत' के पन्नों में। अक्सर इंगलैंड के दूतावास से कुछ पत्रिकायें भेजी जाती हैं। दो अँक मिले थे। पत्रिका वाकई में अच्छी और भिन्न थी ...भारतीय संस्कृति और संस्कारों के प्रति रुझान और विमर्श लिए हुए। बचपन में, परिवार में हर माह इन्तजार करके पढ़ी जाने वाली कन्हैया लाल माणिकलाल मुंशी जी की अब बन्द हो चुकी ' भारती' पत्रिका की जगह ले सकती है यह पत्रिका...ऐसा मन में ख्याल भी आया था तब। बचपन में भारत और भारतीय संस्कृति और दर्शन के बारे में बहुत कुछ जाना, समझा और पढ़ा था इस पत्रिका के माध्यम से और अपने बच्चों को बड़ा करते समय ऐसी पत्रिकाओं की कमी बहुत खली भी थी।

अबतक शायद मेरी चुप्पी देखकर वह समझ बैठे कि मैने पत्रिका देखी ही नहीं है, तुरंत ही बोले मैं कुछ अंक भिजवाने की कोशिश करूंगा।  

मेरे लिए यह बात गौरव की और सुखद थी कि उन्होंने साहित्य-अमृत के लिए कुछ लिखने को कहा। स्वभाव की बाल-सुलभ सहजता और तत्परता के साथ उनपर एक बार फिर आत्मीय विश्वाश हो चला। पूछ बैठी क्या आप भी लेखनी के लिए आशीर्वाद स्वरूप कुछ लिखना चाहेंगे। ' जरूर'। उनका एकबार फिर वही संरक्षण और प्रोत्साहन पूर्ण जबाब था।

" मेरी ' हिन्दी जन-जन की भाषा' कविता डाल दें, अगर हिन्दी पर कुछ लिख रही हैं, तो।"

उन्होंने उसी सहजता से बातचीत को आगे बढ़ाया। एक औपचारिक सी ही जान-पहचान थी अभी तक... पहली बार कुछ मिनटों की बातचीत, लेखनी और जोधपुर के बारे में होते होते थोड़ा और खुली और तुरंत ही पूछने की धृष्टता कर बैठी-

' पर उससे तो बहुत अच्छी अच्छी और भी कविताएँ हैं आपकी?'

मेरा आशय वह तुरंत ही समझ गए। एक आत्मीय बुजुर्ग की तरह बोले, " जो मन हो डाल दिया करें, बस मुझे भी एक ई. मेल से बताती रहें, ताकि मैं भी देख सकूं।" और तब मन का सम्मान, पहली बार आत्मीयता में बदल गया।... यह आत्मीयता चन्द महीनों की भी नहीं, पहली और आखिरी है... तब कब जान पाई थी मैं...!

सहज व्यक्तित्व, मनीषी विचारक, सहृदय कवि और कुशल राजनेता व हिन्दी के कर्मठ सिपाही...जितना लिखूं, उतना कम है। स्मृति द्वार से अनगिनित यादें धूप किरन सी झांक रही हैं...प्रेरक स्मृति-शेष बने वे सदा ही हमारे, विशेषतः यहां ब्रिटेन में बसे भारतीय और हिन्दी प्रेमियों के  साथ रहेंगे। सिंघवी जी को अन्तिम अभिनन्दन और विनम्र श्रद्धांजली !         

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राग-रंग

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भारतीय दीपों की मनोहारी विविधता

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                   -हेमा गुहा

 

प्रागैतिहासिक मानव द्वारा अग्नि की खोज मानव जाति की सभ्यता में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। अग्नि या प्रकाश ने मनुष्य का जीवन हमेशा के लिए बदल दिया। लगभग सभी सभ्यताओं में प्रकृति को प्रकाश, जल, वायु, धरती और ध्वनि के रूप में सदैव से पूजा जाता रहा है। अँधियारे में दीप या मोमबत्ती जलाने से मनुष्य को अँधियारे के भय को दूर करने और जानवरों से अपनी सुरक्षा करने में सहायता मिली।

हिन्दुओं में घरों या मंदिरों में दीप प्रज्वलित करके भगवान की उपासना चिरकाल से चली आ रही है। सूर्य और अग्नि के प्रतीक के रूप में दीप सदैव मंगलकारी माना गया है। दीप को पावनता प्रदान किये जाने के कारण शिल्पकार को इसे अधिक सुंदर, कार्यशील और सुरुचिपूर्ण बनाने की प्रेरणा मिली।

आरंभ में दीप का मुख्य भाग पत्थर या सीप का बनाया जाता था। उसके बाद पकी मिट्टी (टेराकोटा) और धातु के  दीप बनने लगे। भारत के प्रमुख ग्रन्थों में स्वर्ण और बहुमूल्य पत्थरों से बने दीपों का विस्तृत वर्णन मिलता है।

आरंभ में दीप का मुख्य भाग पात्र के आकार का था जिसके एक तरफ बत्ती के लिए चोंच बनी होती थी। बाद में इसे अधिक गरिमामय आधार प्रदान किया गया। अनेक घरों में विशेषकर दक्षिण भारत में एक साधारण सा 'कुथुविलक्कू ' या  एक छोटा पीतल का दीप होता है जिसे प्रतिदिन प्रज्वलित किया जाता है। यह साधारण आम-सा दिया भारत के विभिन्न भागों में विभिन्न रूप में दिखाई देता है, साधारण मिट्टी का, जो प्रकाश के त्योहार 'दिवाली' में प्रत्येक घर में जलाया जाता है से लेकर केरल और तामिलनाडु के मन्दिरों के विशालकाय आनुष्ठानिक दीप और कुछ ऐसे दीपों के रूप में जो केवल संग्रहालयों में ही दिखाई देते हैं। 

पारम्परिक भारतीय दीप को मुलतः चार श्रेणियों में बांटा जा सकता है। आरती दीप, खड़े किये जाने वाले दीप, श्रंखला दीप और मुगल दीप। आरती दीप को सामान्यतः प्रार्थना के समय हाथ में पकड़ा जाता है जिसके कारण इस दीप का हैंडल नाग या मझली के रूप में सुरुचिपूर्ण ढंग से घुमाव लिये हुए होता है। खड़े किये जाने वाले दीप कई प्रकार के होते हैं और आम तौर पर धातु से बनाये जाते हैं और मन्दिरों में प्रयुक्त होते हैं। एक वृक्ष दीप प्रकार भी होती है जिसमें कई शाखाएँ होती हैं। इस श्रेणी में दीपलक्ष्मी संभवतः सबसे प्रचलित है। यह दीप नारी आकृति के समान होता है और इसका उद्गम भारत में रहने वाले रोमन लोगों के बनाये दीपों से हुआ माना जाता है। तामिलनाडु के धातु शिल्पकारों ने समय एवं कलानुरूप इसे नैन-नक्श, आकार, परिधान व आबूषणों से सज्जित कर विभिन्न रूप प्रदान किये।

लटकने वाले दीपों का प्रयोग भी मुख्यतः मंदिरों में होता है। इसमें अनेक पंक्तियां होती हैं। ये मंदिर के सभा-कक्ष  या गर्भ-गृह की छत से लटके होते हैं और इनके प्रकाश से प्रतिमा की आभा और सौंदर्य में चार चांद लग जाते हैं। इस दीप का एक प्रमुख प्रकार 'थुंगा विलक्कू' या अखंड दीप होता है। इस दीप का उल्लेख चोल शिलालेखों में भी होता है। इसे निद्राहीन दीप भी कहते हैं क्योंकि यह सारी रात प्रज्वलित रहता है और वह भी इसमें बिना तेल डाले या बत्ती बदले हुए। इस दीप की रचना भी बहुत महत्वपूर्ण है। इसका तैल एक गोल पात्र में रखा होता है जिसमें से बत्ती एक बारी में एक बूंद ही सोखती है। इस दीप में तैल निकासी छिद्र, बत्ती की मोटाई और वायु प्रवेशिका के आकार में पूर्ण सामन्जस्य होना आवश्यक है।

मुगल दीप दो प्रकार के होते हैं, लटकने वाले गोलाकार दीप और मंजूषा के आकार के दीप। मुगल शाषकों के हरमों में ग्रीष्माकाल के दौरान सुगंधित जल से भरे छोटे कुंड होते थे। उनके जल की सतह छोटे-छोटे दीपों से सज्जित होती थी और उन दीपों पर रेशमी आवरण होता था। युवतियां बाजुबंदों से क्रीडा करती थी जिन्हे किसी गेंद के समान इधर-उधर फेंका  जाता था। दीपों का आकार कुछ इस तरह का होता था कि तैल कभी छलकता नहीं था। इन दीपों को गढ़ने के प्रमुख केन्द्र भारत के केरल और तामिल नाडु राज्य में स्थित हैं।

 

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चार बाल कविताएँ

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स्कूल में लग जाये ताला

अब से ऐसा ही हो जाये

भले किसी को पसंद न आये ।

 

स्कूल में लग जाये ताला

दे बस्तों को देश निकाला

होमवर्क जुर्म घोषित हो,

कोई परीक्षा ले न पाये ।

 

दिन भर केवल खेलें खेल

जो डाँटे उसको हो जेल

खट्टा-मीठा खारा-तीता,

जो चाहे जैसा वह खाये ।

 

हरदम चले हमारी सत्ता

हो दिल्ली चाहे कलकत्ता

मालिक हैं अपनी मर्जी के

हर गलती माँ-बाप को भाये ।

 

मौसी-मामी, नाना-नानी

रोज सुनायें नयी कहानी

हम पंछी हैं, हम तितली हैं

गीत हमारा ही जग गाये ।

 

 

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चलो चलें अब  झील पर

 टांग दे बस्ता कील पर ।

चलो चले अब झील पर

पकडें मछली बंसी डाल

सीपी-घोघा रखें संभाल

नजर रहे पर चील पर ।

 

जा बैठें फिर नाव में

घूमें पानी के गाँव में

नाविक काका की अपील पर ।

 

उतरे विदशी पक्षी पहुना

खुश हैं कितने उमंग दुगुना ।

घर से सौकडों मील पर ।

 

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सोखा किसने पानी

 नदी किनारे पेड साल का

उस पर बैठा पंडूक

सोखा किसने सारा पानी

कहता वह, सुन-सुन, रूक-रूक ।

 

नदी किनारे पेड नीम का

 उस पर बैठी कोयल

सोखा किसने सारी पानी

कहता वह, हम तो घायल ।

 

नदी किनारे पेड आम का

उस पर बैठी मैना

सोखा किसने सारा पानी

कहती वह, मैं ना, मैं ना ।

    

नदी किनारे पेड पीपल का

उस पर बैठा तोता

सोखा किसने सारा पानी

कहता वह, काश न होता ।

 

नदी किनारे पेड ताड का

उस पर बैठा कौआ

सोखा किसने सारा पानी

 कहता वह, आदम भैया ।

 

 

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मेरा प्यारा घर

 

एक छोटे से गाँव में

बादलों की छाँव में

मेरा प्यारा घर...

 

बूढे पर्वत के पीछे

घाटी में सबसे नीचे

दूर से आये नजर...

 

वनफूलों से गमकता

हरी किरनों से दमकता

स्वागत को तत्पर...

 

आँगन में तुलसी मैया

पास बंधी श्यामा गैया

बाँचे तोता अक्षर...

 

पेड़ झूम, मुस्काते हैं

पंछी आपस में गाते हैं

आओ मीत इधर...

 

कभी तितलियों के फेरे

भौंरे आते शाम-सबेरे

यहाँ कहाँ मच्छर...

 

सपनों में नित आता है

अपने पास बुलाता है

परदेश रहा अगर...

                     

              -जयप्रकाश मानस

* * *

 

 

दीपावली

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                    -शैल अग्रवाल

बच्चों क्या आपने कभी दिवाली की रात पटाखे छोड़ते, मिठाई खाते ...सारी  मौज-मस्ती और धूम-धड़ाके के बीच सोचा है कि पहली दिवाली कब, कैसे, कहाँ  और किसने मनाई थी...  आखिर कैसे और कब शुरू हुआ होगा यह दिवाली का त्योहार ! 

भारत के  भिन्न-भिन्न प्रान्तों में अलग-अलग कहानियाँ प्रचिलित हैं - उत्तर भारत में मानते हैं कि भगवान राम जब लक्ष्मण और सीता के साथ चौदह बर्ष का बनवास पूरा करके अयोध्या वापस लौटे तो उनके स्वागत में हर्षातिरेक से झूमती प्रजा ने पूरी अयोध्या को  फूल पत्तों  से सजाया। सैकड़ों दीप जलाए ...और घर घर मिठाई बांटी। और तब उस दिन खुशी और दियों की रौशनी से जगमग अमावस की वह अँधेरी रात पूर्णिमा से भी ज्यादा उजेरी और झिलमिल हो गई थी। तभी से अंधेरे पर रौशनी की...पाप पर पुण्य के विजय का प्रतीक बन गई है दिवाली ; क्योंकि रावण  का वध करके , दुनिया को सभी अन्यायी राक्षसों से मुक्ति दिलाकर  राम ने सिद्ध कर दिया था कि जीत तो हमेशा अच्छाई की ही होती है। झूठ या पाप कितना भी शक्तिशाली क्यों न लगे, अँततः उसे हारना ही पड़ता है। आज भी हम इन्ही आदर्शों को जीवित रखने के प्रयास में , वैसे ही सैकड़ों दीप जलाकर हर्षोल्लास के साथ दिवाली का त्योहार मनाते हैं।

दिवाली का यह त्योहार पांच दिन का होता है। धनतेरस, छोटी दिवाली, दिवाली फिर पड़वा  या गोबर्धन और अंत में भैया दूज।

दिवाली पर घर घर में लक्ष्मी पूजन किया जाता है और फिर बड़ों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। लक्ष्मीजी धन वैभव और सुख शान्ति देती हैं जिससे कि हम सुखी रह सकें और निश्चिन्त होकर अपना और दूसरों का भला कर सकें...सत्कर्म कर सकें। बंगाल में मां काली की पूजा की जाती है दिवाली पर...काली जो कि शक्ति की देवी हैं और जिन्होंने महिषासुर जैसे नरपिशाच का वध किया था। वास्तव में देखा जाए तो लक्ष्मी काली और सरस्वती एक ही देवी के तीन रूप हैं ...सरस्वती ज्ञान देती हैं , लक्ष्मी धन-धान्य और काली शक्ति। एक सफल, सुनियोजित और सुखी जीवन के लिए तीनों का ही आशीर्वाद चाहिए...एक का  भी अभाव जीवन को हताश् और विकलांग कर देता है। ऐसी इस त्रिशक्ति वाली आदि माँ का नमन तो हमें सदैव ही करना चाहिए... सिर्फ दिवाली पर ही नहीं। खील, बताशे, पटाखे, नए कपड़े और नए खिलौनों के बीच आप यह सोचना मत भूलिएगा कि कैसे हम सब आज भी भगवान राम की ही तरह बड़ों की बात मानकर, कर्तव्य  और सच्चाई की राह पर चलकर, लक्ष्मी, सरस्वती और काली तीनों ही देवियों का आशीर्वाद सदा के लिए  आज भी ले सकते हैं।

 व्यापारी वर्ग में दिवाली के अगला दिन नए वर्ष की तरह मनाया जाता है और दिवाली के दिन नए बही-खातों  की पूजा के बाद अगले दिन सभी को मिठाई, उपहार और नए वर्ष की शुभकामनाएँ दी जाती हैं। भारत का विक्रम संवत दिवाली के अगले दिन की पडवा से ही शुरु होता है, पडवा यानी कि चंद्रमा के पखवाड़े का पहला दिन जो कि अमावस या पूर्णिमा के बाद आती है। अमावस यानी कि बिना चंद्रमा की रात और पूर्णिमा यानी कि पूरे गोल मटोल तेज चमकते चंदा मामा की रात। और इस तरह से हर महीने ही घटते-बढ़ते चंदा मामा अपना महीना व्यतीत करते हैं। पहले जब घड़ियाँ नहीं थीं, समय को चंद्रमा और सूरज से ही नापा जाता था। कई जगह दिवाली पर ताश खेलने का भी चलन है। दिवाली एक खुशी का त्योहार है और परिवार व प्रियजनों के साथ मिलजुलकर मनाया जाता है। दिवाली सफाई का भी त्योहार है...इस दिन घर आंगन...कमरे-कमरे और कोने-कोने साफ किए जाते हैं। मान्यता है कि दिवाली की रात धन की देवी लक्ष्मी उसी घर आती है जो साफ-सुथरा हो और उसीके बगल में जाकर बैठती है जिसके तन-मन दोनों साफ हों। 

तो बच्चों  खेल और पढ़ाई के बीच आप भी  बड़ों को , छोटों को, मित्रों व परिचितों को 'शुभ दीपावली' कहना मत भूलिएगा...क्योंकि इस तरह से उन्हें भी तो याद आ जाएँगी वे सारी बातें जो हमने अभी-अभी की हैं...अंत में आप सभी को लेखनी की ओर से ' शुभ दीपावली' और एक सफल व स्वस्थ नव-वर्ष की ढेरों शुभ-कामनाएँ !

 

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विविधा

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From
October 18, 2007

Laxmi Mall Singhvi

Long-serving Indian High Commissioner in London who also achieved distinction as a jurist and constitutional expert

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He had his eccentric side, manifested by an obsession with placing busts of Mahatama Gandhi in as many famous buildings as possible in Britain. He even managed to get one in Shakespeare’s house. He was also fond of using his contacts to get universities to give him honorary degrees, of which he had a large collection.

To celebrate 50 years of Indian independence he designed a watch, handed out by the High Commission in London, which contained an engraved message of Indian-British friendship and declaring that the world was one family. He was also fond of handing out an interfaith tie, whic