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सोच और संस्कारों की साँझी धरोहर

(अंक-10)
हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए ।
चराग़ों की तरह आँखें जलें, जब शाम हो जाए ।
-बशीर बद्र
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गीत और ग़ज़ल विशेषांक
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
copyrights to writers and publisher only.
संरचना व संपादन:: शैल अग्रवाल.
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अपनी बात

-शैल अग्रवाल
गीत और ग़ज़ल का फरक क्या बस गुल और फूल तक ही सीमित है... गीत और ग़ज़ल की बहस अधिकांशतः हिन्दी और उर्दू की बहस बनकर रह जाती है जबकि हिन्दी और उर्दू दोनों ही एक ही कौम की दो भाषाएँ हैं और सदियों से हमारी सांझी और सांस्कृतिक धरोहर रही हैं। विभाजन के साठ साल बाद भी, दोनों देशों की बोलचाल की भाषा आज भी गंगा-जमनी ही है। कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तक हर प्रान्तीय भाषा-भाषियों ने ग़ज़ल गायकी को अपनी जुबां और पहचान दी है। सरहद के दूसरी ओर भी यही हाल है। आज भी लाहौर, पेशावर या ढाका, या फिर कलकत्ता मुम्बई, दिल्ली, सभी जगह एक-से-एक उम्दा गायक सुर और सोज़ की साधना में समर्पित हैं और गीत और ग़ज़ल की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए गालिब और मीर के सुरों में ही गूंज रहे हैं । वैसे भी एक ख़याल, एक सोज़ का कैसा वतन और कैसी सीमा, ये अहसास तो शाश्वत हैं,
मैं हवा हूँ, कहां वतन मेरा
दश्त मेरा न ये चमन मेरा।
अमीक हनफ़ी
भाषा का काम मुख्यतः अभिव्यक्ति है और कविता हो या गीत व गजल, सभी का माध्यम भाषा ही है। मन जो कहे...दूसरा सुन-समझ ले, आनंदित और पुलकित हो ले, भावों और सोच के धरातल पर एक दूसरे से मिल लें, क्या बस इतना ही काफी नहीं ...
तुम्हें खोजता था मैं, पा नहीं सका, हवा बन बहीं तुम, जब
मैं थका, रुका ।
- ' निराला '
ओस की बूदों के कंपन में, झरनों की कलकल में, खुशबू की मादकता और पवन की सिहरन मे... दुखियों के आँसू और बच्चों की मुस्कान में ...कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढा और पाया है इसे। अनगिनित वे पल जिन्हें हम बेहद शिद्दत और अहसास के साथ जीना चाहते हैं, अक्सर इज़ाजत ही नहीं देता जीवन कि उन खूबसूरत पलों के बारे में सोचा तक जाए, उन्ही भागते-दौड़ते पलों की थमी अनुगूँज का नाम है कविता...जैसे सितार पर झाले के बाद एक सुरीली और कंपित मीड ... देर तक गूंजती हुई।
कहीं पढ़ा था कि गजल का शाब्दिक अर्थ है प्रिय से मन की बात कहना। शायद यही वज़ह है कि- जैसे बातों का (वह भी प्रिय से) अंत नहीं, वैसे ही गीत और ग़ज़ल के विषय भी विविध और अनंत रहे हैं। बेबाक मन जो अल्हड़ बच्चे सा खेलता है, आसानी से बहलता नहीं; हां, दुःख और सुख से बिंधी बांसुरी-सा हल्की सी फूंक पर भी गूँजना जरूर स्वभाव है इसका। तो क्या हम यह मान लें कि ये सुख-दुख या विविध अनुभव ही काव्य-जननी या प्रेरणा हैं।
' वियोगी होगा पहला कवि आह से उपजा होगा गान/ उमड़कर आँखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान।'
-सुमित्रानन्दन पंत।
पर मुस्कान और आंसू ही नहीं, भावातिरेक में शब्द भी तो झरते हैं आंखों से... होठों से। भारतीय जन-जीवन में तो वैसे भी गीत-संगीत ताने-बाने-सा ही बुना है। शादी-ब्याह, जन्म, मत्यु, दुःख-सुख; सच कहूँ तो आज भी हर अवसर पर गीत-संगीत ही सामाजिक अभिव्यक्ति का सर्वाधिक सरल, सशक्त और प्रिय माध्यम है। प्यार, नफरत सब समेटे ये गीत और ग़ज़ल कभी जाने-अनजाने की आस ...तो कभी मनचाहे की तलाश हैं। एक अबूझ प्यास, तो कभी एक उलझी भटकन हैं। चुटकी ले-लेकर हँसाती-रुलाती भावों की इस सुरीली छेड़छाड़ को कुछ और ज्यादा ही शह दी है पिछले सात दशक से दिन-प्रति- दिन और-और प्रचलित होते और हरेक के सर चढ़कर बोलते फिल्मी गीतों ने। पिछले साठ सालों में एक-से-एक अच्छे गीतकार और गजलकारों का नाम जुड़ा है इनसे और ये इन्हें एक दूसरे ही धरातल पर ले गए हैं। सफर जो कभी शैलेन्द्र, गोपालसिंह नेपाली, साहिर लुधियानवी, कैफी आजमी और हसरत जयपुरी आदि से शुरु हुआ था, आज इसमें नीरज, अनजान, कतील शफाई, नासिर, गुलज़ार, जावेद अख्तर जैसे कई-कई बेहद संवेदनशील और काबिल नाम जुड़ गये हैं और जगजीत सिंह, अनूप जलोटा, तलत अजीज, चंदन दास, भूपेन्द्र, मेंहदी हसन, गुलाम अली, फरीदा खानम, मुन्नी बेगम, बेगम अख्तर, नूरजहां, तलत महमूद, मुकेश, लता, (आशा भोंसले) कविता कृष्णमूर्ति, सोनू निगम, अलका यागनिक, शान जैसी मधुर और सोजभरी और सुरीली आवाजों ने इनके असर और लोकप्रियता में चार चांद लगाए हैं(नामों की फहरिश्त वक्त के साथ लम्बी ही होती जा रही है)।
इसी लोकप्रियता का असर है कि आज यह काव्य-रस घर-घर स्वर लहरियों के संग बह रहा है...बच्चे-बूढ़े सभी के दिलो-दिमाग पर हावी है। काफी लचर सामग्री भी परोसी जाती है, पर अपवाद कहां नहीं होते?
सूर, तुलसी, कबीर के साथ जब नरेन्द्र शर्मा और प्रदीप भी घर घर गूंजे तो यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि इन स्वर लहरियों के साथ साहित्य जन-जीवन में भी रच-बस गया और सुबह की किरणें, किरणें नहीं 'ज्योति कलश' बन गयीं। रोटी की जोड़-तोड़ में जो मीर और गालिब का नाम तक नहीं जान पाए थे उन्हें भी सुरैया और तलत ने ' दिले नादां ' से परिचित कराया और इन गीत और ग़ज़लों की लोकप्रियता बताती है कि पल भर को ही सही, गरीब-से-गरीब का जीवन भी आज एक गीतों भरी कहानी है... यथार्थ की कठोरता इनके दम पर मिटी भले ही न हो, कम-से-कम कम अवश्य हुई है।
कब हम बचपन से यौवन और यौवन से बुढ़ापे की तरफ चल पड़ते हैं और कब अपने आप से भी बेगाने से होने लगते हैं, सूखे पत्ते सा उड़ता... यथार्थ की जमीं और सपनों के आकाश की दुर्लभ दूरियां नापता यह जीवन, इन बातों का लेखा-जोखा तक रखने की फुरसत नहीं देता। और तब बेबस और ' नुक्तांचीं गमे दिल' ही तो है जो कभी बात न कह पाने के गम में तो कभी 'बात बनाए न बने' की उलझन में डूबा, न जाने कैसे-कैसे करतब दिखलाता है। कितना-कितना हंसाता और रुलाता है। और यहीं से शुरु होता है हमारा शब्द और भावों में रचा बसा एक कल्पना का संसार... गीत-संगीत का साथ।
पर यह जूझ... यह भटकन, यह मज़बूरी ही तो हमारा इश्क या शग़ल है...जीवन है!
हज़ार ख्वाइशें ऐसी कि हर ख्वाइश पर दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान मगर कम निकले ।
आज भी तो हाँ पर ना और ना पर हाँ ही तो इस मन का स्वभाव है।
मेरे महबूब, मेरे दोस्त नहीं ये भी नहीं
मेरी बेबाक तबियत का तकाज़ा है कुछ और
-शौकत जयपुरी
और 'उम्रे दराज़' से उधार मांग कर लाए गये ये पल, दिन, महीने, साल...देखते-देखते ही पीछे भी छूट जाते हैं, पहुंच से परे, इन्ही सपने देखती आंखों के आगे ही। ... आरजू में तो कभी इन्तज़ार में खुशियों के सातवें आसमान बैठे तो कभी उदास और उन्मन, बस उड़ते रहते है हम इनके साथ। वैसे भी चलचित्र-सा देखने के अलावा और कुछ बस में भी तो नहीं हमारे। खुद ही तमाशबीन और खुद ही करतबबाज़, फिर भी जीते जी कब छोड़ पाए हैं हम यह अद्भुत नाटिका!
अपनी मर्जी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
रुख हवाओं का जिधर है उधर के हम है...!
वक्त के हाथ है मिट्टी का सफर सदियों से
किसको मालूम कहां के हैं, किधर के हम हैं।
चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफिर का नसीब
सोचते रहते हैं किस रहगुजर के हम हैं।
-निदा फाज़ली
कैसी बहकी बहकी बातें कर रही हूं; माटी के इस पुतले ने भला कब और किस तूफान से हार मानी है...कैसे भूल गई अपना कभी एक बेहद पसंदीदा शेर ,
ऐ ज़जबाए दिल ग़र तू चाहे हर चीज़ मुनासिब हो जाए
मंजिल के लिए दो पैर चलूँ और मंजिल सामने हो जाए।
किसने लिखा, याद नहीं। कॉलेज के उन्मादी और बेफिक्र दिनों में एक दूसरे को सुना-सुनाकर बस खुश हो लिया करते थे हम और एक नयी स्फूर्ति से भर जाते थे। आज तो बस इतना ही याद है ... अब ना वो जोश और ना ही वे साथी।
भोलापन...सहेलियां ही नहीं, शायद वक्त की भीड़ में सही शब्द तक खो जाते हैं ...पर आजभी तो मुश्किल से मुश्किल पल में यही समझाया है खुद को, कि सब यह मन का ही खेल है...चाहो तो जीत लो, चाहे तो हार। वैसे भी असलियत किसे पता नहीं!
हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
दिल के खुश रखने को 'गालिब' ये खयाल अच्छा है।
एक बार फिर वक्त का मुसाफिर गुजरे वर्ष को अतीत की संदूकची में सजाये तैयार बैठा है। एकबार फिर पीछे छूटी यादें ... मिलन और विछोह की, उपलब्धि और असफलताओं की...सुख-दुख की, मन के एलबम में तस्बीरों सी सजने लगी हैं...हंसाती, रुलाती, उलझाती...कभी-कभी तो बेमतलब ही थकाती। पर मनचाहा सब पूरा ही हो जाए, तो फिर जीने को ही क्या रह जाए...
हर किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता/ कहीं जमीं नहीं मिलती तो कहीं आसमां नहीं मिलता।
मियां गालिब यह कह तो गये, पर जाते-जाते एक ऐसा संसार भी छोड़ गए हमारे लिए, जहां आज भी हम न सिर्फ जमीं और आसमां दोनों को ही बांहों में भरने की गुस्ताख़ी करते हैं बल्कि रमते भी हैं ... लब्ज़ों के कांधे सिर टिकाए अपना एकांत और कोलाहल जी भर-भरकर बांटते हैं... हँसते और रोते हैं।
कभी चांदनी के साथ छत पर टहलती, तो कभी लहरों-सी सागर की बांहों में सिमटने को बेचैन, कल्पना-सुन्दरी भावों के नए-नए लिबास पहने नए वर्ष के स्वागत की तैयारी में सज उठी है। होठों पर एक उत्सुक मुस्कान और आँखों में हल्की-सी नमी ... बिल्कुल नयी-नवेली दुल्हन-सा ही तो हाल है इसका। एक तरफ तो विदाई जाते वर्ष 2007 की... पीछे छूटे कई-कई महीने, घंटों और पलों की, तो दूसरी तरफ नए के स्वागत की प्रतीक्षा और रोमांच...। ऐसे रूमानी पल में हमने भी गीत और ग़ज़लों का एक महकता गमकत गुलदस्ता तैयार किया है आपके लिए और गीत व ग़ज़ल की उत्पत्ति, प्रचलन और तकनीकी आदि जानकारी के बारे में कई-कई तथ्य एकत्रित करने की कोशिश भी।
यही वजह है कि लेखनी के सभी स्थाई स्तंभ जैसे विविधा, राग-रंग और भारती, सभी इसबार ग़ज़लों से या ग़ज़ल संबंधी सामग्री से ओतप्रोत हैं। नए-पुराने, जाने-अनजाने सभी गीतकार और गजलकारों की झोली से कुछ चुनिंदा रतन आपतक पहुँचाने का प्रयास है लेखनी का यह अंक। सच कहूँ तो सुख और दुःख की अनगिनित हिलोरें लेती गीत और गजल की एक मनमौजी लहर उमड़ आई है लेखनी के इस अंक में; आपको भिगोने और डुबोने...शायद संग-संग बहा तक ले जाने को...आपकी प्रतिक्रिया का हमें इन्तज़ार रहेगा!
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मन की किताब से...
कोई फूल

वशीर वद्र
कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बंधा हुआ ।
वो ग़ज़ल का लहजा नया-नया, न कहा हुआ न सुना हुआ ।
जिसे ले गई अभी हवा, वो वरक़ था दिल की किताब का,
कहीँ आँसुओं से मिटा हुआ, कहीं, आँसुओं से लिखा हुआ ।
कई मील रेत को काटकर, कोई मौज फूल खिला गई,
कोई पेड़ प्यास से मर रहा है, नदी के पास खड़ा हुआ ।
मुझे हादिसों ने सजा-सजा के बहुत हसीन बना दिया,
मिरा दिल भी जैसे दुल्हन का हाथ हो मेंहदियों से रचा हुआ ।
वही शहर है वही रास्ते, वही घर है और वही लान भी,
मगर इस दरीचे से पूछना, वो दरख़्त अनार का क्या हुआ ।
वही ख़त के जिसपे जगह-जगह, दो महकते होटों के चाँद थे,
किसी भूले बिसरे से ताक़ पर तहे-गर्द होगा दबा हुआ ।
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें

अहमद फ़राज़
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें
ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें
तू ख़ुदा है न मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यों इतने हिजाबों में मिलें
ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बड़ता है शरबें जो शराबों में मिलें
आज हम दार पे खेंचे गये जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें
अब न वो मैं हूँ न तु है न वो माज़ी है "फ़राज़" जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
बंद होंठों में छुपा लो

-कुंवर बेचैन
बंद होंठों में छुपा लो ये हँसी के फूल वर्ना रो पड़ोगे।
हैं हवा के पास अनगिन आरियाँ कटखने तूफान की तैयारियाँ कर न देना आँधियों को रोकने की भूल वर्ना रो पड़ोगे।
हर नदी पर अब प्रलय के खेल हैं हर लहर के ढंग भी बेमेल हैं फेंक मत देना नदी पर निज व्यथा की धूल वर्ना रो पड़ोगे।
बंद होंठों में छुपा लो ये हँसी के फूल वर्ना रो पड़ोगे।
कहीं चांद

वशीर वद्र
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कहीं चाँद राहों में खो गया कहीं चाँदनी भी भटक गई मैं चराग़ वो भी बुझा हुआ मेरी रात कैसे चमक गई
मेरी दास्ताँ का उरूज था तेरी नर्म पलकों की छाँव में मेरे साथ था तुझे जागना तेरी आँख कैसे झपक गई
कभी हम मिले तो भी क्या मिले वही दूरियाँ वही फ़ासले न कभी हमारे क़दम बढ़े न कभी तुम्हारी झिझक गई
तुझे भूल जाने की कोशिशें कभी क़ामयाब न हो सकीं तेरी याद शाख़-ए-गुलाब है जो हवा चली तो लचक गई
जिन्दगी यूं जली
-कुंवर बेचैन
ज़िंदगी यूँ भी जली, यूँ भी जली मीलों तक
चाँदनी चार क़दम, धूप चली मीलो तक
प्यार का गाँव अजब गाँव है जिसमें अक्सर
ख़त्म होती ही नहीं दुख की गली मीलों तक
प्यार में कैसी थकन कहके ये घर से निकली
कृष्ण की खोज में वृषभानु-लली मीलों तक
घर से निकला तो चली साथ में बिटिया की हँसी
ख़ुशबुएँ देती रही नन्हीं कली मीलों तक
माँ के आँचल से जो लिपटी तो घुमड़कर बरसी
मेरी पलकों में जो इक पीर पली मीलों तक
मैं हुआ चुप तो कोई और उधर बोल उठा
बात यह है कि तेरी बात चली मीलों तक
हम तुम्हारे हैं 'कुँअर' उसने कहा था इक दिन
मन में घुलती रही मिसरी की डली मीलों तक
जब किसी से
-निदा फ़ाज़ली.
जब किसी से कोई गिला रखना सामने अपने आईना रखना
यूं उजालों से वास्ता रखना शमा के पास ही हवा रखना
घर की तामिर चाहे जैसी हो इसमें रोने की कुछ जगह रखना
मिलना जुलना जहा ज़रूरी हो मिलने ज़ुलने का हौसला रखना
दुनिया जिसे कहते हैं

निदा फ़ाज़ली
दुनिया जिसे कहते हैं जादू का ख़िलौना हैं मिल जाये तो मिट्टी हैं खो जाये तो सोना है
अच्छा सा कोई मौसम तनहा सा कोई आलम हर वक़्त आये रोना तो बेकार का रोना हैं
बरसात का बादल तो दिवाना हैं क्या जाने किस राह से बचना हैं किस छत को भिगौना हैं
ग़म हो कि ख़ुशी दोनो कुछ देर के साथी हैं फिर रास्ता ही रास्ता हैं हंसना हैं रोना हैं
शाख़ पर एक फूल भी है

-कुंवर बेचैन
है समय प्रतिकूल माना पर समय अनुकूल भी है। शाख पर इक फूल भी है॥
घन तिमिर में इक दिये की टिमटिमाहट भी बहुत है एक सूने द्वार पर बेजान आहट भी बहुत है
लाख भंवरें हों नदी में पर कहीं पर कूल भी है। शाख पर इक फूल भी है॥
विरह-पल है पर इसी में एक मीठा गान भी है मरुस्थलों में रेत भी है और नखलिस्तान भी है
साथ में ठंडी हवा के मानता हूं धूल भी है। शाख पर इक फूल भी है॥
है परम सौभाग्य अपना अधर पर यह प्यास तो है है मिलन माना अनिश्चित पर मिलन की आस तो है
प्यार इक वरदान भी है प्यार माना भूल भी है। शाख पर इक फूल भी है॥
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शैल अग्रवाल
ग़ज़ल की दस्तक...
अश्क बन-बन के बह रहे होते
जो न कहना था कह रहे होते
रौशनी ने बचा लिया, वरना
हम अँधेरों में रह रहे होते।
-कुंवर बेचैन
आखिर क्या है यह ग़ज़ल या रौशनी की लकीर;
फिक्र मोमिन की, जबां द़ाग की, गालिब की बयां
मीर का रंगे सुख़न हो तो ग़ज़ल होती है।
सिर्फ अल्फ़ाज़ ही माने नहीं पैदा करते
जज़्बा-ए-खिदमते-फ़न हो तो ग़ज़ल होती है।
सोच की गहराई और सुरों में रियाज़ हो तो ग़ज़ल आज भी श्रोताओं को बांधने की बेजोड़ विधा है। आज भारत में जगजीत सिंह, पंकज उधास और सरहद के दूसरी तरफ मेंहदी हसन और गुलाम अली वगैरह जैसे नायाब गायक इसे मखमली और सोजभरी आवाजों में घोलकर पसंदगी के बेजोड़ आयामों तक लिए जा रहे हैं। कभी बेगम अख्तर, मलका पुखराज और नूरजहां व सुरैया की गाई गजल सुनने वाला एक खास तबका होता था और एक खास उम्र के ही इसके प्रशंसक हुआ करते थे, परन्तु अब ऐसा नहीं है। नई गजलों की शब्दावली और तेवर दोनों ही बदल चुके हैं और इसमें आजके गीत और गजलकारों( जावेद अख्तर, गुलजार, नीरज, कतील शफाई, बशीर बद्र...आदि) का बड़ा हाथ है। अब विषय और शब्दावली दोनों में ही गीत और ग़ज़ल के फासले कम होते नजर आते हैं। पहले जो सिर्फ गायकी पर ध्यान दिया जाता था और भारी आवाज में एकाध साज के साथ गजल पक्की रागों में ही गायी जाती थी, आज यह तस्बीर पूरी तरह से बदल चुकी है और अब गजल गायकों के साथ भी पूरा और्क्रेष्ट्रा व आधुनिकतम तकनीकियां होती हैं।
विषय की रूमानियत, सादगी और कभी-कभी एक सोजभरी उदासी या दार्शनिकता की वजह से ग़ज़ल ने हमेशा से ही श्रोताओं के बीच अपनी एक खास जगह बनाई है... रेशमी सलवटों सी सहजतः ही मन की तहों में बैठी रही है। कहते हैं पं बैजनाथ, जो कि बैजू बाबरा के नाम से विख्यात थे और जिन्होंने ध्रुपद और धमाल की गायकी को एक नयी दिशा और नया आयाम दिया था, ग़ज़ल के भी कंठसिद्ध गायक थे और उन्होंने अपनी ग़ज़ल गायकी से मुगल सम्राट हुमायूं को इतना अधिक प्रसन्न व प्रभावित किया कि उनके अनुरोध पर इनाम स्वरूप शहंशाह हुमायूँ ने एक लाख गुजराती युद्धबंदियों को जीवनदान दे दिया था जबकि हुमायूँ उनके कत्ल का आदेश तक दे चुके थे। रूह तक में हलचल पैदा करने वाली ये ग़ज़लें सिर्फ लफ़्जों की तोड़-मरोड़ और नाप तौल से ही नहीं बनतीं। बयानगी की बेमिसाल अदा और बेहतरीन सोच भी एक नायाब ग़ज़ल में उतनी ही दमखम रखती है जितनी कि विषय की सम-सामयिकिता। बात वही असर करेगी, जो सही संदर्भ में, सही ढंग से और सही वक्त पर की गई होगी। और अगर कहने का लहज़ा भी अनूठा और सुरीला हो, तब तो और भी अच्छा...सोने में सुहागा। यही वजह है कि मियां गालिब इतने आराम और विश्वास के साथ कह गये कि 'सुखनबर कई और देखे मगर है गालिब का अन्दाजे बयां कुछ और '।
ग़ज़ल का अर्थ है महबूब से बातचीत करना और इसी अर्थ की तंगदिली तहत शुरुवात में ग़ज़ल राजा महाराजाओं के दरबार या कोठों तक ही कैद रही और कभी तबले की ठेक पर तो कभी नयनों की कटारी से दिल के छिलने की, तो कभी मखमली कालीन से पैरों के छिलने की बातें करती रही।
ग़ज़ल शब्द का अर्थ अरबी भाषा में कातना बुनना भी होता है; एक ऐसा सूत जिससे कि (ख्वाबों का) पूरा का पूरा कालीन बुना जा सके...(जाल भी)। कुछ लोग ग़ज़ल शब्द की उत्पत्ति गज़ाल से भी मानते हैं। ग़ज़ाल यानी कि हिरण... और ग़ज़ल भी तो हिरण की सी ही लम्बी-लम्बी चौकड़ी मारती है...अभिव्यक्ति की कुलाचें लेती है। गालिब ने तो कहीं ग़ज़ल को एक ऐसी घायल हिरणी भी कहा है, जिसका शिकारी पीछा कर रहे हों। लम्बे समय तक ग़ज़लों में अभिव्यक्ति बस प्रेम की ही होती थीं और ग़ज़ल के सभी विषय प्रेमी-प्रेमिकाओं के इर्दगिर्द ही मंडराते रहते थे। यह प्रेमी या प्रेमिका स्त्री-पुरुष या सर्व शक्तिमान ईश्वर और अल्लाह कुछ भी हो सकते थे और इसी दुहरे संदर्भ के तहत सूफी नज्मों में एक-से-एक बढ़कर श्रंगार-रस की प्रेमपगी अभिव्यक्तियां हुयीं और साथ-साथ वह अलौकिक रहस्यमयता भी बरकरार रही। सूफियों ने अपनी सांगीतिक प्रार्थना के लिए फारसी ग़ज़ल को अपनाया और उसे भारतीय संगीत के रागों और तालों में बांधकर पेश किया। फ़िराक गोरखपुरी के अनुसार
' ग़ज़ल मूलतः प्रेम को काव्यात्मक शैली में अभिव्यक्त करने वाली विधा है।'
यदि हम इतिहास के पन्ने पलटें तो पाएंगे कि अरबी भाषा में 'क़सीदा' नाम की एक काव्य-विधा हुआ करती थी जो कि तारीफ या प्रशंसा से जुड़ी थी (आज भी 'नाम के क़सीदे पढ़ना' एक प्रचलित मुहावरा है)। क़सीदे के आरंभ में चार-पांच शेर कहे जाते थे, जिन्हे नसीब या तशबीब कहते थे। कसीदे की यही तशबीब या नसीब ग़ज़ल कहलाती थी। अरबी साहित्य में ग़ज़ल का कोई स्वतंत्र स्थान नहीं था। अरबी साहित्य से फारसी साहित्य में आने पर ही इस काव्य विधा ने अपना स्वतंत्र रूप, गुण और स्थान पाया।
तुर्क सुलतानों का जब बारहवीं शताब्दी में शासन आरंभ हुआ तो वे भाषा के नाम पर फारसी और काव्य के नाम पर कसीदा, मसनवी और ग़ज़ल लेकर भारत आए। अरबी फारसी और हिंदवी के इस सांस्कृतिक समन्वय के साथ-साथ एक नयी भाषा का जन्म हुआ जिसे ' उर्दू' नाम दिया गया जो स्थानीय बोली के साथ अरबी, फारसी और तुर्की भाषा का समन्वय थी।
यूँ तो ग़ज़ल की विधा भारत में अमीर खुसरो से तीन सौ साल पहले से ही प्रचलित थी परन्तु ग़ज़ल को अपनी असली पहचान अमीर खुसरो( 1253-1325) से ही मिली, जिन्होंने अरबी फारसी के साथ-साथ सादी और खड़ी बोली में अपने मन की बात कहनी शुरू की जो अवाम को भी समझ में आयी।
जब यार देखा नैन भर, दिल की गई चिंता उतर
ऐसा नहीं कोई अजब, राखे उसे समझाय कर।
जब आँख से ओझल भया, तड़पन लगा मेरा जिया,
हक्का इलाही क्या किया, आंसू चले भर लाय कर।
तू तो हमारा यार है, तुझ पर हमारा प्यार है,
तुझ दोस्ती बिसियार है, एक शब मिलो तुम आय कर!
तुमने जो मेरा मन लिया, तुमने उठा ग़म को दिया,
तुमने मुझे ऐसा किया, जैसे पतंगा आग पर।
खुसरो कहें बातें गज़ब, दिल में न लाबें अजब,
कुदरत है खुदा की अजब, जब जिव दिया लाय कर।
(बहरे रजज सालिम-2122)
अमीर खुसरो की 'यह ग़ज़ल महमूद शीरानी को तेरहवीं सदी हिजरी के आरंभ में लिखी गई थी और इसकी एक पांडुलीपि अभी भी सलामत है ( लाहौर के प्रो. सिराज्जुद्दीन आजार के संग्रहालय में मिली थी।') डॉ. भोलानाथ तिवारीः अमीर खुसरो और उऩका साहित्य।
अमीर खुसरो की यह खांटी हिंदुस्तानी ग़ज़ल न केवल भारतीय साहित्य की पहली ग़ज़ल है बल्कि हिन्दुस्तानी ग़ज़ल की वह पहली मुख्यधारा या परंपरा है जिसे आज 'हिन्दी ग़ज़ल' के नाम से जाना जाता है। (उनकी ग़ज़ल, कव्वाली और ख्याल आज 700 साल बाद भी गायकों की चुनिंदा पसंद हैं। हाल ही में उनकी एक रचना ' छाप तिलक सब भूली, तोसे नैना मिलाय के' तो दो तीन हिन्दी फिल्मों में ली गयी और आज भी खूब पसंद की गयी)।'
अमीर खुसरो की इसी ग़ज़ल परंपरा को कबीर से लेकर कुंवर बेचैन तक, आज के ग़ज़लकारों ने आगे बढ़ाया है।
यूँ तो केकुबाद के युग में ही (1187-1290) गली-गली में ग़ज़ल के गायक पैदा हो चुके थे और काज़ी कमीदुद्दीन नागौरी के कव्वाल महमूद ने सुलतान शमशुद्दीन इल्तुमिश (कार्यकाल 1210-1235) को ग़ज़ल सुनाकर मुग्ध भी कर दिया था, ऐसा उल्लेख भी मिलता है, परन्तु भारत का पहला ग़ज़लकार कुली कुतुब शाह को ही माना जाता है जो कि गोलकुंडा के शासक थे और उनकी ये पंक्तियां काफी मशहूर भी हुईं।
पिया बाज प्याला पिया जाए ना
पिया बाज यक तल जिया जाए ना।
अपनी सरस और मिलीजुली भाषा में तेरहवीं शताब्दी में अमीर खुसरो ने हिंदी ग़ज़ल कहने का एक नया ही अंदाज पैदा किया जिसे खास और आम दोनों में पसंद किया गया।
ज़े हाले मिसकीं मकुन तग़ाफुल,
दुराय नैना बनाय बतियां।
के ताबे-हिजरां न दारम ए जां,
ना लेहू काहे लगाय छतियां।
शबाने-हिजरां न दराज़ चूं
जुल्फ-ओ-रोज़े वसलत चूं उम्र कोताह,
सखी पिया को जो मैं न देखूं, तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां।
ब-हक्के रोज़े विसाल दिलवर, के दादे मारो फ़रेब 'खुसरो'
समीप मन के दराये राखूं, जो जान पावूं पिया की खतियां।
इस शेर में उन्होंने फारसी और खड़ी बोली को ऐसे सुन्दर और सटीक तरीके से जोड़ा है मानो सोने की अंगूठी में हीरा और उनकी यही वह ग़ज़ल है जिसने उस जमीं को तैयार किया जहां से वली दकनी (1705) ने हिन्दुस्तानी ग़ज़ल की दूसरी धारा आरंभ की जो आज उर्दू ग़ज़ल के नाम से जानी जाती है और इस परंपरा को आगे बढ़ाया दर्द, मीर, मज़हर और गालिब से लेकर जिगर, फिराक और आजतक उर्दू में लिखते आ रहे सभी शायरों ने। अमीर खुसरो की इस पहली हिंदी ग़ज़ल में छंद(बहर) जरूर फारसी भाषा का है, परन्तु इसका काफिया (तुकांत) पूर्णतया हिन्दी का है। खुसरो अपभ्रंश और भारतीय भाषाओँ के संधिकाल में लिख रहे थे। उस समय प्राकृत तत्सम शब्दों का प्रयोग ज्यादा होता था जबकि उन्होंने तद्भव शब्दों का ज्यादा इस्तेमाल किया। इस परिप्रेक्ष में उनकी पहेलियों और मुकरियों को उद्धत किया जा सकता है।
देखन में है बड़ उजियारी।
है सागर से आती प्यारी।
सगरी रैन संग ले सोती
ऐ सखी साजन, ना सखी मोती।
(मुकरियां)
विभिन्न भाषा के समन्वय पर आगे भी प्रयोग हुए हैं और होते ही रहेंगे ( आजकी आधुनिक कविता में तो यह बहुत ही आम सी बात है) जैसे कि अवध के अन्तिम नवाब, शायर और नर्तक वाजिद अली शाह ने अंग्रेजी और उर्दू का मिलाजुला प्रयोग करते हुए लिखा (ग़ज़ल नहीं) ,
माई डियर बुलाओ
कित बसे
माई डियर बुलाओ
हबसन करो/ जश्न करो
बंगला में ले जाओ।
यहां तक आते-आते ग़ज़ल प्यार-मोहब्बत और प्रेमी-प्रेमिकाओं से मुक्त हो आगे बढ़ चुकी थी और अब तो हर तरह के सामाजिक संदर्भ, चिंताएं व दर्शन इसमें आ मिले हैं,
आ के पत्थर तो मेरे सहन में दो-चार गिरे,
जितने उस पेड़ के फल थे, पसे दीवार गिरे।
-शकेब जलाली
दिन भर तो बच्चों की खातिर मैं मजदूरी करता हूँ,
शब को अपनी गैर मुकम्मल ग़ज़लें पूरी करता हूँ।
-तनवीर सुपरा
यूँ तो सब के सब अंधेरों से बहुत बेजार हैं
रोशनी के बास्ते फिर भी नहीं तैयार हैं।
-कमलेश भट्ट कमल
दोस्ती, नेकी, मुहब्बत, आदमियत और वफ़ा
अपनी छोटी नाव में इतना भी मत सामान रख।
-आलम खुरशीद
ग़ज़ल में मिसरों पर किसी मात्रा या मीटर की रोक नहीं, बस तुक मिलाना जरूरी है। तुक की यह बंदिश जहां ग़ज़ल की शर्त और ताकत है वहीं कमजोरी भी। मिर्जा गालिब ने इसीलिए ग़ज़ल को तंग दामन भी कहा है।
बक़द्रे शौक़ नहीं ज़र्फे़ तंगना-ए-ग़ज़ल, कुछ और चाहिये वुसअत मेरे बयाँ के लिये।
ग़ज़ल में कम-से-कम पांच शेर होते हैं और अंतिम शेर में शायर का नाम आता है। गजल में मिसरे (पंक्तियां) होती हैं और दो मिसरों का एक शेर बनता है। पहले दोनों मिसरे सानुप्रास होते हैं। पहले और अंतिम शेरों को 'मत्ला ' और ' मक्ता ' कहते हैं। गजल की एक शर्त यह भी है कि इसका हर शेर खुद अपने आप में भी पूरा होना चाहिए।
पर आजकी समकालीन ग़ज़ल का रूप बदल चुका है। अब मीटर की पाबंदी (वजन)पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता पर काफिया और रदीफ़ का ध्यान रखा जाता है (रदीफ़ शेर का वह आखिरी शब्द है जो हर शेर के अंत में आता है और काफ़िया रदीफ से पहले आने वाले मिलते जुलते शब्द 'अनुप्रास' को कहते हैं); जिससे कि इसका गत्वर तत्व न बिखरे, क्योंकि ग़ज़ल आज भी तबले की ठोक पर ही सजती है। आज की इस ग़ज़ल के बारे में लिखते हुए रतीलाल शाहीन अपने एक लेख में लिखते हैः
' आज की ग़ज़ल जदीद ग़ज़ल है। उसमें मत्ले और मक्ते की पाबंदी भी उतनी सख्ती से नहीं बरती जाती। आज की ग़ज़ल फूल, खुशबू, चादर और इत्र लिहाफ से निकलकर सड़क पर आ गई है। दरअसल कोठे से ग़ज़ल को निकालकर आम जिन्दगी का स्वर बनाने का काम मिर्जा असदुल्ला खां ग़ालिब का है। इसमें दार्शनिकता का पुट भरने का काम किया इकबाल ने। जिन्दगी से जोड़ने का काम किया फिराक जी ने। पृष्ठभूमि में अनेकानेक शायरों की ज़मात है जिनके नामों की सूची बनाई जाए तो कई पृष्ठ भर जाएँगे। मगर उनकी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए।'
सूफी मिलन से विरह पक्ष को अधिक महत्व देते थे और पुराने ग़ज़लकार फारसी की इन्ही ग़ज़लों के आधार पर अपनी ग़ज़लें लिखा करते थे, यही वजह है कि इनमें बिछुड़ने या दूर होने का गम या रोना धोना अधिक मिलता था। इन गजलों में मात्रा की पाबंदी को बहुत कड़ाई से ध्यान में रखा जाता था परन्तु नई गजलों में जीवन की विसंगतियां, विद्रूपताएं और सहजता सभी तरह के विषय आए है। देश के बटवारे ने नक्शे में तो भारत के दो टुकड़े किए मगर दिलों को बांटने का काम न कर पाया। सबूत पाकिस्तान की गजलें हैं। उनमें गंगा जमना, हिमालय, राम, श्याम और राधा, सभी का जिक्र बहुतायत से मिलता है।'
प्रस्तुत हैं पाकिस्तान की कुछ ग़ज़लें अपनी गंगा जमुनी बानगी के साथ, जिनमें हिंदू कथाओं के पारंपरिक संदर्भ ही नहीं, बटवारे से पहले का भारत भी बोलता है,
हर लिया है किसी ने सीता को
जिंदगी है कि राम का बनवास।
-फ़िराक़ गोरखपुरी.
या फिर,
हर क़दम, हर जगह पे साथ रही
ज़िंदगी है कि सती-सावित्री !
- फुज़ैल जाफरी.
अब न वो गीत, न चौपाल, न पनघट, न अलाव,
खो गए शहर के हंगामे में देहात मेरे।
-फुज़ैल जाफरी.
उलझे-उलझे धागे-धागे से ख्यालों की तरह
हो गया हूँ इन दिनों तेरे सवालों की तरह।
-खातिर गजनवी
पेड़ यों तो शाख कट जानेसे भी जिन्दा रहा,
लेकिन अपने साए से भी सख्त शर्मिंदा रहा।
-खाबिर एजाज़
इस नई ग़ज़ल के प्रचलित होने की एक वजह यह भी है कि पिछली शताब्दी के सातवें दशक के आने तक अतुकांत कविताएँ काफी जोर पकड़ चुकी थीं जो कि न छन्दबद्ध थीं और ना ही गेय, इससे इनकी सरसता मिटती जा रही थी। ऐसे में यह गेय विधा एक नयी सरसता लेकर आयी। हिन्दी ग़ज़लें आज एक नए तेवर के साथ लिखी जा रही हैं जिसमें जीवन के सारे इन्द्रधनुषी रंग खिल आए हैं;
ये वही गांव हैं, फसलें वतन को जो देते
भूख ले आई है इनको तो शहर में रख लो।
-प्रेम भंडारी
मैने बच्चों को यूं बातों में लगा रक्खा है
सोचता हूँ चला जाए खिलौने वाला।
-मुनव्वर राणा
दीवार क्या गिरी मेरे कच्चे मकान की,
लोगों ने मेरी सहन में रास्ते बना लिए।
-अली शमीम
मिले जो दीवार, खिड़कियां गुम,कहीं मिले छत तो दर नहीं है
भटक-भटककर हुआ यक़ीं ये, हमारे हिस्से में घर नहीं है।
-सुल्तान अहमद
नारियां अब वक्त की हस्ताक्षर हैं
कथ्य तुलसीदास झूठा हो गया।
श्याम प्रकाश अग्रवाल
दूसरों की जेब में जब हाथ जाता है,
आस्तीनों की सिलाई टूट जाती है।
श्याम प्रकाश अग्रवाल
गीता हूँ कुरान हूँ मैं,
मुझे पढ़, इन्सान हूँ मैं।
राजेश रेड्डी
ये सारे शहर में दहशत-सी क्यों है
यक़ीनन कल कोई त्योहार होगा।
राजेश रेड्डी
मेरे दिल के किसी कोने में इक मासूम-सा बच्चा
बड़ों की देखकर दुनिया, बड़ा होने से डरता है।
राजेश रेड्डी
हम तो कातिल खुद अपने हैं साहब
तीन सौ दो दफा है खामोशी !
चन्द्रभानु गुप्त
सिर्फ शायर वही हुए, जिनकी
जिन्दगी से नहीं पटी साहब।
चन्द्रभानु गुप्त
सूरज को चोंच में लिए मुरगा खड़ा रहा
खिड़की के पर्दे खींच दिए रात हो गई।
निदा फाजली
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।
दुष्यंत कुमार
और अन्त में आज की सपने देखती आंखों की आत्मविश्वास भरी दुस्साही पंक्तियां जो मेरी समझ से इस इक्कीसवीं सदी की हस्ताक्षर पंक्तियां हैं।
कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता?
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों।
-दुष्यंत कुमार
बात खतम करते हुए यही कहना चाहूँगी कि हम हों या ना हों, चाहें न चाहें, हवाओं में बिखरे ये ग़ज़ल और मिसरे...इनकी ये घुसपैठिया दस्तकें तो होती ही रहेंगी। और दिल के खुले दरवाज़े हम गाहे-बगाहे इनका स्वागत भी ऐसे ही हंस-रोकर करेंगे... बिना थके और बिना रुके। ये बात और है कि बदलते वक्त के साथ-साथ सुनने और सुनाने वाले, दोनों नये होंगे और एक और नए अन्दाज़ से किसी और के आगे यही बातें एकबार फिर से किसी नए अन्दाज़ से सुनी और सुनाई जाएँगी...
हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है
नई-नई-सी है कुछ तेरी रहगुज़र फिर भी।...
-फ़िराक़ गोरखपुरी।
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दुष्यंत कुमार
चाँदनी छत पे चल रही होगी अब अकेली टहल रही होगी
फिर मेरा ज़िक्र आ गया होगा वो बर्फ़-सी पिघल रही होगी
कल का सपना बहुत सुहाना था ये उदासी न कल रही होगी
सोचता हूँ कि बंद कमरे में एक शम-सी जल रही होगी
तेरे गहनों सी खनखनाती थी बाजरे की फ़सल रही होगी
जिन हवाओं ने तुझ को दुलराया उन में मेरी ग़ज़ल रही होगी

-महादेवी वर्मा
तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या तारक में छवि, प्राणों में स्मृति, पलकों में नीरव पद की गति, लघु उर में पुलकों की संसृति, भर लाई हूँ तेरी चंचल और करूँ जग में संचय क्या!
तेरा मुख सहास अरुणोदय, परछाई रजनी विषादमय, वह जागृति वह नींद स्वप्नमय, खेलखेल थकथक सोने दे मैं समझूँगी सृष्टि प्रलय क्या!
तेरा अधरविचुंबित प्याला तेरी ही स्मितमिश्रित हाला, तेरा ही मानस मधुशाला, फिर पूछूँ क्या मेरे साकी! देते हो मधुमय विषमय क्या?
रोमरोम में नंदन पुलकित, साँससाँस में जीवन शतशत, स्वप्न स्वप्न में विश्व अपरिचित, मुझमें नित बनते मिटते प्रिय! स्वर्ग मुझे क्या निष्क्रिय लय क्या?
हारूँ तो खोऊँ अपनापन पाऊँ प्रियतम में निर्वासन, जीत बनूँ तेरा ही बंधन भर लाऊँ सीपी में सागर प्रिय मेरी अब हार विजय क्या?
चित्रित तू मैं हूँ रेखाक्रम, मधुर राग तू मैं स्वर संगम, तू असीम मैं सीमा का भ्रम, काया छाया में रहस्यमय। प्रेयसि प्रियतम का अभिनय क्या तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या

-कतील शफ़ाई
किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह वो आशना भी मिला हमसे अजनबी की तरह
बढ़ा के प्यास मेरी उस ने हाथ छोड़ दिया वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल्लगी की तरह
किसे ख़बर थी बढ़ेगी कुछ और तारीकी छुपेगा वो किसी बदली में चाँदनी की तरह
कभी न सोचा था हमने "क़तील" उस के लिये करेगा हमपे सितम वो भी हर किसी की तरह

-दुष्यंत कुमार
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन यह थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर हर गांव में,
हाथ लहराते हुए लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

क़ैफ़ी आज़मी
पत्थर के ख़ुदा वहां भी पाये हम चांद से आज लौट आये
दिवारें तो हर तरफ खडी हैं क्या हो गया मेहरबां साये
जंगल की हवायें आ रही हैं कागज़ का ये शहर उड ना जाये
सहरा सहरा लहू के खेमे फिर प्यासे लब-ए-फ़ुरात आये.

-गोपाल सिंह नेपाली
अपनेपन का मतवाला था
भीड़ों में भी मैं खो न सका चाहे जिस दल में मिल जाऊँ इतना सस्ता मैं हो न सका
देखा जग ने टोपी बदली तो मन बदला, महिमा बदली पर ध्वजा बदलने से न यहाँ मन-मंदिर की प्रतिमा बदली
मेरे नयनों का श्याम रंग जीवन भर कोई धो न सका चाहे जिस दल में मिल जाऊँ इतना सस्ता मैं हो न सका
हड़ताल, जुलूस, सभा, भाषण चल दिए तमाशे बन-बनके पलकों की शीतल छाया में मैं पुनः चला मन का बन के
जो चाहा करता चला सदा प्रस्तावों को मैं ढो न सका चाहे जिस दल में मैं जाऊँ इतना सस्ता मैं हो न सका
दीवारों के प्रस्तावक थे पर दीवारों से घिरते थे व्यापारी की ज़ंजीरों से आज़ाद बने वे फिरते थे
ऐसों से घिरा जनम भर मैं सुखशय्या पर भी सो न सका चाहे जिस दल में मिल जाऊँ इतना सस्ता मैं हो न सका

इब्ने इंशा
हम घूम चुके बस्ती-बन में
इक आस का फाँस लिए मन में
कोई साजन हो, कोई प्यारा हो
कोई दीपक हो, कोई तारा हो
जब जीवन-रात अंधेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो
जब सावन-बादल छाए हों
जब फागुन फूल खिलाए हों
जब चंदा रूप लुटाता हो
जब सूरज धूप नहाता हो
या शाम ने बस्ती घेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो
हाँ दिल का दामन फैला है
क्यों गोरी का दिल मैला है
हम कब तक पीत के धोखे में
तुम कब तक दूर झरोखे में
कब दीद से दिल की सेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो
क्या झगड़ा सूद-ख़सारे का
ये काज नहीं बंजारे का
सब सोना रूपा ले जाए
सब दुनिया, दुनिया ले जाए
तुम एक मुझे बहुतेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो
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कविता आज और अभी

एक खुली खिड़की-सी लड़की

-नरेश शांडिल्य
एक खुली खिड़की-सी लड़की
देखी मस्त नदी-सी लड़की
खुशबू की चूनर ओढ़े थी
फूल-बदन तितली-सी लड़की
मैं बच्चे-सा खोया उसमें
वो थी चाँदपरी-सी लड़की
जितना बाँचू उतना कम है
थी ऐसी चिठ्ठी-सी लड़की
काश कभी फिर से मिल जाए
वो खोई-खोई-सी लड़की
आज फिर दर्द जिगर से गुज़रा

-नरेश शांडिल्य
आज फिर दर्द जिगर से गुज़रा
एक सागर ज्यों भँवर से गुजरा
तर-ब-तर याद लिए इक बादल
डबडबाया-सा नज़र से गुजरा
दर पे उनके भी पड़ी थी साँकल
आज कैसा मैं उधर से गुज़रा
एक चर्चा थी मेरी बर्बादी
आज जब जब मैं जिधर से गुज़रा
नये कपड़े बदलकर

नासिर काजमी
नये कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किस के लिये वो शख़्स तो शहर ही छोड़ गया अब ख़ाक उड़ाऊँ किस के लिये
जिस धूप की दिल को ठंडक थी वो धूप उसी के साथ गई इन जलती बुझती गलियों में अब ख़ाक उड़ाऊँ किस के लिये
वो शहर में था तो उस के लिये औरों से मिलना पड़ता था अब ऐसे-वैसे लोगों के मैं नाज़ उठाऊँ किस के लिये
अब शहर में इस का बादल ही नहीं कोई वैसा जान-ए-ग़ज़ल ही नहीं ऐवान-ए-ग़ज़ल में लफ़्ज़ों के गुलदान सजाऊँ किस के लिये
मुद्दत से कोई आया न गया सुनसान पड़ी है घर की फ़ज़ा इन ख़ाली कमरों में "नासिर" अब शम्मा जलाऊँ किस के लिये
दिल में एक लहर सी

-नासिर काजमी
दिल में एक लहर सी उठी है अभी कोई ताजा हवा चली है अभी
शोर बरपा है ख़ाना-ए-दिल में कोई दिवार सी गिरी है अभी
कुछ तो नाजूक मिजाज है हम भी और ये चोट भी नई है अभी
याद के बेनिशा जंजीरों से तेरी आवाज आ रही है अभी
शहर की बेचिराग गलियों में ज़िंदगी तुझको ढूंढती है अभी
भरी दुनिया में जी नही लगता जाने किस चीज की कमी है अभी
पूछा था रात मैंने

-लक्ष्मीशंकर बाजपेयी
पूछा था रात मैंने ये पागल चकोर से
पैग़ाम कोई आया है चंदा की ओर से
बरसों हुए मिला था अचानक कभी कहीं
अब तक बँधा हुआ है जो यादों की डोर से
मैं चौंकता हूँ जब भी आए है नजर कोई
इस दौर में भी हँसते हुए ज़ोर ज़ोर से
मुझको तो सिर्फ उसकी खामोशी का था पता
हैरां हूँ पास आके समंदर के शोर से
ये क्या हुआ है उम्र के अन्तिम पड़ाव पर
माज़ी को देखता हूँ मैं बचपन के छोर से
पूरा परिवार, एक कमरे में

-लक्ष्मीशंकर बाजपेयी
पूरा परिवार, एक कमरे में
कितने संसार, एक कमरे में
हो नहीं पाया बड़े सपनों का
छोटा आकार, एक कमरे में
ज़िक्र दादा की उस हवेली का
सैंकड़ों बार, एक कमरे में
शोरगुल-नींद, पढ़ाई-टी.वी.
रोज़ तकरार, एक कमरे में
एक घर, हर किसी की आँखों में
सबका विस्तार, एक कमरे में
तुझमें किरणों सा ये उगा क्या है

दिनेश रघुवंशी
तुझमें किरणों सा ये उगा क्या है
मुझमें सूरज सा ढल गया क्या है
दिल को तनहाईयां सुहाती हैं
ज़िन्दगी तेरा फ़लसफ़ा क्या है
हम अभी तक मिले नहीं तुझसे
फिर जुदाई का ख़ौफ सा क्या है
आइना रोज़ मुझसे पूछे है
मेरे भीतर ये टूटता क्या है
जीकर दिखा मेरे बग़ैर इस जहान में
दिनेश रघुवंशी
जीकर दिखा बग़ैर मेरे इस जहान में
कहकर वो मुझको छोड़ गया इम्तिहान में
नज़दीकियों का लोग थे पाले हुए भरम
गो फ़ासले ही फ़ासले थे दरमियान में
चाहत है गर दिलों की, सिमट जाएं दूरियां
तो कुछ मिठास लाइये अपनी ज़बान में
टकरा के सारी ख़ुश्बुएँ दम तोड़ जाएँगी
खिड़की एक भी नहीं है तेरे मकान में
आगोश में ज़मीन की आना है एक दिन
बेशक बसा लो तुम बस्तियां आसमान में
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सुभाष नीरव
आवाज़

सुभाष नीरव
पापा को कहीं बाहर जाना था। कल रात दुकान से लौटकर पापा ने बस इतना ही कहा कि वह सुबह सात बजे वाली ट्रेन पकड़ेंगे और परसों लौटेंगे, कुछ लोगों के साथ। यह सब बोलते समय पापा का स्वर कितना ठंडा था। ऐसा लगा, जैसे कुछ छिपा रहे हों।
सुबह वह पापा से पहले उठ गई। पापा को जगाया और खुद काम में लग गई। पापा अमूमन छह-साढ़े छह बजे तक उठ जाया करते हैं। जब तक वह नहा-धोकर तैयार होते हैं, वह सारा कामकाज निपटा चुकी होती है। पापा आठ बजे तक निकल जाया करते हैं– दुकान के लिए। नौ बजे तक वह भी कालेज के लिए निकल पड़ती है। पिंकी का स्कूल उसके रास्ते में पड़ता है, इसलिए रोज उसे अपने साथ लाती-ले जाती है वह।
आज छुट्टी का दिन है। छुट्टी के दिन वह खुद को बहुत अकेला महसूस करती है। अकेलेपन का अहसास न हो, इसलिए वह खुद को घर के हर छोटे-मोटे काम में जानबूझकर उलझाये रखती है।
पापा के चले जाने के बाद उसने पूरे मन से घर की साफ-सफाई की। खिड़की-दरवाजों के पर्दे धोकर सूखने के लिए डाल दिए। दीवारों पर की धूल को झाड़ा-पोंछा और खिड़कियों के शीशे चमका दिए। और तो और, सीलिंग-फैन को भी साफ कर दिया है और सेल्फ में इधर-उधर बिखरी पड़ी पुस्तकें भी करीने से सजा दी हैं।
कल ‘कुछ लोग’ आ रहे हैं, पापा के साथ। ‘कुछ लोग...’ उसके पूरे शरीर में सिहरन-सी दौड़ गई यह सोचकर। क्षणांश, उसके तन और मन में गुदगुदी-सी हुई और दूसरे ही क्षण भय और घबराहट। हृदय की धड़कनें बढ गईं।...
कैसे वह उन लोगों के सम्मुख जा पाएगी ? वे क्या-क्या प्रश्न करेंगे उससे ? पहला अवसर है न... वह तो एकदम नर्वस हो जाएगी। मम्मी जीवित होती तो बहुत सहारा मिल जाता। उसकी सहेली सुमन ने ऐसे अवसरों के कितने ही किस्से एकान्त में बैठकर सुनाये हैं उसे। उन किस्सों की याद आते ही उसका दिल घबराने लगता है। कैसे अजीब-अजीब से प्रश्न पूछते हैं ये लोग ! एजूकेशन कहाँ तक ली है ? सब्जेक्ट्स क्या-क्या थे ? यह विषय ही क्यों लिया ? खाना बनाने के अलावा और क्या-क्या जानती हो ? फिल्म देखती हो ? कितनी ? कैसी फिल्में अच्छी लगती हैं ? वगैरह-वगैरह। अच्छा-खासा इंटरव्यू ! उत्तर ‘हाँ’ ‘न’ में नहीं दिया जा सकता। कुछ तो बोलना ही पड़ता है। शायद, मंशा यह रहती हो कि लड़की कहीं गूंगी तो नहीं, हकलाती तो नहीं। लड़की को जानबूझकर इधर-उधर बिठाएंगे-उठाएंगे, उसकी चाल परखेंगे। कहीं पांव दबाकर तो नहीं चलती ? यानी हर तरह से देखने की कोशिश की जाएगी।
कई दिनों से पापा कुछ ज्यादा ही परेशान से नज़र आते हैं। कहते तो कुछ नहीं, पर उनकी चुप्पी जैसे बहुत कुछ कह जाती है। सुबह पापा के कमरे में अधजली सिगरेटों का ढेर देखकर वह हैरत में पड़ जाती है। पहले तो पापा इतनी सिगरेट नहीं पीते थे !... लगता है, पापा रात भर नींद से कश-म-कश करते रहते हैं। रातभर जूझते रहते हैं अपने आप से, अपनी अन्तरंग परेशानियों से।
लेकिन, उसे लेकर अभी से इतना परेशान होने की क्या ज़रूरत है ? भीतर ही भीतर घुटते रहने की क्या आवश्यकता है ? क्या पापा अपनी चिन्ता को, अपनी परेशानियों को उससे शेयर नहीं कर सकते ? वह जवान होने पर क्या इतनी परायी हो गई है ? इस तरह के न जाने कितने प्रश्न उसके अंदर धमाचौकड़ी मचाये रहते हैं आजकल।
पापा ऐसे न थे। कितना बड़ा परिवर्तन आ गया है, पापा में अब। मम्मी की मौत ने उन्हें भीतर से तोड़कर रख दिया है जैसे। कितने हँसमुख थे पहले ! इस घर में कहकहे गूँजते थे उनके ! दुकान पर भी ज्यादा नहीं बैठते थे। जब-तब किसी न किसी बहाने से घर आ जाया करते थे। प्यार से उसे ‘मोटी’ कहा करते थे। मम्मी से अक्सर कहा करते– “देखो, बिलकुल तुम्हारी तरह निकल रही है। जब तुम्हें ब्याहकर लाया था, तुम ठीक ऐसी ही थीं।...”
मम्मी पहले तो लज्जा जातीं, फिर नाराजगी जाहिर करते हुए कहतीं, “यह क्या हर समय मेरी बेटी को ‘मोटी-मोटी’ कहा करते हो ? नाम नहीं ले सकते ?”
मम्मी की याद आते ही उसकी आँखें भीग गईं। कितना चाहती थीं उसे ! जवानी की दहलीज पर पांव रख ही रही थी कि यकायक उसने मम्मी को खो दिया। वह दिन उसे भूल सकता है क्या ?... नहीं, कदापि नहीं। वह दृश्य उसकी आँखों के सामने अब भी तैर जाता है। ज़िन्दगी और मौत के बीच संघर्ष करती मम्मी। मम्मी मरना नहीं चाहती थी और मौत थी कि उन्हें और जिन्दा नहीं रहने देना चाहती थी। ऐसे दर्दनाक क्षणों में मम्मी को उसी की चिन्ता थी। आखिरी सांस लेने से पहले मम्मी ने पापा से कहा था– “देखो, सुमि को अच्छे घर ब्याहना। मेरी परी-सी बेटी का राजकुमार-सा दूल्हा हो।“
पापा ने शायद तब पहली बार महसूस किया होगा कि उनकी बेटी जवान हो रही है। उसके लिए अच्छा-सा वर ढूँढ़ना है। और शायद तभी से पापा की खोज जारी है।
पापा का उदास, चिन्तित चेहरा कभी-कभी उसे भीतर तक रुला देता है। ऐसे में, दौड़कर पापा की छाती से लिपट जाने और यह कहने की इच्छा होती है कि पापा, मैं अभी शादी नहीं करुँगी। अभी तो मैं बहुत छोटी हूँ।... लेकिन, कहाँ कह पाती है यह सब। पापा और उसके बीच, मम्मी की मौत के बाद जो खाई उभर आई है, चुप्पियों से भरी, उसे वह मिटा नहीं पाती। क्या जवान होने का अहसास, बाप-बेटी के बीच इतनी खाइयाँ पैदा कर देता है ! बस, वह सोचती भर रह जाती है यह सब।
“मैं जल्दबाजी में कुछ नहीं करना चाहता।" पापा का अस्फुट-सा स्वर।
“ठीक है, आप अच्छी तरह सोच लें।" बिचौलियानुमा व्यक्ति की आवाज़।
“...”
“पर, निर्णय तो आपको ही करना है, दुनिया का क्या है ?”
दबी-दबी जुबान में होतीं इस प्रकार की बातों के कुछ टुकड़े बगल के कमरे में बैठे हुए या किचन में चाय तैयार करते समय उसके कानों में अक्सर पड़ते रहते हैं। पिछले कुछ महीनों से इन लोगों का आना-जाना बढ़ा है। कौन है ये लोग, वह नहीं जानती।
पिछले कई दिनों से पापा कई बार मौसी और मामा के घर आये-गए हैं। जितनी जल्दी-जल्दी उनके यहाँ आना-जाना हुआ है पिछले दिनों, पहले नहीं होता था। पापा क्यों आजकल बार-बार मौसी और मामा के यहाँ आते-जाते हैं ? आखिर, बेटी का मामला ठहरा। कोई कदम उठाने से पहले वह अपने से बड़ों की राय ले लेना चाहते हैं शायद। लेकिन, यह भी सही है, पापा जब-जब मौसी और मामा के घर से लौटे हैं, ज्यादा ही थके और मायूस-से लौटे हैं।
कभी-कभी वह सोचती है, अभी तो इण्टर ही किया है उसने। घर का सारा कामकाज उसी के कंधों पर है। पिंकी की देखभाल भी उसे ही करनी पड़ती है। मम्मी की मौत के समय तो वह बहुत छोटी थी। वही उसके लिए सब कुछ है– मम्मी भी, दीदी भी। वह चली जाएगी तो कौन करेगा घर का सारा काम ? पापा तो दुकान पर रहते हैं, सारा-सारा दिन। शायद, तब कोई आया रख लें। पर, ऐसे में पिंकी की पढ़ाई, उसकी देखभाल, उसका विकास क्या सही ढंग से हो पाएगा ? क्या सोचकर पापा इतनी जल्दी मचा रहे हैं ? शायद, लड़के वाले जल्दी में हों और पापा को लड़का जँच गया हो।
मन में उठते जाने कितने ही प्रश्नों के उत्तर वह खुद ही गढ़ लेती है और उनसे संतुष्ट भी हो जाती है। लेकिन, जवान होती उम्र के साथ-साथ दिल में उमंगों का ज्वार कभी-कभी इतनी जोरों से ठाठें मारने लगता है कि वह ज़मीन से उठकर आकाश छूने लगती है। अकेले बैठे-बैठे वह सपनों की रंगीन दुनिया में पहुँच जाती है। लड़कियाँ शायद इस उम्र में ऐसे ही स्वप्न देखती हैं। अपने सपनों के राजकुमार की शक्ल आसपास के हर जवान होते लड़के से मिलाती हैं। उनका हर स्वप्न पहले से ज्यादा हसीन और खूबसूरत होता है। आसपास गली-मोहल्ले में कहीं बारात चढ़ेगी तो दौड़कर बारात देखने में आगे रहेंगी। और तो और, घोड़ी पर सवार किसी के सपनों के राजकुमार से अपने-अपने सपनों के राजकुमार की तुलना करेंगी। हर बार उन्हें अपने सपनों का राजकुमार अधिक हसीन नज़र आता है। तन-मन को एक सुख गुदगुदाता हुआ बह जाता है। ऐसा सुख जो न अपने में ज़ज्ब किए बनता है और न ही किसी से व्यक्त किए। ऐसे में, किसी अन्तरंग साथी की, मित्र की, बेइंतहा ज़रूरत महसूस होती है।
आजकल उसके साथ भी तो ठीक ऐसा ही हो रहा है। जब कभी वह तन्हां होती है, स्वयं को ऐसे ही सपनों से घिरा हुआ पाती है। उसे लगता है, वह गली-मोहल्ले की औरतों से, अपनी सखियों से घिरी बैठी है, शरमायी-सी ! हथेलियों पर मेंहदी की ठंडक महसूस हो रही है। ढोलक की आवाज़ के साथ-साथ गीतों के बोल उसके कानों में गूँजते हैं–
बन्ने के सर पे सेहरा ऐसे साजे
जैसे सर पे बांधें ताज, राजे-महाराजे
लाडो ! तेरा बन्ना लाखों में एक
काहे सोच करे...।
और तभी उसे मम्मी की याद आ जाती है। सपनों के महल जादू की तरह गायब हो जाते हैं। उसके इर्द-गिर्द गीत गातीं, चुहलबाजी करती स्त्रियाँ नहीं होतीं, खामोश दीवारें होती हैं। चुप्पियों से भरा कमरा होता है। सामने, ठीक आँखों के सामने, टेबुल पर रखा मम्मी का मुस्कराता चित्र होता है। बेजान ! वह उठकर मम्मी का चित्र अपने सीने से लगा लेती है। भीतर ही भीतर कोई रो रहा होता है उसके। मम्मी के बोल फिर एकबारगी हवा में तैरने लगते हैं– ‘सुमि को अच्छे घर ब्याहना। मेरी परी-सी बेटी का राजकुमार-सा दूल्हा हो।‘
आज पापा को लौटना है। कुछ लोगों के साथ। जाने कब लौट आएं। न पिंकी को स्कूल भेजा है, न ही वह खुद कालेज गई है। पिंकी को और खुद को तैयार करने में जितना अधिक समय उसने आज लगाया, पहले कभी नहीं लगाया। जितनी देर आइने के सामने बैठी रही, खुद के चेहरे में मम्मी का चेहरा ढूँढ़ती रही। साड़ी में कितनी अच्छी लगती है वह ! आज उसने मम्मी की पसन्द की साड़ी पहनी है– हल्के पीले रंग की। साड़ी पहनते समय उसे लगा, जैसे मम्मी उसके आस-पास ही खड़ी हों। जैसे कह रही हों– ‘नज़र न लग जाए तुझे किसी की !’
रह–रहकर उसका दिल जोरों से धड़कने लगता है।
शाम के चार बजे हैं। बाहर एक टैक्सी के रुकने की आवाज़ ने उसके हृदय की धड़कन तेज कर दी है। धक्...धक्... धड़कनों की आवाज़ कानों में साफ सुनाई देती है। पिंकी दौड़कर, खोजती हुई-सी उसके पास आई और फिर चुपचाप बिना कुछ कहे-बोले बैठक में चली गई। उसकी सहमी-सहमी आँखों में कौतुहल साफ दिखाई दे रहा था। बगल के कमरे में होने के बावजूद उसने हर क्षण के दृश्य को अपनी आँखों से पकड़ने की कोशिश की।...
पापा की आवाज़ उसे स्पष्ट सुनाई देने लगी। कैसे हँस-हँसकर बातें कर हैं पापा ! पापा की आवाज़ में अचानक हुए इस परिवर्तन को देख वह चौंक गई। बिलकुल वैसी ही आवाज़ ! जैसी मम्मी के रहते हुआ करती थी। उसके चेहरे पर एकाएक खुशी की एक लहर दौड़ गई। कब से तरस रही थी वह, पापा की इस आवाज़ के लिए।
पापा ने सहमी-सहमी-सी खड़ी पिंकी को शायद गोद में उठा लिया है। प्यार से चूमते हुए बोले हैं, “यह है हमारी पिंकी बिटिया...।“
“अरे बेटे, तुमने किसी को नमस्ते नहीं की ?... नमस्ते करो बेटे... अच्छा इधर देखो... ये कौन है ?... ये हैं... तुम्हारी... नई मम्मी...।“
नई मम्मी !
वह स्तब्ध रह गई।
सहसा, उसे लगा कि वह हवा में उड़ रही थी और अभी-अभी किसी ने उसके पर काट दिए हैं। वह ज़मीन पर आ गिरी है–धम्म् से ! इसकी तो उसने कल्पना तक न की थी !
उसकी समझ में कुछ नहीं आया। धराशायी हुए सपनों पर आँसू बहाये या अपनी नई मम्मी को पाकर
खुश हो ! एकाएक, उसने खुद को संभालने की कोशिश की और अगले क्षणों के लिए स्वयं को तैयार करने लगी। यह सोचकर कि न जाने कब पापा उसे बुला लें, नई मम्मी से मिलवाने के लिए !
अब उसके कान पापा की आवाज़ का इन्तज़ार कर रहे थे।
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भाग 3
घर-आँगन और पाठशाला... भरी दुपहर या रात देर गए तक ... बगीचे में पंछी और तितलियों का पीछा करना, साथ-साथ दौड़ना भागना...हंसना और किलकना, उन्ही की, और कभी-कभी तो बस उन्ही से बातें करते जाना; बस ऐसे ही तो गुजरते थे शेखऱ के सारे वे बेफिक्र दिन और रात । वक्त कभी पंख लगाकर उड़ा करता था नन्हे शेखर के लिए। उन्हें तो आज भी विश्वास नहीं हो पाता कि किसी दूसरे का बचपन भी इतना स्नेह पगा और दुलार भरा हो सकता होगा ! भला किसने इतनी मौज-मस्ती और बेफिक्री से जिया होगा बचपन, जितना कि अम्मा-बाबा ने उनके लिए संजोया था!
ये तो थी शेखर सरकार के मन की बात, परन्तु यदि हम -आप निष्पक्ष और निर्लिप्त भाव से देखें, तो पाएँगे कि एक बेहद आम बच्चे का एक आम-सा ही बचपन था उनका भी। अम्मा की आँख बचाकर ही बाहर खेल पाते थे वे भी और समय की पाबंदी, अन्य खाने-पीने, पढ़ने आदि के समय की पाबंदियां की तरह, उनपर भी उतनी ही कठोर और अनुशासन पूर्ण थीं । अम्मा की गली के बच्चों से चिढ़ किसी से छुपी नहीं थी। पर बच्चे तो बच्चे, लाख मना करने पर भी अवसर ढूँढ ही लेते थे वे, और बच्चों के साथ बाहर खेल भी आते थे... कभी कंचे तो कभी लुका-छिपी। और फिर पकड़े जाने पर चुपचाप तुरंत ही मुर्गा भी बन लिया करते थे। परन्तु दादा कुछ भी पूछे जाने पर हर बात से नकार जाते...अपनी ही बात पर अड़े र हना स्वभाव था उनका। जवाब ही नहीं देते किसी बात का कभी। कहां रहे, दिनभर क्या किया किसी को कुछ पता नहीं चल पाता। हर बात उनका अपना बेहद नितांत और निजी मामला ही रहता। अमेरिकन और भारतीय समाज व संस्कृति के सारे भेद मिटा दिए थे उन्होंने... उनकी इस मनमानी रहन-सहन ने। हो भी क्यों न, पिछले सात साल से वहीं अमेरिका में रहकर जो पढ़ रहे थे... वह भी बिना किसी रोक-टोक के। अब कैसे इतनी रोक-टोक बर्दाश्त कर पाते। अन्य अमरीकी -साथियों की तरह उनके पास भी हर बात का वही एक जवाब था और जीने का वही एक अल्हड़ किशोरों वाला एक अधपका नजरिया ' यह मेरी अपनी जिन्दगी है और इसे मैं अपनी ही तरह से जिऊँगा। किसी का कोई हक़ नहीं बनता फालतू की दखलन्दाजी करने का ।'
मात्र चन्द हफ्तों की छुट्टियों में आए वह कैसे .इतनी पूछताछ बर्दाश्त कर पाते? अम्मा-बाबा की रोज-रोज की रोक-टोक ने आखिर एक दिन उनकी जुबां खोल ही दी । आवाज़ बेहद गर्म और तड़क थी मानो सूरज के सात घोड़ों ने चारो दिशाओं पर धावा बोल दिया हो।
“जीना दूभर कर दिया है मेरा। हर काम अब आप लोगों से पूछ कर ही करूँ क्या मैं ... पूरा ब्योरा दूँ दिन भर का... कहां गया, किसके साथ उठा-बैठा... किससे मिला और किससे नहीं... । क्या खाया, कितना खाया , क्यों खाया, वगैरह, वगैरह...? मुझसे नहीं जियी जाएगी ऐसी गुलामों-सी जिन्दगी।"
अवाक् मुंह खोले खड़े बाबा, सुनने की बजाय बस उन्हें देखते ही रह गए थे।...क्या यही उनका सुव्रतो है...बुढ़ापे की लाठी सुब्रतो; जिसके सहारे चलने की आस में उन्होंने पूरी जवानी हंस-हंसकर न्योछावर कर दी! उन्हें तो कभी इतना कड़क गुस्सा नहीं आता और फिर यूँ सारा संयम छोड़कर बड़ों से इस अन्दाज में, इस अभद्रता के साथ बातें करना... वह तो सोच तक नहीं सकते थे। कहीं यही तो जनरेशन गैप नही ... आत्मीय और संस्कारी इस परिवार में यह दूरी की दरार कैसे और कब आ तिरकी... बाबा को दादा के गुस्से और तौर-तरीके पर विश्वास ही नहीं हो पाया कभी...।
परेशान मां थोड़े वक्त के लिए आए बेटे के आगे मनपसंद व्यंजन परोसती और "यह कौनसा तरीका है अपनों से बड़ों से बात करने का सुब्रतो। " कहकर, बाप से ऊंचा कद निकाले बेटे को धीरे-धीरे समझाने की कोशिश करतीं। " यह अमेरिका या ब्रिटेन तो नहीं, भारत है। यहां बड़ों की इज्जत की जाती है और विनम्रता व शालीनता से बात करते है। कितने भी बड़े हो जाओ , झुककर आशीर्वाद लिया जाता है उनका। ऐसा दो टूक रवैया रखकर तो तुम्हारी गुजर बस वहीं, उन्हीं विदेशी देशों में ही हो पाएगी , जहां मां-बाप-बच्चे किसी को भी एक दूसरे से कोई मतलब ही नहीं। हम भी तो न कुछ देख पाएंगे और ना ही तुम्हें टोकेंगे। "
"हाँ, बस जाऊँगा। जरूर वहीं जाकर बस जाऊँगा। बस एक बार शेखर की जिम्मेदारी निभ जाए...पढ़-लिखकर कुछ बन जाए, तो यह भी करके दिखला दूंगा। हां, देखना, जरूर वहीं अमेरिका जाकर ही रहूंगा एक दिन।“
खुद से 17 साल छोटा शेखर हमेशा से ही भाई कम, मां बाप की बेवकूफी और बोझ ज्यादा लगता था सुब्रतो सरकार को। और भारत आते ही अपनी इस जिम्मेदारी से जैसे-तैसे उबरने के लिए वे बेचैन और उतावले दिखते। घर में सभी जान और समझ गए थे उनकी इस झटपटाहट को, साथ में यह भी कि इनसे कोई उम्मीद रखना सूखी रेत में पौध लगाने जैसा ही है। मन ही मन बड़ा दुखी होती थीं अम्मा उनके इस रवैये-से...आखिर कहीं न कहीं, यह बात उनके लालन-पालन पर भी तो एक प्रश्न-चिंन्ह लगाती ही थी। दोनों में आए दिन के ही झगड़े होते और आए दिन ही रोती अम्मा उठकर पूजा करने चली जातीं और तब अम्मा को रोता देख बाबा भी आपे से बाहर हो जाते। और फिर एक दिन यूँ ही क्रोध में कांपते बाबा ने बहुत ही आस-अरमान के साथ हैसियत से चार कदम आगे बढ़कर विदेश में पढ़ाए अपने होनहार बेटे से, एक ही सांस में सारे रिश्ते-नाते तोड़ डाले। घर आने तक को मना कर दिया।
“शेखर की फ़िक्र मत कर तू। बड़ा कर लेंगे हम इसे... “ क्रोध के आवेश में हांफते बाबा ने बस यही कहा था उस वक्त और हमेशा की तरह उस दिन भी, अपने बारे में बात होते हुए भी, शेखऱ की समझ में कुछ नहीं आ पाया था, सिवाय इसके कि रोते अम्मा-बाबा को देखकर बेहद डर लगा था उन्हें और उस छोटी-सी उम्र में भी और एक अनजाने अनर्थ की आशंका ने पूरे बदन में भय की सुरसुरी फैला दी थी।
उसके बाद तो हर साल घर वापस लौटते सुब्रतो दादा पूरे पांच साल बाद ही घर वापस आए थे ...वह भी बस दो दिन के लिए ही। शादी करके नई नवेली लीसा बोहू दी के साथ। और अपना हिस्सा लेकर आनन-फानन लौट भी गए थे।
“यह घाट-बाड़ी सब शेखर की और कैश-जेवर सब मेरा। वैसे भी वहां अमेरिका में बाकी यह सब मेरे किस काम का?“
बाबा तब भी, हमेशा की तरह ही, कुछ नहीं बोल पाये थे...यह तक नहीं पूछा था उन्होंने अपने कमाऊ बेटे से कि अगर कुछ अनहोनी हो ही जाए उनके साथ, तो शेखर और श्रीमना की गुजर कैसे होगी...कौन संभालेगा इन्हें? सारा गुस्सा पीकर जैसे कहा, बस वैसा ही कर दिया। शेखर को अभी भी याद है, दादा उस दिन आंगन में बैठे, अम्मा-बाबा से आँखें चुराए जल्दी-जल्दी बोले जा रहे थे, मानो घर-आँगन ही नहीं, रहने वालों तक से रिश्ता तोड़कर जा रहे हों। मानो सामान ही नहीं, अम्मा बाबा भी अब उनके किसी काम के नहीं थे।
अमरीकन बोहूदी को जानने तक का मौका नहीं मिल पाया था किसी को...न अम्मा-बाबा को और ना ही उल्लासित, ललकते नन्हे देवर शेखर को। हां, बोहू भात में पूरे काली बाग का न्योता जरूर था। पूरी हवेली रंग–रोगन से चमकाई गई थी। बरसों से लटके झाड़-फानूसों को उतार-उतारकर साफ करते-करते नौकरों के हाथ ही नहीं, कमर तक टेढ़ी हो गयी थी, तब कहीं जाकर अपनी खोई शान-शौकत पर वापस लौट पायी थी बूढ़ी काली-बाड़ी। फूल माला और नन्ही बिजली की मालाओं की ऐसी सुंदर सजावट बाड़ी में तो पहले किसी ने नहीं ही देखी थी।
उस दिन देर रात तक नौकरों के साथ अम्मा बाबा और उसने भी, दौड़-दौड़कर बिरादरी को माछी-भात परोसा था। गाने-बजाने वाले भी आए थे और रात भर गीत-संगीत भी हुआ था। यही नहीं, जाते वक्त सौगातों से लदी-फंदी अड़ोस पड़ोस की काकी दादियों ने दादा की किस्मत सराहते, चंदा-सी बोहू दी के रूपरंग की बारबार बलैया भी ली थीं और अगले वर्ष ही चंदा से बेटे को गोदी में लेकर लौटने की दुआएँ तक उसी वक्त और वहीं पर दे डाली थीं।
दादा पर उसके बाद फिर कभी नहीं लौटे थे, दो साल बाद अकस्मात ही बाबा के गुजरने पर भी नहीं। कोई दुःख नहीं था उन्हें अपनों से बिछुड़ने का, या यूँ दूर चले जाने का। एक लम्बी चुप्पी के बाद मां और शेखर के लिए दो टिकटें जरूर आई थीं, जल्दी में लिखे एक छोटे से पत्र के साथ, बहुत बड़े, रंग-बिरंगे और उनकी बेरंग जिन्दगी में बेमेल से लगते उसी स्टार और स्ट्राइप वाले बेहद खूबसूरत और चिकने कागज वाले अमेरिकन लिफाफे में। पता तक उस पर कई-कई बार लिख-लिखकर काटा गया था, मानो पत्र भेजने वाला उलझन में था कि पत्र भेजे भी या नहीं...। अपनों के मन का इतना बेगानापन कैसे सह पायी होंगी मां तब...वह भी अकेले-अकेले ही? बालक शेखर मां की कोई मदद नहीं कर पाता था। कोई दुःख नहीं बांट पाता था उनका। शेखर सरकार उदास थे आज भी वक्त को पलट न पाने के लिए...।
कई अच्छी-अच्छी अमेरिकन डाक टिकटें लगी हुई थीं उस लिफाफे पर...स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी , सेन फ्रैंसिस्को ब्रिज, वाशिंगटन डी.सी. और भी अन्य सुन्दर-सुन्दर जगहों की तस्बीरें। वास्तव में उन तस्बीरों में करीब करीब वे सभी जगहें और इमारतें थीं, जहां एक दिन धूमने जाने की लम्बी-अलसाई दुपहरियों में वह सुब्रतो दादा के साथ बैठकर योजनाएँ बनाया करते थे। जहां उन्हें अम्मा के साथ जाना था और जहां जाकर दादा से मिलने की ललक में तरसता शेखर का मन बस रिसता ही रह गया था...सपने ही तो देखे थे उन जगहों के मां ने भी उठते-बैठते...सपने जो आज इस काली अंधेरी रात से गडमड और बेजरूरत थे अब उनके लिए। फिर भूल क्यों नहीं पाए आज भी शेखर सरकार वह लिफाफा। उन्हें तो यह तक याद है कि बारबार मांगने पर भी, मां ने उन्हें ना वह लिफाफा ही कभी दिया था और ना ही वे टाक-टिकटें; और बालक शेखर के स्टैम्प एलबम का अमरीका वाला पन्ना उन रंगबिरंगी टिकटों का इन्तजार करता, दादा की यादों की तरह ही अनमना और उदास ही रह गया था।
चिठ्ठी भी तो पूरे दो महीने बाद ही पढ़ पाया थे वह और वह भी सोती मां से चुराकर। लिखा एक-एक शब्द आज भी बेहद बेगाना और लिजलिजा है यादों की कीचड़ में लिसा-सना...बिल्कुल ही डंक मारते सांप बित्छुओं सा ही।
“ चाहो तो यहां आकर रह सकती हो आप। हमारे पास एक दो कमरे का एक ग्रैनी-फ्लैट भी है, जहां शेखर की पढ़ाई पूरी होने तक आराम से रहा जा सकता है। मैं और लीसा बिल्कुल ही माइन्ड नहीं करेंगे! वीसा तो मैं करवा दूंगा पर बाकी सब इन्तजाम आपको खुद ही करने होंगे। आप जानती ही हो कि मैं और लीसा यहां पर कितने व्यस्त रहते हैं ! “
माँ ने वह चिठ्ठी शेखर से चुरा-चुराकर कई-कई बार पढ़ी थी और फिर जाने किस तनाव को दूर करने के लिए बारबार मोड़ी, और खोली थी। फिर अंत में आखिरी बार ठीक से सीधी करके वापस रख दी थी हमेशा के लिए भूल जाने को बाबा के उन्ही पुराने धूल खाते सरकारी कागजों के साथ। उसके बाद माँ ने सुब्रतो दादा की किसी चिठ्ठी को ना कभी खोला था और ना ही पढ़ा था। हाँ कभी-कभी उनके फोटो के आगे चुपचाप खड़े जरूर देखा था शेखर सरकार ने उन्हें, और वह भी शाम के उस घुप अँधेरे में जब फोटो क्या, हाथ को हाथ तक नहीं सूझ पाता।
कभी दादा की बात भी करो तो बहुत ही धीमी आवाज़ में कहतीं, “ कैसा दुःख...किसका दुःख? बावला है तू तो। जान ले कि शब्दों की तरह दुःख भी तो बेइमान औऱ खोखळा हो सकता है...औपचारिकता के सभ्य लिबास में लिपटा-छुपा ! उस सूखे पत्ते को देख रहे हो सुमी (ज्यादा प्यार या दुःख में इसी नाम से पुकारती थीं मां उन्हें), कैसे डाली से लिपटा कांप रहा है, पर जानता है कि एक न एक दिन इसे भी तो गिरना ही होगा। रिश्तों की भी बस कुछ ऐसी ही जिन्दगी होती है शेखर!”
बालक शेखर ने भी उस सूखे पत्ते को देखा था और जाना था की कैसे हवा में कांप रहा था वह पत्ता और अब गिरा, तब गिरा। पर पूरी बात तो वह बरसों बाद ही समझ पाए थे। उस समय तो बस डर लगा था...बेहद डर...अम्मा बाबा से कहीं दूर जाकर गिर पड़ने का डर...अपनों से टूटकर अलग हो जाने का डर। और तब उसी वक्त नन्हे मन ने शपथ ली थी कि चाहे कुछ भी हो जाए, कितनी भी तकलीफें क्यों न उठानी पड़ें उन्हें, अम्मा से दूर नहीं हो पाएँगे वह! आखिर उनको भी तो अम्मा की उतनी ही जरूरत है, जितनी की अम्मा को उनकी! परन्तु आज कितनी दूर चले आए हैं वह...हवा के ऱुख के साथ उड़ते-भटकते...उसी कांपते सूखे पत्ते-से ही?
खेतों पर सामने फैली बर्फ की ठंडी चादर अब तन पर ही नहीं, उनके मन पर भी फैलती जा रही थी और जमती सिहरन सी सुन्न किए जा रही थी उन्हे। ठिरन से बचने के लिए और मन से ही ऐँठते हाथ-पैरों को थोड़ी सी गरमाहट देने की एक असफल कोशिश में उन्होंने गीले ठंडे पड़ चुके कोट को थोड़ा और खींचा और हाथ पैरों को थोड़ा और मोड़कर अंदर समेट लिया।
बगल में ही, उनकी खुली जम चुकी पलकों के ठीक नीचे, पैरों के पास चीटियों का वह जत्था कल के बासी पड़े गोश्त के छोटे से डुकड़े को पीठ पर लादे, बिल में ले जाने की कड़ी कोशिश कर रहा था। बार बार गिरती पड़ती, उलटी हो-होकर घिसटती वे चीटियां कैसे भी हार नहीं मान रही थीं और बारबार अपना गन्तव्य की तरफ दुगने जोश से चल पड़ती थीं।
पर शेखर सरकार आज कुछ नहीं सोचना चाहते थे। बेहद जीवटता से जीविका में उलझी चीटियों से कुछ नहीं सीखना चाहते थे, कोई सबक नहीं लेना चाहते थे उसे। कब और कैसे यूँ देखते-देखते ही उन चीटियों की शक्लें खुद उनकी और मां की शक्लों में तब्दील हो गयीं, शेखर सरकार समझ ही नहीं पाए। परन्तु वह तो भूल जाना चाहते थे वह सब...आत्म संघर्ष और संरक्षण के वे दिन और अभाव भरा वह बचपन, जब हर चीज ही आड़े दिन या वक्त-जरूरत के लिए संभालकर रख दी जाती थी। आज भी तो कुछ नहीं बदल पाया उनके जीवन में.. . किसी तरह की कमी न होने पर भी, आज भी तो .सबको समेटते और सं | |