अपनी बात        

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 -शैल अग्रवाल      

मार्च का महीना आ गया है। मुड़कर देखती हूँ तो 17 मार्च 2007, वह तारीख है जब एक सपना आँखों से किलककर 'लेखनी ' में आन छुपा  था और उस दिन से आजतक उसी नटखट को ढूँढते,पकड़ते, उसीके पीछे-पीछे दौड़ते-भागते वक्त कितना गुजर गया, जान ही नहीं पायी! 12 अंक और कई-कई पन्नों का सफर तय करती लेखनी वर्ष पूरा भी कर चुकी; विश्वास ही नहीं होता, वह भी पाठकों के भरपूर स्नेह से सिंची- लहलहाती और झूमती...सोचती और देखती हूं तो आँखें आभार से छलक आती हैं ! आभार उन सभी मित्र और पाठकों का , जिन्होंने बड़ी ईमानदारी व लगन से साथ निभाया और लगातार लेखनी के पन्ने पलटते रहे। न सिर्फ इसके हर रूप को चाहते और सराहते रहे, बल्कि विषयों और भावों को भी परखा और जाना। इरादों की, मेहनत की, इस आन्दोलन की कद्र की। इस सफर के दौरान न सिर्फ हमें कई-कई अच्छे दोस्त और सहयात्री मिले, अपितु बहुत कुछ सीखा और जाना भी है हमने आपसे। वाकई में आभारी हूँ  आपके स्नेह और सहयोग की। प्रिय कवि श्री शिवमंगलसिंह 'सुमन' जी के शब्दों में कहूँ तो,

' जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला

उस उस राही को धन्यवाद

जीवन अस्थिर अनजाने ही

हो जाता पथ का मेला कहीं

सीमित पग-डग, लंबी मंजिल

तय कर लेना कुछ खेल नहीं

दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते

सम्मुख चलता पथ का प्रमाद

जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला

उस उस राही को धन्यवाद।

 

साँसों पर अवलंवित काया

जब चलते चलते चूर हुई

पथ के पहचाने छूट गए

पर साथ साथ चल रही याद

जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला

उस उस राही को धन्यवाद।

 

जो साथ न मेरा दे पाए

उनसे कब सूनी हुई डगर

मैं भी न चलूँ यदि तो भी क्या

राही मर लेकिन है राह अमर

इस पथ पर वे ही चलते हैं

जो चलने का पा गए स्वाद

जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला

उस उस राही को धन्यवाद।

 

कैसे चल पाता यदि न मिला

होता मुझको आकुल-अंतर

कैसे चल पाता यदि मिलते

चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर

आभारी हूँ मैं उन सबका

दे गए व्यथा का जो प्रसाद

जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला

उस उस राही को धन्यवाद। '

जहां मील का पत्थर, यह अंक थमने और सोचने के लिए मजबूर कर रहा है... एक सुखद व रुचिकर दिशा की तरफ इंगित करना चाहता है, वहीं उल्लासित मन पाठकों और मित्रों से पूछना और जानना चाहता है कि क्या और देखना चाहेंगे आप इसके आगामी पन्नों में...क्या क्या नई संभावनाएँ और दिशाएँ हो सकती हैं भविष्य में लेखनी के लिए ?  

आपकी रचनाएं मिल रही हैं और भरपूर सराही भी जा रही हैं। अंक प्रायः विषयोन्मुख होने की वजह से सभी कवि और लेखकों द्वारा भेजी गयी, सभी रचनाओं को अभी तक लेखनी के पन्नों पर यथोचित स्थान और सम्मान नहीं मिल पाया है, लेखनी इसके लिए क्षमा प्रार्थी है और उम्मीद करती है कि शीघ्र ही भविष्य में लेखनी के किसी-न-किसी पन्ने पर आपको अपनी रचनाएँ अवश्य ही दिख जाएँगी ।  लेखनी हर 'लेखनी ' की कद करती है और हर रचना के समावेश का भरसक प्रयत्न भी। आपकी अच्छी रचनाओं का न सिर्फ स्वागत है वरन् प्रतीक्षा भी।  ऐसे ही रचनाएँ भेजते रहें। आपके सहयोग, सद्भाव व स्नेह पर ही तो लेखनी आश्रित है। इस नए वर्ष में भी लेखनी आपके निरंतर सहयोग व स्नेह की कामना और अपेक्षा रखती है।

अतीत के अमर शब्द-शिल्पियों के अमर ग्रन्थों के साथ-साथ, गत वर्ष कई-कई हिन्दी और अंग्रेजी की पत्रिकाओं और संकलनों से ढूंढ-ढूंढकर भी हम आपके लिए भांति-भांति की रचनाएं लाए। संपादक व लेखकों ने भी, जहाँ जैसे संभव हुआ,सहर्ष और तुरंत ही अनुमति दी। हम उन सभी लेखक और संपादकों के प्रति भी तहेदिल से शुक्रगुजार हैं  जिनकी  अनमोल रचनाओं को हमने लेखनी के पाठकों के साथ बांटा और सराहा। लेखनी के कुछ  मित्र ऐसे भी हैं जिनसे मांगकर या बिना मांगे ही एक अधिकार के साथ लेखनी ने उनकी रचनाएं छापीं..उन सभी विशेष मित्रों से आभार के साथ-साथ अनुरोध है कि माना विध्या, सद्भाव और कला बंटने-बांटने से ही बढ़ते हैं, परन्तु कहीं यदि कुछ भी आपको नागवार गुजरे या अतिक्रमण-सा महसूस हो, तो सचेत करना भी मत भूलिएगा। सहज विश्वास और सद्भाव... आडम्बरहीन स्नेह-साथ ही तो है जो दुनिया...  जीवन को रहने-सहने लायक बनाता है।  आप जो पलपल साथ हैं , यह खुशकिस्मती ही नहीं, जीवन का एक नायाब तोहफा है हमारे लिए और ईश्वर की अनमोल नेयमत से कम नहीं। भावातिरेक में ज्यादा बहूँ, इसके पहले आप मेरे मन की बात समझ गए हैं, इस विश्वास के साथ अगले मुद्दे पर आती हूँ।

यूँ तो लेखनी के बारे में आपने सब अच्छा ही अच्छा लिखा, पर एकाध सुझाव यह भी मिले कि 'लेखनी' अन्य मैगजीन की तरह क्यों नहीं दिखती? हमें किसी वेब डिजाइनर की मदद लेनी चाहिए। (स्वस्थ आलोचना सुधार की जननी है इसलिए लेखनी सुधी पाठकों की आभारी है और उम्मीद है कि ऐसे ही भविष्य में भी आप हमारी कमियों की तरफ ध्यान इंगित करते रहेंगे)।

मानती हूँ कि तकनीकी रूप से कमियां हैं और कई सुधार किए जा सकते हैं।  सजाने-संवारने लायक अभी भी बहुत कुछ है, जो अधूरा है...। आपने पूछा- आउटलुक दूसरों की तरह क्यों नहीं ; आप में से एकाध को शायद अखरता भी है यह, परन्तु विश्वास मानिए, हम ध्यान से सुन रहे हैं और लेखनी को बेहतर बनाने का प्रयास भी निरंतर ही जारी है। अधिकांश पाठकों ने इसी ' ईजी टु नैविगेट ले आउट ' को बेहद सराहा भी है। लेखनी अपने मित्रों और आलोचकों  से एक बात और बांटना चाहेगी, मानाकि हम सीखने और सुधारने के लिए सदैव ही तत्पर और उत्सुक हैं, पर जहां तक पत्रिका 'लेखनी ' का सवाल है इसका ध्येय कभी दूसरी पत्रिकाओं की तरह दिखने, या उनसे स्पर्धा करने का नही रहा; और अगर  इसके विषय और सजधज दूसरों से भिन्न हैं तो यह स्वाभाविक ही है... क्या यही प्रकृति नियम भी नहीं ! 

खैर... आपकी लेखनी तो बस यही चाहती है कि आप ऐसे ही  एक उत्साह और कौतुक से पन्ने-दर-पन्ने इसे खोलते और पढ़ते  रहें और नया ढूँढने के प्रयास में, अचानक ही खुलते रहस्यों से विस्मित हों, उनमें रमें...। इस प्रयास में लेखनी आपकी आनन्द-स्थली... प्रेरणा-स्रोत्र भी बन पायी तो प्रयास वास्तव में सार्थक है।

सामग्री संजोने में जो जी तोड़ मेहनत की है हमने और वह रंग भी ला रही है। हर महीने ही ड्योढ़ी होती पाठकों की संख्या हमारे लिए अब एक सुखद अहसास बन चुका है। बाल साहित्य, हास्य व्यंग्य, पर्यटन, ज्ञानविज्ञान और प्रेरक प्रसेंगों और कविता कहानियों व विभिन्न विषयों पर लेख जैसे स्थाई स्तंभों को साथ लिए लेखनी के पिछले बारहों अंक बारह विविध विषयों को लेकर आए। मार्च के पहले अंक ने जहां नारी के विविध रूपों को उकेरा, दूसरा सच पर आधारित था...हमारे अपने-अपने आंतरिक या आत्मा के सच , जिनपर काल और परेशानियों का कोई असर नहीं होता और जो हमें 'हम' बनाते हैं। इन्सान को दूसरे जीवों से ही नहीं, बल्कि एक इन्सान को भी अन्य इन्सानों से भिन्न करते हैं। यह हमारे वैयक्तिक सिद्धान्त, अनुभव, और अभिलाषा का समन्वय ही तो है, जिसके आधार पर  हम इस दुनिया को परखते, खुद को ढालते हैं। जीतते-हारते ही नहीं, सुखी-दुखी, संतुष्ट और भ्रमित तक होते हैं। निजी संस्कार ... संकल्पों को मन की गहराई तक स्थापित कर पाते हैं।

तीसरा मई का अंक 'सुमन' यानी फूलों से हसीन और खूबसूरत महकते पल और इन्सानों का समारोह था। दूसरे शब्द  में बाह्य रूप और आत्मा की गन्ध लिए था। चौथा 'तपिश' या बेचैनी पर था। चीजें, जो हमें सह्य नहीं, या जिन्हें हम बदलना चाहते हैं। पांचवा यानी जुलाई का अंक बरखा पर था। छठा अगस्त का अंक 'हिन्दी के बढ़ते कदम ' यानी कि भारत के गांव, हाटों से निकली हिन्दी के वेस्ट मिनिस्टर से लेकर स्टैच्यू औफ लिबर्टी तक के अथक और जुझारू सफर पर था। कैसे हम इस आगे बढ़ती हिन्दी के कदमों की बाधा या फिसलन नहीं, सहारा और सम्बल बन सकते हैं... अक्षुण्णता और सनातनता को कायम रख सकते हैं, इन मुद्दों पे समाधिस्थ था। आज जब भारत में ही भाषा और प्रान्तीयता को लेकर शर्मनाक आन्दोलन और प्रदर्शन हो रहे हैं। भाषा, जातिवाद और प्रन्तीयता की बिना पर लोग बहलाए और बर्गलाए जा रहे हैं। विकास और सद्भाव की जगह इसे ही लेकर, चारो तरफ अनचाही तोड़फोड़ और नुकसान हो रहे हैं, तो क्या एक  राष्ट्र को जोड़ने वाली भाषा की जरूरत और भी प्रखर और अनिवार्य नहीं?

सशक्त और एक दूसरे से जोड़ने वाली राष्ट्रभाषा की जरूरत सिर्फ भारत की विश्व के आगे प्रभावशाली छवि की ही जरूरत नहीं, अपितु हमारी एक आन्तरिक जरूरत बन चुकी है। सोचना अब यह है कि देश की राष्ठ्र-भाषा हिन्दी को हम गौरव देते हैं या पुनः पुरानी गलतियों  को ही दोहराते हैं? आन्तरिक भेदभावों से त्रसित और भ्रमित होकर एकबार फिर 'विदेशियों' (अंग्रेजी) को ही सत्ता सौंप देते हैं? विश्वीकरण के युग में कन्धे-से कन्धे मिलाकर चलना और बात है, पैरों में लेट जाना.. अपनी हस्ती मिटा देना कुछ और ! जानती हूँ, जबाव भावी पीढ़ी की शिक्षा...देश के तेजी से बदलते रुझान और जरूरतें...अर्थ व्यवस्था से संचालित, यह समय ही दे पाएगा, परन्तु  कम-से-कम सोच-समझकर सही दिशा चुनना , सही व संतुलित निर्णय...यह तो हमारे अपने हाथों में ही है आजभी ! कोई कुछ भी कहे, कितना भी बहकाए या ललकारे, सामूहिक जनमत नकारा नही जा सकता और भविष्य को सुधारने की, आज को बनाने की कुंजी आजभी हम सबके अपने ही हाथों में है ! 

सातवां अंक एकांत ...सूनापन नहीं, जो सहारा और सृजन-संसार या हमारा बैटरी-चार्जर है, उसमें जा रमा। आठवां अक्तूबर का अंक महात्मा गांधी और उनके प्रेरणा-दायक जीवन-दर्शन के सार में डूबकर मोती चुन रहा था। नवां दीपावली यानी उजाले की अँधेरे पर विजय पर केन्द्रित था। दसवां गीत और गजल विशेषांक था। 11 वां अंक नववर्ष यानी पुराने को त्याग नई की शुरुवात का अंक था। और अंत में बारहवां अंक प्रेम-प्यार पर केन्द्रित था। आप सोच रहे होंगे कि मैं इतनी बहक क्यों गई हूँ, अंकों के विषय क्यों गिनवा रही हूँ? बस ! इसलिए कि अगर आपने पुराने अंक नहीं देखे, तो शायद कभी फुरसत से आप देखना ही चाहें...!

मार्च यानी कि फागुन, फागुन यानी कि होली  ...सृजन-सुख से प्रेरित रंगरूप भरा उत्सवों का महीना...गीत-संगीत और राग-रंग का महीना...हास-उल्लास और कवि सम्मेलनों व मूर्खाधिवेशनों का महीना; लहलहाते खेतों बीच सजी-संवरी बैठी पृथ्वी ने एकबार फिर अपनी धानी चूनर पर रंग-बिरंगे बेल-बूटे काढ़ लिए है... नए-नए पुष्प-पल्लवों की अनूठी सजधज से हमें रिझाने व लुभाने लगी है। इसके छलकते-बहते उत्साह में डूबे पशु-पक्षी तक जब तिनका-तिनका नीड़ बना रहे हैं और नेह के अटूट बन्धनों को प्रगाढ़ करता तरल यह नवजीवन संचार मन ही नहीं, कोपल-कोपल पल्लवित दिख रहा है... जब बासन्ती बयार के कान्धे तो कभी गुनगुनी धूप में नहाई नन्ही कूकें हर आंगन, हर डाली, हर बगिया फुदक रही है...  जब पूरी ही प्रकृति चारोतरफ एक अनोखा जादू बुन रही है, तो हम आप भी क्यों न इसी रूप,रस और गंध में डूबजाएं...इसे जी भर-भरकर सोखें और सराहें ! 

 रास-रंग में डूबा, लगन व मेहनत की स्याही से छपा लेखनी का यह तेरहवां अंक, या फिर दूसरे साल का पहला अंक,  आपके लिए सज-संवर चुका है और आपके अपने हाथों में है । चलते-चलते एकबार फिर आपके सुकर्म, यश, आनन्द, रचनाधर्मिता... आपके स्वास्थ और दीर्घ आयु की कामना करते हुए, पुनः होली की अनेक शुभकामनाओँ के साथ आपसे अगले अंक तक के लिए विदा लेना चाहूंगी।...

 

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