माह-विशेष 

बसंत पंचमी के आते-आते ही मौसम में एक मादकता सी छा जाती है। बौराए आमों के साथ मानव पशु-पक्षी, पूरी पृथ्वी ही मानो बौरा-सी जाती है। हरियाली धरती पीली सरसों की चूनर ओढ़े नई-नवेली दुल्हन सी खिलने और फलने लगती है और खुले नीले आकाश से झरझर झरती सुहानी गुलाबी धूप मानो पृथ्वी के सारे रंगों को अपनी  सुहानी आभा से कुछ और ही निखार देती है। कुहकती कोयल, दादुर, मोर ...सभी का मन एक नए आल्हाद से झूमने लगता है और हवाओं तक में शुरु हो जाता है एक अनूठा संगीत...एक गुनगुनी छेड़छाड़। फिर तो किसी को याद दिलाने की जरूरत नहीं... पूरी प्रकृति ही शोर मचा देती है, ' जागो! फाग-फगवाड़ा आ गया। मिलन का प्रियतम के साथ छेड़छाड़ का मौसम आ गया। एक दूसरे के रंग में भीगने और भिगोने का मौसम आ गया।'   

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होरि खेलत हैं गिरधारी।

  मुरली चंग बजत उफ न्यारो, संग जुवति ब्रजनारी।

चन्दन केसर छिरकत मोहन अपने हाथ बिहारी।

भरि-भरि मूठ गुलाल लाल चहुँ देत सबन पै डारी।

छैल छबीले नवल कान्ह संग स्यामा प्राण पियारी।

गावत चार धमार राग तँह दै दै कर करतारी।

फागु जु खेलत रसिक साँवरो बाढ्यो रस ब्रजभारी।

मीरा के प्रभु गिरधरनागर, मोहनलाल बिहारी।

फागुन के दिन चार रे, होरी खेल मना रे। टेक।

बिनि करताल पखबाज बाजै अणहद की झणकार रे।

बिनि सुर राग छतीसों गावैं, रोम रोम रंग सार रे।

सील संतोष की केसर चोली, प्रेम प्रीत पिचकार रे।

उड़त गुलाल लाल भयौ अंबर, बरसत रंग अपार रे।

घट के पट सब खोल दिए हैं लोक लाज सब डार रे।

होली खेलि पीय घर आये, सोई प्यारी प्रिय प्यार रे।

मीरा के प्रभु गिरधर नागर चरण कमल बलिहार रे।

                                           -मीराबाई

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होलीः कुछ कविताएँ

 

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नाना नव रंगों को फिर ले आयी होली,
उन्मत्त उमंगों को फिर भर लायी होली !

आयी दिन में सोना बरसाती फिर होली,
छायी निशि भर चाँदी सरसाती फिर होली !

रुनझुन-रुनझुन घुँघरू कब बाँध गयी होली,
अंगों में थिरकन भर, स्वर साध गयी होली !

उर में बरबस आसव री ढाल गयी होली,
देखो, अब तो अपनी यह चाल नयी हो ली !

स्वागत में ढम-ढम ढोल बजाते हैं होली,
हो कर मदहोश गुलाल उड़ाते हैं होली !

                     -महेन्द्र भटनागर

 

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होली के रंग

रंग होली के कितने निराले,
आओ सबको अपना बना लें,
भर पिचकारी सब पर डालें,
पी को अपने गले लगा लें ।

रक्तिम कपोल आभा से दमकें,
कजरारे नैना शोखी से चमकें,
अधर गुलाबी कंपित दहकें,
पलकें गिर गिर उठ उठ चहकें ।

पीत अंगरिया भीगी झीनी,
सुध बुध गोरी ने खो दीनी,
धानी चुनर सांवरिया छीनी,
मादकता अंग अंग भर दीनी ।

हरे रंग से धरा है निखरी,
श्याम वर्ण ले छायी बदरी,
छन कर आती धूप सुनहरी,
रंग रंग की खुशियां बिखरीं ।

नीला नीला है आसमान,
खुशियों से बहक रहा जहान,
मस्ती से चहक रहा इंसान,
होली भर दे सबमें जान ।

कवि कुलवंत सिंह

 

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 फाग

 
फागुन का महीना है, मचा है फाग
होली छाक छाई है; सरस रँग-राग !

बालों में गुछे दाने, सुनहरे खेत
चारों ओर झर-झर झूमते समवेत !

पुरवा प्यार बरसा कर, रही है डोल
सरसों रूप सरसा कर, खड़ी मुख खोल !

रे, हर गाँव बजते डफ़ मँजीरे ढोल
देते साथ मादक नव सुरीले बोल !

चाँदी की पहन पायल सखी री नाच
आया मन पिया चंचंल सखी री नाच !

                      -महेन्द्र भटनागर

 

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होली हाइकू

फागुन मन

इन्द्रधनुष तन

होली पे आज

 

उमड़ा फिर

रंगों का सागर

पलकों तले

 

मलते हम

प्यार का गुलाल

छूटे ना कभी।

       -शैल अग्रवाल

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