सोच और संस्कारों की साँझी धरोहर 

 

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(अंक-10)

हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए ।

चराग़ों की तरह आँखें जलें, जब शाम हो जाए ।

                                              -बशीर बद्र

 

*

 

 गीत और ग़ज़ल विशेषांक

 (सर्वाधिकार सुरक्षित)

 copyrights to writers and publisher only.

     संरचना व संपादन:: शैल अग्रवाल. 

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  अपनी बात  

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        -शैल अग्रवाल 

 

 

 

गीत और ग़ज़ल का  फरक क्या  बस गुल और फूल तक ही सीमित है...  गीत और ग़ज़ल की बहस अधिकांशतः हिन्दी  और उर्दू की बहस बनकर रह जाती है  जबकि हिन्दी और उर्दू दोनों ही एक ही कौम की  दो भाषाएँ हैं  और सदियों से  हमारी सांझी  और सांस्कृतिक धरोहर रही हैं। विभाजन के साठ साल बाद भी,  दोनों देशों की  बोलचाल की  भाषा आज भी  गंगा-जमनी ही है। कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तक हर प्रान्तीय भाषा-भाषियों ने   ग़ज़ल गायकी को अपनी जुबां और पहचान दी है। सरहद के दूसरी ओर भी यही हाल है। आज भी लाहौर, पेशावर या ढाका, या फिर  कलकत्ता मुम्बई, दिल्ली, सभी जगह एक-से-एक उम्दा गायक सुर और सोज़ की साधना  में समर्पित हैं और गीत और ग़ज़ल की  परंपरा को आगे बढ़ाते हुए गालिब और मीर के सुरों में  ही गूंज रहे हैं । वैसे भी एक ख़याल, एक सोज़ का कैसा वतन और कैसी सीमा, ये अहसास तो शाश्वत  हैं,

मैं हवा हूँ, कहां वतन मेरा

दश्त मेरा न ये चमन मेरा।

                              अमीक हनफ़ी

भाषा का  काम  मुख्यतः अभिव्यक्ति  है और कविता हो या गीत व गजल, सभी का माध्यम भाषा ही   है। मन जो कहे...दूसरा सुन-समझ ले, आनंदित और पुलकित हो ले, भावों और सोच के धरातल पर  एक दूसरे से मिल लें, क्या बस इतना ही काफी नहीं ...

तुम्हें खोजता था मैं,
पा नहीं सका,
हवा बन बहीं तुम, जब

मैं थका, रुका ।

                      -' निराला '

ओस की बूदों के कंपन में, झरनों की कलकल में, खुशबू की मादकता और पवन की सिहरन मे... दुखियों के आँसू और बच्चों की मुस्कान में ...कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढा और पाया है इसे। अनगिनित वे पल जिन्हें हम बेहद शिद्दत और अहसास के साथ जीना चाहते हैं, अक्सर इज़ाजत ही नहीं देता जीवन कि उन खूबसूरत पलों के बारे में सोचा तक जाए, उन्ही भागते-दौड़ते पलों की थमी  अनुगूँज का नाम है कविता...जैसे सितार पर झाले के बाद एक सुरीली और कंपित मीड ... देर तक गूंजती हुई।  

 कहीं पढ़ा था कि गजल का शाब्दिक अर्थ है प्रिय से मन की बात कहना। शायद यही वज़ह है कि- जैसे बातों का (वह भी प्रिय से) अंत नहीं, वैसे ही गीत और ग़ज़ल के विषय भी विविध और अनंत रहे हैं। बेबाक मन जो अल्हड़ बच्चे सा खेलता है, आसानी से बहलता नहीं; हां, दुःख और सुख से बिंधी बांसुरी-सा हल्की सी फूंक पर भी गूँजना जरूर स्वभाव है इसका। तो क्या हम यह मान लें कि ये सुख-दुख या विविध अनुभव ही काव्य-जननी या प्रेरणा हैं। 

' वियोगी होगा पहला कवि आह से उपजा होगा गान/ उमड़कर आँखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान।'

                                                                                              -सुमित्रानन्दन पंत।

पर मुस्कान और आंसू ही नहीं, भावातिरेक में शब्द भी तो झरते हैं आंखों से... होठों से। भारतीय जन-जीवन में तो वैसे भी गीत-संगीत ताने-बाने-सा ही बुना है। शादी-ब्याह, जन्म, मत्यु, दुःख-सुख; सच कहूँ तो आज भी हर अवसर पर गीत-संगीत ही सामाजिक अभिव्यक्ति का सर्वाधिक सरल, सशक्त और प्रिय माध्यम है। प्यार, नफरत सब समेटे ये गीत और ग़ज़ल कभी जाने-अनजाने की आस ...तो कभी मनचाहे की तलाश हैं।  एक अबूझ प्यास, तो कभी एक उलझी भटकन हैं। चुटकी ले-लेकर हँसाती-रुलाती भावों की इस सुरीली छेड़छाड़ को कुछ और ज्यादा ही शह दी है पिछले सात दशक से दिन-प्रति- दिन और-और प्रचलित होते और हरेक के सर चढ़कर बोलते फिल्मी गीतों ने। पिछले साठ सालों में एक-से-एक अच्छे गीतकार और गजलकारों का नाम जुड़ा है इनसे और ये इन्हें एक दूसरे ही धरातल पर ले गए हैं। सफर जो कभी शैलेन्द्र, गोपालसिंह नेपाली, साहिर लुधियानवी, कैफी आजमी और हसरत जयपुरी आदि से शुरु हुआ था, आज इसमें नीरज, अनजान, कतील शफाई, नासिर, गुलज़ार, जावेद अख्तर जैसे कई-कई बेहद संवेदनशील और काबिल नाम जुड़ गये हैं और जगजीत सिंह, अनूप जलोटा, तलत अजीज, चंदन दास, भूपेन्द्र, मेंहदी हसन, गुलाम अली, फरीदा खानम, मुन्नी बेगम, बेगम अख्तर, नूरजहां, तलत महमूद, मुकेश, लता, (आशा भोंसले) कविता कृष्णमूर्ति, सोनू निगम, अलका यागनिक, शान  जैसी मधुर और सोजभरी और सुरीली आवाजों ने इनके असर और लोकप्रियता में चार चांद लगाए हैं(नामों की फहरिश्त वक्त के साथ लम्बी ही होती जा रही है)। 

इसी लोकप्रियता का असर है कि आज यह काव्य-रस घर-घर स्वर लहरियों के संग बह रहा है...बच्चे-बूढ़े सभी के दिलो-दिमाग पर हावी है। काफी लचर सामग्री भी परोसी जाती है, पर अपवाद कहां नहीं होते? 

सूर, तुलसी, कबीर के साथ जब नरेन्द्र शर्मा और प्रदीप भी घर घर गूंजे तो यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि इन स्वर लहरियों के साथ साहित्य जन-जीवन में भी रच-बस गया और सुबह की किरणें, किरणें नहीं 'ज्योति कलश' बन गयीं। रोटी की जोड़-तोड़ में जो मीर और गालिब का नाम तक नहीं जान पाए थे उन्हें भी सुरैया और तलत ने ' दिले नादां ' से परिचित कराया और इन गीत और ग़ज़लों की लोकप्रियता बताती है कि पल भर को ही सही, गरीब-से-गरीब का जीवन भी आज एक गीतों भरी कहानी है... यथार्थ की कठोरता इनके दम पर मिटी भले ही न हो, कम-से-कम कम अवश्य हुई है।

कब हम बचपन से यौवन और यौवन से बुढ़ापे की तरफ चल पड़ते हैं और कब अपने आप से भी बेगाने से होने लगते हैं, सूखे पत्ते सा उड़ता... यथार्थ की जमीं और सपनों के आकाश की दुर्लभ दूरियां नापता यह जीवन,  इन बातों का लेखा-जोखा तक रखने की फुरसत नहीं देता। और तब बेबस और ' नुक्तांचीं गमे दिल' ही तो है जो कभी बात न कह पाने के गम में तो कभी 'बात बनाए न बने' की उलझन में डूबा, न जाने कैसे-कैसे करतब दिखलाता है। कितना-कितना हंसाता और रुलाता है। और यहीं से शुरु होता है हमारा शब्द और भावों में रचा बसा एक कल्पना का संसार... गीत-संगीत का साथ। 

पर यह जूझ... यह भटकन, यह मज़बूरी ही तो हमारा इश्क या शग़ल है...जीवन है!

 

हज़ार ख्वाइशें ऐसी कि हर ख्वाइश पर दम निकले

बहुत निकले मेरे अरमान मगर कम निकले ।

आज भी तो हाँ पर ना और ना पर हाँ ही तो इस मन का स्वभाव है। 

 

मेरे महबूब, मेरे दोस्त नहीं ये भी नहीं

मेरी बेबाक तबियत का तकाज़ा है कुछ और

                             -शौकत जयपुरी

                                      

और 'उम्रे दराज़' से उधार मांग कर लाए गये ये पल, दिन, महीने, साल...देखते-देखते ही पीछे भी छूट जाते हैं, पहुंच से परे, इन्ही सपने देखती आंखों के आगे ही। ... आरजू में तो कभी  इन्तज़ार में खुशियों के सातवें आसमान बैठे तो कभी उदास और उन्मन, बस उड़ते रहते है हम इनके साथ। वैसे भी चलचित्र-सा  देखने के अलावा और कुछ बस में भी तो नहीं हमारे। खुद ही तमाशबीन और खुद ही करतबबाज़, फिर भी जीते जी कब छोड़ पाए हैं हम यह अद्भुत नाटिका!

 

अपनी मर्जी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं

रुख हवाओं का जिधर है उधर के हम है...!

 

वक्त के हाथ है मिट्टी का सफर सदियों से

किसको मालूम कहां के हैं, किधर के हम हैं।

 

चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफिर का नसीब

सोचते रहते हैं किस रहगुजर के हम हैं।

                                              -निदा फाज़ली

 

कैसी बहकी बहकी बातें कर रही हूं; माटी के इस पुतले ने भला कब और किस तूफान से हार मानी है...कैसे भूल गई अपना कभी एक बेहद पसंदीदा शेर ,

ऐ ज़जबाए दिल ग़र तू चाहे हर चीज़  मुनासिब हो जाए

मंजिल के लिए दो पैर चलूँ और मंजिल सामने हो जाए।

किसने लिखा, याद नहीं। कॉलेज के उन्मादी और बेफिक्र दिनों में एक दूसरे को सुना-सुनाकर बस खुश हो लिया करते थे हम और एक नयी स्फूर्ति से भर जाते थे। आज तो बस इतना ही याद है ... अब ना वो जोश और ना ही वे साथी।

भोलापन...सहेलियां ही नहीं, शायद वक्त की भीड़ में सही शब्द तक खो जाते हैं  ...पर आजभी तो मुश्किल से मुश्किल पल में यही समझाया है खुद को, कि सब यह मन का ही खेल है...चाहो तो जीत लो, चाहे तो हार। वैसे भी असलियत किसे पता नहीं!

 हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन

दिल के खुश रखने को 'गालिब' ये खयाल अच्छा है।  

एक बार फिर वक्त का मुसाफिर गुजरे वर्ष को अतीत की संदूकची में सजाये तैयार बैठा है। एकबार फिर पीछे छूटी यादें  ... मिलन और विछोह की, उपलब्धि और असफलताओं की...सुख-दुख की, मन के एलबम में तस्बीरों  सी सजने लगी हैं...हंसाती, रुलाती, उलझाती...कभी-कभी तो बेमतलब ही थकाती।  पर मनचाहा सब पूरा ही हो जाए, तो फिर जीने को ही क्या रह जाए... 

हर किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता/ कहीं जमीं नहीं मिलती तो कहीं आसमां नहीं मिलता।

मियां गालिब यह कह तो गये, पर जाते-जाते एक ऐसा संसार भी छोड़ गए हमारे लिए,  जहां आज भी हम न सिर्फ जमीं और आसमां दोनों को ही बांहों में  भरने की गुस्ताख़ी करते  हैं बल्कि रमते भी हैं ... लब्ज़ों के कांधे सिर टिकाए अपना एकांत और कोलाहल जी भर-भरकर बांटते हैं...  हँसते और रोते हैं।

कभी चांदनी के साथ छत पर टहलती, तो कभी लहरों-सी सागर की बांहों में सिमटने को बेचैन, कल्पना-सुन्दरी भावों के नए-नए लिबास पहने  नए वर्ष के स्वागत की तैयारी में सज उठी है। होठों पर एक उत्सुक मुस्कान और आँखों में हल्की-सी नमी ... बिल्कुल नयी-नवेली दुल्हन-सा ही तो हाल है इसका। एक तरफ तो विदाई जाते वर्ष 2007 की... पीछे छूटे कई-कई महीने, घंटों और पलों की, तो दूसरी तरफ नए के स्वागत की प्रतीक्षा और रोमांच...। ऐसे रूमानी पल में हमने भी गीत और ग़ज़लों का एक महकता गमकत गुलदस्ता तैयार किया है आपके लिए और गीत व ग़ज़ल की उत्पत्ति, प्रचलन और तकनीकी आदि जानकारी के बारे में कई-कई तथ्य एकत्रित करने की कोशिश भी।   

यही वजह है कि लेखनी के सभी स्थाई स्तंभ जैसे विविधा, राग-रंग और भारती, सभी इसबार ग़ज़लों से या ग़ज़ल संबंधी सामग्री से ओतप्रोत हैं। नए-पुराने, जाने-अनजाने सभी गीतकार और गजलकारों की झोली से कुछ चुनिंदा रतन आपतक पहुँचाने का प्रयास है लेखनी का यह अंक। सच कहूँ तो सुख और दुःख की अनगिनित हिलोरें लेती गीत और गजल की एक मनमौजी लहर उमड़ आई है लेखनी के इस अंक में; आपको भिगोने और डुबोने...शायद संग-संग बहा तक ले जाने को...आपकी प्रतिक्रिया का हमें इन्तज़ार रहेगा!  

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मन की किताब से...

 

कोई फूल

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वशीर वद्र

कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बंधा हुआ ।

वो ग़ज़ल का लहजा नया-नया, न कहा हुआ न सुना हुआ ।

 

जिसे ले गई अभी हवा, वो वरक़ था दिल की किताब का,

कहीँ आँसुओं से मिटा हुआ, कहीं, आँसुओं से लिखा हुआ ।

 

कई मील रेत को काटकर, कोई मौज फूल खिला गई,

कोई पेड़ प्यास से मर रहा है, नदी के पास खड़ा हुआ ।

 

मुझे हादिसों ने सजा-सजा के बहुत हसीन बना दिया,

मिरा दिल भी जैसे दुल्हन का हाथ हो मेंहदियों से रचा हुआ ।

 

वही शहर है वही रास्ते, वही घर है और वही लान भी,

मगर इस दरीचे से पूछना, वो दरख़्त अनार का क्या हुआ ।

 

वही ख़त के जिसपे जगह-जगह, दो महकते होटों के चाँद थे,

किसी भूले बिसरे से ताक़ पर तहे-गर्द होगा दबा हुआ ।

 

 

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें

 

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अहमद फ़राज़

 

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें

ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती
ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें

तू ख़ुदा है न मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा
दोनों इंसाँ हैं तो क्यों इतने हिजाबों में मिलें

ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो
नशा बड़ता है शरबें जो शराबों में मिलें

आज हम दार पे खेंचे गये जिन बातों पर
क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें

अब न वो मैं हूँ न तु है न वो माज़ी है "फ़राज़"
जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

 

 

 

 

बंद होंठों में छुपा लो

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-कुंवर बेचैन


बंद होंठों में छुपा लो
ये हँसी के फूल
वर्ना रो पड़ोगे।

हैं हवा के पास
अनगिन आरियाँ
कटखने तूफान की
तैयारियाँ
कर न देना आँधियों को
रोकने की भूल
वर्ना रो पड़ोगे।

हर नदी पर
अब प्रलय के खेल हैं
हर लहर के ढंग भी
बेमेल हैं
फेंक मत देना नदी पर
निज व्यथा की धूल
वर्ना रो पड़ोगे।

बंद होंठों में छुपा लो
ये हँसी के फूल
वर्ना रो पड़ोगे।

 

 

 

कहीं चांद 

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वशीर वद्र

           -

कहीं चाँद राहों में खो गया कहीं चाँदनी भी भटक गई
मैं चराग़ वो भी बुझा हुआ मेरी रात कैसे चमक गई

मेरी दास्ताँ का उरूज था तेरी नर्म पलकों की छाँव में