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" चाहे गीता बाँचिए, या पढ़िए कुरान/ मेरा तेरा प्यार ही हर पुष्तक का ज्ञान।"

                                                                -निदा फाजली-      

+LEKHNI+

Feburary-2008-Issue 12

   

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अपनी बात  

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        तेरह-चौदह साल की किशोर व संवेदन-शील उम्र थी और बनारस से इलाहाबाद तक का लम्बा सफर। धूल-धक्के और भीड़-भाड़ से ऊबीं आँखें अचानक ही आगे-आगे चल रहे एक ट्रक पर लिखे शेर पर जा अटकीं। शेर था: " नशा शराब में नहीं मेरे खून में है साकी, होता जो नशा शराब में बोतल न झूम जाती।" ( कुछ साल बाद यही शेर प्रकाश मेहरा की फिल्म शराबी के एक गाने में भी सुनने को मिला)। उसी वक्त बुद्धि से लेकर मन तक बिजली-सी कौंध गयीं वे पंक्तियां। बात सही और सोचने लायक थी। बाहर जो चल रहा है, वह नहीं, अन्दर जो है, वही तो बदलता है हमें... हंसाता-रुलाता, झुमाता और नचाता है।

पहली बार समझ में आया कैसे सोच का दृष्टिकोण तक बदल सकते हैं ये शब्द। पहली बार पूरी तरह से अंतर्मुखी होकर मन की शक्ति से अवगत हो पाई। आज की पीढ़ी या मुन्नाभाई के शब्दों में कहूँ तो मष्तिष्क में चल रहे ' केमिकल लोचे' से वह मेरा पहला साक्षात्कार था। वैसे भी किसी भी बात या अहसास को पूरी तरह से अनुभव करने के दो ही तो तरीके होते हैं; या तो हम उसे मन की गहराई से समझ लें या फिर जी लें। 

वो सूफी का कौल हो, या पंडित का ज्ञान। जितनी बीते आप पर, उतना ही सच जान।।

                                                                         -निदा फाजली 

फुर्सत के पलों में थोड़ा और गहराई से सोचा तो पाया कि वाकई में जीवन में...इस आज और अभी में जो घट रहा है...हर सौभाग्य, दुर्भाग्य, सुखृ-दुख  के 95 प्रतिशत से  अधिक के कर्ता और कारक हम खुद ही तो हैं। मुश्किल से बचे पांच प्रतिशत ही तो प्रारब्ध या अनहोनी के हाथ होते हैं, जो  बस में नही। ' मन हारे' की हार है 'मन जीते' की जीत।  

मात्र इच्छा या कामना नहीं, वह एक दूसरे के प्रति  उनका अदम्य और अपराजेय प्रेम ही तो था, जिसने राधेश्याम को आजतक अलग नहीं होने दिया। मीरा को जहर के प्याले के बाद भी जिन्दा रखा। पर इतना प्यार इतनी आस्था; इतना विश्वास भी तो साधारण जीवन में  संभव नहीं। इतनी सच्चाई और इतना समर्पण भी तो होना चाहिए, साथ-साथ हिम्मत भी। यूँ तो प्रेम की निर्मल धारा युगों से अविरल बह रही है , पर उस निश्छलता में भीग पाना, उस अमृत को आत्मसात कर पाना विरलों की ही आ पाता है। इसी संदर्भ में याद आ रही है फैज साहब की एक मशहूर नज्म, 

वो लोग बोहत खुश किस्मत थे

जो इश्क को काम समझते थे

या काम से आशिकी करते थे

हम जीते जी मशरूफ रहे

कुछ इश्क किया, कुछ काम किया

काम इश्क के आड़े आता रहा

और इश्क से काम उलझता रहा

फिर आखिर तंग आकर हमने

दोनों को अधूरा छोड़ दिया।

                                 

अधिकांशतः भृतहरि की नायिका जैसा ही तो हाल रहता है , जो यह तक न जान पायी कि जरूरी काम के लिए जाते नायक को किन शब्दों के साथ विदा दे । यदि वह ' जाओ' कहती है तो नायक सोचेगा कि वह उसे प्यार ही नहीं करती, इसीलिए तो झट से जाओ कह दिया। 'मत जाओ' कहने पर भी उसका ही नुकसान होगा और ' थोड़ा और रुककर जाओ' कहने पर काम भी बिगड़ेगा और साथ में जाने की घड़ी भी नहीं टलेगी। अन्त में वह हारकर नायक से ही पूछती है कि अब वही बताए कि ऐसे समय में वह उसे क्या कहकर विदा दे।  

ठहर कर सोचा जाए तो प्रेम के ' पनघट' की 'डगर' वाकई में 'कठिन' है और आज भी झटपट 'गगरी' भर लाने का ना कोई सुगम पथ और ना ही मूलमंत्र। आज भी प्यार के हर प्रश्न का प्यार ही एक उत्तर है।यही वजह है कि प्रेम-प्यार का प्रसंग चलते ही आज भी आँखों में जो छवि सर्वोपरि उभरती है वह राधाकृष्ण की ही होती है। ऐसा नहीं कि बहुत धार्मिक हूँ, या भारतीय हूँ, इस वजह से ऐसा होता है... या फिर रोमियो जूलियट, हीर-राँझा, शीरी फरहाद और लैला मजनू, आदि की प्रेम कहानियों से परिचित नहीं।

रासरंग और मिलन व विछोह के अनगिनित प्रसंगों के बाद भी जो संयम और ठहराव...काल और स्थान की दूरियों को लांघता अभिन्न और अविच्छेद सामीप्य इस जोड़ी में दिखता है, वह और कहीं है ही नहीं...एक ऐसी अजेय ललकार है इनके प्यार में जो अलग या दूर होने की सोच तक को तुरंत ही धिक्कार देती है।  शायद इसलिए कि कर्तव्य की मांग पर योगी-सा कृष्ण का राधा से अलग होने का फैसला खुद अपना था...  निर्णय जो अपने लिए नहीं; सार्वजनिक हित में ... जन कल्याण के लिए लिया गया था  ! विश्वास था उन्हें अपने प्रेम पर। समझ थी अपने कर्तव्य की। मीरा सी दीवानगी संभव है और समझ में भी आती है क्योंकि 'गिरधर गोपाल' के लिए उनका प्यार, साकार होकर भी अमूर्त था। भक्त और भगवान का रिश्ता था। परन्तु राधाकृष्ण तो युगल थे..मित्र थे। सदैव साथ-साथ थे। फिर भी समय की; कर्म की पुकार पर हर व्यक्तिगत सुख (बांसुरी और राधा) तकको छोड़ दिया कृष्ण ने। और राधा भी उनके निर्णय के आड़े नहीं आयी। यह इस युगल का त्याग ही तो है जिसने उनके प्यार को तप की ऊंचाइयों तक पहुँचा दिया। इस निर्वाह के लिए जो अदम्य साहस और संयम चाहिए, वह  आसान नहीं, चाहे हम इन्सानों में ढूँढें या देवी-देवताओं में।

पर राधा-कृष्ण का तप हो या मीरा की दीवानगी और हट, दोनों  ही वन्दनीय हैं। विशेषतः तब जब दोनों ही रिश्ते सांस और शरीर-से हैं... आस्था की उस दीवानगी को छूते हैं जो या तो प्रिय में लीन होकर एकाकर हो जाती है और मिलन या विछोह से ऊपर उठ  जाती है या फिर पत्थर तक को भगवान बना देती है। वैसे भी इस ढाई आखर के शब्द के रहस्यों को समझना या इस चंचल मन को पूरी तरह से बस में कर पाना इतना आसान तो नहीं! जबकि इसकी हर बात ही निराली है । इस दरिया की धार तो सदैव ही उलटी बही हैः इसमें तो डूबकर ही उबरा जाता है।

खुसरो दरिया प्रेम का उलटी वाकी धार।

जो उतरा सो डूब गया जो डूबा सो पार।    

और इस उलझन को चतुर राधारानी ने समझा भी था और सुलझाया भी... जो कृष्णमय होकर अपना जीवन जिया उन्होने। यही वजह थी कि उनकी झलक मात्र कृष्ण को हर्षा देती है क्योंकि संसारिक सारी बाधाओं के बावजूद भी कृष्ण की सांस-सांस की जरूरत को समझा उन्होने...उनके मन की हर बात जानी और निबाही। तभी तो बिहारी ने कृष्ण की नहीं, राधा की प्रार्थना की। वे जानते थे , राधा हैं तो कृष्ण हैं। 

" मेरी भवबाधा हरो राधा नागरि सोय। जा तन की झाँई परे स्याम हरित दुति होय "

राधा वास्तव में चतुर थीं क्योंकि वे प्रेम में बाधा नहीं सहायक बनीं। और यही है प्रेम की वास्तविक परिभाषा; जो आज भी किताबों में नहीं, जीवन में ही मिलेगी। कब सोच और शरीर ही नहीं, जीवन तक प्रिय को समर्पित हो जाता है प्रेमी को पता ही नहीं चल पाता और यही 'स्व' का मिटना ही उनके अमर सुख का कारण बनता है। जीवन के कांटों पर फूल-सा रंग और खुशबू बिखेरता है। तभी तो कबीरदास कह गये कि "पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित हुआ न कोय, ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।" यही कबीर एक दूसरे दोहे में लिखते हैं - "प्रेम न बाड़ी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय। राजा प्रजा जेहि रुचै शीष देय लहि जाय " ऐसे प्रेम को पाने के लिए ' शीष' यानी अहं को, अस्तित्व के अलगाव को त्यागना ही पड़ेगा। और यह कितना कठिन है हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं।

जमला ऐसी प्रीत कर जैसे निसि औ चन्द्। चन्दा बिन निसि फीकरी निसि बिन चन्दो मन्द।।  

और एकबार यदि ऐसा प्रेम मिल भी जाए तो उसे संभालकर रखना भी तो आना ही चाहिए।

" रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाए।।" 

कितना भी हम तौलें परखें, यह तो मानना ही पड़ेगा कि ईश्वर की तरह प्रेम आज भी जिन्दा है। शाश्वत है। सार्वभौमिक है। तभी तो हजार उत्तेजक खबरों के धमाकों के बीच बैठे  हम आप आज भी इसकी बातें कर रहे हैं। इसमें रुचि ले रहे हैं। इसके बारे में लिख-पढ़ रहे हैं। 

हर युग में नई पीढी इसे अपने एक नये ढंग से महसूस करेगी और पाएगी। वक्त  के साथ प्रेमियों के नए-नए स्वरूप और नए-नए प्रतिमान उभरकर आयेंगे... प्रतिमान जो प्यार और त्याग की उद्दाम ऊंचाइयों को छूते रहे हैं, छूते रहेंगे। क्योंकि प्रेम का वास्ता आज भी मन से ज्यादा, बुद्धि से कम है। आजभी प्रेम ही इस सृष्टि का आधार है। यह वही खुशबू और रंग है जिसे जीवन की धूप और हवा उड़ाती भी है और बढ़ाती भी है। इसी दुरुह पर असंभव नहीं, प्रेम-भाव का उत्सव मनाने का प्रयास किया है लेखनी के इस वर्षान्त के अंक ने।  

इन्द्रधनुषी इस अहसास की सतरंगी परछांई को संजोने का एक लघु प्रयास है यह; किस रंग ने आपको छुआ, रचा और समेटा , बांटेंगे तो अच्छा लगेगा!...    

                                                                                                      -शैल अग्रवाल  

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"नैनन अंतर आव तू, नयन झाँप तोहि लेऊँ

ना में देखूँ और कूँ, ना तोहे देखन देऊँ।।"

 

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सबसे ऊँची प्रेम सगाई ।

दुर्योधन को मेवा त्याग्यो, साग विदुर घर पाई ॥
सबसे ऊँची प्रेम सगाई ।

जूठे फल सबरी के खाये, बहु बिधि प्रेम लगाई ॥
सबसे ऊँची प्रेम सगाई ।

प्रेम के बस नृप सेवा कीन्ही, आप बने हरि नाई ॥
सबसे ऊँची प्रेम सगाई।

राजसुय यज्ञ युधिष्ठिर कीनो, तामै जूठा उठाई ॥
सबसे ऊँची प्रेम सगाई ।

प्रेम के बस अर्जुन रथ हाँख्यो, भूल गये ठकुराई ॥
सबसे ऊँची प्रेम सगाई।

ऐसी प्रीति बढी वृन्दावन, गोपिन नाच नचाई ॥
सबसे ऊँची प्रेम सगाई।

सूर क्रूर इस लायक नाही, कह लग करउ बढाई ॥
सबसे ऊँची प्रेम सगाई।

                              -सूरदास

 

 

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कागा सब तन खाइयो, मेरा चुनचुन खाइयो मांस।

दो नैना मत खाइहो मोहे पिया मिलन की आस।।

नी मैं जाना जाना जाना, जाना जोगी दे नाल नी

राँझा राँझा कर दी नी मैं आपै राँझा होई।

राँझा मैं विच मैं राँझा विच होर खयाल न कोई।।
नी मैं जाना जाना जाना, जाना जोगी दे नाल नी

                                  -कैलासा 

 

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मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई
तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई
छांड़ी दई कुलकी कानि कहा करिहै कोई
संतन ढिग बैठि बैठि लोक लाज खोई
चुनरी के किये टूक ओढ़ लीन्ही लोई
मोती मूंगे उतार बनमाला पोई
अंसुवन जल सीचि सीचि प्रेम बेलि बोई
अब तो बेल फैल गई आंनद फल होई
दूध की मथनियां बड़े प्रेम से बिलोई
माखन जब काढ़ि लियो छाछ पिये कोई
भगति देखि राजी हुई जगत देखि रोई
दासी मीरा लाल गिरधर तारो अब मोही

                              -मीराबाई

 

 

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एक पुराना मौसम लौटा याद भरी पुरवाई भी

ऐसा तो कम ही होता है वो भी हों तनहाई भी

 

यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं

कितनी सौंधी लगती है तब मांझी की रुसवाई भी

 

दो दो शक्लें दिखती हैं  इस बहके से आइने में

मेरे साथ चला आया है आपका इक सौदाई भी

 

खामोशी का हासिल भी इक लंबी खामोशी है

उनकी बात सुनी भी हमने अपनी बात सुनाई भी

                                    -गुलजार

 

 

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हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते

वक्त की शाख से लम्हे नहीं तोड़ा करते

 

जिसकी आवाज में सिल्वट हो निगाहों में शिकन

ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते

 

शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा

जाने वालों के लिए दिल नहीं तोड़ा करते

 

लग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दो

ऐसी दरिया का कभी ऱुख नहीं मोड़ा करते

                                -गुलजार

 

 

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कहत, नटत, रीझत, खीजत, मिलत, खिलत, लजात।

भरी भंवन बिच करत है नयनन ही सों बात।।

                   -बिहारी

डॉ. सुभाषिनी आर्या

भारतीय चित्रकारी में अष्ट नायिका

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भारतीय कला में नायिका शब्द का प्रयोग शाब्दिक अर्थ, यानी अंग्रेजी के ' हीरोइन' शब्द या वीरांगना के रूप में नहीं हुआ है, बल्कि एक प्रेमिका या प्रेमरत नारी के रूप में उसे देखा गया है। अधिसंख्य भारतीय लघुचित्रों (मिनिएचर्स) और भित्ति चित्रों में नारी का यह रूप मध्यवर्ती स्थान प्राप्त किए हुए है। इनमें से अधिकतर चित्रकारी 17 शताब्दी से लेकर 20 वीं शताब्दी के प्रारंभिक काल तक की है। ये चित्रकारियां उत्तर भारत, मुख्य रूप से मालवा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, जम्मू, बासोहली, और गढ़वाल से मिली है।

' नायिका' की परिकल्पना संस्कृत साहित्य, विशेषकर भरतमुनि की देन है, जो नाट्यशास्त्र के रचयिता और भारतीय शास्त्रीय नृत्य और नाटक को अनुशाषित करने वाले सिद्धान्तों के प्रतिपालक थे। भरत ने पुरुष और महिलाओँ का वर्गीकरण किया, जिन्हें नायक और नायिका, यानी क्रमशः प्रेमी और प्रेमिका कहा गया। यह वर्गीकरण उनकी शारीरिक और मानसिक विशेषताओं, गुणों, मनोदशाओं, स्वभाव और भावात्मक अवस्थाओं और स्थितियों के अनुसार किया गया। इसके अंतर्गत नारी के मनोभावों का और उसके प्रेम क विभिन्न चरणों का वर्गीकरण बड़े उत्साह और सूक्ष्मता से किया है। वास्तव में, प्रणय के दौरान पुरुष और नारी की मनोदशाओं का विश्लेषण और वर्गीकरण करने की साहित्यिक परम्परा की आधारशिला भरत ने बड़ी सूक्ष्मता के साथ रखी और उनके परवर्तियों ने उसे सुपरिभाषित आलंकारिक रूप में आगे बढ़ाया। भरत ने जहां नायक के चौदह भेद किए हैं-प्रेमी और परमप्रिय, सौम्य, निरंकुश, स्वत्वबोधक, जोशपूर्ण, प्रीतिकर, भावप्रवण, बदमाश, दुष्ट, मिथ्यावादी, जिद्दी, शेखीबाज, बेशरम और क्रूर, वहीं नायिका को आठ श्रेणइयों में ही रखा और नाट्यशास्त्रीय एवं श्रंगारिक साहित्य में उसे नायक की तुलना में काफी स्थान दिया। इसी वर्गीकरण को उनके परवर्ती रचनाकारों ने जारी रखा, जैसा वात्सायन के 'कामसूत्र', 'साहित्य दर्पण', बिहारी की 'सतसई', जसवंत सिंह की ' भाषा भूषण', भानुदत्त की 'रसमंजरी' और केशवदास की 'रसिक प्रिया' और 'कविप्रिया' में इसी  वर्गीकरण का अनुसरण किया गया। इनमें रसिक प्रिया देशी भाषा साहित्य में सबसे महत्वपूर्ण रचना है और इसके अनेक छन्दों को राजस्थानी और पहाड़ी लघुचित्रों में दर्शाया गया है। यह पुष्तक संस्कृत और हिन्दी में प्रेम-काव्य की सदियों पुरानी उस परंपरा पर प्रकाश डालती है जो कालीदास की कृतियों, खासकर 'ऋतुसंहार', 'मेघदूतम्' और 'कुमारसंभव' में अपनी पराकाष्ठा पर थी। 'ऋतुसंहार' में, ऋतुओं के सजीव वर्णन के अलावा उन मनोभावों का भी भावपूर्ण वर्णन किया गया है जो बदलती ऋतुओं के साथ प्रेमी हृदयों में पैदा होते हैं। चांद का प्रकट होना उन स्त्रियों के दिल में प्रेम का स्फुरण करता है जो अपने प्रेमियों की बाट जोहती हैं। आम का विकसित होना उस प्रेमी को दुःखी करता है जो अपने घर से दूर है और वह अपनी प्रेमिका की याद में आँसू बहाता है। बादलों को घिरते देख मोर खुशी से नाचने लगता है और क्रीड़ारत लोगों का आमोद प्रमोद बढ़ जाता है। ' कुमार संभव' में, वसंत के सौंदर्य और विवाहित जीवन के प्रेम की अत्यंत प्रभावशाली अभिव्यक्ति हुई है। 

जयदेव के ' गीत गोविन्द' में कृष्ण नाटकीय हीरो, यानी नायक हैं, और वह श्रंगार भावना का प्रतीक है, जबकि राधा नाटकीय हीरोइन, यानी नायिका है और उसकी पहचान प्रेम से होती है। वह नायक के साथ अंतर-संबंद्धता की सात शैलीगत मनोदशाओं में चित्रित की गई है, जिनकी पहचान भारतीय नाट्य सिद्धान्तों में की गई है। जयदेव ने अपनी रचना में तकनीकी नाम या उसके चारित्रिक संकेत या प्रतीक के साथ प्रत्येक अवस्था की पहचान की है।

भानुदत्त की रसमंजरी में पहली बार नायिका की विभिन्न नित परिवर्तित मनोदशाओं के बारे में प्रकाश डाला गया है। भानुदत्त बिहार में तिरुहत से सम्बद्ध थे और उनका काल 15 वीं सदी के अन्त में माना गया है।रसमंजरी के अंतिम छंद में भानुदत्त ने उल्लेख किया है कि वे कवि गणेश्वर के पुत्र थे। भानुदत्त ने जिन स्थितियों का चित्रण किया उनमें सर्वाधिक दिलचस्प स्थितियां वे हैं जिनमें नायक अपनी प्रेमपात्र पत्नी के साथ, अन्य लोगों की ईर्ष्या का पात्र बने बिना, प्रेम करने की कोशिश करता है। इस कृति के आधार पर बनाए गए चित्रों के कई समूह बासोहली चित्रकारी केन्द्र में उपलब्ध हैं, जो सत्रहवीं सदी से सम्बद्ध है।

बिहारी द्वारा रचित सतसई में सात सौ दोहे हैं, जिनमें नायिका-भेद को उत्कृष्ट ढंग से पेश किया गया है। इन सभी कृतियों में श्रंगार रस पर जोर दिया गया है, जिसका आंतरिक संबंध प्रेम में एकात्मकता के साथ है। भारतीय चित्रकारी के विभिन्न घरानों जैसे मुगल, राजस्थानी, पहाड़ी, मालवा, दक्कनी और कई अन्य जो 17वीं सदी से 20वीं सदी तक सक्रिय थे, पर कृ,ण सम्प्रदाय की लोकप्रियता का गहरा प्रभाव पड़ा था, जिसने 12वीं से 16वीं सदी तक एक स्वच्छंद रहस्यवादी साहित्यधारा को प्रेरित किया। 

नायिका-भेद विषय को और भी व्यापक रूप दिया केशवदास(1520-1601) ने, जो ओरछा नरेश मधुकर शाह के दरबारी कवि थे। उनकी रसिकप्रया छन्दों में संगीतमय शैली में लिखा गया हिन्दी का एक तरह का शोध-प्रबन्ध है जिसमें आलंकारिक और साहित्यिक विश्लेषण किया गया है। इसका समुचित काव्य शास्त्रीय महत्व है। इसका विषय प्रेम है , जिसमें अरक्तक (सूक्ष्म या भावुक) प्रेम नहीं है बल्कि पूर्ण शारीरिक प्रेम का चित्रण है। केशव के नायक और नायिका कृष्ण और राधा हैं। आदर्श प्रेमियों और स्थितियों का वर्णन करते हुए उसमें भगवान और भगत का संबन्ध आरोपित किया गया है।

आयु अनुभव, शारीरिक और मानसिक स्थितियों, मनोदशाओं और संवेगों के आधार पर नारी के वर्गीकरण से चित्रकार को विभिन्न विषय मिल गए हैं। रसिकप्रिया में नायिका के आठ प्रकारों का उल्लेख किया गया है--स्वाधीनपतिका, उत्का या उत्कंठिका, वासकसैया, अभिसंधिता, खंडिता, प्रोसिताप्रेयसी, विप्रलब्धा और अभिसारिका।

स्वाधीनपातिका वह नायिका है, जिसका सतीत्व अपने प्रेमी के प्रति समर्पित हो और जिसे उसका पति प्रेम करने के लिए बाध्य हो और निरंतर उसका साथ दे। चित्रकारी में उसे राधा के रूप में दर्शाया गया है जो चौकी (स्टूल) पर बैठी है जबकि कृष्ण उसके पैर धोते या दबाते हैं। उन्हें राधा के चरणों में महावर लगाते हुए भी दिखाया गया है। नायिका गर्व और स्वाभिमान के साथ कृष्ण की ओर देखती है जो उसके प्रति पूर्ण वशीभूत या विनीत दर्शाया गया है।

उत्का एक चिंतित या बेचैन नायिका है जिसका प्रेमी वायदे के अनुसार मिलन स्थल पर पहुंचने में विफल रहा है। उसका शरीर चंदन की तरह सफेद, उसकी दीप्ति दिए के समान और परिधान कोमल, सुकुमार अंगों के चारो ओर अस्त-व्यस्त हैं। पशु-पक्षिओं की हल्की सी आहट से वह चौंक पड़ती है। वह मृदुभाषी है और अपनी अंतरंग सखी से मनोभाव छिपाती है क्योंकि उसके चौंकने से सखी को कुछ आभास होता है। इस नायिका को चित्रों में शयनकक्ष के द्वार पर बैठे या खड़े हुए, प्रसन्न किंतु प्रेमी के आगमन की प्रत्याशा में चिंतित दर्शाया गया है। कुछ चित्रों में परिवार में नायक के स्वागत की व्यापक तैयारियां चित्रित की गयी हैं-एक महिला आंगण बुहारती है, दूसरी पात्र से पानी उड़ेलती है और शयनकक्ष को सुव्यवस्थित किया जा रहा है। प्रेमी नदी के दूसरी ओर नौका में बैठा है, सारस के एक जोड़े के करीब। 

वासकसैया नायिका अपने प्रेमी से एकात्म होने के लिए उसका इन्तजार कर रही है। उसे चमेली के फूलों के साथ नदी के किनारे पेड़ के नीचे बैठा दिखाया गया है। उसने पेड़ के तने को मालाओं से सजा रखा है। भारी, घने बादलों के बीच बिजली चमकती है। कभी-कभी मिलन-स्थल के निकट हरिण दर्शाए गए हैं, जो हवा में सुगंध ले रहे होते हैं या कमल के तालाब से पानी पी रहे होते हैं।

अभिसंधिता ऐसी नायिका है जो अपने प्रेमी की अनुरक्ति की अवमानना करती है, किंतु उसकी अनुपस्थिति में पश्चाताप से ग्रस्त है, और इससे उसे अलगाव की पीड़ा सालती रहती है। चित्रकारी में प्रेमियों को झगड़ते हुए दर्शाया गया है। कृष्ण पीली धोती में, मोर पंख और मुकुट पहने रवाना होने की स्थिति में हैं। राधा के चेहरे पर घना रोष और उदासी का भाव है। कृष्ण उसका रोष शान्त करते दिखते हैं, राधा अपने रोष के कारण द्रवित नहीं होती और उसे अस्वीकार कर भगा देती है। किंतु जैसे ही कृष्ण जाने को उद्धत होते हैं, तो वह अपनी निष्ठुरता के कारण अनुताप से भर उठती है। 

खंडिता ऐसी प्रेमिका है जिसका प्रेमी रात के समय मिलने का वायदा नहीं निभा पाया, किंतु किसी अन्य महिला के रात बिताकर अगली सुबह घर लौटा है। नायिका प्रेमी की भत्स्रना करती है। चित्रों में खंडिता नायिका को क्रुद्ध और आवेशित प्रेमिका के रूप में दर्शाया गया है जो अपने नायक को उलाहने दे रही है और नायक लज्जित और दोषित चेहरे के साथ उसके आंगण में प्रवेश करता है। 

प्रोसिताप्रेयसी ऐसी नायिका है जिसका पति व्यापार के कारण कुछ समय से घर से बाहर गया हुआ है। एक चित्र में उसे बादलों की गरज सुनने के लिए बालकनी से बाहर आते दिखाया गया है। उसने दुपट्टा ओढ़ रखा है और वह उड़ते हुए सारस की जोड़ी को बड़ी उत्सुकता के साथ देखती है जबकि एक मोर, अनुपस्थित पति का प्रतीक, उल्लास में सिर उठाता दिखाया गया है। वर्षा होने वाली है और नायिका गुजरते बादलों से विनती करती है कि उसका पति सुरक्षित घर आ जाए।

विप्रलब्धा एक हताश नायिका है, जो रात भर अपने प्रेमी का व्यर्थ इन्तजार करती रही है। उसे एक पेड़ के नीचे पत्तों की शैया के साथ चित्रित किया गया है, जिसने आवेश में आकर अपने गहने उतारकर जमीन पर फेंक दिए हैं। पृष्ठ भूमि में खाली जगह उसक अकेलेपन, हताशा और गहरी निराशा को दर्शाती है। उसे अपने नायक की भत्स्रना करते हुए भी दिखाया गया है, जो पिछली रात की ही तरह इस रात भी नहीं लौटा।

अभिसारिका ऐसी नायिका है जो किसी भी जोखिम की परवाह न करते हुए अपने प्रेमी से मिलने निकल पड़ती है। उसे विभिन्न कवियों ने अलग-अलग नाम दिया है। पहाड़ी (हिमाचली) कलाकारों का वह प्रिय विषय रही है। कृष्ण अभिसारिका और शुक्ल अभिसारिका दो तरह की नायिकाएँ हैं जो चांद की स्थिति के अनुसार कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष के दौरान अपन प्रेमी से मिलने निकलती हैं। एक आकर्षक चित्रकारी में कृष्ण अभिसारिका ने नीला दुपट्टा ओढ़ रखा है और वह रात में अकेली जा रही है। अंधेरी रात है और बादल छाए हुए हैं और रुक रुककर बिजली चमक रही है। जंगल में सांप हैं और भूत-पिशाच तथा डाइनें घूम रही हैं। जंगल के भय से बेखौफ- तूफान, सांपों, अंधेरों के आतंक की तनिक भी परवाह न करते हुए नायिका प्रेमी के प्रति जनून लिए उसकी तलाश में निकल पड़ी है। 

नायक-नायिका भेद का विषय सदियों से हमारे परंपरागत चित्रकारों की कल्पना में छाया रहा है। बीसवीं सदी के प्रारम्भिक दो या तीन वर्षों तक यह विषय छाया रहा, जब चित्रकारी घराने संरक्षण के अभाव में विस्मृति के गर्त में चले गए। आज वे भारतीय चित्रकारी के सभी प्रेमियों और गुण ग्राहकों के लिए आनन्द और प्रेरणा का सदाबहार स्रोत हैं।                   

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कविता-धरोहर

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दो गुलाब के फूल छू गए जब से होठ अपावन मेरे
ऐसी गंध बसी है मन में सारा जग मधुबन लगता है।

रोम-रोम में खिले चमेली
साँस-साँस में महके बेला,
पोर-पोर से झरे मालती
अँग-अँग जुड़े जुही का मेला
पग-पग लहरे मानसरोवर, डगर-डगर छाया कदम्ब की
तुम जब से मिल गए उमर का खँडहर राजभवन लगता है।
दो गुलाब के फूल....

छिन-छिन ऐसा लगे कि कोई
बिना रंग के खेले होली,
यूँ मदमाएँ प्राण कि जैसे
नई बहू की चंदन डोली
जेठ लगे सावन मनभावन और दुपहरी साँझ बसंती
ऐसा मौसम फिरा धूल का ढेला एक रतन लगता है।
दो गुलाब के फूल....

जाने क्या हो गया कि हरदम
बिना दिये के रहे उजाला,
चमके टाट बिछावन जैसे
तारों वाला नील दुशाला
हस्तामलक हुए सुख सारे दुख के ऐसे ढहे कगारे
व्यंग्य-वचन लगता था जो कल वह अब अभिनन्दन लगता है।
दो गुलाब के फूल....

तुम्हें चूमने का गुनाह कर
ऐसा पुण्य कर गई माटी
जनम-जनम के लिए हरी
हो गई प्राण की बंजर घाटी
पाप-पुण्य की बात न छेड़ों स्वर्ग-नर्क की करो न चर्चा
याद किसी की मन में हो तो मगहर वृन्दावन लगता है।
दो गुलाब के फूल....

तुम्हें देख क्या लिया कि कोई
सूरत दिखती नहीं पराई
तुमने क्या छू दिया, बन गई
महाकाव्य कोई चौपाई
कौन करे अब मठ में पूजा, कौन फिराए हाथ सुमरिनी
जीना हमें भजन लगता है, मरना हमें हवन लगता है।
दो गुलाब के फूल....

                                                      गोपाल दास नीरज 

 

 

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मधुपुर के घनश्याम अगर कुछ पूछें हाल दुखी गोकुल का
उनसे कहना पथिक कि अब तक उनकी याद हमें आती है।

बालापन की प्रीति भुलाकर
वे तो हुए महल के वासी,
जपते उनका नाम यहाँ हम
यौवन में बनकर संन्यासी
सावन बिना मल्हार बीतता, फागुन बिना फाग कट जाता,
जो भी रितु आती है बृज में वह बस आँसू ही लाती है।
मधुपुर के घनश्याम...

बिना दिये की दीवट जैसा
सूना लगे डगर का मेला,
सुलगे जैसे गीली लकड़ी
सुलगे प्राण साँझ की बेला,
धूप न भाए छाँह न भाए, हँसी-खुशी कुछ नहीं सुहाए,
अर्थी जैसे गुज़रे पथ से ऐसे आयु कटी जाती है।
मधुपुर के घनश्याम...

पछुआ बन लौटी पुरवाई,
टिहू-टिहू कर उठी टिटहरी,
पर न सिराई तनिक हमारे,
जीवन की जलती दोपहरी,
घर बैठूँ तो चैन न आए, बाहर जाऊँ भीड़ सताए,
इतना रोग बढ़ा है ऊधो ! कोई दवा न लग पाती है।
मधुपुर के घनश्याम...

लुट जाए बारात कि जैसे...
लुटी-लुटी है हर अभिलाषा,
थका-थका तन, बुझा-बुझा मन,
मरुथल बीच पथिक ज्यों प्यासा,
दिन कटता दुर्गम पहाड़-सा जनम कैद-सी रात गुज़रती,
जीवन वहाँ रुका है आते जहाँ ख़ुशी हर शरमाती है।
मधुपुर के घनश्याम...

क़लम तोड़ते बचपन बीता,
पाती लिखते गई जवानी,
लेकिन पूरी हुई न अब तक,
दो आखर की प्रेम-कहानी,
और न बिसराओ-तरसाओ, जो भी हो उत्तर भिजवाओ,
स्याही की हर बूँद कि अब शोणित की बूँद बनी जाती है।
मधुपुर के घनश्याम...

                                                       -गोपाल दास 'नीरज'

 

 

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कितनी बार तुम्हें देखा
पर आँखें नहीं भरीं।

सीमित उर में चिर-असीम
सौंदर्य समा न सका
बीन-मुग्ध बेसुध-कुरंग
मन रोके नहीं रुका
यों तो कई बार पी-पीकर
जी भर गया छका
एक बूँद थी, किंतु,
कि जिसकी तृष्णा नहीं मरी।
कितनी बार तुम्हें देखा
पर आँखें नहीं भरीं।

शब्द, रूप, रस, गंध तुम्हारी
कण-कण में बिखरी
मिलन साँझ की लाज सुनहरी
ऊषा बन निखरी,
हाय, गूँथने के ही क्रम में
कलिका खिली, झरी
भर-भर हारी, किंतु रह गई
रीती ही गगरी।
कितनी बार तुम्हें देखा
पर आँखें नहीं भरीं।

 

                       -शिवमंगल सिंह  सुमन 

 

                 

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दो सजा मुझको असंयत कामना के ज्वार पर,

बिन बुलाए आ गया मैं फिर तुम्हारे द्वार पर।

 

दो सजा मुझको-गड़ाऊँ आँख चरणों पर कभी 

अनसुनी कर दो मिलन की धड़कनें मेरी सभी,

 

तुम अनुत्तर बन सदा मेरी पुकारों से बचो

अब न तुम मुझमें नये विश्वास का सपना रचो,

 

प्राण पर मेरे तुम्हारी ही झलक छाई हुई

चेतना मेरी तुम्ही में डूबी उतरायी हुई,

 

पंख-अधकतरा पखेरू चंद्रमा से होड ले!

चाहता आकाश का नीला सितारा तोड़ ले! 

 

तुम न मिटने भी मुझे दो अनगहे आधार पर,

बिन बुलाए आ गया मैं फिर तुम्हारे द्वार पर।

 

दो सजा मुझको तनिक जो आस्था मेरी गले

मर गयी जो ज्योति घुलघुल कर अगर फिर से जले, 

 

दो सजा यदि मैं तुम्हारी छाँह को भी प्यार दूँ

यदि तुम्हारे संगदिल को एक भी झंकार दूँ ,

 

यदि प्रकम्पित कंठ से कुछ पास आने को कहूँ

मैं तुम्हारी एक भी मुस्कान पाने को कहूं,

 

दो सजा मुझको तुम्हारा नाम होठों से चुए

हाथ भी मेरा तुम्हारी बादली वेणी छुए,

 

चढ़ चुका अपनत्व सब मेरा पराई धार पर,

बिन बुलाए आ गया मैं फिर तुम्हारे द्वार पर।

 

दो सजा मुझको कहूँ तुमसे मुझे बूझो तनिक

वेदना की विपुलता में तुम्हीं मुझे सूझे तनिक,

 

दो सजा तुमसे तनिक भी शक्ति ले जीवित रहूँ

यदि तुम्हारे आसरे दुख की तरंगों में मैं बहूँ।

 

आँसुओं में भी कभी माँगू सहारा स्नेह का

स्वप्न भी देखूँ तुम्हारी देव दुर्लभ देह का,

 

मैं तुम्हें बाँधू तरसती चितवनों में निष्पलक

दो सजा पीता रहूँ मधु स्वर तुम्हारा देर तक,

 

गीत लिखने को तुम्हारे दर्प की दीवार पर

बिन बुलाए आ गया मैं फिर तुम्हारे द्वार पर।

 

मूँद दोनों नयन, दम तोड़ दो मेरा अभी

दो मुझे तुम दण्ड, है स्वीकार सिर माथे सभी,

 

मैं तुम्हारे रूप का उन्माद तन-मन में भरे

मैं तुम्हारी वज्रता का दर्द छाती में धरे,

 

यदि तुम्हें पीने लगूँ अपनी समूची प्यास भर

दो सजा मुझको-न सहने में रहे कोई कसर,

 

दो सजा यदि मैं तुम्हारा मन बहुत-सा घेर लूँ

दो सजा कुछ भी तुम्हारी मानता यदि फेर लूँ,

 

पूजता तुमको सुलगता दिल इसी अधिकार पर,

बिन बुलाए आ गया मैं फिर तुम्हारे द्वार पर।

              रामेश्वर शुक्ल अंचल 


 

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क्या तुम भी सुधि से थके प्राण ले-लेकर अकुलाती होगी!
                       
जब नींद नहीं आती होगी!
दिनभर के कार्य-भार से थक जाता होगा जूही-सा तन
,

श्रम से कुम्हला जाता होगा मृदु कोकाबेली-सा आनन।
लेकर तन-मन की श्रांति पड़ी होगी जब शय्या पर चंचल
,
किस मर्म-वेदना से क्रंदन करता होगा प्रति रोम विकल
आँखों के अम्बर से धीरे-से ओस ढुलक जाती होगी!
                       जब नींद नहीं आती होगी!
जैसे घर में दीपक न जले ले वैसा अंधकार तन में
,

अमराई में बोले न पिकी ले वैसा सूनापन मन में
,
साथी की डूब रही नौका जो खड़ा देखता हो तट पर -
उसकी-सी लिये विवशता तुम रह-रह जलती होगी कातर।
तुम जाग रही होगी पर जैसे दुनिया सो जाती होगी!
                       जब नींद नहीं आती होगी!
हो छलक उठी निर्जन में काली रात अवश ज्यों अनजाने
,

छाया होगा वैसा ही भयकारी उजड़ापन सिरहाने
,
जीवन का सपना टूट गया - छूटा अरमानों का सहचर
,
अब शेष नहीं होगी प्राणों की क्षुब्ध रुलाई जीवन भर!
क्यों सोच यही तुम चिंताकुल अपने से भय खाती होगी
?
                       जब नींद नहीं आती होगी!

                                                  रामेश्वर शुक्ल अंचल

 

 

 

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मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार
         पथ ही मुड़ गया था।

गति मिली मैं चल पड़ा
         पथ पर कहीं रुकना मना था,
राह अनदेखी, अजाना देश
         संगी अनसुना था।
चाँद सूरज की तरह चलता
         न जाना रातदिन है,
किस तरह हम तुम गए मिल
         आज भी कहना कठिन है,
तन न आया माँगने अभिसार
         मन ही जुड़ गया था।

देख मेरे पंख चल, गतिमय
         लता भी लहलहाई
पत्र आँचल में छिपाए मुख
         कली भी मुस्कुराई।
एक क्षण को थम गए डैने
         समझ विश्राम का पल
पर प्रबल संघर्ष बनकर
         आ गई आँधी सदलबल।
डाल झूमी, पर न टूटी
         किंतु पंछी उड़ गया था।


           - शिव मंगल सिंह 'सुमन'

 

 

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बरसों के बाद उसी सूने- आँगन में

जाकर चुपचाप खड़े होना

रिसती-सी यादों से पिरा-पिरा उठना

मन का कोना-कोना


कोने से फिर उन्हीं सिसकियों का उठना

फिर आकर बाँहों में खो जाना

अकस्मात् मण्डप के गीतों की लहरी

फिर गहरा सन्नाटा हो जाना

दो गाढ़ी मेंहदीवाले हाथों का जुड़ना,

कँपना, बेबस हो गिर जाना


रिसती-सी यादों से पिरा-पिरा उठना

मन को कोना-कोना

बरसों के बाद उसी सूने-से आँगन में

जाकर चुपचाप खड़े होना !

          -धर्मवीर भारती 

 

 

 

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उत्तर नहीं हूँ

मैं प्रश्न हूँ तुम्हारा ही !

 

नये-नये शब्दों में तुमने

जो पूछा है बार-बार

पर जिस पर सब के सब केवल निरुत्तर हैं

प्रश्न हूँ तुम्हारा ही !

 

तुमने गढ़ा है मुझे

किन्तु प्रतिमा की तरह स्थापित नहीं किया

या

फूल की तरह

मुझको बहा नहीं दिया

प्रश्न की तरह मुझको रह-रह दोहराया है

नयी-नयी स्थितियों में मुझको तराशा है

सहज बनाया है

गहरा बनाया है

प्रश्न की तरह मुझको

अर्पित कर डाला है

सबके प्रति

दान हूँ तुम्हारा मैं

जिसको तुमने अपनी अंजलि में बाँधा नहीं

दे डाला !

उत्तर नहीं हूँ मैं

प्रश्न हूँ तुम्हारा ही !

            धर्मवीर भारती

 

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कविता आज और अभी

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जिस तरह धुंध में लिपटे हुए फूल

इक इक नक्श तेरा याद आया

ये मुहब्बत भी है क्या रोग ' फराज'

जिसको भूले वो सदा याद आया।

                                    फराज 

 

 

 

  

 

 

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बुझते चिरागोँ से उठता धुँआ  
कह गया .. अफसाने, रात के
कि इन गलियोँ मेँ कोई  
आ कर,... चला गया था
रात भी रुकने लगी थी,
सुन के मेरी दास्ताँ
चाँद भी थमने लगा था
देख कर दिल का धुँआ
बात वीराने मे की थी,
लजा कर दी थी सदा  
आप भी आये नही थे,
दिल हुआ था आशनाँ ..  !

रात की बातोँ का कोई गम नहीँ
दिल तो है प्यासा, कहेँ क्या ,  
आप से, ...अब .. .हम भी तो
हैँ हम नहीँ ! 

              -
लावण्या

 

 

 

 

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कोई साथ में है

 
हवा में घुल रहा विश्वास
कोई साथ में है

धूप के दोने
दुपहरी भेजती है
छाँह सुख की
रोटियाँ सी सेंकती है
उड़ रही डालें
महक के छोड़ती उच्छवास
कोई साथ में है

बादलों की ओढ़नी
मन ओढ़ता है
एक घुँघरू
चूड़ियों में बोलता है
नाद अनहद का छिपाए
मोक्ष का विन्यास
कोई साथ में है

    -पूर्णिमा बर्मन

 

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नरगिस

लहरा कर, सरसरा कर, झीने झीने पर्दो ने,
तेरे, नर्म गालोँ को जब आहिस्ता से छुआ होगा
मेरे दिल की धडकनोँ मेँ तेरी आवाज को पाया होगा
ना होशो ~ हवास मेरे, ना जजबोँ पे काबु रहा होगा
मेरी रुह ने, रोशनी मेँ तेरा जब, दीदार किया होगा !
तेरे आफताब से चेहरे की उस जादुगरी से बँध कर,
चुपके से, बहती हवा ने,भी, इजहार किया होगा
फैल कर, पर्दोँ से लिपटी मेरी बाहोँ ने
फिर् ,तेरे,मासुम से चेहरे को, अपने आगोश मेँ, लिया होगा
..
तेरी आँखोँ मेँ बसे, महके हुए, सुरमे की कसम!
उसकी ठँडक मेँ बसे, तेरे, इश्को~ रहम ने,
मेरे जजबातोँ को, अपने पास बुलाया होगा
एक हठीली लट जो गिरी थी गालोँ पे,
उनसे उलझ कर मैँने कुछ सुकुन पाया होगा

तु कहाँ है? तेरी तस्वीर से ये पुछता हूँ मैँ.
.
आई है मेरी रुह, तुझसे मिलने, तेरे वीरानोँ मैँ
बता दे राज, आज अपनी इस कहानी का,
रोती रही नरगिस क्यूँ अपनी बेनुरी पे सदा ?
चमन मेँ पैदा हुआ, सुखन्वर, यदा ~ कदा !!

 

                                     -लावण्या

 

 

 

 


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शब्द   

शब्द जो तुम ने कहे
वो हवाओं मे हैं
शब्द
जो तुम ने कहे,
नही पर चाहते थे

शब्द
जो तुमने मुझसे कहे
पर मैने मने नही
शब्द
जो तुम्हारे मन मे थे
मैने समझने की कोशिश की
शब्द
जो प्यार से कहे
मुझे भिगो गए
शब्द
जो मात्र शब्द थे
मुझे रुला गए
शब्द
जो केवल मेरे लिए थे
मेरी धरोहर बन गए
शब्द
जो मैने सुनने चाहे
तुम ने कहे नही
इन्ही  शब्दों को छूने

चाहने और महसूस करने को
चंद सांसे रोक रखी है
इनके  रिक्त होने से पहले

कह तो दो वो शब्द! 
             रचना श्रीवास्तव
 

 

 

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प्रेम की परिभाषा

 

मेरी सुबह

काली चादर ओढ़े रही

जब बादल छंटे

सुर्ख किरणों की संध्या आयी

मेरी गर्दिशी का कोई तारा टूटा

मैंने उससे पूछा

क्या खेलूँ कोई खेल दूजा?

अब न अल्पना होगी

न कुमकुम

न आरती

न पूजा

बस प्राकृतिक प्रेम की परिभाषा

आकाश

और

आगोश में उसके

चन्द्रमा

     तितिक्षा शाह 

 

 

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प्रतिदान

भेंट लहर की

प्रियतम

तट को

एक बड़ा-सा

क्षितिज का

हिस्सा

 

मोती-हीरे

तो हैं केवल

हर इक रोज का

नन्हा किस्सा

 

प्रतिदान

हमेशा

तट का एक

उसका अवयव

बस कुछ

रेत!

-दिव्या माथुर

 

 

 

 

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प्यार में मिलावट नहीं

 

प्यार में मिलावट नहीं

कोई शिकवा नहीं शिकायत नहीं

प्यार में कोई मिलावट नहीं।

 

हों राहें अलग अलग, तो अलग ही सही।

हमारी कोई आदत आपको नापसंद ही सही।

बस हो प्यार आपको हमसे यही सही।

प्यार में मिलावट नहीं...।

 

विचारों की भूमि पर खिलें, भिन्न भिन्न रंगों के फूल।

हों चाहे हमारे बीच, अवरोधों के शूल।

परन्तु भावनाओं की महक में मिलावट नहीं।

प्यार में मिलावट नहीं...।

 

प्यार शब्द है, स्वयं में पूर्ण।

ना है इसमें शब्दों की जाली।

ना है इसके अर्थ में छिपी कोई पहेली।

बस प्यार से आपको प्यार ही सही।

प्यार में मिलावट नहीं...।

 

प्यार होता है चौबीस कैरट का शुद्ध सोना।

स्वार्थ की मिलावट कर, इसका बना ना देना गहना।

जिसमें हो सिर्फ चमक ही चमक, और मोल कुछ नहीं।

प्यार में मिलावट नहीं...।

 

प्रियतम को मात्र प्यार करना।

ना नाम देना ना नाम गिनना, ना लेने देने का हिसाब रखना।

बस हो प्यार बेहिसाब और कुछ नहीं।

प्यार में मिलावट नहीं...।

       -रेणु राजवंशी गुप्ता।

 

 

 

 

 

 

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प्यार के रूप

प्यार कुछ देता है, जिसको कि हम कह नहीं पाते,

यही कारण है कि हम प्यार बिना रह नहीं पाते।

 

तनसे तन मिलते भी देखे हैं, जुदा होते भी,

 

मनसे मनकी ये जुदाई, कभी सह नहीं पाते।

 

लाख आँधी हो, तूफान हो, या कि कहर हो कभी,

दिलों के प्यार के मन्दिर, कभी भी ढह नहीं पाते।

 

प्यार के नाम पे, तनको जो मसलते रहते हैं,

उनकी बहशत किसी हाल में, हम सह नहीं पाते।

 

प्यार मिश्री भी है, अमृत भी है, और मस्ती भी है,

जिसने जाना ये कहा, कुछ और कह नहीं पाते।

 

प्यार राधा भी है, मीरा भी है, और मुक्ता भी,

इसकी खुशबू के बिना, जिन्दा कभी रह नहीं पाते।

                  -अशोक कुमार वशिष्ठ

 

 

 

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उसके दिल की हर धड़कन में

 

 

उस के दिल की हर धड़कन में, खुद को शाम-सहर देखा है

उसने भी मेरी आँखों से, दुनिया का मंजर देखा है

 

ना वो सपनों की शहजादी, ना वो कोई हुस्नपरी है

इस फकीर ने उन आँखों में, लेकिन अपना घर देखा है

 

'उसको' कितनी बार पुकारा, वो बुत भला कहाँ सुनता है

जीवन की हर धूप-छाँव में, पर उसको तो अक्सर देखा है

 

उसकी जुल्फों की छाया में, यौवन में मधुमास बिताया

और उसी आंचल में पलता, अपना राजकुंवर देखा है

                                             -अनिल जोशी

 

 

 

 

 

 

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अमावस की रात को

 

अमावस की रात को

कहा चुपके से आकाश ने चांद को

सूरज के निकलने से पहले

कर दो मुझे कुछ नर्म

बांध लो फिर कुछ कर्म

आओ सितारों को

अब दें जन्म।

         -तितिक्षा शाह

 

 

 

 

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एक गीत और कहो

सरसों के रंग-सा
महुए की गंध-सा
एक गीत और कहो
मौसमी वसंत का।

होठों पर आने दो
रुके हुए बोल
रंगों में बसने दो
याद के हिंदोल
अलकों में झरने दो
गहराती शाम
झील में पिघलने दो
प्यार के पैगाम

अपनों के संग-सा
बहती उमंग-सा
एक गीत और कहो
मौसमी वसंत का।

मलयानिल झोंकों में
डूबते दलान
केसरिया होने दो
बाँह के सिवान
अंगों में खिलने दो
टेसू के फूल
साँसों तक बहने दो
रेशमी दुकूल

तितली के रंग-सा
उड़ती पतंग-सा
एक गीत और कहो
मौसमी वसंत का।

     - पूर्णिमा बर्मन

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  कहानी (समकालीन)

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राबिन शॉ पुष्प

अहसास का धागा

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आज से चालीस साल पहले उसने कहा था-" जंग में प्यार नहीं होता, लेकिन प्यार में जंग संभव है...इसलिए मैं तुमसे कहती हूँ, अगर तुम दुःखद हादसे को टालना चाहते हो, तो मेरी बात मान लो...।" ... तब मैं ' कैरम' का डिस्ट्रिक्ट और कॉलेज चैम्पियन था। फुटबाल का बेहतरीन खिलाड़ी... अपनी 'नवीन' टीम का कप्तान। हर मैच जीतकर, हाफ-पैंट और हरी सफेद जर्सी में, कंधे पर बूट लादे उसके यहाँ पहुँच जाता था। वह दरवाजे पर खड़ी मेरा इन्तजार करती थी...मैं दूर से अपनी जीत का इशारा करता था और वह खुशी से ताली बजाकर मेरा स्वागत करती थी...।

ऐसा ही कोई एक दिन था...वह गेट पर खड़ी थी प्रतीक्षारत मैने उसके करीब जाकर कहा था-

इस दरवाजे पर

मेरी आहट को रुकी तू,

कहीं गुजरें न

यहीं से कहारों के कदम...

कि मेले में-

हाथ छूटी बच्ची की तरह फिर

हर शाम मरेगी

हर उम्मीद तोड़ेगी दम!

अगर ऐसा हुआ...

तो समझ लूंगा मैं-

इस व्यापारी से जग ने,

इक और भरम दिया है...

वह गुमसुम मुझे देखती रही! साँप सूँघी!  

" क्या हुआ गुड़िया? आज मैं फिर जीत कर आया हूँ। मेरा स्वागत नहीं करोगी, एक कप चाय से? "

" जंग में प्यार नहीं होता, लेकिन प्यार में जंग संभव है...इसलिए मैं तुमसे कहती हूं , अगर तुम इस दुःखद हादसे को टालना चाहते हो, तो मेरी बात मान लो।"

" मैं समझा नहीं!"

" तुम्हारे दोस्त तुमसे मांग करते हैं और लगभग हर मैच में तुम गोल दिया करते हो। तुम भूल जाते हो कि मैने भी तुमसे कुछ मांगा है।"

" क्या?"

" कहानियाँ और लाल चूड़ियां..."

" मुझे हरा रंग पसंद है। हरे कांच की चूड़ियां चलेंगीं?"

" नहीं। बस यूँ समझ लो, मैं कम्यूनिस्ट हूं। मुझे लाल रंग प्रिय है। अपना अधिकार मांग रही हूं, नहीं मिलेगा, तो छीनकर ले लूंगी...जंग में सबकुछ जायज है।"

और सचमुच, वह मुझसे कहानियां लिखवाने लगी...जब भी मेरी कोई कहानी छपती, उस लगता उसने एक किले पर कब्जा कर लिया...वह एक के बाद एक जंग जीतती गयी...कि अचानक एक दिन, वक्त के आतंकवादी ने कुछ इस तरह छल से हमला किया कि हम दोनों का प्यार लहूलुहान हो गया...उसकी शादी हो गई। उस रोज, कहानी छोड़कर मैने फिर एक कविता लिखी-

ये तू, कि जिसने-

मेरी पीड़ा को छांव दी,

अब होके अलग

अश्कों में ढली जाती है

ये तू नहीं-

हर औरत की कोई लाचारी है

जो सिक्के की तरह

हाथों से चली जाती है...

ये पंक्तियां और इस तरह की ढेरों पंक्तियां डायरी के पन्नों के बीच फूलों या पत्तों की तरह दबकर सूख गयीं...कहीं कोई खुशबू नहीं...कोई हरापन नहीं...मगर मुझे हरा रंग पसंद था, पसंद है और तबसे तो और भी, जबसे बुध की महादशा शुरु हुई...और लाल रंग?

अंतिम बार उसने कहा था " मेरी शवयात्रा में आओगे?"

" शवयात्रा?"

" वही, विदाई-समारोह...डोली उठने पर लोग रोयेंगे, जैसे अर्थी उठने पर रोते हैं...मुझे लाल रंग प्रिय है...तुम देख लेना, लाल साड़ी और लाल चूड़ियों में तुम्हारी यह कम्यूनिस्ट गुड़िया कैसी लगती है...।"

मैने, बस इतना कहा था-" हम दोनों के प्यार को सलीब दी गयी...लहू की टपकती बूंदों से हम तर हो गये...तुम तो कम्यूनिस्ट हो ही, जाते-जाते मुझे भी प्यार में कम्यूनिष्ट बनाकर जा रही हो...अब दोनों को, शेष जीवन, इस लाल रंग से मुक्ति नहीं मिलेगी...।"

मगर एक दिन उसे इस रंग से मुक्ति मिल गई, जिस दिन उसके माथे का लाल रंग पोंछ दिया गया...! इन लम्बे वर्षों में न मैं उससे मिला, न वह मुझसे...मैं मुंगेर से पटना आ गया, वह व्याह कर मुंगेर से बेगूसराय चली गयी...हम दोनों अपने-अपने परिवारों में खो गये...। मैं कई बार साहित्यिक कार्यक्रमों के सिलसिले में बेगूसराय गया...उससे कभी नहीं मिला...वजह यह थी कि मुंगेर आने से पहले हम बेगूसराय में रहते थे...1954 में घर-बार बेचकर मुंगेर आ गये...मैने जे.के. हाईस्कूल से मैट्रिक और जी.डी. कालेज से इंटरमीडियट किया था...उसने कहा था-" यह कितना अजीब संयोग रहा! तुम लोग परिवार सहित बगूसराय से उजड़कर बसने के लिए मुंगेर चले गये और मैं मुंगेर से उजड़कर अपना घर बसाने बेगूसराय जा रही हूं...तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि हम अपने-आपसे भाग रहे शरणार्थी जैसे हैं...।" 

" अधिकतर धार्मिक उन्माद में ऐसे हालात बनते हैं, जब आदमी को शरणार्थी बनना पड़ता है...हमारे बीच धर्म की दीवार नहीं रही!" मैने कहा था।

वह मुझे देखती रही...फिर बोली-" जो पूरे मन और आत्मा की गहराई के साथ धारण किया जाये, वही 'धर्म' है...हम दोनों 'प्यार ' को धारण करके 'धार्मिक' बन गये...इसी प्यार के धर्म ने हम दोनों को बारह वर्षों तक विश्वास की तकली पर चढ़ाकर अहसास के धागे में बदल दिया है...पहले तुम रूई की तरह कहीं उड़ रहे थे, मैं कहीं और भटक रही थी...अब न तुम रूई रहे, न मैं...   हम धागा बन चुके हैं...हमें अब कोई लग कर, फिर से रूई में तब्दील नहीं कर सकता...इसलिए ध्यान रखना, विश्वास की तकली पर काता गया यह अहसास का धागा तुम्हारी गलती से टूट न जाये...अहसास और सांस, दोनों के टूटने से मृत्यु होती है...!"

मेरा स्वर आपसे आप काँपने लगा-" तुम्हारे जाने के बाद, मेरा क्या होगा?"

" तुम...अब तुम कहां...और मैं, मैं कहाँ...'हम' बन चुके हैं...हम यानी विश्वास की तकली पर बारह वर्षों तक काता गया अहसास का धागा...याद रखना, अहसास और रिश्तों में फर्क होता है...रिश्ते में ज्यादातर लोग समझौता करते हैं, कभी झुकते हैं, कभी रिश्तों को झेलते हैं और कभी-कभी रिश्तों के बीच अहसास का पौधा भी जन्म ले लेता है...मैने तुमसे कहा न, सांस और अहसास दोनों के टूटने पर मृत्यु होती है...सांस टूटने से इन्सान मरता है, अहसास टूटने से 'प्यार'...।"

और यही वजह थी कि मैं बेगूसराय जाकर भी, उससे कभी नहीं मिला...हां, अहसास के उस धागे को रोजरी या जनेऊ की तरह धारण कर, मैं कभी 'धार्मिक' बन गया था... आज तक मैने 'धर्म' परिवर्तन नहीं किया...शायद इसीलिए, यह सुनकर कि वह अकेली हो गई है, अत्यंत दुःखी है...मैं अपने को रोक नहीं सका!

 वह जहां रहती थी, मैने कई लोगों से उसके बारे में पूछा। कोई उसे नहीं जानता था। मन कांच की तरह चमक गया...हे प्रभु! इस शहर में, इस कदर अनजान-अनाम है मेरी गुड़िया!

एक आदमी ने कहा ग्रीन दीदी...ग्रीन मैडम...ग्रीन मेमसाहब...यहां उन्हें नाम से गिने-चुने लोग ही जानते हैं...हरदम हरी चूड़ियों से भरी कलाइयां, हरी साड़ी...सभी ने अपनी उम्र के हिसाब से उनका नामकरण कर लिया...मगर अब, सफेद सूती साड़ी...एकदम नंगी कलाइयां...!" 

वह दरवाजा खोलती है...सफेद सूती साड़ी...नीम-नंगी कलाइयां- " तुम? ...आओ, भीतर आओ...!"

मैं कमरे में दाखिल हो गया। वह भीतर चली गयी। मैं सोचने लगा कभी इस लड़की ने कहा था- "जंग में प्यार नहीं होता, लेकिन प्यार में जंग संभव है...इसीलिए मैं तुमसे कहती हूँ, अगर तुम इस दुःखद हादसे को टालना चाहते हो तो मेरी बात मान लो...मुझे चाहिए कहानियां और लाल चूड़ियां...!"

" मुझे हरा रंग पसंद है। हरे कांच की चूड़ियां चलेंगीं ?"-मैने कहा था।  

" नहीं! बस यूँ समझ लो, मैं कम्यूनिस्ट हूं। मुझे लाल रंग प्रिय है। अपना अधिकार मांग रही हूँ, नहीं मिलेगा, तो छीनकर ले लूंगी ...जंग में सब कुछ जायज है।"

वह चाय लेकर आ जाती है।

मैं देखता हूँ...नंगी कलाइयां और सफेद रंग की सूती साड़ी...सफेद रंग! यह रंग उसने कब चाहा था! उसे तो लाल रंग प्रिय था...।

"क्या सोचने लगे? चाय पीओ, ठंडी हो जायेगी।"

मैने प्याली लेकर, पहली चुस्की ली। वह चुपचाप मुझे देखती रही। फिर धीरे से बोली-"तुम अपना ध्यान नहीं रखते हो...तुम्हारे बाल कितने सफेद हो गये हैं।"

" और तुमने बहुत ख्याल रखा है अपना! ...अपनी जिन्दगी के खूबसूरत रूमाल के एक कोने में, तुमने जो अहसास का धागा सहेज कर रखा था, उसे क्यों कीड़ों के हवाले कर दिया?"

" यह सच है, इस घर में आते ही, मेरी देह और मेरी इच्छाओँ को, वक्त की दीमक धीरे-धीरे चाटने लगी...अब...अब कुछ भी शेष नहीं...।"-वह अचानक फफककर रोने लगी। 

अपने को जब्त करते हुए मैने कहा- " गुड़िया, हम ये समझे थे, होगा कोई छोटा-सा जख्म, तेरे दिल में बड़ा काम रफू का निकला...।" फिर उसके आँसू पोंछने के लिए मैने हाथ बढ़ाया, तो वह खड़ी हो गयी- " न, मेरा स्पर्श मत करना, न मुझे 'लाचार' या 'बेचारी' समझना... कल मैं उसकी पत्नी थी, आज उनकी विधवा हूँ...साँस टूटने से इंसान मरता है, रिश्ता नहीं-चाहे वह झेला गया हो या समझौते पर टिका हो...मैने 'विधवापन' को धारण किया है, मुझे कभी अधर्मी बनाने की कोशिश मत करना...।"

मैने एक पल उसे देखा...वह सफेद सूती साड़ी के आँचल से आँसू पोंछ रही थी...फिर मैं, अपनी जेब में हाथ डालकर कुछ टटोलने लगा...दरवाजे के करीब आकर, मैने कहा-" अच्छा ग्रीन...अब चलता हूँ...।" 

वह निकट आ गयी-" तुम्हें मेरा नया नाम मालूम हो गया...अच्छा हुआ...यह सच है कि ब्याह के बाद मैं हमेशा हरी चूड़ियां और हरे रंग की साड़ियां पहनती रही...बस, इसलिए कि वक्त के आतंकवादी ने, मुंगेर में छल से जो जख्म दिया था हमेशा हरा रहे...पति के होने और प्रेमी के न होने के अहसास को मैने भरपूर जिया है...हाँ, ये कुछ रुपये तुम मेज पर भूल गए थे...।"

"रख लो, शायद काम आ जायें...।"

" कुछ लोगों का उसूल रहा है-मुहब्बत करो, खाओ-पियो और मौज करो। ऐसे लोग मुहब्बत को, सिक्के की तरह एक दूसरे के जिस्मों पर खर्च करते हैं और आकिरी वक्त में एकदम कंगाल हो जाते हैं। कुछ लोग मोहब्बत को बेशकीमती सिक्का समझकर , बड़ी ही खामोशी से दिल क बैंक में हमेशा के लिए रख छोड़ते हैं...तब वह रकम बढ़ती जाती है...बढ़ती जाती है...मैने भी कभी यही किया था...अब तुम खुद ही अन्दाजा लगा लो कि मैं कितनी अमीर हूँ...और तुम कितना...वर्षों का बहीखाता तो तुम्हारे पास होगा ही...।"

बिना किसी तरफ देखे, मैने हाथ बढ़ाया...उसने हथेली पर सारे रुपये रख दिये...फिर दरवाजा बन्द हो गया।

मैने देखा, घर की खपरैल छत टूटी हुई थी...दीवारें दरक गयी थीं...बावजूद इसके, वर्षों का बही-खाता खोलने पर पता चला, इस दरवाजे के उस पार एक बेहद अमीर औरत रहती है...।  

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 भाग-5

 

 

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कितनी नाकाम कोशिशें की हैं सोच के इस भंवर से निकल आने की,  पर क्या इतना आसान है सब कुछ! आज भी तो पीछा नहीं छुड़ा पाए शेखर सरकार अपनी उन किरकिरी यादों से। तैर ही आती है पिनाकी...मन्द हवा के झोंके-सी, कभी बारिश की रिमझिम बूंदों पे सवार, तो कभी जलती आँच की चिनगारियां साथ लिए।

मां की लाडली बहू, पहले दिन से ही बर्दाश्त नहीं कर पायी थी मां-बेटे के प्यार को- तुम्हारे लिए तुम्हारी मां भगवान हो सकती है, मेरे लिए नहीं!' कठोर जुबां के एक ही हथौड़े जैसे वार ने उनके मन में बसी पत्नी और प्रेयसी की प्रतिमा को भग्न कर डाला था तुरंत ही। आग लग जाती है आजभी तो मन में याद आते ही। इतना तिरस्कार, इतनी नफरत, वह भी मां के लिए...इसी मां की पुजारिन बनकर ही तो आई थी पिनाकी उनके जीवन और इस काली बाड़ी में। पर हजारों बार समझाने के बावजूद भी, कैंची सी चलती जुबां ने उनके बीच रचे-बुने पति-पत्नी के रिश्ते का ताना बाना तक काट डाला।

छोटे-बड़े अतृप्त और असमर्थ अहसासों का कौन सा किनारा अब उन्हें डूबने से बचा पाएगा, कभी जान ही नहीं पाए शेखर सरकार। हार पर  घुटने न टेकने वाले शेखर सरकार सचमें भ्रमित और खुद से अनजान थे- ' क्या सच में वे दूसरों से अलग हैं... गैर जिम्मेदार हैं, जैसा कि पिनाकी उन्हें समझती है? क्रूर और विक्षिप्त हैं जैसा कि मनु उन्हें समझने और जानने लगी हैया बस कमजोर...बेहद कमजोर हैं वह ! खुद को पर बदलें तो बदलें कैसे  आखिर वह?'

पर बदलना तो पिनाकी के काली बाड़ी में आते ही; मां, पिनाकी और उन्हें, तीनों को ही पड़ा था। लाइव करेंट का एक खुला वायर थी पिनाकी। छूते ही, गले लगाते ही सब कुछ तो बदल गया था उनका। सन्न हो गयी थी पूरी काली बाड़ी--- झुलस गया था  सब...नौकर, नौकरानी, फूल-पत्ती सभी कुछ। मां, शेखर और पिनाकी की जिन्दगी तो हमेशा के लिए ही।

  मैं इस तरह से यहां, तुम्हारी मां के साथ अब और नहीं रह सकती। दो मिनट का भी वक्त नहीं तुम्हारे पास अपनी नयी-नवेली व्याहता के लिए।

शादी के अगले दिन ही जब हमेशा की तरह मां के पास बैठकर, उनका हालचाल पूछकर शेखर रात कमरे में वापस  पहुंचे थे  तो बिना किसी लाग-लगाव के, उसी वक्त पत्नी ने डंके की चोटपर बेहद ही स्पष्ट शब्दों में, अपने मन्तव्य का एलान कर दिया था। पर आजभी, हजार इन खामियों और बद्मिजाजी के बाद भी, भुला क्यों नहीं पाए आजतक शेखर सरकार अपनी पत्नी पिनाकी को? क्या इसलिए कि यह वही पिनाकी है जिसने उन्हें जिन्दगी का सबसे हसीन तोहफा दिया ...जिसकी कोख से उनकी लाडली बेटी मनु का जन्म हुआ ... जिसकी गोदी में मनु का हंसता-खेलता बचपन अनगिनत लोरी और कहानियां सुनता पला बढ़ा ? या फिर इसलिए कि यह वही पिनाकी है जिसके साथ हजार मतभेदों के बावजूद भी उन्होंने अपने जीवन के अनगिनित सुखद पल जिए और यही वह पिनाकी है जो आजभी उन्हें शायद इसदुनिया में सबसे ज्यादा चाहती है... ? बचपन से ही तो आकर्षित थी पिनाकी उनकी ओर, शेखर सरकार भलीभांति जानते थे इस सच को। भूल भी कैसे सकते हैं आखिर वह अपनी लाडली मनु की मां को ...तनमन न्योछावर करने वाली प्रेयसी और पत्नी पिनाकी को? यही तो एक ऐसा सच है जिसकी वजह से वे दूसरों से क्या, खुदसे भी कटते ही चले गए। एक ऐसा सच, शेखर सरकार के बहते आँसू गवाह हैं जिसके। मनु गवाह है जिसकी। और यही तो वह पिनाकी है जिसकी वजह से उनकी अपनी बेटी मनु...लाडली मनु, जो कभी खुद से भी ज्यादा प्यार करती थी उन्हें...उनकी सबसे ज्यादा अपनी थी, आज नफरत करती है उनसे। औरतों पर जुल्म करने वाला निष्ठुर, क्रूर राक्षस समझती है उन्हें। जिस मनु को गोदी में उठाकर उन्हें लगता था कि मानो खुद उनका अपना बचपन हंसता किलकता गोदी में वापस आ बैठा है...जिन्दगी को अपनी तरह से जीने का एक और मौका मिला हो उन्हें,  वही मनु अब उनसे कितनी दूर जा चुकी है। जिसे देखकर ...जिसकी मीठी-मीठी और तोतली बातें सुनकर उनकी आत्मा तक तृप्त हो जाया करती थी, आज उनसे  बात तक नहीं करना चाहती। साये तक से कतराती है उनके...नफरत करती है उनसे।

सोच और शान्त नदी से चुपचाप बहते आंसू, दोनों ही रुकने का नाम नहीं ले रहे थे और हठीली यादें काली बाड़ी के आंगन में ठिठकी खड़ी नन्ही मनु सी ही मचली जा रही थीं...बाहें फैलाए...कभी गोदी में आने को तो कभी कांधे पर बैठी बैठी....। देहलीज लांघते ही सुबह-शाम दरवाजे से ही तो आवाज लगाते थे शेखर सरकार, चुम्मू, पुच्ची दे और हाथ का होमवर्क तुरंत ही वहीं पटकती नन्ही मनु दौड़ पड़ती थी पापा की गोद में चढ़ने को। और तब- नहीं, नहीं, यह नहीं। यह तो खट्टी वाली है। वह मीठी, और मीठी वाली। प्यार की बौछार होने लगती थी बाबा और मनु  के बीच । और तब मंत्रमुग्ध-सी कमरे के बीचोबीच खड़ी पिनाकी अनूठे मातृसुख के सुख-सागर में डूब जाया करती थी। दूर से ही उन्हें हंस-हंसकर देखती ही रह जाती थी।

यादों के पच्चीस साल पुराने उस  ठूंठ से अब  उतर आना चाहते थे शेखर सरकार, परन्तु अकेला वह पत्ता भी सूखी डाल पर अटका रहा और खुद वह भी।

ऐसे क्यों देख रही हो पिनाकी यूं अब हमें तुम? मनु तो बस मेरी ही बेटी है। चाहो तो पूछ लो? 

शेखर सरकार हंस-हंसकर चुटकी लेते और तुरंत ही बेटी से पूछते क्यों बेटा, अच्छा यह तो बता, किसकी बेटी है तू...अम्मा की या बाबा की?

बाबा की!‘- तोते सी चहकती मनु  दौड़कर बाबा की पीठ पर लटक जाती। गोद में लदी-चढ़ी घर और स्कूल की एक-एक खबर का आँखों देखा हाल बाबा को सुनाने लग जाती...वह भी ध्यान से मां को देखती, हंसती और खिलखिलाती। गर्दन हिला-हिलाकर बाबा के कन्धे पर झूलती खूब सारी खट्टी-मीठी एक साथ ही दे डालती उन्हें...इस गाल पर, उसगाल पर, हंसते बाबा के पूरे ही चेहरे पर। और तब पिनाकी से बाप-बेटी के बीच चल रहा वह लाड़-प्यार न सहा जाता, अंदर तक ईर्षा की एक मीठी दाह जल उठती उसके। हंस-हंसकर तब खुद भी तो छेड़छाड़ में शामिल हो ही जाती थी वह।

जबर्दस्ती बेटी को गोदी में खींच लेती। बारबार पूछने लग जाती, ' अब थोड़ा मुझे भी प्यार नहीं करेगी क्या मेरी बेटू...' हंस-हंस बेटी को गुदगुदाती और दुलराती। पर मनु का ध्यान बाबा में ही लीन देखकर अगले पल तुनक भी जाती,   अच्छा, अच्छा, बाबा की लाडली! यह तो बता, इस दुनिया में कैसे आयी बिना मेरे... मैं भी तो सुनूँ जरा... इसके लिए तो इसी मां की ही मदद लेनी पड़ी होगी? ‘

इसके पहले कि तब सर खुजलाती नन्ही मनु कुछ बोल तक पाए, वापस गोदी में उठाकर गोल गोल घुमाते, चरखी देते बाबा बोल पड़ते, बाबा के कान से! ‘ और लाडली मनु पूरी तरह से संतुष्ट हो जाती। गर्व से मां की तरफ देखती  कहती, ‘ मां, मां, अब तो हमें बहुत भूख लगी है। जल्दी से मेरा और बाबा का खाना दो।' मानो मां को याद दिला रही हो- 'नहीं मां, तुम्हें भी हम बहुत प्यार करते हैं। अपनी छोटी बड़ी हर जरूरत के लिए तुमपर ही तो आश्रित हैं हम।' मानो मां को भी खुश करने का गुर भी पेट से ही सीखकर आई थी उनकी लाडली मनु। और तब स्नेह से छलकती आँखों को पोंछती तुरंत ही पिनाकी उठ खड़ी होती- अरे, देखो तो आठ बज गए और मैं हूँ कि बच्ची के संग बच्ची बनी खेल रही हूँ और सभी भूखे बैठे हैं!"

'मां आज खीर बनाना, और रसगुल्ला भी।' जाते-जाते लाडली मां को रोज ही कुछ नया कुछ याद दिला जाती दरवाजे से पलटकर। बेटी के इन्ही नन्ही-नन्ही फरमाइशों के सहारे ही तो पिनाकी जिन्दा थी। उसका तो मानो पूरा जीवन ही सार्थक हो उठता।

अभी लायी, मेरी गुड़िया रानी। कहते-कहते मुंह न थकता उसका। हाथ पैरों में मानो पंख लगे रहते। सर्दी-ताप कुछ न सताता उसे।  बेटी और पति के स्नेह में, घर-गृहस्थी में इतनी आलिप्त जो हो चुकी थी पिनाकी कि योगी जिसे मोक्ष कहते हैं; शायद वही पा लिया था उसने। उसके सूने और बेरंग वैवाहिक जीवन के लिए बहारों का पता थी उसकी मनु---एक आनंद लहरी---उसकी अपनी भागीरथी थी लाडली मनु, जो उदास कुनबे और दाम्पत्य जीवन में जान डालने के लिए ही तो आयी थी ....।

पूरनमासी के चांद-सी दिन प्रतिदिन और-और उजाला करती, और-और खुशियां फैलाती  एकदिन झट से बड़ी भी हो गयी मनु। और फिर तब, बहुत रह चुकी यहां, भारत के इस धूल धक्के में मैं, अब और नहीं रह पाऊँगी यहां।   

बड़े काका की तरह ही, मनु ने भी आखिर वह धूमकेतु-सा उपद्रवी एलान कर ही दिया था एकदिन। शेखर नहीं, सुब्रतो काका का ही स्वभाव पाया है उनकी मनु ने। बड़े-बड़े सपने और सपनों में बसे बड़ बड़े शहर...बस उन्ही में घूमती रहती थी वह भी। उन्ही की तरह आर्किटेक्ट ही बनना था उसे भी ...और वह भी लंदन की ब्रूनेल यूनिवर्सिटी से ही पढ़कर ...और आखिर हो भी क्यों न, दादा की ही तरह वज़ीफों की एक लम्बी फहरिश्त थी उसकी मुठ्ठी में भी तो।... पर इंगलैंड पहुँचते ही उसकी खुशनुमा छोटी-सी दुनिया गिरफ्त से खुलती गांठ सी फिसलकर बिखर जाएगी यह कब सोच पायी थी मनु।  

हर लड़ाई अकेले-अकेले ही लड़ती, दिनरात बस पढ़ाई करती मनु के सारे वे सूने और एकाकी दिनरात अक्सर ही अम्मा-बाबा के प्यार को, लाड़ दुलार को तरसते ही रह जाते। हर बात रोज ही बाबा से बांटने वाली मनु के आसपास ऐसा कोई नहीं था जिसके सामने वह बेझिझक अपने मन की बात तक कह पाए। सुख-दुख बांट ले। आखिर चिठ्ठियां भी कितनी लिखती ...वैसे भी अपनी उलझनों से और दुखी नहीं करना चाहती थी  अब अम्मा- बाबा को। बड़ी हो गई थी मनु। फिर धीरे-धीरे कुछ दिनों में  वह पत्रों का सिलसिला भी सूख गया। और बेहद लाड़-प्यार से बिगड़ी मनु ने यथार्थ की हर बोझिल जिम्मेदारी को बेहद गम्भीरता और बड़प्पन से ओढ़ लिया अपने ऊपर, इंगलैंड के उस ठंडे अंधेरे मौसम की तरह ही । आदत डाल ली  उसने भी धीरे-धीरे अकेले रहने की।  

अकेले हो गए तीनों एकबार फिर, ढाक के तीन पत्तों से, अपनी-अपनी दुनिया में अलग-अलग जीते। शेखर सरकार परिवार की हर समस्याओं से जूझते, सुबह से शाम तक अखबारों में मुंह छुपाए। पिनाकी अपने लड्डू गोपाल  में। और मनु मां-बाप, परिवार...सबसे हजारों मील दूर, अपनी मोटी-मोटी किताबों में।

अकेले ही जीवन की हर लड़ाई जीतते-हारते वे तीनों तो यह तक भूल गए कि आखिर किसके लिए और क्यों लड़ रहे हैं यह कठिन और अथक लड़ाई!..हां उन गुमसुम उदास दिनों को रातों को  बहते काजल की स्याही में डुबो-डुबोकर कागज पर उतारना और फिर उन्हें मन की संदूकची में संभालकर ऱखना जरूर सीख लिया  था मनु ने। क्या पता कभी वक्त मिल ही जाए, तो बाबा के साथ बांटेगी जरूर, शायद इसी एक  चाह में।...  

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दो लघु कथाएँ 

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 नदीम अहमद नदीम, आलोक कुमार सातपुते 

    बहू-बेटी

 

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दो औरतें समय का उपयोग, रिश्ते, नाते, संबंधों पर चर्चा करते हुये कह रही थीं।

पहली औरत-बहन जी! आपकी बेटी काफी दिनों से आपके घर पर है।

दूसरी औरत-क्या करें बहन जी! बिटिया ससुराल में बहुत दुखी थी। मेरी लाडली जिसने अपने घर में कभी पानी का गिलास नहीं उठाया, वहाँ ससुराल में कोल्हू क बैल की तरह काम में लगी रहती थी।

पहली औरत- औरत-सही बात है बहनजी! मेरी बिटिया भी हमारे घर बैठी है उसकी भी यही कहानी है अच्छा बहनजी! आपकी बहू दिखाई नहीं दे रही?

दूसरी औरत ने धीरे से जवाब दिया- "उसको उसकी माँ ले गयी।"

                                                                                                                    -नदीम अहमद नदीम

 

 

 

 

 

 

 

 

   औरतें

 

 

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" हम हिन्दू उदार प्रवृत्ति के व सहनशील होते हैं, इसीलिए तो इतने आक्रमणों के बाद भी हमारा धर्म व हमारी संस्कृति जीवित है।"

 " हम मुसलमान अपने धर्म की रक्षा के लिए जान भी लड़ा देते हैं। हम एक-एक दस-दस के बराबर होते हैं, इसी कारण से तो हम इतने व्यापक हैं।"

 " हम सिक्ख हैं। हमारी उत्पत्ति ही मुस्लिम संस्कृति से हिन्दू संस्कृति की रक्षा हेतु हुई है। लेकिन हाँ, हम हिन्दू नहीं हैं। हमारी बहादुरी तो जगजाहिर है।"

 " हम ईसाई बुद्धिमान होते हैं। हम दलितों को अपने धर्म में मिलाकर उन्हें स्वाभिमान से जीना सिखाते हैं। हमने अपनी बुद्धि के सहारे सारी दुनिया पर राज किया है।"

" हम क्या बोलें...? बस इतना ही कि हम औरते हैं।"

                                                                                              आलोक कुमार सातपुते

 

 

 

 

 

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भव्य-भारती

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भारतीय संदर्भ ही क्या, विश्व संदर्भ में भी यदि प्रेम-प्रसंग हो और ताजमहल की बात न हो, तो बात अधूरी रह जाती है। हममें से अधिकांश ने ताज देखा है पर आज इसी अनोखी इमारत ' ताजमहल' को एकबार फिर भगवतीशरण उपाध्याय जी की आँखों से देखते हैं...।

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दमी जन्मता है, काम करता है, मर जाता है। आदमी खुद कमजोर है पर उसके करतब बड़े हैं, उसकी तदबीर बड़ी है। बड़े-बड़े जानवरों से-हाथी, ऊँट, घोड़े, सांप से वह बहुत छोटा, बहुत कमजोर है। पर उनसे वह कहीं चतुर है, कहीं होशियार। इसी से वह इतने बड़े जानवरों को भी नाथकर उनसे अपना काम लेता है। और जिन शेर, चीते आदि जानवरों से वह काम नहीं ले पाता उन्हें भी वह पकड़कर सर कर लेता है और अपने बनाए चिड़ियाघर में लाकर बंद कर देता है। आदमी का चमत्कार यह है।

आदमी जन्मते लाचार होता है, कमजोर जो खड़ा तक नहीं हो सकता, दूसरों के हाथ पलता है। मरने पर तो वह दुनिया से गायब ही हो जाता है। जनम और मरन के बीच वह काम करता है। वही काम रह जाता है-उसके करतब का काम, तदबीर से किया काम। खुद वह तो कमजोर है पर उसका काम बड़ा है, वही रह जाता है। उसके मरने के सालों-सदियों बाद तक उसकी वह कीरत चलती रहती है, जीती-जागती रहती है।

आदमी भी खुद तो कमजोर है, पर उसकी कीरत बड़ी है, उसका काम बड़ा है, टिकाऊ है। जो वह करता-गढ़ता बनाता है, वह जल्दी नहीं मरता। उसे वह अपने मरने के बाद भी छोड़ जाता है जो उसकी याद दिलाता है। आदमी जीता-मरता है पर उसका काम अमर हो जाता है। उसने इतनी ऊँची, इतनी बड़ी, इतनी सुन्दर इमारतें बनाई हैं जो आज भी जमीन पर खड़ी हैं, इस देश में भी, बाहर के दूसरे देशों में भी। मिस्र के पिरामिडों को जो देखता है, अचरज में पड़ जाता है। डेढ़ हजार मील लम्बी चीन की दीवार जो देखता है, हैरत में आ जाता है। जिन्होंने उन्हें बनाया वे कमजोर आदमी हजारों-सैकड़ों साल पहले मर गये, पर उनकी वे इमारतें आज भी खड़ी हैं और दुनिया के अचरजों में गिनी जाती हैं।

इन्ही की तरह एक अचरज अपने देश का, आगरे का ताज है, ताजमहल, मुमताज महल का मकबरा। संसार की सारी इमारतों से सुन्दर है यह ताज, इसका-सा मधुर कोई सपना नहीं, कोई गीत नहीं। इसका-सा कीमती कोई जवाहर नहीं। ताज पिरामिडों की तरह ऊँचा नहीं, चीनी दीवार की तरह लम्बा नहीं, पर उनसे कहीं महान् इमारत है। उसकी-सी प्यारी, उसकी-सी अनोखी, उसकी-सी नयनाभिराम दुनिया की कोई चीज नहीं। आदमी जाता है, ताज को देखता है और चकित हो जाता है। उसी में खो जाता है। उसकी बनावट, उसकी सादगी, उसकी सफाई, उसकी खूबसूरती का शिकार हो जाता है।

ताज सफेद संगमरमर का बना है। चारों कोनों पर चार ऊँची बुर्जियाँ जैसे आसमान में तीर मारती हैं, जमुना की लहरियाँ लहराती हैं। ताज जमुना के किनारे बना है और जब जमुना सूखी नहीं रहती तो समूची इमारत की छाया उसकी लहरों में डोला करती है। यह ताज आरजूमंद बानू बेगम की कब्र है। आरजूमन्द बानू बेगम प्रसिद्ध मुगल बादशाह शाहजहां की मलका थी, उसके चौदह बच्चों की माँ। उसका दूसरा नाम मुमताज महल था और इसी नाम पर उस मकबरा का नाम पड़ा।

आरजूमन्द बानू बेगम मलका नूरजहाँ की भतीजी थी, उसके भाई और सम्राट जहांगीर के वजीर आसफखाँ की बेटी। उसी के मरने पर शाहजहाँ ने यहाँ उसकी कब्र बनवायी। शाहजहाँ के बराबर शानदार दुनिया में कोई बादशाह नहीं हुआ। उसकी-सी शानदार और आलीशान इमारतें किसी ने नहीं बनवायीं। ताज बनवाकर वह अपने महल के कमरे से सालों, मरने के समय तक उसे देखा करता। ताज उसे प्रिय था।

इमारत में नीचे उतरकर वह कमरा है, जिसमें मुमताज महल और शाहजहाँ, दोनों की कब्रें हैं। उसके चारों ओर आठ कमरे बने हैं जिनमें बराबर कुरान का पाठ हुआ करता था और मधुर कंठ वाले गवैये गाया करते थे। कब्रों के चारों ओर संगमरमर की अचरज की खूबसूरती जाती दौड़ती है। दुनिया में अच्छे से अच्छे कलावन्तों ने उस जाली को दस बरस में काट-तराशकर तैयार किया था। 

कब्रों के सफेद पत्थर, कभी न मुरझाने वाले ईरानी फूलों के बाग बन गये हैं। जिस खूबी के साथ मुगल काल का जादूगर चितेरा अपने चित्रों का हाशिया लिखता था, उसी बारीकी से संगतराश ने अपनी छेनी से पत्थरों पर यह फूलों का बाग उगा दिया है। और इस कब्र पर कभी मलिन न होने वाले सुन्दर अक्षरों पर लिखा है-" आरजूमन्द बानू बेगम मुमताज महल की मजार मृत्यु 1040 हिजरी।"

बाहरी मेहराबी दरवाजा कारवाँ सराय से घिरा है। उसके बिचले मेहराब पर संगमूसा के बारीक हरफों में खुदा है- पाकदिल बहिश्त के बाग में प्रवेश करें।

इस दरवाजे से ताज का समूचा शरीर दिखाई पड़ता है। सफेद, चाँदी की परी-सी इमारत जमीन पर कुछ ऐसी हल्की-फुल्की बैठी है कि लगता है, क्षण भर में पंख मार कर उड़ जाएगी। इतने कम विस्तार में इतनी घनी सुधराई! कहीं कुछ कम नहीं, कहीं कुछ ज्यादा नहीं, जैसे कुदरत ने तौलकर रख दिया है। कुछ घटाया-बढ़ाया नहीं जा सकता, कुछ बदला नहीं जा सकता।

सामने पत्थर की पटरियों से सजा बगीचा है, शायद दुनिया का सबसे सुन्दर बगीचा, जिसके बीच एक पतली नहर फाटक तक चली गयी है। बाग भी इमारत का ही एक हिस्सा था। इमारत की खूबसूरती इस बाग से, इसके सरों के पेड़ों से और भी बढ़ जाया करती थी। सामने एक चबूतरा ऊपर है, दूसरा नीचे। एक के फैले मैदान में फूलों का बाग कढ़ा है, दूसरे पर ताज की मीनारें बनी हैं। उनके बीच ताज ऐसा लगता है जैसे चार लम्बी सहेलियों के बीच सुगढ़ शहजादी।

दोनों ओर मस्जिदें खड़ी हैं, लाल पत्थर की मस्जिदें। ताज की इमारत एक जनानी नजाकत लिए हुए है। किसी ने उसे ' संगमरमर के रूप में सपना' कहा है, किसी ने ' फरिश्ते का जाहिर अफसाना'। कुछ भी कहा जा सकता है इस शरीफ इमारत की तारीफ में, और जो कुछ कहा जाएगा वही सारा सही होगा।

ताज बनने का किस्सा भी गजब का है। शाहजहां ने इन्जीनियरों से ' माडल' माँगे। इमारत बनने के पहले उसका माडल तैयार किया जाना है न! सो उसने माडल मांगे। माडल आये-चीन-मंगोलिया से, समरकन्द-फरगना से, ईरान-खुरसान से, ईराक अरमीनिया से, काहिरा-अलहमरा से, वेनिस-कस्तुन्तुनिया से। एक-से-एक खूबसूरत माडल आये, खूबसूरती और इमारती रौनक क नमूने। उस्ताद ईसा का शीराजी नमूना शाहजहाँ को जँच गया। उसकी सादगी ने उसे मोह लिया।

काम शुरु हो गया। हिन्दुस्तान के कलावन्त, फारस के रंगराज, अरब क संगतराश, आरमीनिया के पच्चीकार, कुस्तुन्तुनिया के गुंबजकार, वेनिस के सुनार आगरे में आकर जम गये। जयपुर से संगमरमर आया, सीकरी से संगसुर्ख, पंजाब से सूर्यकान्त पत्थर। चीन से जमरूँद और स्फटिक आये, तिब्बत से नीलमणि, अरब से मूँगा और संगमूसा। पन्ना से हीरे आये, ईरान से बिल्लौर और याकूत, शहर मुंजान से गोमेद।

कहते हैं कि इमारत में करोड़ों रुपये लगे, लाखों मजूर। तब कहीं बीस साल में ताज खड़ा हुआ। काबुल से दकन तक और बंगाल से गुजरात-काठियावाड़ तक के किसानों ने उसी ताज के लिए सालों खेत जोते, व्यापारियों ने सौदागरी की। तब कहीं वह ताज तैयार हुआ। ताज इतना सुन्दर है, इतना कीमती है, बादशाह की मुहब्बत का इजहार है। पर इन सबसे बड़ी बात उसमें यह है कि हमारे देश की बीस बरस की मेहनत, किसानों और मजूरों का पसीना इसमें लगा है। वह हमें बहुत प्रिय है। 

                                                                                                    

 

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laughing

लेखराम चिले निःशंक

मन की अटक जहां, रूप को विचार कहां?

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इस विचित्र दुनिया का सबसे विचित्र प्राणी है-मनुष्य। इस चमत्कारी मनुष्य के पास सबसे विस्मयकारी वस्तु है-मन। इस कल्पनाशील और तड़ित वेग से गमन करने वाले मन की सबसे आश्चक्यजनक देन है-प्रेम। इसे चाहे इश्क कह लो, प्यार, मोहब्बत या स्नेह कह लो-इसका काम एक-नाम अनेक। कमबख्त, इस प्रेम में अनेक हैरत अंगेज करिश्मे हैं। उनमें से एक है-उसकी लचीली तबियत। ठीक रबर जैसी तासीर पायी है इसने-तनने और सिकुड़ने वाली। 

एक लफ्ज 'मुहब्बत' का, इतना सा फसाना है

सिमटे तो दिले आशिक, फैले तो जमाना है।

प्रेम का अक्ल से ज्यादा सरोकार नहीं है, जबकि बुद्धि, मनुष्य को मिला श्रेष्ठतम उपहार है। प्रेम अक्ल के झमेले में नहीं पड़ता। प्रेम की इसी खासियत पर अकबर इलाहाबादी का कलाम देखिए-

इश्क नाजुक मिजाज है बेहद

अक्ल का बोझ उठा नहीं सकता।

तो, आइये इस फागुनी रंग में हम इस 'बेअक्ल' इश्क की कुछ खास लतों और उसकी अटपटी किन्तु चटपटी हरकतों का जायका ही ले लें। प्रेम के चस्के तो इन्सान सहित हर पशु-पक्षी लेता है, इसलिए कविवर बिहारी कह गए हैं-

बहे सदा पशु-नरनि कहें, प्रेम-पयोधि-पगार।

किंतु इश्क के कूचे में, कुछ ज्यादा ही भटककर, कवि और शायरों ने खट्टे, मीठे और तीते अनुभव बटोरे और उन्हें वाणी दी है। यहां कुछ पेश हैं। कबीर साहब के अनुसार यह 'ढाई अक्षर' का प्रेम, न तो खरबूजे की तरह किसी बाड़ी में पैदा होता है, न 'बाटा' और 'लखानी' की चप्पलों की तरह बाजार में ही बिकता है। उसकी कीमत भी बड़ी अजीब है। रुपया-पैसा नहीं, केवल एक अदद सिर-

प्रेम न बाड़ी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय

राजा-परजा जेहि रुचे शीश देह लै जाय।।

इन्ही कबीर साहब के अनुसार ' प्रेम का पथ' सरकस के झूले वाले करतब से भी अधिक खतरनाक है। सर्कस में झूले से गिर जाने पर नीचे लगी वाली (नेट) कुछ रक्षा कर सकती है, किन्तु 'प्रेम के खजूर' से टपकने पर कोई साबुत नहीं बच सकता-

प्रेम-पंथ अति कठिन है, जैसे ताड़ खजूर।

चढ़े सो चाखे प्रेम-रस, गिरे तो चकनाचूर।।

ग़ालिब साहब तो इश्क को आग मानकर भी उसके लगने बुझने से इंकार करते हैं, जबकि कबीरदास इसको ऐसी बुरी बला मानते हैं, जो लगते ही आर-पार हो जाती है-

इश्क पर जोर नहीं, है ये वो आतिश ग़ालिब,

कि लगाए न लगे और बुझाए न बने।

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लागी-लागी क्या करे, लागी बुरी बलाय

लागी सोई जानिए, जो आर-पार हुइ जाय।     -कबीर

 ' प्रेम के कूचे से बेआबरू' होकर निकलने की बात तो हम सबने खूब सुनी है किन्तु कबीर को तो प्रेम में केवल बेइज्जती ही दिखाई पड़ती है-

पीया चाहे प्रेम-रस, राखा चाहे मान।

एक म्यान में दो खड़ग, देखा सुना न कान।।

यही नहीं, नेह के निर्वाह में भी कठिनाइयां ही कठिनाइयां हैं-

अगिन आंच सहना सुगम, सुगम खड्ग की धार।

नेह-निभावन एक रस, महा कठिन व्यवहार।।

कुछ भुक्तभोगी कवि-शायरों ने अपने अनुभव के आधार पर प्रेम को परिभाषित कर उसक लक्षण भी बताए हैं-

अति सूक्षम, कोमल अतिहि, अति पतरो, अति दूर।

प्रेम कठिन सबसे सदा, नित इक रस भरपूर।।

              ...

इक अंगी बिनु कार नहीं, एक रस सदा समान।

गुने प्रियहिं सर्वस्व जो, सोई प्रेम प्रमान।।

              ...

डरे सदा, चाहे न कछु, सहै सब जो होय।

रहे एक रस चाहिके, प्रेम बखाने सोय।।
 

प्रेम मन पटे का सौदा है। इसलिए नागरीदास जी कहते हैं-

दो मन को करि एक मन, भाव देत ठहराय।

शेख आशी साहब तो मन के अटकाव को ही प्रेम का कारण बताते हैं। उनके अनुसार प्रेम में कभी रूप-रंग का कोई विचार नहीं होता-

मन की अटक जहां, रूप को विचार कहां।

रीझिब को पैड़ो, तहां बूझ कछु न्यारी है।।

रसनिधि भी 'रूप-लिप्सा' को प्रेम का कारक नहीं मानते। उनकी दलील है-

जे चेतन क्यों तजें, जाको जा सों मोह।

चुंबक के पीछे लग्यो फिरत, अचेतन लोह।।

प्रेम का चश्मा चढ़ जाए तो प्रेमिका या प्रिया कैसी भी कुरूप क्यों न हो-बस  'हूर' नजर आती है। इसलिए कविवर रसनिधि लोगों को हिदायत देते हैं-

चसमन चस्मा प्रेम को पहिले लेहु लगाई।

सुंदर मुख वह मीत को, तव अवलोको जाइ।।

प्रेम के कूचे में अलख जगाने वाले कवि-शायरों का अनुभव है कि  प्रेम-राग का पहला लक्षण है-दृष्टि-दोष और दूसरा पागल हो जाना। इस असाध्य रोग की चरम परिणति मृत्यु तक हो सकती है। नागरीदास और सहजोबाई की कविता में इन स्थितियों का निरूपण इस प्रकार हुआ है-

इश्क, चमन महबूब का बिरला जावे कोय।

जावे सो जीवे नहीं, जिये सो बौरा होय।।
              ...

प्रेम दीवाने जो भये, पलट गये सब रूप।

सहजो दृष्टि न आवई, कहा रंक, कहा भूप।। 

अनुभव से कहा जा सकता है कि प्रेम और बिजली के करेंट में केवल दो विषमताएँ हैं और शेष सभी समानताएँ हैं। पहली विषमता यह है कि प्रेम में ' फ्लक्चुएशन' नहीं होता और दूसरा यह कि उसका वाल्टेज भी कम-बढ़ नहीं होता-

छिनहि चढ़ै छिन उतरै, सो तो प्रेम न होय।

अघट प्रेम पिंजर बसे, प्रेम कहावै सोय।।    

प्रेम के कैंडे से प्राप्त अनुभव यही निष्कर्ष दे रहे हैं कि प्रेम 'मन पटे का सौदा है। उसमें केवल 'अटकाव' की जरूरत है। 'अटकाव', आकर्षण से होता है। आकर्षण कोई भी हो सकता है-रूप का, रंग का, नयन-नक्श का, चाल-ढाल का, बोल-चाल और किसी 'अदा' विशेष का। रंग मात्र ही किसी लावण्य का बयान नहीं होता। राधा पर कृष्ण का रीझने का कारण केवल उसका गोरा-चिट्टा होना नहीं है। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें भी एक कारण थीं। 'दीरघ-अनियारे नयनों' पर रीझने की बात तो कवि बिहारी भी बता गये हैं। राधा-कृष्ण के 'प्रथम-दर्शन में प्रेम' के भी सूरदास ने दो कारण बताए हैं-

गए स्याम, रवि-तनया के तट, अंग लसति चंदन की खोरी।

औचक ही देखी तहं राधा, नैन-विशाल भाल दिए रोरी।

'सूर' स्याम देखत ही रीझे, नैन-नैन मिली परी ठगोरी।। 

 आकर्षण का कारण सौंदर्य होता है। सुंदरता केवल रंग नहीं होती, शारीरिक सौष्ठव भी उसका एक घटक होता है। अंग्रेजी के एक लेखक का कथन है कि 'ब्यूटी डिपेंड्स आन कट, नाट आन कलर'। शारीरिक सौंदर्य ही केवल सौंदर्य नहीं। इसके अतिरिक्त आचार-व्यवहार, गुण, शालीनता, चतुराई, प्रागल्भता आदि अनेक बातें सुन्दरता प्रदायक होती हैं। ऐसे ही किसी एक या अनेक गुण के कारण, एक गोरी-चिट्टी गोपी, प्रथम दर्शन में ही काले-कलूटे कृष्ण पर रीझ गयी। और ऐसी रीझी कि उसकी आंखों से कृष्ण की छवि निकल ही नहीं रही है। देखिए-

 एकै संग धाये नंदलाल और गुलाल दोऊ,

दुगन गए जु भरि, आनंद मढ़ै नहीं।

धोई-धोई हारी, पद्माकर तिहारी सौं,

अब तो उपाय एकौ चित पै चढ़ै नहीं। 

कैसी करूं, कहां जाऊं, का सों कहों, कौन सुने,

काऊ सो निकासों जा सों दरद बढै नहीं।

ऐसे मेरी बीर, जैसे-तैसे इन आँखिन तें

कढ़ि गौ अबीर पै, अहीर तो कढ़ै नहीं।।

कजरारी आंखें भी प्रेम का दरिया होती हैं जिसमें उतराया और डूबा जाता है-

काजर-सी कारी आंखों में बहा और डूब गया।

केवल महबूबा की  'चाल' पर भी मर-मिटने वाले बहुतेरे हैं। 'गजगामिनी' की चाल पर फिदा होने के कहानी-किस्से पढ़े-सुने थे, किन्तु आजकल तो सिलाई-मशीन (सिंगर) की चाल प्रेम में चलने लगी है-

क्या गजब की चाल है मिस साहिबा।

गोया बखिया कर रही सिंगर मशीन।।

सारांश यह कि 'इश्क' में-' जो जेहि भाव, नीक सोइ तेही' का सूत्र काम करता है। प्रेम-संबन्धों में 'पसंद अपनी-अपनी' के आधार पर जोड़ियां बनती हैं। मिस्टर 'टब' की  युगल बंदी मैडम 'स्वीमिंग पूल' से हो जाती है। हल्की-फुल्की, किसी पोर्टेबल व्यक्तित्व की प्रेमिका किसी भारी-भरकम जंगम वस्तु के गले पड़ सकती है। लंदन की एक प्रसिद्ध अभिनेत्री ने, जो अपने रूप-रंग , नाक-नक्श और सुडौल शरीर और आनुपातिक कद के कारण फिल्म जगत की मलिका मानी जाती है, एक बौने दुबले-पतले और अत्यंत साधारण व्यक्तित्व के धनी टेलर-मास्टर से प्रेम विवाह रचा डाला। पश्रकारों ने जब उनसे इस बेमोल गठजोड़ का कारण पूछा तो अभिनत्री का उत्तर था- " उसकी ऊँचाई मेरे हृदय को छूती है। और कीमती वस्तु छोटी पैकिंग में ही होती है।

यही नहीं. हमारे देश के एक चोटी के धनी उद्योगपति ने जब एक श्यामा युवती को अपनी जीवन-संगिनी बनाया तब उनसे भी कारण पूछा गया तो उनका उत्तर था-" पहला कारण तो यह कि मेरी पत्नी 'घूरने' से बची रहेगी। दूसरा कारण यह कि काले कोयले के गर्भ में ही हीरा होता है।"    

                                            

                                                                 (साभार आजकल)