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कविता आज और अभी

समय

समय को आकार देती ये कलम
क्यों कर अब खामोश है
नए आयाम की
मौन आकृति की
वृत्ति का प्रतिकार है
समय को आकार देती ये कलम
मेरी ये खामोश कलम
मदमस्त, मदहोश जवानी
ये लम्हों की रवानी है
पर लम्हा
कौन सा लम्हा
ठहरूं
जरा सोचूं
पर मैंने तो जिया नहीं
प्याला अभी जी भर पिया नहीं
रेत की तरह फिर बहा लम्हा
यों क्योंकर खामोश है
समय को आकार देती मेरी ये कलम
----अरुणा घवाना
प्रभात
जाग जाग है प्रात हुई,
सकुची, लिपटी, शरमाई ।
अष्ट अश्व रथ हो सवार
रक्तिम छटा प्राची निखार
अरुण उदय ले अनुपम आभा
किरण ज्योति दस दिशा बिखार ।
सृष्टि ले रही अंगड़ाई,
जाग जाग है प्रात हुई ।
कण - कण में जीवन स्पंदन
दिव्य रश्मियों से आलिंगन
सुखद अरुणिम ऊषा अनुराग
भर रही मधु, मंगल चेतन
मधुर रागिनी सजी हुई
जाग जाग है प्रात हुई ।
अंशु-प्रभा पा द्रुम दल दर्पित
धरती अंचल रंजित शोभित
भृंग - दल गुंजन कुसुम - वृंद
पादप, पर्ण, प्रसून, प्रफुल्लित ।
उनींदी आँखे अलसाई
जाग जाग है प्रात हुई ।
रमणीय भव्य सुंदर गान
प्रकृति ने छेड़ी मद्धिम तान
शीतल झरनों सा संगीत
बिखरते सुर अलौकिक भान ।
छोड़ो तंद्रा प्रात हुई
जाग जाग है प्रात हुई ।
उषा धूप से दूब पिरोती
ओस की बूंदों को संजोती
मद्धम बहती शीतल बयार
विहग चहकना मन भिगोती ।
देख धरा है जाग गई
जाग जाग है प्रात हुई ।
-कवि कुलवंत सिंह
एक बरस बीत गया

झुलासाता जेठ मास शरद चाँदनी उदास सिसकी भरते सावन का अंतर्घट रीत गया एक बरस बीत गया
सीकचों मे सिमटा जग किंतु विकल प्राण विहग धरती से अम्बर तक गूँज मुक्ति गीत गया एक बरस बीत गया
अटल बिहारी बाजपेयी
नव- वर्ष!

तुम्हारा स्वागत-सत्कार
चाहते हुए भी न कर सका!
तुम्हारे शुभागमन के पूर्व
कई दिनों से
विविध आयोजनों की
रूपरेखा बनाने का विचार
मन में आता रहा,
न जाने क्या-क्या अभिनव अनूठा समाता रहा,
पर, कार्यरूप में
तनिक भी परिणत न कर सका उसे!
हे नव वर्ष!
तुम आ गये बिना किसी धूमधाम के?
और मैं
तुम्हें प्यार भरी भुजाओं में
चाहते हुए भी न भर सका!
हे नव वर्ष!
तुम सचमुच कितने उदास हो रहे होगे!
तुम्हारे अभिनन्दन में इस बार
एक क्या अनेक कविताएँ लिखना चाहते हुए भी
एक पंक्ति भी
तुम्हें समर्पित न कर सका!
अरे, यह क्या हुआ?
कुछ भी तो स्मरणीय विशिष्ट घटित हो जाता
जीवन- नाटक का
मंगलाचरण या पटाक्षेप!
पर, कुछ भी तो नहीं हुआ;
मात्र पूर्वाभ्यास का बोध होता रहा!
हे नव वर्ष!
तुम्हें जीवन-क्रमणिका में
महत्त्वपूर्ण स्थान दिलाने की साध लिए
जागता… सोता रहा!
चाहते हुए भी
न जी सका - न मर सका!
-महेन्द्र भटनागर
वर्षगांठ पर

यदि सबकुछ किसी तरह
रह जाता शेष
ज्यों का त्यों
परिवर्तनों की आशा में
सपनाता हुआ
एक आदर्शलोक के लिए...
यदि जो
अनन्य था अभिन्न था
सटा रहता था वक्ष से प्रतिफल, फिर
लौट आता और
बातें अपने को दोहरातीं...
यदि जीवन एकबार
फिर जिया जा सकता
एक पारे जैसे स्वप्न के इर्द-गिर्द...
यदि शब्द
अपने को व्यक्त कर पाते
पर्तों में नहीं
रंगों में...
आज मैं भी
एक मोमबत्ती जला देता
जश्न मनाता
इस एक और गुजरते हुए
वर्ष के लिए
सत्येन्द्र श्रीवास्तव
द्वार थपथपा रहा

अतीत संग विदा हुआ
विवादों का सिलसिला
कदम नव बढ़ा रहा
जिन्दगी का हौसला
मशाल ले आ रहा
द्वार थपथपा रहा।
कश्मीर के हिमशिखर
सोचो तो पहाड़ पर
जवान देशों के जहां
लेकर जान हाथ पर
तुम चैन से सांस लो
विश्वास नव दिला रहा
द्वार थपथपा रहा।
मन में कहीं डर न हो
सर ऊँचा उठा सको
गले-गले मिला सको।
मुक्त कंठ गा सको।
शांति गीत गा रहा
द्वार थपथपा रहा।
जन जन की पूरी हों
बुनियादी जरूरतें
संघर्षों से जुड़ी हो
सूरज की प्रथम किरण
समय की पुकार बन
द्वार थपथपा रहा।
खेतों में हरा भरा
भाग्य की मांग में
कर्म के स्वांग में
दिख रहा विभूति है
समय से मन्त्रणा
जीवन का दुख
हर्ष दर्शन करा रहा
द्वार थपथपा रहा।
श्रीलंका या नेपाल हो
वहां शांति वास हो
जब पड़ोसी हो दुखी
कैसे चैन साथ हो
विश्व में हंसी-खुशी
ढोल जो बजा रहा
द्वार थपथपा रहा।
शरद आलोक
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कहानी (समकालीन)

-अरुण अस्थाना
कैसा आदमी हूँ मै!
" कैसे आदमी हो यार! एक छिपकली से डर गये..." नरेन ने खीझकर कहा और चादर खींच ली।
" नहीं यार..." मैं झेंप मिटाने की कोशिश करने लगा," असल में डर नहीं, मुझे खिन लगती है छिपकली से...नाम से ही... साली लिजलिजी...", इससे पहले कि मैं पूरी सफाई दूँ, उसकी नाक फिर बजने लगी है।
मैने बिस्तर की चादर झाड़ी और लाइट औफ़ कर फिर से सोने की कोशिश कर रहा हूँ। लेकिन अब नींद नहीं आ रही। दिमाग में बार-बार नरेन का खीझभरा स्वर घूम रहा है-' कैसे आदमी हो यार !'
दिमाग़ को खाली करने की मैं भरसक कोशिश कर रहा हँ, सभी सोचों को लगातार धकिया रहा हूँ। चन्द लम्हों को लगता भी है खालीपन, पर अचानक फिर कोई वाकया घूम जाता है आँखोंके सामने किसी फिल्म की तरह-' कैसे आदमी हो...'
बिस्तर पर बैठ जाता हूँ पालथी मारकर। नींद न आना तो आम बात है मेरे लिये फिर मैं सोचता हूँ, बाहर ज़रा चहलकदमी कर लूँ तो शायद नींद आ जाये। टहलना अच्छा रहा है आधी रात को। अंदर पंखे की हवा झेली नहीं जा रही। खुश हूँ मैं, बाहर की ठंडी हवा अपना असर जरूर दिखायेगी, यह सोचकर। मैं सो सकूँगा। कुत्तों को मेरा टहलना रास नहीं आ रहा। सोनी साहब जाग गये हैं, बाहर बरामदे में ही सोते हैं न वो, " कौन? अच्छा...आप, आनन्द बाबू, क्या हुआ... "
" कुछ नहीं, बस यूँ ही..., सोने ही जा रहा हूँ, बड़ी गरमी है...सो..." मुझे लग रहा है कुत्ते जरा देर में दुनिया भर को जगा देंगे और फिर सब मुझे ही गरियायेंगे-" कैसे आदमी हो..."
मुझे मजबूरन वापस घर में घुसना पड़ा है। सोच रहा हूँ कुछ पढ़ लूँ तो शायद नींद आ जाये। लेकिन पढ़ने के लिये तो लाइट जलानी पड़ेगी। लाइट जलायी तो नरेन फिर जग जायेगा। फिर...' कैसे आदमी हो यार'... मेरे दिमाग में ये शब्द लगातार हथौड़े मार रहे हैं। गुस्सा आ रहा है नरेन पर, क्यों कहे उसने ऐसे वर्ड्स मेरी तो पूरी रात खराब कर दी और खुद तानकर सोया है।
अब सिगरेट की तलब जोर मार रही है। तकिये के नीचे एक पड़ी है सुबह के लिए। चलो सुबह इमरजेंसी छाप बीड़ी काम आयेगी। दीवार की टेक लगाकर बैठा हूँ, दिमाग अभी भी वहीं है।
' कैसे आदमी हो...' कितनी बार सुन चुका हूँ ये शब्द, कितने संदर्भों में कितने तरीके से सुना है मैने, शब्द अलग-अलग हुए तो क्या, मायने तो वही रहे न हमेशा। अक्सर शब्द भी नहीं हुए लेकिन महसूस कराया गया मुझे-कैसा आदमी हूँ मैं!
वाकई आज की वह छिपकली वाली बात तो बड़ी छोटी है, न के बराबर। मैं शायद अब तक दोबारा सो भी चुका होता। यह भी तय है कि सुबह तक मैं इस बावत सब कुछ भूल चुका होता अगर नरेन ने यह न कहा होता-' कैसे आदमी हो यार', नरेन के इन शब्दों ने मुझे बहुत भीतर तक जगा दिया है, फिर कई रातों न सोने के लिए। खँगालने लगा हूँ मैं अपने आपको, ' आखिर कितना अनबूझा हूँ मैं? मेरे अन्दर से वे सभी घटनाएँ-दुर्घटनाएँ एकाएक बाहर आ गयी हैं, घेर लिया है, जकड़ लिया है मुझे सबने। चिल्ला-चिल्लाकर पूछ रहे हैं सब-' कैसा आदमी हूँ मैं...'
जवाब नहीं है मेरे पास, मिल भी नहीं रहा...उहं...सिगरेट ने उंगलियां जला दीं तकिया पटककर एक बार फिर सोने चला हूँ। लेटे-लेटे धकेल रहा हूँ दिमाग से उन सबको। कोशिश नाकाम। उठकर बैठना पड़ा है मजबूरन। इमरजेंसी छाप बीड़ी के बण्डल से एक बीड़ी निकाल सुलगाते हुए मेरे दिमाग़ में ' कैसे आदमी हो...' से जुड़ी सारी घटनाएँ क्रोनोलॉजिकल आर्डर में उभर रही हैं। मैं रोक नहीं पा रहा अब उन्हें, वापस खदेड़ना कतई नामुमकिन है अब।
हाँ, शहर के सबसे अच्छे स्कूल से हाईस्कूल पास किया था मैने। फर्स्ट क्लास, दो डिस्टिंक्शन। इसके बावजूद मैं उस स्कूल में आगे पढ़ने को तैयार नहीं था। पिताजी से कहा, उन्होंने साफ इन्कार कर दिया। दूसरे स्कूल उन्हें बिलो स्टैंडर्ड लगते थे। मैं अड़ा रहा, उसी स्कूल में नहीं गया। पिताजी झुके पर तब तक देर हो चुकी थी। जिन स्कूलों को वे कुछ अच्छा समझते थे सभी में एडमीशन क्लोज्ड। पिताजी की झल्लाहट लगातार बढ़ती जा रही थी, सबसे कहते, " सब साले मक्कार हैं, बैकडोर से सोर्सवाले का एडमीशन कर रहे हैं। लेकिन एक अच्छे स्टूडेंट को लेने में नानी मरती है। सोर्स के कतई खिलाफ थे वह। खैर एक थर्ड क्लास ( पिताजी की नजरों में) स्कूल में दाखिला मिला मुझे। दाखिले के समय वहाँ के प्रिंसिपल ने पूछा, " तुमने इतना अच्छा स्कूल क्यों छोड़ा?" प्रिंसिपल भले लगे। सो मैने सब कुछ सच-सच बताना ही उचित समझा... " सर वो, वहाँ हर टीचर विनोद को सिर्फ इसलिए डाँटता था क्योंकि एक तो वह ट्यूशन नहीं पढ़ता था और दूसरे---सूती यूनिफॉर्म पहनता था, इसलिए... " प्रिंसिपल ने मुझे अजीब सी नजरों से देखा, दो बार गर्दन हिलाई और फिर उनके मुँह से निकला... " कैसे लड़के हो भई तुम... "
इत्ती-सी बात के लिए मुझे हैरत से देखा गया। हैरत हुई मुझे इस पर तब। इसके बाद भी बीसियों बार जूझना पड़ा है अपने कामों में हैरत वाला हिस्सा ढूँढने के लिए, जब जब मुझे कुछ ऐसा सुनना पड़ा है, तब-तब- " कैसे आदमी हो तुम..."
असल में मैने उसी साल यूनिवर्सिटी में पैर धरे थे, सो रंग चढ़ना शुरु ही हुआ था। मैं भी अपनी साइंस फैकल्टी की जगह आर्ट्स में ज्यादा इंटरेस्ट लेता था। अपने कुछ और साथियों की तरह। हम नये नवेलों की धारणा थी कि आर्ट्स की लड़कियाँ फ्लर्ट करने में ज़्यादा तेज होती हैं इसलिए।
आर्ट्स की तरफ जाते हालाँकि मैं घबराता भी था। मीनाक्षी की वजह से। वह वहीं थी ना। लेकिन वहाँ की रंगीनी से मुँह भी नहीं मोड़ पाता था। और मीनाक्षी...हर बात में नसीहत देना उसकी आदत में शुमार " ऐसा क्यों किया... ", " नीली पैंट पर नीली शर्ट ही क्यों पहनी...", " धूप में यहाँ क्यों टहल रहे हो..." वगैरह वगैरह...असल में हम पड़ोसी थे, बचपन के साथी। एक ही दरजे में पढ़ते थे---मैं बी. एस. सी. वन में, वो बी. ए. वन में। हमने दोस्ती के तहत जो अधिकार एक-दूसरे को दे रखे थे उनमें नसीहत देना उसने अपनी तरफ ज़्यादा जोड़ लिया था, पर यह मुझे अच्छा लगने लगा था। अक्सर मैं मान भी जाता।
साल गुज़रते-गुज़रते हमें पता लग गया था कि हम कितने करीब हैं। मैं तरह-तरह की फिल्में देखता, साहित्यिक उपन्यास पढ़ता। मिल्स एँड बून्स में भरा रोमांस खंगालता। पर समझ नहीं पाता कि किसी 'यूनीक' तरीके से कैसे खुद को एक्सप्रेस करूँ। हालाँकि हम घंटों साथ रहते। बतियाते, गपियाते, पर प्रेम तक पहुँचते-पहुँचते ठहर जाते, सीधा छूटकर बगल वाली गली में घुस जाते और फिर वीरान गली का सन्नाटा हमारे बीच ठहरा रहता, चुप्पी की शक्ल में।
वह उस दिन मेरे कमरे में ही बैठी जगजीत सिंह को सुन रही थी। आँखें बन्द, पूरी तरह खोयी हुई। संगीत उसे कुर्सी के दो पायों पर टिकाये झुला रहा था। अचानक मैने कैसेट रिकॉर्डर बन्द कर दिया। वह ज़मीन पर आ गई, घूरा मुझे। मैने चुपचाप नजर झुकाये हुए अपनी नोटबुक से एक काग़ज़ फाड़ा और उसे तहाकर उसकी जेब में डालता हुआ तेज़ी से बाहर निकल गया।
करीब पाँच मिनट बाद जगजीत फिर गूँज रहे थे। मैने कमरे में झाँका, वह फिर झूल रही थी। मेरी आहट पर उसने कैसेट रिकॉर्डर बन्द किया। मुझ तक आयी। मेरा हाथ पकड़कर खिड़की तक ले गयी और अपने खद्दर के कुर्ते की जेब से वही काग़ज़, जिस पर मैने न जाने कितनी दफ़ा उसका नाम लिखा था, निकालते हुए बोली, " कितना परेशान किया मुझे, बहुत देर से करते हो तुम हर काम...आलसी! शरमाते रहे...कभी मेरी डायरी देखना...", और फिर वही काग़ज़ मेरी जेब में ठूँसते हुए बोली,
" परेशान हो गए? कैसे हो तुम..."
यूँ मेरे प्रेम की औपचारिक शुरुआत भी हुई तो उन्ही लफ्ज़ों से। खैर हमारा प्रेम भी वैसा ही था जैसा आमतौर पर होता है, हम हवाई किले बनाते भविष्य के, शिकायतें करते, लड़ते-झगड़ते, मानते-मनाते। अचानक एक दिन उसकी माँ ने मुझसे पूछ लिया, " मीनाक्षी से शादी करोगे?", " हाँ, पर आप समय आने पर मम्मी पापा से बात कर लीजिएगा एक बार", मैने बेबाक कहा।
" समय आने पर...! कब आएगा समय, पढ़ाई तो तुम्हारी खतम हो गयी ना, जल्दी से नौकरी करो अब।" तमककर बोलीं वो नौकरी जैसे पेड़ पर टंगी थी।
मैने उन्हें समझाने की कोशिश की, " देखिये, अभी बड़े भैया की शादी भी होनी है, वह तो हो जायेगी इसी साल, लेकिन नौकरी लगने में तो कुछ समय... " , आखिर एक साल की मोहलत मिली मुझे।
लेकिन मुझे नौकरी नहीं मिली। पूरा साल तो निकल ही गया। छः महीने करीब ऊपर भी हो गये। मैने मीनाक्षी की तरफ जाना कम कर दिया।
इन्ही कम होती मुलाकातों के बीच एक दिन मीनाक्षी ने बताया, " मेरी शादी की बात चल रही है घर में, शायद कुछ लोग मुझे देखने आने वाले हैं दो-चार-पाँच दिन में।" मैने सुझाया, " कर सको तो इनकार कर दो।"
वह बोली, " नहीं अनु, हम सिविल मैरिज क्यों न कर लें, फिर अगर किसी ने मुझ पर शादी के लिए दबाव डाला तो मैं बता दूँगी, नहीं तो तुम्हें जॉब मिलते ही...बस।" मैंने आदर्शों की किताब खोली और उसे समझाया, " नहीं, बस इस महीने और वेट करो, एन. टी. पी. सी. में इंटरव्यू बहुत अच्छा हुआ था, और अब तो तीन महीने हो गये हैं, कॉल किसी दिन भी आ सकती है। समझो बात को मिनी, तुम्हारे मम्मी-पापा को धोखा देना मैं नहीं चाहता।" उसका चेहरा दोनों हाथों में लेते हुए मैने उसे ढाढ़स बँधाने की भरपूर कोशिश की," डोंट बी डिस्हार्टेंड मिनी, मैं जल्दी ही तुम्हारी मम्मी से बात करता हूँ।"
मैने उसका चेहरा करीब लाना चाहा पर उसने खुद को छुड़ा लिया। पहली बार हुआ ऐसा। वह मेरे हाथों को जोर से पकड़े मेरी आँखों में तैरते भावों को नापती-तौलती रही।
जब तक कॉल आयी तब तक उसकी सगाई हो चुकी थी। मैं रोक नहीं सका। कोशिश ही नहीं की। लेकिन नौकरी मिलने पर जोश फिर ठाठें मारने लगा। मैं उससे मिलने गया। मम्मी मिलीं उसकी। मैने उन्हें अपनी नौकरी लगने की खबर सुनाई और मीनाक्षी से मिलने की इच्छा जाहिर की। उबल पड़ीं वो, " कैसे आदमी हो जी तुम...मालूम है तुम्हें, उसकी सगाई हो चुकी है। अब तो पीछा छोड़ो उसका।" मैं उल्टे पाँव लौट आया।
दूसरे दिन ही मीनाक्षी आयी मेरे घर। मैं उसे देखते ही फिर उछल पड़ा। जल्दी जल्दी कपड़े चेन्ज करके आया और बोला,
" चलो, " " कहाँ?" उसका यह सवाल मेरे लिए उससमय कतई अप्रत्याशित था।, असल में मैं ज्यादा खुशी में तत्कालीन परिस्तियों को भुला भुला बैठा था ना। मैने फिर भी लापरवाही से कहा," कहीं भी। कहीं बैठना है थोड़ी देर।" " नहीं बातें ही तो करनी है ना हमें। फिर यहीं क्यों नहीं..." अब वह समझा रही थी मुझे। " देखो अनु, यू नो कि अब मेरी...प्लीज़, डोण्ट टेक इट अदरवाइज हाँ, तुमसे क्या कहना अब... आयी एम एंगेज्ड, मैं तुम्हारे साथ बाहर नहीं जा सकती अब...समझो जरा...वो लोग भी इसी शहर में रहते हैं ना..."
मैं पढ़ रहा था उसके अटके-अटके शब्दों को भीतर तक, भाषा बदलकर भी वह कह नहीं पा रही थी वह सब। शब्द बदलने में कामयाबी नहीं मिली थी न उसको। कितनी शक्ति लगा गयी थी वह इतना सा बोलने में। फिर भी मैने आखिरी कोशिश की बिना किसी भूमिका के, " अब हम शादी कर सकते हैं मिनी। कल ही।" मैं चेहरे पर जबरदस्ती खुशी छलकाना चाह रहा था। पर वह गम्भीर थी, " अब कैसे? मेरी तो...तुम सब कुछ जानते हुए भी..." मैने लफ़्जों में भरपूर मिठास घोली और नकली बेपरवाही के साथ परोसा।
" सगाई-वगाई गयी भाड़ में...चल। तू कहती थी ना सिविल मैरिज...बस वही कर लेंगे।"
मैने उसे करीब खींच लिया। हालांकि उस वक्त मुझे उसे करीब लाने में और दिनों के मुकाबले कुछ ज्यादा ही ज़ोर लगाना पड़ा। फिर भी हम करीब थे। बहुत करीब। काफी दिनों बाद इतने करीब कि उसका चुम्बन लेने के लिए मुझे ज़रा सी जुंबिश देनी पड़ती अपने चेहरे को। वह खाली-खाली आँखों से कुछ पल मेरा चेहरा देखती रही और फिर अचानक मेरा भ्रम टूट गया। उसने खुद को अलग करते हुए ताना सा दिया, " जब मैं कह रही थी तब तो माने नहीं तुम। अब कह रहे हो जब...पता नहीं कैसे आदमी हो तुम..."
इसके बाद भी एक दो मुलाकात हुई उससे औपचारिक सी। वह हर बार खुश दिखी, अपनी शादी की भावी कल्पनाओं में खोई सी। मैं कभी नहीं समझ पाया कि लड़कियाँ शादी के प्रति एकाएक इतनी उत्साही कैसे हो जाती हैं। बस शादी हो रही है क्या इतना ही काफी होता है एक लड़की के चेहरे पर नयी रौनक लाने के लिए, उसको अन्दर-बाहर फूलों सा महकाने के लिए।
उसकी शादी से डेढ़ महीने पहले मैं घर आया चार दिन की छुट्टी पर। हजरतगंज के बरामदों में एक दिन अचानक वह मिल गयी। मैं बाटा के सामने जबरन चश्मा पहनाने वालों से पीछा छुड़ा रहा था, एक नया-नया दोस्त साथ में था कि वह निकली अपनी मौसेरी या चचेरी बहनों के साथ मॉडर्न सिल्क हाउस से, दोनों हाथों में भारी-भारी शॉपिंग बैग थामे। मुझे देखा, मुस्करायी और रुकी। पर मुझे अचानक जाने क्या हो गया, दोस्त का हाथ पकड़ा और तेजी से ट्रैफिक से बचता-बचाता पहुँच गया सड़क की दूसरी पटरी पर। चोर निगाहों से पीछे देखा वह अब भी मेरी तरफ देख रही थी और अपनी बहनों से कुछ कह रही थी। मेरे दोस्त की आँखों में प्रशंसा के भाव थे उसके लिए, अचरज के मेरे लिए।
अगली सुबह अभी नौ ही बजे थे, मेरा बिस्तर में होना स्वाभाविक था कि मीनाक्षी का छोटा भाई आ धमका। उसके साथ उसके घर जाना पड़ा जबरन। मीनाक्षी ऊपर वाले कमरे में थी, मुझे सीधे वहीं पटका गया। इसके पहले कि मैं कुछ कहता, भैया जा चुका था और मीनाक्षी...वह तो आप फिर उसी पुराने तेवर में थी, जो यूनिवर्सिटी के जमाने में मैं अक्सर झेला करता था।
" कल मैं रुकी वहाँ। और आप साब...क्या हालचाल भी नहीं पूछ सकते थे?
" क्या पूछना, ठीक ही होगी तुम बल्कि खुश हो।"
" अच्छा कब तक हो यहाँ? " इस बार उसका सुर थोड़ा नीचे उतरा।
" कल जाऊँगा रात को," मेरा असहाय सा जवाब था।
" फिर...कब आओगे", शरारत झलकी उसकी आवाज में।
" दो-तीन महीने बाद, जब छुट्टी मिलेगी। "
" और मेरी शादी पर... "
" देखूँगा," मैने टालना चाहा।
" देखूँगा क्या, आना है तुम्हे...समझे। " वह फिर ऊँची होने लगी।
" ठीक है, कहा ना...देखूँगा...मतलब कोशिश करूँगा। "
मैं भी झुँझला सा गया। और फूट लिया वहाँ से। नौकरी पर वापस पहुँच गया पर मन नहीं लग रहा था। उसकी शादी से एक डेढ़ हफ़्ता पहले खत आया उसका। बार-बार शादी में आने का आग्रहभरा खत। रोक नहीं पाया खुद को मैं, बहुत कमज़ोर पा रहा था अपने को, तरह-तरह के विशेषण दे रहा था---बारबार समझौते करने वाला। और इस तरह के बीसियों विशेषण घूम रहे थे दिमाग़ के इर्द गिर्द। इसी हाल में छुट्टी की अर्जी दी और उसकी शादी के दो दिन पहले ही पहुँच गया मैं लखनऊ।
उसी शाम पण्डित के चाय के होटल पर पहुँचा। पुराना अड्डा था वह हम दोस्तों का। शाम को अब भी वे सभी मिलते हैं जो इसी शहर में हैं और कुँवारे हैं। उस दिन भी चार-पाँच मिले। उन्हें आश्चर्य हुआ।
" अबे तुम तो कह गये थे, होली पर आओगे?" एक ने पूछ ही लिया। मेरे मुँह से न चाहते हुए भी निकल गया,
" वो मिनी की शादी है ना..."
बस मुस्कुरा उठे सब और बंगाली मुँहफट तो बोल ही पड़ा,
" अच्छा तो मियां माशूका की शादी में प्लेटें गिनने आए हैं।" , और गूँज उठा वह छोटा-सा कमरा जोरदार ठहाकों से। मेरे बगल में बैठे टुइयाँ गुड्डन ने सरगोशी की, " वह तुझे छोड़कर दूसरे के साथ जा रही है और तुम साले, उल्लू के पट्ठे उसकी शादी में शरीक होगे। अब साले, आ तो गया है तू लखनऊ, पर तुझे शादी की रौनक मैं नहीं बढ़ाने दूँगा।", मैने सफाई दी- " नहीं यार, तुम नहीं समझोगे, किसी ने किसी को नहीं छोड़ा, ये सब तो बस...यूँ समझो कि हम दोनों की मज़बूरियाँ थीं... "
" फिर भी यार, शादी में...तुम भी बस... "
" छोड़ यार, पता नहीं कैसा आदमी है ये..." सबके बीच रखी गर्मागर्म चाय की भाप बादल बनकर मेरे अन्दर बहुत गहरे उतर गयी, कहीं अजीब सी जगह पाकर फिर चिपक गये वे बादल। मैने चाय सिप की, मुस्कुराते हुए, शायद इसी से थोड़ी देर ये बादल छूट जायें या घुल जायें।
शादी वाले दिन दोपहर से ही मैं उसके घर पहुँच गया। छोटे-मोटे कामकाज में हाथ बटाने की कोशिश भी की। खुद हँसता रहा, हँसाता रहा उसे, उसके आसपास के लोगों को। लेकिन वहाँ का माहौल बारबार मेरे अन्दर एक दिन पहले पाण्डे की दुकान पर सुने शब्दों को याद दिला रहा था। बार-बार उसकी सहेलियाँ और हमराज़ बहनों की नज़रें टिक जातीं मुझ पर। मैने जब जब उनकी ओर देखा, सबकी आँखों में एक ही बात लिखी पायी और बादल और गहराते चले गये मेरे भीतर।
शाम होते-होते निकल पड़ा मैं वहाँ से। उसे दुल्हन के लिबास में देखने की तमन्ना तो थी पर अब हिम्मत नहीं। हिम्मत न सही, नशा ही सही। सबकी नज़रों की ताब सहने का बहाना ढूँढा व्हिस्की के एक क्वार्टर में और फिर पहुँच गया पाणडे के होटल पर। वास्तव में मुझे वहाँ बड़ा सुकून मिलता है। अभी बैठा ही था कि धनंजय आ गया, उसकी पैंट की बांयी जेब से भी एक क्वार्टर की झलक मिल रही थी। हम दोनों के पास पाण्डे भी आ गया काउंटर छोड़कर, तीनों ने पीनी शुरु की।
एक पैग अन्दर जाते ही धनंजय बौराने लगा, " क्यों गुरु, मिन्नी की शादी में आये हो ना", मैंने सिर हिलाया।
"अन्नू गुरू एक बात बताओ! हम तो सुने थे मिन्नी की शादी तुमसे होगी, आशिकी भी तो तुम्हारी चल रही थी, क्यों? फिर ये शादी...", वह उत्सुक हो उठा। पाण्डे उठकर काउंटर पर चला गया। धनंजय की नजरें टिक गयीं मुझ पर। मैने दूसरा पेग तेजी से खाली किया और हल्के सुरूर में खुलना शुरू किया- " बस यार, कुछ मामला बिगड़ गया, ऐसी मजबूरियाँ..."
" मजबूरी...तुम्हारे साथ, गैरजात तो है नहीं वो।" उसकी उत्सुकता धीरे-धीरे बढ़ रही थी नशे के साथ।
" उसकी शादी की जल्दी थी उसके घरवालों को, और जब वो लड़का ढूँढ़ रहे थे, तुम जानते हो तब मैं बेकार था।", मैं खाली गिलास नचाते हुए बोला।
हालाँकि उसे मेरा यह तर्क पचाते हुए खासी दिक्कत पेश आ रही थी, फिर भी वह संजीदा हो गया, " जाने दो गुरु, प्यार करने वालों के साथ ऐसा अक्सर होता है...अच्छा ये बताओ...सुहागरात को तो वह तुम्हे याद करेगी। न...?"
मैं जानबूझकर चुप रहा। पर वह तो जैसे सब कुछ जान लेने पर ही उतारू था, उसकी आवाज लड़खड़ायी, " मेरा मतलब...खेले तो खूब होगे गुरु तुम...उसके साथ...रोज़ ही तो टहलाते थे, तुम्हारे घर भी वह घण्टों घुसी रहती थी, गुरु...हम सब ताड़ जाते थे।" जी किया मारते-मारते या तो उसे बेदम कर दूँ या खुद बेदम हो जाऊँ। या फिर सामने रखी बोतल तोड़ूँ और घोंप दूँ उसके पेट में। लेकिन किया कुछ नहीं, बस उसे टाला,
" अरे नहीं यार, क्या बात करते हो, मैने ऐसा कुछ नहीं किया। जल्दी ही क्या थी, मैं तो सोचता था, शादी तो उसी से होनी..."
पाण्डे फिर काउंटर छोड़कर हमारे पास आ गया दूसरे पेग के जुगाड़ में। धनंजय कुछ देर चुप रहा, मेरी बात इस बार भी उसके गले से नहीं उतर रही थी। फिर भी मेरे सुर में सुर मिलाते हुए उसने एक कोशिश और की, " हाँ गुरु, ये तो है, साला शादी के पहले सब कुछ चख लो तो फिर बाद का मजा जाता रहता है...वैसे...किस-विस...तो...?" उसके चेहरे पर शरारत और रहस्यभरी मुस्कान खेलने लगी।
" नहीं यार, किस तक नहीं", मैने झूठ बोला और प्लेट में पड़ी दालमोठ के बड़े दाने समेटता धनंजय उछल पड़ा,
" अबे चूतिये, किस तक नहीं, साले इतना धाँसू माल और तूने किस तक नहीं किया, और आज तीन सौ मील से दौड़ा आया है उसकी शादी में शामिल होने के लिए...भई वाह पाण्डे देखा...कैसा आदमी है ये भी..."
मैं और बर्दाश्त नहीं कर पाया। दनदनाता होटल से बाहर निकला तो धनंजय फिर पीछे। मुझे जबरन पान की दुकान पर ले गया और माफी मांगने लगा,
" सॉरी यार, मुझे पता है, आज तू परेशान होगा, एक्सक्यूज मी यार, आई एम रियली सॉरी...लेकिन एक बात जरूर कहूँगा। मेरे साथ ऐसा होता तो मैं मण्डप से भगा ले जाता लड़की को।
मैं फिर सामान्य होने लगा, " मैने भी उससे कहा तो था कोर्ट मैरेज को।" " फिर...?", उसने पूछा। मैने उगल दिया सब कुछ शायद नशे में ही। एक बार फिर चौंक पड़ा धनंजय, " क्या? उसने भाग चलने को कहा था। तुम स्साले रहोगे हमेशा गधे, वह कह रही है मुझे भगा ले चलो तो हिम्मत नहीं पड़ी, अब जब वह दूसरे के साथ हो ली तो देवदास बने बैठे हैं, दारूबाजी कर रहे हैं... वाकई यार मैं आज तक नहीं समझ पाया कैसे आदमी हो तुम...हुँ!" , और वह दौड़कर एक रेंगती बस में लटक गया और मुझे लगा, मैं उस बस के पहियों के नीचे आ गया हूँ, फिर भी अन्दर जमे बादल छँटकर बिखर नहीं रहे।
मीनाक्षी मुझे छोड़कर चली गयी। फिर मैने यह सोचने की कोशिश भी नहीं की कि-कैसा आदमी हूँ मैं। नयी नौकरी थी, फुर्सत कहाँ। कुछ दिनों के लिए काफी कुछ भूल गया। कई बार ' कैसे आदमी हो...' सुना, महसूसा, पर परवाह नहीं की।
लेकिन इस बार होली की छुट्टियों में...उफ...तभी से बेचैन सा हो गया फिर मैं। एक मित्र के घर रात के खाने का निमंत्रण था, वहां से लौट रहा था। रात दस बजे वैसे भी सवारियाँ कम ही मिलती हैं, पर उस दिन तो मानो शहर में टैम्पो चल ही नहीं रहे थे। एक अदद टैम्पो-टैक्सी के इन्तजार में मेरी नजरें दायीं तरफ टिकी थीं खाली पड़ी सड़क पर। अचानक ऊपर से ही आ रहे दो आदमी चीखे..." किनारे भाई साहब, हटिए-हटिए किनारे।" जब तक मैं उनकी तरफ देखता, उनकी बात को समझता, तेजी से बैक होती एक मारुति कार मुझे धकेल चुकी थी। गनीमत थी, उनके चीखने से मैं अपनी जगह से थोड़ा दायों-बायें हो गया था, वरना बायीं टांग तो टूटनी ही थी। गुस्सा मुझे भीषण आया उस धक्के के साथ ही। ड्राइविंग सीट पर बैठे शख्स के पास पहुँचा। वहाँ पचास-पचपन साल का एक दुबला-पतला झुर्रीदार चेहरा दिखा। मैने पूरे गुस्से में कहा, " अन्धे हो क्या, हॉर्न नहीं बजा सकते थे बैक करते!"
" हॉर्न खराब है भइया" , उसकी मरियल आवाज़ निकली। तब तक वे लोग, जिन्होंने मुझे बचने को आगाह किया था, चार छह लोगों को बटोरकर कार की बाँयी खिड़की पर जमा हो चुके थे। मैने लहज़ा थोड़ा मुलायम किया--- " तो भी पीछे देखना तो चाहिए था न तुम्हें।" वह कुछ बोल तो नहीं पाया पर उसकी आँखों में भय तैरने लगा। मैं ढीला पड़ गया, " जाइये मेरी टांग तो नहीं तोड़ पाये। पर आगे दो-चार की ज़रूर तोड़ेंगे।", गाड़ी बढ़ गयी और वहाँ लगा जमघट, जिसमें एक दो पानवाले भी दुकान छोड़कर शामिल हो गये थे, मुझे घूरता रह गया।
मैं फिर टैम्पो की तलाश में झांकने लगा। तभी जमघटे में से एक आवाज आयी,
" भाषण दे रहे थे- हॉर्न बजाना चाइये था, देखना चाइये था, हुँह...गांधी की औलाद..." अभी जमघट छँटा नहीं था कि वही शख्स जिसने आवाज़ लगाकर मुझे आगाह किया था। बीड़ी सुलगाता हुआ आया मेरे पास- " आपने छोड़ क्यों दिया उसे?"
" बस यूँ ही", मैने टाला। वह मानने को तैयार नहीं, " अरे भाई साहब, यह तिराहा अपना है, डरने की तो कोई बात ही नहीं थी, इत्ती चोट लगी आपको और कहीं हम आवाज न देते तब तो आप नीचे ही होते, फिर भी...और एक कन्टाप जमाते आप बस...बाकी तो हम लोग थे ही, लतिया देते जमकर सब।" बाकी ने भी हाँ में हाँ मिलायी।
" छोड़िये साब, बुड्ढे आदमी से क्या मारपीट करना।" मैने फिर बात खत्म करनी चाही।
पर वे संतुष्ट नहीं हो पा रहे थे। एक बुजुर्ग सज्जन ने मुझे झिड़का, " अरे, मारपीट न सही, दवा-दारू के तो सौ-पचास निकलवा ही लेने थे, आप बस जरा-सी पैण्ट उठाते, पैसे तो हम बाप से निकलवा देते उस हरामजादे के।"
मैं बस हल्के से मुस्करा दिया, इसके सिवा और क्या करता, मुझे सूझा ही नहीं कुछ। मेरी मुस्कराहट का पता नहीं क्या मतलब लगाया उन्होंने। कइयों ने एक दूसरे का मुँह देखा और उनमें से एक आखिर बोल ही पड़ा, " वाह साब वाह, क्या आदमी हैं आप..." , और फिर सब हँस पड़े ठठाकर, कुछ ने सिर झटके, कुछ ने पान की पीक थूकी और छँटने शुरू हो गये। हर चेहरे पर था हैरत के ऊपर चढ़ा हिकारत |