|
चाँद परियाँ और तितली

हलवा
-रचना श्रीवास्तव
एक छोटी सी लड़की थी उसका नाम था अन्विक्षा। बहुत प्यारी थी वो, पर थोडी नटखट भी थी। खेलने मे उस को बहुत मजा आता था। कल्पना की दुनिया मे रहती थी। माँ पापा की दुलारी थी।
पर उस मे एक कमी भी थी, उस को टालने की आदत थी । जब भी माँ कोई काम कहती तो बोलती अभी करती हूँ पर उसका अभी कभी नही आता। माँ उस को जब समझती तो कहती ""माँ कल कर लूँगी"".और भाग जाती खेलने । उसके स्कूल मे इम्तिहान आने वाले थे माँ कहती अन्विक्षा पढ़लो तो वह रटा-रटाया जवाब देती, कल पढ़ लूंगी । "अरे बेटा इम्तिहान सर पे हैं। तुम टालो मत। कितना सारा पढ़ना है, चलो पढो। "
पर अन्वी को कंहा कब सुनना होता था। एक दिन माँ ने कहा अन्विक्षा "जानती हो तुम्हारी नानी क्या कहती थी ?"
अन्विक्षा बोली ""क्या?"
माँ ने कहा "कहती थी, काल करे सो आज कर ,आज करे सो अब। पल मे परलय होएगी, बहुरि करेगा कब?" पर अन्विक्षा को कहाँ सुनना होता था उस के पास तो हर बात का जवाब होता था बोली ""माँ नानी को मालूम नही इसको ऐसे कहते हैं आज करे सो काल कर, काल करे सो परसों। जल्दी जल्दी क्यों करता है, अभी तो जीना बरसों। "
माँ बेचारी कुछ कह नही पाती। बहुत दुखी होती। सोचती क्या करूं इस लडकी का !
अन्विक्षा को हलवा बहुत पसंद था। एक दिन जब वो खेल के आई तो माँ से बोली "माँ आज हलवा बना दो न।"
माँ कुछ काम कर रही थी "बोली बेटा आज तो बहुत काम है कल बना दूंगी।" अन्विक्षा ने कहा ""ठीक है।"कह के कमरे मे चली गई । दुसरे दिन अन्विक्षा ने कहा "माँ तुम ने कहा था आज बना दोगी, बना दो न। "
माँ ने फ़िर कहा "ओहो बेटा मैं तो भूल गई। आज मुझे बाजार जाना है। कल बना दूंगी।" इसी तरह से अन्विक्षा रोज़ हलवा बनने को बोलती, माँ कोई न कोई बहाना बना के टाल देती। इस तरह ७ दिन बीत गए। आठवीं रोज जब अन्विक्षा सो के उठी तो देखा की मेज पे ८ प्लेट हलवा रखा है । अन्विक्षा की खुशी का तो ठिकाना नही था, वो फटाफट ब्रश कर के खाने बैठी। उसने पहली प्लेट और दूसरी प्लेट बहुत मन से खाई। तीसरी भी खा ली । चौथी थोडी मुश्किल से खाई, फ़िर पांचवी तो खा नही पाई। माँ से बोली माँ अब नही खाया जाता ।
माँ ने कहा "अरे बेटा थोड़ा और खालो तुम को तो बहुत पसंद है।"
"नही माँ अब नही खा सकती " अन्विक्षा बोली। "अन्विक्षा देखो तुम को ये हलवा कितना पसंद है पर तुम ज्यादा नहीं खा सकती। यदि यही हलवा एक प्लेट रोज मिलता तो तुम आराम से खा लेतीं, क्यों है न ?इसी तरह से पढ़ाई भी है तुम एक साथ ज्यादा नही पढ़ सकती। जब 8 दिन् का हलवा तुम एक दिन मे नही खा सकतीं, तो 8 दिन् की पढ़ाई कैसे एक दिन मे कर पाओगी । इसीलिए रोज का काम रोज करना चाहिए, टालना नही चाहिए।" अन्विक्षा को बात समझ मे आ गई। इस दिन के बाद से अन्विक्षा ने कभी भी बात को टाला नही। रोज का काम रोज करती थी । अब वो सभी की प्यारी बन गई और माँ बहुत खुश थी।
* बच्चों आप समझ ही गए होगे,इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है की रोज का काम रोज करना चाहिए, कल पर टालना नही चाहिए।
कविता की जगह इसबार हम आपके लिए दो पहेलियां लेकर आए हैं। सही जवाब वाले बच्चों का नाम चांद परियां और तितली के अगले अंक में दिया जाएगा। फिर देर किस बात की बूझिए और फटाफट लिख भेजिए, और अगर हल समझ में न आए तो अगले महीने तक उत्तर का इन्तजार कीजिए।
पहेली- 1.

अन्दर-बाहर सोते जगते
हरदम ही यह अपने साथ
ऊबें हंसे चाहें ना चाहें
बिन इसके तो सभी
हो जाते हैं बेकार।।
*
पहेली-2.

जल में से ही पैदा हुई
जलहि देखि मर जाए,
आओ पंच इसे फूंक दें
उमर बड़ी हो जाए।।
*
|