बसंत पंचमी के आते-आते ही मौसम में एक मादकता सी छा जाती है। बौराए आमों के साथ मानव पशु-पक्षी, पूरी पृथ्वी ही मानो बौरा-सी जाती है। हरियाली धरती पीली सरसों की चूनर ओढ़े नई-नवेली दुल्हन सी खिलने और फलने लगती है और खुले नीले आकाश से झरझर झरती सुहानी गुलाबी धूप मानो पृथ्वी के सारे रंगों को अपनी सुहानी आभा से कुछ और ही निखार देती है। कुहकती कोयल, दादुर, मोर ...सभी का मन एक नए आल्हाद से झूमने लगता है और हवाओं तक में शुरु हो जाता है एक अनूठा संगीत...एक गुनगुनी छेड़छाड़। फिर तो किसी को याद दिलाने की जरूरत नहीं... पूरी प्रकृति ही शोर मचा देती है, ' जागो! फाग-फगवाड़ा आ गया। मिलन का प्रियतम के साथ छेड़छाड़ का मौसम आ गया। एक दूसरे के रंग में भीगने और भिगोने का मौसम आ गया।'
वर्ष भर प्रकृति मंच तैयार करती है तब कहीं जाकर वसंत ऋतु अपने इस मोहक और अनूठे अंदाज में आ पाती है। प्रकृति और पुरुष, दोनों ही को पूरी तरह से लुभाती- रिझाती। ठंडी सिहरती हवा और गुलाबी गुनगुनी धूप। खेतों पर दूर तक फैली पीली सरसों की चादर और खिले-अधखिले रंग-बिरंगे फूलों से लंदी फंदी डालियां और.क्यारियां, वह भी साफ-सुथरे, चमकते नीले आकाश के नीचे...पूरी ही पृथ्वी एक आकर्षक तस्बीर सी सज उठती है...कुशल नृत्यांगना सी थिरकती और लरजती।...नाजुक कोपलें मन्द-मन्द हवा पर झूमती, मानो अपने ही रूप-रंग पर शरमा-शरमाकर इतरा रही हों। सिहरती पत्तियां और चटकती कलियां... सुर और लय के साथ ताल में थिरकती। धरती जाने कैसे दिव्य घुँघरू बांध चुकी होती है कि दादुर मोर पपीहे सभी वाहवाह कर उठते हैं। नन्हे नवजात पक्षियों का कलरव, एक नया उत्साह, नया संगीत देता हुआ सुरभित हवाओं में गूंजने लग जाता है। ताजा हवा के ये झोंके जब खुशबूओं के मस्त कलीन पर सवार हो कर बगल से गुजरते हैं तो उदास से उदास मन पंक्षियों की तरह खुले आकाश में विचरने लग जाता है, लाचार और कमजोर पंख तक अपनी ताकत तौलने लग जाते हैं। शायद इसीलिए तो बसंत ऋतु को ऋतुराज कहा जाता है...सृजन और उल्लास की ऋतु माना जाता है। महकती-लहकती इस ऋतु को प्राचीन काल से ही भारत में एक उत्सव नहीं, महोत्सव की तरह मनाया जाता है। गीत-संगीत और भरपूर राग-रंग के साथ। भारत ही नहीं विश्व के कई विभिन्न भागों में भी थोड़े बहुत फर्क के साथ इस ऋतु का उत्सव मनाया जाता है। बड़ी सख्या में एकत्रित होकर लोग एक दूसरे को रंगों और खुशबुओं में भिंगोते-डुबोते हैं और आनन्द मनाते हैं। फ्रान्स, इटली आदि के साथ यूरोप और दक्षिणी अमेरिका के कुछ देशों में 'मार्डीग्रास' नामका एक उत्सव मनाया जाता है, जिसमें युवक, युवती कई-कई टन टमाटरों से एक दूसरे को रंग देते हैं और हंसी खुशी के माहौल में तरह तरह की झांकियों और नाच-गाने के साथ कार्निवाल के रूप में पूरा दिन गुजार दिया जाता हैं।
हमारे प्राचीन ग्रन्थों में भी कई-कई नाम मिलते हैं इस पर्व के; होलाका, फागुनोत्सव, चैत्रोत्सव, फागु मधुत्सव, कामोत्सव, मदनोत्सव, काममहोत्सव, सिरापंचमी, यात्रामहोत्सव, मदनद्वादशी, मदनत्रयोदशी, अनंगोत्सव आदि। यदि हम इन नामों पर गौर करें तो पता चल जाएगा कि इस उत्सव की रूपरेखा क्या थी और भारत के विभिन्न भागों में आज भी है।
माघ की शुक्ल पंचमी (वसंत पंचमी) से आरंभ यह उत्सव अब भी कई-कई जगह होली तक मनाया जाता है। उत्तर भारत में आजभी बसंत पंचमी के दिन से ही होली आरंभ हो जाती है। सुबह सरस्वती पूजन और शाम को गुलाल उड़ाकर इसी दिन से होली की शुरुआत आज भी कई जगह एक प्रचलित प्रथा है और वह भी रात को मिलबैठकर होली और धमार गाते हुए लोगबाग एकदूसरे को गुलाल लगाते हैं। होली का नाम लेते ही ब्रज की होली सबसे पहले ध्यान में आती है जो भारत में ही नहीं पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यूँ तो राजस्थान में हाथियों की पीठपर बैठकर खेली गयी होली भी प्रसिद्ध हो चुकी है और बड़ी संख्या में विदेशी सैलानी इसे देखने और हिस्सा लेने आते हैं। परन्तु ब्रज ,जो 'कान्हा बरसाने में आई जइयो बुलाए गई राधा प्यारी’ ‘फाग खेलन आए हैं नटवर नंद किशोर’ और ‘उड़त गुलाल लाल भए बदरा’ जैसे गीतों की मस्ती से झूम उठता है, वहाँ आज भी यही कहा जाता है कि- सब जग होरी, जा बृज होरा।
ब्रज की लठ्ठमार होली ही नहीं, कोमल फूलों से राधाकृष्ण का नयनाभिराम श्रंगार भी दर्शनीय है जिससे ब्रज के हर मन्दिर का कोना-कोना सज और महक उठता है। मन्दिरों में एक से एक सुन्दर फूलों के श्रंगार होते हैं और होली के गीत-संगीत के साथसाथ कई जगहों पर फूल डोल के मेले भी लगाए जाते हैं। यहाँ आज भी रंगों के साथ साथ मुख्यतः फूलों से ही होली खेलने का रिवाज है, जिसमें टेसू और गुलाब के साथसाथ, केतकी, चम्पा, बेला और चमेली का प्रयोग अधिक किया जाता है। फूल...जिनकी महक मन को और रंग त्वचा को निखारने और कोमल करने में मदद करते हैं। इस दौरान ब्रज में होली और रसिया जैसे मीठी छेड़छाड़ वाले गानों की ही नहीं, धुलंडी से लेकर कृष्ण दशमी तक जगह जगह चरकुला नृत्य, ङुक्का नृत्य, बेब नृत्य, तख्त नृत्य, चोचर नृत्य एवं झूला आदि मनोहारी नृत्य भी देखे जा सकते हैं।... ब्रज की बरसाने और दाऊ जी की होली देखने आजभी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं और मन्दिर के परिसर के कोने कोने से गूंजती आवाज में उनकी भी मस्ती में डूबी आवाज गूंजने लग जाती हैं ---' आज बिरज में होरी है रसिया/ होरी है रसिया, बरजोरी है रसिया।'
कई प्रमुख भारतीय त्योहारों की तरह भाईचारा और आपसी सद्भावना को जिन्दा रखने का एक प्रयास होली भी है। होलिका का अपने भतीजे प्रहलाद को लेकर आग में बैठना और फिर चमात्कारिक रूप से उसका खुद का जल कर मर जाना यद्यपि इसका प्रीरंभिक बिन्दु है लेकिन उसके बाद यह त्योहार कालचक्र के साथ विभिन्न प्रान्तों और शहरों में अपने-अपने ढंग से मनाया जाने लगा जिसमें उस स्थान विशेष की कुछ परम्परायें, घटनाएं जुड़ती चली गयीं। ऐसा ही एक शहर है कानपुर। गंगा किनारे स्थित उत्तर भारत के इस औद्योगिक नगर की होली यहां के लोगों की मस्ती, जिन्दादिली और जुनून की हद तक जाकर किसी भी त्योहार को मनाना दर्शाती है।
प्राचीन किवदन्ती के अनुसार यहां के गांव के जमींदार के घर पर होली के पन्द्रह दिन पहले गांव वाले इकट्ठा होते थे और ढोल मंजीरा आदि लेकर होली का आगमन गीत फाग गाते थे और जिस दिन होली जलने वाली होती थी उस दिन फाग गाने वालों का जुलूस जमींदार के घर से उठकर उस स्थल पर जाता जहां होली जलाने के लिए बसंत पंचमी के दिन से ही लकड़ियां इकट्ठी करके रखी रहती थीं।
जुलूस के पहुंचने तक पुरोहित पूजा की तैयारी कर चुके होते हैं और फिर लोग पूजा के बाद आग जलाकर उसमें गन्ना और गेहूं की बालियां जलाते थे। ऐसा करके वो ईश्वर से प्रार्थना करते थे कि वो होली जलाकर होलिका रूपी बुराई का नाश कर रहे हैं, अतः ईश्वर इस बार फसल की कटाई के बाद उन्हें हर तरह से समृद्ध करे। दूसरी ओर घर की महिलाएं, किशोरियां तथा युवतियां रात को देर तक जागकर गुझिया और भिन्न भिन्न पकवान का आयोजन करती थीं। अगले दिन एक-दूसरे के ऊपर रंग डाला जाता था।
उन्ही दिनों यह भी सोचा गया कि कोई ऐसी व्यवस्था की जाए कि होली के बाद सभी लोग एक जगह एकत्र हों और तमाम आपसी कटुता आदि को भुलाकर एक-दूसरे से गले मिलें तथा अपने रिश्तों को एक मजबूत शुरुआत दें, इसके लिए होली के पांच-छह दिन पड़ने वाले अनुराधा नक्षत्र का ही चयन किया गया। चूँकि शास्त्रों में यह नक्षत्र मानव जीवन के लिए कल्याणकारी माना गया है इसलिए गांव के प्रतिष्ठित और साधारण बड़े बुजुर्गों ने फैसला किया कि इस एक दिन मेले का आयोजन किया जाए जिसमें लोग होली मिलन के साथ-साथ खरीददारी भी कर सकें। इसलिए शहर के सरसैया घाट नामक तट को चुना गया।
तत्कालीन ब्रिटिश प्रसाशन को होली के हफ्ते भर बाद फिर से दिन भर रंग खेलना और भीड़ जुटाकर मले का आनन्द लेना उचित नहीं लगा इसलिए आदश दिया गया कि होली के दूसरे दिन ही मेले का आयोजन कर लिया जाये लेकिन बात तो अनुराधा नक्षत्र में मेले के आयोजन की थी और इसके पीछे यहां के लोगों की आस्था भी जुड़ी हुई थी। फलतः ऐसी ही एक होली में जब स्वयं शासन द्वारा ठीक एक दिन बाद मेले का आयोजन किया गया तो लोगों ने सामूहिक रूप से इस मेले का बहिष्कार कर दिया, कोई भी वहाँ नहीं पहुँचा और इसके बाद अनुराधा नक्षत्र वाले दिन जमकर रंग खेलने के बाद लोग नहा धोकर नये नये कपड़ों में सजधज कर घरों से निकलने लगे और देखते ही देखते सरसैया घाट पर जनसैलाब उमड़ पड़ा, जिसे काफी कोशिशों के बावजूद ब्रिटिश प्रशासन रोकने में सफल नहीं हो सका। तब से आजतक होली के बाद अनुराधा नक्षत्र वाले दिन इस मेले की परम्परा चली आ रही है। लोग चूंकि उस दिन नहा धोकर बिल्कुल नये और उजले कपड़ों में मेले का आनंद लेते थे इसलिए इसे उजरा मेला भी कहा जाता रहा है। इस मेले की नींव हटिया (नगर का प्रमुख बर्तन बाजार) के व्यापारियों द्वारा रखी गयी थी।
सबसे खास बात यह है कि इन व्यापारियों के अधीन काम करने वाले कर्मचारी और श्रमिक जो होली से मेला तक अपने गांव फसल की कटाई के लिए जाते थे उन्हें उस पूरे सप्ताह की तनख्वाह कानपुर के व्यापारियों द्वारा दी जाने की एक सुखद परंपरा थी। कानपुर नगर का लगभग डेढ़ सौ वर्षों का इतिहास है और यह परंपरा भी तभी से लागू है। हटिया नामक इस स्थान से कोई कोरा बचकर नहीं जा सकता है। हौज में रंग खोलकर रखा जाता है, जो भी कोरा दिखा उसे पकड़कर एक बार गर्दन तक डुबोकर निकाल दिया जाता है। इसके बाद वह व्यक्ति कहीं भी जाने को स्वतंत्र है।
कानपुर जिले के अंतर्गत लगने वाले एक क्षेत्र विशेष का नाम है अहिरवाँ। यहां होली के बाद पँचमी के दिन होली मनायी जाती है, यानी एक ही जिले में दो भिन्न-भिन्न दिनों में यह त्योहार मनाया जाता है इससे अनोखी मिसाल और क्या हो सकती है। इसकी वजह है इस गाँव के जमीदार को ब्रटिश प्रशासन की किसी बात का विरोध करने पर होली के दिन ही गिरफ्तार कर दिया गया था और पंचमी वाले दिन छोड़ा गया था। इस घटना से क्षुब्ध गाँव वालों ने ठीक त्योहार के दिन होली न मनाकर पंचमी वाले दिन ही मनाने का निर्णय लिया। तब से अहिरवाँ नामक इस स्थान पर इसी परंपरा का पालन किया जा रहा है।
लेकिन धीरे-धीरेनगर की होली को कुछ शरारती और असामाजिक तत्वों ने विकृत करने की कोशिश की है। खतरनाक से खतरनाक पेंट किसी के भी चेहरे पर लगा देना, कीचड़ और मशीन की कालिख से होली खेलना जैसी घटनाएं नगर के समृद्ध होली के इतिहास को कलंकित तो करती ही हैं साथ ही गुण्डा किस्म के लोगों ने इसी आपसी वैमनस्य का प्रतिशोध लेने का भी उचित अवसर मान रखा है।
इस मौके पर होने वाली हिंसक घटनाओं के चलते पिछले कुछ वर्षों से प्रशासन को सख्त कदम उठाने पड़े हैं। अब वो पुरानों दिनों जैसी होली तो नहीं है, फिर भी लोग तमाम बन्धनों के बीच भी अच्छी से अच्छी तरह त्योहार मनाने की कोशिश करते हैं। हालांकि किसी भी त्योहार में हर एक की भावना होनी चाहिए कि हर दूसरा आदमी भी अच्छी तरह त्योहार का आनन्द लूटे तब शायद पुलिस या प्रशासन की आवश्यकता नहीं रह जाती है।
बरसानेलाल ने जब से सुनी है कि ब्रिटेन और फ्रांस क्या अमेरिका की पार्लियामेंट तक में दिवाली मनाई गईं है, उनके मन में खलबली मच गई है। सर पर भूत सवार है कि इस बार तो विदेश जा कर ही होली मनाएँगे, वह भी ऐसी कि दुनिया देखती रह जाए - याद रखे उन्हें और उनके भारत दोनों को ही - भारतीय सभ्यता के साथ-साथ उनके यहां के इस रंग-बिरंगे त्योहार को भी। बरसों तक ना भूले कि बस भाषण देना ही नहीं, हम भारतीयों को हँसना-हँसाना...मस्ती करना भी आता है।
बाहर मोहल्ले के हुड़दंगिए टीन कनस्तर पीट-पीटकर होली के लिए चंदा माँग रहे थे। घर का लक्कड़-कबाड़ - टूटी कुरसी, फटा सोफा - पुराना और बेकार, सब दे दो। 'क्यों जी, टूटी यह मेज़ दे दूँ क्या इन्हें इस बार?' पत्नी बारबार पूछे जा रही थी। 'हाँ, हाँ, क्यों नहीं। और खुद को भी।' मन ही मन वे बुदबुदाये। 'जी क्या कहा?' इसके पहले कि पत्नी कुछ समझ पाए उन्होंने बात पलट दी, 'यह जो सामने दूरदर्शन पर मुँह में बिना दाँत और पेट में बिना आँत के मंत्री जी हाल ही में की अपनी विदेश यात्रा का वृतांत सुनाए जा रहे हैं, उन्ही की बात कर रहा था, मैं। सोचता हूँ, उन्हें कोई क्यों नहीं दे देता इन लड़कों को!'
पत्नी हंसकर 'आप भी तो ...' कहती, प्रसन्न मुद्रा में चौके में वापस चली गईं और बरसाने लाल ने अपनी सोच पर लगाम लगा ली - 'छी: छी:, ऐसा अभद्र तो मज़ाक भी शोभा नहीं देता। अबलाओं की रक्षा और बड़ों का आदर किया जाता है। पर अब यह रक्षा या आदर का तो नहीं, भारत की प्रतिष्ठा का सवाल था और विश्व के आगे भारत की सद्भावना की ज़िम्मेदारी थी बाँके बिहारी पर। नहीं, वो द्वापर का बाँके बिहारी नहीं, जो राधा के संग होली खेलने बरसाने जाता था और जिसे ब्रिजवासी आज भी गा-गाकर बुलाते नहीं थकते - 'कान्हा बरसाने में आ जइयो, बुलाय गई राधा प्यारी।' वह तो बात कर रहे थे अपने मित्र बाँकेबिहारी यादव की। बचपन से ही चोली दामन का साथ जो ठहरा दोनों का... और यहीं पड़ौस में, उन्हीं के गाँव में ही तो रहता है वह। वही, जिसके यहाँ पाँच सौ से भी ज़्यादा गाय भैसों का तबेला है और जिसकी माता जी की सूझबूझ से छाछ ही नहीं, गोबर की खाद भी अब तो पूरे गाँव को मुफ़्त ही मिलती है। आजके ज़माने में भाईचारे की ऐसी अनूठी मिसाल और कहाँ देखने को मिलेगी, भला? माताजी का आशीर्वाद और मित्र मंडली का सहयोग ही तो है कि आज न सिर्फ़ बाँकेबिहारी देश का सांस्कृतिक मंत्री बना बैठा हैं, वरन खाद और समन्वय विभाग भी उसी के पास है। हाँ यह बात दूसरी है कि जबसे संस्कृत और समन्वय के साथ पर्यटन विभाग भी आ मिला है, रोज़ ही एक नई योजना लेकर मित्र-मंडली घेरे रहती है और सौभाग्यवश विदेश-भ्रमण के नए-नए संयोग भी जुटते ही रहते हैं। आख़िर दोस्त के काम न आए, तो वो भी भला किस काम का दोस्त?
तुरंत ही मित्र की अनुमति से एक नयी 'विश्व मैत्री संघ' नामकी संस्था बना डाली गईं। आनन-फानन ही सदस्यों की सूची व योजना और कार्य-प्रणाली का खाका भी तैयार हो गया- शर्त, नियम और कानून सबके साथ मुकम्मल। अब होली से बढ़िया और कौन-सा त्योहार हो सकता हैं मित्रता और सद्भावना के लिए जिसमें न सिर्फ़ सारी ग़लतियों और विषमताओं को भूलकर दुश्मन के गले मिला जा सकता हैं अपितु विषमताओं और ग़लतियों का बदला भी लिया जा सकता है? मुँह काला पीला कर दो, गधे पर बिठाकर घुमा दो, बैंड बजवा दो, कोई बुरा नहीं मानता। मान ही नहीं सकता। आख़िर होली जो ठहरी। फिर हो--ली सो होली, बिल्कुल अपनी भारतीय परंपरा क्या, मानवीय और विश्व परंपरा की तरह ही- एक हाथ से थप्पड़ मारो और दूसरों से तुरंत ही गाल सहला दो – सौरी कह दो।-सब ठीक, पल भर में ही।
खुद बाँकेबिहारी की बैठकी में सब-कमेटी बनी और तुरंत ही समस्त कार्यभार सक्षम पी. ए. मथुरा प्रसाद जी के सूझ-बूझ भरे कंधों पर डाल दिया गया। वैसे भी बाँकेबिहारी जी अंगूठा लगाने से ज़्यादा कोई सरदर्द नहीं ही लेते थे। मथुरा प्रसाद ने भी बिना वक्त ख़राब किए तुरंत ही ना सिर्फ़ पूरी मित्र-मंडली, काशी प्रसाद, बिहारी लाल, अवध बिहारी, गया प्रसाद और ब्रिजरमण सभी को बुला लिया, बल्कि यह भी बता दिया कि अगली होली इंग्लैंड में ही मनानी है उन्हें, कैसे और कहाँ यह अभी मिल-जुलकर सोचना होगा। ब्रज की लठ्ठमार होली होगी या फिर कानपुर और लखनऊ की वार्निश पेंट-वाली...कनस्तर पीटकर होली का हुड़दंग होगा या सांस्कृतिक मेल-मिलाप कार्यक्रम ...ऐसी अन्य छोटी-मोटी बातें भी तय होनी बाकी थीं । हां, यह जरूर निश्चित था कि बाहर जाकर मौज-मस्ती में कोई कसर नहीं रहेगी। अगर इस मनमोहन सरकार के नीचे, सोनिए के राज में भी यह न कर पाए तो कभी भी न कर पाएंगे वे ...कड़क चासनी में लपेटकर बात प्रस्तावित की गयी थी । फटाफट सभी अधिवेशन की तैयारी में जुट गए।
निश्चय किया गया कि होली भी ब्रिटिश पार्लियामेंट में ही होनी चाहिए...आखिर अब भारत और भारतीयों की इतनी साख तो है ही वहाँ पर। काशी प्रसाद जी ने प्रस्ताव रखा कि हमारी काशी में तो धुलहटी के साथ-साथ होली की शाम को एक मूर्खाधिवेशन का भी रिवाज़ है। जिसमें सारे नामी-गिरामी मूर्ख इकठ्ठे किए जाते हैं और उन्हें अनूठे-अनूठे नाम और सम्मान दिए जाते रहे हैं - जैसे कि घर फूँक तमाशा देख, मान न मान मैं तेरा मेहमान, बछिया का ताऊ, धूमकेतु आदि-आदि। सभापति के लिए सर्व सम्मति से बुश का नाम पास हो गया और महारानी एलिजाबेथ और ड्यूक सहित, ब्लेयर, सद्दाम व अपनी सोनिया...वगैरह के नाम तुरंत ही तीस-चालीस निमंत्रण पत्रों पर लिख भी डाले गए। ऊपर सत्यमेव जयते के साथ यह भी छापा गया कि बुरा ना मानो होली है। बाकी सब मेहमान तो आने को राज़ी हो गए परंतु चीन और पाकिस्तान ने आने में यह कहकर असमर्थता ज़ाहिर कर दी कि वे तो यह वाला अधिवेशन हर महीने ही करते हैं अपने यहां और इसी व्यस्तता के रहते आने में असमर्थ हैं।
बिहारी लाल का सुझाव आया कि इसबार ठंडाई में भांग, गुलाबजल, बादाम और सौंफ के संग थोड़ा भारतीय चारा भी ज़रूर ही घुटना चाहिए क्योंकि आजकल विदेशी मालों की भरमार होने के कारण भारत में भी देशी चारे की खपत बिल्कुल ही ख़तम हो गई है। गाय भैंस तक को अब बस विदेशी चारा ही चाहिए और यह माल खपाने का बढ़िया मौका है। सुना है समिति अभी भी इस प्रस्ताव पर विचार कर रही है। अवध बिहारी और गया प्रसाद ने हास्य कवि सम्मेलन का ज़िम्मा ले लिया और सुनाने के लिए नए-नए होली के गीत और रसिया रचे जाने लगे। जैसे कि होली खेलें अवध में रघुबीरा की अगली लाइन लिखी गई - 'अल्लाह के हाथ कनक पिचकारी, जीसस के हाथ अबीरा' क्योंकि उन्हें इस होली की ठिठोली में बेमतलब की और बेसुरी बाबरी और दरबारी नहीं चाहिए थी।बरसाने लाल ने होली के स्वांग के लिए लखनऊ से कुछ पुलिस अधिकारी और मंत्रियों को भी बुलवा लिया क्योंकि सुनते हैं वहाँ पर आजकल चारोतरफ मुलायम ककड़ियों और भिंडियों की माया फैली हुई है।
इस तरह से सभी इस आयोजन से खुश थे, ख़ास करके अब जब कि खुद बिल क्लिंटन ने होली के उस स्वांग में ना सिर्फ़ कृष्ण कन्हैया बनना स्वीकार कर लिया था वरन सभी गोपिकाओं को लाने की ज़िम्मेदारी भी खुद ही अपने ऊपर ही ले ली थी। अब जब होली की यह टीम समन्वित हो गई और पूरे ताम-झाम के साथ लंदन जा पहुँची, (अबीर गुलाल रंग, पिचकारी, कविता, चुटकुले सभी कुछ तो था उनके पास) तो ऐन वक्त पर कमबख़्त कस्टम ऑफ़िसर ने ही रोड़ा डाल दिया। पिछले चार घंटों से हीथ्रो के हवाई अड्डे पर ही ता-ता थैया करवाने लगा वह तो उनसे। मथुरा प्रसाद बार-बार कह रहे थे कि हम पी. ए. हैं और वह कह रहा था कि अगर आप पीए हैं तो हम आपको पार्लियामेंट में तो हरगिज़ ही नहीं जाने दे सकते क्योंकि वहाँ पर ईराक के बाद ईरान के पास रासायनिक हथियार हैं या नहीं के साथ-साथ अगले सत्र में महिला विधायकों की स्कर्ट की लंबाई जाँघ तक हो या एड़ियों तक या फिर उनकी लिपिस्टिक का रंग गर्मियों में हो रहे जी सेवेन के अधिवेशन में गुलाबी रखा जाए या नारंगी जैसे कई मुख्य और गंभीर मुद्दों पर बहस चल रही हैं।
उस चुस्त-दुरुस्त ऑफ़िसर के आगे विपदा के मारे मथुरा प्रसाद जब गिड़गिड़ाते-गिड़गिड़ाते थक गए तो झल्लाकर बृजभाषा में ही रोने लगे, "अरे भइया, मैं तो बस पी.ए. हूँ मेरे पीछे चौं पड़ गए हो - कछू दुस्मनी तौ नायै हमते - हाँ मोए तौ जेई मामलौ दीखै अब, वरना का ज़रूरत थी यौं परेशान करने की, कोई पहली बार तो विलायत आए ना ऐँ हम ?" "इतना पीकर एयरपोर्ट पर तमाशा करोगे तो क्या मैं तुम्हें छोड़ दूँगा?" ऑफ़िसर लाल आँखों से तर्राया। "बो पीए नायैं, हम तौ बस पी. ए. हैं यानी की मंत्री जी के प्राईबेट असिस्टैंट। जे देख लल्ला, सातौ ब्लैक हौर्स अभी खोली भी नाएं हमनै तौ। वैसै थोरी-भौत अंगरेज़ी तौ पढ़ी ही होगी तैने भी?" ''क्या मंत्री जी सात काले घोड़े भी लाए हैं।'' टी टोटलर अवध बिहारी जोश में आ गए। "ना बे गधे तेरे लिए शेरबानी और सेहरा भी। बारात जो सजानी है हमें तेरी यहां पर। पाँच मिनट कू चुप ना रह सकौ का तुम सब।" बरसाने लाल को विश्वास नहीं हो रहा था कैसे-कैसे अकल के मद्दों से यारी निभ रही है उनकी। "अच्छा तो अब मंत्री जी के पी. ए. बन गए तुम।" गुस्से से भी ज़्यादा हँसी आ रही थी लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट पर खड़े कड़क सरदार को अब तो।
ज़रा भी डरे या विचलित हुए बगैर, बेख़बर पांडे जी अभी भी हाथ ऊपर उठाए वैसे ही गोल-गोल घूमे जा रहे थे, और भांग के नशे में ज़ोर-ज़ोर से गा रहे थे, "कान्हा ने कीन्हीं बरज़ोरी रे, होरी पर/भीज गई मोरी सारी चेली रे, होरी पर।" बीच-बीच मैं खुद ही 'जय राधे' की टेक लगाकर एकाध ठुमका भी ले लेते थे। आज भी राधेरानी पर ही तो पूरा ध्यान था उनका! होठों पर लाली, कान में बारी, माथे पर बिंदिया, और सर पर लाल चुन्नी, कौन कह सकता था कि वह भी कभी ऐसे ही एक कड़क ऑफ़िसर थे पुलिस में। आता-जाता हर यात्री कौतूहलवश रुक जाता, बिना टिकट के पूरा लबालब मनोरंजन जो हो रहा था सबका। काशी प्रसाद, अयोध्या दास और बरसाने लाल सभी आँख बंद किए माथे पर हाथ रखे चुपचाप एक कोने में जा बैठे। साँस रोके प्रतीक्षा करने लगे मित्र मंत्री जी का और मन ही मन कोसने लगे खुद को कि क्या ज़रूरत थी वे भांग के लड्डू खाने की, पर यह काशी प्रसाद भी तो नहीं मानता बात ही ऐसी कह देता है। अब भला बाबा भोलेनाथ के प्रसाद को कैसे मना कर पाते वे। वह भी शिवरात्रि का प्रसाद? वैसे भी फगवाड़ा तो शुरु ही हो चुका है। ऑफ़िसरों को भी तो समझना चाहिए इस बात को। कुरसी के नशे में धुत रहते हैं सब-के-सब। होली पर ऐसी छोटी-मोटी ठिठोली तो होती ही रहती है। पर अब तो बस इंतज़ार ही करना होगा उन्हें बाँकेबिहारी जी का और कोई चारा भी तो नहीं उनके पास। वही ढिबरी टाइट करेगा इनकी। चारे की याद आते ही याद आया कि बिहारी लाल सही ही कर रहा था, अगर चारा मिला देते तो एक-आध लड्डू इस ऑफ़िसर के लिए भी बच ही जाता और फिर क्या पता यह भी बरसने की बजाय पांडे जी की तरह ही, नाच ही रहा होता उनके साथ?
"अरे भाई पर हम भी तो होली जैसा गंभीर त्यौहार मनाने सात समंदर पार तुम्हारे देश, यहां आए हैं।" मथुरा प्रसाद जी ने इस बार हाथ जोड़कर दाँत निपोरे। "ओह तो सिर्फ़ पीए ही नहीं, 'होली' भी हो आप। कौन से सेक्ट को बिलांग करते हो? परेशान कर रखा है इन होली मेन और उनके सर्मनों ने हमें तो। अबू सलेम के बाद हमारी सरकार की यही पौलिसी है कि हर होली मैन को चौबीस घंटे के ऑबज़रवेशन और हर तरह की जाँच पड़ताल के बाद ही देश में आने दिया जाए।" सुनते ही धैर्य छूट गया उनका। सबकुछ भूल गए मथुरा प्रसाद। सर पकड़कर धम से वहीं बैठ गए। मुँह बाए एकटक देखते रह गए। बड़ी गुस्सा आ रही थी उन्हें मित्र बाँकेबिहारी पर जो कि ओरिजिनल पत्नी को सास की सुरक्षा में छोड़कर, कॉपी की जुगाड़ में कल ही आ पहुँचा था यहांपर। पर अब उसे दोष भी तो नहीं दिया जा सकता, ... विदेश मंत्रालय का सख्त आदेश भी तो ठहरा,
" कृपया विदेश-यात्रा दौरान अनिवार्य चीजों की कॉपी अवश्य साथ लें।"....
उड़ते अबीर और गुलाल और पिचकारियों की तीखी और रंग-बिरंगी छेड़छाड़---काँजी, बड़े, मीठी गुँजिया और सेव--- होली का त्योहार ही ऐसा है कि याद आते ही मन खुद ही ऊदा-ऊदा और रंगीन हो उठता है, बिल्कुल फागुन के मौसम की तरह ही। पर कहाँ से शुरु करूँ होली की ये रंगभरी बातें, जब कि इतनी सारी यादें नटखट शिशु सी पालथी मारे सामने आ बैठी हैं और जिद पर जिद किए जा रही हैं ---हमारे बारे में बताओ ना----हमारे बारे में लिखो, तुम्हारे पाठकों को अच्छा लगेगा? चलिए, शायद वहाँ से, जब पहली बार कई बरस पहले, दूर कहीं बचपन में उस बारात के साथ उँटों पर चढ़कर राजस्थान के दूर दराज के गांव में गए थे और जहाँ तक पहुँचने का शायद वही एकमात्र जरिया भी था, या फिर मथुरा वासियों के लिए कुछ नया हो जाए, यह सोचकर ऐसा आयोजन किया गया था, पर ऊंटों की बारात तो उतनी नही, हाँ, लड़की वालों ने फूलों की माला और रोली के टीकों के बाद , बरात की जो जोरदार होली खेलकर आबोभगत की थी वह आज भी याद है। आजभी मन उन महकती टेसू और गुलाब की पत्तियों की बाल्टियों से नहाया हुआ है और वह गीला टूटते-बिखरते बूँदी के लड्डुओं का स्वाद, उन रसीली गालियों के साथ ज्यों का त्यों बरकरार है। या फिर बनारस की गुलालों वाली नाच-गानों के रंग से सजी बजड़ों पर बीती होलियाँ और गंगा किनारे के वे मुखरित मूर्खाधिवेशन ---या फिर शुरू करूँ वहाँ से, जब हमारी पहली-पहली होली थी अपनी नई नवेली भाभी के साथ और हम बच्चों की बानर सेना ने कई कई योजनाएँ बना डाली थीं पर जाने कैसे दादा जी को हर बात की खबर पहले से ही लगजाती थी और वह योजना को नामंजूर कर देते थे---और तब हारकर बागडोर हमने खुद अपने हाथों में ली थी और पूरा ही मिशन एक बेहद खुपिया तरीके से संचालित किया गया था। जब भाइयों की सभी योजनाएँ ज्यादा हुड़दंगी सिद्ध हो चुकीं --कुछ और नया और भाभी को कम परेशान करने वाला सोचने पर बात आई , तो फिर होली के दिन सुबह सुबह अपने नए पोस्टर कलर और ब्राश लेकर हम सोती भाभी के सिराहने जा पहुँचे और बेहद सिद्धहस्त कलाकर की तरह सारी लीपा पोती करके चुटकियों मैं कमरे से बाहर भी निकल आए और हमारी शरारतों से बेखबर भाभी सोती ही रह गईं। हाँ सुबह-सुबह जब सर ढके, छमछम करती भाभी ने आकर बड़ों के पैर छुए तो एक-से-एक गंभीर स्वभाव वाले बड़ों का भी हंसते हंसते बुरा हाल था। यह बदमाशी किसने की है---दादाजी की कड़कती आवाज यकायक गूंजी और घर भर की आंखें हम पर आ अटकीं। परेशान, घबराई- शरमाई भाभी जबाव सुने बगैर ही, तुरंत ही वापस कमरे को दौड़ीं। अपना वह होलीवाला चेहरा देखकर उनका क्या हाल हुआ होगा, इसका अन्दाज आसानी से नहीं लगाया जा सकता। फिर जब रामलीला के रावण जैसा अपना दाढ़ी मूँछ वाला वह मेकअप पोंछकर भाभी वापस लौटीं तो पूरी तरह से होली के अस्त्र शस्त्रों से लैस थीं और फिर तो दो तीन घंटे तक वह होली का हुड़दंग मचा कि मुझ जैसे बन्द कमरे के अन्दर से ही सारा खिलवाड़ देखने वालों को भी महीनों लग गए चेहरे, गर्दन और हाथ पैरों से रंग पोंछते -छुड़ाते;--- इसबार रंगों के साथ अल्म्यूनियम पेंट और शू पौलिश सभी कुछ मिला हुआ जो था। या फिर शायद वह होली जो यहाँ इंगलैंड में खेली गई थी और जिसमें चुटकी भर गुलाल के अलावा और कोई रंग ही नही था। यूँ तो यहाँ इंगलैंड में सब त्योहार करीब करीब एक से ही महसूस होते हैं क्योंकि सभी का प्रमुख आकर्षण वही खाना और नाच गाना ही रह जाता है, परन्तु वह होली फ़र्क और यादगार थी।- डाँ कूपर नए नए हमारी बिÏल्डग में आए थे और शायद कुछ दिन भारत में रहे भी थे क्योंकि अक्सर ही वह भारत और भारतीय तौर तरीके और तीज त्योहारों के बारे में भी बात करते रहते थे और कई बार उन्होंने बताया था कि कैसे भारत की रंग-बिरंगी तीज त्योहारों वाली संस्कृति और उत्साह उन्हे आज भी याद आता है और हजारों तीज त्योहारों की यादों ने ---तरह तरह के पकवानों ने उनकी फिरसे एक भारतीय परिवार से जुड़ने की चाह को और भी प्रगाढ़ कर दिया है। वैसे भी आम आदमियों से थोड़ा हटकर ही थे वे, बिल्कुल मनमौजी किस्म के। पाँच साल इंजिनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद मन हुआ कि नहीं डॉक्टर ही बनना है, तो अगले पाँच साल तक मेडिसिन पढी और डॉक्टर बनकर ही दम लिया। हाँ तो हम बात कररहे थे होली की---सुबह सुबह ही उस दिन कूपर साहब पधार चुके थे और पूछ रहे थे कि आज तो होली है--- खेलोगी नही? लाचार मैं उठकर गई और तश्तरी में गुलाल और मिठाई ले आई। हम तीनों ने आपस में गुलाल लगाया। मिठाई खाई और बनारस के स्वयंभू वाले मिश्रा जी की बोतल से बनाकर ठँडाई भी पी ली। पर कूपर साबह का मन भरा ही नही था। जाते ही पाँच मिनट बाद फिर दरवाजे पर घंटी थी और दरवाजा खोलते ही बुरा न मानो होली है कहकर उन्होंने बाल्टी भर पानी से नहला दिया , गनीमत थी कि पानी अच्छी तरह से गरम था और सीढ़ियों और जीने पर कालीन नही था। पति भी तबतक दौड़े दौड़े वहां आ चुके थे और बाल्टी लेकर मेरे पीछे खड़े थे। फिर क्या था बात आग की तरह बूरी बिÏल्डग में फैल गई। और सभी जुड़गए होली के उस नहाने और नहलाने के हुड़दंग में जो कि दोपहर देर तक चलता रहा। और यही नही बाद में हम सबने मिलजुलकर चाय भी पी, वहीं बाहर लौन में ही। और जी भरकर होली की परंपरा को कायम रखते हुए गाना बजाना भी हुआ ---हास परिहास हुआ। जिनके पास यादें थीं उन्होंने यादें बाँटीं और जिनके पास चुटकुले थे उन्होंने चुटकुले। कितनी होलियाँ आईं और चली गईं पर आजभी उस होली की, अच्छी खासी ठंड के बाद भी, उसके उत्साह और जोश की---वह भी इंगलैंड में... याद आते ही होठोंपर आई मुस्कान रुक नही पाती।----
शैल अग्रवाल
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बाथ टब की होली
अपने देश से यहाँ आ के बहुत कुछ पाया पर इस बहुत कुछ पाने मे जो खोया वो बहुत कुछ से बहुत ज्यादा था .अपने देश जैसी बात तो यहाँ है नही विशेष कर जब बात हो त्यौहारों की .सब कुछ जैसे छोटा हो जाता है एक जगह मे सिमट जाता है। .आप सोच रहे होंगे की मै अचानक ये क्या रोना लेके बैठ गई .जानते है अभी होली आई थी आई थी न .अरे भाई आई थी मै इस बात को बारबार क्यों कह रही हूँ आप के लिये नही ख़ुद को यकीन दिला रही हूँ की हाँ यहाँ भी आई थी होली .मै आप को बताना चाहती हूँ कि मै एक संवेदनशील लड़की हूँ और हर चीज मै संवेदनाओं के साथ हास्य भी ढूंढ लेती हूँ अब आप सोचेंगे की मै क्या कहना चाहती हूँ आप पढ़ते रहिये मै बताती जारही हूँ अरे रुक गए नही नही रुकिए नही, पढ़ते रहिये, .हाँ तो होली आई यहाँ पे यानि डैलस मे होली सिकुड़ के मन्दिर के प्रांगण मे सिमट जाती है वहाँ मेला सा लगता है, पर अपने देश वाली बात कहाँ... .वहां तो रंग भी खेला जाता है पर एक दूसरे को पूछ पूछ के रंग लगाया जाता है क्यों भाई रंग लगा दूँ .यदि हाँ तो लगा दिया यदि आप अपने ग्रुप के साथ है तब ठीक वर्ना अनुमति लेते रहिये, यदि नही पूछा और रंग लगा दिया और खुदा न खस्ता उसको रंग से अलार्जी हुई तो बस आप की हो-ली। होली .के रंग में भंग हो सकता है। यहाँ .आनद बाजार भी लगता है ये मुझको बहुत पसंद है खूब खाओ ........अलग अलग पकवान ... पर जानते है मै जहाँ रहती हूँ डेनटन मै वहां से मन्दिर ५० मिनट की ड्राइव है अब इतनी लम्बी दूरी तय कर के बच्चों को ले के जाओ फ़िर रंग लगाओ (पूछ पूछ के ) है न कितनी मेहनत का काम... ऐसा नही है के मै गई नही हूँ, मै गई हूँ तभी तो आप को ये सब बता रही हूँ तब मेरे साथ मेरी बेटी ही थी .अब इन छोटू महाराज के आने के बाद तो थोड़ा और मुश्किल हो गई .तो मेने सोचा की क्यों न घर मे ही होली मनाई जाये .अब सोच तो लिया पर कहाँ किस जगह खेलूं ये बहुत बड़ी समस्या आ गई .आप हँस रहे है न कह रहें होंगे की भाई घर है वंही खेलो सड़क है वहां खेलो इतना सोचने की क्या बात है हुम................ यहाँ आपने देश जैसी बात है कहाँ, दोस्तों घर के बाहर खेला तो शिकायत होगी और जो लीजिंग ऑफिस के लोग है न वो जुर्माना कर देंगे होली के दिन फटका (चूना ) लग जायेगा .और घर के अंदर खेला तो कार्पेट गंदा होगा और उस की सफाई ख़ुद से तो होगी नही किसी को बुलाना होगा और उसके लिए देने होंगे आपनी गाढी कमाई के कीमती डॉलर.... तो क्या किया जाए..। फ़िर नजर गई रेस्टरूम पे यानि की बाथरूम पे बस फ़िर क्या था हम घुस गए बाथटब मे खूब रंग लगाया एक दूसरे को बच्चों को भी मजा आया क्यों कि आज के दिन तो अपने घर पर माँ खुद घऱ को गंदा करने को कहती थी। खूब रंग उछाला गया थोड़ा डर तब भी था दीवारों का .उसके बाद बाथ टब मे पानी भरा गया उसमें रंग डाला गया .और उसमें डुबकी लगाई। मेरी बेटी तो बहुत खुश थी कहती है की आइ लाइक कलर बाथ .तो कलर बाथ के बाद साफ पानी से नहाकर सभी बाहर आ गये....और ऐसे हुई हमारी बाथ टब की होली...। पर एक बात बताऊँ जब अपने देश भारत में रंग खेलते थे तो बाद मे बहुत नींद आती थी उसी तरह से बाथ टब होली के बाद भी खूब नीद आई .दोस्तों यदि आप के पास आपना घर है तो आप बैक यार्ड मे होली खेल सकते है पर नहाना भी वहीं पड़ेगा क्योंकि रंग मे भीगे हुए आप घर के अंदर नही जा सकते वरना कार्पेट ख़राब होगा तो अच्छा है की मेरी तरह बाथ टब की होली खेल कर ही होली का भरपूर मजा लिया जाए... जानते है मैं चाहती थी कि होली की मस्ती को बस यहीं पर खत्म करके आराम करुं मगर इसके आगे तो और भी बहुत कुछ था.... शाम को घर पर एक छोटी सी पार्टी रखी थी खाना तो पहले से ही बना लिया था बाकि थी पूड़ी कचौड़ी तलनी .भइया यहाँ का घर है तलने से पहले बहुत इंतजाम करने पड़ते है खिड़की खोलो महक सोखने वाली मोमबत्ती जलाओ तब जा के तलो, वरना आने वालों को परेशानी होगी .और आपके घर मे खाने की खुशबू भर जायेगी . सब हो गया लोग आगये .बातें की हँसी ठहाकों के साथ गपशप करते करते थोडी रात हुई तो हमको अपनी आवाज धीमी करना पड़ी क्योंकि पडोसियों तक हमारी आवाज नहीं पहुँचनी चाहिए.... क्या अपने देश में हम कभी ऐसा सोचते हैं कि पड़ोस में रहने वाले को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए... हम तो अपने घर के मालिक होते हैं जितनी मर्जी होगी उतना शोर मचाएंगे . खाना खाने के बाद मैने घर आए सभी मेहमानों का मजाकिया टाईटल देकर उनका खूब मजाक उड़ाया और जाते-जाते सबको एक टीका लगाकर कहा बुरा न मानो होली है.....तो ऐसी रही भारत से हजारों किलोमीटर दूर अमरीका के डैलास शहर की होली.....कभी आपका होली खेलने का मूड हो तो आजाईये ...अगली होली पर..।
इन दिनों चारों ओर होली की बहार है। साल भर मुखौटा लगाकर घूमने वाले इस फिराक में हैं, कि कम से कम एक दिन तो अपने ‘असली’ रूप में सांसरिक स्टेज पर अवतरित होकर, बिना हींग-फिटकरी के, चोखा रंग बिखेर सकें। बच्चों में बला का उत्साह है, जवानों में गज़ब का जोश है और ‘ सीनियर सिटीजन्स ‘ की लुप्त हसरतों की बासी कढ़ी उबलने को बेताब है-गोया तमन्नाएँ ‘ रॉक एंड रोल‘ करती फिरती हैं। जो बदनसीब ‘ वेलन्टाइन-डे‘ के खुले आमंत्रण के दौरान, नयनसुख उर्फ ‘ चक्षु व्यायाम‘ तक से वंचित रह गए थे, वे भी स्पर्श-कामना के दिवास्वप्नों में मग्न हैं।
टी.वी. के हर चैनेल पर, होली के चुनिन्दा मदमस्त गीत, जन-जन के तन-मन पर, बला की उर्जा बरसाते हुए, अज़ब की उष्मा का पलीता लगा रहे हैं।
यूँ तो उन पचास ‘ वसन्तों‘ की अपनी रंग-विहीन जिन्दगी में, हर साल ही अपने इर्द-गिर्द की होली देख पाने के अवसर मिलते ही रहे हैं, किन्तु इस बार दिल से तमन्ना की, कि कुछ खास लोगों की होली का अन्दरूनी ज़ायज़ा लिया जाये-सो सबसे पहले, हम एक मशहूर फिल्लम-अभिनेत्री के बदनाम सेक्रेट्री को किसी तरह पटाने के बाद, उनके ड्राइंगरूम में दाखिल होकर पूछ बैठे -‘‘ हां, तो सुश्री मुनमुन जी, आप होली कैसे मनाती हैं? “ उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के कहा-‘‘ जी, आप तो जानते ही हैं, कि हमें तो साल के बारहों महीने मेकअप के रंगों को ओढ़ना-बिछाना पड़ता है और ‘ टेक-रिटेक‘ के चक्कर में जबरन की इतनी ‘ चिपटा-चिपटी ‘ हो जाती है , कि मैं तो होली के दिन, अज्ञातवास के बिस्तर पर, चादर तानकर चैन की नींद सोती हूँ। वैसे भी उन बेगेरतों से क्या होली खेलना, जो मुझ जैसी ‘सती-सावित्री‘ की ‘ पर्सनल लाइफ‘ के जीवन में सदा कीचड़ उछालते रहते हैं। हां, शाम को कुछ खास लोगों की महफिल में खा-पीकर दो-चार ठुमके लगा लेती हूँ।‘
किसी ‘हीरो नं. वन ‘ आतंकवादी के रूबरु होने का दुस्साहस तो अपने बस की बात है नहीं, अतः हमने एक खूंखार ‘ जालिम खां‘ को फोन करके पूछा- ‘ महामहिम जी, होली के शुभ दिन आप अपनी प्राणेश्वरी ए.के. 47 से जुदा होकर कुछ मौज-मस्ती करते हैं या.... ? ‘ उन्होने गर्जनापूर्ण वाणी में उचारा-‘‘ मां कसम! अगर हमसे देवर-भाभी और जीजा-साली की होली की बात कर रहे हो, तो फोन पर ही ‘ शूट‘ कर दूंगा। अरे ! हम मर्द हैं –हम तो ख़ून की होली खेलते हैं, जो साल के 365 दिन कभी भी और कहीं भी खेली जा सकती है । नामाकूल! गुलाल-अबीर में वह दमख़म कहां, जो हमारी ‘ इस्टाईल ‘में दूसरों के रंग में भंग कर सके। बाक़ी मौज-मस्ती तो हम किसी भी शरीफ या बदमाश की इज्जत की होली जलाते जब-तब करते ही रहते हैं।‘‘
कुछ देर बाजार में मटरगश्ती के दौरान, हम एक फुदकते हुए छात्र नेता से टकरा गये। लगे हाथों हमने उनसे भी पूछ ही लिया- ‘‘ इस बार होली पर जनाब के क्या इरादे हैं ? “ , उन्होंने अट्टाहास का रंग बिखेरते हुए फ़रमाया-‘‘ यू नो, होली मीन्स हो हुल्ला एंड हुड़दंग। सो हमारी स्टूडैंट-बिरादरी होली को बहुत ‘लाईक‘ करता है। पेड़ों कोकाटकर सड़कों पर ‘ले‘ करना और ड्राइवरों, सवारियों से चरस पीने के लिए ज़बरन चन्दा मांगना तो हमारा एनुअल प्लान है ही, इस बार भंग की तरंग में गली-गली घूमने के मुकाबले, हम होली को लार्ज-वाइड लेबल पर सेलिब्रेट करना मांगता है।‘‘
अभी हम छात्र-नेता के खयाली-पुलाव-कुंड में डुबकी लगा ही रहे थे, कि सामने चौधरी मिश्री लाल जी अपनी गद्दी पर विराजमान दिख गये। हमने उनसे हंसी-हंसी में पूछा, ‘‘नेता जी, क्या ठाठ हैं आपके। इस बार होली पर आपका क्या परोगराम है ?‘‘ उन्होंने नाक भौं सिकोड़ते हुए बताया- ‘‘ भैया हमें तो रंगों के नाम तक से एलर्जी हैगी, पर क्या करें -राजनीति में तो मन्दिर-मस्जिद के लिए एक साथ लड़ने के बाद भी, इफ़्तार पार्टी और होली-मिलन को एक ही तराजू पर तौलना पड़ता हैगा जी। कुछ दिन पहले सेवैयों का लुफ्त उठाया, अब गुँजिया गटकने के वास्ते हाज़मा दुरुस्त कर रहे हैंगे। ‘‘
तभी हमें अपने दोस्त हल्दीराम की याद आई, जिसके लिए होली मनाना किसी जुनून से कम नहीं हुआ करता था। उसके ड्राइंग-कम-डाइनिंग-कम-लिविंग-कम-बैडरूम रूपी इकलौते कमरे में दाखिल होते ही, उसने हमें गले लगाकर भींच डाला। हमने कहा- ‘‘ कहो प्यारे! तुम्हारा होली का बुखार बरकरार है या वक्त की रफ्तार ने उस बहार को बाहर का रास्ता दिखा दिया है? ‘‘, उसने ‘ छुटती नहीं है गालिब, यह मुँह से लगी हुई‘ के अन्दाज में बताया-‘‘ यार, हमें तो उन नामुरादों के साथ जबरन होली खेलने का शौक था, है और इंशाअल्लाह रहेगा भी- जो होली के नाम पर इस तरह बिदकते हैं, जैसे हजार दमड़े रोज झटकने वाला पनवाड़ी आयकर के नाम पर मुँह पिचकाता है। अहा! क्या सीन होता है-जब अपन किसी कोने में दुबके शिकार को पहले तो टनों पानी से नहलाते हैं, उसके बाद उसके अंग-अंग पर रंग ऐसा रंग पोतते हैं, कि पट्ठा जिन्दगी भर भूल नहीं पाता होगा। पिछली बार तो एक ऐसे ही डरपोक द्वारा दरवज्जा न खोलने पर, हमने उसकी छत की टंकी में थोक भाव से रंग घोल दिए थे।
अगली प्रातः मन्दिर के आहते में, शिव के अनन्य भक्त श्रीमान रिश्वत लाल के सुपुत्र श्री नटवर लाल के दर्शन हो गये। हमने उस हस्ती से करबद्ध निवेदन किया- ‘‘ महादेव, क्या आप बमभोले जी को साक्षी मानकर अपनी ‘अन्दरूनी‘ होली का खुलासा देने का कष्ट करेंगे? ‘‘, उन्होंने बेहिचक बता ही डाला ‘‘आप तो जानते ही हैं, कि जहां हमारे पिताश्री का मूल मंत्र रिश्वत लेकर भी काम न करना है, उसी परम्परा में हम भी गुलाल की बोरियों में और कुछ भले ही डालें, होली के रंग नहीं मिलाते। अन्यथा हमारे सड़े-गले पीतल पर मुनाफे का सुनहरा रंग कैसे चढ़ पाएगा? ‘‘
मन्दिर से घर की ओर आते समय, पड़ौस में देखा, कि मटरू राम उसी मुस्तैदी से ईंटे ठो रहा है। हमने उससे भी जानना चाहा-‘‘और मटरू, होली पर तुम का करत हो? ‘‘ बेचारे के बदरंग चेहरे पर, हल्की सी मुस्कान चली आयी। उसने ठंडी सांस लेकर कहा- ‘‘ बाबू जी, आप तो जानत हो, साल भर मुई मंहगाई अऊर ससुरी सरकार की वजह से, पल भर का चैन नाहीं मिलत। सो, होली के दिन हम सब दुःख-दर्द भुला के, अद्धे-पव्वे की तरंग मां मस्त हुई के, खूब होली खेलत रहिन।‘‘
मटरू की बेचारगी के मुक़ाबले, आसपास देखता हूं, तो लगता है, कई महानुभावों का तो हर दिन होली का दिन और हर रात दिवाली की रात होती है। उनका हर दिन किसी ना किसी को चूना लगाने में बीतता है, फलस्वरूप हर रात उनकी हवेलियों में घी के चिराग जगमग करते फिरते हैं। पता नहीं, इन लोगों की होली हो ली कब होगी?
बसंत का मौसम जब अपने पूरे यौवन पर आ जाता है तब चारो ओर फागुन की मस्ती और इन्द्र धनुशी रंगों की बयार बहने लगती है।हर त्यौहार का अपना रंग अपना महत्व है लेकिन फागुन का मौसम जब आता है अपने साथ रंग गुलाल की फुहार, भंग की तरंग और हर तरफ मौज मस्ती की बयार लेकर आता है। इसका आन्नद ही कुछ और होता है क्योंकि होली में चौतरफा रंगों की फुहार होती है। यानी लाल-पीले-हरे-गुलाबी रंगों का त्यौहार के साथ-साथ भावनाओं के समन्वय एवं मन के मिलन का उत्सव होने के साथ ही फुल टाइम मौज मस्ती, उल्लास एवं उमंग का उत्सव माना जाता है। इस रंगों के पर्व में जहाँ एक ओर साठ वर्श की उम्र का व्यक्ति अपने को जवान नजर आता है वहीं बच्चे भी इस पर्व की मस्ती के आलम में अपने को जवान महसूस करने लगते हैं। अर्थात् रंगों का यह पर्व अपने अन्दर अनेक विविधताओं को समाहित किये हुए है। आखिर इस पर्व की विविधताएं एवं मान्यतायें क्या हैं इसके लिए हमें अपने देश के विविध प्रान्तों की ओर चलना होगा। रंगों का यह पर्व अपने आप में देखने में एक लगता है परन्तु इसे पूरे भारत में मनाने/अपनाये जाने के विविध पहलू हैं। वास्तव में अवलोकन किया जाय तो सच्चे अर्थों में यह रंग पर्व अनेकता में एकता की वास्तविक मिसाल सामने रखता है। इस पर्व के मनाये जाने/खेले जाने के अनेक तरीके होते हैं। जैसे कि नाम से रंग के रूप में यह पर्व रंगों के द्वारा मनाया जाता है पर कहीं-कहीं यह गुलाल के साथ, कहीं यह फूलों के रूप में मनाया जाता है तो कहीं पत्थरों से, कहीं-कहीं इस पर्व में लट्ठ चलते हैं तो कहीं से कोड़े के साथ इसका आगाज किया जाता है तो कहीं आटे, कीचड़ से, कहीं-कहीं दूध, दही मट्ठे और कढ़ी से भी खेलने का रिवाज परम्परागत रूप से आज भी चल रहा है। महाराश्ट्र एवं गुजरात में होली (रंगपर्व) के दिन आम स्थान एवं सड़कों के बीच एक निश्चित ऊँचाई में दूध-मक्खन की मटकी को किसी आधार में बाँध देते हैं। यहाँ के लोगों में ऐसी मान्यताएं एवं वि वास है कि भगवान कृश्ण (माखन चोर) आकर इसे खांयेगें और अपने ग्वालों को भी खिलांएगे। इसी समय उमंग एवं वि वास के साथ सभी लोग 'गोविन्दा आल्हा रे` जरा मटकी संभाल ब्रजबाला ` का सामूहिक गायन करते हैं। 'रंग पंचमी` के नाम से ग्रामीण इलाकों (महाराश्ट्र) में इसे मनाया जाता है। रंगों के इस पर्व को पंजाब में 'होली मोहल्ला` कहते हैं जिसे सिख समुदाय के एक पंथ के लोग रंग पर्व के अगले दिन अपने प्राचीन हथियारों के साथ स्वांग रचने का भव्य आयोजन करते हैं। वहीं हरियाणा में भी इस रंगपर्व को बड़े उत्साह के साथ मनाता है। घर में परिवार के सदस्यों के साथ भाभी अपने देवर को साड़ी के फंदे बनाकर मारने/पीटने का नाटक करती हैं वहीं दूसरी ओर चौराहे एवं सड़कों पर दूध-मक्खन से भरी हांडी (मटकी) को दो आधारों के बीच बांधकर पुरूश वर्ग पिरामिड के आकार में बनकर उसे तोड़ने का उपक्रम करते हैं। यहाँ की स्थानीय भाशा में इसे 'धुलेडी होली` भी कहते हैं। पं० बंगाल में इस पर्व के दिन श्री कृश्ण और राधा की मूर्ति को सभी लोग एक झूले में रखकर उनके चारों ओर झूमते हैं इसके साथ ही रंगों का आपस में आदान-प्रदान कर बैंड बाजे के साथ होली पर्व मनाते हैं। यहाँ इसे 'दोल यात्रा` के नाम से जाना जाता है। महत्वपूर्ण यह है कि बंगाल में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने होली के नये रूप `बसंत उत्सव` से परिचित कराया। वर्तमान में शांति निकेतन विश्वभारती विश्वविद्यालय में होली को बसंत उत्सव के रूप में मनाते हैं। राजस्थान (बाड़मेर) में पहले फूलों एवं पत्थरों से होली खेली जाती थी। वर्तमान में मांडवा में लोग सिर्फ अबीर-गुलाल से इस रंग पर्व को मनातें हैं और रंगों का प्रयोग नहीं करते हैं। दक्षिण भारत में भी इस रंगपर्व को लोग उत्साह से मनाते हैं। साथ ही एक दूसरे के घर पर जाकर शुभकामनाएं देते -लेते हैं। दक्षिण भारत में इस रंग पर्व को 'कामुस पुत्ररू` कहते हैं। मणिपुर में होली को 'योगंस` कहते हैं। चांदनी रात में लोग ढोल बजाकर लोकगीत गाते हैं। यहाँ के लोग अपनी परम्परागत/पारंपरिक सफेद और पीली पगड़ी बांधकर यहाँ के प्रसिद्ध लोकनृत्य 'थाबल` पर थिरकते हैं। सबसे बड़ी विशेशता यह है कि इस पर्व को लोग यहां छह दिन तक मनातें हैं। और अन्तिम दिन इसे श्रीकृश्ण मन्दिर में धूम से मनाकर समाप्त करते हैं। उड़ीसा प्रान्त में श्रीकृश्ण की इस पर्व में पूजा न कर भगवान जगन्नाथ की मूर्ति को लोग झूलें में रखकर झुलाते हैं। भारतीयों में यह रंगों का उत्सव सभी राज्यों में किसी न किसी रूप में दिल की उमंग एवं मस्ती का सम्पूर्ण उत्सव माना जाता है परन्तु यदि उत्तर प्रदेश, बिहार एवं मध्य प्रदेश की बात न हो तो यह रंग पर्व अधूरा रह जाता है। उत्तर प्रदेश में इस रंग पर्व के मनाये जाने का अंदाज ही अलग है। मथुरा एवं बरसाने की होली तो अब अंतर्राश्ट्रीय हो गयी है। यहां (बरसाना) में महिलाएं पुरूशों को लट्ठमारकर एवं आपस में रंग डालकर होली मनाती हैं। इसलिए यहां की होली को 'लट्ठ मार` होली कहते हैं। बिहार, म० प्र० राज्यों में लोग होलिका दहन के अगले दिन शाम के समय सामूहिक रूप से बैंड बाजे एवं ढोल के साथ निकलते हैं और अपने इश्ट मित्रों से मिलकर इसे मनाते हैं। कीचड़ एवं रासायनिक रंगों का प्रयोग करके कुछ विकृत मानसिकता के लोग इस रंग पर्व की महत्वता को कम कर रहे हैं। परन्तु कुछ भी हो इस दिन का वातावरण बड़ा धांसू रहता है और कहीं फाग का गायन होता है तो कहीं लोग लोकगीत गाते हैं। कहीं रास का गायन होता है तो कहीं पर रसिया का नाच-नाचकर लोग अपनी खुसी का इजहार करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे देश के लोग भले ही अलग-अलग रहन-सहन, तौर-तरीकों में रहते हों, इसके साथ ही उनकी परम्पराओं एवं मान्यताओं में कितना ही 'मध्यान्तर` क्यों न हो पर इस रंगपर्व के माध्यम से यह तात्कालिक सन्देश तो जरूर लोगों के जेहन में रहता है, कि इस रंग पर्व में भाईचारा मौजस्ती, उमंग, उल्लाह निहित रहता है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि-
भूल-चूक हो माफ कि भैया, ऐसा उड़े गुलाल। भ्रश्टाचार, आतंकवाद, वैमनस्य जले होली में, देश बने खुशहाल।।
होली का मतलब मिलन, रंग-अर्थ है प्यार। मिले सभी आ कर तभी, सतरंगी संसार। फागुन में सब जल गया, जितना भी था रार, निर्मल मन को कर गया, ये अद्भुत त्यौहार.. फाग लिए अनुराग की, पिचकारी के साथ, कर देता है प्यार की, अंतस में बरसात।
रक्षाबन्धन की अवधारणा यदि विप्र और सुकुमार वर्ण के संरक्षण हेतु कभी की गई होगी, तो दशहरा शौर्य प्रदर्शन यानी क्षत्रियों के लिए रचा गया था। दीपावली व्यापारियों की संतुष्टि के लिए थी तो होली आम जनता यानी शूद्रों का बेबाक त्योहार था, जिसमें नाच-गाना, मांस-मदिरा ही नहीं, गाली-गलौज तक का भी खुलकर प्रयोग हुआ करता था। पूर्णतः कुंठाहीन और स्वच्छंद था यह त्योहार और हफ्ते-हफ्ते या पूरे पखवाड़े भर चला करता था । छोटे-बड़े, दोस्त-दुश्मन, सभी खुल कर गले मिलते, और जी भरकर एक-दूसरे के साथ छेड़छाड़ करते।
मध्यकाल के आते-आते यह रजवाड़ों और मन्दिरों में भी जगह पा चुका था और आज भी राजा-रजवाड़े और ज्ञानी-ध्यानी ही नहीं, जनसाधारण के भी हृदय के बेहद करीब है यह पर्व, जिसमें अमीर-गरीब, बच्चे-बूढ़े, सभी खुलकर हिस्सा लेते हैं। इक्कीसवीं सदी तक आते आते तो अब सौहाद्र और भाईचारे का प्रतीक बन चुका है यह होली का त्योहार...जिसमें कट्टर विरोधी सांप्रदायिक और राजनैतिक संस्थाओं व नेताओं और जान-साधारण को एक ही मंच और एक ही परिसर में हंसते-गाते, गुलाल का टीका लगाते लगवाते देखा जा सकता है। राजनेता से लेकर अभिनेता तक, सभी के यहां इसे धूमधाम से मनाने की परंपरा-सी चल पड़ी है। ब्रिज और राजस्थान में बहुत ही धूमधाम से और विविध श्रृंगार और गीत-संगीत के साथ मनाई जाती है होली..मुख्य़तः मन्दिरों और सामाजिक संस्थानों में। युवा वर्ग के साथ-साथ, विदेशी पर्यटकों तक को लुभाने लगे हैं ये होली के आयोजन और राग-रंग। विदेशियों के मन में इनके प्रति आकर्षण दिन-प्रतिदिन और और बढ़ता ही जा रहा है। कुछ वासन्ती मौसम की मादकता और कुछ नित नए तरीके से रंग खेलने की प्रथाएं आज इसे सबका ही प्रिय त्योहार बना बैठी है। इस त्योहार में सामूहिक जुलूस, नाच-गाने आदि की बहुलता...मौज-मस्ती के माहौल के साथ-साथ एक हर्षोल्लास भरी उन्मुक्तता जो है। आश्चर्य नहीं कि भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में होली के समकक्ष या समरूप, होली जैसे ही त्योहार मनाए जाते हैं।
घाना का होमोवो
अफ्रीकी देश घाना में होली की तरह होमोवो मनाया जाता है। ड्रम की तेज आवाज पर रात में लोग खूब नाचते-गाते हैं। वहाँ की महत्वपूर्ण फसल शकरकंद और उबले अँडे से एक खास डिश तैयार की जाती है, जिसे लोग बड़े चाव से खातेहैं। इस दिन गाँव के मुखिया से आशीर्वाद लिया जाता है। चमकीले रंग का खास परिधान भी लोग पहनते हैं।
चीन में मून फेस्टिवल
चाइनीज कैलेंडर के अनुसार, आठवें महीने के पंद्रहवें दिन चीन में मनाया जाता है मून फेस्टिवल। चावल और गेहूँ की अच्छी फसल होने पर यह त्योहार मनाया जाता है। इस समय पूरा चंद्रमा दिखाई देता है। चीनी किवदंती के अनुसार इस दिन चंद्रमा का बर्थडे होता है। कथा के अनुसार चांग ओ नामक महिला उड़कर चंद्रमा तक पहुँच गई थी, जो आज भी पूरे चांद में दिखाई देती है। इस दिन लोग पूरे परिवारके साथ फुल मून देखते हैं, जो अच्छे भाग्य और मधुर संबंध का प्रतीक माना जाता है।
कोरिया का चू सुक
कोरिया में नई फसल को सेलिब्रेट करने के लिए चू सुक मनाया जाता है। यह आठवें महीने के पंद्रहवें दिन मनाया जाता है। इस दिन एक दूसरे को मुबारकबाद देने के लिए लोग विशेष भोज का आयोजन करते हैं। जिसमें परिजनों को चावल, तिल और अखरोट से बना केक परोसा जाता है। औरतें घेरा बनाकर नाचती-गाती हैं।
स्पेन में ला टोमेटिना
स्पेन के वेलेंसियन शहर में हर साल टमाटर उत्सव मनाया जाता है। इसमें भाग लेने वाले लोग एक-दूसरे पर टमाटर, पानी के गुब्बारे और गुलाल फेंकते हैं। यह अगस्त में अंतिम बुधवार को मनाया जाता है।
कैलिफोर्निया का ग्रेप स्टैम्प फेस्टिवल
अमेरिका के कैलिफोर्निया प्रांत में अंगूर की अच्छी पैदावार की खुशी मनाने के लिए ‘ ग्रेप स्टॉम्प फेस्टिवल ‘ मनाया जाता है। दो बड़े पीपों में कई टन अंगूर डाला जाता है। आसपास इटैलियन म्यूजिक बजाया जाता है। इस दौरान डांस, प्ले कौम्प्टीशन और कई प्रकार के व्यंजनों की भी व्यवस्था होती है। इसके बाद बच्चे, बूढ़े और जवान सभी हंसते-गाते हुए पैरों से अंगूर मसलते हैं।
थाइलैंड का सॉनाक्रन
थाइलेड में हर वर्ष 13 अप्रैल को सॉनाक्रन मनाया जाता है। यह उत्सव लगातार तीन दिन तक चलता है। सॉनाक्रन का मतलब स्थान बदलना होता है। दरअसल इसी दिन सूर्य अपनी स्थिति बदलता है। यह वाटर फेस्टिवल भी कहलाता है, क्योंकि यहाँ पर मान्यता है कि पानी बैड लक को धो देता है। इस दिन परिवार के सभी लोग एक जगह एकत्रित होते हैं। माता-पिता और घर के बुजुर्गों के हाथों पर सुगंधित पानी छिड़का जाता है और उन्हें उपहार भी दिया जाते हैं। बड़े-बुजुर्ग छोटों को समृद्धशाली होने का आशीर्वाद देते हैं। दोपहर में भगवान बुद्ध की मूर्ति को स्नान कराया जाता है और फिर सभी लोग एक दूसरे पर पानी फेंककर खुशियां मनाते हैं।
अमेरिका में हेलोइन व होबो
अमेरिका में 31 अक्टूबर को हैलोइन नामक रंगों का त्योहार पूरे उल्लास के साथ मनाया जाता है। इसके अलावा एक अन्य त्योहार होबो भी मनाया जाता है। इसमें लोग अजब-गजब पोशाक पहनकर होबो बनते हैं। किसी के पतलून की एक टांग गायब होती है तो कोई शर्ट का बटन पीछे की ओर लगाए होता है। किसी के एक पैर में जूता होता है तो दूसरे में चप्पल। चेहरे पर इस तरह रंग पोता जाता है कि घर वाले भी पहचान नहीं पाते। होबो लोगोंकी सभा में जो सबसे ज्यादा बेहूदगी करता है, उसे विजेता मानकर ताज पहनाया जाता है।
पोलैंड में आरशिना
पोलैंड के लोग होली की तरह आरशिना नामक त्योहार मनाते हैं। इसमें लोग टोलियां बनाकर एक-दूसरे पर फूलों से बने रंग डालते हैं और गले मिलते हैं।
इटली का बेलियाकोनोन्स
अन्न की देवी को खुश करने और खेती की उन्नति के लिए होली की ही तरह इटली के लोग बेलिया कोनोन्स नामक त्योहार मनाते हैं। भारत की तरह यहां भी लोग शाम को लकड़ियां जलाते हैं, अग्नि के आगे नाचते-कूदते हैं और आतिशबाजी करते हैं। इस दिन छोटे-बड़े सभी एक-दूसरे पर सुगंधित जल छिड़कते हैं और घास के बने आभूषण भेंट करते हैं।
अन्य देशों में होलीकुछ अन्य देशों में भी होली जैसे त्योहार मनाए जाते हैं। भारत के पड़ोसी देश म्यांमार देश में तेच्या नाम से रंगों का त्योहार चार दिन तक मनाया जाता है। मिश्र में फलिका नाम से मार्च महीने में लोग होली जैसा त्योहार सेलिब्रेट करते हैं। यूनान में मेपोल नामक त्योहार में एक खंभा गाड़कर उसके आसपास लकड़ियां रख दी जाती हैं और उसमें त को आग लगा दी जाती है। लोग अपने देवता डायनोसिस की पूजा करते हैं। रूस में 31 मार्च को हास्य पर्व मनाया जाता है और महामूर्ख सम्मेलन भी आयोजित किया जाता है। फ्रांस में 13 अप्रैल को होली की तरह हुड़दंग मनाते और लोगों को रंग गुलाल लगाते हैं। जैसे त्योहार मनाने के अन्दाज भिन्न और व्यक्तिगत होते हैं , वैसे ही भावनाएँ और अभिव्यक्ति भी। इसबार हम आपके लिए लेकर आए हैं, बिना किसी लाग-लगाव के अपने मन की बात कहतीं, कुछ बिल्कुल ही भिन्न और अलबेली सी होली की कविताएं। उम्मीद है आपको पसंद आएँगी।
-शैल अग्रवाल
1.
पंछी करें टीका अम्बर भाल धरा का हो गया तन मन लाल फागुन की अँगुलियों में सजा गीतों का छल्ला नीले पीले रंग चले मचाते हुए हो हल्ला ईद मिल होली से पूछे हाल धरा का होगया तन मन लाल रंगों भरी चादर हटा गुनगुनी धूप झांके गुलाबी ठण्ड थाम के चुनर गलियों गलियों भागे टेसू खिले हर बाग हर डाल धरा का होगया तन मन लाल गोरी की हसुली टूटी नील पड़ा था हाथ सजना की ठिठोली हुई पांव फिसला था हाट लज्जा वश हुए सुर्ख उसके गाल धरा का हो गया तन मन लाल पापड़ चिप्स छज्जे फैले ताके बैठा कौवा घर में गुझिया चहक रही बाग भटक रहा महुआ ठंढाई पीके बदली चाल धरा का हो गया तन मन लाल।
-रचना श्रीवास्तव
2.
मन में रहे उमंग तो समझो होली है
जीवन में हो रंग तो समझो होली है
तन्हाई का दर्द बड़ा ही जालिम है प्रिय मेरा हो संगतो समझो होली है
स्वारथ की हर मैलचलो हम धो डालें छिड़े अगर यह जंग तो समझो होलीहै
मीठा हो, ठंडाईभी हो साथ मगर थोड़ी-सी हो भंगतो समझो होलीहै
निकले हैं बाहरलेकिन क्यों सूखे हैं
इन्द्रधनुष हो अंग तो समझो होली है
दिल न किसी काकोई यहाँ दुखाए बस हो सुंदर ये ढंग तो समझो होलीहै
तन में रंग और भंगहो ज़ेहन में पूरा घर हो तंग तो समझो होलीहै
दुश्मन को भीगले लगाना सीख ज़रा जागे यही उमंग तो समझो होलीहै
रूखी-सूखी खा करके भी मस्त रहो
बाजे मन का चंग तो समझो होली है
इक दिन सबको बुढऊ होना है पंकज दिल हो लेकिन 'यंग' तोसमझो होली है
- गिरीष पंकज
फाग की मीर अमीरनि ज्यों, गहि गोविंद लै गई भीतर गोरी, माय करी मन की पद्माकर, ऊपर नाय अबीर की झोरी। छीन पितंबर कम्मर ते, सुबिदा दई मीड कपोलन रोरी, नैन नचाय मुस्काय कहें, लला फिर अइयो खेलन होरी। -कवि पद्माकर
-लेखनी के सभी पाठकों को मेल-मिलाप के इस रंग-पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ!!