जीवन क्षितिज की निर्णायक रेखा माना धुँधली है पर रही हमेशा से मनभावन ही। प्रो० योगेश अटल जी जो अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के समाजशास्त्री और मानव-विज्ञानी हैं तथा यूनेस्को के रीज़नल ऐडवाइज़र भी रह चुके हैं, उनकी यह अनूठी कविता पढ़ते ही मन में पैठ गयी, दोस्त बन गयी। सीधी सरल और जीने के उत्साह...एक जिजीविषा से भरपूर कविता। न सिर्फ यह स्वावलंबी कविता जीने की विधा से परिचित कराती है, अपितु उसका भरपूर आनंद भी देती है। न जाने क्यों यह कविता मुझे विश्व के कोने-कोन में बिखरे भारतीय (भारतीय ही क्यों; जीवन में डूबे सफल, असफल , नामी , बेनामी हर आदमी) की याद दिला जाती है जिसने यह जीवन जिया है या जो जीने की आस रखता है। जो निराशावादी या कुंठित नहीं हुआ है। यही नहीं मानवता की आस्था और अमरत्व का संदेश भी देती है यह कविता।
कभी किसी से सुना या पढ़ा था कि हम भारतीय रेत में से तेल निकालने वाले हैं...कि आलू और प्याज के बाद भारत सबसे ज्यादा असंख्य भारतीयों का ही उत्पादन और निर्यात करता है। बात कैसे भी कही गयी हो पर मन साल गयी। पल भर को अपना अस्तित्व तक अनचाहा, बेमानी और इफरात लगा।प्रियजनों तक के लिए भी आलू,प्याज-सा 'डिसपेन्सिबिल' लगा और अचानक ही दुनिया के कोने-कोने में बसे हर प्रवासी का दर्द हृदय में उठते धुँए सा आंखों तक उमड़ आया...एक ठंडी अवहेलित भाप सा जमा पलकों को नम और बोझिल कर गया।
सोचती हूँ पर आज इन्ही आलू प्याजों ने ही तो विश्व को एकबार फिर अपने उसी पुराने गौरवमय भारत से परिचित कराया है। इस नयी इक्कीसवीं सदी की नित नयी समस्याओं को परंपरागत चले आ रहे अपने पुराने भारतीय ठोस समाधान देने की भरपूर कोशिश की है । एक समझदार, ब्याही बेटी-सी दोनों देशों (कुलों) की साख बढ़ायी है । विश्व की नजर में भारत को एकबार फिर उसका गौरवमय स्थान और इतिहास दोनों ही वापस मिल पाए हैं। आज भारतीय खाना-पीना ही नहीं, भारतीय पहनावा ही नहीं, भारतीय सोच तक को यथोचित सम्मान मिल रहा है, चाहे वह तनाव का उपचार हो या फिर व्यापार का। हो सकता है इसमें हम भारतीयों की बढ़ती संपन्नता का भी स्पष्ट और बढ़ता हाथ हो ...पर सफलता ही तो सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है।( दलाल स्ट्रीट के उछाल के साथ आज अम्बानी बंधु विश्व के सबसे धनाढ्य व्यक्ति हैं और लक्ष्मी मित्तल , हिन्दूजा बन्धु ही नहीं, सबीर भाटिटा( हौटमेल के संस्थापक) जैसे अनेक व्यक्ति मिल जाएँगे जिन्होंने भारतीय सोच और दर्शन को ही नहीं, व्यावहारिकता तक को अग्रणीय पंक्ति में ला खड़ा किया है।) श्री कमलेश शर्मा को य़ूनाइटेड नेशन्स का सचिव चुने जाना कहीं-न-कहीं तो एकबार फिर इस तथ्य की पुष्टि करता ही है कि भारत को एकबार फिर से अपना खोया सम्मान वापस मिल रहा है!
विदेशी कम्पनियों का भारत की तरफ मुड़ना भारत को एकबार फिर लैंड औफ औपर्चुनिटी तो दर्शाता ही है , खुद भारत में भी आत्म विश्वास और खुशी की एक नयी लहर-सी उमड़ आई है। पर अभी भी सोने या भूलने का वक्त नहीं; अभी तो बस हम जमीन तैयार कर रहे हैं... भविष्य की उस स्वप्निल और संपन्न इमारत की ठोस नींव उठना तो दूर अभी तो ठीक से खुदी तक नहीं है!
माना एक और नयी सुबह, एक और नये वर्ष की एकबार और आ गयी है... नए स्वप्नों के नए पंखों सहारे मानवता नयी दिशा की ओर उड़ने को अग्रसर और बेचैन है। ज्ञान-विज्ञान के ये नए-नए क्षितिज, अपनी सुनहरी आभा से मंडित अवसाद को तोड़ने की ज़िद पर तो हैं पर यह कालिमा इतनी घटाघोप है कि रौशनी की लकीर फ़क उजाला नहीं बन पाती। कहीं जर्जर धरती की फिक्र है, तो कहीं टूटते-बिखरते समाज के ढांचे को संभालने की जिम्मेदारी। पश्चिम के व्यस्त समाज की परेशानियां (बुराईयां कहूं तो शायद अतिशयोक्ति न होगी) अब पूरब तक फैल चुकी है; पूरब जो कि उगते सूरज का प्रतीक था अब पश्चिम की नकल करते-करते पश्चिम से ही जा मिला है (विश्वीकरण का एक अनचाहा हरजाना ही समझ लें इसे।) ...वैसे ही विवेक के सूरज की पूर्ण अवहेलना कर...पूरी तरह से ढांप-निगलकर।
भौतिकता की अंधी दौड़ में आज जो संग नहीं दौड़ पाते उन्हें मात्र पीछे ही नहीं छोड़ा जाता, कुचलकर आगे बढ़ना भी आम बात हो गयी है। फिर भी बुराई नहीं, अब व्यवहारिकता या वक्त की मांग ही दिखती है इसमें। पश्चिम की तरह अब भारत में भी बुझी आँखों वाले बृद्ध मां-बाप और मां-बाप का इन्तजार करते छोटे बच्चे घर-घर में दिख जाएंगे। वृद्ध-आश्रमों की जरूरत अब भारत को भी उतनी ही महसूस होने लगी है जितनी कि अंधी दौड़ में फंसे पश्चिम को होती रही है। समाज का ढांचा भारत में भी बदल रहा है। विश्वीकरण के इस युग में जीने का तरीका ही नहीं सोच तक बदल रही है...कैसा है यह इक्कीसवीं सदी का भारत और उससे भी ज्यादा कैसा रखना चाहते हैं हम आप अपने इस देश को, खुद अपने आपको...अपनी सोच और अस्मिता को,यही सब समझने और इन्ही यक्ष प्रश्नों से जूझने का प्रयास है लेखनी। उम्मीद ही नहीं विश्वास है कि हमारे इस अभियान में आप ऐसे ही हमारे साथ कदम से कदम मिलाकर चलते रहेंगे, एक अंतहीन, आनंदमयी अंतर्यात्रा और सानिध्य का सुख लेते और देते रहेंगे!...
अमा को चीरती स्वर्णिम किरणों-सा आपका आगामी जीवन ही नहीं, हर दिन, हर पल, जीवन दृष्टि तक सफल, सार्थक व विषाद और विकारों से दूर रहे, इन्ही अशेष शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत है आपकी अपनी लेखनी-2008।...
एक बार फिर हम वक्त के उस मोड़ पर खड़े हैं जब अलविदा कहने से पहले मुड़कर देखने को मन करता है।
हर जाते वर्ष की तरह सन 2007 के भी अपने अलग और कई-कई तेवर रहे, कुछ सही गलत फैसले...उपलब्धियां और असफलताएँ भी रहीं जिसने इसे अन्य वर्षों से अलग अपनी एक पहचान और यादें दीं।
विश्व के फलक पर देखें तो ईराक, अफगानिस्तान और अमेरिका ... पैलेस्टाइन और इजराइल के साथ एकबार फिर खबरों में छाए रहे।
ईराक से सैनिक कब वापस बुलाए जाएँ, बुलाए जाएं भी या नहीं, अमेरिका और इंगलैंड के लिए सरदर्द ही बना रहा। एक ऐसा सरदर्द जिसके रहते प्रसिडेन्ट बुश और उनकी पार्टी के खिलाफ उन्ही के देशवासियों ने मत दिए। विश्व-पटल पर भी बुश-नीतियों के समर्थक दिन-प्रतिदिन कम होते ही नजर आ रहे हैं। पर अभी भी इन निरर्थक और खोखली लड़ाइयों का कोई अंत हमें नजर नहीं आता। दस बिलियन डॉलर प्रति माह के खर्चे पर बुश अपनी 1, 70,000 सैनिकों की सेना को सन 2009 तक ईराक में ही रखना चाहते हैं। इस फैसले से वहां के नागरिकों में काफी असंतोष है। पर्यावरण से लेकर स्वास्थ्य, शिक्षा और गरीबों के लिए गृह-निर्माण आदि कई ऐसी आंतरिक और विश्व की समस्याएँ हैं जिनपर ध्यान देने की ज्यादा जरूरत है।
गरम होते पृथ्वी के तापमान को नीचे लाने के प्रयास में और कुछ हो न हो अमेरिका के वाइस प्रेसिडंट अलगोर को इस साल का सम्मानजनक नोबल पुरुष्कार अवश्य मिल गया...वह भी विश्व में शांति के लिए पर्यावरण की तरफ किए गये प्रयासों के लिए।
मलेशिया में भी एक नया इतिहास रचा गया जब 25 नवंबर को हजारों भारतीयों की रैली को कोलालंपुर में कुचल दिया गया। लाठी चार्ज के साथ-साथ पुलिस ने भीड़ पर अश्रु-गैस के गोले बरसाए...बेरहमी से उनके साथ कड़ा व्यवहार किया गया । भारतीय मूल के नागरिकों ने ब्रिटिश सरकार से एक बड़ी रकम (4 ट्रिलियन डालर) के हरजाने की मांग की है, क्योंकि उन्होंने ही उनके पूर्वजों को श्रमिकों की तरह लाकर वहां बसाया था और मलेशिया की स्थानीय सरकार मुख्यतः दूसरे धर्म की होने के कारण उनके साथ भेदभाव का बर्ताव करती है और भारतीय मूल के लोगों को अब मलेशिया में वे अवसर नहीं मिल रहे, जो मिलने चाहिएँ।
दूसरी तरफ ईरान की आणविक गतिविधियों पर अमेरिका काफी समय से असंतुष्ट रहा है। हारकर अब ईरान ने भी 2007 में अमेरिका को जांच की अनुमति दे ही दी है और अबसे अमरीका ईरान की आणविक गतिविधियों पर आँख रख पाएगा। ध्यान रहे कि जनवरी में ईरान ने अपनी 41 आणविक भट्टी और यूरेनियम कोषों की अमेरिका द्वारा जांच के लिए मना कर दिया था। ईरानी सरकार का कहना था कि वे सिर्फ संयुक्त राष्ट्रसंघ के प्रतिनिधियों को ही यह अधिकार देंगे। ईरानी सरकार के अनुसार उनके आणविक प्रयोग औध्योगीकरम के लिए है। अब निरीक्षण के बाद अमेरिका ने भी उनके इस दावे को सही मान लिया है।
चीन,रूस, जापान, अमेरिका, उत्तरी और दक्षिणी कोरिया इन छह देशों के संयुक्त प्रयासों और संयुक्त ट्रीटी के तहत नौर्थ कोरिया की आणविक भट्टियों को नष्ट करने का काम भी नवंबर में शुरु कर दिया गया है। नोर्थ कोरिया इतना यूरेनियम पैदा कर रही थी कि आराम से एटम बम बना सके।
भारत में आंतरिक विरोधों के कारण , भारत अमरीका की न्यूक्लीयर पावर पर संयुक्त हस्ताक्षर भी अभी टलते से ही नजर आ रहे हैं।
लड़ाई, हिंसा और अनचाही बाढ़ और तबाही की खबरों के अलावा पाकिस्तानी मंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या दूसरी अंतर्राष्ट्रीय दिल दहला देने वाली 2007 की घटना रही।
यहां इंगलैंड में जे. के. रुलिंग द्वारा सुविख्यात हैरी पौर्टर सीरीज के अन्त की घोषणा और 3 साल की बच्ची मैडलिन मकान का स्पेन में गायब हो जाना और खुद उसके मां बाप का ही शक के घेरे में आ जाना पूरे 2007 की खबरों में रहे बिव्कुल वैसे ही जैसे कि इंगलैंड के बाजारों में भारतीय सामान छाया रहा और ब्रिटिश टेलीविजन की सीरीज बिग ब्रदर की वजह से ब्रिटिश टेलीविजन पर भारतीय फिल्म अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी छाई रही । अपने संतुलित व गरिमामय व्यवहार व सोच की वजह से सीरीज के साथ-साथ ब्रिटेन वासियों का भी मन उन्होंने जीता।
30 जून को ग्लास्को एयरपोर्ट पर हुए आतंकवादी हमले ने भारत की शांतिप्रिय छवि को भी थोड़ा बहुत दागी किया। अपराधी कफील मोहम्मद, एरोनौटिक इन्जीनियर और डॉ बिलाल अब्दुल्ला ने विष्फोटक पदार्थों से भरी जीप को ग्लास्को के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की मुख्य इमारत में ले जाकर दे मारा। जलती जीप के साथ कफील भी लपटों में फूट पड़ा था और तुरंत उपचार के बाद भी अगस्त के पहले हफ्ते में उसकी मौत भी हो गयी थी। भीड़भाड़ भरे हवाई अड्डे पर इस घटना से जो डर और चीख-पुकार का माहौल बना होगा उसकी कल्पना मुश्किल नहीं है। पुलिस ने इस सिलसिले में बाद में कुछ और लोगों ( डॉ सबील अहमद, कफील के भाई और आस्ट्रेलिया में ड़ां मोहम्मद हनीफ) को भी गिरफ्तार किया। डॉ हनीफ ने राजीव गांधी यूनिवर्सिटी , बंगलौर से पढ़ाई की थी और जब उन्हें ब्रिसबन एयरपोर्ट आस्ट्रेलिया में गिरफ्तार किया गया, तो वह बंगलौर अपनी पत्नी से मिलने जा रहे थे। उनके यहां हाल में ही बच्चा पैदा हुआ था। उनपर आतंकवाद को शह देने का आरोप लगा ( उनका सिम कार्ड आतंक वादियों ने इस्तेमाल किया था।)जो बाद में खारिज़ भी कर दिया गया और वे भारत अपनी पत्नी और बच्चे क पास वापस लौट भी पाए। कुल मिलाकर आठ लोगों की गिरफ्तारी हुई थी।
दूसरी तरफ भारतीय मूल के पीयूष बॉबी जिन्दल पहले अश्वेत नागरिक थे जो अमेरिका में कंजरवेटिव लूजियाना के 20 अक्टूबर को गवर्नर नियुक्त किए गये। वह जनवरी 2008 में अपना कार्यभार संभालेंगे।
एक लेखिका (तस्लीमा नसरीन) मात्र अपने विचार व्यक्त करने के लिए आज भी, इस इक्कीसवीं सदी में भी दर दर भटके, यह हम सबकी...गुजरे वर्ष की क बड़ी हार ही कही जाएगी।
यह बात दूसरी है कि भारत के सेनसेक्स के उछाल ने इस साल भारत के अम्बानी ब्रदर्स को दुनिया के सर्वाधिक धनाढ्य लोगों की पदवी पर ला बिठाया है। लक्ष्मी मित्तल के अलावा, टाटा का ब्रिटिश कोरस (स्टील) ग्रूप का टेकओवर एक ऐसी दूसरी घटना है जिससे तेजी से आर्थिक शक्ति की तरह उभरते भारत की छवि को कुछ और चमकाया है।
यूँ तो सोनिया गांधी के साथ-साथ नरेन्द्र मोदी भी हमेशा भारतीय खबरों में बने रहे। पर राम-सेतु जिसे अंग्रेज एडम्स ब्रिज भी कहते हैं, 2007 का भारत का सबसे बड़ा विवादास्पद मुद्दा रहा। व्यापारिक मार्ग (सेतु सुन्दरम) की सहूलियत के लिए प्रशस्त मार्ग करने के लिए इसे तोड़े जाने का विचार था। परन्तु सरकार के इस व्यावहारिक विचार को लोगों ने हिन्दुत्व और धर्म का एक बड़ा मुद्दा बना लिया है।
मुम्बई बम ब्लास्ट के अन्दर सौ लोगों की गिरफ्तारी, 12 को मौत की सजा और बीस को उम्र कैद की सजा देकर टाडा केस के जज ने आतंकवादियों को निश्चय ही अपनी दृढ़ता का भलीभांति परिचय दिया है । यह वही जज थे जिन्होंने मशहूर अभिनेता संजय दत्त को इस साल दो बार जेल भेजा और उनकी दिवाली तक जेल में निकलवायी परन्तु निसंदेह इस साल की सबसे बड़ी और दहला देने वाली घटना बेनजीर की हत्या थी । महीने भर पहले भी एक असफल प्रयास में 150 निर्दोषों ने अपनी जान गंवाई थी। और अभी भी असंतुष्ट और क्रोधित पाकिस्तानी अवाम के बीच तोड़फोड़ और मारा-मारी का सिलसिला कायम ही है। भारत के फिल्मी संसार में संजय दत्त के साथ-साथ सलमान खान भी अपने चिंकारा हिरण के शिकार के चक्कर में, तो कभी कटरीना कैफ से रोमांस की वजह से खबरों में बने रहे। सबकुछ खराब ही खराब नहीं था। 2007 में बाली में पर्यावरण के हित में अमरीका का आनाकानी के बाद हस्ताक्षर कर देना, निश्चय ही आक्रान्त पृथ्वी के हित में एक अच्छी घटना थी। और भारतीय फिल्म जगत के राजकुमार अभिषेक बच्चन का रूप की राजकुमारी ऐश्वर्य रॉय से शादी ने 2007 में काफी हलचल मचाई और सभी देश विदेश की पत्रिकाओं ने इसे कवरेज भी दी । ज्ञान-विज्ञान में भी कई-कई नई और अद्भुत उपलब्धियां हुईं विशेशतः जीव कोष विज्ञान में अब शायद नली के अन्दर ही नहीं बिना पिता के भी जीव निर्माण संभव हो। कहा जाता है कि मादा के स्टेम सेल से वीर्य रचना करके नव मानव का निर्माण अब संभव है। कुल मिलाजुलाकर 2007 भी अन्य सालों की तरह एक मिलाजुला साल था जिसने हम पृथ्वी वासियों को संतोष असंतोष, सफलता-आपदा...सूखा-बाढ़ सभी कुछ दिए।
आंसू और मुस्कानों में लिपटा 2007 विदा लेने को तैयार खड़ा है और 2008 बांहें फैलाए सामने। आइये इस नए साल का आशा सद्भाव और सुसंकल्पों से स्वागत करें!
नया वर्ष द्वार पर खड़ा है नई आशाओं और अनदेखे भविष्य का तोहफ़ा लेकर।
आखिर क्यों रहती हैं ये आँखें इतनी उत्सुक भविष्य के इस जादुई शीशे में झांकने को!
क्या जो दिखता है वह इतना मनोहारी है...
प्रस्तुत है मंथन में इसबार इक्कीसवीं सदी की पूर्व संध्या पर लिखा आलेख!
युग कगार पर
उत्सुकता अधीरता में बदलती जा रही थी। वर्षों, महीनों, दिनों का इन्तजार अब कुछ घंटों का ही रह गया था। टकटकी बांधे बैठी शाम की बेचैन आँखों में अँधेरा भरने लगा। समय जो सर्व शक्तिमान है, सबकुछ अतीत में बदलने की ताकत रखता है, आज उसी समय के इस संधि-बिन्दु पर बैठकर समय को आँखों के आगे पलटता देखना महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक लग रहा था। कैसी होगी वह कल की सुबह? क्या सच में सबकुछ नया-नया होगा, नई सदी के उल्लास में डूबा ...कबूतर के पंखों सा उजला और उड़ने को आतुर। नयी उमंगों में नहाया हुआ, दूध से धुले बादलों सा बेदाग और साफ-सुथरा। शायद आसमान से बरसती खुशी को पेड़ सुनहरी किरणों के संग सोने-सा अपनी फुनगियों में समेट लेंगे, हर आते-जाते राही के पैरों के नीचे बिछाने के लिए; बिल्कुल वैसे ही जैसे अमलतास और पलाश के फूल चटकती धूप में चुपचाप जलते हुए पैरों के नीचे आ गिरते हैं। जाने क्यों मन मानना चाह रहा था कि कल की सुबह कुछ विशेष होगी। सुबह होते-होते पक्षी घोसलों से उड़कर आकाश में जा पहुँचेंगे और मंगल-गीत गाने लगेंगे, कुशल कलाबाजों की तरह भांति-भांति के करतब दिखाएँगे। आखिर रोज-रोज तो सदी नहीं बदलती। युग नहीं बदलता। हजारों साल इंतजार करना पड़ता है, कई जन्म लेने पड़ते हैं; तब जाकर सहस्त्राब्दि आती है! उत्साह समेटे नहीं सिमट रहा था। आँखें सपने बुनती, बड़े जोश से रात निकालने को तैयार थीं। हृदय, अपने समस्त सहवासियों की तरफ से इस आल्हादित पल को, इस धरती को, आकाश को, पेड़, पर्वत, नदी-नाले, छोटे-बड़े सभी जीव-जन्तुओं को बधाई देना चाहता था। इस पल को यादों की तह में तराश लेना चाहता था।
कहाँ से कहाँ आ गयी है हमारी सभ्यता! ...पर पाषाण-युग से लेकर आज अंतरीक्ष-यान तक का सफ़र आसान तो नहीं था। कल की तरह आज भी वही चारो तरफ बिखरा हुआ जंगल है। आज भी करीब-करीब वही जंगल के ही कानून चलते हैं। आज भी लाठीवाला ही भैंस हांकता है। शासन और शोषण करता है। यह बात और है कि अब लाठी या ताकत के नये-नये रूप उभरकर सामने आ रहे हैं। हाट और शॉपिंग-मालों से निकलकर हम ई.कामर्स के युग में जा पहुँचे हैं। अब लड़ाइयाँ सिर्फ रण-क्षेत्रों में ही नहीं, कॉमर्स-चेम्बरों में भी लड़ी जाती हैं। लड़ाइयाँ बदलीं, तो लड़ने के तरीके भी बदलने पड़े। आज किसी राष्ट्र पर आरोपित आर्थिक नियंत्रण और व्यापारिक क्षेत्र में विश्व समुदाय से बहिष्कार, उसके लिए परमाणु बम से भी ज्यादा हानिकारक सिद्ध हो सकता है। निश्चय ही इस आपाधापी के दौर में बड़ी-बड़ी उपलब्धियां भी हुईँ, कीर्तिमान भी स्थापित किए गए। इस मानव-जाति की आजकी सहूलियतवादी सभ्यता ने वैज्ञानिक तकनीकियों से भौतिक दूरियां तो करीब-करीब मिटा ही दी हैं। समूचा विश्व आज हर मानव का क्रीडांगन और कर्मभूमि दोनों ही बन चुका है। इस नये सामीप्य के अनुभव में रिश्तों की परिभाषा बदलना भी स्वाभाविक ही है। बदलती सुविधाओं के साथ सबकुछ सुविधानुसार बदल चुका है। आत्मिकता, भौतिकता के साथ गडमड हो चुकी है और सफ़ेद-काला सब ऐसा सलेटी हुआ है कि भावुकता और संवेदनशीलता आज कमजोरी और पिछड़ेपन का प्रतीक बनकर रह गयी है। राजा और प्रजा सबके ही मुखौटे एक हो गए हैं। क्षितिज की उस काल्पनिक रेखा की तरह कौन कहाँ किससे कैसे और कब मिला कहना जब दिन-प्रतिदिन मुश्किल से मुश्किलतर् होता जा रहा है, तो फिर हम इस बहुरँगी युग का सँधि-विच्छेद कैसे करें? इसके आदर्शों और प्रतिमानों को कैसे पहचानें?
काली रात की पिघलती नदी अलसाई चेतना को धीरे-धीरे जाने कब बहाती-भटकाती एक दूसरे ही जंगल में ले गयी, एक ऐसे घने जंगल में जहाँ पेड़ नहीं, जले हुए पेड़ों के ठूँठ खड़े हुए थे और जीव-जन्तुओं के अधमरे ढाँचे दम तोड़ते कराह रहे थे। वर्षों की लापरवाही और दुरुपयोग ने पृथ्वी को आकाश सहित उबलता हुआ लावा बना दिया था। सारी नदियाँ सूख चुकी थीं। जो थोड़ा बहुत पानी इधर-उधर बचा हुआ था वह आरसनिक और इँडस्ट्रियल कचरे की वजह से अब बस जहर था। समुद्र बेचारा तो कबका काली- महकती, सड़ी कीचड़ की खाइयों में पलट गया था। मौत की महकती चादर ने सबकुछ सड़ा-गला दिया था। जैनेटिकली मोटिवेटेड फसल और नसल दोनों ही जीवन से बहुत आगे जा चुकी थीं। संक्रमक और असह्य बीमारियों का गढ़ अपने साथ-साथ लिए हुए आगे बढ़ते इस प्रगतिवादी इंसान ने, उसके सभ्य समाज ने, अपनी बंद आँखों के आगे से अवांछनीय सबकुछ हटा-बढ़ा दिया था। ढक और छुपा दिया था। चारो तरफ घुप अँधेरा था और उस अँधेरे को चीरता था एक हृदय-विदारक क्रंदन। अमानवीय अट्टाहासों के बीच शायद कुछ सुनाई भी नहीं दे पाता, पर डरा-बेचैन मन उस करुण क्रंदन की डोर पकड़े जटिल जंगल में कूद गया।
सामने बैठी औरत बूढ़ी, बहुत बूढ़ी और असहाय थी और उसकी थकी-बुझी आँखों में निराशा धूप-छाँव सी आ-जा रही थी। कभी-कभी तो उन गहरी, काली पुतलियों में क्रोध की बिजलियाँ तक कौंध रही थीं। ग्लानि व मजबूरी के बादल उमड़-घुमड़ रहे थे। हताश् आँखें विश्वास नहीं कर पाईं, वह औरत कोई और नहीं मेरी अपनी धरती मां ही थी। उस अधजले, झुलसे चेहरे से अभी भी खूबसूरती झाँक रही थी। अब भी उसे दूर से ही पहचाना जा सकता था। पर दर्द उन अनगिनित बूढ़ी सिलवटों से रिसते घाव सा बह-बहकर बाहर आ रहा था। जिसके इतने बच्चे, उस मां की ऐसी दुर्दशा! इतनी दयनीय और उपेक्षित वह? मां जो शक्ति और प्यार का रूप होती है, यदि वह निस्वार्थ प्यार कर सकती है तो भरपूर सजा देने का भी तो उसे पूरा ही हक है। फिर यूँ बिलखना क्यों? मन भर आया। एक आश्वासन, एक वादे के तौर पर बढ़े हाथों ने उन थके निराश हाथों को अपने हाथों में लेना चाहा। उन आंसुओं को पोंछना चाहा। " बोलो मां, तुम्हारी यह दुर्दशा किसने की?" नाराज, हताश चेहरे को अपनी ओर करते हुए पूछा, " आखिर यह इतना दुःख, इतनी उदासी क्यों?" पर यह क्या मेरे हाथ तो खुद ही बंधे हुए थे। उनमें पड़ी हथकड़ियों की एक-एक कड़ी इस अशक्त समाज के हर मूर्ख रीति-रिवाज़, व्यक्तिगत लालच और स्वार्थ वगैरह से बनी थीं। शर्म और ग्लानि से बहते आंसुओं को पोंछते हुए मैने अपने असमर्थ हाथ उस बूढ़ी मां के कन्धों पर रख दिए, " बता मां, तेरी इस दुर्दयनीयता का जिम्मेदार कौन है? हम तेरा दुःख कैसे बांट सकते हैं? अपनी सारी कमजोरियों, असमर्थताओं के बाद भी हम मिलकर तेरा दुःख दूर करना चाहेंगे!"
खोखले शब्दों में बुना वह बेईमान प्रश्न अपनी केंचुल से गिर पड़ा। घायल सच बनकर वहीं जमीन पर दम तोड़ने लगा। उत्तर बना आँखों के आगे बार-बार कराहने लगा। इतने सारे लोगों का पेट कैसे भरा जाए, कहां से आए इतना खाद्य पदार्थ, इतनी उर्जा? आदमी नामका दैत्य, बुद्धि से लैस धीरे-धीरे सब पर हाबी होता जा रहा है। सब हज़म करता जा रहा है, बिना रुके, बिना डकारे। अब जब इसका यह पेट नैसर्गिक खज़ानों से नहीं भर पा रहा तो इसने समुन्दर की सारी मछलियां चुन डाली हैं। पर्वतों से पूरी बनस्पति उजाड़ दी है। पृथ्वी को लूटकर अब उसकी लालची आँखें दूसरे ग्रहों पर जा टिकी हैं। सब तहस-नहस करके शुरु हो गया है चुनाव का एक और प्रकरण। बूढ़े बीमारों को हटना पड़ेगा। कमज़ोर, अनाथों को हटना होगा।
" क्या अपने स्वार्थ में तुम मुझे यूँ ही लूटते और खसोटते रहोगे और फिर एकदिन जब सब खतम हो जाएगा, तो किसी और गृह पर जा बसोगे?" विक्षिप्त बूढ़ी धरती बारबार पूछे जा रही थी। " नहीं मां, मां का सौदा नहीं होता।" होठ बुदबुदा रहे थे और मुझे याद आ रहे थे, चंद्रमा और मार्स पर चल रहे अनवरत् नए-नए अनुसंधान। जब आख़िरी पेड़ गिर जाएगा, आख़िरी मझली मार दी जाएगी, तब...तब क्या होगा? कौन सा वह नक्षत्र है जो हमारा बोझ उठा पाएगा? सारे जानवरों को अपनी सुविधानुसार मारकर खा जानेवाले हम, क्या एकदिन ज़रूरत पड़ने पर एक-दूसरे को ही मारकर न खा जाएँगे? शर्म से गर्दन झुकी जा रही थी। " नहीं मां " होठ फिर कांपे और कानों में दुनिया के हर कोने में चलरही लड़ाइयां गूंज उठीं। निहत्थे और गरीब तबकों पर चल रहे अत्याचारों के चलचित्र अनायास ही आँखों के आगे स्वतः प्रसारित होने लग गए। क्या फायदा इस झूठी तसल्ली से, झूठे इस उत्साह से? कौनसी ख़ुशी का जश्न मनाएँ हम पृथ्वावासी? अपनी बीमार धरती का? उन सारी असंभावित संभावनाओं का? इस आगामी सम्पूर्ण विनाश का? अगर जगे नहीं, तो शायद हमारी यह नस्ल शायद आखिरी शताब्दी मना रही होगी! सुबह की गुनगुनी किरणों ने थपकी देकर कब थकी पलकों को सुला दिया, कुछ पता ही नहीं चल पाया।
चेतना कितना ही पक्षी की तरह पंख पसारकर कल्पना के आकाश में विचर ले, यथार्थ की धरती को पीछे, बहुत पीछे छोड़ आए, पर आँखों के आगे से धरती और आकाश को जोड़ती वह क्षितिज की रेखा तो नहीं ही हटती कभी। पहली बार पता चला कि नींद भी कभी-कभी कितना ज्यादा जगा जाती है। इतनी बड़ी बेईमानी, वह भी सभी के साथ!आखिर क्यों? मन ने बहुत ठगा-ठगा-सा महसूस किया। इस नये युग की नई सुबह को देखने के लिए जाने कितने महीनों से इन्तज़ार किया था, शायद अभी भी उतनी देर न हुयी हो जितना सोच रही हूँ। उत्साही मन ने हिम्मत न हारते हुए दौड़कर कमरे और मन के दोनों ही बन्द परदे खोल दिए। किरणें फक उजाला बन चुकी थीं। पक्षी और पौधे निरुत्साह जरूर लग रहे थे, पर हताश नहीं। नया युग खास तरह से मनाना होगा। निजी स्वार्थ से निकलकर एक सामूहिक चेतना को लिए हुए...वृहद विश्व परिवार के साथ। एकसाथ ही अमीर होने के लालच में सोने के अंडे देनेवाली मुर्गी को मारदेने वाले किसान की कहानी हम सभीकी सुनी और जानी-समझी है। हमें देश, धर्म और राजनीति के संकीर्ण दायरों से निकलना होगा। मालूम था काम बहुत मुश्किल है, पर यदि सब मिलकर चाहें तो क्या संभव नहीं? बस जन-चेतना को बदलना होगा। सोचने का तरीका बदलना होगा। अपने लिये ही नहीं, पूरे विश्व के लिए सोचना सीखना होगा। भौगोलिक और जातीय चयन मात्र एक नैसर्गिक दुर्घटना है। किस देश और किस घर में पैदा होना है इसमें व्यक्ति विशेष का अधिकार या हाथ नहीं होता, फिर इस आधार पर भेदभाव और अत्याचार क्यो? इतनी सीमाएँ, त्रासता और शोषण क्यों...कहीं दर्प और गर्व तो कहीं हीनता और दयनीयता क्यों?
गलियां और सड़कें कुछ ज्यादा ही सुनसान लग रही थीं। रातभर उत्सव मनाकर लगता था पूरा शहर ही नयी सदी से बेखबर सोया पड़ा था। कोई बात नहीं दूरदर्शन तो जाग रहा था, इस प्राणहीन, आत्महीन विश्व में इक्कीसवीं सदी का स्वागत करने के लिए। उस बहुचर्चित पहली किरण को अपने चलचित्रों में हमेशा के लिए बन्द किए हुए अनवरत पूरे उत्साह से बोले जा रहा था। हर द्वीप, हर टापू पर गिरती पहली उस किरन का लोगों ने कैसे, भांति-भांति के नृत्य और संगीत से, पुष्पार्पण और शंखनाद से स्वागत किया, सब कुछ बारबार दिखाए जा रहा था। अपने देशों और दूर-सुदूर टापुओं में, कहीं आतिशबाजी से आकाश ढका था तो कहीं उड़ते रंग-बिरंगे गुब्बारों ने आकाश में पक्षियों से होड़ लगा रखी थी, पर मन था कि कचोटे ही जा रहा था। साल रहा था अन्दर ही अन्दर। कितनी सुबहों की पहली किरणें हमने देखी हैं पर क्या हमारी आनेवाली पीढ़ियां भी कुछ सुनहरा देख पाएँगी, कुछ सेलिब्रेट कर पाएँगी? या बस हमारे स्वार्थ और लापरवाही के नीचे घुटकर एकदिन यूँ ही दम तोड़ देंगी? अब इस संभावित जटिल समस्या का हल क्या है?
दुनिया को विनाश के इस कगार से एक नयी सुरक्षित दिशा में तो आना ही होगा। मन की बेचैनी आसपास बिखर गयी और आसमान का उदास मुँह जमीन तक आ लटका। इसके पहले कि वह निराश आसमान बेरुखी से करवट बदलकर सो जाए, पास खड़े ओक के पेड़ ने एड़ियों पर उचककर उसे अपनी शाखों में उठा लिया। मानो कह रहा हो, 'ना, ना, ऐसे हिम्मत नहीं हारते। मुझे मालूम है तुम बहुत बूढ़े और जर्जर हो चुके हो पर नहीं, अब यहांतक पहुँचकर, इतना साथ देकर, तुम हताश नहीं हो सकते। तुम्हें भी हम सब की ही तरह इस नयी सदी का स्वागत करना होगा। यह सदी हमने तुमने मिलकर साथ-साथ देखी है। साथ-साथ विदा की है, इसके सारे सुख-दुख मिलकर बांटे हैं। माना तुम्हारे ओजोन लेयर की चादर भी हमारे हौसलों सी फटी-टूटी है और सपनों के विस्तार से बहुत छोटी है पर आज भी छांव तो दे ही रही है। इसे ऐसे ही सबके सर पर तने रहने देना। बूढ़ा तन चलेगा, पर बूढ़ा मन नहीं। आओ चलो देखें इस नये युग को, इसके नये प्रतिमानों को। मिलकर ढूँढें इन ढीट समस्याओं के सशक्त और समर्थ हल। फलों में बीज सा छुपा सब कुछ आसपास ही मिल जाएगा।'
सुना है एक नए युग ने जन्म लिया है, एज औफ एक्वेरियस। एक नये भाईचारे का युग। अब शायद अपना ही नहीं, हम दूसरों का भी दुख बांट पाएँगे। कम से कम समझने की कोशिश तो अवश्य ही करेंगे और शायद समझ भी जाएँ। अब शायद लोग गरीब और भूख से बिलखते लोगों के पास बस चुनावों के समय फोटो सेशन के लिए ही नहीं, वरन् उनके दुख-दर्द से खिंचकर भी जाएँगे । शायद लड़ाइयां खतम हो जाएँ। ये बेबात के धमाके खतम हो जाएँ। शायद इस गरम होते मौसम के साथ-साथ लोगों के मन भी एक दूसरे के प्रति उष्मित होने लगें। प्यार और सौहाद्र की इस उठती लहर से सारा वैमनस्य, सारा कलुष धुल जाए। रिमझिम प्यार और सत्कार में भीगे हम जीना सीख ही जाएँ। आम और खास, दोनों ही इन्सान धर्म, स्वार्थ और ताकत की बैसाखियों पर ही नहीं, इन्सानियत और फर्ज के पैरों पर चलने लगें। बहुत कुछ है, जो होना चाहिए, हो सकता है और हो भी रहा है। सुना है कि कुछ वैज्ञानिकों ने तो परमाणु बमों से हटाकर अपना ध्यान जानलेवा बीमारियों के निदान की तरफ लगा दिया है। अगर सच में ऐसा हुआ तो शायद अब हममें से कोई भी विचलित न हो, चाहे दुनिया का तापमान कितना ही असह्य क्यों न हो उठे... उलटी-सीधी खबरों का रोज ही कितना ही गुबार क्यों न उठे। बिग थौ हो या बिग फ्रीज, तब हम सब इस धरा के वासी अपने एक विस्तृत कुनबे के साथ हर संभावना से लड़ने को तैयार जो हो चुके होंगे। सुख-दुख दोनों को बांटना सीख चुके होंगे। हो सकता है हममें भी एक नया बोध हो ही जाए और हम भी जान जाएँ कि पृथ्वी हो या इन्सान, उबलते ज्वालामुखी उगलने के बाद कितना ठंडे हो जाते हैं। और हर बार बचाने के लिए नोहा और उसका जहाज भी नहीं ही आ सकता। आज हमें पता चल गया है कि हर स्थिति को एक बेहतर स्थिति में परिवर्तित करने की संभावना भी उसी में रहती है जैसे कि ये उबलते ज्वालामुखी ही थक और चुक जाने पर शान्त झीलों में बदल जाते हैं। आज हम एक नए ज्ञान-विज्ञान के युग में पैर रख चुके हैं। और अब शायद हमें एक दूसरे से डरने की जरूरत नहीं। ना ही एक दूसरे पर बेवजह शक करने की। अब हम खुद अपना ध्यान अपनी परेशानियों से हटाने के लिए पड़ौसियों के यहां उपद्रव करने नहीं जा पहुँचेंगे। ना ही पिछड़े और गरीब समाजों पर अत्याचार करके उन्हें शिष्टाचार और मानव अधिकारों की दुहाई ही देने की जरूरत पड़े कभी। दादागिरी करने के बाद पसीना पोंछते हुए 'जीने और जीने दो' का, मानवता का खोखला सबक अब कोई पढ़ाने नहीं आए, क्योंकि शायद कहीं हमने युगों के दायरों के संग मनों के दायरे भी बढ़ा ही लिए हों।...
अंदर से फूटी उजाले की किरण होठों पर आ बैठी। सबके साथ बांटने को मन मचलने लगा। कलम कागज पर नए जोश से दौड़ने लगी। खुशी का आवेग संक्रामक था। नये वर्ष, इस नई सदी की पहली खबर सुखद थी। हाइजैक्ड यात्री सकुशल अपने अपने घरों को जा रहे थे। पक्षियों ने फिर से चहकना शुरु कर दिया। सोई सड़कें जग गईं। शोर-शराबे और कहकहों के बीच चुपचाप एक नयी समझ की स्मिति होठों पर आ बैठी और उसी फटी-पुरानी ओजोन लेयर का कोट पहनकर सूरज ने आकाश में फिर से खुशी-खुशी घूमना शुरू कर दिया। नए युग का वास्तविक स्वागत करने क्यारियों में मुस्कुराते हुए फूल भी निकल आए और यही नहीं, उन्होंने आकाश में ऊंची उड़ान लेते पक्षियों का आनन्द समझना और महसूस करना तक शुरू कर दिया। और हो भी क्यो न, ताजी ऑक्सीजन देती हवा तो दोनों के ही पास थी। अब किसी को किसी से स्पर्धा करने की जरूरत नहीं। पूरे विश्व की बिछी आँखें, इच्छित उपहार लिए, कल्पतरु सी सजी-संवरी, सामने खड़ी और गले मिलने को आतुर इक्कीसवीं सदी का स्वागत करने को अधीर ही नहीं, आज शायद तैयार भी हैं। और आकाश में बैठा वह सृजनहार भी अब पहली बार अपनी सृष्टि को देखकर चैन से मुस्कुरा सकता है, अपने इन्ही जागरूक इक्कीसवीं सदी के स्व-भाग्यनिर्माताओं की तरह ही। शायद अब उसकी सृष्टि व्यर्थ नहीं। वैदिक काल में शुरू किए गए उस सर्वे भवन्तु सुखिनः वाले तप की समिधाओं ने मानव-चेतना की चिनगारियों को पकड़ ही लिया है आखिर। शायद अब उसे बारबार इस धरती पर नहीं आना पड़ेगा। हजारों साल कम तो नहीं होते बुद्धि को जगाने के लिए। वैसे भी यदि डार्विन की विकास वाली थ्योरी सही है तो उम्मीद है कि यह इक्कीसवीं सदी बीसवीं सदी से हर हालत में बेहतर ही होगी। बस देखना यह है कि हम बन्दरों के अग्रज अपनी गुफाओं से निकलकर, अब मानवता के आगे किधर जाते हैं!
धरोहर में इसबार 26 जनवरी के शुभ अवसर पर विशेष शुभकामना संदेश
दो ओजमयी कविताएं भावी पीढ़ी के नाम...
उठो धरा के अमर सपूतो
पुनः नया निर्माण करो ।
जन-जन के जीवन में फिर से
नई स्फूर्ति, नव प्राण भरो ।
नया प्रात है, नई बात है,
नई किरण है, ज्योति नई ।
नई उमंगें, नई तरंगे,
नई आस है, साँस नई ।
युग-युग के मुरझे सुमनों में,
नई-नई मुसकान भरो ।
डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ
नए स्वरों में गाते हैं ।
गुन-गुन, गुन-गुन करते भौंरे
मस्त हुए मँडराते हैं ।
नवयुग की नूतन वीणा में
नया राग, नवगान भरो ।
कली-कली खिल रही इधर
वह फूल-फूल मुस्काया है ।
धरती माँ की आज हो रही
नई सुनहरी काया है ।
नूतन मंगलमयी ध्वनियों से
गुँजित जग-उद्यान करो ।
सरस्वती का पावन मंदिर
यह संपत्ति तुम्हारी है ।
तुम में से हर बालक इसका
रक्षक और पुजारी है ।
शत-शत दीपक जला ज्ञान के
नवयुग का आव्हान करो ।
उठो धरा के अमर सपूतो,
पुनः नया निर्माण करो ।
*
इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है। देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से जाति भेद की, धर्म-वेश की काले गोरे रंग-द्वेष की ज्वालाओं से जलते जग में इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥
नये हाथ से, वर्तमान का रूप सँवारो नयी तूलिका से चित्रों के रंग उभारो नये राग को नूतन स्वर दो भाषा को नूतन अक्षर दो युग की नयी मूर्ति-रचना में इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है॥
लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है जीर्ण-शीर्ण का मोह मृत्यु का ही द्योतक है तोड़ो बन्धन, रुके न चिन्तन गति, जीवन का सत्य चिरन्तन धारा के शाश्वत प्रवाह में इतने गतिमय बनो कि जितना परिवर्तन है।
चाह रहे हम इस धरती को स्वर्ग बनाना अगर कहीं हो स्वर्ग, उसे धरती पर लाना सूरज, चाँद, चाँदनी, तारे सब हैं प्रतिपल साथ हमारे दो कुरूप को रूप सलोना इतने सुन्दर बनो कि जितना आकर्षण है॥
" कैसे आदमी हो यार! एक छिपकली से डर गये..." नरेन ने खीझकर कहा और चादर खींच ली।
" नहीं यार..." मैं झेंप मिटाने की कोशिश करने लगा," असल में डर नहीं, मुझे खिन लगती है छिपकली से...नाम से ही... साली लिजलिजी...", इससे पहले कि मैं पूरी सफाई दूँ, उसकी नाक फिर बजने लगी है।
मैने बिस्तर की चादर झाड़ी और लाइट औफ़ कर फिर से सोने की कोशिश कर रहा हूँ। लेकिन अब नींद नहीं आ रही। दिमाग में बार-बार नरेन का खीझभरा स्वर घूम रहा है-' कैसे आदमी हो यार !'
दिमाग़ को खाली करने की मैं भरसक कोशिश कर रहा हँ, सभी सोचों को लगातार धकिया रहा हूँ। चन्द लम्हों को लगता भी है खालीपन, पर अचानक फिर कोई वाकया घूम जाता है आँखोंके सामने किसी फिल्म की तरह-' कैसे आदमी हो...'
बिस्तर पर बैठ जाता हूँ पालथी मारकर। नींद न आना तो आम बात है मेरे लिये फिर मैं सोचता हूँ, बाहर ज़रा चहलकदमी कर लूँ तो शायद नींद आ जाये। टहलना अच्छा रहा है आधी रात को। अंदर पंखे की हवा झेली नहीं जा रही। खुश हूँ मैं, बाहर की ठंडी हवा अपना असर जरूर दिखायेगी, यह सोचकर। मैं सो सकूँगा। कुत्तों को मेरा टहलना रास नहीं आ रहा। सोनी साहब जाग गये हैं, बाहर बरामदे में ही सोते हैं न वो, " कौन? अच्छा...आप, आनन्द बाबू, क्या हुआ... "
" कुछ नहीं, बस यूँ ही..., सोने ही जा रहा हूँ, बड़ी गरमी है...सो..." मुझे लग रहा है कुत्ते जरा देर में दुनिया भर को जगा देंगे और फिर सब मुझे ही गरियायेंगे-" कैसे आदमी हो..."
मुझे मजबूरन वापस घर में घुसना पड़ा है। सोच रहा हूँ कुछ पढ़ लूँ तो शायद नींद आ जाये। लेकिन पढ़ने के लिये तो लाइट जलानी पड़ेगी। लाइट जलायी तो नरेन फिर जग जायेगा। फिर...' कैसे आदमी हो यार'... मेरे दिमाग में ये शब्द लगातार हथौड़े मार रहे हैं। गुस्सा आ रहा है नरेन पर, क्यों कहे उसने ऐसे वर्ड्स मेरी तो पूरी रात खराब कर दी और खुद तानकर सोया है।
अब सिगरेट की तलब जोर मार रही है। तकिये के नीचे एक पड़ी है सुबह के लिए। चलो सुबह इमरजेंसी छाप बीड़ी काम आयेगी। दीवार की टेक लगाकर बैठा हूँ, दिमाग अभी भी वहीं है।
' कैसे आदमी हो...' कितनी बार सुन चुका हूँ ये शब्द, कितने संदर्भों में कितने तरीके से सुना है मैने, शब्द अलग-अलग हुए तो क्या, मायने तो वही रहे न हमेशा। अक्सर शब्द भी नहीं हुए लेकिन महसूस कराया गया मुझे-कैसा आदमी हूँ मैं!
वाकई आज की वह छिपकली वाली बात तो बड़ी छोटी है, न के बराबर। मैं शायद अब तक दोबारा सो भी चुका होता। यह भी तय है कि सुबह तक मैं इस बावत सब कुछ भूल चुका होता अगर नरेन ने यह न कहा होता-' कैसे आदमी हो यार', नरेन के इन शब्दों ने मुझे बहुत भीतर तक जगा दिया है, फिर कई रातों न सोने के लिए। खँगालने लगा हूँ मैं अपने आपको, ' आखिर कितना अनबूझा हूँ मैं? मेरे अन्दर से वे सभी घटनाएँ-दुर्घटनाएँ एकाएक बाहर आ गयी हैं, घेर लिया है, जकड़ लिया है मुझे सबने। चिल्ला-चिल्लाकर पूछ रहे हैं सब-' कैसा आदमी हूँ मैं...'
जवाब नहीं है मेरे पास, मिल भी नहीं रहा...उहं...सिगरेट ने उंगलियां जला दीं तकिया पटककर एक बार फिर सोने चला हूँ। लेटे-लेटे धकेल रहा हूँ दिमाग से उन सबको। कोशिश नाकाम। उठकर बैठना पड़ा है मजबूरन। इमरजेंसी छाप बीड़ी के बण्डल से एक बीड़ी निकाल सुलगाते हुए मेरे दिमाग़ में ' कैसे आदमी हो...' से जुड़ी सारी घटनाएँ क्रोनोलॉजिकल आर्डर में उभर रही हैं। मैं रोक नहीं पा रहा अब उन्हें, वापस खदेड़ना कतई नामुमकिन है अब।
हाँ, शहर के सबसे अच्छे स्कूल से हाईस्कूल पास किया था मैने। फर्स्ट क्लास, दो डिस्टिंक्शन। इसके बावजूद मैं उस स्कूल में आगे पढ़ने को तैयार नहीं था। पिताजी से कहा, उन्होंने साफ इन्कार कर दिया। दूसरे स्कूल उन्हें बिलो स्टैंडर्ड लगते थे। मैं अड़ा रहा, उसी स्कूल में नहीं गया। पिताजी झुके पर तब तक देर हो चुकी थी। जिन स्कूलों को वे कुछ अच्छा समझते थे सभी में एडमीशन क्लोज्ड। पिताजी की झल्लाहट लगातार बढ़ती जा रही थी, सबसे कहते, " सब साले मक्कार हैं, बैकडोर से सोर्सवाले का एडमीशन कर रहे हैं। लेकिन एक अच्छे स्टूडेंट को लेने में नानी मरती है। सोर्स के कतई खिलाफ थे वह। खैर एक थर्ड क्लास ( पिताजी की नजरों में) स्कूल में दाखिला मिला मुझे। दाखिले के समय वहाँ के प्रिंसिपल ने पूछा, " तुमने इतना अच्छा स्कूल क्यों छोड़ा?" प्रिंसिपल भले लगे। सो मैने सब कुछ सच-सच बताना ही उचित समझा... " सर वो, वहाँ हर टीचर विनोद को सिर्फ इसलिए डाँटता था क्योंकि एक तो वह ट्यूशन नहीं पढ़ता था और दूसरे---सूती यूनिफॉर्म पहनता था, इसलिए... " प्रिंसिपल ने मुझे अजीब सी नजरों से देखा, दो बार गर्दन हिलाई और फिर उनके मुँह से निकला... " कैसे लड़के हो भई तुम... "
इत्ती-सी बात के लिए मुझे हैरत से देखा गया। हैरत हुई मुझे इस पर तब। इसके बाद भी बीसियों बार जूझना पड़ा है अपने कामों में हैरत वाला हिस्सा ढूँढने के लिए, जब जब मुझे कुछ ऐसा सुनना पड़ा है, तब-तब- " कैसे आदमी हो तुम..."
असल में मैने उसी साल यूनिवर्सिटी में पैर धरे थे, सो रंग चढ़ना शुरु ही हुआ था। मैं भी अपनी साइंस फैकल्टी की जगह आर्ट्स में ज्यादा इंटरेस्ट लेता था। अपने कुछ और साथियों की तरह। हम नये नवेलों की धारणा थी कि आर्ट्स की लड़कियाँ फ्लर्ट करने में ज़्यादा तेज होती हैं इसलिए।
आर्ट्स की तरफ जाते हालाँकि मैं घबराता भी था। मीनाक्षी की वजह से। वह वहीं थी ना। लेकिन वहाँ की रंगीनी से मुँह भी नहीं मोड़ पाता था। और मीनाक्षी...हर बात में नसीहत देना उसकी आदत में शुमार " ऐसा क्यों किया... ", " नीली पैंट पर नीली शर्ट ही क्यों पहनी...", " धूप में यहाँ क्यों टहल रहे हो..." वगैरह वगैरह...असल में हम पड़ोसी थे, बचपन के साथी। एक ही दरजे में पढ़ते थे---मैं बी. एस. सी. वन में, वो बी. ए. वन में। हमने दोस्ती के तहत जो अधिकार एक-दूसरे को दे रखे थे उनमें नसीहत देना उसने अपनी तरफ ज़्यादा जोड़ लिया था, पर यह मुझे अच्छा लगने लगा था। अक्सर मैं मान भी जाता।
साल गुज़रते-गुज़रते हमें पता लग गया था कि हम कितने करीब हैं। मैं तरह-तरह की फिल्में देखता, साहित्यिक उपन्यास पढ़ता। मिल्स एँड बून्स में भरा रोमांस खंगालता। पर समझ नहीं पाता कि किसी 'यूनीक' तरीके से कैसे खुद को एक्सप्रेस करूँ। हालाँकि हम घंटों साथ रहते। बतियाते, गपियाते, पर प्रेम तक पहुँचते-पहुँचते ठहर जाते, सीधा छूटकर बगल वाली गली में घुस जाते और फिर वीरान गली का सन्नाटा हमारे बीच ठहरा रहता, चुप्पी की शक्ल में।
वह उस दिन मेरे कमरे में ही बैठी जगजीत सिंह को सुन रही थी। आँखें बन्द, पूरी तरह खोयी हुई। संगीत उसे कुर्सी के दो पायों पर टिकाये झुला रहा था। अचानक मैने कैसेट रिकॉर्डर बन्द कर दिया। वह ज़मीन पर आ गई, घूरा मुझे। मैने चुपचाप नजर झुकाये हुए अपनी नोटबुक से एक काग़ज़ फाड़ा और उसे तहाकर उसकी जेब में डालता हुआ तेज़ी से बाहर निकल गया।
करीब पाँच मिनट बाद जगजीत फिर गूँज रहे थे। मैने कमरे में झाँका, वह फिर झूल रही थी। मेरी आहट पर उसने कैसेट रिकॉर्डर बन्द किया। मुझ तक आयी। मेरा हाथ पकड़कर खिड़की तक ले गयी और अपने खद्दर के कुर्ते की जेब से वही काग़ज़, जिस पर मैने न जाने कितनी दफ़ा उसका नाम लिखा था, निकालते हुए बोली, " कितना परेशान किया मुझे, बहुत देर से करते हो तुम हर काम...आलसी! शरमाते रहे...कभी मेरी डायरी देखना...", और फिर वही काग़ज़ मेरी जेब में ठूँसते हुए बोली,
" परेशान हो गए? कैसे हो तुम..."
यूँ मेरे प्रेम की औपचारिक शुरुआत भी हुई तो उन्ही लफ्ज़ों से। खैर हमारा प्रेम भी वैसा ही था जैसा आमतौर पर होता है, हम हवाई किले बनाते भविष्य के, शिकायतें करते, लड़ते-झगड़ते, मानते-मनाते। अचानक एक दिन उसकी माँ ने मुझसे पूछ लिया, " मीनाक्षी से शादी करोगे?", " हाँ, पर आप समय आने पर मम्मी पापा से बात कर लीजिएगा एक बार", मैने बेबाक कहा।
" समय आने पर...! कब आएगा समय, पढ़ाई तो तुम्हारी खतम हो गयी ना, जल्दी से नौकरी करो अब।" तमककर बोलीं वो नौकरी जैसे पेड़ पर टंगी थी।
मैने उन्हें समझाने की कोशिश की, " देखिये, अभी बड़े भैया की शादी भी होनी है, वह तो हो जायेगी इसी साल, लेकिन नौकरी लगने में तो कुछ समय... " , आखिर एक साल की मोहलत मिली मुझे।
लेकिन मुझे नौकरी नहीं मिली। पूरा साल तो निकल ही गया। छः महीने करीब ऊपर भी हो गये। मैने मीनाक्षी की तरफ जाना कम कर दिया।
इन्ही कम होती मुलाकातों के बीच एक दिन मीनाक्षी ने बताया, " मेरी शादी की बात चल रही है घर में, शायद कुछ लोग मुझे देखने आने वाले हैं दो-चार-पाँच दिन में।" मैने सुझाया, " कर सको तो इनकार कर दो।"
वह बोली, " नहीं अनु, हम सिविल मैरिज क्यों न कर लें, फिर अगर किसी ने मुझ पर शादी के लिए दबाव डाला तो मैं बता दूँगी, नहीं तो तुम्हें जॉब मिलते ही...बस।" मैंने आदर्शों की किताब खोली और उसे समझाया, " नहीं, बस इस महीने और वेट करो, एन. टी. पी. सी. में इंटरव्यू बहुत अच्छा हुआ था, और अब तो तीन महीने हो गये हैं, कॉल किसी दिन भी आ सकती है। समझो बात को मिनी, तुम्हारे मम्मी-पापा को धोखा देना मैं नहीं चाहता।" उसका चेहरा दोनों हाथों में लेते हुए मैने उसे ढाढ़स बँधाने की भरपूर कोशिश की," डोंट बी डिस्हार्टेंड मिनी, मैं जल्दी ही तुम्हारी मम्मी से बात करता हूँ।"
मैने उसका चेहरा करीब लाना चाहा पर उसने खुद को छुड़ा लिया। पहली बार हुआ ऐसा। वह मेरे हाथों को जोर से पकड़े मेरी आँखों में तैरते भावों को नापती-तौलती रही।
जब तक कॉल आयी तब तक उसकी सगाई हो चुकी थी। मैं रोक नहीं सका। कोशिश ही नहीं की। लेकिन नौकरी मिलने पर जोश फिर ठाठें मारने लगा। मैं उससे मिलने गया। मम्मी मिलीं उसकी। मैने उन्हें अपनी नौकरी लगने की खबर सुनाई और मीनाक्षी से मिलने की इच्छा जाहिर की। उबल पड़ीं वो, " कैसे आदमी हो जी तुम...मालूम है तुम्हें, उसकी सगाई हो चुकी है। अब तो पीछा छोड़ो उसका।" मैं उल्टे पाँव लौट आया।
दूसरे दिन ही मीनाक्षी आयी मेरे घर। मैं उसे देखते ही फिर उछल पड़ा। जल्दी जल्दी कपड़े चेन्ज करके आया और बोला,
" चलो, " " कहाँ?" उसका यह सवाल मेरे लिए उससमय कतई अप्रत्याशित था।, असल में मैं ज्यादा खुशी में तत्कालीन परिस्तियों को भुला भुला बैठा था ना। मैने फिर भी लापरवाही से कहा," कहीं भी। कहीं बैठना है थोड़ी देर।" " नहीं बातें ही तो करनी है ना हमें। फिर यहीं क्यों नहीं..." अब वह समझा रही थी मुझे। " देखो अनु, यू नो कि अब मेरी...प्लीज़, डोण्ट टेक इट अदरवाइज हाँ, तुमसे क्या कहना अब... आयी एम एंगेज्ड, मैं तुम्हारे साथ बाहर नहीं जा सकती अब...समझो जरा...वो लोग भी इसी शहर में रहते हैं ना..."
मैं पढ़ रहा था उसके अटके-अटके शब्दों को भीतर तक, भाषा बदलकर भी वह कह नहीं पा रही थी वह सब। शब्द बदलने में कामयाबी नहीं मिली थी न उसको। कितनी शक्ति लगा गयी थी वह इतना सा बोलने में। फिर भी मैने आखिरी कोशिश की बिना किसी भूमिका के, " अब हम शादी कर सकते हैं मिनी। कल ही।" मैं चेहरे पर जबरदस्ती खुशी छलकाना चाह रहा था। पर वह गम्भीर थी, " अब कैसे? मेरी तो...तुम सब कुछ जानते हुए भी..." मैने लफ़्जों में भरपूर मिठास घोली और नकली बेपरवाही के साथ परोसा।
" सगाई-वगाई गयी भाड़ में...चल। तू कहती थी ना सिविल मैरिज...बस वही कर लेंगे।"
मैने उसे करीब खींच लिया। हालांकि उस वक्त मुझे उसे करीब लाने में और दिनों के मुकाबले कुछ ज्यादा ही ज़ोर लगाना पड़ा। फिर भी हम करीब थे। बहुत करीब। काफी दिनों बाद इतने करीब कि उसका चुम्बन लेने के लिए मुझे ज़रा सी जुंबिश देनी पड़ती अपने चेहरे को। वह खाली-खाली आँखों से कुछ पल मेरा चेहरा देखती रही और फिर अचानक मेरा भ्रम टूट गया। उसने खुद को अलग करते हुए ताना सा दिया, " जब मैं कह रही थी तब तो माने नहीं तुम। अब कह रहे हो जब...पता नहीं कैसे आदमी हो तुम..."
इसके बाद भी एक दो मुलाकात हुई उससे औपचारिक सी। वह हर बार खुश दिखी, अपनी शादी की भावी कल्पनाओं में खोई सी। मैं कभी नहीं समझ पाया कि लड़कियाँ शादी के प्रति एकाएक इतनी उत्साही कैसे हो जाती हैं। बस शादी हो रही है क्या इतना ही काफी होता है एक लड़की के चेहरे पर नयी रौनक लाने के लिए, उसको अन्दर-बाहर फूलों सा महकाने के लिए।
उसकी शादी से डेढ़ महीने पहले मैं घर आया चार दिन की छुट्टी पर। हजरतगंज के बरामदों में एक दिन अचानक वह मिल गयी। मैं बाटा के सामने जबरन चश्मा पहनाने वालों से पीछा छुड़ा रहा था, एक नया-नया दोस्त साथ में था कि वह निकली अपनी मौसेरी या चचेरी बहनों के साथ मॉडर्न सिल्क हाउस से, दोनों हाथों में भारी-भारी शॉपिंग बैग थामे। मुझे देखा, मुस्करायी और रुकी। पर मुझे अचानक जाने क्या हो गया, दोस्त का हाथ पकड़ा और तेजी से ट्रैफिक से बचता-बचाता पहुँच गया सड़क की दूसरी पटरी पर। चोर निगाहों से पीछे देखा वह अब भी मेरी तरफ देख रही थी और अपनी बहनों से कुछ कह रही थी। मेरे दोस्त की आँखों में प्रशंसा के भाव थे उसके लिए, अचरज के मेरे लिए।
अगली सुबह अभी नौ ही बजे थे, मेरा बिस्तर में होना स्वाभाविक था कि मीनाक्षी का छोटा भाई आ धमका। उसके साथ उसके घर जाना पड़ा जबरन। मीनाक्षी ऊपर वाले कमरे में थी, मुझे सीधे वहीं पटका गया। इसके पहले कि मैं कुछ कहता, भैया जा चुका था और मीनाक्षी...वह तो आप फिर उसी पुराने तेवर में थी, जो यूनिवर्सिटी के जमाने में मैं अक्सर झेला करता था।
" कल मैं रुकी वहाँ। और आप साब...क्या हालचाल भी नहीं पूछ सकते थे?
" क्या पूछना, ठीक ही होगी तुम बल्कि खुश हो।"
" अच्छा कब तक हो यहाँ? " इस बार उसका सुर थोड़ा नीचे उतरा।
" कल जाऊँगा रात को," मेरा असहाय सा जवाब था।
" फिर...कब आओगे", शरारत झलकी उसकी आवाज में।
" दो-तीन महीने बाद, जब छुट्टी मिलेगी। "
" और मेरी शादी पर... "
" देखूँगा," मैने टालना चाहा।
" देखूँगा क्या, आना है तुम्हे...समझे। " वह फिर ऊँची होने लगी।
" ठीक है, कहा ना...देखूँगा...मतलब कोशिश करूँगा। "
मैं भी झुँझला सा गया। और फूट लिया वहाँ से। नौकरी पर वापस पहुँच गया पर मन नहीं लग रहा था। उसकी शादी से एक डेढ़ हफ़्ता पहले खत आया उसका। बार-बार शादी में आने का आग्रहभरा खत। रोक नहीं पाया खुद को मैं, बहुत कमज़ोर पा रहा था अपने को, तरह-तरह के विशेषण दे रहा था---बारबार समझौते करने वाला। और इस तरह के बीसियों विशेषण घूम रहे थे दिमाग़ के इर्द गिर्द। इसी हाल में छुट्टी की अर्जी दी और उसकी शादी के दो दिन पहले ही पहुँच गया मैं लखनऊ।
उसी शाम पण्डित के चाय के होटल पर पहुँचा। पुराना अड्डा था वह हम दोस्तों का। शाम को अब भी वे सभी मिलते हैं जो इसी शहर में हैं और कुँवारे हैं। उस दिन भी चार-पाँच मिले। उन्हें आश्चर्य हुआ।
" अबे तुम तो कह गये थे, होली पर आओगे?" एक ने पूछ ही लिया। मेरे मुँह से न चाहते हुए भी निकल गया,
" वो मिनी की शादी है ना..."
बस मुस्कुरा उठे सब और बंगाली मुँहफट तो बोल ही पड़ा,
" अच्छा तो मियां माशूका की शादी में प्लेटें गिनने आए हैं।" , और गूँज उठा वह छोटा-सा कमरा जोरदार ठहाकों से। मेरे बगल में बैठे टुइयाँ गुड्डन ने सरगोशी की, " वह तुझे छोड़कर दूसरे के साथ जा रही है और तुम साले, उल्लू के पट्ठे उसकी शादी में शरीक होगे। अब साले, आ तो गया है तू लखनऊ, पर तुझे शादी की रौनक मैं नहीं बढ़ाने दूँगा।", मैने सफाई दी- " नहीं यार, तुम नहीं समझोगे, किसी ने किसी को नहीं छोड़ा, ये सब तो बस...यूँ समझो कि हम दोनों की मज़बूरियाँ थीं... "
" फिर भी यार, शादी में...तुम भी बस... "
" छोड़ यार, पता नहीं कैसा आदमी है ये..." सबके बीच रखी गर्मागर्म चाय की भाप बादल बनकर मेरे अन्दर बहुत गहरे उतर गयी, कहीं अजीब सी जगह पाकर फिर चिपक गये वे बादल। मैने चाय सिप की, मुस्कुराते हुए, शायद इसी से थोड़ी देर ये बादल छूट जायें या घुल जायें।
शादी वाले दिन दोपहर से ही मैं उसके घर पहुँच गया। छोटे-मोटे कामकाज में हाथ बटाने की कोशिश भी की। खुद हँसता रहा, हँसाता रहा उसे, उसके आसपास के लोगों को। लेकिन वहाँ का माहौल बारबार मेरे अन्दर एक दिन पहले पाण्डे की दुकान पर सुने शब्दों को याद दिला रहा था। बार-बार उसकी सहेलियाँ और हमराज़ बहनों की नज़रें टिक जातीं मुझ पर। मैने जब जब उनकी ओर देखा, सबकी आँखों में एक ही बात लिखी पायी और बादल और गहराते चले गये मेरे भीतर।
शाम होते-होते निकल पड़ा मैं वहाँ से। उसे दुल्हन के लिबास में देखने की तमन्ना तो थी पर अब हिम्मत नहीं। हिम्मत न सही, नशा ही सही। सबकी नज़रों की ताब सहने का बहाना ढूँढा व्हिस्की के एक क्वार्टर में और फिर पहुँच गया पाणडे के होटल पर। वास्तव में मुझे वहाँ बड़ा सुकून मिलता है। अभी बैठा ही था कि धनंजय आ गया, उसकी पैंट की बांयी जेब से भी एक क्वार्टर की झलक मिल रही थी। हम दोनों के पास पाण्डे भी आ गया काउंटर छोड़कर, तीनों ने पीनी शुरु की।
एक पैग अन्दर जाते ही धनंजय बौराने लगा, " क्यों गुरु, मिन्नी की शादी में आये हो ना", मैंने सिर हिलाया।
"अन्नू गुरू एक बात बताओ! हम तो सुने थे मिन्नी की शादी तुमसे होगी, आशिकी भी तो तुम्हारी चल रही थी, क्यों? फिर ये शादी...", वह उत्सुक हो उठा। पाण्डे उठकर काउंटर पर चला गया। धनंजय की नजरें टिक गयीं मुझ पर। मैने दूसरा पेग तेजी से खाली किया और हल्के सुरूर में खुलना शुरू किया- " बस यार, कुछ मामला बिगड़ गया, ऐसी मजबूरियाँ..."
" मजबूरी...तुम्हारे साथ, गैरजात तो है नहीं वो।" उसकी उत्सुकता धीरे-धीरे बढ़ रही थी नशे के साथ।
" उसकी शादी की जल्दी थी उसके घरवालों को, और जब वो लड़का ढूँढ़ रहे थे, तुम जानते हो तब मैं बेकार था।", मैं खाली गिलास नचाते हुए बोला।
हालाँकि उसे मेरा यह तर्क पचाते हुए खासी दिक्कत पेश आ रही थी, फिर भी वह संजीदा हो गया, " जाने दो गुरु, प्यार करने वालों के साथ ऐसा अक्सर होता है...अच्छा ये बताओ...सुहागरात को तो वह तुम्हे याद करेगी। न...?"
मैं जानबूझकर चुप रहा। पर वह तो जैसे सब कुछ जान लेने पर ही उतारू था, उसकी आवाज लड़खड़ायी, " मेरा मतलब...खेले तो खूब होगे गुरु तुम...उसके साथ...रोज़ ही तो टहलाते थे, तुम्हारे घर भी वह घण्टों घुसी रहती थी, गुरु...हम सब ताड़ जाते थे।" जी किया मारते-मारते या तो उसे बेदम कर दूँ या खुद बेदम हो जाऊँ। या फिर सामने रखी बोतल तोड़ूँ और घोंप दूँ उसके पेट में। लेकिन किया कुछ नहीं, बस उसे टाला,
" अरे नहीं यार, क्या बात करते हो, मैने ऐसा कुछ नहीं किया। जल्दी ही क्या थी, मैं तो सोचता था, शादी तो उसी से होनी..."
पाण्डे फिर काउंटर छोड़कर हमारे पास आ गया दूसरे पेग के जुगाड़ में। धनंजय कुछ देर चुप रहा, मेरी बात इस बार भी उसके गले से नहीं उतर रही थी। फिर भी मेरे सुर में सुर मिलाते हुए उसने एक कोशिश और की, " हाँ गुरु, ये तो है, साला शादी के पहले सब कुछ चख लो तो फिर बाद का मजा जाता रहता है...वैसे...किस-विस...तो...?" उसके चेहरे पर शरारत और रहस्यभरी मुस्कान खेलने लगी।
" नहीं यार, किस तक नहीं", मैने झूठ बोला और प्लेट में पड़ी दालमोठ के बड़े दाने समेटता धनंजय उछल पड़ा,
" अबे चूतिये, किस तक नहीं, साले इतना धाँसू माल और तूने किस तक नहीं किया, और आज तीन सौ मील से दौड़ा आया है उसकी शादी में शामिल होने के लिए...भई वाह पाण्डे देखा...कैसा आदमी है ये भी..."
मैं और बर्दाश्त नहीं कर पाया। दनदनाता होटल से बाहर निकला तो धनंजय फिर पीछे। मुझे जबरन पान की दुकान पर ले गया और माफी मांगने लगा,
" सॉरी यार, मुझे पता है, आज तू परेशान होगा, एक्सक्यूज मी यार, आई एम रियली सॉरी...लेकिन एक बात जरूर कहूँगा। मेरे साथ ऐसा होता तो मैं मण्डप से भगा ले जाता लड़की को।
मैं फिर सामान्य होने लगा, " मैने भी उससे कहा तो था कोर्ट मैरेज को।" " फिर...?", उसने पूछा। मैने उगल दिया सब कुछ शायद नशे में ही। एक बार फिर चौंक पड़ा धनंजय, " क्या? उसने भाग चलने को कहा था। तुम स्साले रहोगे हमेशा गधे, वह कह रही है मुझे भगा ले चलो तो हिम्मत नहीं पड़ी, अब जब वह दूसरे के साथ हो ली तो देवदास बने बैठे हैं, दारूबाजी कर रहे हैं... वाकई यार मैं आज तक नहीं समझ पाया कैसे आदमी हो तुम...हुँ!" , और वह दौड़कर एक रेंगती बस में लटक गया और मुझे लगा, मैं उस बस के पहियों के नीचे आ गया हूँ, फिर भी अन्दर जमे बादल छँटकर बिखर नहीं रहे।
मीनाक्षी मुझे छोड़कर चली गयी। फिर मैने यह सोचने की कोशिश भी नहीं की कि-कैसा आदमी हूँ मैं। नयी नौकरी थी, फुर्सत कहाँ। कुछ दिनों के लिए काफी कुछ भूल गया। कई बार ' कैसे आदमी हो...' सुना, महसूसा, पर परवाह नहीं की।
लेकिन इस बार होली की छुट्टियों में...उफ...तभी से बेचैन सा हो गया फिर मैं। एक मित्र के घर रात के खाने का निमंत्रण था, वहां से लौट रहा था। रात दस बजे वैसे भी सवारियाँ कम ही मिलती हैं, पर उस दिन तो मानो शहर में टैम्पो चल ही नहीं रहे थे। एक अदद टैम्पो-टैक्सी के इन्तजार में मेरी नजरें दायीं तरफ टिकी थीं खाली पड़ी सड़क पर। अचानक ऊपर से ही आ रहे दो आदमी चीखे..." किनारे भाई साहब, हटिए-हटिए किनारे।" जब तक मैं उनकी तरफ देखता, उनकी बात को समझता, तेजी से बैक होती एक मारुति कार मुझे धकेल चुकी थी। गनीमत थी, उनके चीखने से मैं अपनी जगह से थोड़ा दायों-बायें हो गया था, वरना बायीं टांग तो टूटनी ही थी। गुस्सा मुझे भीषण आया उस धक्के के साथ ही। ड्राइविंग सीट पर बैठे शख्स के पास पहुँचा। वहाँ पचास-पचपन साल का एक दुबला-पतला झुर्रीदार चेहरा दिखा। मैने पूरे गुस्से में कहा, " अन्धे हो क्या, हॉर्न नहीं बजा सकते थे बैक करते!"
" हॉर्न खराब है भइया" , उसकी मरियल आवाज़ निकली। तब तक वे लोग, जिन्होंने मुझे बचने को आगाह किया था, चार छह लोगों को बटोरकर कार की बाँयी खिड़की पर जमा हो चुके थे। मैने लहज़ा थोड़ा मुलायम किया--- " तो भी पीछे देखना तो चाहिए था न तुम्हें।" वह कुछ बोल तो नहीं पाया पर उसकी आँखों में भय तैरने लगा। मैं ढीला पड़ गया, " जाइये मेरी टांग तो नहीं तोड़ पाये। पर आगे दो-चार की ज़रूर तोड़ेंगे।", गाड़ी बढ़ गयी और वहाँ लगा जमघट, जिसमें एक दो पानवाले भी दुकान छोड़कर शामिल हो गये थे, मुझे घूरता रह गया।
मैं फिर टैम्पो की तलाश में झांकने लगा। तभी जमघटे में से एक आवाज आयी,
" भाषण दे रहे थे- हॉर्न बजाना चाइये था, देखना चाइये था, हुँह...गांधी की औलाद..." अभी जमघट छँटा नहीं था कि वही शख्स जिसने आवाज़ लगाकर मुझे आगाह किया था। बीड़ी सुलगाता हुआ आया मेरे पास- " आपने छोड़ क्यों दिया उसे?"
" बस यूँ ही", मैने टाला। वह मानने को तैयार नहीं, " अरे भाई साहब, यह तिराहा अपना है, डरने की तो कोई बात ही नहीं थी, इत्ती चोट लगी आपको और कहीं हम आवाज न देते तब तो आप नीचे ही होते, फिर भी...और एक कन्टाप जमाते आप बस...बाकी तो हम लोग थे ही, लतिया देते जमकर सब।" बाकी ने भी हाँ में हाँ मिलायी।
" छोड़िये साब, बुड्ढे आदमी से क्या मारपीट करना।" मैने फिर बात खत्म करनी चाही।
पर वे संतुष्ट नहीं हो पा रहे थे। एक बुजुर्ग सज्जन ने मुझे झिड़का, " अरे, मारपीट न सही, दवा-दारू के तो सौ-पचास निकलवा ही लेने थे, आप बस जरा-सी पैण्ट उठाते, पैसे तो हम बाप से निकलवा देते उस हरामजादे के।"
मैं बस हल्के से मुस्करा दिया, इसके सिवा और क्या करता, मुझे सूझा ही नहीं कुछ। मेरी मुस्कराहट का पता नहीं क्या मतलब लगाया उन्होंने। कइयों ने एक दूसरे का मुँह देखा और उनमें से एक आखिर बोल ही पड़ा, " वाह साब वाह, क्या आदमी हैं आप..." , और फिर सब हँस पड़े ठठाकर, कुछ ने सिर झटके, कुछ ने पान की पीक थूकी और छँटने शुरू हो गये। हर चेहरे पर था हैरत के ऊपर चढ़ा हिकारत का भाव।
उस रात नींद नहीं आयी। मैं सोचता रहा बस यह कि कैसा आदमी हूँ मैं। सिलसिला यह अब तक जारी है, चलते-फिरते, उठते बैठते, काम करते, सोते-जागते, मैं सोचता रहता हूँ-कैसा आदमी हूँ मैं। आज तक पता नहीं चला मुझे यह, पिछले कई महीनों से नींद नहीं आती, घण्टा भर से ज्यादा शायद ही कभी सोया हूँ। हालाँकि डॉक्टरों का कहना है, स्वस्थ शरीर के लिए छः घंटे की नींद जरूरी है, फिर भी मेरा शरीर स्वस्थ है, आखिर कैसा आदमी हूँ मैं...
बाहर पैटियो पर सूखने और विलुप्त होने से पहले बूंदें आनन्दमग्न नाच रही थीं---अपनी सामर्थ से कई-कई गुना ऊपर उठ-उठकर। खुद उन्होंने भी इस सुख को भली-भांति जाना था कभी। बरसात शायद इसीलिए होती है कि पुरानी यादें रिमझिम बरसें। आजफिर पानी जमकर गिर रहा था। वैसे इंगलैंड में तो रोज ही बरसात होती है और शेखर सरकार आदी हो चुके हैं इस वक्त-बेवक्त की बरसात के...आखिर पिछले तीस साल से यूँ ही तो भीग रहे हैं। अब तो निमोनिया होने का भी डर नहीं लगता। कोई मां थोड़े ही है जो पूरे वक्त रोकती-टोकती रहे उन्हे-“ सुमी, यह मत खाओ, पेट खराब हो जाएगा। देखो फिर पानी में भीगे तुम। जाओ कपड़े बदल लो तुरंत। फेफड़े सरदी पकड़ लेते हैं, फिर बुढ़ापे तक खांसते रहना मेरी तरह।“ मुँह और बालों पर गिर आयी चन्द काल्पनिक ठंडी बूंदों को गीली कोट की बांहों से तुरंत ही पोंछने की कोशिश की उन्होंने। अंदर बैठे होने के बावजूद भी बाहर गिरती बूंदों की नमी और ठंडक, दोनों को ही पूरी तरह से महसूस कर पा रहे थे वह अब...कांपते पैरों के नीचे भी और ठंड से अकड़ते चेहरे पर भी।
हाथ की ऐंठती उंगलियों को गरमाहट के लिए आपस में रगड़ते-रगड़ते अबतक लाल कर डाला था उन्होंने और अब वे सूजी लाल उँगलियां मां के हाथों की याद दिला रही थीं-‘ तो क्या मां को भी आदत थी इन नम बूंदों को अंदर ही अंदर सोखते रहने की? क्या यही वे बूंदें थीं जिनके समंदर में डूबकर मां की आंखों की चमक हमेशा के लिए ही खो चुकी थी ! ‘
अकेलेपन और दुःख ने मां और बेटे के बीच एक बहुत ही करीब का और नाजुक सा रिश्ता कायम कर दिया था। एक दूसरे की तरफ देखते, जरूरतों को पढ़ते-समझते ही बीतते थे दोनों के दिन रात। बचपन से ही मां के माथे की हर शिकन को होठों की बस होठों की मुस्कान में ही तो बदलना चाहते थे। बिना बाप के बेटे की हर ज़रूरत के लिए जितना ही मां परेशान होती, उतनी ही उनकी परेशानी और कुछ न कर पाने की असमर्थता नन्हे शेखर को दुख देती-धिक्कारती। जल्दी-से बड़े होने के लिए वह बेचैन हो उठते। अपने अभाव का दुख नहीं था उन्हें, बस मां का दुःख बर्दाश्त नहीं होता था उनसे। यूँ तो मां की तरह ही जिन्दगी की हर बंदिश और सीमाओं से समझौता करते हुए ही बड़े हुए थे वे भी, परंतु मां का छोटा-बड़ा हर दुःख उन्हें पागलपन की हद तक विचलित कर देता था। माँ की आंख से टपका मात्र एक आंसू उनके मन में सैलाब ला सकता था। और सैलाबों से जूझना, तैरकर खुदको और माँ को बचाते हुए साहिल पर आ पाना कितना कठिन होता है, बचपन से ही भली-भांति जान गये थे शेखर सरकार। वैस भी माँ के बगैर तो कोई अस्तित्व ही नहीं था...जिन्दगी ही नहीं थी उनकी। माँ ने खाया या नहीं...माँ सोई या नहीं, मां की तबियत ठीक है या नहीं, कोई दर्द, तकलीफ तो नहीं, बस बचपन से यही तो थी पढ़ाई के अलावा उनकी एकमात्र दिनचर्या। और फिर तब कदिन पहले से ही कठिन जिन्दगी और उलझाती, मां अपनी बहू पिनाकी बोस को उनकी जिन्दगी में ले आई थीं।
एक नया रंग और नया ही मौसम लेकर आयी थी पिनाकी काली बाड़ी में। कितने अरमान और ज़िद से लाई थीं मां पिनाकी को घर में बहू बनाकर। कुम्हलाने और कलुछाने से पहले कितना झूमकर कहती थीं – ‘ हमारे तो दरिद्दर ही दूर हो गए। लक्ष्मी सा रूप और सरस्वती के गुण लेकर आयी है बहू। सच कहूं तो भगवती खुद ही चलकर आयी है काली बाड़ी में।‘
शेखर सरकार मां के चेहरे पर आयी इस नयी संतुष्ट मुस्कान पर न्योछावर थे और मां अपनी बहू पर। तभी तो बिना कुछ कहे और जान-समझे ही वरण कर लिया था पिनाकी का। काली बाड़ी की नयी मालकिन के स्वागत में क्या-क्या पापड़ बेलने होंगे, यह तब न शेखर ने ही सोचा था और ना ही खुशियों के सातवें आसमान पर बैठी श्रीमना ने। उसके लिए तो उनकी पिनाकी बहू नहीं, खुशियों का समन्दर थी...हजारों रतन गर्भ में छुपाए, उनकी अपनी रत्नगर्भा।
पिनाकी के घर ट्यूशन करके ही शेखर सरकार ने अपनी केमिकल इंजिनियरिंग की पढ़ाई पूरी की थी और पहले दिन से ही, उन्हें देखते ही पिनाकी के पिता कार्तिक बाबू अपनी केमिकल्स की फैक्टरी वाला अपना सपना जीने लग गये थे। इस होनहार युवक में न सिर्फ उन्हें एक योग्य और संस्कारी जंवाई दिख रहा था अपितु वह अजन्मा बेटा भी जो उनकी स्वर्गीय पत्नी अपनी कोख से उन्हें न दे पायी थी। वे जान गये थे कि कुशाग्र बुद्धि शेखर सरकार उनके व्यापार और सपने, दोनों को ही नई बुलन्दियों पर ले जाने में सक्षम हैं। सूझबूझभरी और पैनी आंखों में वही लगन और कर्मठता दिखी उन्हें जो कभी खुद उनके अपने पास थी। युवा पंखों में वही आतुर फड़फडाहट थी जो किसी भी ऊंचाई को नाप-तौल सकती थी। फिर बेटी के चेहरे पर भी तो एक गुलाबी आभा दिखती थी उन्हं शेखर के सानिध्य में। और इस तरह से शीघ्र ही नियति के सारे निर्णय खुद अपने हाथों में ले लिए कार्तिक बाबू ने। और तब खुद उनकी अपनी जिन्दगी भी कार्तिक बाबू के सपनों के ताने-बानों में उलझकर हमेशा के लिए ही बदल गयी। परन्तु किसी को भी तो कुछ हासिल नहीं हुआ इन सपनों के जाल से...ना तो कार्तिक बाबू के घर जमाई के सपने को उनके स्वाभिमान ने पूरा होने दिया और ना ही अम्मा की आदर्श बहू के सपने को पिनाकी ने। ‘क्या हर रिश्ते का जन्म सिर्फ जरूरतों से ही होता है? ‘
शेखर सरकार अपने इस प्रश्न का उत्तर तो आज तक नहीं ढूँढ पाए क्योंकि जीवन की तरह ही, रिश्तों को भी तो नफे-नुकसान के तराजू में तौलना उन्हें आया ही नहीं! हां याद आते ही एक मलिन अवसाद की परछांई जरूर शाम के बढ़ते अंधेरे से भी ज्यादा उनकी आँखों को गहरा जाती है।
अगर बस यही जीवन है तो इन रिश्तों में अपनी जरूरतों को, खुद को ढूंढ क्यों नहीं पा रहे वह-आकंठ बस डूबे ही क्यों रह जाते हैं ? छोटे-बड़े अतृप्त और असमर्थ इन अहसासों का कौनसा किनारा अब उन्हं डूबने से बचा पाएगा, यह तक तो कभी जान नहीं पाए वे।
पर एक शेखर के रूप और गुणों को देखकर ही तो रिश्ता मांगा था कार्तिक बाबू ने और बस इतना ही सुख काफी था श्रीमना के एकाकी अस्तित्व और मान सम्मान के लिए भी। हाथ जोड़कर कहा था तब-“ शेखर से अच्छा दामाद और बेटा मुझे और कहां मिलेगा बोहू दी...आप बस ‘हां’ कर दो, बाकी सब मैं संभाल लूंगा। आपकी सेवा करती, आपके चरणों में बैठी बेटी आंखों के आगे ही जीवन निकाल दे, इससे बड़ा सुख मेरे लिए भला और क्या हो सकता है?”
जिनके पांच मंजिले मकान की सीढ़ियां चढ़ने की श्रीमना के कमजोर घुटने हिम्मत तक नहीं जुटा पाए थे वही कार्तिक बाबू उसके सामने घुटने टेके बैठे थे। खुद चलकर आए थे उसके पास....श्रीमना बारबार सोचती और फूली न समाती। जिन कार्तिक बाबू के सहारे वह पिछले दस वर्षों तक अपनी गृहस्थी चला रही थी, जिन कार्तिक बाबू के यहां एक-एक करके वह अपना मंगलसूत्र तक गिरवी रख आयी थी, उसी कार्तिक बाबू की बेटी थी पिनाकी और सब जानते थे कि रंगरेजी टोला में बसने वाला हर व्यक्ति बस कार्तिक बाबू के लिए ही काम करता है---कैसे मना कर पाती श्रीमना कार्तिक बाबू को!
और आखिर क्यों नहीं, क्या कमी थी उनके श्रवण कुमार जैसे समझदार और होनहार बेटे में? इतना समझदार कि बिना कहे ही हर बात, हर दर्द समझ ले ...प्यार करे तो खुशियों से झोली भर दे। दूसरा कोई और कहां मिलेगा उन्हें शेखर जैसा? बड़े पुण्य प्रताप से जनमते हैं ऐसे बेटे। हर धूप छांव में बरगद के पेड़ सा ही तो खड़ा रहता है उनके आंगन में। कई-कई जन्मों के आशीर्वादों के बाद किसी-किसी को ही मिल पात होंगे ऐसे बेटे ? कितनी जिम्मेदारियां और तकलीफें उठाई हैं पर इसने भी इस छोटी सी उम्र मं ! श्रीमना ने भर आई आंखें पोंछ डालीं---परेशान होने की जरूरत नहीं पर अब। बहू के आते ही घर से खोई सारी खुशियां खुद ही लौट आएँगी...मंगलसूत्र, चंदनहार, कंगन, सभी कुछ। भगवान ने जब खुशियां लौटाई हैं तो पूरी तरह से ही जिएगी अब वह...बहू-बेटे की हर खुशी बांटती, पोते-पोतियों को खिलाती, मगन हंसती-गाती।
और तब बहुत सोच-विचारकर श्रीमना ने ‘हां’ कर दी। बेटे को संभालने की तो जरूरत ही नहीं पड़ी थी। श्रवण कुमार जैसे शेखर के लिए मां की ही ‘ हां’ काफी थी। परन्तु पिनाकी के लिए बस इतना काफी नहीं था, बहुत कुछ चाहिए था उसे जिन्दगी से ---और भी कई सपने थे उसके बेहद अपने, जिनमें श्रीमना के लिए कोई जगह नहीं थी। ...
क्या वाकई में पिनाकी इतनी गलत थी, जितना कि वे समझते थे या थोड़ी गलती कहीं उऩसे भी हुई थी ? क्या वाकई में पिंकी ही जिम्मेदार थी इस प्रलय की, उनकी अपनी सोच और परिस्थियों का कोई योगदान नहीं था क्या....क्या जीवन की विषमताओं और जरूरतों ने कुछ ज्यादा ही सख्त नहीं कर दिया था उन्हें? वैसे भी कौन खुश रह पाया---वह, मां, मनु---या फिर खुद पिंकी ही!
रिश्तों की उस रेशमी उलझी डोर को एक बार फिर से उठा लिया था शेखर सरकार ने और असफल व नामुमकिन वह प्रयास---पिनाकी बोस, एक हठी नाम...उस हठी लड़की सा ही, पानी पर लिखे होने के बावजूद भी, बारबार और धीरे-धीरे उनकी आँखों में तैरने लग जाता...बेचैन अहसास क्या, खुद बेचैनी बनकर। चाहे-अनचाहे उन्हें डुबोने और भिगोने लग जाता...अस्तित्व और उनकी जिन्दगी का दुःखदायी हिस्सा, क नासूर बनकर।
पिंकी यानी कि पिनाकी बोस, गोरी-चिट्टी, तीखे नाक-नक्शों वाली पिंकी...बी.ए. तक पढ़ी-लिखी, सुरुचिपूर्ण और गृहकार्य में दक्ष, सुगढ़ उनकी पत्नी पिंकी। जिसकी कोख से कभी उनकी मनु का जन्म हुआ था। परन्तु दोस्त, दुश्मन रिश्तेदारों की तरह नामों का भी तो एक खास चेहरा होता है, खास जगह और पहचान होती है जिन्दगी में, फिर पिनाकी क्यों उनकी यादों और पहचानों में...जिन्दगी में अपनी सही जगह नहीं ढूँढ पाई...एक भग्न प्रतिमा-सी भटकती और भटकाती ही रही! क्यों आजतक नहीं जान पाए वे कि पिनाकी उनकी, उनके परिवार की...मां की दोस्त है या दुश्मन ! क्यों आजभी शीशे में बाल संवारते, चलते-फिरते, अपनी शकल की जगह उन्हें पिनाकी ही दिखने लग जाती है...बेवजह ही उनकी तरफ प्यार से देखती, मुस्कुराती...उनका घर-संसार संवारती। कभी-कभी तो उलाहने तक देती। अपनी बड़ी-बड़ी भूरी आँखों से एकटक बस उन्हें ही घूरती, जाने क्या-क्या कह जाती है पिनाकी उनसे। पर उन्होंने तो बरसों पहले ही पिनाकी यादों को विस्मृति की संदूकची में रखकर संयम के ताले लगा दिए थे...ताली रखकर भूलतक गए हैं अब तो वे। पर क्या सही था यह कदम उनका...क्या हर लड़की की बस यही इच्छा नहीं होती कि उसका, सिर्फ उसका अपना एक घर हो, जहां वह अपने पति और बच्चों के साथ मनमानी जिन्दगी जी सके...पटरानी बनी राज कर सके?कई दूसरों के साथ रह पाती हैं, कई नहीं। परन्तु पिनाकी को यह नहीं भूलना चाहिए था कि मां कोई दूसरी नहीं, सबसे ज्यादा अपनी है...शेखर से भी ज्यादा। क्यों शेखर की पत्नी पिनाकी के लिए इस अभद्र अपराध की कोई माफी नहीं थी शेखर की आँखों में, क्यों नहीं समझ पायी उनकी अपनी पत्नी पिनाकी इतनी जरा-सी इस बात को ! सामने हवा में उड़ता वह पत्ता भी उनके मन-सा ही एक सूखी और कटीली डाल पर जा अटका था और बर्फीली हवाओं में फंसा बेचैन कांप रहा था। नम हो आई आँखें पोंछ डाली उन्होंने। कौन सी नयी बात है इसमें, जीवन के झंझावत में तो हर पल ही ऐसा होता रहता है...कहीं से उड़कर कहीं भी अटक जाते हैं हम भी तो किसी एक ही पल की डाल पर!...
बच्चों को पिता बहुत ही समझ और निष्ठा से बड़ा कर रहे थे। समझ और निष्ठा जो प्यार और सम्मान पैदा करती है।
' हमेशा एक दूसरे का ध्यान रखोगे, लड़ोगे नहीं कभी,' अक्सर ही वे समझाते। बच्चे भी उन्हं देखते ही लड़ाई और बहस बीच में छोड़ देते । 'कट्टी' भूलकर दोस्त बन जाते और साथ-साथ खेलने लगते। पिता भी हरदम ध्यान रखते कि घर में बच्चों के लिए हर चीज बराबर की और एक सी ही हो पाए। खिलौने तक बराबर के और एक से आते। हां खिलौनों के रंग जरूर बदल जाता। एक के लाल होते तो दूसरे के नीले। बेटा साल भर छोटा होने की वजह से ज्यादा लाडला और नटखट था। पिता के कहने से पहले ही, बहन छोटे भाई से ही रंग पसंद करवाती और छांटने के बाद तुरंत ही भाई अपने हिस्से के खिलौने अलमारी में रख आता। बहन के खिलौनों से ही खोलता और टूटने या खराब होने के बाद ही अपने निकालकर लाता। फिर दीदी को छूने तक न देता। "तुम्हारा तो लाल था ना!और लाल तो टूट गया। यह तो नीला है। और नीला तो मेरा है।" समझदार बड़ी बहन कुछ न कह पाती।
वैसे तो दीदी पर जान छिड़कता था भइया। उसकी हर बात भी मानता था, परन्तु खिलौनों के साथ-साथ बहन की हर चीज पर बस उसका ही कब्जा होता। मां-बाप भी बहन को ही समझाते- ' छोटा भाई है। नासमझ है। खिलौने देने में दुख कैसा... छोटे भाई का वह ध्यान नही रखेगी, तो और कौन रखेगा !'
एकदिन आंगन में पड़ी रबर की पुरानी गेंद के साथ बहन खेल रही थी । भाई ने देखा और गेंद हाथ से छीन ली।
'मेरी गेंद है। मुझे दो। अब मैं खेलूंगा इसके साथ।'
' तुम जाओ। दूसरी ले लो। बहुत सारी गेंदें हैं। ' बहन वोली।
' नहीं मुझे तो यही चाहिए।'
'तो मुझे दूसरी लाकर दो। '
भाई खेलने में मस्त हो गया। बहन की बात सुनी अनसुनी हो गयी। उदास बच्ची आंखों में आसू भरे फिर देखती रह गयी। पिता से नहीं देखा गया। बेटी को गोदी में लेकर बोले " अगर दीदी तुम्हें अच्छी नहीं लगती और तुम इसे किसी भी खिलौने के साथ नहीं खेलने दोगे, तो चलो, हम इसे बाबाजी को (डरावना,राख मले जटाजूट वाला भिखारी, जिसकी धमकी देकर बच्चों को अक्सर डराया जाता था) दे आते हैं?"
सुनते ही बच्चा सहम गया और गेंद तुरंत ही बहन को वापस लौटा दी। पर अगले पल ही दौड़ कर पिता के पास वापस जा पहुँचा । बांहें फैलाकर गोदी में जा बैठा और बोला, "अब चलो, मुझे भी बाबाजी को दे आओ। "
डरी बहन ने तुरंत ही गेंद भाई को वापस लौटा दी।
***
वीर
उस दिन कपड़े पहनाते समय जब अचानक ही अपाहिज मेजर साहब का संतुलन बिगड़ा और वे बिस्तर से नीचे की ओर ढुलकने लगे, तो नर्स ने संभालने की बहुत कोशिश की पर संभाल नहीं पाई। नतीजा यह हुआ कि अगले पल ही दोनों फर्श पर थे। मेजर साहब नीचे और नर्स उनके ऊपर, अभी भी कसकर उन्हें पकड़े ङुए और संभालने की कोशिश करती हुई । नर्स का भय और चिन्ता के मारे बुरा हाल था, ' पता नहीं कमजोर और बीमार मेजर साहब का क्या हाल हो? कहीं जाने और चोट न लग गयी हो ? '
डरी और परेशान नर्स को देखकर मेजर साहब अपना दर्द भूल अपना वही पुराना ठहाका लगाते हुए बोले, " जेनी,क्या तुम नहीं सोचतीं कि अब तुम्हें मेरे ऊपर से उठ ही जाना चाहिए। आखिर एक खूबसूरत युवती को यूँ एक दिलेर नौजवान की बाहों में देखकर लोग जाने क्या-क्या सोचने और कहने लग जाएँ !"
पल भर में ही घबराई नर्स के चेहरे की वे सारी भय और चिंता की लकीरें आत्मविश्वास और मुस्कुराहट में तब्दील हो गयीं।
(नए वर्ष में संकल्प लेने का रिवाज है ताकि कुछ हानिकारक आदतें छोड़ी जा सकें या फिर एक दृढ़ निश्चय के साथ किसी मनचाहे गन्तव्य को पाया जा सके। इन संकल्पों को कैसे सुलभता से पूरा किया जाए, या मुश्किल व परीक्षा की घड़ियों में कैसे डगमगाने से बचा जाए- जैसी सभी जटिल गुत्थियों के समाधान, प्रेरक व सरल शब्दों में और रोचक उदाहरणों के साथ लेकर आए हैं श्री सीताराम गुप्ता जी इस लेख में...।)
मन है कल्पवृक्ष अर्थात् संपूर्ण इच्छाओँ को पूर्ण करने वाला
-सीताराम गुप्ता
एक थका-हारा व्यक्ति एक जंगल में एक वृक्ष के नीचे बैठा था। उसे जोर से प्यास लगी थी। उसने सोचा कि क्या ही अच्छा हो यदि मुझे पीने के लिए ठंडा-ठंडा पानी मिल जाए। उसका ये सोचना था कि वहां फौरन एक लोटा ठंडा पानी पहुंच गया। उसने अपनी प्यास बुझाई और आराम करने लगा। अब उसे भूख भी लग आई थी। उसने फिर सोचा कि क्या ही अच्छा हो यदि खाने के लिए स्वादिष्ट भोजन भी मिल जाए। उसका इतना सोचना था कि उसके सामने खूब सारा स्वादिष्ट भोजन आ गया। उसने पेट भर भोजन किया। भोजन करने के बाद उसके मन में विचार आया कि इस निर्जन वन में मेरे सोचते ही पानी और खाना आ गया। आखिर कहां से आया ये भोजन और पानी? कहीं ये भूत-प्रेत की तो माया नहीं? यदि इस समय कोई भूत-प्रेत आकर मुझे खा जाए तो? इस विचार से वह डर गया और थर थर कांपने लगा। उसका इतना सोचना और अपनी सोच के प्रभाव से भयभीत होना था कि सचमुच एक भूत वहां आ उपस्थित हुआ और बोला, " मैं तुम्हें खाउँगा।"
वह व्यक्ति बुरी तरह डर गया और सोचने लगा कि हो न हो इस वृक्ष में ही कोई जादू है जो मेरे मन के विचारों को जान लेता है और फिर वैसा ही कर देता है। पहले उसने मुझे पानी दिया, फिर भोजन दिया और अब भूत के रूप में मृत्यु। अचानक उस व्यक्ति के मन में इसके विपरीत भाव आया और कहने लगा, " नहीं, नहीं, ये नहीं हो सकता। मैं कोई सपना देख रहा हूं। भूत-वूत कुछ नहीं होता और मैं किसी भूत-प्रेत से नहीं डरता।" उसका ये सोचना और कहना था कि भूत गायब। वस्तुतः वह व्यक्ति एक कल्पवृक्ष के नीचे बैठा था। कहते हैं कल्पवृक्ष सब इच्छाओं को पूरी करने वाला होता है। उसके नीचे बैठकर जो भाव मन में लाए जाएँ अथवा इच्छा की जाए वह अवश्य पूर्ण होती है।
इस प्रसंग में एक बात स्पष्ट होती है वह ये कि कल्पवृक्ष के नीचे जाने वाली हर इच्छा पूर्ण होती है लेकिन इच्छा के पूर्ण होने के लिए सबसे जरूरी चीज है मन में इच्छा का होना अर्थात इच्छा के अभाव में कल्पवृक्ष भी फल नहीं दे सकता। कामना नहीं तो कैसी कामना पूर्ति? हर फल या परिणाम किसी कर्म के फलस्वरूप ही उत्पन्न होता है। कर्म नहीं करेंगे तो फल नहीं मिलेगा। कर्म की प्रेरणा विचार से ही उत्पन्न होती है और विचार का उद्गम है मन। कल्पवृक्ष भी तभी इच्छा पूरी करेगा जब मन में कोई इच्छा उत्पन्न होगी।
दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि जैसी इच्छा होगी वैसा ही परिणाम आएगा। भोजन की इच्छा तो भोजन और पानी की इच्छा तो पानी तथा मृत्यु का भय तो मृत्यु का सामना। हमारी इच्छापूर्ति हमारी सोच का ही परिणाम है। हमारी सफलता-असफलता, सुख-दुख, लाभ-हानि, आरोग्य-रुग्णता सब हमारी सोच द्वारा निश्चित होते हैं।
सकारात्मक सोच का अच्छा परिणाम तथा नकारात्मक सोच का बुरा परिणाम। हमारी सफलता, सुख, समृद्धि, आरोग्य और दीर्घायु हमारी सकारात्मक सोच या भावधारा का परिणाम है तो असफलता, दुख, हानि, रुग्णता तथा अल्पायु हमारी नकारात्मक सोच का परिणम। सफलता, सुख-समृद्धि, आय, स्वास्थ्य तथा आयु के प्रति अविश्वास, संशय तथा भय ही इनकी प्राप्ति में प्रमुख बाध्य है। मनुष्य वास्तव में वही तो है जो उसकी सोच है। तभी तो कामना की गई है कि मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो 'तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु'।
मन तो संकल्पविकल्पात्मक है। उसमें परस्पर विरोधी भाव उत्पन्न होते रहते हैं। अच्छे विचार आते हैं तो बुरे विचार भी आते हैं। बुरे विचार आते हैं तो उसके विरोधी विचार अर्थात अच्छे विचार भी अवश्य उत्पन्न होते हैं। मन में उठने वाले विचारों पर नियंत्रण कर हम जीवन को मनचाहा आकार दे सकते हैं। जैसा भाव या विचार वैसा ही जीवन। अच्छे विचारों का चुनाव कर जीवन को उन्नत तथा बुरे विचारों का चुनाव कर जीवन को अवनत हम स्वयं बनाते हैं।
ये पूरा बृह्माण्ड ही कल्प वृक्ष है जो हमारे भावों के अनुरूप हमारी सृष्टि का निर्माण करता है। हमारी आंतरिक और बाह्य सृष्टि सब हमारे भावों से आकार पाती है और भावों से ही नियंत्रित होती है। सकारात्मक भावों द्वारा इसे सही आकार प्रदान किया जा सकता है तथा नियंत्रण द्वारा गलत आकार पाने से रोका जा सकता है। लेकिन हमारी सृष्टि के निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है हमारे मन की ही। विचारों के अभाव में कल्पवृक्ष हो या ये पूरा बृह्माण्ड अथवा इस बृह्मण्ड को संचालित करने वाली दिव्य शक्तियां सब निरर्थक हैं। इस बृह्माण्ड अथवा भौतिक जगत् के निर्माण के मूल में भी एक दिव्य विचार ही तो है ऐसा उल्लेख हमारे आर्ष-ग्रन्थों में मिलता है. कल्पवृक्ष मनुष्य-मन की ही सृष्टि है। मनुष्य का मन ही सही अर्थों में कल्पवृक्ष है।
कहते हैं कि पारस पत्थर लोहे को सोना बना देता है। पारस पत्थर किसी ने देखा नहीं सिर्फ किस्से सुने हैं पारस पत्थर के। पारस पत्थर प्रतीक है अपरिमित लाभ के स्रोत का। यह एक मुहावरा बन गया है। किसी के लिए कोई व्यापार पारस पत्थर सिद्ध होता है तो किसी के लिए दूसरी वृत्ति। वस्तुतः सबसे महत्वपूर्ण पारस पत्थर है मनुष्य का मन। मन रूपी पारस पत्थर को छुआने के लिए सकारात्मक विचार रूपी लोहे की आवश्यकता होती है तभी वह सोना बनता है अर्थात अपरिमित लाभ का कारण बनता है। मन को किसी सकारात्मक उपयोगी विचार से ओतप्रोत कर लो तो असीमित लाभ संभव है। जैसा विचार वैसा लाभ। सुख-दुख की अनुभूतियां मन में उत्पन्न विचार की ही देन हैं। स्वास्थ्य विषयक सकारात्मक विचार स्वास्थ्य तथा आरोग्य प्रदान करेंगे तथा समृद्धि के प्रति विश्वास से ओतप्रोत विचार समृद्धि देंगे। कुछ लोग केवल भौतिक सुख और समृद्धि चाहते हैं। उनको ये सब मिलता भी है लेकिन वास्तविक सुख और समृद्धि नहीं। यदि जीवन में संतोष की कामना करोगे तो संतोष भी मिलेगा और संतुष्टि के सामने मात्र भौतिक सुख और समृद्धि कोई मायने नहीं रखते। अतः मन को संतुलित सकारात्मक विचारों से ओतप्रोत रखना श्रेयस्कर है।
प्रायः कहा जाता है कि पुरुषार्थ से ही कार्य़ सिद्ध होते हैं मन की इच्छा से नहीं। बिल्कुल ठीक बात है लेकिन मनुष्य पुरुषार्थ कब करता है और किसे कहते हैं पुरुषार्थ? पहली बात तो यह है कि मन की इच्छा के बिना पुरुषार्थ भी असंभव है। मनुष्य में पुरुषार्थ या हिम्मत अथवा प्रयास करने की इच्छा भी किसी न किसी भाव से ही उत्पन्न होती है और सभी भाव मन द्वारा उत्पन्न और संचालित होते हैं। अतः मन की उचित दशा अथवा सकारात्मक विचार ही पुरुषार्थ को संभव बनाता है। पुरुषार्थ के लिए उत्प्रेरक तत्व मन ही है।
कई व्यक्ति तथाकथित पुरुषार्थ तो करते हैं लेकिन फिर भी सफलता से कोसों दूर रहते हैं। एक श्रमिक कितना परिश्रम करता है लेकिन क्या उसका परिश्रम या पुरुषार्थ अपेक्षित कार्य-सिद्धि प्रदान कर पाता है? कार्य -सिद्धि अथवा सफलता या लक्ष्य-प्राप्ति पूर्ण रूप से पुरुषार्थ पर नहीं मन की इच्छा पर निर्भर है। कालिदास कहते हैं ' नास्त्यगतिर्मनोरथानां ' अर्थात मनुष्य के लिए कुछ भी अगम्य नहीं है। इच्छाएँ ही हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं, सफलता प्रदान करने में सहायक होती हैं लेकिन संतुलित सकारात्मक इच्छाएँ क्योंकि जैसी इच्छा वैसा परिणाम।
कल्पवृक्ष मनचाही वस्तु ही नहीं देता अपितु आनंद का अनुपम व अजस्र स्रोत भी है। कल्पवृक्ष अथवा हमारा मन। आनंद भी मन का एक भाव है। भौतिक सुख-सुविधाओं में आनंद नहीं यदि मन प्रसन्न नहीं। मन के प्रसन्न होने पर आर्थिक समृद्धि अथवा भौतिक सुख-सुविधाओं में कमी होने पर भी आनंद ही आनंद है। जिस दिन मन को नियंत्रित कर उसे सकारात्मकता प्रदान करना सीख जाएंगे, पारस पत्थर हाथ में आ जाएगा। कल्पवृक्ष बनते देर नहीं लगेगी।
क्या आपको पता है कि आज के दौर में सफलता का मूलमंत्र क्या है? ' जी नहीं!' किताबों की बातें तो रहने ही दें। मुझसे यह जान लें कि सफलता का मूलमंत्र है- 'यस सर!' यानी ' जी हां।' ' हां हुजूर।'
मेरे ख्याल से मेरी तरह आप भी अंग्रेजी की इस उक्ति से बखूबी परिचित होंगे। भले ही कोई अंग्रेजी के अन्य शब्दों से परिचित न हो, किंतु यदि उसने 'यस सर' का सधा हुआ प्रयोग करना सीख लिया है तो निश्चय रूप से सभ्य सुसंकृत कहलाने के काबिल है। वैसे 'सर' शब्द आज क युग में सर्वहारा से हब तक सबकी जबान पर है, किंतु ' यस' लग जाने पर इस शब्द के साथ एक विशिष्टता जुड़ जाती है।
अन्य बच्चों की तरह मैने भी सर्वप्रथम, वर्ग में लगाई जाने वाली हाजिरी के प्रत्युत्तर में 'यस सर' कहना सीखा। उस समय यह वाक्यांश बड़ा ही अर्थवान् लगता था और उसे बोलते हुए आदर, उत्साह आदि भावनाएँ प्रकट होती थीं। बाद में ' बा-बा ब्लैक शीप' का रट्टा लगाते हुए ' यस सर...यस सर...' की सम्मान सूचक ध्वनि ने हमेशा दिलो दिमाग के अंदर खुशी और उत्साह के भाव का संचार किया। किंतु वयःसंधि की सीमा-रेखा तोड़ने तक तो इस उक्ति के अर्थ भी बदलने लगे। उस समय तक मेरा एक सहपाठी अपने साथ पढ़ने वाली एक सहपाठिन में रुचि लेने लगा था। क्लास-रूम में कई दफा उस पर कागज की गोली फेंकते हुए शिक्षकों द्वारा पकड़ा गया और हर दफा शिक्षकों के डाँटने और दुबारा ऐसी हरकत न करने की ताकीद के प्रत्युत्तर में वह 'यस सर' कहकर सर झुका लता। किंतु उसने अपनी हरकत नहीं छोड़ी। सच तो यह है कि युवावस्था के लड़के-लड़कियों के 'यस सर' के टोन में काफी वैराइटी मिलती है और आरंभ में इसका सार्थक उपयोग बड़ों की खिल्ली उड़ाने के लिए करते हैं। एक शिक्षक ने एक सोलह वर्षीय छात्र से कहा- " क्या तुम्हें यह नहीं लगता कि मैं यह सब तुम्हारे भले के लिए कर रहा हूँ?" "यस सर! पर क्या आपको पता है-मर लिए भला क्या है?"
इस शब्द के पीछे छिपा हुआ जो उपहास है, क्या उसे बताने की जरूरत है?
आइए अब थोड़ा बड़ों की दुनिया में झांक लें। इस दुनिया में तो 'यस सर' विनम्रता की प्राथमिक पहचान है और इसके बगैर तो काम ही नहीं चल सकता। इसके लगातार प्रयोग से यह जीभ के साथ उसी प्रकार लिपट-चिपट जाता है, जैसे चंदन बृक्ष के साथ भुजंग। जहां मोटी-मोटी किताबों की रटें लगाकर प्राप्त किया ज्ञान चुकने लगता है, अक्सर अकेला 'यस सर' सफलता के झंड गाड़कर चला आता है। सादा जीवन उच्च विचार के सिद्धांत का मनसा, वाचा, कर्मणा पालन करने वाले जहां मुंह की खा जाते हैं, वहां झूठ और आडंबर का पैंट कोट चढ़ाए तथा 'यस सर' को टाई की तरह गले में फंसाए व्यक्ति सफलता के शीर्ष से हाथ हिलाता नजर आ जाता है। यकीन न हो तो साक्षात्कार कीजिए किसी व्यापारिक प्रतिष्ठान के सेल्समैन या एक्जीक्यूटिव से।
आप कितने महान व्यक्ति हैं, कितने आज्ञाकारी और कितनी कार्यक्षमता अपने अंदर रखते हैं, इसका फैसला एक मिनट में 'यस सर' द्वारा हो जाता है। आपने किसी प्रश्न या सौंपे जा रहे दायित्व के जवाब में ' नो सर' कहा नहीं कि आपके कैरियर या प्रतिष्ठान पर खतरा मंडराया। यही कारण है कि बिजनेस एक्जीक्यूटिव हमेशा सिर्फ 'यस सर...यस सर' कहते हैं और इसके आगे की सारी बातें स्वयमेव ही शातिपूर्वक संपन्न हो जाती हैं। किसकी मजाल जो इस वाक्य में छिपे मकड़जाल की चपेट में आने से स्वयं को बचा ले? मुझे तो यही एक ऐसा वाक्य मिला है आज तक, जिसके कई-कई अर्थ निकाले जा सकते हैं। शब्दों की सब्जी मंडी में यह प्याज है जिसके छिलकों की गणना और महिमा से हम सब परिचित हैं।
एक कनिष्ठ अधिकारी अपने बॉस के साथ समुद्र के किनारे टहल रहा था। अचानक बॉस के मन में क्या सनक सूझी कि उसने अपने मातहत से पूछा-"क्या तुम यह समुद्र लांघ सकते हो?" बेचारे मातहत को हमेशा 'यस सर' कहने की आदत थी, सो उसके मुंह से तपाक से निकल गया-"यस सर !'' बॉस चौंक उठे। "क्या तुम सचमुच लाँघ सकते हो?" उन्होंने आश्चर्य प्रकट करते हुए पूछा। मातहत को अब अपनी गलती समझ में आई। किंतु उसने दुनिया भर की शालीनता अपने चेहरे पर समेटते हुए कहा "यस सर! मगर आपकी उंगली पकड़कर। यदि आप लांघ सकते हैं तो आपकी उंगलियां पकड़कर चलने वाला यह खादिम क्यों नहीं?" अब बॉस ही अपनी झेंप मिटाने को 'हें...हें...' कर 'गुड जोक'...'गुड जोक'...कहते हुए हंसने लगे।
दफ्तर में बॉस जिस किसी भी कार्य के लिए कहें, उसके जवाब में 'यस सर' कहने से बेहतर और कोई विकल्प नहीं। लेकिन जब फाइल सामने आए तो आप वही लिखिए, जिसे लिखना आप उचित समझते हों। बड़े बाबू दफ्तर में यह सलाह एक नए लिपिक को बराबर देते रहते हैं। लेकिन लिपिक बेचारा आधुनिक शासन-क्षेत्र का एक ऐसा मोहरा है, जिसे बड़े बाबू तथा बड़े साहब दोनों को 'यस सर', 'यस सर' कहते हुए अपने हित में एक राह निकालनी पड़ती है। ऐसी परिस्थिति में 'यस सर' मजबूरी का एक पर्यायवाची शब्द बन जाता है। एक सरकारी अधिकारी होने के नाते मैं अपने अधीनस्थों से अपने प्रत्येक परामर्श के एवज में 'यस सर' सुनने का आदी हो चुका हूँ। बहुधा ऐसे मौके भी आते हैं, अपने से बड़े अधिकारियों के फालतू एवं चालू किस्म के सुझावों पर मुझे भी 'यस सर' कहना पड़ा है, लेकिन राइटिंग में आते ही वही चीज 'नो सर' भी हो जाती है। कभी-कभी तो कई अधिकारी झुंझलाकर जवाब-तलब भी करत कि जब आपसे मौखिक बातचीत हुई थी, तो आपने 'यस सर' क्यों कहा? अब भला मैं उन्हें कैसे समझाऊँ कि 'यस सर' महज एक ऐसा औपचारिक मुहावरा है जो सहज भाव से मुंह से निकल जाता है जिसका अर्थ उद्गम के समय समझ में नहीं आता। लिखते समय सावधानी विशेष रूप से बरतनी पड़ती है। इसलिए अधिकांश नेता, प्रशासक तथा सफल लोग लिखते हैं कम, बोलते हैं ज्यादा।
इसमें दो मत नहीं कि लगातार 'यस सर' सुनते रहने से अधिकारियों के अहम् की तुष्टि होती रहती है और इसी से उनकी कार्यक्षमता में भी वृद्धि हो सकती है। किन्तु कभी-कभी ऐसा भी देखने में आया है कि ऐसे अधिकारी स्वेच्छाचारी हो जाते हैं और अपनी दक्षता में घुन लगा बैठते हैं। यह वाक्य अधिकारी को असीम आनन्द प्रदान कर देता है, किन्तु विवेक या निर्णय शक्ति का हरण कर लेता है। 'यस सर' का सटीक प्रयोग तो बहुधा बेधड़क होता है और बड़ी दूर तक असर डालता है। चर्चिल एक मुखर सांसद थे, एक दिन वह आधे दर्जन दफा, सदन में अपनी बात रखने को खड़े हुए, किन्तु हर बार अपनी ही पार्टी की एक खूबसूरत महिला सांसद द्वारा बीच में टपक पड़ने के कारण केवल 'यस सर' कहकर बैठ जाते। इस बार बार ' यस सर' के पश्चात उनके बैठ जाने पर स्पीकर ने खीझकर इसका कारण जानना चाहा। चर्चिल ने ऐसा जवाब दिया जिसे सुनकर स्पीकर तो झेंप गए और सांसद में पूरा अट्टाहास हुआ।
'यस सर'-पदबंध को महिमा-मंडित भी होते देखा है, जब ऊंचे प्रशासनिक पदों पर बैठे अधिकारी तथा शीर्ष राजनेता अपने पुराने शिक्षकों का अभिवादन कर अतीत के गलियारों में झांकने को मजबूर करते हैं। 'यस सर', 'यस सर' की झड़ी लग जाती है- जब ये शिक्षक स्कूल या कालेज की बीती घटनाएं अपने वरिष्ठ पुराने छात्रों के बीच रखते हैं। कहावत है कि ताली दोनों हाथों से बजती है, अतः पुराने छात्र भी अपने शिक्षक की प्रशंसा में पीछे नहीं रहते।' सर!' 'सर!' कहते हुए उनके सामने .दों की बारात सजा देते हैं, जिससे शिक्षक आहलादित होकर अपनी ओर से भी कुछ जोड़-घटाव करते हैं। छात्र 'यस सर'. 'यस सर' की हामी भरते हुए उनकी स्मृति की दाद देत हैं और एक अत्यंत आत्मीयता का माहौल खड़ा हो जाता है। यहां ' यस सर' श्रद्धा और प्रेम क रूप में प्रतिष्ठा पाता है। 'यस सर' का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करते हुए एक पदाधिकारी ने 'नारे और मेरा जीवन' में लिखा है कि बचपन में अत्यंत आज्ञाकारी होने के कारण ये दो शब्द कालांतर में एक लत की तरह व्यक्ति से चिपक जात हैं। लेखक इतना ईमानदार है कि बचपन से जवानी तक की घटनाओं को उसने बड़े मनोरंजक ढंग से आगे बढ़ाया है-
जब मुझे कहा जाता है-खीर खा लो, मैं तुरंत खीर खा लेता। जब कहा जाता-बिना इजाजत के घर के बाहर न जाओ, मैं शौचालय भी आज्ञा मांगकर ही जाता। यदि आदेश होता कि शरारती लड़कों के साथ न रहो, घर में ही मन लगाकर पढ़ो, तो मैं बाहर न जाकर घर में ही मक्खी मारता रहता। यदि कही जाता कि कुछ संगीत-गायन का भी अभ्यास करो तो मैं गवैयों के साथ अभ्यास शुरु कर देता, अगरचे मेरा गला बड़ा बेसुरा था।
जब मैं जवान हुआ और बी.ए. करने के बाद एक फर्म में अफसर हो गया तो मेरा आज्ञाकारी व्यक्तित्व बॉस की आज्ञा के लिए बराबर ललायित रहता। 'यस सर', 'यस सर' हर बात पर कहने की ऐसी आदत लगी कि जब बॉस ने कहा कि एयर इँडिया की उड़ान बड़ी अच्छी होती है, तो मैने 'यस सर' कहकर एयर इँडिया का टिकट बॉस के साथ जाने के लिए मंगवा लिया, यद्यपि मैं इस टिकट का हकदार नहीं था, और मेरे पास उतने पैसे भी नहीं थे, जिसके कारण मुझे कर्ज लेना पड़ा। एक दिन बॉस न कहा "थम्स-अप बड़ा स्वादिष्ट होता है!" मैं 'यस सर' कहकर बिना दूसरे पेय को चखे ही थम्स-अप पीने लगा तथा बॉस को खुश करने के लिए दफ्तर के लोगों को भी इसे पीने की आदत लगवाई। मेरी दोस्ती उन लोगों से ज्यादा हुई जो 'यस सर' को पूरी तरह जीवन में साधे हुए थ और 'यस सर' कहने की दौड़ में जैसे लोगों से प्रतिस्पर्धा करते थे। 'यस सर' एक मंत्र है-विघ्नविनाशक, मंगलकारी मंत्र! जपते चलो।
कुछ लोगों को 'यस सर' से एलर्जी भी होती है। अतः ऐसे लोगों को फौरन भांपकर उनके लिए इस वाक्य का प्रयोग कदापि नहीं करना चाहिए, अन्यथा काम बिगड़ने का खतरा है। मेरे एक विद्वान मित्र को आकाशवासी मं रिकार्डिंग के लिए आमंत्रित किया गया। रिकार्डिंग के समय कार्यक्रम अदिशासी आदतन उनक प्रत्यक जवाब में 'यस सर' दोहराने लगा। वह उत्तेजित हो उठे और कार्यक्रम से उनका मन उचटने लगा। केन्द्र निर्देशक भी रिकार्डिंग रूम में ही खड़े थे। उन्होंने श्थिति को समझा और कार्यक्रम अधिशासी को 'यस सर' कहने से मना किया। इसके बाद ही मित्र का तनाव कम हुआ और रिकार्डिंग पूरी हुई। 'यस सर' का अत्यधिक प्रयोग सत् पुरुष सुनना पसंद नहीं करते। यह दोगर बात है कि सच का आतंक होता है, झूठ मित्र की तरह होता है।
कुछ लोग 'यस सर' का प्रयोग टरकाने के लिए भी करते हैं। बहुधा आफिस में यदि कोई अपने कार्य के बारे में दरयाफ्त करता है तो संबंधित लिपिक टरकाने के लिए कह देता है-" यस सर, आपका काम हो रहा है।" यदि आप अचानक किसी अवांछित जगह पर पहुंच गए हो तो स्वागतकर्ता 'यस सर' कहते हुए आपको इस तरह से घूर सकता है, मानो कह रहा हो-' मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है?' 'यस सर' के ऐसे आदरभाव में 'भाव' महत्वपूर्ण होता है।
'यस सर' से संबंधित एक घटना याद आती है, जो अपने में बड़ी शिक्षाप्रद है। एक दिग्गज सेनापति न अपने पुत्र के आपरेशन के लिए, जिसे हृदय रोग था, एक बड़ी रकम की सहायता मुख्यमंत्री से मांगी। मुख्यमंत्री ने तुरंत मुख्य सचिव को आर्थिक सहायता दिलवाने के लिए कहा। मुख्य सचिव ने मुख्यमंत्री से कहा-'यस सर!' मुख्य सचिव ने स्वास्थ्य सचिव से मुख्यमंत्री की बात कही। स्वास्थ्य सचिव ने कहा 'यस सर!' स्वास्थ्य सचिव ने स्वास्थ्य निर्दशक को वह आदेश पहुंचाया- उन्होंने कहा- 'यस सर!' स्वास्थ्य्य निर्देशक ने उसी तरह उप निर्देशक को कहा। उन्होंने भी कहा-'यस सर!' पूरा तंत्र जैसे सहायता के लिए बेचैन हो गया।
कुछ दिन बाद स्वंत्रता सेनानी की पुनः मुख्यमंत्री से मुलाकात हुई। मुख्यमंत्री ने कहा "आपरेशन सफल हुआ न, बच्चा तो अब स्वस्थ होगा? किंतु एक बात, प्राप्त हुए रुपयों के खर्चे का ब्यौरा, रसीद के साथ सरकार को भज दें, जिससे हिसाब-किताब ठीक रहे।" स्वतंत्रता सेनानी ने दुखी होकर कहा-" रुपये कहां मिले, ऊपर से नीचे तक 'यस सर' हो गया।" मुख्यमंत्री ने आश्चर्य व्यक्त किया-"नहीं मिले? मैं तुरंत मुख्य सचिव को बताता हूँ।" मुख्यमंत्री ने मुख्य सचिव स रौब से पूछा-" इन्हें लड़के के आपरेशन के लिए रकम क्यों नहीं मिली?" मुख्य सचिव ने कहा- " सॉरी सर, मैं स्वास्थ्य सचिव से पूछता हूँ।" स्वास्थ्य सचिव ने कहा- "सॉरी सर, मैं स्वास्थ्य निदेशक से पूछता हूँ।" निदेशक ने कहा- " सॉरी सर, मैं उप निदेशक से पूछता हूँ।" उप निदेशक ने कहा-"सॉरी सर, मैं आफिस में पता लगाता हूँ।" इतना सुनकर बचारे स्वतंत्रता सेनानी ने मुख्यमंत्री से कहा-" महाशय! पहले 'यस सर' था, अब 'सॉरी सर' ऊपर से नीचे तक है। कृपा करके इन्हें ज्यादा तकलीफ न दें, इस बीच मेरा बच्चा नीचे से ऊपर चला गया।...यस सर।"
गुलामी के समय की शासन प्रणाली, संचिका परिचालन विधि तथा डेस्क सिस्टम की लीक पर चलने वाली मानसिकता की उपज है - 'यस सर', और 'सॉरी सर'। ये दोनों मौसेरे भाई, नौकरशाही में एलीटिज्म को कायम रखते हुए नौकरशाही का, व्यवस्था के प्रति बिकने का व्यापार चालू रखते हैं। आज के प्रशासन तंत्र की संरचना इन मुहावरों से इस तरह प्रभावित है कि दफ्तरों में इनके प्रयोग की अनावश्यक प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना मुश्किल हो गया है। एक तीसरा शब्द युग्म है-'एक्सक्यूज मी', जो प्रेम-त्रिकोण बनाने के लिए 'यस सर' ' सॉरी सर' के साथ जुट जाता है तथा सूखे पांव वैतरणी पार करवाने में लोगों का सहायक होता है। इस शार्टकट के जमाने में इन तीनों से बनी त्रिवेणी में स्नान कर 'हर-हर गंगे' कहते हुए कोई भी अपना अभिष्ट सिद्ध करने में सफल होगा। यह जान जाइये कि इन तीनों में कहीं कोई अकड़ नहीं, अहंकार नहीं, अनास्था नहीं, वरन् विनय, करुणा और सेवा के भाव हैं, जो पत्थर को भी मोम बना देते हैं।
आज के इस बहुरंगे युग में 'यस सर' जैसा बहुरंगा संक्षिप्त वाक्य शायद ही मिले। 'यस सर' आज के युग की एक आत्मिक नहीं, यांत्रिक अभिव्यंजना है, जिसका प्रयोग अत्यंत भ्रामक और छलपूर्ण सिद्ध हो सकता है। इसके अर्थ के सत्यापन के लिए आपको अपने मन को टटोलना होगा, व्यक्ति की परख करनी होगी तथा परिस्थितियों को भांपना पड़ेगा। व्यवहार में 'यस सर' का न तो कोई निश्चित अर्थ है, न ही उपयोग; फिर भी हमारी जिह्वा से यह चासनी की तरह टपकता है। विनम्रता प्रदर्शन के लिए यह सबसे फुर्तीला मुहावरा बन गया है। भले ही हमारी आवाज में दम न हो, हमारा शब्द-ज्ञान काफी कमजोर हो, किंतु सफलता तलवे चाटेगी, यदि 'यस सर' के सार्थक प्रयोग से हम भिज्ञ हो, क्योंकि 'यस सर' कहना सामाजिक शिष्टाचार का एक अंग बन गया है। यदि भरोसा न हो तो आप इस 'यस सर' को भूलकर देखें, मेरा दावा है कि यह दुनिया भी आपको बिसार देगी। इस 'यस सर' में जादू है। इसका प्रयोग करके कई अफसरों ने अपने मंत्री को अपनी मुठ्ठी में कर रखा है और राजनीतिक दबाव के बावजूद इस 'यस सर वादी' अफसर की ' अवसरवादिता' चलती रहती है। 'यस सर' वह सोने की तलवार है, जिसमें धार नही होती, केवल चमक होती है।
'यस सर' के संबंध में अब तक जो मैं कह रहा था, वह समाज के वर्तमान और प्रत्यक्ष रूप का विश्लेषण करता है, किंतु बात यहीं समाप्त नहीं होती। जरा इसकी परंपरा दर्शन और मनोविज्ञान पर विचार किया जाए तो अनेक तथ्य उपलब्ध होंगे। फिर आप खुद भी 'यस सर', 'नो सर ' का अर्थ पटल खोलने में समर्थ हो सकेंगे। 'यस सर' अथवा ' जी हां' एक स्वीकृति सूचक अभिव्यंजना है। चाहे-अनचाहे इस व्यंजना के प्रयोग में 'जी हां' का अर्थ ' जी नहीं' हो जाता है। अलंकार शास्त्र में कभी-कभी प्रयुक्त शब्द का अर्थ उल्टा हो जाता है, जैसे पंडित का अर्थ मूर्ख और पहलवान का अर्थ दुर्बल हो जाता है। कभी-कभी मौन भाषा का प्रयोग भी आवश्यक हो जाता है। कहा गया- 'मौनं स्वीकृति लक्षणम्'। अर्थात 'नो सर'। बड़ा मुश्किल है समझना। शब्दों के पीछे अर्थछाया की जो रेखा बनती है, वही महत्वपूर्ण है। यह रेखा एक अबूझ पहेली-सी है।
बुद्ध से अनेक प्रश्न पूछे गए थे। जैसे 'ईश्वर है?', 'ईश्वर नहीं है?' 'आत्मा है?', ' आत्मा नहीं है?' ' पुनर्जन्म होता है?', 'पुनर्जन्म नहीं होता है?' इन सभी प्रश्नों के उत्तर में बुद्ध मौन रहे। शिष्यों ने इस मौन की व्याख्या की। कहा-' बुद्ध के मौन का अर्थ है-' हां' (यस सर)। दूसरे पक्ष ने कहा- बुद्ध के मौन का अर्थ है-'नहीं' (नो सर)। मौनं स्वीकृति लक्षणम्। मौनं अस्वीकृति लक्षणम्। इसी आधार पर बुद्ध को एक पक्ष ने अऩीश्वरवादी, अनात्मवादी, पुनर्जन्म- विरोधी माना, तो दूसरे पक्ष ने इसी मौन के आधार पर ईश्वरवादी, आत्मवादी और पुनर्जन्मवादी मान लिया। शताब्दियों तक विवाद बना रहा।
बहुत बाद में नागार्जुन ने इसका समाधान प्रस्तुत किया। कहा-' सारे प्रश्न ही गलत थे। अतः गलत प्रश्न (फैलेसस क्वेश्चन) का उत्तर हां या ना में नहीं हो सकता।' प्राश्चिकों ने पूछा ' जैसे?' नागार्जुन ने कहा-' यदि मैं आपसे एक प्रश्न करूँ और आप हां या ना में जवाब देकर देखिए। प्रश्न है-क्या आपने अपनी मां को झाड़ू से पीटना बन्द कर दिया? आप हां और ना कुछ नहीं कह सकते। दोनों गलत होंगे, क्योंकि प्रश्न ही गलत है। इसलिए ईश्वर, आत्मा, पुनर्जन्म जैसे गढ़े हुए शब्द अननुभूत तथा अदृष्टपूर्व हैं।' जैसे कोई कहे-आपने आपने नदेज्दा फ्योदोरीसना को देखा है? कोई क्या उत्तर देगा? रूसी भाषा का यह शब्द उत्तरदाता के लिए अपरिचित है। अतः'यस सर', ' नो सर' दोनों बेमानी हैं। वैस कहा भी जाता है कि विकल्पहीन सच, आपको कहीं का नहीं छोड़ता। और आज तमाम दुनिया निर्मूल और भ्रांत प्रश्नों पर बिना समझे-बूझे 'यस सर', 'नो सर' कहे जा रही है। झूठे प्रश्न, झूठे उत्तर। लेकिन मलुष्य तो विवक्षु प्राणी है। वह बोलना चाहता है। दूसरे वह किसी-न-किसी के अधीनस्थ है। अधीनस्थता ना नहीं जानती । वह हां कहलवाती है। 'यस सर' एक विवश सरेंडर है, यही ठकुरसुहाती और आत्मप्रवंचित खुशामद-भरी वाणी है। हम 'यस सर' की दासता में फंसे हैं। सभी दास हैं। ये दास भक्तिकाल के सूरदास, तुलसीदास, कबीरदास, केशवदास, मलूकदास, रविदास नहीं, वरन् बॉस-दास हैं।
स्मृति शेष में इसबार जैनन्द्र कुमार जी की कलम से पढ़िए शांत नास्तिक साहित्यकार प्रेमचंद की अंतिम यादें,
एक शांत नास्तिक संत
मुझे एक अफसोस है, वह अफसोस यह है कि मैं उन्हें पूरे अर्थों में शहीद क्यों नहीं कह पाता हूँ, मरते सभी हैं, यहां बचना किसको है! आगे-पीछे सबको जाना है, पर मौत शहीद की ही सार्थक है, क्योंकि वह जीवन की विजय को घोषित करती है। आज यही ग्लानि मन में घुट-घुटकर रह जाती है कि प्रेमचन्द शहादत से क्यों वंचित रह गये? मैं मानता हूँ कि प्रेमचंद शहीद होने योग्य थे, उन्हें शहीद ही बनना था।
और यदि नहीं बन पाए हैं वह शहीद तो मेरा मन तो इसका दोष हिंदी संसार को भी देता है।
मरने से एक सवा महीने पहले की बात है, प्रेमचंद खाट पर पड़े थे। रोग बढ़ गया था, उठ-चल न सकते थे। देह पीली, पेट फूला, पर चेहरे पर शांति थी।
मैं तब उनकी खाट के पास बराबर काफी-काफी देर तक बैठा रहा हूँ। उनके मन के भीतर कोई खीझ, कोई कड़वाहट, कोई मैल उस समय करकराता मैने नहीं देखा, देखके तो उस समय वह अपने समस्त अतीत जीवन पर पीछे की ओर भी होंगे और आगे अज्ञात में कुछ तो कल्पना बढ़ाकर देखते ही रहे होंगे लेकिन दोनों को देखते हुए वह संपूर्ण शांत भाव से खाट पर चुपचाप पड़े थे। शारीरिक व्यथा थी, पर मन निर्वीकार था।
ऐसी अवस्था में भी (बल्कि ही) उन्होंने कहा- जैनेन्द्र! लोग ऐसे समय याद किया करते हैं ईश्वर। मुझे भी याद दिलाई जाती है। पर अभी तक मुझे ईश्वर को कष्ट देने की जरूरत नहीं मालूम हुई है।
शब्द हौले-हौले थिरता से कहे गए थे और मैं अत्यंत शांत नास्तिक संत की शक्ति पर विस्मित था।
मौत से पहली रात को मैं उनकी खटिया के बराबर बैठा था। सबेरे सात बजे उन्हें इस दुनिया पर आँख मीच लेनी थीं। उसी सबेरे तीन बजे मुझसे बातें होती थीं। चारो तरफ सन्नाटा था। कमरा छोटा और अँधेरा था। सब सोए पड़े थे। शब्द उनके मुंह से फुसपुसाहट में निकलकर खो जाते थे। उन्हें कान से अधिक मन से सुनना पड़ा था।
तभी उन्होंने अपना दाहिना हाथ मेरे सामने कर दिया, बोले-दाब दो।
हाथ पीला क्या सफेद था और पूला हुआ था, मैं दाबने लगा।
वह बोले नहीं, आँख मींचे पड़े रहे। रात के बारह बजे ' हंस' की बात हो चुकी थी। अपनी आशाएँ, अपनी अभिलाषाएँ, कुछ शब्दों से और अधिक आँखों से वह मुझपर प्रगट कर चुके थे। ' हंस' की और साहित्य की चिंता उन्हें तब भी दबाए थी। अपने बच्चों का भविष्य भी उनकी चेतना पर दबाब डाले हुए था। मुझसे उन्हें कुछ ढारस था।
अब तीन बजे उनके फूले हाथ को अपने हाथ में लिए मैं सोच रहा था कि क्या मुझ पर उनका ढारस ठीक है। रात के बारह बजे मैने उनसे कुछ तर्क करने की धृष्टता भी की थी। वह चुभन मुझे चुभ रही थी। मैं क्या करूँ? मैं क्या करूँ?
इतने में प्रेमचन्द जी बोले, जैनेन्द्र! बोलकर, चुप मुझे देखते रहे। मैने उनके हाथ को अपने दोनों हाथों से दबाया। उनको देखते हुए कहा, आप कुछ फिकर न कीजिए बाबूजी। आप अब अच्छे हुए और काम के लिए हम सब लोग हैं ही।
अब मुझे देखते, फिर बोले-आदर्श से काम नहीं चलेगा। मैने कहना चाहा...आदर्श, बोले-बहस न करो। कहकर करवट लेकर आँखें मींच लीं।
उस समय मेरे मन पर व्यथा का पत्थर ही मानो रख गया। अनेकों प्रकार की चिंता-दुश्चिंता उस समय प्रेमचन्द जी के प्राणों पर बोझ बनकर बैठी हुयी थी। मैं या कोई उसको उस समय किसी तरह नहीं बटा सकता था। चिंता का केन्द्र यही था कि 'हंस' कैसे चलेगा? नहीं चलेगा तो क्या होगा? 'हंस' के लिए तब भी जीने की चाह उनके मन मं थी और ' हंस' न जियेगा, यह कल्पना उन्हें असह्य थी, पर हिन्दी-संसार का अनुभव उन्हें आश्वस्त न करता। 'हंस' के लिए न जाने उस समय वह कितना झुककर गिरने को तैयार थे।
मुझे यह योग्य जान पड़ा कि कहूं ...' हंस' मरेगा नहीं, लेकिन वह बिना झुके भी क्यों न जिये? वह आपका अखबार है, तब वह बिना झुके ही जियेगा। लेकिन मैं कुछ भी न कह सका और कोई आश्वासन उस साहित्य-सम्राट को आश्वस्थ न कर सका।
थोड़ी देर में बोले -गरमी बहुत है, पंखा करो। मैं पंखा करने लगा। उन्हें नींद न आती थी, तकलीफ बेहद थी। पर कराहते न थे, चुपचाप आंख खोलकर पड़े थे।
दस पंद्रह मिनट बाद बोले-जैनेन्द्र, जाओ, सोओ।
क्या पता था अब घड़ियां गिनती की शेष हैं, मैं जा सोया। और सबेरा होते-होते ऐसी मूर्छा उन्हें आयी कि फिर उनसे जगना न हुआ।
हिंदी संसार उन्हें तब आश्वस्त कर सकता था, और तब नहीं तो अभी भी आश्वस्त कर सकता है। मुझे प्रतीत होता है, प्रेमचन्द जी का इतना ऋण है कि हिन्दी संसार सोचे, कैसे वह आश्वासन उस स्वर्गीय आत्मा तक पहुंचाया जाये।
बारह वर्ष पूर्व मैं पहली बार भारत आयी। तीन सप्ताह के उस छोटे झटपट दौरे ने मुझे देश के अनेक प्रमुख नगरों और स्थानों से परिचित करवाया था। लेकिन भारत के उत्तर पश्चिम छोर में बसे राजस्थान न मेरा सबसे अधिक मन लुभाया था। समय गुजरने के साथ राजस्थान की छवियां मेरे मष्तिष्क में उतनी ही तरोताजा बनी रहीं जैसी जब मैंने उन्हें पहली बार देखा था, उस कभी न अंत होने वाले मरुस्थल में बिखरे छोटे-छोटे गांव, विशाल मध्ययुगीन दुर्ग, हिन्दु मन्दिर, महाराजाओं के विलासमय प्रासाद और सदा की भांति शुष्क रगिस्तानी वातावरण के ठीक विपरीत चटख पीले, नारंगी और लाल रंग के परिधानों धारण किये राजस्थानी महिलाएँ।
मैन वापिस लौटने का स्वप्न संजोया था। और मेरा यह स्वप्न पूरा हुआ। यह मेरा उस क्षेत्र को पूरी तरह से खोजने का मौका था जिसके साथ मुझे अपनी पहली यात्रा के दौरान प्रेम हो गया था। मैने ऊँटों, दुर्गों और प्रासादों की अपेक्षा की थी और मुझे निराशा नहीं हुई। मुझे वे प्रचुर संख्या में मिले। लेकिन मैने शेखावाटी की अपेक्षा नहीं की थी जो राजस्थान के उत्तर पूर्व का एक क्षेत्र है जहां अपूर्व ढंग से चित्रित विशाल मकान हैं जिन्हें हवेलियां कहा जाता है। मैने "भव्य" शब्द को साधारण तौर पर नहीं प्रयुक्त किया है। शखावाटी को भारत के समृद्धतम कलात्मक और वास्तुशिल्पीय क्षेत्रों में एक कहा गया है।
मूलतः सैन्य तानाशाहों और बाद में राजपूत योद्धाओं द्वारा शाषित शेखावाटी इसलिए समृद्ध हुआ क्योंकि यह अरब सागर पर स्थित गुजरात को देश के भीतरी भागों से जोड़ने वाले कारवां मार्ग पर स्थित था। व्यापारियों ने इन कारवां मार्गों पर व्यापार केन्द्र स्थापित किये जो शीघ्र ही नगरों में बदल गये। जैसे जैसे वे धनवान हुए उन व्यापारियों ने अपनी संपदा हवलियों, मंदिरों, कुओ तथा व्यापारिक स्मृति स्थलों, जिन्हें छत्रियां कहा जाता था, पर लगा दी।
19वीं शताब्दी के आरंभ से मध्य काल तक ब्रिटिश शासन के कारण व्यापार बम्बई, कलकत्ता और मद्रास ( अब क्रमशः मुम्बई, कोलकता और चेन्नै) चला गया। चतुर शेखावाटी व्यापारी, जिन्हें मारवाड़ी कहा जाता था, अपने शेखावाटी गृह प्रदेशों को छोड़कर बड़े बन्दरगाह नगरों की ओर बढ़ चले। लेकिन कम से कम आगामी कुछ पीढ़ियों तक उनके परिवार पीछे रह गये जबकि धनाड्य व्यापारिओं ने अपने पूर्वजों के मकानों को चित्रों से अलंकृत करने में अपना धन लगा दिया। ये अलंकृत हवेलियां शेखावाटी की शान हैं।
ये हवेलियां जो अधिकांशतः 1800 और 1930 के मध्यकाल के दौरान निर्मित हुई थीं समस्त शेखावाटी में तब फली फूलीं जब व्यापारियों में विशालतम, सबसे अलंकृत हवेलियों के निर्माण के लिए होड़ लग गई। एक विशाल मुख्य प्रवेश द्वार जिससे एक छोटा प्रवेश द्वार निकलता है, भीतरी ड्योढ़ी में ले जाता है जिसे मरदाना कहते हैं और जहां आगंतुकों का बैठक में स्वागत किया जाता है। मरदाना वह स्थान है जहां घर के पुरुष अपना अधिकांश समय बिताते हैं।
मरदाना के बाद एक दीवार और छोटे गलियारे से अलग हुआ जनाना या भीतरी ड्योढ़ी होती है जहां पर घर की महिलाएँ रहती हैं। व्यापारी की धन-दौलत के अनुसार घर में अतिरिक्त ड्योढ़ियां भी हो सकती हैं। ड्योढ़ियों के चारो ओर बने कमरे आम तौर पर दो से तीन मंजिलों में होते हैं।
शेखावाटी हवेलियों में प्रचुर चित्रकारी की गयी होती है। भवनों के बाह्य भाग, ड्योढ़ियों की भीतरी दीवारें, कमरे, भीतरी छतें और महराबों पर भी चित्रकारी की गयी होती है। सतहों पर प्लास्टर लगाया जाता है और जब उसकी ऊपरी परत अभी गीली ही होती है उस पर रंग लगाया जाता है जिससे भित्ति चित्र बनते हैं। प्रयुक्त रंग चटख और शोख होते हैं। 19 वीं शताब्दी के अंत तक आते आते प्राकृतिक वनस्पति रंगों का स्थान धीरे धीरे कृतिम रंगों ने ले लिया था।
इन सतहों पर क्या चित्रित किया जाता था, लगभग हर कुछ-पुष्पीय और अरबी डिजाइन जिन पर मुगलों का प्रभाव पड़ा था, जिन्होंने अधिकांश उत्तर भारत पर लगभग 200 वर्षों (1526-1707) तक राज्य किया था, लोक कथाओं के दृश्य और हिन्दु पौराणिक प्रसंग या केवल साधारण चित्र। लेकिन इनमें वास्तव में अनूठे चित्र उन नयी खोजों के हैं जिनको ब्रिटिश लोग लेकर आये थे जैसे स्टीमशिप, ट्रेन, कारें, ग्रामोफोन और आरंभिक हवाई जहाज। इन्हें बड़ी संख्या में चित्रित किया गया है।
शेखावाटी के केन्द्रीय भाग में जो एक त्रिकोण के समान है और जिसके तीन सिरों पर जयपुर, दिल्ली व बीकानेर है -मांडवा है जो दिल्ली से 150 मील पश्चिम में एक व्यस्त भीड़ भाड़ वाला नगर है। मांडवा के केन्द्र में मांडवा किला है। 1755 में निर्मित यह एक सुदृढ़ किला है जिसमें एक प्रासाद होटल है जो इस नगर के संस्थापक नवल सिंह के वंशजों द्वारा चलाया जा रहा है। शेखावाटी के कुछ प्राचीनतम भित्ति चित्र-200 वर्षों से भी प्राचीन- इस दुर्ग के कक्ष की दीवारों को अलंकृत करते हैं।
मांडवा में दर्जनों चित्रित हवेलियां हैं। सीमित समय के लिए भी आए यात्री यहां कुछ उत्कृष्ट हवेलियां देख सकते हैं। यहां गोयनका हवेली (निर्मित 1890) है जिसके बाह्य भाग में हाथियों और घोड़ों के विशाल भित्ति चित्र हैं। गुलाब राय लाडिया( 1870) की हवेली के बाह्य भाग पर हाथी और ऊँट चित्रित हैं। नंदलाल मुरमुरिया ( 1935) की हवेली में भित्ति चित्रों का अजीबोगरीब संग्रह देखने को मिलता हैः घोड़े पर सवार नेहरू, इंगलैंड के सम्राट जार्ज पंचम और गंडोला के साथ वेनिस। बन्सीधर नेवटिया (1921) में घोड़ों और हाथियों के पारंपरिक भित्ति चित्रों के साथ फोन पर बात करता तरुण बालक, सुख सुविधाओं से सज्जित यात्रा वाहन और राइट ब्रदर्स का हवाई जहाज। मांडवा दुर्ग से पैदल यात्रा करके कई अन्य हवेलियों को देखा जा सकता है। यहां की सर्वाधिक जानी पहचानी हवेलियों को देखना अच्छा लगता है लेकिन इस छोटे से शहर के अनेक आनंदों में से एक है वैसे ही टहलना और अनायास छोटी मोटी खोजें करना। आप दोनों ही कर सकते हैं यदि आप कुछ दिन यहां ठहरें।
दक्षिण में पन्द्रह मील आगे नवलगढ़ है, शेखावाटी के सबसे महत्वपूर्ण चित्रित नगरों में से एक। ऐसा अनुमान है कि इस छोटे से नगर में 100 से अधिक चित्रित हवेलियां हैं। यदि आप कोई अन्य हवेली न देख पाये तो कम से कम आनंदीलाल पोद्दार हवेली ( 1920) देखिये जो एक भलीभांति संरक्षित हवेली है जिसकी बाहरी और भीतरी दीवारों पर सज्जित भित्ति चित्र शोख और सजीव हैं। पोद्दार परिवार मुंबई के एक धनाढ्य उद्योगपति हैं जो शेखावाटी और समस्त भारत में स्कूलों का निर्माण करवाने में सक्रिय हैं। कभी यह उनका घर हुआ करता था।
मांडवा और नवलगढ़ के बीच मुकुन्दगढ़ और डुंडलोड है जहां अनेक विशाल चित्रित हवेलियां हैं। डुंडलोड में 250 वर्ष पुराना किला है जिसमें मुगल और हिन्दु वास्तुशिल्पीय शैली का मेल देखने को मिलता है( अब एक होटल है)।
लगभग प्रत्येक शेखावाटी नगर में कम से कम एक चित्रित हवेली तो है ही लेकिन जिन नगरों में सर्वोत्तम अलंकृत हवेलियां देखने को मिलती हैं वे हैं फतेहपुर, झुंझनु और रायगढ़-सभी मांडवा के समीप हैं और हां नवलगढ़ व मांडवा भी इस सूची शामिल हैं।
हवलियों को देखने के लिये कुछ सुझावः
समय का पूरा पूरा उपभोग करने और जितनी अधिक संभव हो सकें उतनी हवेलियां देख पाने के लिए आपको एक गाइड कर लेना चाहिये जिससे आपउन हवेलियों को आसानी से ढूंढ सकें।
शेखावाटी भ्रमण तो मेरी भारत यात्रा का एक महत्वपूर्ण भाग था लेकिन दो सप्ताह के मेरे राजस्थान भ्रमण में और भी बहुत कुछ शामिल था। भारत के श्रेष्ठतम जैन मन्दिरों में गिने जाने वाले रणकपुर (जैनी पुनर्जन्म पर विश्वास करते हैं और शुद्ध शाकाहारी होते हैं): उदयपुर का भव्य सिटी पैलेस, जयपुर स्थित 300 वर्ष प्राचीन खगोलीय वैधशाला जन्तर-मंतर; विश्नोइयों के गांव जिसे हम रोहेत के राजकुमार सिद्धार्थ सिंह के साथ देखने गये थे; जैसलमेर और जोधपुर की गलियां जहां कारीगर और व्यापारीजन लगभग उसी प्रकार से अपने अपने व्यवसायों में व्यस्त हैं जैसा सैकड़ों वर्ष पूर्व हुआ करते थे।
इसके अलावा हमने अनेक भव्य किले भी देखेः बीकानेर का जूनागढ़, जैसलमेर, जोधपुर का मेहरानगढ़, जयपुर के उपनगरीय क्षेत्र में बना आमेर और मेरा पसंदीदा मध्ययुगीन उजाड़ पड़ा कुंभल गढ़ जो उदयपुर के उत्तर में पर्वतों में शान से खड़ा है।
राजस्थान से दिल्ली लौटते हुए हमने अपने पिछले भ्रमण के दो पसंदीदा स्थान देखे-16 वीं शताब्दी की अल्पकालीन मुगल राजधानी फतेहपुर सीकरी और भव्य ताजमहल।
इस उत्कृष्ट यात्रा को और भी अधिक यादगार बनाने के लिए हम जिन नौ होटलों में ठहरे थे उनमें से पांच पैलेस होटल थे। प्रत्येक होटल अद्भुत थाः मांडवा, बीकानेर के समीप गजनेर पैलेस, जोधपुर का उमेद भवन पैलेस, उदयपुर का शिव निवास पैलेस और जयपुर का राज विलास। इनमें प्रवास ने हमारी यात्रा के आनंद को और अधिक बढ़ा दिया। हम स्वयं को कम से कम कुछ दिनों तक तो महाराजा समझ सके थे।
गणेश एक छोटा-सा बच्चा है। अपने माँ पिताजी से भगवान के बारे में बहुत कुछ बार-बार सुन चुका है। इसलिए उसे एक दिन भगवान जी से मिलने की इच्छा हुई। उसने सुना था कि भगवान जी को मिलने उसे बहुत दूर तक जाना होगा। क्योंकि उसका घर तो बहुत दूर है। वहाँ पहुँचने तक उसे भूख लगेगी, प्यास लगेगी। उसने माँ ने बना कर रखी घी-शक्कर लगी रोटियाँ साथ में रख लीं और मीठी लस्सी भी लेना न भूला। पानी की बोतल के साथ सभी चीज़ें रख कर बॅग तैयार कर ली और निकल पड़ा भगवान जी से मिलने।
आधा घंटा चलता चला गया, उसे प्यास लगी। सामने ही एक हरा-भरा बगीचा था। छाया में थोड़ी देर आराम करने का सोच कर उसके कदम बगीचे की तरफ़ बढ़े। वहाँ एक बूढ़ी औरत बैठी थी। बेचारी अकेली थी, अकेली, दाना चुगते कबूतरों को देखती हुई। गणेश उसके पास जा कर बैठ गया। अपनी बॅग खोली। पानी पीने लगा तभी उसे ऐसे लगा कि वह बूढ़ी औरत भूखी है और उसकी तरफ़ आशाभरी निगाहों से देख रही है। गणेश ने उसे एक रोटी दी। खुश हो कर उसने वह रोटी ली और दिल से हँसी। उसकी हँसी गणेश को इतनी पसंद आई कि वह ऐसी एक बार और हँसे, वह आनंदित हो जाए इसलिए उसने बुढ़ी औरत को मीठी लस्सी भी पीने को दी। वह दुबारा उसी तरह मुस्कुराई। गणेश भी मुस्कुराया। दोपहर का पूरा समय इस तरह कुछ खाने में और दिलखुलास मनभावन हँसी में गणेश और उस बूढ़ी औरत ने बिताया, एक शब्द ही कहे-बोले बिना।
शाम हो गई, सूरज डूबने लगा वैसे गणेश को घर की याद आने लगी और वो वापस लौट चला। दो कदम ही बढ़ाए थे उसने, पीछे मुड़कर देखा, बूढ़ी औरत की तरफ़ भागा, और उससे लिपट गया। एक बार फिर बूढ़ी औरत हँसी। सबसे सुंदर हँसी थी वह उसकी, प्यार भरी, ममता भरी। गणेश घर लौटा, उल्हासभरा, कुछ पाने की खुशी में। उसकी माँ ने पूछा, "कितने खुश नज़र आ रहे हो गणेश! लगता है भगवान से मिल कर आ रहे हो ?" कहने लगा, "माँ, आज मैंने भगवान जी के साथ खाना खाया।" माँ को कुछ कहने ही नहीं दिया उसने, कहने लगा, "तुम्हें पता है, भगवान जी की हँसी दुनिया में सबसे अच्छी थी।"
उसी दरम्यान वह बूढ़ी औरत भी अपने घर पहुँची। उसके चेहरे पर अजीब तरह का तेज देखकर उसका बेटा पूछने लगा, "आज किस बात से इतनी खुश हो माँ?" "मैंने आज बगीचे में भगवान ने दी हुई रोटी खाई। मैं धन्य हो गई। और एक बात बताऊँ, जैसा मैंने सोचा था, जो मेरी भगवान जी के बारे में अपेक्षा थी उससे वह बहुत ही छोटा है।" हलका-सा स्पर्श, सादगी भरा हास्य, ममतापूर्ण एक शब्द, सुननेवाले कान, प्रामाणिक प्रतिक्रिया या कोई छोटी-सी ही मदद, इसका महत्व हम इस भाग-दौड़ वाली दुनिया में भूल से जाते हैं। सही मायने में देखा जाय ते उसमें जग बदलने की ताकत समाई हुई मिलेगी। इसलिए हमारी ज़िंदगी में किसी बहाने से आनेवाले, कभी-कभार आनेवाले या ज़िंदगीभर के लिए आनेवाले लोगों का मन से स्वीकार करना चाहिए, उन्हें अपना बना लेना चाहिए।
तोता-तोता
तोता, तोता, बोली मैना
सच्ची सच्ची ही कहना
रहता कहां तुम्हारा ध्यान
दोहराओ तो अब यह गान
चार और चार होते हैं आठ
थकी पढ़ाती तुमको मैं पाठ
फुदक-फुदक बस उड़ते-फिरते
रह- रहके मिर्ची क्यों कुतरते।
-शैल अग्रवाल
खरगोश
दरवाज़े में ताला खरगोश गया शाला ज़ोर ज़ोर नगाड़ा खरगोश पढ़े पहाड़ा दो एकम दो दो दुनी चार बड़ी ज़ोर से गुज़री कार दो तिया छे दो चौके आठ पूरा कर लो अपना पाठ जल्दी जल्दी पढ़ी कहानी एक था राजा एक थी रानी गुरूजी हँस बोले शाब्बाश खरगोश बोला कर दो पास