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कीर्ति-स्तंम्भ.


अमृता प्रीतम

(१९१९-२००५)


पंजाब की सर्वाधिक लोकप्रिय कवियत्री और करीब करीब 100 पुष्तकें लिखने वाली अमृता प्रीतम उन साहित्यकारों में थीं जिनकी कृतियों का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ। साहित्य अकादमी और पद्मविभूषण से सम्मानित हिन्दी की जानी-मानी, पाठकों के मन में उतर   जाने  वाली कवियत्री-विचारक-विदुषी वे एक ऐसी संवेदनशील और बेबाक लेखिका थीं जिन्होने जीवन को भी अपने तरीके से और अपनी ही शर्तों पर जिया ।

चर्चित कृतियाँ उपन्यास- पांच बरस लंबी सड़क, पिंजर, अदालत, कोरे कागज़, उन्चास दिन, सागर और सीपियां आत्मकथा-रसीदी टिकट कहानी संग्रह- कहानियाँ जो कहानियाँ नहीं हैं, कहानियों के आँगन में, संस्मरण- कच्चा आंगन, एक थी सारा।

मंथन

लेख-

स्याही ताकतों के साये ( लेखनी-अक्तूबर-2009) 



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आचार्य चतुरसेन शास्त्री

(26 August 1891 – 2 February 1960)


जयपुर से आयुर्वेदाचार्य की उपाधि लेनेवाले आचार्य चतुरसेन शास्त्री हिन्दी भाषा के एक महान उपन्यासकार और कहानीकार थे। आपका पहला उपन्यास हृदय की परख 1918 में आया परन्तु इससे उन्हें कोई विशेश प्रसिद्धि नहीं मिल पाई।  दूसरी किताब सत्याग्रह और असहयोग 1921 में आई जो गान्धीजी के सिद्धान्तों को उजागर करती थी। गांधीजी के विचारों की उन दिनों  भारतीय चेतना और राष्ट्र निर्माण में गहरी पैठ थी फलतः सबका ध्यान इस किताब की तरफ गया और इससे आपको प्रसिद्धि मिली। तदुपरान्त कई ऐतिहासिक उपन्यास, सामाजिक कहानियां और आयुर्वेद पर किताबें लिखीं परन्तु अधिकतर लेखन ऐतिहासिक घटनाओं के ही इर्दगिर्द रहा ।

प्रमुख कृतियां सोमनाथ, वयं रक्षामः और वैशाली की नगर वधू है। कुछ अन्य कृतियां जैसे-गोली ,धर्मपुत्र,सोना और ख़ून, नीलमणि, नरमेध, सोमनाथ, भारत में इस्लाम, अच्छी आदतें , अपराजिता, आदर्श भोजन, नीरोग जीवन आदि हैं। आपकी कुछ कृतियों का सफल फिल्मांकन भी किया गया है। 

कहानी धरोहरः नामालूम सी एक खता   ( लेखनी मार्च-2010)

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ओशो

(11 दिसम्बर 1939-19 जनवरी 1990) 

"मैं तुम्हें लुभा रहा हूं ताकि तुम जीवन के प्रति प्रेमपूर्ण हो सको, थोड़ा और काव्यमयी हो सको, तुम तुच्छ व साधारण के प्रति उदासीन हो सको ताकि तुम्हारे जीवन में उदात्त का विस्फोट हो जाए।"                                                                                                                                               

रजनीश चन्द्र मोहन जैन का जन्म भारत के मद्य प्रदेश राज्य के जबलपुर शहर में  हुआ था। आप भगवान श्री रजनीश और ओशो के नाम से विख्यात हुए। आपने प्यार, ध्यान, और खुशी को जीवन का प्रमुख मूल्य माना। आप मुख्यतः भारत और अमेरिका में रहे और अपने नए धार्मिक और आद्यात्मिक आन्दोलन के साथ इन्होंने अपनी ओर सबका ध्यान आकर्षित किया और भारत व विदेशों में जीवन और दर्शन के विभिन्न पहलुओं पर प्रवचन दिए।                                                                                                                 

ओशो ने हर एक पाखंड पर चोट की। सन्यास की अवधारणा को उन्होंने भारत की विश्व को अनुपम देन बताते हुए सन्यास के नाम पर भगवा कपड़े पहनने वाले पाखंडियों को खूब लताड़ा। ओशो ने सम्यक सन्यास को पुनरुज्जीवित किया है। ओशो ने पुनः उसे बुद्ध का ध्यान, कृष्ण की बांसुरी, मीरा के घुंघरू और कबीर की मस्ती दी है। सन्यास पहले कभी भी इतना समृद्ध न था जितना आज ओशो के संस्पर्श से हुआ है। इसलिए यह नव-संन्यास है। उनकी नजर में सन्यासी वह है जो अपने घर-संसार, पत्नी और बच्चों के साथ रहकर पारिवारिक, सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए ध्यान और सत्संग का जीवन जिए।

दृष्टिकोणः

इस धरती की जिम्मेदारी कौन लेगा (लेखनी-अगस्त-2008)


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इस्मत चुगताई

( 15 August. 1911 – 24 October, 1991)

बदायूँ उत्तर प्रदेश में जन्मी और जोधपुर में पली बढ़ी , जहाँ उनके पिता एक सिविल सर्वेंट थे, इस्मत चुगताई, सआदत हसन मंटो, किशन चन्दर और राजिन्दर सिंह बेदी के साथ  उर्दू साहित्य के प्रमुख चार स्तंभों में से एक हैं। बेबाक बयानगी और समाज में तुच्छ या वर्जित समझे जाने वाले विषयों पर लिखने की  वजह से आपने तत्कालीन आलोचकों में काफी हलचल मचाई और बुद्धिजीवी व प्रगतिशील विचारकों की चहेती बनी।  

कहानीः

चौथी का जोड़ा (लेखनी-जुलाई 2009)

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जयशंकर प्रसाद

(30-1-1889--14-1-1937)





भारतीय हिन्दी साहित्य में जयशंकर प्रसाद अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। अड़तालीस वर्ष की अल्पायु में इन्होंने तीन उपन्यासों सहित एक से एक उत्कृष्ट तीस ग्रन्थों की रचना की।  श्रेष्ठ कवि और श्रेष्ठ नाटककार होने के साथ-साथ वे श्रेष्ठ कथाकार भी थे। इनके पांच कहानी संग्रह - छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आंधी तथा इंद्रजाल में सत्तर कहानियां प्रकाशित हुईं। कोमल और सूक्ष्म भावनाओं की पकड़ प्रसाद की अनोखी थी और क्षमा, शान्ति, धैर्य, अक्रोध, आत्म-संयम, पवित्रता, इन्द्रिय निग्रह, सत्य सदाचार, जातीय सम्मान, राष्ट्र-रक्षा आतिथ्य त्याग, दानशीलता, परोपकार, आज्ञापालिता आदि गुणों से भरपूर इनकी कहानियों को अगर हम भारतीय संस्कृति की मूल धारा की अभिव्यक्ति कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। जहां एक तरफ वे मानव मन के उद्दात्त भावों को प्रदर्शित करती हैं, वहीं दूसरी ओर मानव मन का सूक्ष्म और भावात्मक चित्र भी उकेरती हैं।  

कहानी-

घीसू--(लेखनी-मई-2007)

पुरस्कार-(लेखनी-अगस्त-2008)

गुदड़ी में लाल (लेखनी-अगस्त-2009)
 

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जैनेन्द्र कुमार


 

 


स्मृति-शेष

संस्मरण लेख (प्रेमचन्द) - एक शांत नास्तिक संत-(लेखनी-अंक11-जनवरी 2008)

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डां. ईश्वर दत्त वर्माः कवि, लेखक।

रागरंगः पर्यटन- मध्य माहेश्वर-दैवीयता की ओर बढ़ते कदम ( लेखनी-मई-2008-वर्ष-2-अंक3
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धनपत राय 'प्रेमचन्द'

31-7-1880 to 8-10-1936

जन्मः पाण्डेपुर (जिला वाराणसी)


कहानी सम्राट प्रेमचन्द का साहित्य में विशिष्ट स्थान है। आजीवन विषम आर्थिक कठिनाओं से जूझते प्रेमचन्द ने मानो कभी जीवन से हार ही नहीं मानी थी। विचारों से प्रगतिशील, मानव संवेदनाओं से भरपूर और देशभक्त प्रेमचन्द यथार्थ के हिमायती थे। राजारानी की कहानियों के देश में उन्होंने आम आदमी की कहानी लिखी वह भी बिना किसी लाग-लगाव के। कहानी हों या उपन्यास, सुगढ़ शिल्पी की तरह एक ऐसा अप्रतिम साहित्य सृजन किया जो आज भी अविस्मरणीय है।  इनकी सभी कृतियां कालजयी हैं और कथ्य आज के संदर्भ में भी उतने ही खरे हैं, जैसे कि तब थे, जब इन्हें लिखा गया था। उपन्यास ही नहीं, कोई भी कहानी भी ऐसी नहीं जो हृदय में पैठकर विचारों को मथे न और समाज की कुरीतियों मनव मन की जटिलता के बारे में सोचने के लिए विवश न करे। 

कहानी-

बूढ़ी काकी (लेखनी-अँक-5-जुलाई-2007)

हिंसा परमो धर्मः ( लेखनी-अँक-8-अक्टूबर-2007)

पूस की रातः ( लेखनी-अंक-23- जनवरी-2009)

बाल कहानी

मिट्ठू  ( लेखनी-अंक-35-जनवरी2010)

दस्तावेज लेख-काशी ( लेखनी-अँक-17-जुलाई-2008)

हास्य व्यंग्य- शादी की वजह (लेखनी-अंक-24-2009)

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निर्मल वर्मा


(३ अप्रैल १९२९- २५ अक्तूबर २००५)

अवसाद भरी मनोवैज्ञानिक कहानियों के लिए सुप्रसिद्ध निर्मल वर्मा  हिन्दी के आधुनिक कथाकारों में एक मूर्धन्य कथाकार और पत्रकार हैं। सुरक्षा अधिकारी रतन वर्मा के यहाँ शिमला में जन्मे निर्मल वर्मा विदेशों में भी काफी रहे थे जिसने उनके रचना संसार को और एकाकी व अंतर्मुखी बना दिया। मूर्तिदेवी पुरस्कार  (१९९५), साहित्य अकादमी पुरस्कार(१९८५) उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान पुरस्कार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित निर्मल वर्मा को सन 2002 में भारत की दूसरी सर्वोच्च उपाधि पद्मविभूषण से भी सम्मानित किया गया।

कहानी धरोहर

सुबह की सैर (लेखनी-नवंबर-2009)

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यशपाल

(3-12-1903-26-12-1976)

फ़िरोज़पुर छावनी पंजाब में जन्मे यशपाल का नाम प्रेमचंद के बाद के हिंदी कहानीकारों में अग्रणीय है। स्वतंत्रता-सेनानी और क्रान्तिकारी, विद्यार्थी जीवन से ही भारतीय क्रान्तिकारी दल के सक्रिय सदस्य। वर्षों विप्लव नामक पत्र का सम्पादन और संचालन। देशप्रेम और लेखन की दोहरी राह पर चले यशपाल ने समाज की खोखली मान्यताओं और नैतिकताओं पर अपनी रचनाओं में करारी चोट की है। इनकी रचनाओं में शोषित समाज के प्रति आत्मीयता के साथ-साथ परिस्थितियों के बेहतर बदलाव की चाह है और पात्र प्रायः प्रगतिशील परन्तु संवेदनशील हैं। कई रचनाओं का देश विदेश की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद और मेरी तेरी उसकी बात के लिए साहित्य अकादमी पुरष्कार।    

कृतियां
उपन्यास-दिव्या, देशद्रोही, झूठा सच, दादा कामरेड, अनीता, मनुष्य के रूप, तेरी मेरी उसकी बात।

कहानी संग्रह-पिंजरे की उड़ान, फूलों का कुर्ता, धर्मयुद्ध, सच बोलने की भूल, भस्मावृत चिंगारी।

व्यंग्य संग्रह-चक्कर क्लब

 

कहानी-

करवा का व्रत (लेखनी-नवंबर-2007) 

 

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रविन्द्र नाथ टैगोर

(7-5-1861-7-8-1941)


विश्व साहित्य के जाने माने हस्ताक्षर रविन्द्रनाथ टैगोर को जीवन काल में ही अपार ख्याति प्राप्त हुई और साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए आपको नोबल पुरस्कार जैसे सम्मान से सम्मानित किया गया।

इन्होंने अपना समस्त साहित्य बंगला भाषा में लिखा जो अपनी मार्मिकता व रोचकता के कारण भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवादित हुआ। गीत-कविता और उपन्यासों के साथ-साथ इन्होने अनेकों कहानियों का भी सृजन किया। इनकी सभी कहानियों में कथ्य सरसता के साथ-साथ मानवीय प्रेम व स्वाभिमान का भाव सिमटा हुआ है। साथ ही मानवीय रिश्तों के विभिन्न पहलुओं की मार्मिक प्रस्तुति है, यही कारण है कि तत्कालीन भारतीय जनजीवन को दर्शाती ये कहानियां आज भी उतनी ही रोचक हैं।

कहानी धरोहर

क्षुधित पाषाण-( लेखनी-अंक 34-दिसंबर 2009)

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लक्ष्मीमल सिंघवी

( 9 नवंबर 1939-6 दिसंबर 2007)

ख्यातिलब्ध न्यायविद, संविधान विशेषज्ञ, कवि, भाषाविद एवं लेखक लक्ष्मीमल सिंघवी का नाम आज भी हिन्दी जगत में अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है। उन्होंने अपने ब्रिटेन के प्रवास काल में हिन्दी और इसके विकास को भरपूर सहयोग दिया। प्रवासी दिवस की कल्पना भी आपकी ही थी। विश्व बंधुत्व में विश्वास रखने वाले सिंघवी जी आजीवन साहित्य और भारतीय संस्कृति के प्रति समर्पित थे। हिन्दी और अंग्रेजी दोनों ही भाषा में साहित्य और कानून पर कई पुष्तकों के अलावा आप साहित्य अमृत पत्रिका के कुशल व सक्षम संपादक रहे। 

मंथन

लेख- जनतंत्र और साहित्य (लेखनी-नवंबर-2009)

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विद्यानिवास मिश्र

(14-1-1925-14-2-2003)

राज्यसभा के मनोनीत सदस्य विद्यानिवास मिश्र  हिंदी और संस्कृत के  प्रखर विद्वान और विचारक थे।

उन्हें साहित्य जगत के कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया , इसमें साहित्य अकादमी, कालिदास सम्मान, केंद्रीय हिंदी संस्थान और भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान शामिल हैं।
उन्हें पद्मविभूषण से भी अलंकृत किया गया। वे संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय और काशी विद्यापीठ के कुलपति रहे। उन्होंने राष्ट्रीय दैनिक नवभारत टाइम्स का भी संपादन किया।
उनकी हिंदी और अंग्रेज़ी में दो दर्ज़न से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं. इसमें महाभारत का कव्यार्थ और भारतीय भाषादर्शन की पीठिका प्रमुख हैं. ललित निबंधों में तुम चंदन हम पानी, वसंत आ गया और शोधग्रंथों में हिंदी की शब्द संपदा चर्चित कृतियां हैं। कृतियाँ-चितवन की छाँह, गाँव का मन, तुम चंदन हम पानी, मेरे राम का मुकुट भींग रहा है, भारतीयता की पहचान, रीति-विज्ञान,आदि लगभग 100 कृतियों का लेखन और संपादन।

 

विजयादशमी पर एक पत्र ( लेखनी अक्तूबर-2008)

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विष्णु शर्मा- नीति कहानियां पंचतंत्र के रचयिता।

चांद-परियां-तितली

चालबाज- (लेखनी-अंक-24-फरवरी-2009)


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सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'

(7-3-19911-1987)

 कुशीनगर देवरिया में जन्मे अज्ञेय का अपनी मौलिक व प्रगतिशील सोच और संवेदनशील शैली की वजह से साहित्य में अनूठा स्थान है। एक गहरी और विचारोत्तेजक सोच के बाबजूद भी अज्ञेय जी की भाषा बहुत ही सहज थी और मन को छूती थी। 

 कुछ प्रमुख कृतियां---हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, इंद्र धनु रौंदे हुए, आंगन के पार द्वार, कितनी नावों में कितनी बार।

कितनी नावों में कितनी बार- नामक काव्य संग्रह के लिए 1978 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित। आंगन के पार द्वार- के लिए 1964 का साहित्य अकादमी पुरस्कार।

 

लेख-

1.पतझर का एक पात (लेखनी-नवंबर-2007)

2. साहित्यकार और सामाजिक प्रतिबद्धता ( लेखनी-फरवरी-2010)



 

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शरद जोशी

(21 -5-1931-to- 5-9-1991).

हरिशंकर परसाई आज भी व्यंग दुनिया के चंद अति प्रिय व चर्चित हस्ताक्षर। 


जन्मःउज्जैन मध्यप्रदेश
शिक्षा होल्कर कॉलेज इन्दौर से स्नातक

                              व्यंग्य-

                              1. छाता हाथ में लेकर (लेखनी-अंक 5-जुलाई-2007)

                              2.  सहिष्णु ( लेखनी अंक-4-वर्ष-2-जून-2008)                                                  

 

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शरद चन्द चटोपाध्याय

15-9-1876 -16-1-1938 

देवनन्दपुर, हुगली, कलकत्ता

कहानियां हों या उपन्यास, शरदचन्द मानवीय संवेदनाओं के अद्बुत चितेरे हैं। अपनी पैनी कलम से संवेदनाओं को शब्दों में उकेरकर वे बहुत ही सहजता से पाठक के हृदय में पैठ जाते हैं। उनके देवदास, श्रीकांत, आदि आजभी बेहद ही लोकप्रिय व साहित्य के धाती उपन्यास हैं। बंगाली जन-जीवन का बेहद सजीव व संवेदनशाल मनोवैज्ञानिक चित्रण, और समाज की कुरीतियों के खिलाफ आवाज उनकी लेखनी की विशेषता रही है। रवीन्द्रनाथ टैगोर के बाद वह बंगाल के आज भी सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक हैं। 

कहानी

अनुपमा का प्रेम ( लेखनी-अंक-1-मार्च-2007)

 

 

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शैलेन्द्र मटियानी

14 अक्तूबर 1931- 14 अप्रैल-2001)

किसी भी हालत में, दबाव या उपेक्षा  में साहित्यधर्म को न त्यागने के लिए कटिबद्ध रमेश चन्द्र सिंह मटियानी जी का जन्म अल्मोड़ा जिले के बाड़ेछीना गांव में हुआ था। आरंभिक वर्षों में वे रमेश मटियानी 'शैलेश' नाम से लिखा करते थे।  गरीबी और संघर्ष की आंच में तपी शैलेश मटियानी की रचनाएं स्वर्ण-सी निखरकर पाठक के आगे आती हैं।  जीवन के अंतिम वर्षों में वे हल्द्वानी आ गए। विक्षिप्तता की स्थिति में उनकी मृत्यु दिल्ली के शहादरा अस्पताल में हुई।

सृजन लेखा-जोखाः

संपादनः जनपक्ष; विकल्प।

उपन्यासः किस्सा गंगूबाई नर्मदाबेन; चौथी मुठ्ठी; हौलदार; बोरीवली से बोरी बन्दर तक; चिठ्ठी रसैन; चन्द औरतों का शहर; गोपुली-गफूरन; भागे हुए लोग;  मुख सरोवर; नगवल्लरी; आकाश कितना अनंत है; सवित्तरी; छोटे -छोटे पक्षी; बावन नदियों का संगम; मुठभेड़;  बर्फ गिर चुकने के बाद; माया सरोवर;  रामकली।

कहानी संग्रहः मेरी तैंतीस कहानियां;  दो दुखों का एक सुख ; नाच जमूरे नाच;  हारा हुआ;  महाभोज;  भेड़ और गड़ेरिए;  जंगल में मंगल; बर्फ की चट्टानें;  प्यास और पत्थर; माता तथा अन्य कहानियां; सुहागिनी तथा अन्य कहानियां;  पाप मुक्ति तथा अन्य कहानियां; अहिंसा तथा अन्य कहानियां;  अतीत तथा अन्य कहानियां;  भविष्य तथा अन्य कहानियां;  शैलेश मटियानी की इक्यावन कहानियां;  प्रतिनिधि कहानियां।

संस्मरण तथा निबंध संग्रहः मुख्य धारा का सवाल; कागज की नाव;  राष्ट्रभाषा का सवाल; यदा-कदा;  लेखक की हैसियत से; किसके राम, कैसे राम;  जनता और साहित्य;  यथा-प्रसंग;  कभी कभार;  राष्ट्रीयता की चुनौतियां;  किसे पता है राष्ट्रीय शर्म का मतलब।

पुरस्कार/ सम्मानः उत्तर प्रदेश सरकार का संस्थागत सम्मान,  शारदा सम्मान; देवरिया केडिया संस्थान साधना सम्मान;  लोहिया सम्मान, उत्तर प्रदेश सरकार;  1994  में कुमाऊँ विश्वविद्यालय से डी.लिट की मानद उपाधि;  14 अक्टूबर, 1997 को बागेश्वर में नागरिक अभिनन्दन।

कहानी धरोहरः मैमूद  ( लेखनी-सितंबर-2009)

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श्री मां (अरविंद आश्रम)


कहानी विशेषः  आत्म निर्भर (लेखनी-जनवरी-2010)

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हजारी प्रसाद द्विवेदी 

(19-8-1907-19-5-1979)

१९३० में ज्योतिष विषय लेकर शास्राचार्य की उपाधि पाई।

८ नवंबर, १९३० को हिन्दी शिक्षक के रुप में शांतिनिकेतन में कार्यरंभ। वहीं अध्यापन १९३० से १९५० तक। अभिनव भारती ग्रंथमाला का संपादन, कलकत्ता १९४०-४६। विश्वभारती पत्रिका का संपादन, १९४१-४७। हिंदी भवन, विश्वभारती, के संचालक १९४५-५०। लखनऊ विश्वविद्यालय से सम्मानार्थ डॉक्टर आॅफ लिट्रेचर की उपाधि, १९४९। सन् १९५० में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी प्रोफेसर और हिंदी विभागध्यक्ष के पद पर नियुक्ति। विश्वभारती विश्वविद्यालय की एक्जीक्यूटिव कांउसिल के सदस्य, १९५०-५३। काशी नागरी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष, १९५२-५३। साहित्य अकादमी दिल्ली की साधारण सभा और प्रबंध-समिति के सदस्य। नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, के हस्तलेखों की खोज (१९५२) तथा साहित्य अकादमी से प्रकाशित नेशनल बिब्लियोग्रैफी (१९५४) के निरिक्षक। राजभाषा आयोग के राष्ट्रपति-मनोनीत सदस्य, १९५५ ई.। सन् १९५७ में राष्ट्रपति द्वारा पद्मभूषण उपाधि से सम्मानित। १९६०-६७ के दोरान, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़, में हिंदी प्रोफेसर और विभागध्यक्ष। सन् १९६२ में पश्चिम बंग साहित्य अकादमी द्वारा टैगोर पुरस्कार। १९६७ के बाद पुन: काशी हिंदू विश्वविद्यालय में, जहाँ कुछ समय तक रैक्टर के पद पर भी रहे। १९७३ साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत। जीवन के अंतिम दिनों में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के उपाध्यक्ष रहे।

आपका हिन्दी निबंध और आलोचनाक्मक क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान व योगदान है। हिन्दी संस्कृत और बांगला के विद्वान द्विवेदी जी की सभी रचनाओं में उनके मौलिक चिंतन व गहन ज्ञान की छाप है। भारतीय संस्कृति और धर्म में इनकी गहन रुचि थी और इन्होंने सूर, कबीर, और तुलसी पर गहन और सारगर्भित आलचना की हैं। द्विवेदी जी का निबंध-साहित्य हिन्दी की अनमोल धरो हर है।  

लेखः आलोक पर्व की ज्योतिर्मय देवी (लेखनी-अंक-9- नवम्बर 2007) पुनर्पाठ ( अक्तूबर-2009)

लेखः प्राचीन भारत में मदनोत्सव  ( लेखनी-अंक 11--फरवरी 2007)

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हरिशंकर परसाई

(22 अगस्त 1921-1995)

अद्भुत प्रतिभा के धनी परसाई कहानियाँ, उपन्यास एवं निबंध-लेखन के बावजूद मुख्यत: व्यंग्यकार के रूप में ही आज भी विख्यात हैं। 'विकलांग श्रद्धा का दौर' के लिए आपको  सन 1982 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

प्रकाशित रचनाएँ :
कहानी-संग्रह: हँसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे।
उपन्यास: रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज।
लेख संग्रह: तब की बात और थी, भूत के पाँव पीछे, बेइमानी की परत, वैष्णव की फिसलन, पगडंडियों का जमाना, शिकायत मुझे भी है, सदाचार का ताबीज, विकलांग श्रद्धा का दौर, तुलसीदास चंदन घिसैं, हम एक उम्र से वाकिफ हैं।
 

जन्मस्थान : जमानी, जि. होशंगाबाद, म.प्र.।
नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए.।

हास्य व्यंग्य

दो नाक वाले लोग (लेखनी अँक 27- मई 2009)