दो लघुकथाएँः मिन्नी मिश्रा

* लक्ष्मी- नारायण *

‘क्या हुआ ? तबियत तो ठीक है न..? सबेरे से तुम्हारा चेहरा क्यों उतरा हुआ लग रहा है ?”
“ हाँ..हाँ…सब ठीक है |” मैं चेहरे पर फीकी हँसी लाते हुए पति से बोली |
किसे बताऊँ… मन की बात ! आज मेरी पहली वटसावित्री है, मायके से एक कौवा भी नहीं पूछने आया !
बार बार बाथरूम जाकर मैं आँसुओं से भींगी आँखों पर छींटा देती और सामने लगे शीशे को अपने मन की बात बताती , “ बचपन सौतेली माँ के साये में बीता ! असली माँ का स्वाद भी नहीं जाना ! नई( सौतेली) माँ के मोहपाश में पिता का पलड़ा हमेशा उधर ही भारी रहता !
आनन-फानन में पोलियो ग्रसित लड़के से मेरी शादी करके पिता ने अपना बोझ तो हल्का कर लिया ! खैर! भगवान का लाख-लाख शुक्र , मेरे पति भले पोलियो से ग्रसित हैं…पर, मन से अपाहिज नहीं !”
“ लक्ष्मी….ओ लक्ष्मी….|”
“ अपना नाम सुनते ही मैं चौंक गई, घबराकर चिल्लाई, “जी…..अभी आई |”
“ लो, इसे पहन लो ,आज तुम्हारा पहला वटसावित्री है |” व्हील चेयर पर बैठे पति , चुनरी प्रिंट साड़ी के साथ सिंदूरी लाल लाख की चूड़ी मेरे हाथ में पकड़ाते हुए आगे बढ़ गये |
झट से तैयार होकर, मैंने फूल की साजी (डलिया) को हाथ में लेकर पूजा करने के लिए जैसे ही आगे बढ़ी, व्हील चेयर के सहारे पति मेरे करीब आ पहुँचे |
डगमगाते हुए वह हठात् उठकर मेरे माथे को चूमते हुए उन्होंने कहा , “ सच, तू लक्ष्मी-सी लगती है |”
आज पहली बार उनको बिना सहारे खड़ा होते देख, मुझे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था | ये, तो सरासर चमत्कार है ! हड़बड़ाहट में मेरे साजी के सारे फूल उनके चरणों पर बिखर गये |
झुकते हुए मैंने आहिस्ता से कहा , “आप, नारायण हो गये |”

*गजरे वाली रात *

कमबख्त टिक-टिक करती घड़ी की सूईयों ने उनकी नजरों में मुझे चंद्रमुखी से कब ज्वालामुखी बना दिया, पता ही नहीं चला !खाना-पीना, उठाना-बैठना , साथ जाना , एक-दूसरे पर मर-मिटना … सबकुछ अब सपना-सा लगने लगा है | कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा ! बात-बात पर इनसे तकरार होना , जैसे हमारी नियति बन गई है !
उफ्फ्फ! वो शादी की रात…जैसे ही इनका स्पर्श हुआ , तन-मन पुलकित हो उठा | ऐसा लगा मानो पूरी कायनात आंचल में सिमट आयी हो | और वाह ! उसी दिन से मैं खुद को दुनिया की सबसे भाग्यशाली पत्नी समझने लगी |

क्या पता था, कि सास-ससुर , ननद, देवर और बच्चों की जिम्मेदारी निभाते-निभाते , हमारे सारे अरमान, गृहस्थी के चूल्हे में झुलस जायेंगे ! सच,कोल्हू की बैल की तरह हम इस तरह पिसते गये कि हमारा दाम्पत्य हमसे रूठ गया !
आज, हमारी पैंतीसवीं एनिवर्सरी है |सुबह से शाम हो गयी , इन्होंने सीधी मुंह मुझसे बात भी नहीं की है ! सामने पड़ते ही बहस शुरू हो जाती है, बात कुछ नहीं…बात बढ़ जाती !
आजकल के लोगों की तरह नहीं, मन नहीं मिला तो तुरंत डिवोर्स ! हमारे संस्कारों में बड़े-बुजुर्गों ने इस तरह की घुट्टी पिलाई है कि जिसका हाथ थामा.. जनम भर उसके साथ निभाना है |

पत्नी जो ठहरी, उनसे बात किये बिना मुझे चैन कहाँ पड़ता ! कठोर बनाना चाहती हूँ, पर उन्हें देखते ही पसीज जाती हूँ !क्यूँ, अब मेरी बात उन्हें नहीं सुहाती !? क्या कमी हो गई !?यही न…अब पहले जैसी षोडशी नहीं रही ! देह-आकर्षण ही तो सब कुछ नहीं होता ! …….
“रीना….ओ…रीना…” पति की आवाज सुनते ही मेरी तंद्रा भंग हुई | चारपाई से उठकर , जल्दी से उनके पास पहुँची | ”
“पार्क जा रहा हूँ, दरवाजा बंद कर लो |”
“मैं…चलूँ ..? अनायास दो शब्द , मेरे मुँह से फिसल गये |”
इनकी खामोश नजरें मुझे घूरती रहीं और मैं, पैरों के नाखूनों से जमीन को खुरचती रही |
“चलो …|” इतना सुनते ही मन में मचा बवंडर थम-गया | इनके साथ मैं भी चल पड़ी |
रास्ते में गजरे की पुरानी दूकान को देखते ही मैं ठिठक गई | एक जमाना था, कचहरी से लौटते वक्त यहीं से एक गजरा मेरे लिए ये नित्य लाया करते थे और हमारी हर रात, गजरे वाली रात होती थी |
अरे…? कहाँ गये…? मैंने पलटकर देखा, धक्क से रह गई ! उसी गजरे वाली दुकान के पास, हाथ बढाये ये खड़े थे | मैं अविलम्ब वहाँ पहुँच गई |गजरे के पोलोथिन को पॉकेट में रखते ही इनकी चलने की दिशा बदल गई | बिना हाँ..हूँ किये इनके साथ चलने लगी |कुछ ही देर बाद हमदोनों वापस घर पहुँचे |
इन्होंने कमरे का दरवाजा बंद किया और नम आँखों से गजरा लिए मेरे सामने खड़े हो गये | जूड़े में गजरा लपेटते हुए…मुस्कुराकर बोले , “ हैप्पी एनिवर्सरी रीना.. वक्त ने फिर से करवट ले ली है | ”
“ अप्रत्याशित इनकी मधुर आवाज से मेरा दग्ध तन-मन पुलकित हो उठा | अपनी आँखों पर भरोसा ही नहीं हो रहा था ! मन के सारे शिकवे…प्रेम के प्रचंड आवेग में जैसे बह गये | मैं इनसे लिपट गई | वक्त थम सा गया |
दोनों दिलों की धड़कनें अब एक ही स्वर में बातें करने लगे , “ देखो, हमारी दग्ध होती बगिया फिर से हरिया गई है | “
मिन्नी मिश्रा
वर्तमान पता —

मिन्नी मिश्रा
शिवमातृ अपार्टमेन्ट,
फ्लैट न- 301, रोड न.—3, महेशनगर
Patna, 800024
बिहार (भारत )
मोबाइल नं.: 8340290574
. ईमेल mishraminni0@gmail.com

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