सोच और संस्कारों की साँझी धरोहर

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January-2008-Issue-11

-LEKHNI-

In search of a better tomorrow...

"मत डर प्रलय झकोरों से तू/बढ़ आशा हलकोरों से तू

झण में यह अरि दल मिट जाएगा तेरे पंखों से पिसकर

खग उड़ते रहना जीवन भर"

-गोपालदास नीरज

 

 

 (सर्वाधिकार सुरक्षित)

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     संरचना व संपादन:: शैल अग्रवाल. 

संपर्क -सूत्र-  editor@lekhni.net  ,  shailagrawal@hotmail.com

    पत्रिका प्रति माह की पहली तारीख को परिवर्तित की जाती है।

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        -शैल अग्रवाल 

पेड़ 

 

हवा चली

चलती रही

मुझे गिराने को

पानी बरसा

बरसता रहा

मुझे मिटाने को

 

पर मैंने की शिकायत

न हवा से

न पानी से

 

मैंने अपनी जड़ों की पकड़

को मजबूत किया है

उनसे जो कुछ लेना था

चुपचाप लिया है

और भरा-पूरा जीवन जिया है ।

 

*

जीवन क्षितिज की निर्णायक रेखा माना धुँधली है  पर रही हमेशा से मनभावन ही। प्रो० योगेश अटल जी जो अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के  समाजशास्त्री और  मानव-विज्ञानी हैं तथा यूनेस्को के रीज़नल ऐडवाइज़र भी रह चुके हैं, उनकी यह अनूठी  कविता  पढ़ते ही मन में पैठ गयी, दोस्त बन गयी। सीधी सरल और जीने के उत्साह...एक जिजीविषा से भरपूर कविता। न सिर्फ  यह स्वावलंबी कविता  जीने की  विधा से परिचित कराती है, अपितु उसका भरपूर आनंद भी देती है। न जाने क्यों यह कविता मुझे  विश्व के कोने-कोन में बिखरे भारतीय (भारतीय ही क्यों; जीवन में डूबे सफल, असफल , नामी , बेनामी हर आदमी) की याद दिला जाती है जिसने यह जीवन जिया है या जो जीने की आस रखता है। जो निराशावादी या कुंठित नहीं हुआ है। यही नहीं मानवता की आस्था और  अमरत्व का संदेश भी देती है यह कविता। 

कभी किसी से सुना या पढ़ा था कि हम भारतीय रेत में से तेल निकालने वाले हैं...कि आलू और प्याज के बाद भारत सबसे ज्यादा असंख्य भारतीयों का ही उत्पादन और  निर्यात करता है। बात कैसे भी कही गयी हो पर मन साल गयी। पल भर को अपना अस्तित्व तक अनचाहा, बेमानी और इफरात लगा।प्रियजनों तक के लिए भी आलू,प्याज-सा 'डिसपेन्सिबिल' लगा और अचानक ही दुनिया के कोने-कोने में बसे हर प्रवासी का दर्द हृदय में उठते धुँए सा आंखों तक उमड़ आया...एक ठंडी अवहेलित भाप सा जमा पलकों को नम और बोझिल कर गया। 

सोचती हूँ पर आज इन्ही आलू प्याजों ने ही तो  विश्व को एकबार फिर अपने उसी पुराने गौरवमय भारत से परिचित कराया है। इस नयी इक्कीसवीं सदी की नित नयी समस्याओं को परंपरागत चले आ रहे अपने पुराने भारतीय ठोस समाधान देने की भरपूर कोशिश की है । एक समझदार, ब्याही बेटी-सी दोनों देशों (कुलों) की साख बढ़ायी है । विश्व की नजर में भारत को एकबार फिर उसका गौरवमय स्थान और  इतिहास दोनों ही वापस मिल पाए हैं। आज भारतीय खाना-पीना ही नहीं, भारतीय पहनावा ही नहीं, भारतीय सोच तक को यथोचित सम्मान मिल रहा है, चाहे वह तनाव का उपचार हो या फिर व्यापार का। हो सकता है इसमें हम भारतीयों की बढ़ती संपन्नता का भी स्पष्ट और बढ़ता हाथ हो  ...पर सफलता ही तो सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है।( दलाल स्ट्रीट के उछाल के साथ आज अम्बानी बंधु विश्व के सबसे धनाढ्य व्यक्ति हैं और लक्ष्मी मित्तल , हिन्दूजा बन्धु ही नहीं, सबीर भाटिटा( हौटमेल के संस्थापक) जैसे अनेक व्यक्ति मिल जाएँगे जिन्होंने भारतीय सोच और दर्शन को ही नहीं, व्यावहारिकता तक को अग्रणीय पंक्ति में ला खड़ा किया है।) श्री कमलेश शर्मा को य़ूनाइटेड नेशन्स का सचिव चुने जाना कहीं-न-कहीं तो एकबार फिर इस तथ्य की पुष्टि करता ही है कि भारत को एकबार फिर से अपना खोया सम्मान वापस मिल रहा है!

विदेशी कम्पनियों का भारत की तरफ मुड़ना भारत को एकबार फिर लैंड औफ औपर्चुनिटी तो दर्शाता ही है , खुद भारत में भी आत्म विश्वास और खुशी की एक नयी लहर-सी उमड़ आई है। पर अभी भी सोने या भूलने का वक्त नहीं; अभी तो बस हम जमीन तैयार कर रहे हैं... भविष्य की उस स्वप्निल और संपन्न इमारत की ठोस नींव उठना तो दूर अभी तो  ठीक से खुदी तक नहीं  है!    

माना एक और नयी सुबह, एक और नये वर्ष की एकबार और आ गयी है... नए स्वप्नों के नए पंखों सहारे मानवता नयी दिशा की ओर उड़ने को अग्रसर और बेचैन है। ज्ञान-विज्ञान के ये नए-नए क्षितिज, अपनी सुनहरी आभा से मंडित अवसाद को तोड़ने की ज़िद पर तो हैं पर यह कालिमा इतनी घटाघोप है कि रौशनी की लकीर फ़क उजाला नहीं बन पाती। कहीं जर्जर धरती की फिक्र है, तो कहीं टूटते-बिखरते समाज के ढांचे को संभालने की जिम्मेदारी। पश्चिम के व्यस्त समाज की  परेशानियां (बुराईयां  कहूं तो शायद अतिशयोक्ति न होगी) अब पूरब तक फैल चुकी है; पूरब जो कि उगते सूरज का प्रतीक था अब पश्चिम की नकल करते-करते पश्चिम से ही जा मिला है (विश्वीकरण का एक अनचाहा हरजाना ही समझ लें इसे।) ...वैसे ही विवेक के सूरज की पूर्ण अवहेलना कर...पूरी तरह से ढांप-निगलकर।

भौतिकता की अंधी दौड़ में आज जो संग नहीं दौड़ पाते उन्हें मात्र पीछे ही नहीं छोड़ा जाता, कुचलकर आगे बढ़ना भी आम बात हो गयी है। फिर भी बुराई नहीं, अब व्यवहारिकता या वक्त की मांग ही दिखती है इसमें। पश्चिम की तरह अब भारत में भी बुझी आँखों वाले बृद्ध मां-बाप और मां-बाप का इन्तजार करते छोटे बच्चे घर-घर में दिख जाएंगे। वृद्ध-आश्रमों की जरूरत अब भारत को भी उतनी ही महसूस होने लगी है जितनी कि अंधी दौड़ में फंसे पश्चिम को होती रही है। समाज का ढांचा भारत में भी बदल रहा है। विश्वीकरण के इस युग में जीने का तरीका ही नहीं सोच तक बदल रही है...कैसा है यह इक्कीसवीं सदी का भारत और उससे भी ज्यादा कैसा रखना चाहते हैं हम आप अपने इस देश को, खुद अपने आपको...अपनी सोच और अस्मिता को,यही सब समझने और इन्ही यक्ष प्रश्नों से जूझने का प्रयास है लेखनी। उम्मीद ही नहीं विश्वास है कि हमारे इस अभियान में आप ऐसे ही हमारे साथ कदम से कदम मिलाकर चलते रहेंगे, एक अंतहीन, आनंदमयी अंतर्यात्रा और सानिध्य का सुख लेते और देते रहेंगे!...

अमा को चीरती स्वर्णिम किरणों-सा आपका आगामी जीवन ही नहीं, हर दिन, हर पल, जीवन दृष्टि तक सफल, सार्थक व विषाद और विकारों से दूर रहे, इन्ही अशेष शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत है आपकी अपनी लेखनी-2008।...    

 

 

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सन 2007: एक सिंहावलोकन 

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एक बार फिर हम वक्त के उस मोड़ पर खड़े हैं जब अलविदा कहने से पहले मुड़कर देखने को मन करता है।

हर जाते वर्ष की तरह सन 2007 के भी अपने अलग और कई-कई तेवर रहे, कुछ सही गलत फैसले...उपलब्धियां और असफलताएँ भी रहीं जिसने इसे अन्य वर्षों से अलग अपनी एक पहचान और यादें दीं।

विश्व के फलक पर देखें तो ईराक, अफगानिस्तान और अमेरिका ...  पैलेस्टाइन और इजराइल के साथ एकबार फिर खबरों में छाए रहे।

ईराक से सैनिक कब वापस बुलाए जाएँ, बुलाए जाएं भी या नहीं, अमेरिका और इंगलैंड के लिए सरदर्द ही बना रहा। एक ऐसा सरदर्द जिसके रहते प्रसिडेन्ट बुश और उनकी पार्टी के खिलाफ उन्ही के देशवासियों ने मत दिए। विश्व-पटल पर भी बुश-नीतियों के समर्थक दिन-प्रतिदिन कम होते ही नजर आ रहे हैं। पर अभी भी इन निरर्थक और खोखली लड़ाइयों का कोई अंत हमें नजर नहीं आता। दस बिलियन डॉलर प्रति माह के खर्चे पर बुश अपनी 1, 70,000 सैनिकों की सेना को सन 2009 तक ईराक में ही रखना चाहते हैं।  इस फैसले  से वहां के नागरिकों में काफी असंतोष है। पर्यावरण से लेकर स्वास्थ्य, शिक्षा और गरीबों के लिए गृह-निर्माण आदि कई ऐसी आंतरिक और विश्व की समस्याएँ हैं जिनपर ध्यान देने की ज्यादा जरूरत है।

गरम होते पृथ्वी के तापमान को नीचे लाने के प्रयास में और कुछ हो न हो अमेरिका के वाइस प्रेसिडंट  अलगोर को इस साल का सम्मानजनक नोबल पुरुष्कार अवश्य मिल गया...वह भी विश्व में शांति के लिए पर्यावरण की तरफ किए गये प्रयासों के लिए।

मलेशिया में भी एक नया इतिहास रचा गया जब 25 नवंबर को हजारों भारतीयों की रैली को कोलालंपुर में कुचल दिया गया। लाठी चार्ज के साथ-साथ पुलिस ने भीड़ पर अश्रु-गैस के गोले बरसाए...बेरहमी से उनके साथ कड़ा व्यवहार किया गया । भारतीय मूल के नागरिकों ने ब्रिटिश सरकार से एक बड़ी रकम (4 ट्रिलियन डालर) के हरजाने की मांग की है, क्योंकि उन्होंने ही उनके पूर्वजों को श्रमिकों की तरह लाकर वहां बसाया था और मलेशिया की स्थानीय सरकार मुख्यतः दूसरे धर्म की होने के कारण उनके साथ भेदभाव का बर्ताव करती है और भारतीय मूल के लोगों को अब मलेशिया में वे अवसर नहीं मिल रहे, जो मिलने चाहिएँ।       

दूसरी तरफ ईरान की आणविक गतिविधियों पर अमेरिका काफी समय से असंतुष्ट रहा है। हारकर अब ईरान ने भी 2007 में अमेरिका को जांच की अनुमति दे ही दी है और अबसे अमरीका ईरान की आणविक गतिविधियों पर आँख रख पाएगा। ध्यान रहे कि जनवरी में ईरान ने अपनी 41 आणविक भट्टी और यूरेनियम कोषों की अमेरिका द्वारा जांच के लिए मना कर दिया था। ईरानी सरकार का कहना था कि वे सिर्फ संयुक्त राष्ट्रसंघ के प्रतिनिधियों को ही यह अधिकार देंगे। ईरानी सरकार के अनुसार उनके आणविक प्रयोग औध्योगीकरम के लिए है। अब निरीक्षण के बाद अमेरिका ने भी उनके इस दावे को सही मान लिया है।

चीन,रूस, जापान, अमेरिका, उत्तरी और दक्षिणी कोरिया इन छह देशों के संयुक्त प्रयासों और संयुक्त ट्रीटी के तहत नौर्थ कोरिया की आणविक भट्टियों को नष्ट करने का काम भी नवंबर में शुरु कर दिया गया है। नोर्थ कोरिया इतना यूरेनियम पैदा कर रही थी कि आराम से एटम बम बना सके।

भारत में आंतरिक विरोधों के कारण , भारत अमरीका की न्यूक्लीयर पावर पर संयुक्त हस्ताक्षर भी अभी टलते से ही नजर आ रहे हैं।

   लड़ाई, हिंसा और अनचाही बाढ़ और तबाही की खबरों के अलावा पाकिस्तानी मंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या दूसरी अंतर्राष्ट्रीय दिल दहला देने वाली 2007 की घटना रही।

यहां इंगलैंड में जे. के. रुलिंग द्वारा सुविख्यात हैरी पौर्टर सीरीज के अन्त की घोषणा और 3 साल की बच्ची मैडलिन मकान का स्पेन में गायब हो जाना और खुद उसके मां बाप का ही शक के घेरे में आ जाना पूरे 2007 की खबरों में रहे बिव्कुल वैसे ही जैसे कि इंगलैंड के बाजारों में भारतीय सामान छाया रहा और ब्रिटिश टेलीविजन की सीरीज बिग ब्रदर की वजह से ब्रिटिश टेलीविजन पर भारतीय फिल्म अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी छाई रही । अपने संतुलित व गरिमामय व्यवहार व सोच की वजह से सीरीज के साथ-साथ ब्रिटेन वासियों का भी मन उन्होंने जीता।

30 जून को ग्लास्को एयरपोर्ट पर हुए आतंकवादी हमले ने भारत की शांतिप्रिय छवि को भी थोड़ा बहुत दागी किया। अपराधी कफील मोहम्मद, एरोनौटिक इन्जीनियर और डॉ बिलाल अब्दुल्ला ने विष्फोटक पदार्थों से भरी जीप को ग्लास्को के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की मुख्य इमारत में ले जाकर दे मारा। जलती जीप के साथ कफील भी लपटों में फूट पड़ा था और तुरंत उपचार के बाद भी अगस्त के पहले हफ्ते में उसकी मौत भी हो गयी थी। भीड़भाड़ भरे हवाई अड्डे पर इस घटना से जो डर और चीख-पुकार का माहौल बना होगा उसकी कल्पना मुश्किल नहीं है। पुलिस ने इस सिलसिले में बाद में कुछ और लोगों ( डॉ सबील अहमद, कफील के भाई और आस्ट्रेलिया में ड़ां मोहम्मद हनीफ) को भी गिरफ्तार किया। डॉ हनीफ ने राजीव गांधी यूनिवर्सिटी , बंगलौर से पढ़ाई की थी और जब उन्हें ब्रिसबन एयरपोर्ट आस्ट्रेलिया  में गिरफ्तार किया गया, तो वह बंगलौर अपनी पत्नी से मिलने जा रहे थे। उनके यहां हाल में ही बच्चा पैदा हुआ था। उनपर आतंकवाद को शह देने का आरोप लगा ( उनका सिम कार्ड आतंक वादियों ने इस्तेमाल किया था।)जो बाद में खारिज़ भी कर दिया गया और वे भारत अपनी पत्नी और बच्चे क पास वापस लौट भी पाए। कुल मिलाकर आठ लोगों की गिरफ्तारी हुई थी।

दूसरी तरफ भारतीय मूल के पीयूष बॉबी जिन्दल पहले अश्वेत नागरिक थे जो अमेरिका में कंजरवेटिव लूजियाना के 20 अक्टूबर को गवर्नर नियुक्त किए गये। वह जनवरी 2008 में अपना कार्यभार संभालेंगे।

एक लेखिका (तस्लीमा नसरीन) मात्र अपने विचार व्यक्त करने के लिए आज भी, इस इक्कीसवीं सदी में भी दर दर भटके, यह हम सबकी...गुजरे वर्ष की क बड़ी हार ही कही जाएगी।         

यह बात दूसरी है कि भारत के सेनसेक्स के उछाल ने इस साल भारत के अम्बानी ब्रदर्स को दुनिया के सर्वाधिक धनाढ्य लोगों की पदवी पर ला बिठाया है। लक्ष्मी मित्तल के अलावा, टाटा का ब्रिटिश कोरस (स्टील) ग्रूप का टेकओवर एक ऐसी दूसरी घटना है जिससे तेजी से आर्थिक शक्ति की तरह उभरते भारत की छवि को कुछ और चमकाया है।

यूँ तो सोनिया गांधी के साथ-साथ नरेन्द्र मोदी भी हमेशा भारतीय खबरों में बने रहे। पर राम-सेतु जिसे अंग्रेज एडम्स ब्रिज भी कहते हैं, 2007 का भारत का सबसे बड़ा विवादास्पद मुद्दा रहा। व्यापारिक मार्ग (सेतु सुन्दरम) की सहूलियत के लिए प्रशस्त मार्ग करने के लिए इसे तोड़े जाने का विचार था। परन्तु सरकार के इस व्यावहारिक विचार को लोगों ने हिन्दुत्व और धर्म का एक बड़ा मुद्दा बना लिया है।

मुम्बई बम ब्लास्ट के अन्दर सौ लोगों की गिरफ्तारी, 12 को मौत की सजा और बीस को उम्र कैद की सजा देकर टाडा केस के जज ने आतंकवादियों को निश्चय ही अपनी दृढ़ता का भलीभांति परिचय दिया है । यह वही जज थे जिन्होंने मशहूर अभिनेता संजय दत्त को इस साल दो बार जेल भेजा और उनकी दिवाली तक जेल में निकलवायी परन्तु निसंदेह इस साल की सबसे बड़ी और दहला देने वाली घटना बेनजीर की हत्या थी । महीने भर  पहले  भी एक असफल  प्रयास में 150 निर्दोषों ने अपनी जान गंवाई थी। और अभी भी असंतुष्ट और क्रोधित पाकिस्तानी अवाम के बीच तोड़फोड़ और मारा-मारी का सिलसिला कायम ही है।  भारत के फिल्मी संसार में संजय दत्त के साथ-साथ सलमान खान भी अपने चिंकारा हिरण के शिकार के चक्कर में, तो कभी कटरीना कैफ से रोमांस की वजह से खबरों में बने रहे।  सबकुछ खराब ही खराब नहीं था। 2007 में बाली में पर्यावरण के हित में अमरीका का आनाकानी के बाद हस्ताक्षर कर देना, निश्चय ही आक्रान्त पृथ्वी के हित में एक अच्छी घटना थी। और भारतीय फिल्म जगत के राजकुमार अभिषेक बच्चन का रूप की राजकुमारी ऐश्वर्य रॉय से शादी ने 2007 में काफी हलचल मचाई और सभी देश विदेश की पत्रिकाओं ने इसे कवरेज भी दी । ज्ञान-विज्ञान में भी कई-कई नई और अद्भुत उपलब्धियां हुईं विशेशतः जीव कोष विज्ञान में अब शायद नली के अन्दर ही नहीं बिना पिता के भी जीव निर्माण संभव हो। कहा जाता है कि मादा के स्टेम सेल से वीर्य रचना करके नव मानव का निर्माण अब संभव है। कुल मिलाजुलाकर 2007 भी अन्य सालों की तरह एक मिलाजुला साल था जिसने हम पृथ्वी वासियों को संतोष असंतोष, सफलता-आपदा...सूखा-बाढ़ सभी कुछ दिए।     

आंसू और मुस्कानों में लिपटा 2007 विदा लेने को तैयार खड़ा है और 2008 बांहें फैलाए सामने। आइये इस नए साल का आशा सद्भाव और सुसंकल्पों से स्वागत करें!     

 

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नया वर्ष द्वार पर खड़ा है नई आशाओं और अनदेखे भविष्य का तोहफ़ा लेकर।

आखिर क्यों रहती हैं ये आँखें इतनी उत्सुक भविष्य के इस जादुई शीशे में झांकने को!

क्या जो दिखता है वह इतना मनोहारी है... 

 प्रस्तुत है मंथन में इसबार इक्कीसवीं सदी की पूर्व संध्या पर लिखा आलेख!

  युग कगार पर

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         उत्सुकता अधीरता में बदलती जा रही थी। वर्षों, महीनों, दिनों का इन्तजार अब कुछ घंटों का ही रह गया था। टकटकी बांधे बैठी शाम की बेचैन आँखों में अँधेरा भरने लगा। समय जो सर्व शक्तिमान है, सबकुछ अतीत में बदलने की ताकत रखता है, आज उसी समय के इस संधि-बिन्दु पर बैठकर समय को आँखों के आगे पलटता देखना महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक लग रहा था। कैसी होगी वह कल की सुबह? क्या सच में सबकुछ नया-नया होगा, नई सदी के उल्लास में डूबा ...कबूतर के पंखों सा उजला और उड़ने को आतुर। नयी उमंगों में नहाया हुआ, दूध से धुले बादलों सा बेदाग और साफ-सुथरा। शायद आसमान से बरसती खुशी को पेड़ सुनहरी किरणों के संग सोने-सा अपनी फुनगियों में समेट लेंगे, हर आते-जाते राही के पैरों के नीचे बिछाने के लिए; बिल्कुल वैसे ही जैसे अमलतास और पलाश के फूल चटकती धूप में चुपचाप जलते हुए पैरों के नीचे आ गिरते हैं। जाने क्यों मन मानना चाह रहा था कि कल की सुबह कुछ विशेष होगी। सुबह होते-होते पक्षी घोसलों से उड़कर आकाश में जा पहुँचेंगे और मंगल-गीत गाने लगेंगे, कुशल कलाबाजों की तरह भांति-भांति के करतब दिखाएँगे। आखिर रोज-रोज तो सदी नहीं बदलती। युग नहीं बदलता। हजारों साल इंतजार करना पड़ता है, कई जन्म लेने पड़ते हैं; तब जाकर सहस्त्राब्दि आती है! उत्साह समेटे नहीं सिमट रहा था। आँखें सपने बुनती, बड़े जोश से रात निकालने को तैयार थीं। हृदय, अपने समस्त सहवासियों की तरफ से इस आल्हादित पल को, इस धरती को, आकाश को, पेड़, पर्वत, नदी-नाले, छोटे-बड़े सभी जीव-जन्तुओं को बधाई देना चाहता था। इस पल को यादों की तह में तराश लेना चाहता था।

कहाँ से कहाँ आ गयी है हमारी सभ्यता! ...पर पाषाण-युग से लेकर आज अंतरीक्ष-यान तक का सफ़र आसान तो नहीं था। कल की तरह आज भी वही चारो तरफ बिखरा हुआ जंगल है। आज भी करीब-करीब वही जंगल के ही कानून चलते हैं। आज भी लाठीवाला ही भैंस हांकता है। शासन और शोषण करता है। यह बात और है कि अब लाठी या ताकत के नये-नये रूप उभरकर सामने आ रहे हैं। हाट और शॉपिंग-मालों से निकलकर हम ई.कामर्स के युग में जा पहुँचे हैं। अब लड़ाइयाँ सिर्फ रण-क्षेत्रों में ही नहीं, कॉमर्स-चेम्बरों में भी लड़ी जाती हैं। लड़ाइयाँ बदलीं, तो लड़ने के तरीके भी बदलने पड़े। आज किसी राष्ट्र पर आरोपित आर्थिक नियंत्रण और व्यापारिक क्षेत्र में विश्व समुदाय से बहिष्कार, उसके लिए परमाणु बम से भी ज्यादा हानिकारक सिद्ध हो सकता है। निश्चय ही इस आपाधापी के दौर में बड़ी-बड़ी उपलब्धियां भी हुईँ, कीर्तिमान भी स्थापित किए गए। इस मानव-जाति की आजकी  सहूलियतवादी सभ्यता ने वैज्ञानिक तकनीकियों से भौतिक दूरियां तो करीब-करीब मिटा ही दी हैं। समूचा विश्व आज हर मानव का क्रीडांगन और कर्मभूमि दोनों ही बन चुका है। इस नये सामीप्य के अनुभव में रिश्तों की परिभाषा बदलना भी  स्वाभाविक ही है। बदलती सुविधाओं के साथ सबकुछ सुविधानुसार बदल चुका है। आत्मिकता, भौतिकता के साथ गडमड हो चुकी है और सफ़ेद-काला सब ऐसा सलेटी हुआ है कि भावुकता और संवेदनशीलता आज कमजोरी और पिछड़ेपन का प्रतीक बनकर रह गयी है। राजा और प्रजा सबके ही मुखौटे एक हो गए हैं। क्षितिज की उस काल्पनिक रेखा की तरह कौन कहाँ  किससे  कैसे और कब मिला कहना जब दिन-प्रतिदिन मुश्किल से मुश्किलतर् होता जा रहा है, तो फिर हम इस बहुरँगी युग का सँधि-विच्छेद कैसे करें? इसके आदर्शों और प्रतिमानों को कैसे पहचानें?

काली रात की पिघलती नदी अलसाई चेतना को धीरे-धीरे जाने कब बहाती-भटकाती एक दूसरे ही जंगल में ले गयी, एक ऐसे घने जंगल में जहाँ पेड़ नहीं, जले हुए पेड़ों के ठूँठ खड़े हुए थे और जीव-जन्तुओं के अधमरे ढाँचे दम तोड़ते कराह रहे थे। वर्षों की लापरवाही और दुरुपयोग ने पृथ्वी को आकाश सहित उबलता हुआ लावा बना दिया था। सारी नदियाँ सूख चुकी थीं। जो थोड़ा बहुत पानी इधर-उधर बचा हुआ था वह आरसनिक और इँडस्ट्रियल कचरे की वजह से अब बस जहर था। समुद्र बेचारा तो कबका काली- महकती, सड़ी कीचड़ की खाइयों में पलट गया था। मौत की महकती चादर ने सबकुछ सड़ा-गला दिया था। जैनेटिकली मोटिवेटेड फसल और नसल दोनों ही जीवन से बहुत आगे जा चुकी थीं। संक्रमक और असह्य बीमारियों का गढ़ अपने साथ-साथ लिए हुए आगे बढ़ते इस प्रगतिवादी इंसान ने, उसके सभ्य समाज ने, अपनी बंद आँखों के आगे से अवांछनीय सबकुछ हटा-बढ़ा दिया था। ढक और छुपा दिया था। चारो तरफ घुप अँधेरा था और उस अँधेरे को चीरता था एक हृदय-विदारक क्रंदन। अमानवीय अट्टाहासों के बीच शायद कुछ सुनाई भी नहीं दे पाता, पर डरा-बेचैन मन उस करुण क्रंदन की डोर पकड़े जटिल जंगल में कूद गया।

सामने बैठी औरत बूढ़ी, बहुत बूढ़ी और असहाय थी और उसकी थकी-बुझी आँखों में निराशा धूप-छाँव सी आ-जा रही थी। कभी-कभी तो उन गहरी, काली पुतलियों में क्रोध की बिजलियाँ तक कौंध रही थीं। ग्लानि व मजबूरी के बादल उमड़-घुमड़ रहे थे। हताश् आँखें विश्वास नहीं कर पाईं, वह औरत कोई और नहीं मेरी अपनी धरती मां ही थी। उस अधजले, झुलसे चेहरे से अभी भी खूबसूरती झाँक रही थी। अब भी उसे दूर से ही पहचाना जा सकता था। पर दर्द उन अनगिनित बूढ़ी सिलवटों से रिसते घाव सा बह-बहकर बाहर आ रहा था। जिसके इतने बच्चे, उस मां की ऐसी दुर्दशा! इतनी दयनीय और उपेक्षित वह? मां जो शक्ति और प्यार का रूप होती है, यदि वह निस्वार्थ प्यार कर सकती है तो भरपूर सजा देने का भी तो उसे पूरा ही हक है। फिर यूँ बिलखना क्यों? मन भर आया। एक आश्वासन, एक वादे के तौर पर बढ़े हाथों ने उन थके निराश हाथों को अपने हाथों में लेना चाहा। उन आंसुओं को पोंछना चाहा। " बोलो मां, तुम्हारी यह दुर्दशा किसने की?" नाराज, हताश चेहरे को अपनी ओर करते हुए पूछा, " आखिर यह इतना दुःख, इतनी उदासी क्यों?" पर यह क्या मेरे हाथ तो खुद ही बंधे हुए थे। उनमें पड़ी हथकड़ियों की एक-एक कड़ी इस अशक्त समाज के हर मूर्ख रीति-रिवाज़, व्यक्तिगत लालच और स्वार्थ वगैरह से बनी थीं। शर्म और ग्लानि से बहते आंसुओं को पोंछते हुए मैने अपने असमर्थ हाथ उस बूढ़ी मां के कन्धों पर रख दिए, " बता मां, तेरी इस दुर्दयनीयता का जिम्मेदार कौन है? हम तेरा दुःख कैसे बांट सकते हैं? अपनी सारी कमजोरियों, असमर्थताओं के बाद भी हम मिलकर तेरा दुःख दूर करना चाहेंगे!" 

खोखले शब्दों में बुना वह बेईमान प्रश्न अपनी केंचुल से गिर पड़ा। घायल सच बनकर वहीं जमीन पर दम तोड़ने लगा। उत्तर बना आँखों के आगे बार-बार कराहने लगा। इतने सारे लोगों का पेट कैसे भरा जाए, कहां से आए इतना खाद्य पदार्थ, इतनी उर्जा? आदमी नामका दैत्य, बुद्धि से लैस धीरे-धीरे सब पर हाबी होता जा रहा है। सब हज़म करता जा रहा है, बिना रुके, बिना डकारे। अब जब इसका यह पेट नैसर्गिक खज़ानों से नहीं भर पा रहा तो इसने समुन्दर की सारी मछलियां चुन डाली हैं। पर्वतों से पूरी बनस्पति उजाड़ दी है। पृथ्वी को लूटकर अब उसकी लालची आँखें दूसरे ग्रहों पर जा टिकी हैं। सब तहस-नहस करके शुरु हो गया है चुनाव का एक और प्रकरण। बूढ़े बीमारों को हटना पड़ेगा। कमज़ोर, अनाथों को हटना होगा।      

" क्या अपने स्वार्थ में तुम मुझे यूँ ही लूटते और खसोटते रहोगे और फिर एकदिन जब सब खतम हो जाएगा, तो किसी और गृह पर जा बसोगे?" विक्षिप्त बूढ़ी धरती बारबार पूछे जा रही थी। " नहीं मां, मां का सौदा नहीं होता।" होठ बुदबुदा रहे थे और मुझे याद आ रहे थे, चंद्रमा और मार्स पर चल रहे अनवरत् नए-नए अनुसंधान। जब आख़िरी पेड़ गिर जाएगा, आख़िरी मझली मार दी जाएगी, तब...तब क्या होगा? कौन सा वह नक्षत्र है जो हमारा बोझ उठा पाएगा? सारे जानवरों को अपनी सुविधानुसार  मारकर खा जानेवाले हम, क्या एकदिन ज़रूरत पड़ने पर एक-दूसरे को ही मारकर न खा जाएँगे? शर्म से गर्दन झुकी जा रही थी। " नहीं मां " होठ फिर कांपे और कानों में दुनिया के हर कोने में चलरही लड़ाइयां गूंज उठीं। निहत्थे और गरीब तबकों पर चल रहे अत्याचारों के चलचित्र अनायास ही आँखों के आगे स्वतः प्रसारित होने लग गए। क्या फायदा इस झूठी तसल्ली से, झूठे इस उत्साह से? कौनसी ख़ुशी का जश्न मनाएँ हम पृथ्वावासी? अपनी बीमार धरती का? उन सारी असंभावित संभावनाओं का? इस आगामी सम्पूर्ण विनाश का? अगर जगे नहीं, तो शायद हमारी यह नस्ल शायद आखिरी शताब्दी मना रही होगी! सुबह की गुनगुनी किरणों ने थपकी देकर कब थकी पलकों को सुला दिया, कुछ पता ही नहीं चल पाया।

चेतना कितना ही पक्षी की तरह पंख पसारकर कल्पना के आकाश में विचर ले, यथार्थ की धरती को पीछे, बहुत पीछे छोड़ आए, पर आँखों के आगे से धरती और आकाश को जोड़ती वह क्षितिज की रेखा तो नहीं ही हटती कभी। पहली बार पता चला कि नींद भी कभी-कभी कितना ज्यादा जगा जाती है। इतनी बड़ी बेईमानी, वह भी सभी के साथ!आखिर क्यों? मन ने बहुत ठगा-ठगा-सा महसूस किया। इस नये युग की नई सुबह को देखने के लिए जाने कितने महीनों से इन्तज़ार किया था, शायद अभी भी उतनी देर न हुयी हो जितना सोच रही हूँ। उत्साही मन ने हिम्मत न हारते हुए दौड़कर कमरे और मन के दोनों ही बन्द परदे खोल दिए। किरणें फक उजाला बन चुकी थीं। पक्षी और पौधे निरुत्साह जरूर लग रहे थे, पर हताश नहीं। नया युग खास तरह से मनाना होगा। निजी स्वार्थ से निकलकर एक सामूहिक चेतना को लिए हुए...वृहद विश्व परिवार के साथ। एकसाथ ही अमीर होने के लालच में सोने के अंडे देनेवाली मुर्गी को मारदेने वाले किसान की कहानी हम सभीकी सुनी और जानी-समझी है। हमें देश, धर्म और राजनीति के संकीर्ण दायरों से निकलना होगा। मालूम था काम बहुत मुश्किल है, पर यदि सब मिलकर चाहें तो क्या संभव नहीं? बस जन-चेतना को बदलना होगा। सोचने का तरीका बदलना होगा। अपने लिये ही नहीं, पूरे विश्व के लिए सोचना सीखना होगा। भौगोलिक और जातीय चयन मात्र एक नैसर्गिक दुर्घटना है। किस देश और किस घर में पैदा होना है इसमें व्यक्ति विशेष का अधिकार या हाथ नहीं होता, फिर इस आधार पर भेदभाव और अत्याचार क्यो? इतनी सीमाएँ, त्रासता और शोषण क्यों...कहीं दर्प और गर्व तो कहीं हीनता और दयनीयता क्यों?

गलियां और सड़कें कुछ ज्यादा ही सुनसान लग रही थीं। रातभर उत्सव मनाकर लगता था पूरा शहर ही नयी सदी से बेखबर सोया पड़ा था। कोई बात नहीं दूरदर्शन तो जाग रहा था, इस प्राणहीन, आत्महीन विश्व में इक्कीसवीं सदी का स्वागत करने के लिए। उस बहुचर्चित पहली किरण को अपने चलचित्रों में हमेशा के लिए बन्द किए हुए अनवरत पूरे उत्साह से बोले जा रहा था। हर द्वीप, हर टापू पर गिरती पहली उस किरन का लोगों ने कैसे, भांति-भांति के नृत्य और संगीत से, पुष्पार्पण और शंखनाद से स्वागत किया, सब कुछ बारबार दिखाए जा रहा था। अपने देशों और दूर-सुदूर टापुओं में, कहीं आतिशबाजी से आकाश ढका था तो कहीं उड़ते रंग-बिरंगे गुब्बारों ने आकाश में पक्षियों से होड़ लगा रखी थी, पर मन था कि कचोटे ही जा रहा था। साल रहा था अन्दर ही अन्दर। कितनी सुबहों की पहली किरणें हमने देखी हैं पर क्या हमारी आनेवाली पीढ़ियां भी कुछ सुनहरा देख पाएँगी, कुछ सेलिब्रेट कर पाएँगी? या बस हमारे स्वार्थ और लापरवाही के नीचे घुटकर एकदिन यूँ ही दम तोड़ देंगी? अब इस संभावित जटिल समस्या का हल क्या है?

दुनिया को विनाश के इस कगार से एक नयी सुरक्षित दिशा में तो आना ही होगा। मन की बेचैनी आसपास बिखर गयी और आसमान का उदास मुँह जमीन तक आ लटका। इसके पहले कि वह निराश आसमान बेरुखी से करवट बदलकर सो जाए, पास खड़े ओक के पेड़ ने एड़ियों पर उचककर उसे अपनी शाखों में उठा लिया। मानो कह रहा हो, 'ना, ना, ऐसे हिम्मत नहीं हारते। मुझे मालूम है तुम बहुत बूढ़े और जर्जर हो चुके हो पर नहीं, अब यहांतक पहुँचकर, इतना साथ देकर, तुम हताश नहीं हो सकते। तुम्हें भी हम सब की ही तरह इस नयी सदी का स्वागत करना होगा। यह सदी हमने तुमने मिलकर साथ-साथ देखी है। साथ-साथ विदा की है, इसके सारे सुख-दुख मिलकर बांटे हैं। माना तुम्हारे ओजोन लेयर की चादर भी हमारे हौसलों सी फटी-टूटी है और सपनों के विस्तार से बहुत छोटी है पर आज भी छांव तो दे ही रही है। इसे ऐसे ही सबके सर पर तने रहने देना। बूढ़ा तन चलेगा, पर बूढ़ा मन नहीं। आओ चलो देखें इस नये युग को, इसके नये प्रतिमानों को। मिलकर ढूँढें इन ढीट समस्याओं के सशक्त और समर्थ हल। फलों में बीज सा छुपा सब कुछ आसपास ही मिल जाएगा।'

सुना है एक नए युग ने जन्म लिया है, एज औफ एक्वेरियस। एक नये भाईचारे का युग। अब शायद अपना ही नहीं, हम दूसरों का भी दुख बांट पाएँगे। कम से कम समझने की कोशिश तो अवश्य ही करेंगे और शायद समझ भी जाएँ। अब शायद लोग गरीब और भूख से बिलखते लोगों के पास बस चुनावों के समय फोटो सेशन के लिए ही नहीं, वरन् उनके दुख-दर्द से खिंचकर भी जाएँगे । शायद लड़ाइयां खतम हो जाएँ। ये बेबात के धमाके खतम हो जाएँ। शायद इस गरम होते मौसम के साथ-साथ लोगों के मन भी एक दूसरे के प्रति उष्मित होने लगें। प्यार और सौहाद्र की इस उठती लहर से सारा वैमनस्य, सारा कलुष धुल जाए। रिमझिम प्यार और सत्कार में भीगे हम जीना सीख ही जाएँ। आम और खास, दोनों ही इन्सान धर्म, स्वार्थ और ताकत की बैसाखियों पर ही नहीं, इन्सानियत और फर्ज के पैरों पर चलने लगें। बहुत कुछ है, जो होना चाहिए, हो सकता है और हो भी रहा है। सुना है कि कुछ वैज्ञानिकों ने तो परमाणु बमों से हटाकर अपना ध्यान जानलेवा बीमारियों के निदान की तरफ लगा दिया है। अगर  सच में ऐसा हुआ तो शायद अब हममें से कोई भी विचलित न हो, चाहे दुनिया का तापमान कितना ही असह्य क्यों न हो उठे... उलटी-सीधी खबरों का रोज ही कितना ही गुबार क्यों न उठे। बिग थौ हो या बिग फ्रीज, तब हम सब इस धरा के वासी अपने एक विस्तृत कुनबे के साथ हर संभावना से लड़ने को तैयार जो हो चुके होंगे। सुख-दुख दोनों को बांटना सीख चुके होंगे। हो सकता है हममें भी एक नया बोध हो ही जाए और हम भी जान जाएँ कि पृथ्वी हो या इन्सान, उबलते ज्वालामुखी उगलने के बाद कितना ठंडे हो जाते हैं। और हर बार बचाने के लिए नोहा और उसका जहाज भी नहीं ही आ सकता। आज हमें पता चल गया है कि हर स्थिति को एक बेहतर स्थिति में परिवर्तित करने की संभावना भी उसी में रहती है जैसे कि ये उबलते ज्वालामुखी ही थक और चुक जाने पर शान्त झीलों में बदल जाते हैं। आज हम एक नए ज्ञान-विज्ञान के युग में पैर रख चुके हैं। और अब शायद हमें एक दूसरे से डरने की जरूरत नहीं। ना ही एक दूसरे पर बेवजह शक करने की। अब हम खुद अपना ध्यान अपनी परेशानियों से हटाने के लिए पड़ौसियों के यहां उपद्रव करने नहीं जा पहुँचेंगे। ना ही पिछड़े और गरीब समाजों पर अत्याचार करके उन्हें शिष्टाचार और मानव अधिकारों की दुहाई ही देने की जरूरत पड़े कभी। दादागिरी करने के बाद पसीना पोंछते हुए 'जीने और जीने दो' का, मानवता का खोखला सबक अब कोई पढ़ाने नहीं आए, क्योंकि शायद कहीं हमने युगों के दायरों के संग मनों के दायरे भी बढ़ा ही लिए हों।... 

अंदर से फूटी उजाले की किरण होठों पर आ बैठी। सबके साथ बांटने को मन मचलने लगा। कलम कागज पर नए जोश से दौड़ने लगी। खुशी का आवेग संक्रामक था। नये वर्ष, इस नई सदी की पहली खबर सुखद थी। हाइजैक्ड यात्री सकुशल अपने अपने घरों को जा रहे थे। पक्षियों ने फिर से चहकना शुरु कर दिया। सोई सड़कें जग गईं। शोर-शराबे और कहकहों के बीच चुपचाप एक नयी समझ की स्मिति होठों पर आ बैठी और उसी फटी-पुरानी ओजोन लेयर का कोट पहनकर सूरज ने आकाश में फिर से खुशी-खुशी घूमना शुरू कर दिया। नए युग का वास्तविक स्वागत करने क्यारियों में मुस्कुराते हुए फूल  भी निकल आए और यही नहीं, उन्होंने आकाश में ऊंची उड़ान लेते पक्षियों का आनन्द समझना और महसूस करना तक शुरू कर दिया। और हो भी क्यो न, ताजी ऑक्सीजन देती हवा तो दोनों के ही पास थी। अब किसी को किसी से स्पर्धा करने की जरूरत नहीं। पूरे विश्व की बिछी आँखें, इच्छित उपहार लिए, कल्पतरु सी सजी-संवरी, सामने खड़ी और गले मिलने को आतुर इक्कीसवीं सदी का स्वागत करने को अधीर ही नहीं, आज शायद तैयार भी हैं। और आकाश में बैठा वह सृजनहार भी अब पहली बार अपनी सृष्टि को देखकर चैन से मुस्कुरा सकता है, अपने इन्ही जागरूक इक्कीसवीं सदी के स्व-भाग्यनिर्माताओं की तरह ही। शायद अब उसकी सृष्टि व्यर्थ नहीं। वैदिक काल में शुरू किए गए उस सर्वे भवन्तु सुखिनः वाले तप की समिधाओं ने मानव-चेतना की चिनगारियों को पकड़ ही लिया है आखिर। शायद अब उसे बारबार इस धरती पर नहीं आना पड़ेगा। हजारों साल कम तो नहीं होते बुद्धि को जगाने के लिए। वैसे भी यदि डार्विन की विकास वाली थ्योरी सही है तो उम्मीद है कि यह इक्कीसवीं सदी बीसवीं सदी से हर हालत में बेहतर ही होगी। बस देखना यह है कि हम बन्दरों के अग्रज अपनी गुफाओं से निकलकर, अब मानवता के आगे किधर जाते हैं!                   

               

                                                                                                       --शैल अग्रवाल 

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धरोहर में इसबार 26 जनवरी के शुभ अवसर पर विशेष शुभकामना संदेश

दो ओजमयी कविताएं भावी पीढ़ी के नाम...

 

 

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उठो धरा के अमर सपूतो

पुनः नया निर्माण करो ।

जन-जन के जीवन में फिर से

नई स्फूर्ति, नव प्राण भरो ।


नया प्रात है, नई बात है,

नई किरण है, ज्योति नई ।

नई उमंगें, नई तरंगे,

नई आस है, साँस नई ।

युग-युग के मुरझे सुमनों में,

नई-नई मुसकान भरो ।


डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ

नए स्वरों में गाते हैं ।

गुन-गुन, गुन-गुन करते भौंरे

मस्त हुए मँडराते हैं ।

नवयुग की नूतन वीणा में

नया राग, नवगान भरो ।


कली-कली खिल रही इधर

वह फूल-फूल मुस्काया है ।

धरती माँ की आज हो रही

नई सुनहरी काया है ।

नूतन मंगलमयी ध्वनियों से

गुँजित जग-उद्यान करो ।


सरस्वती का पावन मंदिर

यह संपत्ति तुम्हारी है ।

तुम में से हर बालक इसका

रक्षक और पुजारी है ।

शत-शत दीपक जला ज्ञान के

नवयुग का आव्हान करो ।


उठो धरा के अमर सपूतो,

पुनः नया निर्माण करो ।

 

*

 

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इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है।
     
देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से
      सिंचित करो धरा,
समता की भाव वृष्टि से
           जाति भेद की,
धर्म-वेश की
          
काले गोरे रंग-द्वेष की
          
ज्वालाओं से जलते जग में
इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥

नये हाथ से
,
वर्तमान का रूप सँवारो
नयी तूलिका से चित्रों के रंग उभारो
          
नये राग को नूतन स्वर दो
          
भाषा को नूतन अक्षर दो
          
युग की नयी मूर्ति-रचना में
इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है॥

लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है
जीर्ण-शीर्ण का मोह मृत्यु का ही द्योतक है
           तोड़ो बन्धन,
रुके न चिन्तन
           गति,
जीवन का सत्य चिरन्तन
          
धारा के शाश्वत प्रवाह में
इतने गतिमय बनो कि जितना परिवर्तन है।

चाह रहे हम इस धरती को स्वर्ग बनाना
अगर कहीं हो स्वर्ग
,
उसे धरती पर लाना
           सूरज, चाँद, चाँदनी,
तारे
          
सब हैं प्रतिपल साथ हमारे
          
दो कुरूप को रूप सलोना
इतने सुन्दर बनो कि जितना आकर्षण है॥

 

- द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

 

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कविता आज और अभी

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समय

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समय को आकार देती ये कलम

क्यों कर अब खामोश है

नए आयाम की

मौन आकृति की

वृत्ति का प्रतिकार है

समय को आकार देती  ये कलम

मेरी ये खामोश कलम

मदमस्त, मदहोश जवानी

ये लम्हों की रवानी है

पर लम्हा

कौन सा लम्हा

ठहरूं

जरा सोचूं

पर मैंने तो जिया नहीं

प्याला अभी जी भर पिया नहीं

रेत की तरह फिर बहा लम्हा

यों क्योंकर खामोश  है

समय को आकार देती मेरी ये कलम

                                      ----अरुणा घवाना

 

 

 

प्रभात

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जाग जाग है प्रात हुई,
सकुची, लिपटी, शरमाई ।
 
अष्ट अश्व रथ हो सवार
रक्तिम छटा प्राची निखार
अरुण उदय ले अनुपम आभा
किरण ज्योति दस दिशा बिखार ।
 
सृष्टि ले रही अंगड़ाई,
जाग जाग है प्रात हुई ।
 
कण - कण में जीवन स्पंदन
दिव्य रश्मियों से आलिंगन
सुखद अरुणिम ऊषा अनुराग
भर रही मधु, मंगल चेतन
 
मधुर रागिनी सजी हुई
जाग जाग है प्रात हुई ।
 
अंशु-प्रभा पा द्रुम दल दर्पित
धरती अंचल रंजित शोभित
भृंग - दल गुंजन कुसुम - वृंद
पादप, पर्ण, प्रसून, प्रफुल्लित ।
 
उनींदी आँखे अलसाई
जाग जाग है प्रात हुई ।
 
रमणीय भव्य सुंदर गान
प्रकृति ने छेड़ी मद्धिम तान
शीतल झरनों सा संगीत
बिखरते सुर अलौकिक भान ।
 
छोड़ो तंद्रा प्रात हुई
जाग जाग है प्रात हुई ।
 
उषा धूप से दूब पिरोती
ओस की बूंदों को संजोती
मद्धम बहती शीतल बयार
विहग चहकना मन भिगोती ।
 
देख धरा है जाग गई
जाग जाग है प्रात हुई ।
 
     -कवि कुलवंत सिंह

 

 

 

 

एक बरस बीत गया

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झुलासाता जेठ मास
शरद चाँदनी उदास
सिसकी भरते सावन का
अंतर्घट रीत गया
एक बरस बीत गया

सीकचों मे सिमटा जग
किंतु विकल प्राण विहग
धरती से अम्बर तक
गूँज मुक्ति गीत गया
एक बरस बीत गया

            अटल बिहारी बाजपेयी

 



 

नव- वर्ष!

 

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तुम्हारा स्वागत-सत्कार

चाहते हुए भी न कर सका!

तुम्हारे शुभागमन के पूर्व

कई दिनों से

विविध आयोजनों की

रूपरेखा बनाने का विचार

मन में आता रहा,

न जाने क्या-क्या अभिनव अनूठा समाता रहा,

पर, कार्यरूप में

तनिक भी परिणत न कर सका उसे!

 

हे नव वर्ष!

तुम आ गये बिना किसी धूमधाम के?

और मैं

तुम्हें प्यार भरी भुजाओं में

चाहते हुए भी न भर सका!

 

हे नव वर्ष!

तुम सचमुच कितने उदास हो रहे होगे!

तुम्हारे अभिनन्दन में इस बार

एक क्या अनेक कविताएँ लिखना चाहते हुए भी

एक पंक्ति भी

तुम्हें समर्पित न कर सका!

 

अरे, यह क्या हुआ?

कुछ भी तो स्मरणीय विशिष्ट घटित हो जाता 

जीवन- नाटक का

मंगलाचरण या पटाक्षेप!

पर, कुछ भी तो नहीं हुआ;

मात्र पूर्वाभ्यास  का बोध होता रहा!

 

हे नव वर्ष!

तुम्हें जीवन-क्रमणिका में

महत्त्वपूर्ण स्थान दिलाने की साध लिए

जागता… सोता रहा!

चाहते हुए भी

न जी सका - न मर सका!

    -महेन्द्र भटनागर

 

 

 

 

 

वर्षगांठ पर

 

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यदि सबकुछ किसी तरह

रह जाता शेष

ज्यों का त्यों

परिवर्तनों की आशा में

सपनाता हुआ

एक आदर्शलोक के लिए...

यदि जो

अनन्य था अभिन्न था

सटा रहता था वक्ष से प्रतिफल, फिर

लौट आता और

बातें अपने को दोहरातीं...

यदि जीवन एकबार

फिर जिया जा सकता

एक पारे जैसे स्वप्न के इर्द-गिर्द...

यदि शब्द

अपने को व्यक्त कर पाते

पर्तों में नहीं

रंगों में...

आज मैं भी

एक मोमबत्ती जला देता

जश्न मनाता

इस एक और गुजरते हुए

वर्ष के लिए

        सत्येन्द्र श्रीवास्तव

 

 

 

 

 

 

 

 द्वार  थपथपा रहा

 

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अतीत संग विदा हुआ

विवादों का सिलसिला

कदम नव बढ़ा रहा

जिन्दगी का हौसला

मशाल ले आ रहा

द्वार थपथपा रहा।

 

कश्मीर के हिमशिखर

सोचो तो पहाड़ पर

जवान देशों के जहां

लेकर जान हाथ पर

तुम चैन से सांस लो

विश्वास नव दिला रहा

द्वार थपथपा रहा।

 

मन में कहीं डर न हो

सर ऊँचा उठा सको

गले-गले मिला सको।

मुक्त कंठ गा सको।

शांति गीत गा रहा

द्वार थपथपा रहा।

 

जन जन की पूरी हों

बुनियादी जरूरतें

संघर्षों से जुड़ी हो

सूरज की प्रथम किरण

समय की पुकार बन

द्वार थपथपा रहा।

 

खेतों में हरा भरा

भाग्य की मांग में

कर्म के स्वांग में

दिख रहा विभूति है

समय से मन्त्रणा

जीवन का दुख

हर्ष दर्शन करा रहा

द्वार थपथपा रहा।

 

श्रीलंका या नेपाल हो

वहां शांति वास हो

जब पड़ोसी हो दुखी

कैसे चैन साथ हो

विश्व में हंसी-खुशी

ढोल जो बजा रहा

द्वार थपथपा रहा।

       शरद आलोक 

 

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   कहानी (समकालीन)

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-अरुण अस्थाना 

कैसा आदमी हूँ मै!

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" कैसे आदमी हो यार! एक छिपकली से डर गये..." नरेन ने खीझकर कहा और चादर खींच ली। 

" नहीं यार..." मैं झेंप मिटाने की कोशिश करने लगा," असल में डर नहीं, मुझे खिन लगती है छिपकली से...नाम से ही... साली लिजलिजी...", इससे पहले कि मैं पूरी सफाई दूँ, उसकी नाक फिर बजने लगी है।

मैने बिस्तर की चादर झाड़ी और लाइट औफ़ कर फिर से सोने की कोशिश कर रहा हूँ। लेकिन अब नींद नहीं आ रही। दिमाग में बार-बार नरेन का खीझभरा स्वर घूम रहा है-' कैसे आदमी हो यार !' 

दिमाग़ को खाली करने की मैं भरसक कोशिश कर रहा हँ, सभी सोचों को लगातार धकिया रहा हूँ। चन्द लम्हों को लगता भी है खालीपन, पर अचानक फिर कोई वाकया घूम जाता है आँखोंके सामने किसी फिल्म की तरह-कैसे आदमी हो...

बिस्तर पर बैठ जाता हूँ पालथी मारकर। नींद न आना तो आम बात है मेरे लिये फिर मैं सोचता हूँ, बाहर ज़रा चहलकदमी कर लूँ तो शायद नींद आ जाये। टहलना अच्छा रहा है आधी रात को। अंदर पंखे की हवा झेली नहीं जा रही। खुश हूँ मैं, बाहर की ठंडी हवा अपना असर जरूर दिखायेगी, यह सोचकर। मैं सो सकूँगा। कुत्तों को मेरा टहलना रास नहीं आ रहा। सोनी साहब जाग गये हैं, बाहर बरामदे में ही सोते हैं न वो, " कौन? अच्छा...आप, आनन्द बाबू, क्या हुआ... "

" कुछ नहीं, बस यूँ ही..., सोने ही जा रहा हूँ, बड़ी गरमी है...सो..." मुझे लग रहा है कुत्ते जरा देर में दुनिया भर को जगा देंगे और फिर सब मुझे ही गरियायेंगे-" कैसे आदमी हो..."

मुझे मजबूरन वापस घर में घुसना पड़ा है। सोच रहा हूँ कुछ पढ़ लूँ तो शायद नींद आ जाये। लेकिन पढ़ने के लिये तो लाइट जलानी पड़ेगी। लाइट जलायी तो नरेन फिर जग जायेगा। फिर...कैसे आदमी हो यार'... मेरे दिमाग में ये शब्द लगातार हथौड़े मार रहे हैं। गुस्सा आ रहा है नरेन पर, क्यों कहे उसने ऐसे वर्ड्स मेरी तो पूरी रात खराब कर दी और खुद तानकर सोया है।

अब सिगरेट की तलब जोर मार रही है। तकिये के नीचे एक पड़ी है सुबह के लिए। चलो सुबह इमरजेंसी छाप बीड़ी काम आयेगी। दीवार की टेक लगाकर बैठा हूँ, दिमाग अभी भी वहीं है।

' कैसे आदमी हो...' कितनी बार सुन चुका हूँ ये शब्द, कितने संदर्भों में कितने तरीके से सुना है मैने, शब्द अलग-अलग हुए तो क्या, मायने तो वही रहे न हमेशा। अक्सर शब्द भी नहीं हुए लेकिन महसूस कराया गया मुझे-कैसा आदमी हूँ मैं!

वाकई आज की वह छिपकली वाली बात तो बड़ी छोटी है, न के बराबर। मैं शायद अब तक दोबारा सो भी चुका होता। यह भी तय है कि सुबह तक मैं इस बावत सब कुछ भूल चुका होता अगर नरेन ने यह न कहा होता-' कैसे आदमी हो यार', नरेन के इन शब्दों ने मुझे बहुत भीतर तक जगा दिया है, फिर कई रातों न सोने के लिए। खँगालने लगा हूँ मैं अपने आपको, ' आखिर कितना अनबूझा हूँ मैंमेरे अन्दर से वे सभी घटनाएँ-दुर्घटनाएँ एकाएक बाहर आ गयी हैं, घेर लिया है, जकड़ लिया है मुझे सबने। चिल्ला-चिल्लाकर पूछ रहे हैं सब-' कैसा आदमी हूँ मैं...'

जवाब नहीं है मेरे पास, मिल भी नहीं रहा...उहं...सिगरेट ने उंगलियां जला दीं तकिया पटककर एक बार फिर सोने चला हूँ। लेटे-लेटे धकेल रहा हूँ दिमाग से उन सबको। कोशिश नाकाम। उठकर बैठना पड़ा है मजबूरन। इमरजेंसी छाप बीड़ी के बण्डल से एक बीड़ी निकाल सुलगाते हुए मेरे दिमाग़ में ' कैसे आदमी हो...से जुड़ी सारी घटनाएँ क्रोनोलॉजिकल आर्डर में उभर रही हैं। मैं रोक नहीं पा रहा अब उन्हें, वापस खदेड़ना कतई नामुमकिन है अब।

हाँ, शहर के सबसे अच्छे स्कूल से हाईस्कूल पास किया था मैने। फर्स्ट क्लास, दो डिस्टिंक्शन। इसके बावजूद मैं उस स्कूल में आगे पढ़ने को तैयार नहीं था। पिताजी से कहा, उन्होंने साफ इन्कार कर दिया। दूसरे स्कूल उन्हें बिलो स्टैंडर्ड लगते थे। मैं अड़ा रहा, उसी स्कूल में नहीं गया। पिताजी झुके पर तब तक देर हो चुकी थी। जिन स्कूलों को वे कुछ अच्छा समझते थे सभी में एडमीशन क्लोज्ड। पिताजी की झल्लाहट लगातार बढ़ती जा रही थी, सबसे कहते, " सब साले मक्कार हैं, बैकडोर से सोर्सवाले का एडमीशन कर रहे हैं। लेकिन एक अच्छे स्टूडेंट को लेने में नानी मरती है। सोर्स के कतई खिलाफ थे वह। खैर एक थर्ड क्लास ( पिताजी की नजरों में) स्कूल में दाखिला मिला मुझे। दाखिले के समय वहाँ के प्रिंसिपल ने पूछा, " तुमने इतना अच्छा स्कूल क्यों छोड़ा?" प्रिंसिपल भले लगे। सो मैने सब कुछ सच-सच बताना ही उचित समझा... " सर वो, वहाँ हर टीचर विनोद को सिर्फ इसलिए डाँटता था क्योंकि एक तो वह ट्यूशन नहीं पढ़ता था और दूसरे---सूती यूनिफॉर्म पहनता था, इसलिए... " प्रिंसिपल ने मुझे अजीब सी नजरों से देखा, दो बार गर्दन हिलाई और फिर उनके मुँह से निकला... " कैसे लड़के हो भई तुम... "

इत्ती-सी बात के लिए मुझे हैरत से देखा गया। हैरत हुई मुझे इस पर तब। इसके बाद भी बीसियों बार जूझना पड़ा है अपने कामों में हैरत वाला हिस्सा ढूँढने के लिए, जब जब मुझे कुछ ऐसा सुनना पड़ा है, तब-तब- " कैसे आदमी हो तुम..." 

असल में मैने उसी साल यूनिवर्सिटी में पैर धरे थे, सो रंग चढ़ना शुरु ही हुआ था। मैं भी अपनी साइंस फैकल्टी की जगह आर्ट्स में ज्यादा इंटरेस्ट लेता था। अपने कुछ और साथियों की तरह। हम नये नवेलों की धारणा थी कि आर्ट्स की लड़कियाँ फ्लर्ट करने में ज़्यादा तेज होती हैं इसलिए।

आर्ट्स की तरफ जाते हालाँकि मैं घबराता भी था। मीनाक्षी की वजह से। वह वहीं थी ना। लेकिन वहाँ की रंगीनी से मुँह भी नहीं मोड़ पाता था। और मीनाक्षी...हर बात में नसीहत देना उसकी आदत में शुमार " ऐसा क्यों किया... ", " नीली पैंट पर नीली शर्ट ही क्यों पहनी...", " धूप में यहाँ क्यों टहल रहे हो..." वगैरह वगैरह...असल में हम पड़ोसी थे, बचपन के साथी। एक ही दरजे में पढ़ते थे---मैं बी. एस. सी. वन में, वो बी. ए. वन में। हमने दोस्ती के तहत जो अधिकार एक-दूसरे को दे रखे थे उनमें नसीहत देना उसने अपनी तरफ ज़्यादा जोड़ लिया था, पर यह मुझे अच्छा लगने लगा था। अक्सर मैं मान भी जाता।

साल गुज़रते-गुज़रते हमें पता लग गया था कि हम कितने करीब हैं। मैं तरह-तरह की फिल्में देखता, साहित्यिक उपन्यास पढ़ता। मिल्स एँड बून्स में भरा रोमांस खंगालता। पर समझ नहीं पाता कि किसी 'यूनीकतरीके से कैसे खुद को एक्सप्रेस करूँ। हालाँकि हम घंटों साथ रहते। बतियाते, गपियाते, पर प्रेम तक पहुँचते-पहुँचते ठहर जाते, सीधा छूटकर बगल वाली गली में घुस जाते और फिर वीरान गली का सन्नाटा हमारे बीच ठहरा रहता, चुप्पी की शक्ल में। 

वह उस दिन मेरे कमरे में ही बैठी जगजीत सिंह को सुन रही थी। आँखें बन्द, पूरी तरह खोयी हुई। संगीत उसे कुर्सी के दो पायों पर टिकाये झुला रहा था। अचानक मैने कैसेट रिकॉर्डर बन्द कर दिया। वह ज़मीन पर आ गई, घूरा मुझे। मैने चुपचाप नजर झुकाये हुए अपनी नोटबुक से एक काग़ज़ फाड़ा और उसे तहाकर उसकी जेब में डालता हुआ तेज़ी से बाहर निकल गया।

करीब पाँच मिनट बाद जगजीत फिर गूँज रहे थे। मैने कमरे में झाँका, वह फिर झूल रही थी। मेरी आहट पर उसने कैसेट रिकॉर्डर बन्द किया। मुझ तक आयी। मेरा हाथ पकड़कर खिड़की तक ले गयी और अपने खद्दर के कुर्ते की जेब से वही काग़ज़, जिस पर मैने न जाने कितनी दफ़ा उसका नाम लिखा था, निकालते हुए बोली, " कितना परेशान किया मुझे, बहुत देर से करते हो तुम हर काम...आलसी! शरमाते रहे...कभी मेरी डायरी देखना...", और फिर वही काग़ज़ मेरी जेब में ठूँसते हुए बोली

" परेशान हो गएकैसे हो तुम..."

यूँ मेरे प्रेम की औपचारिक शुरुआत भी हुई तो उन्ही लफ्ज़ों से। खैर हमारा प्रेम भी वैसा ही था जैसा आमतौर पर होता है, हम हवाई किले बनाते भविष्य के, शिकायतें करते, लड़ते-झगड़ते, मानते-मनाते। अचानक एक दिन उसकी माँ ने मुझसे पूछ लिया, " मीनाक्षी से शादी करोगे?",  " हाँ, पर आप समय आने पर मम्मी पापा से बात कर लीजिएगा एक बार", मैने बेबाक कहा।   

" समय आने पर...! कब आएगा समय, पढ़ाई तो तुम्हारी खतम हो गयी ना, जल्दी से नौकरी करो अब।" तमककर बोलीं वो नौकरी जैसे पेड़ पर टंगी थी।

मैने उन्हें समझाने की कोशिश की, " देखिये, अभी बड़े भैया की शादी भी होनी है, वह तो हो जायेगी इसी साल, लेकिन नौकरी लगने में तो कुछ समय... " , आखिर एक साल की मोहलत मिली मुझे। 

लेकिन मुझे नौकरी नहीं मिली। पूरा साल तो निकल ही गया। छः महीने करीब ऊपर भी हो गये। मैने मीनाक्षी की तरफ जाना कम कर दिया। 

इन्ही कम होती मुलाकातों के बीच एक दिन मीनाक्षी ने बताया, " मेरी शादी की बात चल रही है घर में, शायद कुछ लोग मुझे देखने आने वाले हैं दो-चार-पाँच दिन में।" मैने सुझाया, " कर सको तो इनकार कर दो।" 

वह बोली, " नहीं अनु, हम सिविल मैरिज क्यों न कर लें, फिर अगर किसी ने मुझ पर शादी के लिए दबाव डाला तो मैं बता दूँगी, नहीं तो तुम्हें जॉब मिलते ही...बस।" मैंने आदर्शों की किताब खोली और उसे समझाया, " नहीं, बस इस महीने और वेट करो, एन. टी. पी. सी. में इंटरव्यू बहुत अच्छा हुआ था, और अब तो तीन महीने हो गये हैं, कॉल किसी दिन भी आ सकती है। समझो बात को मिनी, तुम्हारे मम्मी-पापा को धोखा देना मैं नहीं चाहता।" उसका चेहरा दोनों हाथों में लेते हुए मैने उसे ढाढ़स बँधाने की भरपूर कोशिश की," डोंट बी डिस्हार्टेंड मिनी, मैं जल्दी ही तुम्हारी मम्मी से बात करता हूँ।" 

मैने उसका चेहरा करीब लाना चाहा पर उसने खुद को छुड़ा लिया। पहली बार हुआ ऐसा। वह मेरे हाथों को जोर से पकड़े मेरी आँखों में तैरते भावों को नापती-तौलती रही।

जब तक कॉल आयी तब तक उसकी सगाई हो चुकी थी। मैं रोक नहीं सका। कोशिश ही नहीं की। लेकिन नौकरी मिलने पर जोश फिर ठाठें मारने लगा। मैं उससे मिलने गया। मम्मी मिलीं उसकी। मैने उन्हें अपनी नौकरी लगने की खबर सुनाई और मीनाक्षी से मिलने की इच्छा जाहिर की। उबल पड़ीं वो, " कैसे आदमी हो जी तुम...मालूम है तुम्हें, उसकी सगाई हो चुकी है। अब तो पीछा छोड़ो उसका।" मैं उल्टे पाँव लौट आया।

 दूसरे दिन ही मीनाक्षी आयी मेरे घर। मैं उसे देखते ही फिर उछल पड़ा। जल्दी जल्दी कपड़े चेन्ज करके आया और बोला,

" चलो, "  " कहाँ?" उसका यह सवाल मेरे लिए उससमय कतई अप्रत्याशित था।, असल में मैं ज्यादा खुशी में तत्कालीन परिस्तियों को भुला भुला बैठा था ना। मैने फिर भी लापरवाही से कहा," कहीं भी। कहीं बैठना है थोड़ी देर।" " नहीं बातें ही तो करनी है ना हमें। फिर यहीं क्यों नहीं..." अब वह समझा रही थी मुझे। " देखो अनु, यू नो कि अब मेरी...प्लीज़, डोण्ट टेक इट अदरवाइज हाँ, तुमसे क्या कहना अब... आयी एम एंगेज्ड, मैं तुम्हारे साथ बाहर नहीं जा सकती अब...समझो जरा...वो लोग भी इसी शहर में रहते हैं ना..." 

मैं पढ़ रहा था उसके अटके-अटके शब्दों को भीतर तक, भाषा बदलकर भी वह कह नहीं पा रही थी वह सब। शब्द बदलने में कामयाबी नहीं मिली थी न उसको। कितनी शक्ति लगा गयी थी वह इतना सा बोलने में। फिर भी मैने आखिरी कोशिश की बिना किसी भूमिका के, " अब हम शादी कर सकते हैं मिनी। कल ही।" मैं चेहरे पर जबरदस्ती खुशी छलकाना चाह रहा था। पर वह गम्भीर थी, " अब कैसे? मेरी तो...तुम सब कुछ जानते हुए भी..." मैने लफ़्जों में भरपूर मिठास घोली और नकली बेपरवाही के साथ परोसा। 

" सगाई-वगाई गयी भाड़ में...चल। तू कहती थी ना सिविल मैरिज...बस वही कर लेंगे।"

मैने उसे करीब खींच लिया। हालांकि उस वक्त मुझे उसे करीब लाने में और दिनों के मुकाबले कुछ ज्यादा ही ज़ोर लगाना पड़ा। फिर भी हम करीब थे। बहुत करीब। काफी दिनों बाद इतने करीब कि उसका चुम्बन लेने के लिए मुझे ज़रा सी जुंबिश देनी पड़ती अपने चेहरे को। वह खाली-खाली आँखों से कुछ पल मेरा चेहरा देखती रही और फिर अचानक मेरा भ्रम टूट गया। उसने खुद को अलग करते हुए ताना सा दिया, " जब मैं कह रही थी तब तो माने नहीं तुम। अब कह रहे हो जब...पता नहीं कैसे आदमी हो तुम..." 

इसके बाद भी एक दो मुलाकात हुई उससे औपचारिक सी। वह हर बार खुश दिखी, अपनी शादी की भावी कल्पनाओं में खोई सी। मैं कभी नहीं समझ पाया कि लड़कियाँ शादी के प्रति एकाएक इतनी उत्साही कैसे हो जाती हैं। बस शादी हो रही है क्या इतना ही काफी होता है एक लड़की के चेहरे पर नयी रौनक लाने के लिए, उसको अन्दर-बाहर फूलों सा महकाने के लिए।

उसकी शादी से डेढ़ महीने पहले मैं घर आया चार दिन की छुट्टी पर। हजरतगंज के बरामदों में एक दिन अचानक वह मिल गयी। मैं बाटा के सामने जबरन चश्मा पहनाने वालों से पीछा छुड़ा रहा था, एक नया-नया दोस्त साथ में था कि वह निकली अपनी मौसेरी या चचेरी बहनों के साथ मॉडर्न सिल्क हाउस से, दोनों हाथों में भारी-भारी शॉपिंग बैग थामे। मुझे देखा, मुस्करायी और रुकी। पर मुझे अचानक जाने क्या हो गया, दोस्त का हाथ पकड़ा और तेजी से ट्रैफिक से बचता-बचाता पहुँच गया सड़क की दूसरी पटरी पर। चोर निगाहों से पीछे देखा वह अब भी मेरी तरफ देख रही थी और अपनी बहनों से कुछ कह रही थी। मेरे दोस्त की आँखों में प्रशंसा के भाव थे उसके लिए, अचरज के मेरे लिए।

अगली सुबह अभी नौ ही बजे थे, मेरा बिस्तर में होना स्वाभाविक था कि मीनाक्षी का छोटा भाई आ धमका। उसके साथ उसके घर जाना पड़ा जबरन। मीनाक्षी ऊपर वाले कमरे में थी, मुझे सीधे वहीं पटका गया। इसके पहले कि मैं कुछ कहताभैया जा चुका था और मीनाक्षी...वह तो आप फिर उसी पुराने तेवर में थी, जो यूनिवर्सिटी के जमाने में मैं अक्सर झेला करता था।

" कल मैं रुकी वहाँ। और आप साब...क्या हालचाल भी नहीं पूछ सकते थे?

" क्या पूछना, ठीक ही होगी तुम बल्कि खुश हो।"

 " अच्छा कब तक हो यहाँ? " इस बार उसका सुर थोड़ा नीचे उतरा।

 " कल जाऊँगा रात को," मेरा असहाय सा जवाब था। 

" फिर...कब आओगे", शरारत झलकी उसकी आवाज में।

" दो-तीन महीने बाद, जब छुट्टी मिलेगी। "

" और मेरी शादी पर... "

" देखूँगा," मैने टालना चाहा।

" देखूँगा क्या, आना है तुम्हे...समझे। " वह फिर ऊँची होने लगी। 

" ठीक है, कहा ना...देखूँगा...मतलब कोशिश करूँगा। "

मैं भी झुँझला सा गया। और फूट लिया वहाँ से। नौकरी पर वापस पहुँच गया पर मन नहीं लग रहा था। उसकी शादी से एक डेढ़ हफ़्ता पहले खत आया उसका। बार-बार शादी में आने का आग्रहभरा खत। रोक नहीं पाया खुद को मैं, बहुत कमज़ोर पा रहा था अपने को, तरह-तरह के विशेषण दे रहा था---बारबार समझौते करने वाला। और इस तरह के बीसियों विशेषण घूम रहे थे दिमाग़ के इर्द गिर्द। इसी हाल में छुट्टी की अर्जी दी और उसकी शादी के दो दिन पहले ही पहुँच गया मैं लखनऊ।

उसी शाम पण्डित के चाय के होटल पर पहुँचा। पुराना अड्डा था वह हम दोस्तों का। शाम को अब भी वे सभी मिलते हैं जो इसी शहर में हैं और कुँवारे हैं। उस दिन भी चार-पाँच मिले। उन्हें आश्चर्य हुआ। 

" अबे तुम तो कह गये थे, होली पर आओगे?" एक ने पूछ ही लिया। मेरे मुँह से न चाहते हुए भी निकल गया,

 " वो मिनी की शादी है ना..."

बस मुस्कुरा उठे सब और बंगाली मुँहफट तो बोल ही पड़ा,

" अच्छा तो मियां माशूका की शादी में प्लेटें गिनने आए हैं।" , और गूँज उठा वह छोटा-सा कमरा जोरदार ठहाकों से। मेरे बगल में बैठे टुइयाँ गुड्डन ने सरगोशी की, " वह तुझे छोड़कर दूसरे के साथ जा रही है और तुम साले, उल्लू के पट्ठे उसकी शादी में शरीक होगे। अब साले, आ तो गया है तू लखनऊ, पर तुझे शादी की रौनक मैं नहीं बढ़ाने दूँगा।", मैने सफाई दी- " नहीं यार, तुम नहीं समझोगे, किसी ने किसी को नहीं छोड़ा, ये सब तो बस...यूँ समझो कि हम दोनों की मज़बूरियाँ थीं... "

" फिर भी यार, शादी में...तुम भी बस... "

" छोड़ यार, पता नहीं कैसा आदमी है ये..." सबके बीच रखी गर्मागर्म चाय की भाप बादल बनकर मेरे अन्दर बहुत गहरे उतर गयी, कहीं अजीब सी जगह पाकर फिर चिपक गये वे बादल। मैने चाय सिप की, मुस्कुराते हुए, शायद इसी से थोड़ी देर ये बादल छूट जायें या घुल जायें।

शादी वाले दिन दोपहर से ही मैं उसके घर पहुँच गया। छोटे-मोटे कामकाज में हाथ बटाने की कोशिश भी की। खुद हँसता रहा, हँसाता रहा उसे, उसके आसपास के लोगों को। लेकिन वहाँ का माहौल बारबार मेरे अन्दर एक दिन पहले पाण्डे की दुकान पर सुने शब्दों को याद दिला रहा था। बार-बार उसकी सहेलियाँ और हमराज़ बहनों की नज़रें टिक जातीं मुझ पर। मैने जब जब उनकी ओर देखा, सबकी आँखों में एक ही बात लिखी पायी और बादल और गहराते चले गये मेरे भीतर।

शाम होते-होते निकल पड़ा मैं वहाँ से। उसे दुल्हन के लिबास में देखने की तमन्ना तो थी पर अब हिम्मत नहीं। हिम्मत न सही, नशा ही सही। सबकी नज़रों की ताब सहने का बहाना ढूँढा व्हिस्की के एक क्वार्टर में और फिर पहुँच गया पाणडे के होटल पर। वास्तव में मुझे वहाँ बड़ा सुकून मिलता है। अभी बैठा ही था कि धनंजय आ गया, उसकी पैंट की बांयी जेब से भी एक क्वार्टर की झलक मिल रही थी। हम दोनों के पास पाण्डे भी आ गया काउंटर छोड़कर, तीनों ने पीनी शुरु की।

 एक पैग अन्दर जाते ही धनंजय बौराने लगा, " क्यों गुरु, मिन्नी की शादी में आये हो ना", मैंने सिर हिलाया। 

"अन्नू गुरू एक बात बताओ! हम तो सुने थे मिन्नी की शादी तुमसे होगी, आशिकी भी तो तुम्हारी चल रही थी, क्योंफिर ये शादी...", वह उत्सुक हो उठा। पाण्डे उठकर काउंटर पर चला गया। धनंजय की नजरें टिक गयीं मुझ पर। मैने दूसरा पेग तेजी से खाली किया और हल्के सुरूर में खुलना शुरू किया- " बस यार, कुछ मामला बिगड़ गया, ऐसी मजबूरियाँ..."

" मजबूरी...तुम्हारे साथ, गैरजात तो है नहीं वो।" उसकी उत्सुकता धीरे-धीरे बढ़ रही थी नशे के साथ।

 " उसकी शादी की जल्दी थी उसके घरवालों को, और जब वो लड़का ढूँढ़ रहे थे, तुम जानते हो तब मैं बेकार था।", मैं खाली गिलास नचाते हुए बोला।

हालाँकि उसे मेरा यह तर्क पचाते हुए खासी दिक्कत पेश आ रही थी, फिर भी वह संजीदा हो गया, " जाने दो गुरु, प्यार करने वालों के साथ ऐसा अक्सर होता है...अच्छा ये बताओ...सुहागरात को तो वह तुम्हे याद करेगी। न...?"

मैं जानबूझकर चुप रहा। पर वह तो जैसे सब कुछ जान लेने पर ही उतारू था, उसकी आवाज लड़खड़ायी, " मेरा मतलब...खेले तो खूब होगे गुरु तुम...उसके साथ...रोज़ ही तो टहलाते थे, तुम्हारे घर भी वह घण्टों घुसी रहती थी, गुरु...हम सब ताड़ जाते थे।" जी किया मारते-मारते या तो उसे बेदम कर दूँ या खुद बेदम हो जाऊँ। या फिर सामने रखी बोतल तोड़ूँ और घोंप दूँ उसके पेट में। लेकिन किया कुछ नहीं, बस उसे टाला,

" अरे नहीं यार, क्या बात करते हो, मैने ऐसा कुछ नहीं किया। जल्दी ही क्या थी, मैं तो सोचता था, शादी तो उसी से होनी..." 

पाण्डे फिर काउंटर छोड़कर हमारे पास आ गया दूसरे पेग के जुगाड़ में। धनंजय कुछ देर चुप रहा, मेरी बात इस बार भी उसके गले से नहीं उतर रही थी। फिर भी मेरे सुर में सुर मिलाते हुए उसने एक कोशिश और की, " हाँ गुरु, ये तो है, साला शादी के पहले सब कुछ चख लो तो फिर बाद का मजा जाता रहता है...वैसे...किस-विस...तो...?" उसके चेहरे पर शरारत और रहस्यभरी मुस्कान खेलने लगी।

" नहीं यार, किस तक नहीं", मैने झूठ बोला और प्लेट में पड़ी दालमोठ के बड़े दाने समेटता धनंजय उछल पड़ा

" अबे चूतिये, किस तक नहीं, साले इतना धाँसू माल और तूने किस तक नहीं किया, और आज तीन सौ मील से दौड़ा आया है उसकी शादी में शामिल होने के लिए...भई वाह पाण्डे देखा...कैसा आदमी है ये भी..."

मैं और बर्दाश्त नहीं कर पाया। दनदनाता होटल से बाहर निकला तो धनंजय फिर पीछे। मुझे जबरन पान की दुकान पर ले गया और माफी मांगने लगा,

" सॉरी यार, मुझे पता है, आज तू परेशान होगा, एक्सक्यूज मी यार, आई एम रियली सॉरी...लेकिन एक बात जरूर कहूँगा।  मेरे साथ ऐसा होता तो मैं मण्डप से भगा ले जाता लड़की को।

मैं फिर सामान्य होने लगा, " मैने भी उससे कहा तो था कोर्ट मैरेज को।"  " फिर...?", उसने पूछा। मैने उगल दिया सब कुछ शायद नशे में ही। एक बार फिर चौंक पड़ा धनंजय, " क्या? उसने भाग चलने को कहा था। तुम स्साले रहोगे हमेशा गधे, वह कह रही है मुझे भगा ले चलो तो हिम्मत नहीं पड़ी, अब जब वह दूसरे के साथ हो ली तो देवदास बने बैठे हैं, दारूबाजी कर रहे हैं... वाकई यार मैं आज तक नहीं समझ पाया कैसे आदमी हो तुम...हुँ!" , और वह दौड़कर एक रेंगती बस में लटक गया और मुझे लगा, मैं उस बस के पहियों के नीचे आ गया हूँ, फिर भी अन्दर जमे बादल छँटकर बिखर नहीं रहे।

मीनाक्षी मुझे छोड़कर चली गयी। फिर मैने यह सोचने की कोशिश भी नहीं की कि-कैसा आदमी हूँ मैं। नयी नौकरी थी, फुर्सत कहाँ। कुछ दिनों के लिए काफी कुछ भूल गया। कई बार ' कैसे आदमी हो...' सुना, महसूसा, पर परवाह नहीं की।

लेकिन इस बार होली की छुट्टियों में...उफ...तभी से बेचैन सा हो गया फिर मैं। एक मित्र के घर रात के खाने का निमंत्रण था, वहां से लौट रहा था। रात दस बजे वैसे भी सवारियाँ कम ही मिलती हैं, पर उस दिन तो मानो शहर में टैम्पो चल ही नहीं रहे थे। एक अदद टैम्पो-टैक्सी के इन्तजार में मेरी नजरें दायीं तरफ टिकी थीं खाली पड़ी सड़क पर। अचानक ऊपर से ही आ रहे दो आदमी चीखे..." किनारे भाई साहब, हटिए-हटिए किनारे।" जब तक मैं उनकी तरफ देखता, उनकी बात को समझता, तेजी से बैक होती एक मारुति कार मुझे धकेल चुकी थी। गनीमत थी, उनके चीखने से मैं अपनी जगह से थोड़ा दायों-बायें हो गया था, वरना बायीं टांग तो टूटनी ही थी। गुस्सा मुझे भीषण आया उस धक्के के साथ ही। ड्राइविंग सीट पर बैठे शख्स के पास पहुँचा। वहाँ पचास-पचपन साल का एक दुबला-पतला झुर्रीदार चेहरा दिखा। मैने पूरे गुस्से में कहा, " अन्धे हो क्या, हॉर्न नहीं बजा सकते थे बैक करते!" 

" हॉर्न खराब है भइया" , उसकी मरियल आवाज़ निकली। तब तक वे लोग, जिन्होंने मुझे बचने को आगाह किया था, चार छह लोगों को बटोरकर कार की बाँयी खिड़की पर जमा हो चुके थे। मैने लहज़ा थोड़ा मुलायम किया--- " तो भी पीछे देखना तो चाहिए था न तुम्हें।" वह कुछ बोल तो नहीं पाया पर उसकी आँखों में भय तैरने लगा। मैं ढीला पड़ गया, " जाइये मेरी टांग तो नहीं तोड़ पाये। पर आगे दो-चार की ज़रूर तोड़ेंगे।", गाड़ी बढ़ गयी और वहाँ लगा जमघट, जिसमें एक दो पानवाले भी दुकान छोड़कर शामिल हो गये थे, मुझे घूरता रह गया। 

मैं फिर टैम्पो की तलाश में झांकने लगा। तभी जमघटे में से एक आवाज आयी,

" भाषण दे रहे थे- हॉर्न बजाना चाइये था, देखना चाइये था, हुँह...गांधी की औलाद..." अभी जमघट छँटा नहीं था कि वही शख्स जिसने आवाज़ लगाकर मुझे आगाह किया था। बीड़ी सुलगाता हुआ आया मेरे पास- " आपने छोड़ क्यों दिया उसे?" 

" बस यूँ ही", मैने टाला। वह मानने को तैयार नहीं, " अरे भाई साहब, यह तिराहा अपना है, डरने की तो कोई बात ही नहीं थी, इत्ती चोट लगी आपको और कहीं हम आवाज न देते तब तो आप नीचे ही होते, फिर भी...और एक कन्टाप जमाते आप बस...बाकी तो हम लोग थे ही, लतिया देते जमकर सब।"  बाकी ने भी हाँ में हाँ मिलायी।

" छोड़िये साब, बुड्ढे आदमी से क्या मारपीट करना।" मैने फिर बात खत्म करनी चाही। 

पर वे संतुष्ट नहीं हो पा रहे थे। एक बुजुर्ग सज्जन ने मुझे झिड़का, " अरे, मारपीट न सही, दवा-दारू के तो सौ-पचास निकलवा ही लेने थे, आप बस जरा-सी पैण्ट उठाते, पैसे तो हम बाप से निकलवा देते उस हरामजादे के।"

 मैं बस हल्के से मुस्करा दिया, इसके सिवा और क्या करता, मुझे सूझा ही नहीं कुछ। मेरी मुस्कराहट का पता नहीं क्या मतलब लगाया उन्होंने। कइयों ने एक दूसरे का मुँह देखा और उनमें से एक आखिर बोल ही पड़ा, " वाह साब वाह, क्या आदमी हैं आप..." , और फिर सब हँस पड़े ठठाकर, कुछ ने सिर झटके, कुछ ने पान की पीक थूकी और छँटने शुरू हो गये। हर चेहरे पर था हैरत के ऊपर चढ़ा हिकारत