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कानपुर की होली

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           -श्याम सुन्दर चौधरी

कई प्रमुख भारतीय त्योहारों की तरह भाईचारा और आपसी सद्भावना को जिन्दा रखने का एक प्रयास होली भी है। होलिका का अपने भतीजे प्रहलाद को लेकर आग में बैठना और फिर चमात्कारिक रूप से उसका खुद का जल कर मर जाना यद्यपि इसका प्रीरंभिक बिन्दु है लेकिन उसके बाद यह त्योहार कालचक्र के साथ विभिन्न प्रान्तों और शहरों में अपने-अपने ढंग से मनाया जाने लगा जिसमें उस स्थान विशेष की कुछ परम्परायें, घटनाएं जुड़ती चली गयीं। ऐसा ही एक शहर है कानपुर। गंगा किनारे स्थित उत्तर भारत के इस औद्योगिक नगर की होली यहां के लोगों की मस्ती, जिन्दादिली और जुनून की हद तक जाकर किसी भी त्योहार को मनाना दर्शाती है।

प्राचीन किवदन्ती के अनुसार यहां के गांव के जमींदार के घर पर होली के पन्द्रह दिन पहले गांव वाले इकट्ठा होते थे और ढोल मंजीरा आदि लेकर होली का आगमन गीत फाग गाते थे और जिस दिन होली जलने वाली होती थी उस दिन फाग गाने वालों का जुलूस जमींदार के घर से उठकर उस स्थल पर जाता जहां होली जलाने के लिए बसंत  पंचमी के दिन से ही लकड़ियां इकट्ठी करके रखी रहती थीं।

जुलूस के पहुंचने तक पुरोहित पूजा की तैयारी कर चुके होते हैं और फिर लोग पूजा के बाद आग जलाकर उसमें गन्ना और गेहूं की बालियां जलाते थे। ऐसा करके वो ईश्वर से प्रार्थना करते थे कि वो होली जलाकर होलिका रूपी बुराई का नाश कर रहे हैं, अतः ईश्वर इस बार फसल की कटाई के बाद उन्हें हर तरह से समृद्ध करे। दूसरी ओर घर की महिलाएं, किशोरियां तथा युवतियां रात को देर तक जागकर गुझिया और भिन्न भिन्न पकवान का आयोजन करती थीं। अगले दिन एक-दूसरे के ऊपर रंग डाला जाता था।

उन्ही दिनों यह भी सोचा गया कि कोई ऐसी व्यवस्था की जाए कि होली के बाद सभी लोग एक जगह एकत्र हों और तमाम आपसी कटुता आदि को भुलाकर एक-दूसरे से गले मिलें तथा अपने रिश्तों को एक मजबूत शुरुआत दें, इसके लिए होली के पांच-छह दिन पड़ने वाले अनुराधा नक्षत्र का ही चयन किया गया। चूँकि शास्त्रों में यह नक्षत्र मानव जीवन के लिए कल्याणकारी माना गया है इसलिए गांव के प्रतिष्ठित और साधारण बड़े बुजुर्गों ने फैसला किया कि इस एक दिन मेले का आयोजन किया जाए जिसमें लोग होली मिलन के साथ-साथ खरीददारी भी कर सकें। इसलिए शहर के सरसैया घाट नामक तट को चुना गया।

तत्कालीन ब्रिटिश प्रसाशन को होली के हफ्ते भर बाद फिर से दिन भर रंग खेलना और भीड़ जुटाकर मले का आनन्द लेना उचित नहीं लगा इसलिए आदश दिया गया कि होली के दूसरे दिन ही मेले का आयोजन कर लिया जाये लेकिन बात तो अनुराधा नक्षत्र में मेले के आयोजन की थी और इसके पीछे यहां के लोगों की आस्था भी जुड़ी हुई थी। फलतः ऐसी ही एक होली में जब स्वयं शासन द्वारा ठीक एक दिन बाद मेले का आयोजन किया गया तो लोगों ने सामूहिक रूप से इस मेले का बहिष्कार कर दिया, कोई भी वहाँ नहीं पहुँचा और इसके बाद अनुराधा नक्षत्र वाले दिन जमकर रंग खेलने के बाद लोग नहा धोकर नये नये कपड़ों में सजधज कर घरों से निकलने लगे और देखते ही देखते सरसैया घाट पर जनसैलाब उमड़ पड़ा, जिसे काफी कोशिशों के बावजूद ब्रिटिश प्रशासन रोकने में सफल नहीं हो सका। तब से आजतक होली के बाद अनुराधा नक्षत्र वाले दिन इस मेले की परम्परा चली आ रही है। लोग चूंकि उस दिन नहा धोकर बिल्कुल नये और उजले कपड़ों में मेले का आनंद लेते थे इसलिए इसे उजरा मेला भी कहा जाता रहा है। इस मेले की नींव हटिया (नगर का प्रमुख बर्तन बाजार) के व्यापारियों द्वारा रखी गयी थी।

सबसे खास बात यह है कि इन व्यापारियों के अधीन काम करने वाले कर्मचारी और श्रमिक जो होली से मेला तक अपने गांव फसल की कटाई के लिए जाते थे उन्हें उस पूरे सप्ताह की तनख्वाह कानपुर के व्यापारियों द्वारा दी जाने की एक सुखद परंपरा थी। कानपुर नगर का लगभग डेढ़ सौ वर्षों का इतिहास है और यह परंपरा भी तभी से लागू है। हटिया नामक इस स्थान से कोई कोरा बचकर नहीं जा सकता है। हौज में रंग खोलकर रखा जाता है, जो भी कोरा दिखा उसे पकड़कर एक बार गर्दन तक डुबोकर निकाल दिया जाता है। इसके बाद वह व्यक्ति कहीं भी जाने को स्वतंत्र है।

कानपुर जिले के अंतर्गत लगने वाले एक क्षेत्र विशेष का नाम है अहिरवाँ। यहां होली के बाद पँचमी के दिन होली मनायी जाती है, यानी एक ही जिले में दो भिन्न-भिन्न दिनों में यह त्योहार मनाया जाता है इससे अनोखी मिसाल और क्या हो सकती है। इसकी वजह है इस गाँव के जमीदार को ब्रटिश प्रशासन की किसी बात का विरोध करने पर होली के दिन ही गिरफ्तार कर दिया गया था और पंचमी वाले दिन छोड़ा गया था। इस घटना से क्षुब्ध गाँव वालों ने ठीक त्योहार के दिन होली न मनाकर पंचमी वाले दिन ही मनाने का निर्णय लिया। तब से अहिरवाँ नामक इस स्थान पर इसी परंपरा का पालन किया जा रहा है।

लेकिन धीरे-धीरेनगर की होली को कुछ शरारती और असामाजिक तत्वों ने विकृत करने की कोशिश की है। खतरनाक से खतरनाक पेंट किसी के भी चेहरे पर लगा देना, कीचड़ और मशीन की कालिख से होली खेलना जैसी घटनाएं नगर के समृद्ध होली के इतिहास को कलंकित तो करती ही हैं साथ ही गुण्डा किस्म के लोगों ने इसी आपसी वैमनस्य का प्रतिशोध लेने का भी उचित अवसर मान रखा है।

इस मौके पर होने वाली हिंसक घटनाओं के चलते पिछले कुछ वर्षों से प्रशासन को सख्त कदम उठाने पड़े हैं। अब वो पुरानों दिनों जैसी होली तो नहीं है, फिर भी लोग तमाम बन्धनों के बीच भी अच्छी से अच्छी तरह त्योहार मनाने की कोशिश करते हैं। हालांकि किसी भी त्योहार में हर एक की भावना होनी चाहिए कि हर दूसरा आदमी भी अच्छी तरह त्योहार का आनन्द लूटे तब शायद पुलिस या प्रशासन की आवश्यकता नहीं रह जाती है। 

     (साभार समरलोक)