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 कवि/कवियत्री...


  अमृता प्रीतम

1. धूप का टुकड़ा    ( लेखनी-अप्रैल-2008-अँक-14)

2. एक मुलाकात    ( लेखनी-अप्रैल-2008-अँक-14)

3. शहर                ( लेखनी-अप्रैल-2008-अँक-14)

4. दोस्त                   ( लेखनी-अप्रैल-2009-अंक 26)   

5. मजबूर                 ( लेखनी-अप्रैल-2009-अंक 26)   

6. वारिस शाह से  ( लेखनी-अप्रैल-2009-अंक 26)   


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इब्ने ईँशा

1927- 11-1-1978

लुधियाना में जन्मे  शेर मोहम्मद खान की प्रारंभिक शिक्षा भी लुधियाना में ही हुई थी। 1948 में करांची में आ बसे और वहीं उर्दू कॉलेज से बी.ए. किया। बचपन से ही इब्ने इंशा नाम अपनाया और लिखा और इसी नाम से विख्यात भी हुए। उर्दू के मशहूर शायर और व्यंगकार। मिजाज और बयानगी में मीर की खस्तगी और नजीर की फकीरी भरी रूमानियत । मनुष्य के स्वाभिमान और स्तंत्रता के प्रबल हिमायती। 

हिंदी ज्ञान के बल पर औल इँडिया रेडिओ में काम किया फिर कौमी किताब घर के  निर्देशक, इंगलैंड स्थित पाकिस्तानी दूतावास में उर्दू के सांस्कृतिक मंत्री  और यूनेस्को के प्रतिनिधि रहे।

इंगलैंड में ही कैंसर से मृत्यु।

प्रमुख पुष्तकें, उर्दू की आखिरी किताब (व्यंग्य), चांद नगर, इस बस्ती इस कूंचे में, बिल्लू का बस्ता, यह बच्चा किसका है (बाल कविताएँ)

हम घूम चुके बस्ती बस्ती ( लेखनी अँक 10- दिसंबर-2007) 

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कतील शफाई

किया है प्यार जिसे ( लेखनी अँक 10- दिसंबर-2007)

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              कबीर

     (1297 - 1410)

 हिंदी साहित्य में कबीर का व्यक्तित्व अनुपम है।  गोस्वामी तुलसीदास को छोड़ कर इतना महिमामण्डित व्यक्तित्व कबीर के सिवा अन्य किसी का नहीं है। काशी के इस अक्खड़, निडर एवं संत कवि का जन्म लहरतारा के पास सन् १२९७ में ज्येष्ठ पूर्णिमा को हुआ था।  हिन्दू ब्राहमणी के यहां जन्मे और परित्यक्त कबीर का पालन-पोषण नीरू नामके जुलाहे के परिवार में हुआ, संत रामानंद के शिष्य बने और अलख जगाने लगे।  कबीर सधुक्कड़ी भाषा में किसी भी सम्प्रदाय और रुढियों की परवाह किये बिना खरी बात कहते थे।  उन्होंने हिंदू-मुसलमान सभी समाज में व्याप्त रुढिवाद तथा कट्टपरंथ का खुलकर विरोध किया।  कबीर की वाणी उनके मुखर उपदेश उनकी साखी, रमैनी, बीजक, बावन-अक्षरी, उलटबासी में देखें जा सकते हैं।  गुरु ग्रंथ साहब में उनके २०० पद और २५० साखियां हैं।  काशी में प्रचलित मान्यता है कि जो यहाँ मरता है उसे मोक्ष प्राप्त होता है।  रुढि के विरोधी कबीर को यह कैसे मान्य होता।  काशी छोड़ मगहर चले गये और सन् १४१० में वहीं देह त्याग किया।  मगहर में कबीर की समाधि है, जिसे हिन्दू मुसलमान दोनों पूजते हैं।

 आज भी शायद सर्वाधिक याद किए जाने वाले कबीर के दोहे कवि, दार्शनिक और समाजसुधारक तीनों की ही सोच का समन्वय लिए हुए हैं। इस संत की खरी बानी आज भी  गृहस्थ और सन्यासी दोनों को ही एक सी प्रिय है। और हो भी क्यों न छह सौ साल पहले जीवन की किताब से सारे वेदान्त और दर्शन का सार और सूफी-सी सादगी लिए अनमोल इन दोहॉ में दे जाने वाले वे अनपढ कबीर ही तो थे जिन्होंने लिखा था ,                                                                                                                                       

पोथी पढ़ पढ़  जग मुआ पंडित हुआ न कोय/ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।

 माह विशेषः  गीत-कबीर ( लेखनी-अंक22-दिसंबर 2008)

1. मेरी चुनरी में परिगयो दाग पिया।

2. अंखियां तो छाई परी
3. माया महा ठगनी हम जानी।।
  
4. सुपने में सांइ मिले
5. नैना अंतर आव तू

6.अवधूता युगन युगन हम योगी
7. कौन ठगवा नगरिया लूटल हो 
8.साधो ये मुरदों का गांव


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प्रभुनाथ गर्ग (काका हाथरसी)

18 सितंबर 1906 - 18 सितंबर 1995 व्यंग्य जिसका मुख्य उद्देश्य हंसना हंसाना ही नहीं बल्कि समाज में व्याप्त दोषों, कुरीतियों, भ्रष्टाचार और राजनीतिक कुशासन की ओर ध्यान आकृष्ट करना भी है, जिससे कि इन्हें रोका जा सके। इस तरह के व्यंग्य न सिर्फ समाज में व्याप्त दोषों और कुरीतियों को उजागर करते हैं, उनके ख़िलाफ़ जनमत तैयार करते हैं अपितु समाज सुधार की प्रक्रिया पर सोचने को मजबूर भी करते हैं।                                                                                                                      हाथरस उत्तर प्रदेश में जन्मे काका हाथरसी इस विधा के सिद्धहस्त थे। उनकी पैनी नज़र से छोटी-से- छोटी अव्यवस्था या कुरीतियां तक बच नहीं पाती थीं। बहेद गहरे कटाक्ष के साथ सहज शब्दों में अपनी बात कह देने से वे कभी नहीं चूकते थे। यही वजह है कि कई कवियों और लेखकों के प्रेरक काका हाथरसी का नाम आजभी हास्य कवियों में बड़ी ही श्रद्धा के साथ लिया जाता है और  उनकी शैली की छाप आजतक कई-कई कवियों और लेखकों की  व्यंग्य और हास्य रचनाओं में स्पष्ट दिखलाई देती है।

कुछ प्रमुख कृतियाँ -काका के कारतूस, काकादूत, हंसगुल्ले, काका के कहकहे, काका के प्रहसन।

कविता धरोहर ( लेखनी-मार्च-2009)

1. जय बोलो बेईमान की

2. दुर्दशा हिन्दी की

3. मंहगाई

4.  कालेज स्टूडेंट

5. मुर्गी और नेता

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केदार नाथ अग्रवाल                                                (1अप्रैल1911- 22 जून 2000)

नदी उदास थी  (लेखनी-जुलाई-अंक-5-वर्ष-2)   


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कैफी आजमी


पत्थर के खुदा यहां भी ( लेखनी अँक 10- दिसंबर-2007)

 


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गोपाल सिंह नेपाली

 

अपने पन का मतवाला था ( लेखनी अँक 10- दिसंबर-2007
)

यह लघु सरिता का बहता जल  (लेखनी-जुलाई-अंक-5-वर्ष-2)   

स्वतंत्रता का दीपक (लेखनी-अंक 30-अगस्त 2009)

गिरिराज हिमालय से भारत का ( लेखनी-सितंबर 2009)

मेरा धन है स्वाधीन कलम ( लेखनी-जनवरी-2010)

कुछ ऐसा खेल रचो साथी ( लेखनी-जनवरी-2010)

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चंद्रशेखर 'आजाद'                                                                     ( 23-7-1906-27-2-1931)                                                                           'दुश्मन की गोलियां हम सहेंगे /आजाद हैं आजाद ही रहेंगे।' का नारा लगाने ही नहीं, जीने वाले चंद्रशेखर आजाद भारत के अग्रणीय स्वतंत्रता सेनानी थे। जिन्होंने भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे देशभक्तों को संगठित करके अपनी अभूतपूर्व मुहिम छेड़ी थी।                                                                           

वही शाहे शहीदां है... ( लेखनी-अंक-6- अगस्त 2008)  

वतन के वास्ते  ( लेखनी-अंक-6- अगस्त 2008)  


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जयशंकर प्रसाद  ( 30 जनवरी-1889-14 जनवरी-1937 )                                                                                                                                                   मानवीय भावनाओं के उदात्त  और तरल चितेरे व छायावाद के प्रमुख व लोकप्रिय कवि।                                                                                                                                                        काव्य कृतियां-कामायनी, आंसू, कानन-कुसुम, प्रेम पथिक, झरना, लहर।                                                                                     



अरुण यह मधुमय देश हमारा ( लेखनी-अंक-6- अगस्त 2008)  

कामायनी से---(लेखनी अंक27- मई 2009)


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गोस्वामी तुलसी दास

[१४९७ (१५३२?) - १६२३] 

बांदा जिले के राजापुर नामक ग्राम में जन्मे तुलसीदास एक महान कवि ही नहीं, युगद्रष्टा व अभूतपूर्व समाज सुधारक व संस्कृत  के प्रगल्भ विद्वान थे।

भक्तिकाल के तीन प्रमुख   स्तंभों में से एक, तुलसीदास की रामचरित के प्रति भक्तिभाव से ओतप्रोत सरस व सुलझी रामायण को आज हिन्दुओं की बाइबल कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। श्री रामचरित मानस वाल्मीकि रामायण का अवधी भाषांतर है परन्तु उसमें एक सरस कवि, विचारक, और समाज-सुधारक का दृष्टिकोण पलपल उदीप्त है। तुलसीदास ने 12 ग्रन्थ लिखे। विनयपत्रिका तुलसीदास कृत एक और अन्य  महत्त्वपूर्ण कृति  है।

दोहे -रामचरितमानस-उत्तर कांड ( लेखनी-अक्तूबर-2009)

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द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

 


 

 


1. उठो धऱा के अमर सपूतों (लेखनी-अँक-11-जनवरी 2008) 

2. इतने ऊँचे उठो (लेखनी-अँक-11-जनवरी 2008)

3.  हम सब सुमन एक उपवन के ( लेखनी-अंक-15-मई-2008)

बाल कविता

मुन्नी मुन्नी ओढ़े चुन्नी ( लेखनी-जनवरी-2010)



 

 

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दुष्यंत कुमार



1 सितंबर 1933-30 दिसंबर 1975

बिजनौर, उत्तर प्रदेश में जन्मे दुष्यंत कुमार त्यागी को वर्तमान हिन्दी ग़ज़ल का प्रणेता माना जाता है। उनकी गजलों में पहली बार एक आम आदमी की आवाज एक आम आदमी से हाथ मिलाकर कही गयी। आज की ग़ज़लों के एक और महत्वपूर्ण हस्ताक्षर निदा फाजली के शब्दों में ;  

"दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है। यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है।

विषय की तब्दीली के कारण, उनकी ग़ज़ल के क्राफ्ट में भी तब्दीली नज़र आती जो कहीं-कहीं लाउड भी महसूस होती है. लेकिन इस तब्दीली ने उनके ग़ज़ल को नए मिज़ाज के क़रीब भी किया है।

दुष्यंत ने केवल देश के आम आदमी से ही हाथ नहीं मिलाया उस आदमी की भाषा को भी अपनाया और उसी के द्वारा अपने दौर का दुख-दर्द गाया...

जिएँ तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए "
 

कविता-धरोहर 

चांदनी छत पे ( लेखनी अँक 10- दिसंबर-2007)

हो गई है पीर ( लेखनी अँक 10- दिसंबर-2007)

बाढ़ की संभावनाएँ सामने है ( लेखनी-अंक-15-मई-2008)

कहां तो तय था चरागाँ   ( लेखनी-अंक-15-मई-2008)

मत कहो आकाश में कहरा घना है  ( लेखनी-अंक-15-मई-2008)

आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख  ( लेखनी-अंक-15-मई-2008)
 

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डा. धर्मवीर भारती



 


कविता धरोहर

उत्तर हूँ तुम्हारा ( लेखनी अँक 12-फरवरी-2008)

बोआई का गीत ( लेखनी अंक 23-  जनवरी 2009)

उतरी शाम ( लेखनी अंक 23-  जनवरी 2009)

क्योंकि सपना है अभी भी (लेखनी अंक 36-फरवरी 2010)


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श्यामलाल 'पार्षद'

स्वतंत्रता सेनानी व कवि पार्षद अपने इस ध्वजगान से भारत में अमर हैं।श्री श्यामलाल गुप्त 'पार्षद' के इस गीत को आजादी के बाद थोड़ा संशोधित करके कांग्रेस ने  राष्ट्रीय ध्वज गान के रूप में अपनाया था। सन 47 में लालकिले में  इस गीत को सुनकर भावविभोर नेहरू जी ने कहा था कि- हो सकता है श्री पार्षद जी को सब न याद रख पाएँ, पर उनके इस ध्वजगीत को देश का बच्चा-बच्चा गाएगा। ...लेखनी में गीत को असंशोधित ( संकलन देश हमारा) व संशोधित (अगस्त के माह विशेष में) दोनों रूप में टंकित किया गया है। हममें से अभी भी कितने ही ऐसे होंगे जिनके हृदय में इस गीत और पाठशाला की कई मधुर स्मृतियाँ आज भी विद्यमान होंगी। 



झंडा ऊँचा रहे हमारा (लेखनी-अंक 30-अगस्त 2009)

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सुदामा पांडेय 'धूमिल' 
 
क्रोधी कवि कहलाए जाने वाले धूमिल बेहद ही संवेदनशील और आसपास के प्रति जागरूक कवि थे। समाज को बदलने की बेचैनी ने ही शायद उन्हें यह संज्ञा दिलवाई। तेवर ओर सशक्त  प्रतिमान जहां इनकी कविता की पहचान हैं सक्षम सामाजिक और राजनीतिक टिप्पड़ी भी । यही वजह है कि ये कविताएँ आजभी उतनी ही समसामयिकी हैं, जितनी कि तब जब लिखी गयी थीं।  हाल ही में इनकी कविता मोची पाठ्यक्रम से हटाए जाने पर बी.जे.पी. ने संसद में काफी बबाल मचाया।

   (7-11-1936-10-2-1975)

काव्य-संग्रह 'कल सुनना मुझे' मृत्यु के उपरान्त ही छप पाया और फिर इसे साहित्य अकादमी पुरष्कार भी मिला।



जन्म : 7 नवंबर १९३६ ग्राम खेवली ज़िला वाराणसी।

शिक्षा : दसवीं तक। अत्यंत मेधावी छात्र। आई. टी. आई. वाराणसी से विद्युत डिप्लोमा प्राप्त कर के इसी संस्थान में विद्युत अनुदेशक के रूप में कार्यरत रहे।

१० फरवरी १९७५ को लखनऊ में मस्तिष्क ट्यूमर से निधन। 

प्रकाशित रचनाएँ :
कविता संग्रह: संसद से सड़क तक, कल सुनना मुझे।

 गांव                       ( लेखनी अंक-4-वर्ष-2-जून-2008)
 संसद से सड़क तक ( लेखनी अंक-4-वर्ष-2-जून-2008)
 घर में वापसी          ( लेखनी अंक-4-वर्ष-2-जून-2008)                                                                   रोटी और संसद       ( लेखनी अंक-4-वर्ष-2-जून-2008)
 खेवली                    ( लेखनी अंक-4-वर्ष-2-जून-2008)
 सिलसिला               ( लेखनी अंक-4-वर्ष-2-जून-2008)
 अन्तिम कविता        ( लेखनी अंक-4-वर्ष-2-जून-2008)

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नईम

पानी उछाल के  (लेखनी-जुलाई-अंक-5-वर्ष-2)   

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नागार्जुन  (30 जून 1911-5नवंबर 1998)                                                                       नागार्जुन की प्रसिद्धि मुख्यतः एक जन कवि के रूप में है, जिन्होंने कविता के साथ ही कथा साहित्य में अपनी यथार्थ दृष्टि का प्रमाण दिया। इनके अतिरिक्त निबंधों और टिप्पणियों में नागार्जुन अपनी जीवंत सृजनशीलता का प्रमाण देते रहे हैं। उनके समूचे साहित्य में वे तत्व निहित हैं, जो किसी लेखक को लोकप्रिय बनाते हैं। समझा यह जाता है कि लोकप्रियता और कलात्मकता दोनों विरोधी चीजें हैं। नागार्जुन ने विरोधी प्रतीत होने वाले इन तत्वों को अपनी रचनाओं में बखूबी आत्मसात किया।                                                                                                                                                

कविता धरोहर  - लेखनी दिसंबर 2008


1, गेहूं दो, चावल दो।

2. गुलाबी चूड़ियां

3. अकाल और उसके बाद

4. सपना देखा

5. बातें

6. आ जा

7. बादल को घिरते देखा है ( लेखनी-सितंबर 2009)



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       फैज अहमद फैज

पाकिस्तान और हिन्दुस्तान दोनों ही तरफ के बेहद पसंदीदा शायर और उतने ही भले इन्सान।


वो लोग...(लेखनी-अंक 29-जुलाई 2009)


बोल कि...(लेखनी-अंक 29-जुलाई 2009)



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भगत सिंह

आओ मुकाबला करें ( लेखनी-अंक-6- अगस्त 2008)  


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भगवती चरण वर्मा



(30-8-1903-5-10-1981)

शफीपुर ग्राम जिला उन्नाव उत्तर प्रदेश में जन्मे श्री भगवती शरण वर्मा जी की प्रमुख कृतियों में 'मेरी कविताएं' नामक संकलन उल्लेखनीय हैं। वर्माजी ने इलाहाबाद से बी.ए., एल. एल. बी. की डिग्री प्राप्त की और प्रारम्भ में कविता लेखन किया । फिर उपन्यासकार के नाते विख्यात । १९३३ के करीब प्रतापगढ़ के राजा साहब भदरी के साथ रहे । १९३६ के लगभग फिल्म कारपोरेशन, कलकत्ता, में कार्य । कुछ दिनों ‘विचार’ नामक साप्ताहिक का प्रकाशन-संपादन, इसके बाद बंबई में फिल्म-कथालेखन तथा दैनिक ‘नवजीवन’ का सम्पादन, फिर आकाशवाणी के कई केंन्दों में कार्य । बाद में, १९५७ से मृत्यु-पर्यंत स्वतंत्न साहित्यकार के रूप में लेखन ।

‘चित्रलेखा’ उपन्यास पर दो बार फिल्म-निर्माण और ‘भूले-बिसरे चित्र’ साहित्य अकादमी से सम्मानित । पद्मभूषण तथा राज्यसभा की मानद सदस्यता प्राप्त ।   

बसंतोत्सव (लेखनी अंक-1-वर्ष-2-मार्च-2008)

संकोच भार को (लेखनी अंक-1-वर्ष-2-मार्च-2008)

अज्ञात देश से आना  (लेखनी अंक-1-वर्ष-2-मार्च-2008)

मातृ-भूमि तुझे शत् शत् बार प्रणाम  ( लेखनी-अंक-18- अगस्त 2008)  

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भवानी प्रसाद मिश्र (1913-1985)                                                                     जन्म तिथि- २९ मार्च १९१३, गांव टिगरिया, तहसील सिवनी मालवा, जिला होशंगाबाद म.प्र. ।                                                                                                        " बूँद-बूंद उमगा था एक दिन
धारा हूँ आज
न बूँद मेरी थी न धारा
दूसरों का हूँ समूचा सारा."
तार सप्तक के प्रमुख कवि, मिश्र जी अदम्य जिजीविषा और गांधी-चेतना के कवि थे। सहज शब्द और गहरी अनुभूतियां लिए हुए उनकी कालजयी कविताएं आज भी पूर्णतः समकालीन हैं। 
 कुछ प्रमुख कृतियाँ : गीत फरोश, चकित है दुख, गाँधी पंचशती, अँधेरी कविताएँ, बुनी हुई रस्सी, व्यक्तिगत, खुशबू के शिलालेख, परिवर्तन जिए, त्रिकाल संध्या, अनाम तुम आते हो, इदम् मम्, शरीर कविता फसलें और फूल, मान-सरोवर दिन, संप्रति, नीली रेखा तक।

इसे जगाओ ( लेखनी- अंक-19-सितंबर-2008) 

स्नेह-पथ ( लेखनी- अंक-19-सितंबर-2008) 

कौवे उर्फ चार हौवे ( लेखनी- अंक-19-सितंबर-2008) 

तुम कागज पर लिखते हो ( लेखनी-अँक 20-अक्तूबर 2008)

तार के खम्बे ( लेखनी- अंक 22-दिसंबर 2008)

स्वागत में---(लेखनी अंक27-मई 2009)


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मज़ाज लखनवी

(1909-5-12-1955)

असरारुल हक उर्दू शायरी के कीट्स माने जाते थे।  मजाज लखनवी के नाम से विख्यात वे  अपने ज़माने के बेहद मशहूर और महबूब शायर थे । अपने वक्त में मज़ाज के कलाम की दीवानगी लोगों , खासतौर से लड़कियों में बहुत ज्यादा थी। मज़ाज का जन्म सन १९०९ में रुदौली जिला बाराबंकी में हुआ था। मज़ाज उस्ताद शायर फानी बदायूनी को अपना उस्ताद मानते थे।मज़ाज की मृत्यु दिसम्बर ५ सन १९५५ में लखनऊ में हुई। आपकी नज्मों को कई मशहूर गायक जैसे तलत महमूद और जगजीत सिंह आदि ने गाकर सदा के लिए अमर कर दिया है।   


नन्ही पुजारन (लेखनी-अंक 29-जुलाई 2009)

ख्वाबे सहर (लेखनी-अंक 29-जुलाई 2009)

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महादेवी वर्मा

(26 मार्च 1907-11 सितम्बर-1987)
जन्मः फरुख्खाबाद, उत्तर प्रदेश, भारत।                                       

छायावाद के प्रमुख स्तंभों में से एक, कोमल शब्द चित्र और भावों की चितेरी महादेवी वर्मा की रचनाओं में पीड़ा के स्वर नैसर्गिक रूप से रचे-गुंथे हैं हैं। भावों की तीव्रता और गहराई इनके प्रमुख गुण हैं। सत्य और सुन्दर की पुजारी महादेवी ने शिव यानी कि जन कल्याण को ध्यान में रखकर विशेषतः नारी अनुभूति और पीड़ा पर भी काफी लिखा है।

कालजयी कृतियाः

अतीत के चलचित्र। स्मृति की रेखाएँ, (1942) 51 गूढ़, रहस्यवादी, सुन्दर कविताओं का संग्रह। अन्य काव्य संग्रहः

नीहार (1930)। रश्मि ( 1932)। नीरजा ( 1934)। सांध्यगीत (1936)

गद्यः श्रंखला की कडियां  ( नारी अनुभूतियों और पीड़ा पर)।

गध्य- श्रंखला की कडियां, साहित्यकार की आस्था।

मैं नीर भरी दुख की बदली (लेखनी-मार्च-2007)

तुम मुझमें प्रिय ( लेखनी अँक 10- दिसंबर-2007)

जो तुम आ जाते (लेखनी अंक 24-फरवरी-2009)

 

 

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मैथली शरण गुप्त  

माँ कह एक कहानी (लेखनी-अंक-8-अक्टूबर 2007)                                                                                                 सखी वो मुझसे कहकर जाते (लेखनी-अंक-8-अक्टूबर 2007)


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मोहम्मद इकबाल
(1877 - 1938 )
कवि, दार्शनिक और स्वतंत्रता सेनानी इकबाल का जन्म सियालकोट, पंजाब( अब पाकिस्तान) में हुआ था। उनके कश्मीरी ब्राह्मण दादाजी श्री सहजराम सप्रू को इस्लाम धर्म अपनाना पड़ा था। 1904 में जब लाला हरदयाल ने (गदर पार्टी के संस्थापकों में से एक) ने लाहौर गवर्मेंट कॉलेज के युवा लेक्चरर को अपनी सभा में आमंत्रित किया तो इकबाल ने  ' सारे जहां से अच्छा' गीत गाकर सभी को स्तब्ध कर दिया था...गीत जो आजभी देश का गौरव है और हर देशप्रेमी के मन में अद्बुत देशप्रेम की लहर उठाता है।   

गीत --सारे जहां से अच्छा--लेखनी अंक 6-अगस्त-2007.

 

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रमानाथ अवस्थी
(1926-29 जून 2002)


मैं सदा बरसने वाला (लेखनी-अंक-5, जुलाई 2007)

मेघ सांवले छा गये हैं( लेखनी-अंक-5, जुलाई 2007)  

 

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रसखान

मानुष हौं तौ वही रसखान (लेखनी-अंक 18 अगस्त-2008)


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रामचन्द्र द्विवेदी -प्रदीप-

(6 फरबरी 1915-1998)

कवि प्रदीप ने भारतीय फिल्मों को कई यादगार और मधुर गीत दिए हैं। उनके देशप्रेम से भरपूर गीतों का अपना एक विशिष्ट स्थान है। कहते हैं-ए मेरे वतन के लोगों-इस गीत को जब नेहरू जी ने पहली बार सुना था तो असंख्य अन्य आम भारतीयों की तरह वह भी रो पड़े थे। 1997-98 में उन्हें ' दादा फालके ' पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

 ' गीत-ए मेरे वतन के लोगों'-लेखनी अंक 6-अगस्त 2007

बाल गीत

साबरमती के संत - लेखनी-अंक-20-अक्तूबर 2008

   

 

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राम अवतार त्यागी

 

आने से मेरे ( लेखनी-जून-2007)

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डा. रामकुमार वर्मा


एकांकी सम्राट डॉ. रामकुमार वर्मा का जन्म १५ सितम्बर सन् १९०५ ई. में मोहल्ला गोपालगंज, सागर में हुआ था। आप इलाहाबाद विश्वविद्यालय से विभागाध्यक्ष --हिन्दी-- पद से सेवा निवृत हुये। वीर हम्मीर, चित्तौड़ विजय --प्रबन्ध काव्य-- निशीथ, बालि वध, एकलव्य, --खण्ड काव्य-- कुलललना, नूरजहाँ, भोजराज, जौहर --आख्यान गीत, पृथ्वीराज की आंखें, रेशमी टाई, रुप-रंग, कुन्ती का परिताप, शिवाजी, रिम-झिम, कौमुदी महोत्सव --ऐतिहासिक एकांकी-- मयूर पंख, खट्टे-मीठे, ललित एकांकी, मेरे श्रेष्ठ रंग एकांकी प्रकाशित हैं। साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, कबीर ग्रन्थावली --सम्पादित-- कबीर का रहस्यवाद, कबीर : एक अनुशीलन, संस्मरणों के सुमन भी प्रकाशित हैं। आपके काव्य संग्रह अंजलि, अभिशाप, रुपराशि, चारुमित्र, सप्तकिरण, हिमहास, स्मृति के अंकुर, रुप-रंग, ॠतुराज, दीपदान, कामकंदला, चन्द्र किरण, बापू, इन्द्रधनुष, अग्निशिखा, अशोक का शोक आदि हैं।

डॉ. वर्मा बहुमुखी प्रतिभा के साहित्यकार थे। वे श्रेष्ठ कवि तथा एकांकी लेखन के अद्वितीय रचनाकार थे। एक महान नाटककार एवं साहित्य के मूर्धन्य अध्येता थे। उनका प्रत्येक ग्रन्थ साहित्य जगत में प्रकाशमान है। सन् १९६३ ई. में "पद्म भूषण' से सम्मानित हुए।

 

 मैं सदा बरसने वाला मेघ बनूँ ( लेखनी-अंक-5-जुलाई 2007)

 



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रामेश्वर शुक्ल अँचल



 

दो सजा मुझको -(लेखनी-अँक 12-फरवरी 2008)

जब नींद नहीं आती होगी-  (लेखनी-अँक 12-फरवरी 2008)


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रामधारी सिंह 'दिनकर'
1908---अप्रैल 1974

 


चांद और कवि ( लेखनी-अंक 2- अप्रैल-2007)

चांद का कुर्ता ( लेखनी-अंक-4-जून-2007)

वसंत राजा बरखा ऋतुओं की रानी(लेखनी-अंक-5-जुलाई-2007)

पक्षी और बादल, ( लेखनी अंक-5-जुलाई-2008) 

आग की भीख ( लेखनी-अंक-6- अगस्त 2008) 


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रामप्रसाद बिस्मिल


ऐ मातृभूमि ( लेखनी-अँक-30-अगस्त-2009)

मेरी भावना ( लेखनी-अँक-30-अगस्त-2009)

तेरे चरणों में सिर नवाऊँ ( लेखनी-अँक-30-अगस्त-2009)


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लक्ष्मीमल सिंघवी 

   

 


हिन्दी अपनी परिभाषा-(लेखनी-अंक-6-अगस्त-2007) 

 

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शिवमंगल सिंह सुमन

 

पर आँखें नहीं भरी (लेखनी अँक 12-फरवरी 2008)
विवशता (लेखनी अँक 12-फरवरी 2008)

मेरा देश जल रहा  -( लेखनी-अंक-18-अगस्त 2008)

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शैलेन्द्र नाथ श्रीवास्तव

माह के कवि

टूट रहा कुछ (लेखनी-अंक-8-अक्टूबर 2007)

कठपुतले (लेखनी-अंक-8-अक्टूबर 2007)

गन्दी माता (लेखनी-अंक-8-अक्टूबर 2007)

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सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'

(7-3-19911-1987)

कुशीनगर देवरिया में जन्मे अज्ञेय का अपनी मौलिक व प्रगतिशील सोच और संवेदनशील शैली की वजह से साहित्य में अनूठा स्थान है। एक गहरी और विचारोत्तेजक सोच के बाबजूद भी अज्ञेय जी की भाषा बहुत ही सहज थी और मन को छूती थी। 

 कुछ प्रमुख कृतियां---हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, इंद्र धनु रौंदे हुए, आंगन के पार द्वार, कितनी नावों में कितनी बार।

कितनी नावों में कितनी बार- नामक काव्य संग्रह के लिए 1978 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित। आंगन के पार द्वार- के लिए 1964 का साहित्य अकादमी पुरस्कार।

1. कौन खोले द्वार ( लेखनी-नवंबर-2009)

2. नाच ( लेखनी-नवंबर-2009)

3. चीनी चाय पीते हुए ( लेखनी-नवंबर-2009)

4. बोलो चिड़िया ( लेखनी-नवंबर-2009)

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सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
15 सितम्बर 1927-24 सितम्बर1983


1.वाणी मत देना (लेखनी-अप्रैल 2007)

2.चले नहीं जाना बालम (लेखनी अंक 24-फरवरी-2009)

3.विवशता  (लेखनी अंक 24-फरवरी-2009)

4.सूरज को नहीं डूबने दूंगा (लेखनी अंक27-मई 2009)

5.बतूता का जूता (बाल कविता) ( लेखनी-अंक 29-जुलाई 2009)

6.अजनबी देश है यह    ( लेखनी-अँक-30-अगस्त-2009)

7.रंग तरबूजे का      ( लेखनी-अँक-30-अगस्त-2009)

8.धन्त मन्त दुई कौड़ी पावा ( लेखनी-अँक-30-अगस्त-2009)

9.भेड़िए की आंख सुर्ख है  ( लेखनी-अँक-30-अगस्त-2009)

10.जब भी ( लेखनी-अँक-30-अगस्त-2009)


------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------सियाराम शरण गुप्त

बहुमुखी प्रतिभा के साहित्यकार श्री सियारामशरण गुप्त का जन्म भाद्र पूर्णिमा सम्वत् १९५२ वि. तद्नुसार ४ सितम्बर १८९५ ई. को सेठ रामचरण कनकने के परिवार में श्री मैथिलीशरण गुप्त के अनुज रुप में चिरगांव, झांसी में हुआ था। प्राइमरी शिक्षा पूर्ण कर घर में ही गुजराती, अंग्रेजी और उर्दू भाषा सीखी। सन् १९२९ ई. में राष्ट्रपिता गांधी जी और कस्तूरबा के सम्पर्क में आये। कुछ समय वर्धा आश्रम में भी रहे। सन् १९४० ई. में चिरगांव में ही नेता जी सुभाषचन्द्र बोस का स्वागत किया। वे सन्त बिनोवा जी के सम्पर्क में भी आये। उनकी पत्नी तथा पुत्रों का निधन असमय ही हो गया। मूलत- आप दु:ख वेदना और करुणा के कवि बन गये। साहित्य के आप मौन साधक बने रहे।

'मौर्य विजय' प्रथम रचना सन् १९१४ में लिखी। अनाथ, आर्द्रा, विषाद, दूर्वा दल, बापू, सुनन्दा, गोपिका आपके खण्ड काव्य हैं। मानुषी --कहानी संग्रह--, पुण्य पर्व --नाटक--, गीता सम्वाद, --अनुवाद--, उन्मुक्त गीत --नाट्य--, अनुरुपा तथा अमृत पुत्र --कविता संग्रह-- सर्वप्रसिद्ध है। दैनिकी नकुल, नोआखली में, जय हिन्द, पाथेय, मृण्मयी, आत्मोसर्ग काव्यग्रन्थ हैं। "अन्तिम आकांक्षा', "नारी' और गोद उपन्यास है। "झूठ-सच' निबन्ध संग्रह है। ईषोपनिषद, धम्मपद भगवत गीता का पद्यानुवाद आपने किया।

दीर्घकालीन हिन्दी सेवाओं के लिए सन् १९६२ ई. में "सरस्वती' हीरक जयन्ती में सम्मानित किये गये। आपको सन् १९४१ ई. में "सुधाकर पदक' नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी द्वारा प्रदान किया गया। आपकी समस्त रचनाएं पांच खण्डों में संकलित कर प्रकाशित है। असमय ही २९ मार्च १९६३ ई. को लम्बी बीमारी के बाद मां सरस्वती के धाम में प्रस्थान कर गये।

 बापू माह विशेष(लेखनी-अंक-8-अक्टूबर 2007)

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सुभद्रा कुमारी चौहान (१९०४-१९४८)                                                हिन्दी की सुप्रसिद्ध कवियत्री और लेखिका सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म १९०४ में इलाहाबाद के निकट निहालपुर नामक गांव में रामनाथसिंह के जमींदार परिवार में हुआ था। १५ फरवरी १९४८ में एक कार दुर्घटना में उनका आकस्मिक निधन हो गया था।
उनके तीन कथा संग्रह प्रकाशित हुए पर उनकी प्रसिद्धि झांसी की रानी कविता के कारण है। 1921 में गांधी जी के असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाली वह प्रथम महिला थीं। वे दो बार जेल भी गई थीं। सुभद्रा कुमारी चौहान की जीवनी, इनकी पुत्री, सुधा चौहान ने 'मिला तेज से तेज' नामक पुस्तक में लिखी है। इसे हंस प्रकाशन, इलाहाबाद ने प्रकाशित किया है। वे एक रचनाकार होने के साथ-साथ स्वाधीनता संग्राम की सेनानी भी थीं। डॉo मंगला अनुजा की पुस्तक सुभद्रा कुमारी चौहान उनके साहित्यिक व स्वाधीनता संघर्ष के जीवन पर प्रकाश डालती है। साथ ही स्वाधीनता आंदोलन में उनके कविता के जरिए नेतृत्व को भी रेखांकित करती है।

जन्माष्टमी  विशेष

   यह कदम्ब का पेड़ अगर मां होता जमुना तीरे... ( लेखनी-अंक 18 -अगस्त-2008)


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सुमित्रानन्दन पंत (मई 20, 1900 – दिसंबर 28, 1977)                                  वीणा, ग्रंथि, पल्लव, गुंजन, ज्योत्स्ना, ग्राम्या, युगांत, उत्तरा, अतिमा, चिदंबरा (भारतीय ज्ञानपीठ से सम्मानित) कला और बूढ़ा चाँद (साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत) तथा लोकायतन जैसे प्रबंध-काव्य सहित 28 पुष्तकों के रचयिता पंत प्रगीत प्रतिभा के पुरोगामी सर्जक तथा कला-विदग्ध कवि के रूप में, व्यापक पाठक वर्ग में समान रूप से आदृत और प्रिय रहे हैं। उन्होंने नाटक, एकांकी, रेडियो-रूपक, उपन्यास, कहानी आदि विधाओं में भी रचनाएँ प्रस्तुत की हैं पर पंत जी की परिचित छवि सुकुमार कवि की ही है।  कौसानी में जन्मे पंत जी को प्रकृति-प्रेम हिमालय की सुरम्य वादियों से विरासत में मिला था और उनका प्रकृति चित्रण व शब्दावली उसी के अनुरूप  विशिष्ट और  रमणीयता लिए हुए है।                                        

चांदनी (लेखनी-नवंबर-2008)

नौका बिहार (लेखनी-नवंबर-2008)

द्रुत झरो (लेखनी-नवंबर-2008)

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सूरदास

भक्ति काल के तीन प्रमुख कवियों में तुलसी और मीरा के साथ सूरदास का नाम बहुत ही आदर से लिया जाता है। वात्सल्य और श्रंगार रस के सम्राट सूरदास को भारतीय काव्याकाश का सूरज कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है । 'सूर सूर तुलसी शशी, उद्गन् केशवदास, अन्य कवि खद्गोत सम जंह तंह करत प्रकास '। उनका प्रमुख ग्रन्थ सूरसागर हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि है। सूरदास की आयु "सूरसारावली' के अनुसार उस समय ६७ वर्ष थी। 'चौरासी वैष्णव की वार्ता' के आधार पर उनका जन्म रुनकता अथवा रेणु का क्षेत्र (वर्तमान जिला आगरान्तर्गत) में हुआ था। मथुरा और आगरा के बीच गऊघाट पर ये निवास करते थे। गुरु बल्लभाचार्य से भी इनकी भेंट वहीं पर हुई थी। "भावप्रकाश' में सूर का जन्म स्थान सीही नामक ग्राम बताया गया है। वे सारस्वत ब्राह्मण थे और जन्म के अंधे थे। मदन मोहन, और सूरज दास आदि कई इनके नाम बताए गए हैं और कहा जाता है कि इनकी आयु 105 वर्ष थी।
"आइने अकबरी' में (संवत् १६५३ वि०) तथा "मुतखबुत-तवारीख' के अनुसार सूरदास को अकबर के दरबारी संगीतज्ञों में माना है।

सूरदास श्रीनाथ की "संस्कृतवार्ता मणिपाला', श्री हरिराय कृत "भाव-प्रकाश", श्री गोकुलनाथ की "निजवार्ता' आदि ग्रन्थों के आधार पर, जन्म के अन्धे माने गए हैं। लेकिन राधा-कृष्ण के रुप सौन्दर्य का सजीव चित्रण, नाना रंगों का वर्णन, सूक्ष्म पर्यवेक्षणशीलता आदि गुणों के कारण अधिकतर वर्तमान विद्वान सूर को जन्मान्ध स्वीकार नहीं करते।
श्यामसुन्दरदास ने इस सम्बन्ध में लिखा है - ""सूर वास्तव में जन्मान्ध नहीं थे, क्योंकि श्रृंगार तथा रंग-रुपादि का जो वर्णन उन्होंने किया है वैसा कोई जन्मान्ध नहीं कर सकता।'' डॉक्टर हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है - ""सूरसागर के कुछ पदों से यह ध्वनि अवश्य निकलती है कि सूरदास अपने को जन्म का अन्धा और कर्म का अभागा कहते हैं, पर सब समय इसके अक्षरार्थ को ही प्रधान नहीं मानना चाहिए।


 जशोदा हरि पालने झुलावै  ( लेखनी -अंक-6-अगस्त 2007)

काहू जोगी की नजर लगी है ( लेखनी-अंक-6-अगस्त 2007)

मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो ( लेखनी-अंक-6-अगस्त 2007)

सबसे ऊँची प्रेम सगाई (लेखनी-अँक-12-फरवरी 2008)

मैया मोहे दाऊ बहुत खिजायो ( लेखनी-अंक-6-अगस्त 2007)

मैया मोरी कबहूँ बढ़ेगी चोटी ( लेखनी-अंक-6-अगस्त 2007)

ग्वालिन तैं मेरी गेंद चुराई ( लेखनी-अंक-6-अगस्त 2007)

बूझत श्याम कौन तू गोरी ( लेखनी-अंक-6-अगस्त 2007)

 

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सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

(21 फरवरी 1896-15 अक्तूबर 1961)

 
जितना भव्य व्यक्तित्व उतनी ही सशक्त व गरिमामय बहुआयामी रचनाएं; निराला जी की  आज भी अपनी एक अलग पहचान है। महादेवी बर्मा और सुमित्रानंदन पंत व जयशंकर प्रसद के साथ छायावाद के प्रमुख स्तंभ।  काव्य कृतियाँ- परिमल, गीतिका, द्वितीय अनामिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नये पत्ते, अर्चना, आराधना, गीत कुंज, और सांध्य काकली।                                                                                                   

कुकुरमुत्ता ( लेखनी-मई-2007)

आज प्रथम गाई पिक पंचम (लेखनी-मई-2007)

राम की शक्ति पूजा  (लेखनी-अक्टूबर-2008)

शरद गीत   ( लेखनी-नवंबर-2008)

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सोहन लाल द्विवेदी


कविता धरोहर

1. हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती (लेखनी-अक्टूबर-2007)

2. खड़ा हिमालय ( लेखनी-सितंबर 2009)

3. गिरवर विशाल( लेखनी-सितंबर 2009)


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हरिवंश राय बच्चन

27-11-1907--18-1-2003


1.लो दिन बीता लो रात गयी ( लेखनी अंक-2-अप्रैल-2007)

2. जो बीत गयी सो बात गयी ( लेखनी अंक-4- जून-2007)

3. जीवन की आपाधापी में (लेखनी अंक 7-सितंबर-2007)

4. इसपार प्रिये मधु है--(लेखनी अंक 7-सितंबर-2007)

5. दिन जल्दी-जल्दी ढलता है ( लेखनी- अंक 36- फरवरी 2010)

6. निर्माण ( लेखनी- अंक 36- फरवरी 2010)

7. तुम तूफान समझ पाओगे ( लेखनी- अंक 36- फरवरी 2010)

8. कहते हैं तारे गाते हैं ( लेखनी- अंक 36- फरवरी 2010)

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त्रिलोचन

(20 अगस्त 1917- 9  दिसंबर 2007)  

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर ज़िले के कठघरा चिरानी पट्टी गाँव में जन्म।

हिंदी की प्रगतिशील काव्यधारा के एक प्रमुख कवि। डॉ. रामविलास शर्मा के शब्दों में वे "एक खास अर्थ में आधुनिक है और सबसे आश्चर्यजनक तो यह है कि आधुनिकता के सारे प्रचलित साँचों को (अर्थात नयी कविता के साँचों को) अस्वीकार करते हुए भी आधुनिक हैं। दरअसल वे आज की हिंदी कविता में उस धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं जो आधुनिकता के सारे शोरशराबे के बीच हिंदी भाषा और हिंदी जाति की संघर्षशील चेतना की जड़ों को सींचती हुई चुपचाप बहती रही है। त्रिलोचन जी की कविताएँ समकालीन बोध की रूढ़िग्रस्त परिधि को तोड़ने वाली कविताएँ हैं।"

त्रिलोचन जी तुलसी, शेक्सपियर, गालिब और निराला की परंपरा के समर्थ संवाहक कवि हैं। 'सॉनेट' उनका अपना प्रिय छंद है, लेकिन गज़ल, गीत, बरवै और मुक्त छंद को भी उन्होंने अपनी कविता में अपनाया।  मुक्तिबोध सृजनपीठ सागर विश्वविद्यालय के अध्यक्ष व साहित्य अकादेमी समेत अनेक शीर्ष सम्मान व पुरस्कारों से सम्मानित।

प्रमुख कृतियाँ :
कविता संग्रह : धरती, दिगंत, गुलाब और बुलबुल, ताप के ताये हुए दिन, अरधान, उस जनपद का कवि हूँ, फूल नाम है एक, अनकहनी भी कहनी है, तुम्हें सौंपता हूँ, सबका अपना आकाश, अमोला।
डायरी : दैनंदिनी,
कहानी संग्रह : देश-काल।

कविता धरोहरः

1.हंस के समान दिन- (लेखनी-जून-2009)

2.अगर चांद मर जाता (लेखनी-जून-2009)

3.कोयलिया न बोली (लेखनी-जून-2009)

4. परिचय की वो गांठ (लेखनी-जून-2009)

5. दुनिया का सपना (लेखनी-जून-2009)

6. उस जनपद का कवि हूं (लेखनी-जून-2009)

7. हमको भी बहुत कुछ याद था (लेखनी-जून-2009)